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द्वारका के अधिपति भगवान श्रीकृष्ण एक विकराल चुनौती का सामना करते हैं। प्राग्ज्योतिषपुर का दुष्ट दैत्य नारकासुर (भस्मासुर का पुत्र) स्वर्ग लोक को आतंकित कर रहा है, उसने देवमाता अदिति के कुण्डल चुरा लिए हैं और सोलह हजार एक सौ राजकन्याओं को बंदी बना लिया है। इंद्र सहित सभी देवता कृष्ण से सहायता मांगते हैं। अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा के साथ, श्रीकृष्ण नारकासुर के गढ़ में प्रवेश करते हैं। एक भयंकर युद्ध के बाद, कृष्ण नारकासुर और उसके सेनापति मूर का वध करते हैं, सभी राजकुमारियों को मुक्त कराते हैं, और अदिति के कुण्डल वापस दिलाते हैं। इस ऐतिहासिक विजय के बाद, कृष्ण एक अद्वितीय कार्य करते हुए सभी सोलह हजार एक सौ राजकुमारियों से एक ही शुभ मुहूर्त में विवाह करते हैं। यह गाथा भगवान के ऐश्वर्य, न्याय और उनकी अलौकिक शक्ति का अद्भुत प्रमाण है। #KrishnaLeela #NarakasuraVadha #Satyabhama #BhagavataPurana #Dwarka #Narakasura #Krishna #Satyabhama #BhagavataPurana #Dwarka #Pragjyotishpura #AditiEarrings #16100Queens #MuraRakshasa #Bhumiputra #Varaha #SudarshanaChakra #HinduMythology #PuranicStories #Divin
Transcript
00:00प्राग जयोतिशपुर का महाबली दैत्य नार कासुर, जिसने स्वयंको प्रित्वी और वराह भगवान का पुत्र होने का दम्भभरा, अपनी आसुरी
00:08प्रकृती के गहन अंधकार में डूब कर तीनों लोकों के लिए अभिशाप बन चुका था।
00:30नगरों और गावों पर उसका अत्याचार असहनिय हो गया था, जहां उसने राजाओं को पराजित कर उनके राज्यों को छीना
00:38और प्रजा को दास्ता की बेडियों में जकर दिया।
01:00जिससे स्वर्ग के वैभव और सुरक्षा पर सीधा प्रहार हुआ और देवगण असहाय महसूस करने लगे।
01:30इच्छाओं का शिकार बनाने के लिए उन्हें अपने महल में कैद कर लिया।
01:35नारकासुर के अत्याचारों से त्रस्थ होकर प्रिथवी देवी जो स्वया उसकी जन्नी थी असहनिय पीडा से काप उठीन और अपने
01:44पुत्र की आसुरी क्रूरता पर अश्रु बहाने लगी।
01:47अपने हृदय की गहन वेधना लिये, प्रिथवी देवी ने अपने स्वामी भगवान विश्णू की शरण ली, ताकि वे अपने क्रूर
01:56पुत्र के आतंक से इस संसार को मुक्ती दिला सकें।
02:00भगवान विश्णू ने प्रिथवी के दूहक को सुना, उनकी करूनामई द्रिष्टी ने संसार के कश्टों को भामपा और उन्होंने माता
02:09को आश्वस्ट किया कि वे शीघ्र ही नारकासुर के अत्याचारों का अंत करेंगे।
02:15इसी बीच देवराज, इंद्र और अन्य देवतागन भी नारकासुर के बढ़ते आतंक से भयभीत होकर ब्रहम लोग पहुँचे ब्रहमाजी से
02:24सहायता की याचना करने के लिए।
02:27ब्रहमाजी ने देवों की व्यथा सुनी और उन्हें समझाया की नारकासुर का अंत केवल भगवान विश्नु के अवतार श्री कृष्ण
02:35के हाथों ही संभव है क्योंकि उसे स्वयम पृत्वी देवी और वराह देव का आशिरवाद प्राप्थ था।
02:43नारकासुर के कुकर्मों के कारण स्वर्ग के बागों की शोभा जाती रही, नदिया अपवित्र हो गई और प्रकृती का संतुलन
02:51भंग हो गया था।
02:52उसकी अहंकार भरी हसी तीनों लोकों में गूंजती थी, मानो वह स्वयंको ब्रह्मा, विश्णु और महेश से भी उपर मानता
03:01हो अपनी शक्ती के मद में अंधा होकर।
03:04उसने देवर्शी नारत जैसे महान रिशियों का भी अपमान किया, उनके पवित्र मार्गों को अवरुद्ध किया, और सत्य के प्रकाश
03:13को बुझाने का दुस्सा हस किया।
03:16नारकासुर ने सभी दिशाओं से राजाओं और राजकुमारियों को बलपूर्वक अपने अधीन किया, जिससे प्रित्वी पर न्याय और व्यवस्था का
03:25धाचा चर्मरा गया।
03:27उसके आतंक ने यग्यों और धार्मिक अनुष्थानों को रोक दिया, जिससे देवताओं को मिलने वाला भोग रुप गया और उनका
03:35बलक्षीन होने लगा।
03:38संपूर्ण ब्रहमांड में हाहाकार मच गया, हर प्रानी त्राहिमाम कर रहा था, और ऐसा प्रतीत होता था कि नारकासुर का
03:46अंधकार में सामराज्य कभी समाप्त नहीं होगा।
03:49किन्तु ब्रहमांड के संतुलन को बनाय रखने वाले भगवान विश्नु ने अपनी पत्नी लक्ष्मी और गरुड के साथ भूलोग पर
03:58अवतार लेने का निश्चय कर लिया था, ताकि धर्म की पुनरस्थाप ना हो सके।
04:04नारकासुर की पराकाश्था पर पहुची करूरता और प्रभू के अवतरण के निश्चय ने एक अद्रिश्य संधर्ष की नीव रख दी
04:12थी, जहां अधर्म का अहमकार धर्म के दिव्य प्रकाश से टकराने को था।
04:17ब्रहमांड में हाहाकार मचाने वाले नारकासुर ने अब अपने अत्याचारों को देवलोग तक पहुचाने का निर्णय लिया, जिससे स्वर्ग के
04:26अधिपती इंद्र भी भयभीत हो उठे।
04:30उसकी सेनाएं, जिन में भयानक राक्षस और दानव शामिल थे, स्वर्ग लोग पर आक्रमन करने के लिए पाताल और भूलोग
04:38के अंधकार में कोनों से निकल कर एक जुठ होने लगी।
04:42जैसे ही नारकासुर की सेनाओं ने स्वर्ग की सीमाओं की ओर प्रस्थान किया, आकाश में काले बादल घिराए और भयंकर
04:51गर्जनाए होने लगी। मानो स्वयन प्रकृती भी इस आसन विनाश से काप उठी हो।
04:57स्वर्ग के द्वारपालों और देव सैनिकों ने अपनी पूरी शक्ती से असुर सेना का सामना किया, किन्तु नारकासुर के सैनिकों
05:05की संख्या और कुरूरता इतनी अधिक थी कि वे पीछे हटने को विवश हो गए।
05:11स्वय नारकासुर एक प्रचंड तूफान की भाती स्वर्ग में प्रविष्ठ हुआ, अपने विशाल गदा से देवताओं और दिव्य अस्त्रों को
05:20चूर-चूर करता हुआ, उसके मार्ग में आने वाली हर बाधा को रौंधता चला गया।
05:25उसने देवमाता अधिती के पवित्र आश्रम पर आक्रमन किया, जहां शान्ती और दिव्यता का वास्था, उसे अपने अधर्मी कद्मों से
05:35अपवित्र करता हुआ।
05:37नारकासुर ने बलपूर्वक देवमाता अधिती के दिव्य कुंडल छीन लिये, जो उनके तेज और एश्वर्य का प्रतीक थे, जिससे देवलोक
05:46की गरिमा धूमिल हो गई।
05:48कुंडल खोने के बाद देवमाता अधिती के मुख पर गेहन पीडा और अपमान की छाया मंदरा गई और समस्थ देवलोक
05:57में शोक की लहर दोड़ गई।
05:59नारकासुर की बरबरता यही नहीं रुकी, उसने 16100 राजकन्याओं को विभिन राज्यों से बंदी बना लिया, उन्हें अपने अभेद्य दुर्ग
06:09में कैद करने के लिए।
06:11इन निर्दोश कन्याओं को बलपूर्वक नरकासुर के अंधकार में दुर्ग में घसीटा गया, जहां उन्हें भविश्य की अनिश्चित्ता और भय
06:20के अंधकूक में धकेल दिया गया।
06:23दुर्ग की गहरी, काली कोठ्रियों में बंदी बनी उन राजकन्याओं की चीखें गूंज रही थी, जो अपनी स्वतंत्रता और सम्मान
06:31के लिए त्राहिमाम कर रही थी।
06:34स्वर्ग के देवता, भयभीत और असहाय होकर नारकासुर के बढ़ते आतंक को देख रहे थे, जिसकी कुरूरता ने देवलोग की
06:43शांती भंग कर दी थी।
06:46देवराज इंद्र, जिनका वजर कभी शत्रूओं पर काल बनकर तूटता था, अब स्वयन चिन्ता और निराशा में डूबे हुए थे,
06:54उन्हें कोई मार्ग नहीं सूज रहा था।
06:57तब सभी देवताओं ने मिलकर यह निर्णय लिया कि अब एक मात्र द्वार काधीश भगवान श्री कृष्ण ही है, जो
07:05उन्हें इस विकट संकट से उबार सकते हैं।
07:09अपने विमानों और दिव्य रथों पर सवार होकर, भयभीत देवतागन तुरंत द्वार का की ओर प्रस्थान करने लगे, जहां भगवान
07:17श्री कृष्ण का दिव्य निवास था।
07:20द्वार्का के भव्यद्वार पर पहुँचकर देवताओं ने भगवान श्रीकृष्ण के महल में प्रवेश करने की अनुमती मांगी, उनके हृदय में
07:29एक नई आशा की किरन जग्मगा रही थी
07:33भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य आभासे प्रकाशित द्वार्का के भव्य सभा भवन में सिनहासन पर विराजमान थे, उनके चारों और एक
07:42शांत और तेजस्वी वातावर्ड था
07:45देवराज इंद्र ने नमरता पूर्वक आगे बढ़कर भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी करुणापूर्ण व्यथा व्यक्त करना आरंभ किया, उनके शब्दों
07:55में देवलोग की सम्पूर्ण पीड़ा समाई हुई थी
07:58इंद्र ने नारकासुर के अधर्म, उसके द्वारा देवमाता अधिती के कुंडलों की चोरी और स्वर्गलोग पर उसके भयानक आक्रमन का
08:07विस्तृत वर्णन किया
08:09अंत में उन्होंने 16,180 राजकन्याओं की दैनिय स्थिती का वर्णन करते हुए भगवान से उन सभी को नारकासुर के
08:19कारावास से मुक्ट करने की भावुक प्रार्थना की
08:23भगवान श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र की करुणापूर्ण व्यथा को शांति पूर्वक सुना, उनके मुख मंडल पर गेहन चिंता और संकल्प
08:31का एक जटिल मिश्रन स्पष्ट जलक रहा था
08:35उनकी कमलन्यन आखों में नारकासुर के अधर्म के प्रती तीवर क्रोध की अगनी प्रज्वलित हुई, जैसे ब्रहमांडिय न्याय का एक
08:43ज्वलंत प्रतीक प्रकट हो रहा हो
08:47श्रीकृष्ण ने अपने दिव्यमुखार्विन से वचन दिया कि वे शीघर ही नारकासुर के अहमकार का नाश करेंगे और धर्म की
08:55पुनस्थापना करेंगे
08:57भगवान के आश्वासन से इंद्र का हृदय आभार और राहत से भर गया, जैसे तप्ती भूमी को वर्षा का जल
09:04मिल गया हो
09:06कर्तव्य प्रायन इंद्र ने भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और अपने स्वर्गलोग की ओर प्रस्थान किया, उनके मन में एक
09:14नई आशा का संचार हो चुका था
09:18देवराज के जाने के बाद भगवान श्रीकृष्ण गंभीर विचार में लीन हो गए, उनकी दिव्यग्रिष्टी भविष्य के युद्ध की रणनीती
09:26पर केंद्रित थी
09:28इसी क्षण उनकी प्रियपतनी सत्यभामा ने शान्त भव्यता के साथ कक्ष में प्रवेश किया, उनके मुख पर भी क्रोध और
09:36ग्रिड़ता के भाव स्पष्ट थे
09:39उन्होंने नारकासुर के अत्याचारों और सोलह हजार एक सो राजकन्याओं के दुहक को सुना था, जिसने उनके क्षत्रिय हरिदय में
09:48आक्रोश भर दिया था
09:51सत्यभामा ने अपने पती भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष अपनी वानी बुलंद की, उनके शब्दों में अन्याय के प्रती घोर घेना
09:59और पीडितों के लिए करुणा स्पष्ट थी
10:03उन्होंने द्रिडता पूर्वक अपनी इच्छा व्यक्त की की वे भी इस धर्म युद्ध में उनके साथ रणभूमी में चलेंगी ताकि
10:10अधर्म का नाश कर सकें
10:13भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी के मुख पर जलकते शौर्य और संकल्प को देखा, उनके हृदय में एक क्षण के
10:21लिए विचार उठा
10:23सक्यभामा ने अपनी वीरवी रांधना प्रकृती का स्मरण दिलाया और कहा कि नार कासुर जैसे पापी का अंत करने में
10:31वे भी अपना योगदान देना चाहती है
10:35उन्होंने अपनी युद्ध कौशल और पराक्रम का वर्णन किया, जो उन्होंने बचपन से सीखा था
10:41यह दर्शाते हुए की वे केवल एक रानी नहीं, बलकि एक सिध्धेहस्ट योध्धा भी थी
10:48श्रीकृष्ण ने उनकी प्रत्येक बात को ध्यान से सुना, सत्यभामा के आंतरिक बल और उनके राइटियस क्रोध को पूरी तरह
10:56से समझा
10:58उनके मन में नारकासुर को प्राप्त वर्दान का विचार कौन धा, जिसमें उसे एक स्त्री के हाथों ही मृत्यू मिलने
11:05का श्राप था, और सत्यभामा की उपस्थिती का महत्व स्पष्ट हो गया
11:11भगवान ने अपनी दिव्य मुस्कान बिखेरी और सत्यभामा की इच्छा का सम्मान करते हुए, उन्हें अपने साथ युद्ध में ले
11:19जाने का निर्णय लिया
11:21उन्होंने तत्पश्चात अपने सार्थी दारुक को तुरंत युद्ध की तैयारियों का आदेश दिया, जिसमें गरुर को तैयार करने और दिव्य
11:30अस्त्रशस्त्रों को सुसज़ित करने का निर्देश था
11:34सत्यभामा का हरिदय उच्साह और कर्तव्यनिष्ठा से भर गया, वे अपने पती के साथ इस महान कार्य में भागीदार बनने
11:42के लिए आतुर थी
11:44अल्प समय में ही दिव्य रत और गरुर तैयार थे, उनकी पंखों की फड़फडाहट युद्ध के आगमन की सूचना दे
11:52रही थी
11:53भगवान श्री कृष्ण और सत्यभामा दिव्य कवच और अस्त्रों से सुसज्जित होकर नारकासुर का अंत करने के लिए प्राग जोतिशपुर
12:02की ओर प्रस्थान करने को ततपर खड़े थे
12:06गरुड के विशाल स्वनवर्निय पंख आकाश में फैले मानो सूर्य स्वयं उडान भर रहा हो और उस पर भगवान श्री
12:13कृष्ण तथा सत्यभामा युद्ध के लिए पूर्णत है ततपर आरूड हुए
12:19दिव्य गरुड ने अपनी अतुलनिय गती से आकाश को चीरते हुए बादलों को पीछे छोडते हुए प्राग ज्योतिशपुर की दिशा
12:27में प्रचंड वेक से उडान भरी
12:30दूर क्षितिच पर घने पहाडों और रहस्यमे वनों के बीच छिपा नारकासुर का अभेद्यगड प्राग ज्योतिशपुर एक काली छाया के
12:39रूप में दिखाई देने लगा जो किसी भयानक स्वपन की तरह लग रहा था
12:44जैसे ही वे समीप आये नारकासुर के गड़ की पहली पंक्ती दिखाई दी जिसमें आकाश की ओर नुकिले शस्त्रों और
12:52भाले की वर्षा होती दिख रही थी जो हर घुसपैठिये को भेदने को तयार थे
12:59भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य सुदर्शन चक्र का आहवान किया जो एक तेजस्वी सूर्य के समान घूमता हुआ मार्ग में
13:07आने वाले सभी तीक्षन शस्त्रों को क्षण भर में भस्न कर गया
13:12मुख्यद्वार की ओर बढ़ते हुए उन्हें मूर नामक दैत्य के पांच सिरों वाले पुत्रों ने घेर लिया जो भयानक गर्जना
13:20करते हुए अपने स्वामी की रक्षा में खड़े थे
13:24मूर के पुत्र जिनका शरीर काले पत्थरों के समान कठोर था भगवान श्रीक्रिष्ण की ओर अपनी विशाल कदाये और खड़द
13:32लेकर भयानक चीतकार के साथ तूट पड़े
13:36भगवान श्रीक्रिष्ण ने अपने दिव्यशार्गधनुष को उठाया और एक ही क्षण में अग्निबानों की ऐसी वर्षा की की मूर के
13:45पुत्रों के हृदयकाप उठे
13:48सत्यभामा ने भी अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए सुक्षमता से लक्ष साथते हुए विशैले बानों से राक्षसों की आखें
13:56और दुर्बल बिंदु भेद दिये जिससे उनकी शक्ती क्षीन होने लगी
14:02भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी गदा कौमोद की से प्रहार करते हुए एक एक कर मूर के पुत्रों को धराशाई कर
14:09दिया उनके शरीर धर्ती पर विशाल शिलाखंडों की भांती गिरे
14:14मूर के पाचों पुत्रों का वध करने के बाद द्वार का मार्ग तो खुल गया परंतु गेहन अंधकार और ध्रामक
14:22मायाजाल ने पूरे क्षेत्र को घेर लिया जो आगे बढ़ने से रोकता था
14:26यह मायाजाल नारकासुर के गुरु शक्तिशाली दैत्यमूर द्वारा निर्मित था जिसे केवल सबसे शुद्ध और शक्तिशाली दिव्यद्रिष्टी ही भेज सकती
14:37थी
14:38अंदर प्रवेश करते ही विभिन प्रकार के जादूई फंदे और अद्रिष्य शत्रू उन पर आक्रमन करने लगे जो भ्रम पैदाकर
14:47उन्हें मार्ग से भटकाने का प्रयास कर रहे थे
14:51भगवान श्री कृष्ण ने अपनी योग माया शक्ति का प्रयोग करते हुए सभी मायावी बाधाओं को एक एक कर समाप्त
14:58कर दिया
14:59मानो कोई तेजस्वी प्रकाश अंधकार को चीर रहा हो
15:04जैसे ही माया जाल तूटा एक और अभेद्य दिवार सामने आई जो काले पत्थरों और लौह से बनी थी जिस
15:11पर भयानक राक्षसी आकृतिया खुदी हुई थी
15:16अपनी गदा कौमोदकी के एक प्रचंड प्रहार से भगवान श्री कृष्ण ने उस विशाल दिवार को ध्वस्त कर दिया जिससे
15:23धूल और पत्थरों का एक भयानक बवंदर उठ खड़ा हुआ
15:28धूल छंटने पर नारकासुर की नगरी का हरिदय प्रकट हुआ एक विशाल भयानक और अंधकार्मय शहर जिसकी इमारतें आकाश को
15:37भेदती हुई काले दंभ के साथ खड़ी थी
15:41शहर के केंदर में नारकासुर का भव्य और भयावह महल खड़ा था जो अपने काले शिखरों से आकाश को चुनौती
15:49दे रहा था उसकी हर इंट में क्रूरता की कहानी समाई थी
15:54महल में नारकासुर अपने सिनहासन पर बैठा हुआ अपने अंत की आहट को महसूस कर रहा था उसके भीतर एक
16:02अंजानी बेचैनी और क्रोध की ज्वाला धधक रही थी
16:07भगवान श्री कृष्ण और सत्यभामा अब महल के बाहरी प्रांगण में थे अंतिम युद्ध के लिए तैयार उनके चहरों पर
16:15द्रिड संकल्प और धर्म की विजय का प्रकाश चमक रहा था
16:19भव्य महल के विशाल द्वार के सामने खड़े भगवान कृष्ण और सत्यभामा की दिव्य आभाने वातावर्ण में एक अध्वितिय उर्जा
16:28भर्दी मानो धर्म स्वय अधर्म से लोहा लेने आया हो
16:33तभी धर्ती धर्रा उठी और महल के गहरे अंधकार से एक भयानक गड़गडाती हुई गर्जना गूंज उठी जिसने आकाश को
16:42भी चीर दिया
16:43शन्भर में विशालकाय महल के द्वार चर्मरा कर खुले और अंदर से नारकासुर का परम सेनाप्ती भय उत्पन करने वाला
16:52दैत्य मूर बाहर निकला
16:54मूर दैत्य अपने विशालकाय शरीर और भयावह रूप के साथ साक्षात विनाश का प्रतीक लग रहा था जिसकी द्रिष्टी मात्र
17:03से ही धैर्यवान योध्धा भी काप उठे
17:07अपनी करूर आखों से श्री कृष्ण को घूरते हुए मूर ने एक गर्जना के साथ उन्हें युद्ध के लिए ललकारा
17:14जिससे उसकी दुष्टता और अहमकार स्पष्ट दिखाई दे रहा था
17:20भगवान कृष्ण ने बिना किसी भयके अपने चहरे पर शांत और द्रिड संकल्पित भाव के साथ मूर की चुनौती को
17:27स्विकार किया उनकी दिव्य उपस्थिती से बुराई की हर छाया काप उठी
17:33क्रोध से पागल होकर मूर ने अपनी विशालकाई गदा घुमाते हुए बिजली की गती से श्री कृष्ण की ओर आक्रमन
17:41किया उसकी हर चाल में विध्वन्स की आहट थी
17:46सत्यभामा अपनी दिव्य धनुषबान को धारण किये भगवान कृष्ण के साथ खड़ी थी उनकी आखे सतर्कता और भक्ती से भरी
17:54थी हर पल युद्ध के लिए तयार
17:57मूर के भीषण प्रहारों का सामना करते हुए भगवान कृष्ण ने अपने दिव्यास्त्रों को जागरित किया जिससे एक एक कर
18:05मूर के सभी आक्रमन हवा में ही निश्फल हो गए
18:09अचानक महल के भीतर से मूर के पांच भयावः पुत्र भी युद्ध में कूद पड़े अपनी दुष्टता से वातावर्ण को
18:17और भी अंधकार्मय कर दिया
18:20प्रत्येक पुत्र अपने पिता के समान क्रूर और बल्शाली था जिनकी आखें प्रतिशोध की अगनी से देहक रही थी और
18:28उनके हथियार रक्तपात के लिए आतुर थे
18:31एक साथ मूर और उसके पाचों पुत्रों के आक्रमन से युद्ध का मैदान रणभूमी में बदल गया जहां चारों और
18:39अराजक्ता और भीशन संघर्ष व्याप्त था
18:43भगवान कृष्ण अपनी अलौकिक शमता से एक ही समय में मूर और उसके पुत्रों के हर वार का कुशलता से
18:50जवाब दे रहे थे उनकी हर चाल में दैविय संतुलन और शक्ती थी
18:56सत्यभामा ने अपनी अचूप बानवर्षा से शत्रूओं के छोटे समुहों को रोक रखा था जिससे भगवान कृष्ण को मुख्य युद्ध
19:04पर ध्यान केंद्रित करने का अफसर मिला
19:08अंतह भगवान कृष्ण ने मूर के अंतका निश्चय किया और अपनी उंदली पर अपने अजे सुदर्शन चक्र को आहवान किया
19:16जो ब्रहमांडिय उर्जा से चमक उठा
19:19एक पलक जपकते ही सुदर्शन चक्र अपनी तीवर गती और चमक के साथ एक घूमते हुए प्रकाश पुन्च की तरह
19:28मूर की ओर बढ़ा जो अपने मार्ग में सब कुछ भस्म करने को तैयार था
19:33अपनी मृत्यों को निकट देखकर मूर ने अपनी गदा से चक्र को रोकने का एक अंतिम हताश प्रयास किया पर
19:41दिव्य शक्ती के सामने उसका बल व्यर्थ था
19:45सुदर्शन चक्र ने एक ही वार में मूर के विशालकाई सिर को उसके धर से अलग कर दिया और उसका
19:51कटा हुआ मस्तक एक भयंकर गर्जना के साथ धर्थी पर जागिरा जिससे पूरी धर्थी काप उठी
19:59अपने पिता के भयानक अंत को देख कर मूर के पुत्र क्रोध और आतंक से भर गए और उन्होंने एक
20:06साथ चीखते हुए भगवान कृष्ण पर पागलपन भरा आक्रमन किया
20:11पर भगवान कृष्ण ने पलक जपकते ही अपने दिव्यास्त्रों के तीक्षन प्रहारों से उन सभी क्रोधित पुत्रों का भी वध
20:19कर दिया जिससे प्राग जियोतिशपूर का मुख्य सुरक्षा कवच ध्वस्त हो गया
20:24प्राग जोतिशपुर का मुख्य सुरक्षा कवच ध्वस्थ होते ही नारकासुर के गुप्तचरों ने तुरंट उसके सेनाप्ती मूर और उसके पुत्रों
20:33के भीशन वध का समाचार उसके गुप्त कक्ष में पहुँचाया
20:37अपने सबसे शक्तिशाली सेनाप्ती और पुत्रों के विनाश की खबर सुनते ही नारकासुर का अहंकार और क्रोध एक ज्वाला मुख्य
20:46की तरह फट पड़ा जिससे उसकी आखों में प्रतिशोध की ज्वाला धधक उठी
20:52उसने तुरंत अपनी शेश असुर सेना को इकठा करने का आदेश दिया उसकी गर्जना से प्राग ज्योतिशपुर के महल की
21:00नीन्व तक काप उठी और पूरी नगरी में आतंक फैल गया
21:04काल के समान भैभीत करने वाला नारकासुर अपने भयानक रत पर सवार होकर अपनी विक्राल सेना के साथ प्रणभूमी की
21:13ओर चल पड़ा मानोस्वयं विनाश उसकी अगवाई कर रहा हो
21:19प्रागज्योतिशपुर के युद्धस्थल में नारकासुर और उसकी भयानक सेना का आगमन एक भूचाल की तरह था जहां भगवान कृष्ण पहले
21:27से ही अपने दिव्यरत पर धैर्यपूर्वक विराजमान थे
21:32दोनों महाशक्तियों के बीच एक अविस्मनिय और तीखा टकराव हुआ, नारकासुर की आखों में प्रतिशोध की अगनी धधक रही थी,
21:41जबकि कृष्ण के मुख पर शांत ग्रिड संकल्प स्पष्ट जलक रहा था
21:46नारकासुर ने एक भयंकर गर्जना करते हुए, अपने भयानक शूल, भाले और विभिन शस्त्रों से भगवान कृष्ण पर एक साथ
21:55प्रहार किया, जिससे आकाश में अंधकार छा गया
21:59किन्तु भगवान कृष्ण ने अपनी लीला शक्ती से उन सभी वारों को मानोवे व्यर्थ हों, ऐसे ही आकाश में विलीन
22:07कर दिया, जिससे नारकासुर का प्रथम आक्रमन निश्प्रभावी हो गया
22:12अपनी शक्तियों के निरर्थक होते ही, नारकासुर ने अपनी मायावी विद्या का प्रयोग किया और एक भयानक अंधकार तथा भ्रामक
22:21ग्रिश्यों का मायाजाल चारों और फैला दिया
22:25परम्पिता श्रीकृष्ण ने एक पल में अपनी योग माया का आहवान किया और एक दिव्य प्रकाश पुंज ने नारकासुर के
22:32सारे मायाजाल को चीरते हुए उसे पूरी तरह से भंग कर दिया
22:37अपनी मायावी शक्ती विफल होने पर नारकासुर ने क्रोधित होकर कुछ और भी प्राचीन और शक्तिशाली राक्षसी अस्त्रों का प्रयोग
22:46किया जिनहें उसने हजारों वर्षों की तपस्या से प्राप्त किया था
22:51उनके प्रत्युप्तर में भगवान कृष्ण ने भी अपने शंक, चक्र और गदा जैसे दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया, जिससे रणभूमी में
23:00एक भयंकर उर्जा युद्ध छिड़ गया
23:03आकाश में दिव्यास्त्रों और राक्षसी शस्त्रों के टक्राने से भयानक विस्फोट हुए, जिससे पूरा वातावर्ण कमपन करने लगा और एक
23:12दूसरे पर अविश्वस्नी उर्जाएं प्रस्पुटित हुई
23:16अपनी अपार शक्ती और अहंकार से प्रेरित होकर नारकासुर ने और भी अधिक विध्वन्सक वेग से हमला किया, यह मानते
23:24हुए कि कोई भी उसकी ताकत का सामना नहीं कर सकता
23:29परंतु भगवान कृष्ण ने अपनी अजे शक्ती और असीम धैर्य के साथ नारकासुर के प्रत्येक वार को कुशलता से रोका
23:37और उसके अहंकार को चूर-चूर करने का अफसर बनाया
23:42जैसे जैसे युद्ध आगे बढ़ा, नारकासुर के सभी प्रयास निश्फल होते गए और उसकी आखों में क्रोध के साथ-साथ
23:50बढ़ती हुई निराशा और हताशा साफ झलकने लगी
23:55अपनी हार की आशंका से भयभीत होकर, नारकासुर ने एक अंतिम और धोखे बास चाल चलने का प्रयास किया, जिससे
24:03भगवान कृष्ण को भ्रमित किया जा सके
24:06किन्तु सर्वग्य भगवान कृष्ण ने नारकासुर की चाल को तुरंत पहचान लिया और अपनी अलोकिक द्रिष्टी से उसकी हर माया
24:14को एक जटके में भेट कर उसे निरर्थक कर दिया
24:19अपनी अंतिम चाल विफल होने पर नारकासुर ने अपनी सारी शक्ती और बची हुई उर्जा को एकत्रित कर भगवान कृष्ण
24:27पर एक अंतिम और भयानक प्रहार करने का निश्चय किया
24:32भगवान कृष्ण ने भी इस अंतिम और निर्नायक क्षण को भाम्पते हुए नारकासुर के अहंकार और अत्याचार का अंत करने
24:40के लिए अपने दिव्य सुदर्शन चक्र को युद्ध के लिए तैयार किया
24:45रणभूमी में एक भयंकर गर्जना गूंजी जैसे नारकासुर ने अपनी अंतिम और सबसे विनाशकारी शक्ती का प्रयोग करते हुए भगवान
24:54कृष्ण पर एक प्रचंड अस्त्र से प्रहार किया
24:58उस दैत्य के छल से उत्पन्न मायावी प्रहार ने एक क्षण के लिए प्रभू के दिव्य रूप को ढख लिया
25:04जिससे ऐसा प्रतीत हुआ मानो संसार का आधार ही विचलित हो गया हो
25:10यह देख समीब खड़ी वीर्मई महारानी सत्यभामा का हरिदय एक क्षण के लिए भैसे काम उठा किन्तु अगले ही पल
25:18उनकी आखों में प्रचंड क्रोध और ग्रिड संकल्प की अगनी धधक उठी
25:24ततकाल उन्होंने अपनी आखों के सामने अपने प्रियतम पर हुए इस कप्टी प्रहार का प्रतिशोध लेने के लिए अपनी भुजाओं
25:32में अध्भुत शक्ती का संचार किया
25:35एक क्षण का भी विलंब किये बिना महारानी सत्यभामा बिजली की गती से आगे बढ़ी उनकी चाल में एक महारानी
25:43का गौरव और एक कुशल योध्धा का शौर्य स्पष्ट जलक रहा था
25:48उन्होंने ततपरता से अपने दिव्यधनुष को उठाया और क्षण भर में ही उस पर अनेक तीक्षन बानों को साधा जिनकी
25:56नोके नारकासुर की ओर लक्षित थी
26:00महारानी ने एक साथ अनेक बानों की वर्षा कर दी, जो फुर्ती से नारकासुर की ओर बढ़े उसकी मायावी रक्षा
26:08को भेदने और उसे विचलित करने के लिए
26:11अचानक हुए इस प्रचंड आक्रमन से नारकासुर भौचक का रह गया, क्योंकि उसने महारानी सत्यभामा से इस प्रकार के त्वरित
26:20और साहसिक प्रत्युप्तर की कल्पना भी नहीं की थी
26:24उसके कप्टी मन में यह विचार आया कि एक स्त्री कैसे युद्ध में उसे चुनोती दे सकती है, जिससे उसका
26:31ध्यान भगवान कृष्ण से हटकर सत्यभामा की ओर चला गया
26:35इस बीच भगवान कृष्ण ने जिन्होंने अपनी दिव्यमाया से स्वयंको क्षणिक मूर्चा का दिखावा किया था, धीरे धीरे अपनी आखें
26:45खोली और उनकी द्रिष्टी में ब्रहमांडिय शक्ती का संचार हुआ
26:50प्रभु के मुख पर एक हलकी सी मुस्कान फैल गई, जो सत्यभामा के शौर्य और उनकी अटूट निष्ठा की प्रशंसा
26:58कर रही थी, जिसने नारकासुर को विचलित करने में सफलता प्राप्त की थी
27:04यह देखकर की नारकासुर का ध्यान अब सत्यभामा की ओर है, भगवान कृष्ण ने अपने दिव्य सुदर्शन चक्र को पुनह
27:12अपने हाथ में लिया, जो अब और भी तीवर जोती से प्रजवलित हो उठा
27:18भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र को अंतिम वार के लिए तैयार करते हुए, नारकासुर की ओर एक ग्रिड और निरनायक
27:26ग्रिष्टी डाली, जैसे उसके अंत की घोशना कर रहे हुँ
27:30उस पापी दैत्य के अत्याचारों और घमंड का अंत करने का समया गया था, और भगवान क्रिष्ण ने अपनी अमोग
27:38शक्ती का प्रयोग करने का निश्चय कर लिया
27:41एक क्षण के लिए ब्रहमांड थमसा गया, जब भगवान श्री क्रिष्ण ने अपने दिव्य सुदर्शन चक्र को अपनी उंगली से
27:49छोड़ दिया, जिसने एक प्रचंड गती से नारकासुर की ओर उडान भरी
27:54चक्र एक चमकते हुए धूमकेतु के समान तीवर वेग से हवा को चीरता हुआ आगे बढ़ा, उसकी उर्जा से वायुमंडल
28:02में कमपन पैदा हो गया
28:05नारकासुर ने जब उस दिव्य और अमोग शक्ती को अपनी ओर आते देखा, तो उसके भयानत लाल नेत्रों में एक
28:13क्षण के लिए भय की परचाई उभर आई और उसने बचाव का अंतिम प्रयास किया
28:19किन्तु दैविय शक्ती से युक्त सुदर्शन चक्र को कोई नहीं रोक सकता था, और वह एक अविश्वसनिय गती से नारकासुर
28:27के निकट पहुँच गया
28:29पलक जपकते ही सुदर्शन चक्र ने नारकासुर के अहमकारी सिर को उसके विशाल धड़ से अलग कर दिया, जिससे एक
28:37भयंकर रक्तपात हुआ और उस पापी दैट्य का अंथ हो गया
28:42उसके मृत शरीर के धराशाई होते ही रनभूमी में एक शान्ती छा गई, जैसे प्रिथवी ने एक भारी बोच से
28:50मुक्ती पाली हो और स्वर्ग में देवताओं ने विजनाद किया
28:54युद्ध समाप्त होने के पश्चात, भगवान श्री कृष्ण देवी सत्यभामा के साथ विशालकाय गरूर देव पर विराजमान होकर नारकासुर के
29:03भव्यकिंतु भयावह महल के मुख्य द्वार की ओर बढ़े
29:07जैसे ही श्री कृष्ण ने महल के प्रांगण में अपने कदम रखे, वहाँ पसरा हुआ असुरों का भय और अंधकार
29:15उनके शरीर से निकलते दिव्य प्रकाश से स्वतही विलीन होने लगा
29:20देवी सत्यभामा ने आश्चर्य और घेना से उस विशाल महल की भव्यता को देखा, जो अधर्म और निर्दोशों की पीड़ा
29:28की नीम्व पर खड़ा किया गया था
29:31महल के सबसे सुरक्षित गर्भग्रेह की ओर बढ़ते हुए, श्रीकृष्ण ने उस गुप्ट द्वार को खोज निकाला जहां नारकासुर ने
29:39त्रिलोक से लूटी हुई दिव्य संपत्तियां छिपा रखी थी
29:44द्वार के खुलते ही, श्रीकृष्ण की द्रिष्टी उस परम पावन वस्तु पर पड़ी जिसे इंद्रलोक से कुरूरता पूर्वक छीन कर
29:52यहां लाया गया था
29:54वह दिव्य वस्तु और कोई नहीं बलकी देवमाता अधिती के वे अलौकिक स्वर्ण कुंडल थे, जो अपनी खोई हुई आभा
30:02को पुनह प्राप्त करने के लिए आतुर दिख रहे थे
30:06श्रीकृष्ण ने अत्यंत आदर के साथ उन पावन कुंडलों को अपने हाथों में ले लिया, जिससे देवलोक का खोया हुआ
30:14गौरव और तेज पुनह जागरित हो उठा
30:17कुंडलों को सुरक्षित रखने के बाद, श्रीकृष्ण का ध्यान उस गहरे और अंधकार्मय कारागार की ओर गया जहां हजारों निर्दोष
30:26आत्माय क्रंदन कर रही थी
30:29जैसे ही श्रीकृष्ण और सत्यभामा कारागार के मुख्य लौह द्वार के पास पहुँचे, वहां तैनात असुर पहरेदार भय के मारे
30:37अपने शस्त्र छोड़कर भाग खड़े हुए
30:41श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ती के स्पर्ष से उस विशाल और अभेद्य लोहे के द्वार को तिनके की भांती एक
30:48ही बार में खोल दिया
30:50द्वार खुलते ही कारागार का वह भीशन अंधकार श्रीकृष्ण के दिव्य और करुणामई स्वरूप की आभासे पूरी तरह आलोकित हो
30:59उठा
31:00वहां बंदी बनाई गई 16100 राजकुमारी जो अब तक अत्यंत निराशा में थी अचानक इस अलोकिक प्रकाश को देखकर चकित
31:10रह गई
31:11उन पवित्र कन्याओं के अश्रुपूर्ण नेत्रों में अब भय का स्थान अपार श्रधा और आनंद ने ले लिया था
31:19मानो उन्हें साक्षात इश्वर के दर्शन हो गए हो
31:23श्रीकृष्ण ने अत्यंत दयालुता से मुस्कुराते हुए उन सभी राजकुमारियों की ओर देखा और उन्हें निर्भय होने का वर्दान दिया
31:33देवी सत्यभामा ने आगे बढ़कर उन सभी पीडिताओं को सांत्वना दी और उन्हें आश्वस्त किया कि उनका कठिन समय अब
31:41सदा के लिए समाप्थ हो चुका है
31:45राजकुमारियों ने रोते हुए श्रीकृष्ण से कहा कि समाज और उनके परिवार अब उन्हें कभी स्विकार नहीं करेंगे इसलिए वे
31:53केवल प्रभु के चर्णों में ही शरण चाहती है
31:58उनकी पीडा और शुद्ध भक्ती को देखकर जगत के स्वामी श्रीकृष्ण ने उन सभी 16,100 राजकुमारियों को अपनी पत्नियों
32:07के रूप में स्विकार करने का निर्णय लिया
32:10इस पावन घोषणा के साथ ही सभी राजकुमारियों को कारागार के संकीर्ण और घुटन भरे वातावर्ण से मुक्त कर महल
32:18के सुन्दर प्रांगण में लाया गया
32:21स्वर्ग से देवताओं ने इस परमपावन और उद्धारकारी क्षण पर पुषपों की वर्षा की जिससे पूरा वातावर्ण सुगंधित और दिव्यहो
32:30उठा
32:32देवमाता अदिती के कुंडल और मुक्त हुई राजकुमारियों के साथ भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारकापुरी की ओर प्रस्थान करने के लिए
32:40पुनह गरुर देव का आहवान किया
32:44भगवान श्रीकृष्ण और सत्यभामा विशाल गरुर देव पर सवार होकर मुक्त कराई गई 16100 राजकुमारियों के विशाल समूह के साथ
32:54बादलों को चीरते हुए आगे बढ़े
32:57उधर प्राग ज्योतिशपुर से भेजा गया नारकासुर का अपार वैभव जिसमें मदमस्ट एरावत कुल के हाथी, वेगवान घोडे और सोने
33:06के रथ थे, द्वारका के मार्ग पर एक अंथीन स्वर्णिन धारा की तरह बहचला
33:12स्वर्गलोग के द्वार पर पहुँचते ही देवराज इंद्र के दिव्यनगर अमरावती की आभाने विजी देवताओं और राजकुमारियों का स्वागत किया,
33:21जहां की हर दिवार बहुमूल्य मनियों से चमक रही थी
33:26देवराज इंद्र ने अपनी पत्नी शची के साथ देवलोग के मुख्य द्वार पर आकर परमिश्वर श्रीकृष्ण और देवी सत्यभामा का
33:34पूर्ण आदर सत्कार किया
33:37भगवान श्रीकृष्ण ने शांत भाव से मुस्कुराते हुए देवमाता अदिती के वे दिव्यकुंडल देवराज इंद्र को सौंप दिये, जिन्हें दुष्ट
33:46नारकासुर ने बलपूर्वक छीन लिया था
33:49अपनी खोई हुई अमूल्य निधी को पुनह प्राप्त कर देवमाता अदिती का हृदय गदगधो उठा और वे वात्सल्य भाव से
33:57भरकर अपने पुत्रों के उध्धारक के सामने खडी हुई
34:02देवमाता अदिती ने दोनों हाथ उठाकर भगवान श्रीकृष्ण और देवी सत्यभामा को अचल सौभाग्य, अनंतकीर्ती और लोककल्यानकारी होने का परम
34:12आशिर्वाद दिया
34:13इस महान विजय और माता अदिती के सम्मान की रक्षा से प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने स्वर्ग के सबसे दुलब
34:22और दिव्यकल्प वरिक्ष पारिजात को सत्यभामा को उपहार स्वरूप अर्पित किया
34:28देवी सत्यभामा ने उस अलोकिक पारिजात व्रिक्ष की दिव्य सुगंध का आनंद लिया, जिसकी भीनी-भीनी महेक से संपूर्ण स्वर्गलोग
34:36का वातावर्ण और भी अधिक उन्मादित हो उठा था
34:40अब देव लोग का कार्य पूर्ण कर भगवान श्री कृष्ण ने देवी सत्यभामा और पारिजात व्रिक्ष के साथ पुनह गरूर
34:48देव पर बैठकर प्रिथवी लोग की ओर प्रस्थान किया
34:52स्वर्ग से उतरते हुए गरूर देव के पंखों की तीवर वायू से बादलों में दिव्य गर्जना हुई और प्रिथवी के
34:59मानव इस अलोकिक ग्रिश्य को देखकर विस्मय में डूब गए
35:04नीले समुद्र के बीचों बीच स्थित भव्य द्वार का पुरी नगरी सूर्य की किर्णों में चमकती हुई सोने की तरह
35:11दमक रही थी जो अपने स्वामी की वापसी की राह देख रही थी
35:16द्वार का के तट पर खड़े होकर हजारों नागरिक, सैनिक और श्रिष्ट जन आकाश की ओर टकटकी लगाए अपने परम्प्रिय
35:24प्रभु के स्वागत में उच्सुख खड़े थे
35:28जैसे ही गरोर देव ने समुद्र तटकी सुनहरी रेत पर अपने पैर रखे, शंखों की ध्वनी और दुन्दुभियों के नाज
35:35से संपूर्ण दिशाय गुन्जायमान हो उठी
35:39भगवान श्रीकृष्ण गरोर देव की पीठ से नीचे उत्रे और उनके चरण स्पर्ष करते ही द्वार्का की भूमी धन्य हो
35:47गई, मानो साक्षात नारायन अपनी वैकुन्ठपुरी में लोटे हो
35:52उनके ठीक पीछे देवी सत्यभामा उत्री, जिनके हाथों में स्वर्ग का वह चमतकारी पारिजात व्रिक्ष था, जिसकी सुगंध ने पूरे
36:01द्वार का नगर को महका दिया था
36:04इसके बाद बंदीग्रे की काल कोठरी से मुक्त हुई वे 16,100 राजकुमारी भी गरुर देव से उत्री, जिनकी आखों
36:13में अब भय की जगह स्वतंत्रता के आसू थे
36:17यदुवंश के वयोवरिध राजा उग्रसेन और वासुदेव ने आगे बढ़कर अपने परम प्रतापी पुत्र श्री कृष्ण को गले लगाया और
36:25उनकी इस महान और धर्मनिष्ट विजय की सराहना की
36:30भगवान श्री कृष्ण के निर्देश पर उस अलौकिक पारिजात व्रिक्ष को सत्यभामा के महल के सुन्दर प्रांगण में रोपित किया
36:37गया जिससे वह स्थान साक्षात स्वर्ग के समान सुन्दर हो गया
36:42इस प्रकार समस्थ संपदा, मानसम्मान और मुक्त हुई राजकुमारियों के साथ भगवान श्री कृष्ण ने द्वार्का में प्रवेश किया जिससे
36:52संपूर्ण नगर में एक महान उत्सव का आरंभ हो गया
36:56द्वार्का के विशाल और भव्य अतिथी प्रासाद में एकत्रित होकर सभी 16,100 राजकुमारिया अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और भविश्य की
37:06चिंता में डूबी हुई परस्पर चर्चा कर रही थी
37:10समाज द्वारा परित्यक्तोंने और असुर नर्कासुर के कारागार में रहने के कलंक के भैसे भैभीत होकर उन राजकुमारियों की आखों
37:19में अश्रु बह रहे थे
37:22तभी उस भव्यकक्ष के द्वार पर साक्षात करुणा के सागर भगवान श्रीकृष्ण का आगमन हुआ जिनकी दिव्यमुस्कान ने पूरे वातावर्ण
37:31को सांत्वना और शांती से भर दिया
37:33एक प्रमुख राजकुमारी ने साहस बटोर कर आगे बढ़ते हुए श्रीकृष्ण के चर्णों में प्रणाम किया और अश्रुपूर्ण नेत्रों से
37:42अपनी रक्षा और सम्मान की भिक्षा मांगी
37:46भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत कोमल और मधूर्स्वर में उनसे कहा कि वेस्वयं उनके रक्षक हैं और संसार की कोई भी
37:55शक्ती उनकी पवित्रता और गरिमा पर उंगली नहीं उठा सकती
38:00उन्होंने घोशना की की वेस्वयं उन सभी 16,100 राजकुमारियों को अपनी पट्रानियों के रूप में स्विकार कर उन्हें द्वार्का
38:09का सर्वोच्च सम्मान प्रदान करेंगे
38:12यह सुनकर सभी राजकुमारियों के हिरिदय का भाय और शोक ततकाल विलीन हो गया और उनके मुख पर अपूर्व आनंद
38:20और कृतग्यता की कांती चमकने लगी
38:24परमग्यानी देवर्शी नारद और राजगुरु गर्गाचार्य ने नक्षत्रों की गणना करके एक ही अत्यंत शुभ महूर्थ का चयन किया जो
38:32इस अलोकिक विवाह के लिए सर्वथा उप्युक्त था
38:35इस अभूतपूर्व विवाह की तैयारी में संपून द्वार का नगरी को स्वर्णदीपो, सुवासित पुष्पों और दिव्यध्वजाओं से दुलहन की भाती
38:45सजाया गया
38:47नगर के 16,100 दिव्य प्रासादों में प्रिथक प्रिथक विवाह मंडप तैयार किये गए, जो सुगंधित धूप और पवित्र समिधा
38:56की सुगंध से महक रहे थे
38:59विवाह के पावन दिन भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अचिंत्य योगमाया शक्ती का स्मरण किया, जिससे स्रिष्टी की सीमाओं को
39:07लांधने वाला एक परंकौतुक आरंभ हुआ
39:11योगमाया के प्रभाव से भगवान श्री कृष्ण ने स्वय को 16100 समान रूप से तेजस्वी और दिव्य रूपों में विभाजित
39:19कर लिया
39:21प्रत्येक रूप में पूर्ण और दिव्य होकर श्री कृष्ण ने एक ही समय में सभी प्रिथक प्रिथक 16100 महलों में
39:29प्रवेश किया
39:31वहां 16100 राजकुमारिया जो वधु के लाल रेश्मी वस्त्रों और सुवर्ण आभूशनों से सुसज्जित थी अपने सम्मुक श्री कृष्ण को
39:40पाकर आनन्दित हो उठी
39:43पुरोहितों द्वारा उच्चारित वेद मंत्रों की गूंच और पवित्र यग्य की अगनी की लप्टे सभी महलों में एक ही समय
39:51में प्रजवलित हो उठी
39:53प्रत्येक मंडप में भगवान श्री कृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ अपनी नवविवाहित वधु के गले में पारिजात के सुगंधित
40:01पुष्पों की जैमाला डाली
40:04ततपश्चात उन्होंने अपनी पत्नियों का कोमल हाथ ठामकर पवित्र अगनी के परिता फेरे लिए जिससे उनका यह गठ बंधन युगों
40:13-युगों के लिए अमर हो गया
40:15अगनी के सम्मुख भगवान श्री कृष्ण ने प्रत्येक रानी की मांग में सिंदूर भर कर उन्हें सदैव के लिए अपनी
40:22अर्धांगिनी और द्वारका की महारानी स्विकार किया
40:26इस अलोकिक विवाह के पूर्ण होते ही स्वर्ग से देवताओं ने दुन्दुभी बजाई और सभी 16,100 महलों पर कल्पवरिक्ष
40:35के पुष्पों की वर्षा की
40:38जब देवर्षी नारद ने द्वारका के प्रतेक महल में जाकर श्रीकृष्ण को अलग-अलग रूप में पूर्ण ग्रिहस्थ धर्म का
40:45पालन करते देखा
40:46तो वे उनकी इस अनंत माया को देखकर पूर्ण तहस्तब्ध रह गए
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