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हिरण्यकशिपु के संहार के बाद भी भगवान नरसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ! 🔥 कौन करेगा उन्हें शांत? भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति कैसे बदलेगी दैत्यों का भाग्य? इस एपिसोड में हम देखेंगे कि कैसे प्रह्लाद को दैत्यों का राजा बनाया गया और उनके वंशज, विशेषकर पराक्रमी महाराज बलि का उत्थान हुआ। बलि के तप और शक्ति से इंद्र का स्वर्ग सिंहासन कैसे डगमगाया? इंद्र की माता अदिति क्यों करती हैं घोर तपस्या? एक ऐसी कहानी जो भक्ति, शक्ति और नियति के गहरे रहस्यों को उजागर करती है! #BhagavataPurana #Narasimha #Prahlada #BaliMaharaj #VamanaAvatar #Aditi #Shukracharya #HinduMythology
Transcript
00:00हिरन्यक्षिपु का वध करने के पश्चात भी भगवान नर्सिंग का भयंकर क्रोध शांत नहीं हुआ और वे संध्या के धुन्धलके
00:07में राजसभा की चौखट पर प्रचंड गर्जना करने लगे।
00:12उनके अगनिस्मान धधकते नेत्र और रक्ट से सनी सिह की अयाल देखकर संपून ब्रहमांड में भय की एक प्रचंड लेहर
00:20दोड़ गई।
00:42आकाश मंडल में लाल सुनहरे मेगों का हुजूम छा गया, मानो संपून स्रिष्टी ही इसक्षन इस रौदर अवतार के समक्ष
00:50भस्म होने जा रही हो।
01:39साहस नहीं था।
01:41की उनके तीक्षन नखों से दिव्यकांती और रक्त की बून्दे टपक रही थी।
01:46तूटे हुए विशाल स्तंभों और धुए से भरी उस असुर सभा में चारों और केवल सन्नाटा और भगवान की हुकार
01:54का कमपन गूज रहा था।
01:57गंधर्वों ने आकाश से स्तुतिगान करने का प्रयास किया, किन्तु प्रभो की एक कृध द्रिष्टी से उनकी वानी गले में
02:05ही थम गई।
02:06महान सबतर्शियों ने शांत स्तोत्रों का पाठ करना चाहा, परंतु नर्सिंग के शरीर से निकलती ज्वालाओं ने उनके शब्दों को
02:14निरर्थक कर दिया।
02:17भगवान नर्सिंग की विशाल चाती में उठता तूफानी श्वास अंतरिक्ष की सीमाओं को जगजोर रहा था, जिससे दसों दिशाएं डोलार्मान
02:25हो रही थी।
02:27उनकी स्वर्णिम अयाल से निकलती दिव्य अगने की लप्टों ने भगन महल को एक भयावा और अलोकिक प्रकाश से आलोकित
02:35कर दिया था।
02:37देवता आपस में घबरा कर फुस्फुसाने लगे कि अब ब्रहमांड में ऐसी कोई शक्ती नहीं बची जो इस अलोकिक क्रोध
02:44को शांत कर सके।
02:46प्रजापती और सिधगन बादलों पर दंडवत प्रणाम करते हुए मन ही मन जगत की रक्षा के लिए करुन पुकार करने
02:54लगे।
02:55भगवान नर्सिह ने जब अपनी लालपीली आँखों से गगन की ओर देखा तो उनके खुले हुए जबरों की भयंकर मुद्रा
03:03से देवविमान पीछे हटने लगे।
03:05तब ब्रह्मा जी ने निश्पाप बालक प्रहलाद की ओर देखा और समझा की केवल अनन्य भक्ती ही इस महाकाल स्वरूप
03:14को शांत कर सकती है।
03:17इस महाभ्यावः वातावर्ण के बीच छोटा बालक प्रहलाद हाथ जोडे खड़ा था जिसकी आँखों में भय के स्थान पर केवल
03:25परम प्रेम और अविरल अश्रुधारा थी।
03:29पितामा ब्रह्मा अत्यंत विनीत भाव से अपने कमंडलु को थामे हुए आगे बढ़े और उनके चारों मुखों पर परमेश्वर के
03:37इस प्रचंड रूप के प्रती अथाह भय और श्रग्धा जलक रही थी।
03:42ब्रह्मा जी ने अपने चारों मुखों से पवित्र वेद मंत्रों और स्तुतियों का सस्वर उच्चारण आरंभ किया, जिसकी गंभीर ध्वनी
03:50ब्रह्मान के सुदूर कोनों तक गूंजने लगी।
03:54परंतु भगवान नर्सिंग के भीशन सिहनाद ने उन दिव्य वेदध्वनियों को भी आच्छादित कर दिया, और उनकी निश्वास से निकलती
04:02अग्नी ने सभाभवन के बचे हुए स्वर्नस्तंभों को भी जुलसा दिया।
04:08ब्रहमा जी के पीछे खड़े देवराज, इंद्र, अग्निदेव और वायुदेव सहित समस्त लोकपालों ने नकमस्तक होकर पुष्प वर्षा की, किन्तु
04:17वे पुष्प नर्सिंग के तेज के निकट पहुँचते ही भस्म हो गए।
04:22देवताओं द्वारा स्मरण किये जाने पर स्वयन साक्षात महालक्षमी भी वहां प्रकट हुई, परंतु अपने स्वामी के ऐसे अभूत पूर्व
04:30और उग्र रूप को देखकर वे भी दूर से ही ठिठक कर खड़ी रह गई।
04:36ब्रहमा जी ने अपनी चारों भुजाओं को जोड कर प्रार्थना की किहें सर्वव्यापी प्रभो आपने धर्म की रक्षा और असुर
04:43के विनाश का अपना अवतार कार्य पूर्ण कर लिया है, अब कृप्या शांत हो जाए।
04:50भगवान नर्सेह के उग्रनेत्रों से अब भी क्रोध की लाल ज्वालाएं निकल रही थी और उनकी नुकीली नखों पर असुर
04:57के रक्त की चमक अभी भी उनके संहारक स्वरूप की गवाही दे रही थी।
05:03ब्रह्मा जी समझ गये की देवताओं, यक्षों और महर्शियों की बड़ी से बड़ी स्तुतियां भी इस अगाथ महाकाल रुपी क्रोध
05:11की अगनी को बुझाने में असमर्थ हैं।
05:15नर्सिह भगवान के सांसों से उत्पन प्रचंड उश्मा के कारण तीनों लोकों में कमकमपी छूट रही थी, जिससे अपसराएं और
05:23सिद्धगन भैभीत होकर गगन में पीछे हटने लगे।
05:28ब्रहमा जी ने कापते स्वर में देवताओं से कहा कि यह दिव्यक रोध किसी शक्ति या स्तुती से नहीं, केवल
05:35निश्चल भक्ती और अनन्य प्रेम से ही शांत हो सकता है।
05:40कैलाश परवतपर विराजमान भगवान शिव ने भी अपनी तीसरी आख के तेज के साथ इस परम द्रिश्य को देखा और
05:48मौन रहकर विश्णुजी के इस रोगरानंद को नमन किया।
05:51इसके पश्चात पितामा ब्रहमा ने अपनी द्रिश्टी पुना बालक प्रहलाद की और मोडी और संकेत से उसे भगवान नर्सिंग के
06:00पास जाने की आग्या दी।
06:03जैसे ही प्रहलाद ने अपना पहला ननहा कदम आगे बढ़ाया। उसके पैरों में बंधी छोटी पायल की मधुर ध्वनी ने
06:11नर्सिंग के विशाल कानों को आकरशित किया।
06:14गगन में छाय कालिलाल बादलों के बीच अचानक एक हलकी सी दरार पड़ी और प्रभू की करुणा की एक सुनहरी
06:22किरन सीधे प्रहलाद के निश्पाप चहरे पर आन पड़ी।
06:26प्रहलाद के कोमल हरिदय में भय का लेशमात्र भी न था क्योंकि वह उस विक्राल सिहमानव रूप में केवल अपने
06:34सर्वरक्षक हरी की वातसल्य में छवी देख रहा था।
06:38ब्रहमा जी और अन्य समस्त देवताओं ने अपनी सांसे थाम ली और भक्त तथा भगवान के बीच के इस पावन
06:46पत से पीछे हटकर स्थान खाली कर दिया।
06:49भगवान नरसिंग की विशाल सुनहरी अयाल हवा में लहरा रही थी, परन्तु उनकी जलती हुई द्रिष्टी अचानक उस ननहे, जो
06:58तिरमय बालक पर आकर टिक गई।
07:01प्रहलाद ने बिना किसी संकोच के उस धूल भरे धरातल पर अपने पूरे शरीर को दंडवत कर दिया और अपना
07:08मस्तक प्रभु के चर्णों के समीप रख दिया।
07:12जैसे ही बालक के कोमल मस्तक ने नर्सिंग के चर्णों की धूल को छुआ, परमेश्वर के विशाल वक्षस्थल में वादसल्य
07:19और मम्ता की एक अलौकिक तरंग दोड गई।
07:23देवताओं ने आश्चर्यचकित होकर देखा कि नर्सिंग का भयंकर ज्वालामी आभामंडल धीरे-धीरे प्रहलाद के चारों और एक शीतल सुरक्षात्मक
07:33स्वन किरण में बदलने लगा था।
07:36भगवान नर्सिंह ने अपनी ज्वालामी भेकुटी को शांत करते हुए अत्यंत वादसल्य से अपना कोमल कमल रूपी हस्त बालक प्रहलाद
07:44के सिर पर रख दिया।
07:46प्रभु के वर्देहस्त का स्पर्ष होते ही प्रहलाद के भीतर का समस्त भाय और संताप सदा के लिए नश्ट हो
07:54गया और परम ज्यान का प्रकाश प्रस्वुटित हो उठा।
07:57वादसल्य के अतिरेक में भगवान नरसिंह ने जुपकर अपने सिन्हमुख से ननहें भक्त के कपोलों को दुलारते हुए उसकी आँखों
08:06के आसुओं को पोँच दिया।
08:09प्रहलाद ने अपने अश्रुपूरित नेत्रों को धीरे धीरे उठाया और श्रीहरी के इस सौमय एवं अलौकिक रूप के दर्शन कर
08:17आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
08:19अपने सम्मुख परमात्मा को पाकर भक्त प्रहलाद ने हाथ जोड़कर अत्यंत मधुर एवन छंदोबधवानी में प्रभू की सर्वव्यापक्ता का स्तवन
08:29प्रारंभ किया।
08:31प्रहलाद की उस निश्चल और भक्ति में स्तुती के गूंचते ही पूरे राजसभा का वातावर्ण एक अलौकिक शांती और परम
08:39आनंद से भर गया।
08:42ननहेंग बालक के निर्मल प्रेम से द्रवी भूत होकर सर्वेश्वर नर्सिन्ह ने प्रहलाद को उठा कर अपने विशाल और सुरक्षित
08:49वक्षस्थल से लगा लिया।
08:52आकाश में खड़े ब्रहमा, शिव और समस्त देवगण इस अध्भुत वातसल्यद्रिश्य को देखकर आनंद विभोर होकर अपने हाथ जोड जुका
09:01रहे थे।
09:02भगवती लक्ष्मी अपने स्वामी के इस परमशांत एवं कृपालु स्वरूप को देखकर मंदमंद मुस्कान के साथ उन पर प्रसन्नता के
09:11भाव प्रकट करने लगी।
09:14स्वर्गलोग के द्वार खुल गए और देवताओं ने प्रभु तथा उनके अनन्य भक्त के उपर मंदार और पारिजात के सुगंधित
09:22पुष्पों की अनवरत वर्षा प्रारंभ कर दी।
09:25गंधर्वों के मधुरगान और अपसराओं के दिव्यन रिती से संपून ब्रहमांड में मंगलमय वेनू और मृदंग की ध्वनिया गूंजने लगी।
09:34भगवान नर्सिह ने अपनी गंभीर किन्तु अमरित्मई वानी में कहा कि प्रहलाद की यह निश्चल भक्ती आने वाले युगों लुगों
09:43तक समस्त मानव जाती का मार प्रशस्त करेगी।
09:47ननहिन प्रहलाद ने अत्यंत विनमरतापूर्वक उत्तर दिया कि मुझे संसार के किसी भी धन अथवा पद की कामना नहीं है,
09:56केवल प्रभुचर्णों की सदा के लिए सेवा प्राप्थ हो।
10:00प्रहलाद के इस नहस्वार्थ प्रेन से प्रसन्न होकर भगवान ने वर्दान दिया कि उसके कुल में उत्पन होने वाला कोई
10:08भी जीव कभी भी मेरे कोप का भाजन नहीं बनेगा।
10:11इसके साथ ही प्रभुने यह भी घोशनाकी की प्रहलाद की पावन उपस्थिती और भक्ती के प्रभाव से उसके अत्याचारी पिता
10:20हिरन्यक्षिपु को भी मोक्षपद प्राप्थ हो गया है।
10:25स्रिष्टी के रच्चिता भगवान ब्रहमा ने आगे बढ़कर भगवान नर्सिन के इस परम कल्यानकारी अवतार की वंदना की और धर्म
10:33की पुनर्स्थापना के लिए धन्यवाद दिया।
10:37समस्त्रशियों, सिद्धों और लोकपालों ने एक स्वर में जय नर्सिन के नारों से तीनों लोकों के दसों दिशाओं को गुंजायमान
10:45कर दिया।
10:46भगवान नर्सिन के कमल न्यनों से शांती और प्रेम की ऐसी किरने निकली जिससे ब्रहमांड में फैली भय और असुरक्षा
10:54की भावना सदा के लिए समाप्थ हो गई।
10:57नर्सिन और प्रहलाद से निकलने वाले स्वर्ण प्रकाश ने उस संपून दैत्य राजमहल के अंधकार को धोकर उसे एक पवित्र
11:06तीर्थ स्थल में बदल दिया।
11:09अब समा आ गया था कि भगवान नर्सिन अपने परमभक्त प्रहलाद को दैत्य सामराज्य के धर्म प्रायन राजा के रूप
11:16में स्थापित कर उसका राज्याभिशेक संपन करें।
11:21परमभक्त प्रहलाद अपने कोमल हाथों को जोड कर और नेत्रों से प्रेमाश्रूओं की धारा बहाते हुए अती विनमरता पूर्वक्त भगवान
11:29नर्सिंग के भीशन रूप के निकट बढ़ते हैं।
11:34प्रहलाद ने अत्यंत मधोर और कापती वानी में स्तुती करते हुए कहा कि भगवान को न अभिजातकुल, न विशाल धन्बल
11:41और नहीं शुष्प ज्यान रिजा सकता है, केवल निशकाम भक्ती ही उन्हें वश में करती है।
11:49प्रहलाद के प्रत्येक भक्तिरस्से भरे प्रेमपूर्ण शब्द के उच्चारण के साथ, भगवान नर्सिह के चारों और लप्टे मार्ती भीशन लाल
11:57अगनी एक शांत, स्वर्नेम और शीतल आभा में बदलने लगी।
12:02समस्त ब्रहमांड को थर्राने वाली भगवान नर्सिह की विशाल सिहद्रिष्टी में अचानक अगाध वातसल्य और पिता के समान अपार करुणा
12:11का सागर छलकने लगा।
12:14भगवान नर्सिह ने अपना वजर जैसा शक्तिशाली किन्तु अत्यंत कोमल पंजा आगे बढ़ा कर भक्त प्रहलाद के मस्तक पर अत्यंत
12:22स्नेह पूर्वक रख दिया।
12:25भगवान नर्सिह ने अत्यंत प्रेमवश अपने प्रिय बालत प्रहलाद को उठा कर अपनी विशाल स्वर्णिन गोद में बिठा लिया और
12:33वातसल्य की अमरित वर्शा करने लगे।
12:36प्रहलाद ने पूर्ण निश्चिन्तता और आनंद के साथ अपना मस्तक भगवान के विशाल वक्षस्थल से लगा दिया, जहां समस्त संसार
12:45को परम शांती की अनुभूती हो रही थी।
12:48उपर आकाश में उपस्थित ब्रह्मा, शिव और समस्त देवगण भगवान के इस अती भयंकर रूप के एकायक करुणामई रूप में
12:57बदलने को देखकर आश्चर्यचकित और पुलकित हो उठे।
13:01स्वर्गलोग से पारिजात और मंदार पुष्पों की अविरल वर्षा होने लगी, जिसने सम्पूर्ण दैत्यराजमहल के परिसर को दिव्य सुगंध और
13:10पवित्रता से भर दिया।
13:32मुझे केवल आपके चर्णों की अचल भक्ती ही चाहिए।
14:01अपने हंस वाहन से उतर कर हाथ जोड कर आगे बढ़े और स्रिष्टी की रक्षा तथा धर्म की पुनस्थापना के
14:09लिए श्रीहरी के इस रूप की स्तुती करने लगे।
14:13भगवान नरसिन्ह ने ब्रहमा जी को निर्देश दिया कि वे अविलम प्रहलाद का दैत्य सामराज्यके धर्म प्रायन समराट के रूप
14:21में वैदिक राज्याभिशेक करें।
14:23देवर्शी नारद के नेत्रित्व में महर्शियों ने पवित्र मंदाकिनी और समुद्रों के जल से भरे स्वन कलश एकत्र करके राज्याभिशेक
14:33का अनुष्ठान प्रारंब किया।
14:34बालक प्रहलाद को भव्य दैत्य सिनहासन पर विराजमान किया गया। उनके मस्तक पर मनिक्त मुकुट सजाया गया और वे दिव्यवस्त्रों
14:44से सुशोभित हुए।
14:45भगवान नर्सिह ने स्वया आगे बढ़कर अपने वरध हस्त प्रहलाद के मुकुट धारी शीश पर रखकर उन्हें अनंत ग्यान, धर्मबल
14:55और अखंड राज्य का आशिरवात प्रदान किया।
14:58समस्त देवताओं, गंधर्वों, असुरों और रिशियों ने एक स्वर में जय नर्सिह, जय प्रहलाद का जय घोश किया और स्वर्ण
15:08पुष्पों की वर्षा से आकाश गुँझ गुठा।
15:11अपने अवतार के प्रयोजन को पूर्ण कर भगवान नर्सिह परम जोती में अंतरध्यान हो गए और राजा प्रहलाद भक्ती तथा
15:20न्याय के एक नए स्वर्णिन युग की स्थापना में सनलगन हुए।
15:25भगवान नर्सिह के अंतरध्यान होने के पश्चात भक्तराज प्रहलाद ने अपने पिता के मोक्ष और प्रभु द्वारा प्रदत्त निशकाम भक्ती
15:33के वर्दान का स्मरण करते हुए उस पवित्र भूमी को प्रणाम किया।
15:39देवर्शी नारद और ब्रहमा जी के निर्देशानुसार प्रहलाद ने अपने मृत पिता हिरन्यक्षिपु का अंतिम संस्कार शास्त्रोक्त विधी से पूर्ण
15:48करने का संकल्प लिया।
15:50पवित्र मंत्रों के उच्चारण के बीच प्रहलाद ने अपने पिता की आत्मा की परमशान्ती के लिए अगनी कुंड में तिल
15:58और जल की आहुतिया अर्पित की।
16:01यग्य की पवित्र ज्वालाओं के मध्य से ब्रहमा जी ने प्रहलाद को आश्वस्त किया कि उसकी अतुलनिय भक्ती से हिरण
16:09यक्षिपु सहित उसके कुल की 21 पीधियां पापमुक्त हो चुकी हैं।
16:31सप्त नदियों के पवित्र जल से प्रहलाद का मस्तक पर अभिशेक किया।
17:01मराज्य के आरंभ की प्रसंता में निरित्य प्रस्तुत किया।
17:05महाराजा प्रहलाद ने अपना राजकोष खोल कर सभी दीन दुखियों, ब्राहमनों और प्रजाजनों में स्वर्ण, वस्त्र और अन्न का उदार्ता
17:14पूर्वक दान किया।
17:16प्रहलाद के रामराज जस्मान धर्म शासन में दैत्य पूरी में हिंसा समाप्थ हो गई और हिंसक पशु भी एक साथ
17:23प्रेम से रहने लगे।
17:25राजसी वैभव के बीच रहते हुए भी राजा प्रहलाद एकांत कक्ष में भगवान विश्नों के युगल चर्नों का निरंतर ध्यान
17:33करते थे।
17:35समय बीतने पर रानी धन्या मालिनी के गर्ब से एक अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम
17:43विरोचन रखा गया।
17:46महाराजा प्रहलाद ने अपने पुत्र विरोचन को केवल शस्त्रविद्या ही नहीं, बलकी भक्ती, सत्य और धर्म के अटूट संस्कार भी
17:54प्रदान किये।
17:56आगे चलकर राजकुमार विरोचन के घर एक परम प्रतापी पुत्र का जन्म हुआ, जिसकी अलोकिक कांती से संपूर्ण ब्रहमांड आलोकित
18:05हो उठा और उसका नाम बली रखा गया।
18:08पितामा प्रहलाद ने अपने पोते बली को अपनी गोद में उठा कर उसके मस्तक को चूमा और उसके भीतर भावी
18:16महान दानवीर राजा के लक्षन देखे।
18:20जैसे जैसे बली बड़ा हुआ, उसने महर्शी शुक्राचार्य के सानिध्य में धनुर्विद्या, राज्य शास्त्र और सत्यवचन के कठोर नियमों का
18:28पालन किया।
18:30आचार्य शुक्राचार्य ने बली के लिए एक महान विश्वजीत यग्य का आयोजन किया, जिससे उसे अभेद्य स्वर्णरत और अलौकिक दिव्य
18:39अस्त्र प्राप्थ हुए।
18:42भक्तराज प्रहलाद ने अपने वंश्जों को यह अंतिम संदेश दिया कि धन और राज्य से भी बढ़कर भगवान नारायन की
18:50भक्ती ही सत्य है।
18:52इस प्रकार प्रहलाद की अटूट भक्ती से दैत्य कुल का उद्धार हुआ और उनके पौत्र राजा बली के स्वर्णिम युग
19:00का मार्ग प्रशस्थ हुआ।
19:02भगवान नर्सिं के शांत स्वरूप और ब्रहमा जी के पावन आशिरवाद से प्रहलाद को समस्त दैत्य सामराज्य का नया धर्म
19:10प्रायन समराट घोशित किया गया।
19:13पाताल लोग की भव्यराज सभा में महर्शी नारद, देवगन और दैत्य कुल के वृद्ध जन इस एतिहासिक धर्म पुरु ठान
19:21के साक्षी बने।
19:24पितामा ब्रह्मा ने वेद मंत्रों के पवित्र उच्चारण के साथ प्रहलाद के मस्तक पर दैत्य सामराज्य का अलोकिक स्वन मुकुट
19:31सुशोगित किया।
19:33भगवान नर्सिह ने भक्त प्रहलाद के मस्तक पर अपना वर्देहस्त रखते हुए यह अभयदान दिया कि जब तक उनका वंश
19:41धर्म पत पर रहेगा, तब तक भगवान स्वयां उनकी रक्षा करेंगे।
19:47रत्नजडित सिनहासन पर विराज मान होकर भी प्रहलाद के भीतर अहंकार का लेश मात्र न था, वे प्रभु नारायन के
19:55चर्णों में अपना मस्तक नवाकर राज्य संचालन का संकल्प लेते हैं।
20:00माता कयाधू ने अपने परम ज्यानी और विश्नुभक्त पुत्र के मस्तक पर अश्रुपूर्ण नेत्रों से विजय तिलकांकित कर अपना आशिर्वाद
20:09दिया।
20:11समराट प्रहलाद ने सिनहासन संभालते ही हिरन्यक्षिपू के सभी अधार्मिक और क्रूर नियमों को निरस्थ कर सर्वत्र सत्य और अहिंसा
20:19का विधान लागू किया।
20:22जिस राजसभा में कभी भाय और हुंकार का सामराज्य था, वहां अब ओम नमो भगवते वासुदेवाई की पवित्र ध्वनी निरंतर
20:30गूंजने लगी।
20:32प्रहलाद ने दैत्य लोग के कोने-कोने में वैदिक गुरुकुलों की स्थापना करवाई ताकि भावी पीधी सत्य, करुणा और हरिभक्ती
20:40का पाठ सीख सके।
20:42दैत्य गुरु शुक्राचारिय और वरिष्ठ मंत्री प्रहलाद की निश्पक्ष नियाय प्रणाली और अपार नमरता को देखकर हत प्रभ और गदगधो
20:51उठे।
20:53प्रहलाद के प्रभाव से असुरों ने अस्त्रशस्त्रों का त्याग कर क्रिशी, यज्यनुष्ठान और हरिकीर्तन को अपने जीवन का मुख्य आधार
21:02बना लिया।
21:03दैत्य सामराज्य में स्थानस्थान पर भगवान विश्णु के भव्य स्वन मंदिरों का निर्मान हुआ, जिससे संपून पाताल लोक दिव्य आलोक
21:12से जगमगा उठा।
21:14प्रहलाद के पुन्य प्रताप से शुष्क और भयंकर दैत्य भूमी हरीभी वनस्पतियों, अलोकिक पुष्पों और शीतल धाराओं से समरिध्ध हो
21:23गई।
21:25स्वर्गलोक में इंद्रदेव और समस्थ देवता प्रहलाद के धर्म प्रायन शासन को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और चिरकाल से चला
21:33आ रहा वैरभाव समाप्त हो गया।
21:36महाराज प्रहलाद ने विशाल महायग्यों का आयोजन करके अपनी प्रजा को भोजन, वस्त्र, स्वर्ण और भागवत ज्यान का अनमोलदान दिया।
21:46प्रहलाद अपने पुत्र विरोचन और पौत्र बली को भक्ती योग और न्यायपूर्ण शासन के गूड सिध्धानतों की शिक्षा देने लगे।
21:55दैत्य सामराज्य अपने इतिहास के सबसे शांतिपून और समरिद्ध युग में प्रवेश कर गया, जहां अन्याय और भय का नामों
22:03निशान नहीं बचा था।
22:05राजसी सुख भोगों के बीच रहते हुए भी प्रहलाद का चित्त सदैव अपने निजी मंदिर में नारायन की मूर्ती के
22:13सम्मुख ध्यान मगन रहता था।
22:15त्रिलोक में प्रहलाद की कीर्ती एक ऐसे आदर्ष भक्तनरेश के रूप में फैली, जिसने अपने पावन चरित्र से पूरे दैत्यकुल
22:24का उद्धार कर दिया।
22:26इस प्रकार भक्तराज प्रहलाद के धर्म प्रायन शासन ने एक ऐसे स्वर्णिम यूग की आधारशिला रखी, जिस पर आगे चल
22:35कर राजा बली का अभ्यूदय संभव हुआ।
22:38समय के निरंतर प्रवाह के साथ भक्त राज प्रहलाद के धर्ममय और न्याई शासन में संपूर्ण राज्य की सुख, शांती
22:46और सम्रिध्धी अपने उच्चतम शिखर पर पहुँच गई
22:50इसी परम पावन और आनंदमय काल में प्रहलाद की धर्म पत्नी महारानी धृती ने एक परम तेजस्वी बालत को जन्म
22:58दिया, जिसका नामकरण विरोचन किया गया
23:02भक्त शिरोमने प्रहलाद ने नवजात विरोचन को अपनी ममतामई गोद में उठा कर उसके कानों में श्री हरी विष्णु के
23:10पावन द्वाजशाक्षर मंत्र का जाप किया
23:13पिता के उच्च संसकारों और पावन शिक्षाओं की छाया में बालक विरोचन तेजी से बढ़ा होने लगा और वेदध्यान के
23:21साथ-साथ राजधर्म में भी पारंगत हो गया
23:25युवावस्था में कदम रखते ही विरोचन में असुरकुल का असीम शारिरिक पराकरम और अपने पिता प्रहलाद की धर्म प्रायंता का
23:33एक अद्भुत संतुलन दिखाई देने लगा
23:36प्रहलाद ने अपने पराक्रमी और ज्यानी पुत्र विरोचन की योग्यता को देखकर अत्यंत आनंद के साथ उसे सामराज्य का आधिकारिक
23:45युवराज घोशित किया
23:47समय बीतने पर युवराज विरोचन का विवाह रूपवती और धर्म प्रायन राजकुमारी विशुलाक्षी के साथ बड़ी धुमधाम और वेदोक्त रीती
23:57से संपन्न हुआ
23:59शीघरही विरोचन और विशुलाक्षी के महल में एक परम ओजस्वी और तेजपुंच बालक का जन्म हुआ
24:06जो आगे चलकर त्रिलोक में महाबली बली के नाम से विख्यात हुआ
24:11अपने पोते के जन्म का शुब समाचार सुनते ही वयोवरिध पितामा प्रहलाद का हृदय परम आनंद और भगवान नारायन की
24:19सर्वोप्री भक्ती से परिपूर्ण हो उठा
24:23पितामा प्रहलाद ने स्वयन अपने हाथों से बाल बली का पावन नामकरण और अभिशेक संसकार करते हुए उनके मस्तक पर
24:31नारायन के चरणकमलों का ध्यान किया
24:34जैसे जैसे बालक बली बड़ा होने लगा, पितामह प्रहलाद उसे स्वया अपने पास बैठा कर नवधा भक्ती का मर्म और
24:42सर्वव्यापी इश्वर के सिध्धान्त सिखाने लगे
24:46बालक बली अत्यंत तन्मयता और विस्मय से अपने पितामह के मुखारविन से भगवान रिसिन्ह के प्राकट्य और उनकी अध्भुत लीलाओं
24:55की गाथा सुनता था
24:58भक्तिभाव के साथ साथ राजकुमार बली को दैत्यगुरु और कुशल आचारियों द्वारा अस्त्रशास्त्र विद्या, गदायुद्ध और युद्धरन नीती का कठोर
25:07प्रशिक्षन दिया गया
25:08अपनी अल्प आयु में ही बली ने असुरों के स्वाभाविक असीम पराक्रम को दर्शाते हुए विशाल गदाओं को सहच्ता से
25:17उठाकर अपनी अध्भूत शक्ती का परिचय दिया
25:21प्रतिदिन संध्या समय पितामह प्रहलाद, उत्र विरोचन और बालक बली तीनों मिलकर राजमहल के विशाल मंदिर में श्री नारायन की
25:29भव्य आरती करते थे
25:32भगवान नारायन के विशाल श्री विग्रह के सम्मुख जुकते ही बालक बली का हृदय शुद्ध प्रेम से भर जाता था
25:39और उनकी आखों से अनवरत भक्तिय अश्रु बहने लगते थे
25:44समय चक्र की अबाध गती के साथ बली एक विशालकाय, पराक्रमी और अलौकिक कांती से सुशोभित महाबली युवा योध्धा के
25:53रूप में पूर्णत्ध विक्सित हो गए
25:56पितामा प्रहलाद ने देखा कि उनके पौत्र बली के व्यक्तित्व में भक्ती, धर्म, दानशीलता और असुर पराक्रम का एक दुलब
26:04और अध्भुत संगम तयार हो चुका है
26:08संपूर्ण दैत्य सामराज्यकी राजधानी को नए महान समराट के आगमन हेतु स्वर्णिम तोरंदवारों, दीपमालाओं और सुगंधित पुश्पों से अत्यंत भव्यता
26:18से सजाया गया
26:20इस प्रकार पितामह प्रहलाद के महान धर्म मार्क दर्शन में महा बली बली अपने जीवन के उस अभ्युदय के द्वार
26:27पर खड़े थे, जहां से उनका यश संपूर्ण त्रिलोक में गूंजने वाला था
26:33बली ने अपने तेजस्वी गुरु दैत्य गुरु शुक्राचार्य के समक्ष नमर्ता पूर्वक्षीश जुका कर भविश्य के मार्क का आहवान किया
26:42उनके हृदय में दैत्य कुल के उत्थान की तीवर अभिलाशा जड़ रही थी
26:47गुरु शुक्राचार्य ने बली की आखों में अथा शक्ती और अटूट संकल्प की ज्वाला देखी
26:53जो उन्हें अपने पूर्वजों के धर्म प्रायन मार्क पर आगे बढ़ने को प्रेरित कर रही थी
26:59किन्तु उसमें पराक्रम का भाव अधिक प्रबल था
27:03महाराज बली ने गुरु से कहा कि वे चाहते हैं कि दैत्यकुल का मान एक बार फिर तीनों लोकों में
27:10स्थापित हो
27:11और वे धर्म प्रायनता के साथ असुरों के खोये हुए गौरव को पुनः प्राप्त करें
27:17शुक्राचार्य ने बली को विश्वजित जैसे महायग्यों और कठोर तपस्या के मार्ध्यम से दिव्य शक्तिया अर्जित करने का मार्ग सुझाया
27:25जिससे वे तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकें
27:30गुरू के आदेश पर बली ने हिमालय की दुरगम कंदराओं में प्रवेश किया
27:35और अपनी इंद्रियों को वश्मे करते हुए गहन और अविचलित तपस्या आरंभ की जिसका संकल्प हिमालय सा अटल था
27:45वर्षों तक बली ने केवल वायू का सेवन करते हुए शीत और उश्न की परवाह किये बिना अपने शरीर और
27:52मन को एक अगनी कुंड में होम दिया जिसकी तपस्या का ताप चारों और फैलने लगा
27:58बली की अतुलनिय तपस्या की अगनी से तीनों लोग कमपायमान हो उठे और स्वर्ग में बैठे देवगण इस असाधारन दैत्य
28:07बालक के बढ़ते तेज से भयभीत हो गए उनके सिनहासन हिलने लगे
28:12तपस्या पूर्ण होने के पश्चात गुरु शुक्राचार्य ने अनेक विद्वान रिशियों और पुरोहितों के साथ मिलकर विश्वजत यग्य का भव्य
28:21अनुष्ठान आरंभ किया जिसकी तैयारिया अलोकिक थी
28:26स्वर्ण वस्त्रों में सजे शुक्राचार्य मंत्रों का शुद्ध उच्चारन करते हुए अगनी मेघी और समिधाय अर्पित कर रहे थे जिनकी
28:34ज्वालाए आकाश को छू रही थी और दिव्य उर्जा फैला रही थी
28:40अगनी कुंड से एक दिव्य स्वर्ण रत, अमूल्य कवच और अजे अस्त्रशस्त्र प्रकट हुए जिनहें बली ने सहर्ष स्विकार किया
28:48और उनका तेज पूरे वातावर्ण में फैल गया
28:52दैत्य सेनानियों ने अपने समराठ को दिव्य शक्तियों से सुसजित देखकर जैगोश किया और उनके हृद्यों में स्वर्ग विजय का
29:01नया उत्साह जाग उठा उनकी गर्जना से धर्ती काप उठी
29:06नवप्राप्त शक्तियों से युक्त होकर महाराज बली ने सबसे पहले मृत्यों लोग पर विजय प्राप्त की जहांके राजाओं ने उनके
29:14अजे बल और धर्म प्रायन शासन के आगे घुटने टेक दिये
29:19प्रित्वी के सभी शासकों ने स्वेच्छा से बली के आधिपत्य को स्विकार किया क्योंकि उन्होंने दैत्यराज की दानशीलता और धर्मनिष्ठा
29:28का अनुभव किया था जो उनके पूर्वच प्रहलाद के समान थी
29:33अब महाराज बली की द्रिष्टी स्वर्गलोग पर थी और इंद्र सहित सभी देवगण भैभीत होकर अपनी राजसभा में इस आसन्न
29:42संकट पर विचार करने लगे उनके चहरे पर चिंता की रेखाय स्पष्ट थी
29:48देवराज इंद्र ने ब्रिहस्पती और अन्य रिशियों से इस विकट परिस्थिती से निपटने का उपाय पूछा क्योंकि बली का बल
29:56अकल्पनिय हो चुका था और स्वर्ग को चुनौती दे रहा था
30:00अपने अदमय पराक्रमी योध्धाओं और गुरु शुक्राचार्य के आशिरवाद के साथ महाराज बली ने स्वर्ग की और प्रस्थान किया जिससे
30:09देवताओं के हृदय में कमपन होने लगा और भय की लहर दौड गई
30:15स्वर्ग के द्वार पर देवों और दैतियों के बीच एक भीशन युद्ध छिड़ गया जहां अस्त्रशस्त्रों की गड़गडाहट और योध्धाओं
30:23के सिंहनाद से दिशाए गूंज उठीन आकाश भी थर्रा उठा
30:28महाराज बली ने स्वयं देवराज इंद्र को द्वंधव युद्ध के लिए ललकारा और दोनों के बीच वजर तथा दिव्य अस्त्रों
30:36का भयंकर प्रहार आरंभ हो गया जिससे ब्रहमांड कमपायमान हो गया
30:41अपनी अलोकिक शक्तियों और गुरु के वर्दान से महाराज बली ने देवराज इंद्र को परास्त कर दिया और तीनों लोकों
30:49के अधिपती बन गए स्वर्ग उनकी मुठ्थी में था
30:53इस प्रकार महाराज बली ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त की और धर्म पूर्वक शासन करते हुए गुरु शुक्राचार्य के साथ
31:02अपने नए स्वर्णिन सामराज्य में प्रवेश किया एक नए युग का आरंभ हुआ
31:08स्वर्ग से निश्कासित होने के बाद अत्यंत दुखी और श्रीहीन होकर देवराज इंद्र और अन्य देवगन आकाश मार्ग से प्रित्वी
31:16की ओर उतरने लगे
31:19इंद्र के मस्तक का मुकुट और दिव्य आभूशन अब धूल धूसरित हो चुके थे और वे अपनी खोई हुई महिमा
31:26पर गहरा विलाप करते हुए घने जंगलों से होकर आगे बढ़े
31:31अगने देव, वायुदेव और अन्य देवताओं के चहरे भी अपमान और निराशा की कालिमा से ढखे हुए थे
31:38मानो उनका सारा तेज उस युद्ध भूमी में ही समाप्थ हो गया हो
31:43चलते चलते वे सभी देवता, अन्तह, शांत और पवित्र वातावर्ण से घिरे अपनी माता अधिती के पावन तपोवन में पहुँचे
31:51जहां का वातावर्ण दिव्य शांती से ओतप्रोथ था
31:56तपोवन के एक एकान्थ स्थान पर देवताओं की जन्नी माता अधिती पवित्र यज्यवेदी के समीप बैठी हुई ध्यानमगन थी और
32:05उनके चारों और एक अलौकिक दिव्यप्रकाश फैल रहा था
32:09अपने पुत्रों के आने की व्याकुल पच्चाप सुनकर माता अधिती ने धीरे से अपनी करुणामई आखें खोली और उनके मुखमंडल
32:18पर अचानक ही एक गंभीर चिन्ता की रेखा उभराई
32:22अपनी माता को देखते ही देवराज इंद्र के सबर का बांध तूट गया और वे अपनी सारी मर्यादा भूलकर अत्यंत
32:30व्याकुलता के साथ उनके चर्णों में गिर पड़े
32:34इंद्र के पीछे-पीछे अन्य सभी देवगण भी अत्यंत दीन भाव से माता अधिती के समक्ष भूमी पर जुक गए
32:41और अपनी रक्षा के लिए हाथ जोड कर प्रार्थना करने लगे
32:47अश्रुपूर्ण नेत्रों से इंद्र ने माता अधिती को बताया कि कैसे दानवराज बली ने अपनी प्रचंड आसुरी सेना के बल
32:54पर अमरावती पर अधिकार कर उन्हें वहां से ख़देड दिया है
32:59इंद्र ने अत्यंत दुखी होकर कहा कि गुरु शुक्राचार्य के वर्दान और अपनी असीम शक्तियों के कारण बली इस समय
33:07अजे हो चुका है जिससे हमारी सारी सेना परास्थ हो गई
33:12अग्नी और वायुदेव ने भी अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि यग्यों में मिलने वाले हविर्भाग से वंचित होकर वे
33:20सभी शक्तिहीन और असहाय हो चुके हैं
33:24अपने तेजस्वी पुत्रों को इस दैनिय और अपमानजनक स्थिती में देखकर माता अदिती का ममतामई हृदय करुणा से भर उठा
33:32और उनकी आँखों से आशु छलक पड़े
33:36उन्होंने अत्यंत वात्सल्य के साथ इंद्र के धूल से सने मस्तक पर अपना वर्देहस्त रखा और उन्हें धांधस बंधाते हुए
33:44धैर्य रखने को कहा
33:47माता अदिती ने समझाया कि समय अभी महाराज बली के पक्ष में है क्योंकि उन्हें ब्राहमनों और उनके गुरु का
33:54पूर्ण आशिर्वात प्राप्थ है इसलिए इस समय बल का प्रयोग व्यर्थ होगा
34:00उन्होंने अत्यंट गंभीरता से कहा कि इस संकट पूर्ण परिस्थिती से मुक्ती पाने का अब केवल एक ही मार्ग है
34:08और वह है सर्वव्यापक भगवान नारायन की शरण में जाना
34:13अत्यंट उच्सुक होकर इंद्र ने पूछा की वे ऐसा कौन सा उपाय या तपस्या करें जिससे भगवान विश्नु प्रसन्न होकर
34:21उन्हें उनका खोया हुआ स्वर्ग वापस दिला सकें
34:25तब माता अधिती ने परमकल्यानकारी पयोवरत का अनुष्ठान करने का संकल्प लिया जो बारह दिनों तक केवल दूध पीकर किया
34:34जाने वाला एक अत्यंत कठिन वरत है
34:38माता अधिती ने अपने मन को पूरी तरह एकागर किया और अपने हृदय में शंक, चक्र और गदाधारन किये हुए
34:46भगवान विश्नु के अत्यंत तेजस्वी रूप का ध्यान करने लगी
34:51माता के इस अटल विश्वास और कठिन तप के संकल्प को देखकर निराश हो चुके देवताओं के हृद्यों में भी
34:58आशा की एक नई दिव्यकिरन जागरत हो उठी
35:02परमश्रध्धा और भक्ती से भर कर माता अधिती ने अपने दोनों हाथ जोड लिये और संपूर्ण स्रिष्टी के पालनहार भगवान
35:10नारायन की दिव्यस्तुती करना आरंभ कर दिया
35:14माता अधिती के मुख से निकले वेद मंत्रों की मधुर ध्वनी कशप रिशी के आश्रम के शांत वातावर्ण में गूझने
35:21लगी जिससे संपूर्ण प्रकृती में एक अलोकिक और दिव्यशांती व्याप्थ हो गई
35:27कुटिया के एक कोने में बैठे परम ज्यानी महर्शी कशप अपनी अर्धांगिनी के इस निश्चल और कठोर तप को देखकर
35:35अत्यंत हर्शित हो रहे थे और उनके हृदय में देवों के भविश्य के प्रती एक नई आशा जागरत हो रही
35:42थी
35:43जैसे जैसे पयोवरत के दिन बीटते गए केवल दुग्ध का आहार लेने के कारण माता अधिती का शरीर अत्यंत दुर्बल
35:51हो गया परन्तु उनके मुखमंडल का तेज किसी प्रचंड सूर्य की भांती चमक रहा था
35:58माता की भक्ती की पराकाश्था से प्रभावित होकर आश्रम के उपर का आकाश अचानक स्वर्ण में और बैंगनी बादलों की
36:06आभासे भर उठा मानो स्वर्ग स्वयंधर्ती पर उतरने को आतुर हो
36:12देवराज इंद्र और अन्य पराजित देवता स्वर्ग के गुप्त कोनों से अपनी माता के इस महान त्याग को देख रहे
36:19थे और उनके व्यथित हृद्यों में भक्ती और सम्मान का सागर उमड रहा था
36:25माता अधिती ने बाहे जगत से अपने ध्यान को पूरी तरह हटा कर अपने हृदय कमल के भीतर क्षीर सागर
36:32में शयन कर रहे अनन्त कोटी ब्रहमांड नायक भगवान विश्नु के रूप को स्थापित कर लिया
36:39अचानक उस शांत पर्णकुटी के भीतर से एक अत्यंत तीवर और अलौकिक प्रकाशपुंच प्रकट हुआ जिसके तेज के सामने दोपहर
36:47के सैकडों सूरियों की रोशनी भी फीकी प्रतीत हो रही थी
36:52संपूर्ण वन ख्षेत्र में बहने वाली पवन अचानक मंद और सुगंधित हो गई और व्रिक्षों से दिव्य पारिजात के पुष्प
37:00स्वतह ही प्रित्वी पर गिरने लगे जो स्रिष्टी के रक्षक के आगमन का संकेत दे रहे थे
37:06उस दिव्य स्वर्णिन प्रकाश के मध्य से धीरे धीरे चराचर जगत के स्वामी साक्षात भगवान श्री हरी नारायन की अत्यंत
37:15मनमोहक और भव्य आकरिती प्रकट होने लगी
37:19चार भुजाओं में शंक, चक्र, गदा और पद्मधारन किये हुए नीलकमल के समान श्याम वर्ण वाले भगवान विश्णु अपनी मंद
37:27मुस्कान से पूरी कुटिया को आलोकित कर रहे थे
37:31माता अधिती ने जैसे ही अपने नेत्र खोले, सामने साक्षात परमेश्वर को पाकर उनका रोम्रोम पुलकित हो गया और वे
37:40भाव विभोर होकर उनके चर्णों की ओर देखने लगी
37:44महर्शी कश्यप भी इस परम सौभाग्य शालीक्षन को देखकर भक्तिभाव से अश्रुपूर्ण हो गये और उन्होंने भगवान नारायन के चर्णों
37:53में साश्टान गंडवत प्रणाम किया
37:56अपने पुत्रों के कश्टों को भूल कर माता अदिती भगवान विश्णु के चरण कमलों में गिर पड़ी और उनके नेत्रों
38:03से बहने वाले प्रेमाश्रुओं ने प्रभु के कोमल चरणों का अभिशेक कर दिया
38:09क्रिपानिधान भगवान विश्णु ने अत्यंत वातसल्य और करुणा के साथ अपने अभय हस्त को उठाया जिससे माता अदिती के हृदय
38:17का सारा संताप और भैक्षन भर में विलीन हो गया
38:22भगवान विश्णु ने अपनी गंभीर और मेग जैसी गंभीर वानी में कहा कि वे माता अदिती के इस अत्यंत कठिन
38:30पयोवरत और निश्काम भक्ती से पूरी तरह संतुष्ट हैं
38:35प्रभु ने देवताओं की पराजय और असुर्राज बली के बढ़ते हुए अहंकार को स्विकार करते हुए आश्वासन दिया कि धर्म
38:43की रक्षा के लिए अब न्याय का समय निकट आ गया है
38:48भगवान ने माता अधिती को वह महावर्दान दिया जिसकी उन्होंने कलपना भी नहीं की थी कि वे स्वयं उनके गर्ब
38:55से पुत्र रूप में जन्म लेकर देवताओं के खोए हुए गौरव को पुनरस्थापित करेंगे
39:00इस दिव्य आश्वासन को सुनकर माता अधिती का हृदय मातरित्व के असीम आनन्द से भर गया और उन्होंने हाथ जोड़कर
39:10भगवान के इस अध्भुत अनुग्रह को शिरोधार्य किया
39:14भगवान नारायन ने दोनों पती पतनी को एक साथ कल्यान का आशिरवाद दिया और देवलोक से दुदुम्भियों की दिव्य ध्वनी
39:22के साथ कल्पवरिक्ष के फूलों की वर्षा होने लगी
39:26वह मनमोहक दिव्य रूप धीरे धीरे एक सुखद सुनहरी आभा में परिवर्तित हो गया जिससे कशप का आश्रम दिव्य शांती
39:34और आने वाले मंगलकारी अवतार की प्रतीक्षा से सराबोर हो उठा

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