सुदामा के द्वारका से लौटने के बाद क्या हुआ? ✨ इस एपिसोड में देखिए, कैसे श्रीकृष्ण की असीम कृपा से सुदामा की दरिद्र कुटिया एक भव्य महल में बदल गई, और उनकी निष्काम भक्ति का अद्भुत फल मिला। इसके बाद, एक दुर्लभ चंद्रग्रहण के अवसर पर, कुरुक्षेत्र में एक विशाल तीर्थयात्रा का आयोजन होता है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण और बलराम, वर्षों बाद अपने प्रिय माता-पिता नंद और यशोदा, और वृंदावन के समस्त ग्वाल-बालों तथा गोपियों से मिलते हैं। यह भावुक पुनर्मिलन पुरानी यादों को ताजा करता है, प्रेम और भक्ति के गहरे अर्थों को उजागर करता है। कुरुक्षेत्र के इस पवित्र संगम में जुटे ऋषि-मुनियों और राजाओं के बीच धर्म और आध्यात्मिक ज्ञान पर भी गहन चर्चा होती है। देखिए सच्ची दोस्ती, अटूट प्रेम और भगवान की असीम कृपा की यह अविस्मरणीय गाथा! #BhagavataPurana #KrishnaStories #Sudama #Kurukshetra #Vrindavan #NandaYashoda #Gopis #DivineLove #HinduMythology
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00:00द्वारका से विदा लेकर सुदामा अपने चिरपरिचित गाउं की ओर ठके हुए कदमों से बढ़ रहे थे। उनके हृदय में
00:07केवल कृष्ण के अगाध प्रेम की स्मृती थी। उन्हें अभी भी द्वारकाधीश की अनुपम आतिथ्य सत्कार और उनके मित्र प्रेम
00:16की अ
00:29कुछ ऐसा जो उन्होंने पहले कभी अनुभव नहीं किया था। जहां उनकी जीनशेन जोपडी हुआ करती थी, वहां अब एक
00:39भव्य चमकदार संरचना की रूपरेखा क्षितिच पर उभरती दिखाई दे रही थी। उन्होंने अपने आखों को मला यह विश्वास करने
00:48क
00:49के लिए कि कहीं यह कोई स्वपन तो नहीं पर भव्य महल की दीप्ती वास्तविक्ता का प्रमान दे रही थी।
00:56वह अपने घर को खोजने के लिए इधर उधर भटकने लगे यह सोचते हुए कि शायद वह गलत रास्ते पर
01:03आ गए हैं या किसी और गाउं में प्रवेश कर ग
01:17ही थी। उनके मन में हजारों प्रश्न उठ रहे थे कि यह किसका महल है और वह यहां क्यों आ
01:24गए कहीं कोई गलती तो नहीं हुई। तभी बिना किसी आहट के महल के विशाल द्वार धीरे-धीरे खुलने लगे
01:32एक स्वर्णिम प्रकाश अंदर से बाहर की ओर फैलने लगा
01:36उस चमकीले प्रकाश से निकल कर कुछ अलोकिक रूप मानो दिव्य लोग के प्राणी हों सुदामा की ओर बढ़ते हुए
01:45दिखाई दिये। उनमें से सबसे आगे उनकी अपनी पतनी थी जो अब स्वर्णिम वस्त्रों और बहुमुल्य आभूशनों से सजी हुई
01:54थी जिन
01:59उनके पीछे उनके बच्चे थे जो अब रेश्मी पोशाकों और सुनहरे आभूशनों से सुसजित हनस्ते खेलते हुए उनके पास आ
02:07रहे थे। उनकी पतनी स्वयन भी इस अचानक आये वैभव से चकित उनके पास आई और उन्हें पहचानते ही उनके
02:16मुख पर एक नई �
02:18चमक आ गई। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। एक गहन मौन में लिपते हुए उनकी आखें इस अकलपनिय
02:26परिवर्तन की गवाह थी। बच्चे अपने पिता को देखकर खुशी से चहक उठे और दौड कर उनसे लिपट गए उनकी
02:35मासूमियत इस मायावी परिवर्
02:39उनकी पतनी ने व्याकुलता से बताया कि उन्हें नहीं पता यह सब कैसे हुआ। बस एक रात में उनकी जीर्णशीन
02:47कुटिया एक भव्य महल में बदल गई। तब सुदामा की आखों में एक गहरा भाव उमड़ा आया। उन्होंने ततकाल पहचान
02:56लिया कि यह उनके परम
02:57मित्र द्वारकाधी श्री कृष्ण की असीम कृपा है। बिना कुछ मांगे ही उनके मित्र ने उन्हें वह सब प्रदान कर
03:07दिया था जो उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। एक मौन उफार प्रेम का सबसे बड़ा प्रमान। अपनी
03:15पतनी और बच्चों के सा�
03:18महल में प्रवेश किया। हर कदम पर कृष्ण की कृपा का अनुभव करते हुए उनके हृदय में भक्ती का सागर
03:25उमड रहा था। महल के भीतर कदम रखते ही वे हीरे मोती, स्वर्नर्जत और बहुमूल्य रतनों से सुसज्जित कक्षों को
03:34देखकर अभिभूत हो गए, प
03:48अनसार रच दिया था, उनके मन में कृष्ण की लीला का गहन चिंतन उठ रहा था। उनकी पतनी और बच्चे
03:56इस अकलपनिय वैभव को देखकर आनंद से अभिभूत हो उठे, उनकी किलकारिया और हसी महल के स्वर्नमंदित गलियारों में गूंज
04:05रही थी।
04:20वे महल के विस्तरित, सुगंधित उध्यानों में टहल रहे थे, जहां रंगबिरंगे पुष्प और निर्मल जल के फववारे मन को
04:28मोह रहे थे, पर उनका मन वरिंदावन की सरल स्मितियों में खोया हुआ था।
04:48वो से बुने हुए राजसी वस्तर भेंट किये, जिनकी चमक उनकी सादगी को चुनोती देती प्रतीत हो रही थी।
04:55उन्होंने विनमरता से अत्यधिक अलंकरित वस्तरों को अस्वीकार कर एक गरिमामय पर सादे रेश्मी धोती का चुनाव किया, जो उनकी
05:05आंतरिक विरक्ती का प्रतीक था।
05:07अपने भव्यकक्ष के एक शांत कोने में अकेले बैठे सुदामाने आखे मूद ली और उनके मन में द्वारकाधीश कृष्न का
05:16दिव्य स्वरूप साकार हो उठा।
05:19गुरुकुल के वे दिन उनकी आखों के सामने घूम गए, जब कृष्न ने अभाव में भी उनके साथ अपना मुठी
05:27भर चनाबाटा था, और उनके बीच का प्रेम किसी भी भौतिकता से परे था।
05:33उन्हें सपष्ट आभास हुआ कि कृष्न ने अपने परम मित्र के सूखे चावल भी जिस प्रेम से स्विकार किये थे,
05:40वही प्रेम इस अतुल्निय संपदा से कहीं अधिक मूल्यवान था।
05:45सुदामा ने अपनी आखें खोली और उन्हें आभास हुआ कि यह अपार धन संपदा मात्र एक क्षन भंगुर भ्रम है,
05:53कृष्न की अनंत लीला का एक छोटा सा अंश।
05:57उन्होंने महल के स्वर्ण और रत्नों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ती नहीं माना, बलकि उन्हें भगवान की सर्वव्यापी कृपा की अस्थाई
06:05अभिव्यक्ती के रूप में देखा।
06:08उनका हृदय विरक्ती के एक अध्भुत भाव से भर गया, यह जानकर की सच्ची समरिधी भौतिक संग्रह में नहीं, बलकि
06:16परमात्मा के प्रती अटूट भक्ती में नहित है।
06:20नई स्पष्टता के साथ सुदामा ने समझा की कृष्ण की मित्रता और उनका दिव्य आशिरवाध ही एक मात्र शाश्वत खजाना
06:29है, जो किसी भी सांसारिक सामराज्य या विलासिता से कहीं बढ़ कर है।
06:35उनकी भक्ती और भी गहरी हो गई, उनकी नई परिस्थितियों में अचानक हुए बदलाव से अप्रभावित, कृष्ण के चरंटमलों पर
06:43केंद्रित रहने का उनका संकल्प और ग्रिड हो गया।
06:47सुदामा ने अपनी दैनिक पूजा पहले से भी अधिक समर्पन और प्रेम के साथ की, उनकी सरल भेंट ने उस
06:55भव्य वातावर्ण में भी एक गहन आध्यात्मिक उर्जा भर दी।
07:00उनकी पत्नी, उनके नए धन के बीच भी उनकी शांत विरक्ती को देखकर, उनके आध्यात्मिक बोध की गहराई को समझते
07:08हुए, और सम्मान के साथ उनके पास आई।
07:13सुदामा ने उन्हें शांत, प्रेमपूर्ण आखों से देखा, उनकी आंतरिक शांती बाहर की ओर फैल रही थी, मानो यह मौन
07:21संदेश दे रही हो की उनका सबसे बड़ा भाग्य महल नहीं, बलकि कृष्ण की असीम कृपा है।
07:28उन्होंने धीरे से अपने बच्चों के हाथ पकड़े, उन्हें यह सिखाया की सच्चा सुख रिदय की पवित्रता और भक्ती से
07:36आता है, नकी क्षन भंगुर भौतिक सुखों से।
07:39अंतिम द्रिश में सुदामा उस भव्य महल में खड़े थे, एक विनमर फिर भी तेजस्वी आकृती जो सच्ची विरक्ती और
07:48अटूट भक्ती का सार गर्शा रहे थे, आत्मा से सबसे धनी पुरुष।
07:53सुदामा ने कृष्ण की असीम कृपा और अपनी आंतरिक शांती से परिपूर्ण होकर पुनह अपने सरल कुटिया जीवन की ओर
08:02लोटने का मन बनाया, जहां वे भौतिक्ता से उपर उठकर भक्ती के आनंद में लीन रहना चाहते थे, जबकि उनकी
08:09आत्मा अब पहले से भ
08:22प्रेम और आशिरवाद का प्रत्यक्ष और चकित कर देने वाला प्रमान था, जिसने उन्हें विस्मित कर दिया।
08:54जिसका योग कुरुक्षेत्र में सनान और दान के लिए विशेश रूप से पवित्र माना गया, जिसने सभी भक्तों के हृद्यों
09:02में उत्साह भर दिया।
09:22द्वार का नगरी में भी चंद्र ग्रहेन के सनान के लिए व्यापक तयारियां चल रही थी, जहां याद्वगण अपने राजा
09:29उग्रसेन और राज कुमारों के साथ कुरुक्षेत्र जाने की तयारी में व्यस्त थे, जिससे पूरी नगरी उत्सवमय हो गई थी।
09:38भगवान श्रीक्रिष्न अपने अग्रस बलराम के साथ कुरुक्षेत्र की तीर्थ्यात्रा के आध्यात्मिक महत्व और विभिन संबंधियों के साथ पुनर्मिलन की
09:48संभावनाओं पर शांत मुद्रा में चर्चा कर रहे थे, उनके चहरों पर गंभीरता और प्रेम का अ�
10:07गतिशी द्रिश प्रस्तुत कर रहे थे, जो श्रध्धा और आस्था से उत्प्रोत था। कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमी जहा धर्म और
10:16अधर्म का महा संग्राम भविश्य में होना था, अब लाखों भक्तों और तपस्वियों के शिविरों और यद्यशालाओं से स�
10:24जो एक आध्यात्मिक नगरी में परिवर्तित हो गई थी।
10:54उनके हृदय में वर्षों के विरह के बाद एक अनूठी संतुष्टी उमड आती है। मानो ब्रहमांड स्वयें इस पवित्रक्षन का
11:02साक्षी बन रहा हो।
11:04फिर क्रिशनत राजा उग्रसेन और अन्ययादव वृद्धों के चर्णों में जुक कर उनका आशिरवाद लेते हैं, जो उन्हें देखकर असीम
11:12आनंद और गर्व का अनुभव करते हैं।
11:15उनके चहरे पर वातसल्य और सम्मान का भाव स्पष्ट था।
11:20वनवास से लोटे पांडव और ग्रॉपदी भी अपने तपस्या से तेजस्वी चहरों के साथ कुरुक्षेत्र के समागम में पहुँचते हैं,
11:29उनकी आखों में आशा और पूर्व संबंधों की मधुर स्मृतिया जलकती हैं, जो उनके दीर्ग कालिक संधर्ष की कहानी ब
11:48जलकती हैं, जैसे दो महान आत्माएं एक दिव्य उद्देश के लिए मिल रही हों।
12:20जैसे वे अपने प्रियजनों को वर्षों बाद देख रहे हों।
12:51जैसे वे एक दूसरे को शक्ती और साहस प्रदान कर रहे हों।
12:57संपूर्ण कुरुवंश और यादव कुल एक ही स्थान पर एकत्रित होकर दशकों के बिछोह और कठिनाईयों के बाद प्रेम और
13:05सद्भाव से परिपूर्ण एक विशाल पारिवारिक पुनर्मिलन का दृष्य प्रस्तुत करता है, जिसने कुरुक्षेत्र के वातावर्�
13:39संपूर्ण को भावनात्मक उर्जा से भर दिया।
13:42अब शांत भाव से एक दूसरे से मिल रहे थे। वातावर्ण में एक दिव्य उर्जा का संचार हो रहा था।
13:51सहसा दूर से धूल का एक गुबार उठता दिखाई दिया और उसके पीछे एक विशाल जनसमूह धीमी गती से शिविरों
13:59की ओर अग्रसर होता प्रतीत हुआ, �
14:01जिसकी उपस्थिती ने धीरे-धीरे सबकी उठसुकता बढ़ा दी। इस नए दल में व्रिंदावन के ग्रामेन निवासी थे, जिनके सरल
14:11वस्त्र और चेहरों पर वर्षों के बिचोह की एक गहरी टीस साफ जलक रही थी, किन्तु उनके हृदय में कृष्न
14:18को देखने की �
14:48अटूट आशा थी।
14:49खोजती आखों में एक शांत करुणामय अभिव्यक्ती लिए हुए थे। उनकी त्वचा का रंगर्म प्रित्वी जैसा था, जो प्रकृती के
14:57साथ सामनजस्य में बिताए जीवन को दर्शाता है। उन्होंने पारंपरिक सरल फिर भी सुरुचिपून सफेद धोती पहनी �
15:05जो पूरी तरह से व्यवस्थित और लपेटी हुई थी। साथ में एक महीन बुनी हुई गहरे केसरिया रंग की शौल
15:13जिसमें सुक्ष्म सुनहरे धागों से जटिल पैटर्न बने थे जो उनके चौड़े कंधों पर सुरुचिपून धंग से लपेटी हुई थी।
15:22जो उन
15:35उनके बाल मुख्य रूप से सफेद और करीने से कंधे हुए। कभी कभी महीन कपास की एक साधारन सुरुचिपून पगडी
15:43से धके होते हैं जो उनकी आडंबरहीन रॉयल्टी को दर्शाते हैं। उन्होंने नियूनतम क्लासिक सोने के आभूशन शायद एक साधारन
15:52सोने क
15:53कहार या एक मजबूत सोने का कड़ा पहें। रखे थे जो बिना दिखावा किये उनकी स्थिती को दर्शाते थे। उनके
16:02हाथ अकसर श्रद्धा में जुड़े होते थे या सनेह में फैले होते थे जो अटूट भक्ती और पित्रिवत कोमलता का
16:09आभा मंडल बिखेरते थे।
16:11जब वे भीड में निहारते थे उनका हृदय गहन लालसा से भरा था।
16:41उनकी त्वचा का रंग एक नरम गर्म प्रित्वी जैसा था जो साधारन कृपा और भक्ती में जिये जीवन को दर्शाता
16:49था। उन्होंने एक जीवन्त जटिल पैटर्न वाली रेश्मी साड़ी पहनी थी। शायद एक गहरा मैरून या गहरा नीला रंग जिसमें
16:58नाजु
16:58सुनहरे बॉर्डर और पारंपरिक रुपांकन बुने हुए थे, जो उनके सुन्दर फिर भी मजबूत रूप को निखारते थे, पल्लू उनके
17:08सिर और कंधों को सुरुचिपून धंग से धका हुआ था, उनके चादी के बालों बाली काली लटे करीने से पारंपरिक
17:15जु�
17:28या सुरक्षाक्मक रूप से उनकी चाती के करीब रखे होते थे, जो उनकी अटूट मातरित्व प्रवरित्ती का प्रतीक थे, उन्होंने
17:38पारंपरिक सन्यमित सोने के आभूशन पहने थे, नाजुक जुमके एक पतली सोने की चेन, और कुछ चूडिया सभी उनकी विनमर
17:47�
17:47शाही आभा को पूरक करते थे, उनका पूरा अस्तित्व एक आरामदायक गर्मजोशी और एक प्रचंड अटूट प्रेम को बिखेर रहा
17:56था, उनके कदम अपने प्यारे बच्चे के साथ फिर से जुडने की तीवर इच्छा से तेज थे, उनका हृदय आजीवन
18:03दबी भा
18:04भावनाओं से उमड रहा था, जो हल्चल भरी भीड के बीच एक शक्तिशाली भावनात्मक उपस्थिती का निर्मान कर रहा था,
18:12नेगेटिव मल्टिपल आर्म्स, गोट हेड, मॉडर्न एलिमेंट्स, आउट अफ सिंक क्यारक्टर्स, उनके पीछे ग्वाल बालों और गो
18:33पुची भीड में एक फुसफुसाहट फैल गई, क्योंकि कई लोगों ने व्रिंदावन के इन सरल लोगों को पहचान लिया, और
18:40उनके साथ भगवान कृष्ण के बचपन की मधुर स्मृतिया ताजा हो उठी
18:46दूर से ही, नंद और यशोदा ने एक चमकती हुई दिव्य आकरिती को देखा, उनका लल्ला, जो अब एक शक्तिशाली
18:54राजा और ब्रहमांडिय नायक के रूप में प्रतिष्थित था, जिसका तेज कुरुक्षेत्र के वातावर्ण को प्रकाशित कर रहा था
19:03भगवान कृष्ण एक दिव्य युवा पुरुष आकरिती, उनके कमल जैसे होठोन पर एक इथर, शांत मुसकान थी, उनकी मनमोहक आखें,
19:13एक अन्थीन ब्रहमांडिय सागर की तरह गहरी और काली, करुणा और गहन ज्यान को विकीर्ण कर रही थी, उनकी तवचा,
19:21एक च
19:32अव्य सुनहरे रेश्मी धोती, पीतांबर, जटल पैटर्न के साथ सावधानी से लपेटी हुई, और एक चमचमाती, जीवंत पीली शॉल उनके
19:41कंधों पर ग्रेस फोली बहती हुई, चमचमाते मानेक और पन्ने जड़े एक भारी सुनहरे कमरबंध से बंधी हुई, सुस
20:01अशिदार सुनहरे हार, उनकी बाहों को गले लगाने वाले पौरानिक जीवों से तराशे गए भारी बाजूबंध, अलंकृत सुनहरे पायल, और
20:10एक राजसी सुनहरा मुकुट मुकुट जो चमकते, बहुआया में रकनों से सजा था जो बिखरे हुए सितारों की तरह प्
20:18करते थे, जिसके उपर एक अकेला, इंद्रधनुशी मोर पंख धीरे से हिलता था, जो उनके शाश्वत आकर्शन और प्रकृती से
20:27संबंध का प्रतीक था, उनके लंबे, काले, हलके घुंगराले बाल उनके आदर्श चहरे को घेरे हुए थे, दिव्य भव्यता बिखेरते
20:36हुए, उनके रूप से एक सुक्ष्म सुनहरा आभा धीरे से निकलती थी, उनके चारों और एक पवित्र वातावर्ण बनाती थी,
20:44उनके हाथ अकसर एक शंख या बानसुरी पकड़े हुए होते थे, हालांकि यहां वे एक अभिवादन या प्रत्याशा की मुद्रा
20:52में थे
20:53गर्म जोशी और दिव्य उर्जा बिखेरते हुए भव्य सभा के बीच।
21:23द्रिश्य कौंध उठे, माखन चोरी, गोवर्धन लीला और ग्वालों के साथ बिताए आनंदमय क्षण जिसने उनके दिव्य हरिदय को वातसल्य
21:31से भर दिया।
21:33शनभर की हिच्खिचाहट के बाद भगवान कृष्ण अपनी सीट से उठे, उनकी राजसी चाल में एक त्वरित आतुर्ता थी और
21:42वे उस दिशा में आगे बढ़े जहां से उनके मातापिता की आहट आ रही थी।
21:47नंद महाराज ने जैसे ही कृष्ण को अपनी ओर आते देखा, उनकी आखों से वर्षों के बिचोह की पीड़ा आसूओं
21:55के रूप में बह निकली और वे अपने प्यारे पुत्र की ओर दौर पड़े, उनके कदम उच्साह से डगमगा रहे
22:02थे।
22:03कृष्ण ने अपने वृद्ध पिता को कसकर गले लगाया, दोनों के बीच का मौन आलिंगन अनकहे प्रेम और दशकों के
22:11बिचोह की कहानी कह रहा था, जिसने उपस्थित सभी लोगों की आखें नम कर दी।
22:18ततपश्चात कृष्ण अपनी यशोदा मया की ओर मुडे, जिनकी आखें आसूओं और प्रेम से भरी थी, और उन्होंने उन्हें अपनी
22:26शक्तिशाली भुजाओं में भर लिया, जैसे कोई बच्चा अपनी मा की गोद में लौट आया हो।
22:33यशोदा मया ने कृष्ण के गालों को थप्थ पाया, उनके माथे को चूमा और उनके बाल सहलाए, जैसे वे आज
22:41भी उन्हें अपना नटखट कानहा मानती हों, उनके वादसल्य की कोई सीमा नहीं थी।
22:47फिर कृष्ण ने अपने बच्चपन के सभी ग्वाल बालों को सनेह पूर्वक गले लगाया, उनके नाम पुकारे और उनके कंधे
22:55थप्थ पाये, जिससे उनके बीच की पुरानी मित्रता और खेलकूद की यादें ताजा हो गई।
23:02गोपिया दूर से ही इस भावुक पुनर्मिलन को देख रही थी, उनके हृदय में भक्ती और प्रेन का सागर उमड
23:09रहा था, उनके नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी, जो उनके अटूर प्रेन का प्रतीक थी।
23:16कुरुक्षेत्र की वह भूमी, जो भविश में महायुध की गवाह बनने वाली थी, उस दिन व्रिंदावन के विशुध प्रेन और
23:24कृष्ण के वातसल्य के पुनर्मिलन से धन्य हो गई, एक ऐसा द्रिश जिसने समय को भी क्षण भर के लिए
23:30थाम दिया।
23:32उन्ही क्षणों में भगवान कृष्ण की दिव्यद्रिश्टी ने दूर खड़ी अपनी पालक माता यशोदा और पिता नंद को देखा, जिनके
23:40चहरे पर वर्षों के विरह का दुहक और मिलन की आशा स्पष्ट जलक रही थी।
23:46नंद और यशोदा ने भी अपने कानहा और बलराम को भीड के बीच देखा, और उनके हृदय में वर्षों से
23:54दबा हुआ वातसल्य और प्रेम का सागर उमड पड़ा, अश्रुधाराएं अविरल बहने लगी।
24:00जैसे ही कानहा ने उन्हें देखा, उनके मुख से अनाया स्मया, और बाबा का उद्धोश निकला, और वे पलक जपकते
24:08ही अपने सभी राजसी कर्तवियों को भूल कर उनकी ओर दोड पड़े।
24:14सबसे पहले कृष्ण अपनी मा यशोदा के चर्णों में गिरे और फिर उनके वक्ष से लिपट गए, जैसे एक शिशु
24:21अपनी मा की गोद में लोटने के लिए तरसता है।
24:26यशोदा मा ने अपने कलेजे के टुकडे को इतने वर्षों बाद फिर से अपनी बाहों में भर कर रोपड़ी, उनके
24:33हाथों ने कान्हा के श्याम वर्ण गालों को सहलाया और उनके आसु कृष्ण के मुख को धो रहे थे।
24:40कान्हा ने अपनी मा यशोदा के आसूओं को पोँचते हुए कहा मया इन आखों में अब केवल प्रेम के आसू
24:47बहें वियोग का एक भी कत्रा नहीं
24:49मुझे ख्षमा कर देना मया
24:53इसके बाद कृष्ण अपने पिता नंद बाबा के गले लगे जिन्होंने वर्षों से अपने लाडले पुत्र को हृदैसे लगाने की
25:02प्रतीक्षा की थी और अब उनका हृदैस ने से भर उठा
25:07नंद बाबा ने कृष्ण के सिर पर हाथ फेरते हुए उन्हें आशिरवात दिया मेरे कानहा तुम जहाँ भी रहे हम
25:14जानते थे कि तुम जग का कल्यान ही कर रहे हो
25:18बलराम ने भी पहले यशोदामा को गले लगाया उनकी आखों में अपने बड़े पुत्र के लिए असीम वात्सल्य और गर्व
25:26जलक रहा था
25:28फिर बलराम ने नंद बाबा को आदर पूर्वक गले लगाया जिन्होंने अपने शक्तिशाली पुत्र को देखकर भावुकता से कहा
25:36मेरा बलदाउं तुम हमेशा मेरे गौरव रहे हो
25:41यशोदा मा ने अपने कानहा के सिर पर हाथ फेरते हुए वरिंदावन की उन मधुर स्मृतियों को ताजा किया जब
25:48वे छोटे थे
25:50कृष्ण ने अपनी मा की बातों को सुनकर मंद मंद मुस्कुराते हुए कहा
25:54हा मया और तुम मुझे डाटने के बाद भी मेरे माथे पर चुम्बन देती थी
26:01नंद बाबा ने आखों में आसू लिये हुए कहा
26:04जब तुम वरिंदावन छोड़ कर गए तब से हमारा आंगन सुना हो गया था
26:09हर पल तुम्हारी याद में बीटता था कानहा
26:13बलराम ने नंद बाबा के कंधे पर हाथ रखते हुए सांत्वना दी
26:18बाबा हम जानते हैं कि यह वियोग कितना कश्ट दाई रहा पर आपका प्रेम ही हमारी शक्ती है
26:26कृष्ण ने आखों में पश्चाताप के आसूली कहा
26:29मया बाबा मैं जानता हूँ कि मैंने आपको बहुत कश्ट दिया
26:33मुझे ख्षमा कर दें कि मैं आपको छोड़ कर मथुरा चला गया
26:38यशोदा मा ने तुरंट कृष्ण को उठाया और उनके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली
26:44नहीं मेरे लाल इसमें तुम्हारी कोई गल्ती नहीं थी हम जानते थे कि तुम्हें बड़े कार्य करने है
26:52नंद बाबा ने गर्व से कृष्ण के कंधे पर हाथ रखा हमें तुम पर गर्व है मेरे कानहा तुमने अधर्म
26:59का नाश करके धर्म की स्थापना की है
27:03कुरुक्षेत्र की वह भूमी, जो कुछ समय पहले युद्ध की आशंका से ग्रस्थ थी, अब कृष्ण, बलराम, नंद और यशोदा
27:11के पवित्र वातसल्य और प्रेम के पुनर्मिलन से दिव्य शांती और आनन से परिपूर्ण हो गई
27:18कान्हा ने अपने पालक माता-पिता से आग रह किया, मया, बाबा, अब आप द्वारका में हमारे साथ रहें, वहां
27:26आपका घर, आपका परिवार, आपकी प्रतीक्षा कर रहा है
27:31नंद और यशोदा अपने पुत्र के इस अनुरोध से भाव विभोर हो उठे, उनके हृदय में अपने लाडले के साथ
27:39रहने की अदमय इच्छा जाग उठी, और उन्होंने प्रेम पूर्वक द्वार का जाने की स्वीकृती दे दी
27:46कुरुक्षेत्र के विस्तृत मैदान में दूर से ही द्वार काधी श्री कृष्ण को अपने परिवार के साथ देख व्रिंदावन की
27:54गोपिया, जिनकी आखें वर्षों से अपने प्रियतम की एक जलक को तरस रही थी, एक अद्रिश्यबल द्वारा खिंची चली आई
28:03जैसे ही उनकी आखें कृष्ण के दिव्यस्वरूप पर पड़ी, उनके हृदय में प्रेम की एक अवर्णनी लहर उमड पड़ी, मानो
28:11समय की सभी दीवारे ढह गई और वे पुन्ह उनके बाल्यकाल की लीलाओं में खो गई
28:17हर एक गोपी के मनमस्तिश्क में कृष्ण के साथ बिताय वरिंदावन के मधुर्क्षन माखन चोरी से लेकर रासलीला तक एक
28:26चलचित्र की भाती तेजी से घूमने लगे, जिससे उनकी विरहव्यथा और भी गहरी हो गई
28:33इतनी निकट्ता पर भी उनसे मिल न पाने की असमर्थता ने उनके हृदय में एक तीखी पीडा जगा दी, जैसे
28:40प्यासा व्यक्ति जल के स्रोत को देख रहा हो पर उस तक पहुंच न पा रहा हो
28:46श्री कृष्ण की चुम्बकिय उपस्थिती ने उन्हें एक तक निहारने पर विवश कर दिया, उनकी आखें उनके दिव्य सौंदर्य से
28:54हट ही नहीं पा रही थी, मानो सदियों की प्यास बुझाने का यह एक मात्र उपाय हो
29:01उनके नेत्रों से अश्रु नहीं बह रहे थे, बलकि उनके हृदय से निकली प्रेम की अनकही भावनाएं, हर पल कृष्ण
29:08के प्रती उनकी अटूट श्रद्धा को बिना शब्दों के व्यक्त कर रही थी
29:14सहसा, श्री कृष्ण ने अपनी कमल जैसी आखों को थोड़ा उपर उठाया और उनकी द्रिष्टी मानो एक अद्रिष्य दोर से
29:22बंधी गोपियों की दिशा में घूम गई, जिससे उनके हृदय में एक मीठी सी हल चल हुई
29:29यद्यपी दूर से उस एक क्षण के लिए कृष्ण और गोपियों के बीच वर्षों की दूरी मिट गई और उनकी
29:36आत्माओं ने एक दूसरे को मौन प्रेम और पहचान के साथ अभिवादन किया
29:42विशेश रूप से राधा, जिनका प्रेम क्रिश्ण के प्रती अनमोल और असीम था, उस क्षण में अपने हृदय के हर
29:49स्पंदन में क्रिश्ण की उपस्थिती महसूस कर रही थी, उनकी आखें अवर्णनिय प्रेम से भरी थी
29:57उनके बीच कोई शब्द नहीं थे, कोई स्पर्ष नहीं था, फिर भी हजारों वर्षों की कहानिया उन दो आत्माओं के
30:04बीच उस मौन समवाद में नहित थी, जो केवल हृदय ही समझ सकते थे
30:11गोपियों को पता था कि यह क्षन अस्थाई था, और जल्द ही कृष्ण द्वार का लौट जाएंगे, जिससे उनके हृदय
30:18में एक और वियोग की आशंका ने धीरे-धीरे अपनी जगह बना ली
30:23क्रिश्ण ने गोपियों की उस निस्वार्थ, पवित्र प्रेम को अपनी आत्मा में महसूस किया, जानते हुए भी की कर्मों के
30:31मार्ग पर उन्हें अब अलग दिशा में चलना था
30:35हर गोपि की आखों में एक अव्यक्त प्रश्ण था, क्या आप हमें भूल गए हैं, हमारे प्रेम को व्रिंदावन की
30:42उन मधुर स्मितियों को?
30:44क्रिश्न की ओर से कोई शब्द नहीं आया, क्योंकि उनकी लीला अब ब्रह्मांडिय धर्म और कर्तवियों से बंधी थी, और
30:52वे जानते थे कि गोपियों का प्रेम शाश्वत है, जिसे किसी भौतिक उपस्थिती की आवश्शक्ता नहीं
31:00गोपियों ने क्रिश्न की मौन स्वीकृती को समझा, और उनके भीतर प्रेम की एक नई समझ जागरित हुई, एक ऐसा
31:07प्रेम जो भौतिक सीमाओं से परे था, जो केवल आत्मा से आत्मा तक पहुँचता था
31:14उन्होंने महसूस किया कि भले ही क्रिश्न उनके समक्ष शारिरिक रूप से नहों, वे हर पल उनके हिदय में, उनकी
31:21आत्मा के हर कोने में, शाश्वत रूप से विराजमान थे
31:26उनकी आखों में अब अश्रु नहीं, बलकि भक्ती की गेहन जोती चमक रही थी, एक ऐसी जोती जो क्रिश्न के
31:34प्रती उनके अटूट विश्वास और प्रेम की साक्षी थी
31:38अंतह एक अंतिन प्रेमपूर्ण ग्रिष्टी के साथ, गोपियों ने क्रिश्न को विदा किया, यह जानते हुए कि उनका प्रेम किसी
31:46भौतिक सीमा का मोहताज नहीं, बलकि यह चिरंतन और अविनाशी है
31:52वे वापस व्रिंदावन की ओर मुर गई, अपने हृद्यों में क्रिष्ण के उस प्रेम को लेकर, जो अब पहले से
32:00भी अधिक शुद्ध और गहरा हो गया था, जिसे कोई भी दूरी कम नहीं कर सकती थी
32:06कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में गोपियों और कृष्ण का यह मौन मिलन, भौतिक दूरी के बावजूद, प्रेम की शाश्वत प्रकृती
32:14और भक्त भगवान के अटूट संबंध का एक अविस्मनिय प्रमान बन गया
32:20कुरुक्षेत्र के उस पावन रणभूमी पर जहां प्रेम का मौन समवाद संपन्न हुआ था, अब एक अध्वितिय आध्यात्मिक सभा का
32:28आयोजन हो रहा था, जिसके लिए दूर-दूर से ज्ञानी जन पधार रहे थे
32:34गोपियों के विदा होने के उपरांट वायुमंडल में एक नई पवित्रता घुल गई थी, जो गहन चिंतन और आत्म ज्ञान
32:42की ओर संकेत कर रही थी
32:45अनेक रिशियों, मुनियों और तपस्वियों ने, जिनकी आभा उनके तप और ज्ञान से प्रकाशित थी, इस धर्म प्रायन सभा में
32:53अपना स्थान ग्रहन करना प्रारंभ कर दिया
32:57महातेजस्वी महर्शी व्यास, जिनका ज्यान सागर की तरह अगाध था, अपनी दिव्य उपस्थिती से सभा को और भी गौर्वानवित कर
33:05रहे थे
33:07देवर्शी नारद, जिनके हाथों में वीना सुशोगित्थी और मुख से हर पल नारायन का नाम निकलता था, अपनी दिव्य ध्वनी
33:15से सभा को मंत्रमुग्ध कर रहे थे
33:18राजा युधिष्थिर और अन्यधर्मात्मा नरेश भी अपने राजसी वेश में परंतु विनम्रता पूर्वक इस पावन प्रवचन को सुनने के लिए
33:28उपस्थित हुए थे
33:30जैसे ही सभा व्यवस्थित हुई, एक गहन शांती और गंभीर प्रतीक्षा ने पूरे वातावर्ण को आच्छादित कर लिया, मानो ब्रह्मांड
33:39स्वयं ज्ञान की वर्षा के लिए उच्छुखो
33:43महर्शी व्यास ने अपनी तपस्या से प्रदीत मुख मंडल को उपर उठाया, उनकी आखें हजारों वर्षों के ज्ञान से चमक
33:51रही थी, और उन्होंने धर्म के सार पर प्रवचन प्रारंब किया
33:56उन्होंने समझाया कि धर्म केवल अनुष्ठानों का पालन नहीं, अपितु आत्मा का स्वभाव है, जो सत्यत न्याय और करुणा पर
34:04आधारित है
34:07गुरुशिष्य परमपरा का महिमामंदन करते हुए, व्यास ने जीवन के चार पुरुशार्थों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की गहन व्याख्या
34:15की
34:17देवर्शी नारद ने अपनी वीना के मधुर तारों को छेड़ते हुए, भक्ती योग के महत्व पर प्रकाश डाला, जिसे सभी
34:25मारगों में सर्वोच बताया
34:28उन्होंने समझाया कि निश्काम, प्रेम और पूर्ण समर्पन से ही व्यक्ती परम सत्य का अनुभव कर सकता है, जो सभी
34:35बंधनों से मुक्ती दिलाता है
34:38सभा में उपस्थित अन्य विद्वानों ने भी अपने अनुभवों और ज्ञान से धर्म, कर्म और आत्मा के गूढ रहसियों पर
34:46विचार प्रस्तुत किये
34:48कर्म योग के सिध्धान्त पर बल दिया गया, जिसमें फल की इच्छा के बिना कर्तव्यों का पालन करने से आत्मशुद्धी
34:56होती है
34:58ज्यान योग की महत्ता भी प्रतिपादित हुई, जिसके माध्यन से आत्मज्यान और माया से मुक्ती प्राप्ट की जा सकती है
35:07सभा में उपस्थित सभी ने एक स्वर में स्विकार किया कि आत्मसाक्षातकार ही जीवन का परम लक्ष है, जिसे प्राप्ट
35:15करने के विभिन मार्ध है
35:18इस प्रवचन ने सभी के हरिद्यों को धर्म, प्रेम और ज्ञान से भर दिया, जिससे उनके जीवन का उद्देश्य और
35:26भी स्पष्ठ हो गया
35:28कुरुक्षेत्र का युद्ध मैदान, जो कभी विनाश का साक्षी था, अब आध्याक्मिक पुरुठ्थान और गेहन ज्यान के संगम स्थल में
35:36बदल चुका था
35:38सभा के समापन पर सभी ने एक दूसरे को प्रणाम किया, उनके चहरों पर एक नई शान्ती और उद्देश की
35:46चमक थी, मानों वे एक पवित्र यात्रा पर निकल पड़े हो
35:51यह महामिलन केवल शरीरों का नहीं, बलकि आत्माओं का था, जिसने धर्म के शाश्वत संदेश को युगो-युगो तक गुंजने
35:59के लिए प्रेरित किया
36:01कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान से लोटते ही, महाराज वसुदेव के हरिदय में एक गेहन आत्ममन्थन चल रहा था
36:09उन्हें अपनी दीरगायू और कृष्णा जैसे पुत्र के लिए देवताओं का आभार व्यक्त करने की प्रबल इच्छा थी
36:17उन्होंने ततकाल राज्य के सबसे ज्ञानी और तपस्वी ब्राहमनों और रिशियों को अपने समक्ष प्रस्तुत होने का आदेश दिया, ताकि
36:25वे धर्म के मार्ग पर उचित मार्ग गर्शन प्राप्त कर सकें
36:30रिशियों ने वसुदेव की धर्म प्रायंता और उनके संकल्प की सराहना की और उन्हें पापों से शुद्धी तथा देवताओं की
36:38क्रिपा प्राप्त करने हेतु एक भव्य अश्वमेध यज्य करने का परामर्श दिया
36:44आदेश मिलते ही द्वारका के चारों और यग्य की भव्य तैयारी आरंभ हो गई सेवकगन पवित्र सामगरी, सुगंधित लकडिया और
36:53घी एकत्र करने में जुट गए
36:56पुरोहितों ने शुभ महूत और नक्षत्रों का ध्यान रखते हुए एक विशाल, शांत और पवित्र भूखंड का चयन किया, जहां
37:04यग्य की वेदी का निर्मान किया जा सके
37:07कुशल कारीग्रों ने वैदिक शास्त्रों के अनुसार, पवित्र इंटों और मिक्टी से निर्मित एक भव्य और बहुमंजिला यग्य वेदी का
37:15निर्मान आरंभ कर दिया, जिसे शुभ चेहनों से सजाया गया
37:20शुभ महूत पर शंकनाद और वैदिक मंत्रों की गूंज के साथ यग्य का विधिवत आरंभ हुआ, जिससे पूरा वातावर्ण, पवित्र
37:29और उर्जावान हो उठा
37:32महाराज वसुदेव और महारानी देव की शुद्ध वस्त्रों में सज्जित होकर विनमरता पूर्वक यग्य शाला में प्रवेश किया, उनके चेहरों
37:40पर श्रधा और ग्रिड संकल्प का भाव स्पष्ट था
37:45पुरोहितों के निर्देशानुसार वसुदेव और देवकी ने पवित्र अग्नी मेगी, जो तिल और अन्य सुगंधित हविश्य की प्रथं आहुती प्रदान
37:54की, जिससे दिव्यलो और सुगंध चारों और फैल गई
37:59यग्यशाला में उपस्थित सभी ब्राह्मनों ने एक स्वर में शक्तिशाली वैदिक मंत्रों का उच्चारण करना आरंभ किया, जिससे वातावर्ण में
38:08एक अध्भुत स्पंदित उर्जा भर गई, जो सीधे आकाश की ओर उठ रही थी
38:14भगवान श्री कृष्ण और बल्राम अपने अन्य बंधुबांध वो सहित यग्य की पवित्र प्रक्रिया को एकाग्रचित होकर देख रहे थे,
38:23उनके चहरों पर दिव्य शान्ती और प्रसन्नता का भाव था
38:27यग्य की अग्नी के सम्मुख बैठे वसुदेव अपने जीवन के उन पलों को याद कर रहे थे, जब उन्होंने अन्जाने
38:35में कोई पाप किया होगा, और अब वे इस यग्य के माध्यम से उन सभी से मुक्ती पा रहे थे
38:42यग्य अपनी पराकाश्था पर पहुँच चुका था, अगनी कुंड से उठती ज्वालाए मानो साक्षात देवताओं को आमंत्रित कर रही थी,
38:51और मंत्रों की ध्वनी पूरे ब्रहमांड में गूंज रही थी
38:55यग्य के समापन की वेला में, प्रमुख पुरोहितों ने वसुदेव और देवकी पर पवित्र जल छिड़का और उन्हें दीरगायू, सुक्सम्रिधी
39:04तथा समस्थ पापों से मुक्ती का आशिरवाद प्रदान किया
39:08यग्य की अंतिम आहुती के साथ ही, वैदिक मंत्रों का उच्चारन शांत हुआ और एक गहरी शांती ने यग्यशाला को
39:16घेर लिया, मानो देवताओं ने अपनी कृपा बरसा दी हो
39:21वसुदेव ने खड़े होकर एक ओजस्वी वानी में घोशना की की वे इस पवित्र यग्य के उपलक्ष में अपार धंधान्य,
39:29गौए और वस्त्रदान करेंगे, जिससे दरिद्रों का कल्यान हो
39:34वसुदेव की दान की घोशना सुनकर दूर दूर से असंख्य दीन दुखी और निर्धन लोग अपनी आशाओं को संजुए यग्यस्थल
39:42की ओर उमड़ पड़े
39:45वसुदेव और देवकी ने स्वय अपनी देखरेख में स्वण मुद्राय, हजारों दुधारुगाय, अन्मोल रत्न और उत्तम वस्त्र, दरिद्र ब्राहमनों और
39:55सभी याचकों को उदारता पूर्वक दान किये
39:58दान प्राप्थ करने वाले सभी लोगों ने वसुदेव और देवकी को हरिदय से आशिरवाद दिया, उनकी लंबी आयू और परम
40:07कल्यान की कामना की, जिससे यग्यस्थल पर प्रेम और कृतज्यता की धारा बह निकली
40:13यग्य और दान की समाप्ती के बाद वसुदेव ने अपनी पतनी और पुत्रों को देखा और उनके हृदय में अद्वितिय
40:21शांती, शुद्धी और आत्मसंतुष्टी का अनुभव हुआ, मानों उन्होंने अपना जीवन धन्य कर दिया हो
40:29यग्य की भव्यता और आत्मसंतुष्टी के उपरांत, भगवान श्री कृष्ण के हृदय में अचानक वरिंदावन की मधुर स्मृतिया और गोपियों
40:38का अन्मोल प्रेम उमड पड़ा, जो अब भी उनके विरह में तडप रही थी
40:44अपनी दिव्यत रिष्टी से उन्होंने गोपियों के हृदय की अथाह पीडा को अनुभव किया, उनकी अश्रुपून आखों और अटूट भक्ती
40:52को देखा, जो वर्षों से केवल उनके ही नाम का जाप कर रही थी
40:58गोपियों की पुकार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने तुरंथ ही वरिंदावन की ओर प्रस्थान करने का निर्णय लिया, जहां उनके बचपन
41:06की लीलाएं और प्रेम की अटूट दोर उन्हें खीच रही थी
41:11उनकी आगमन की खबर एक शीतल पवन की तरह वरिंदावन के हर कण में फैल गई, जिससे गोपियों के उदास
41:19हृद्यों में आशा की नई किरन जगमगा उठी
41:23वरिंदावन पहुचते ही, उन्होंने गोपियों को एक शांत कदम के पेड़ के नीचे बैठे हुए पाया, उनकी आखें दूर क्षितिच
41:31पर टिकी थी, मानों वे किसी चिरपरिचित आकृती की प्रतीक्षा कर रही हूँ
41:37श्री कृष्ण को अचानक अपने सामने देखकर, गोपिया अवाक रह गई, उनकी आखों में वर्षों का विरह और फिर अचानक
41:45मिली खुशी के आसु एक साथ चलक पड़े
41:49मौन को तोरते हुए, क्रिश्ण ने अपनी मधुरवानी में उन्हें सांत्वना दी, यह समझाते हुए कि वे कभी उनसे दूर
41:57नहीं थे, क्योंकि वे हमेशा उनके हृदय में निवास करते हैं
42:03उन्होंने समझाया कि भौतिक दूरी केवल एक भ्रम है, और सच्चा संबंध आत्माओं का होता है, जो प्रेम और भक्ती
42:11के धागे से सदा जुड़ा रहता है
42:14क्रिश्ण ने उन्हें याद दिलाया कि व्रिंदावन की हर ध्वनी, हर सुगंध और हर ग्रिश में उनकी उपस्थिती नहित है,
42:22जिसे केवल शुद्ध हरिदय ही अनुभव कर सकता है
42:26उनकी बाते सुनकर, गोपियों के मन में वर्षों से जमा विरह का कोहरा छंटने लगा और उनके चहरों पर एक
42:34अलौकिक शान्ती का भाव उभर आया
42:37कृष्ण ने प्रेम की शक्ती पर बल दिया, यह कहते हुए कि वही सक्चा मार्ग है, जिससे आत्मा परमात्मा से
42:44अविभाज्य रूप से जुड़ सकती है
42:48उन्होंने प्रेम भक्ती को सर्वोच्च साधन बताया, जिसके माध्यम से वे निरंतर उनकी उपस्थिती का अनुभव कर सकती थी, चाहे
42:57वह शारिरिक रूप से कहीं भी क्यों न हो
43:00उनकी बातों से गोपियों को यह एहसास हुआ कि उनका प्रेम केवल एक व्यक्ती के लिए नहीं, बलकि समस्त ब्रहमांड
43:08के सार्व स्वयं परमात्मा के लिए था
43:12उन्होंने अपनी हृदय की गहरायों में क्रिश्न की शाश्वत उपस्थिती का अनुभव किया, मानों वे सदा से ही उनके साथ
43:19थे, कभी दूर नहीं हुए
43:22क्रिश्न ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे हमेशा उनकी भक्ती के हर कण में मौजूद हैं, और यह प्रेम ही
43:29उन्हें एक दूसरे से अविभाज रखता है
43:33उनके आसु अब विरह के नहीं, बलकी परम आनंद और आंतरिक मिलन के थे, जिससे उनके हृदय में असीम संतोष
43:41और चिरस्थाई शांती भर गई
43:45व्रिंदावन का कणकन उनके मिलन की दिव्य उर्जा से स्पंदित हो उठा, और हर फूल, हर पत्ती प्रेम और भक्ती
43:52के नए अर्थ से खिल उठी
43:55गोपियों ने अब श्री कृष्ण की शारिरिक उपस्थिती को नहीं, बलकी उनकी आत्मिक शाश्वत उपस्थिती को अपने भीतर अनुभव किया,
44:04जो उनके जीवन का आधार बन गई
44:07कृष्ण ने उन्हें अंतिमबार आशिर्वाद दिया, यह जानते हुए कि अब उनका प्रेम भौतिक सीमाओं से परे होकर एक नई
44:15आध्यात्मिक उचाई पर पहुँच गया है
44:19गोपिया अब अपने भीतर कृष्ण को पूर्ण रूप से आत्म साथ कर चुकी थी, अपने दैनिक जीवन में भी उनकी
44:27निरंतर उपस्थिती का अनुभव करती हुई, व्रिंदावन में प्रेम और भक्ती का शाश्वत गीत गाती रही
44:34गोपियों ने कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमी से विदा लेते हुए, श्रीकृष्ण की भौतिक अनुपस्थिती में भी उनके प्रेम और उपस्थिती
44:43को अपने हृदय के प्रत्येक स्पंदन में अनुभव किया, जो अब उनकी आत्मा का अविभाज अंग बन चुक
45:26की वर्षा कर रहे थे।
45:35बलराम अपने शांत और शक्तिशाली स्वरूप में कुरूक्षेत्र के पवित्र मैदान पर अंतिन द्रिश्टी डालते हुए, अपने भीतर इस महान
45:44समागम की आध्यात्मिक शांती को आत्म साथ कर रहे थे।
46:04भगवान श्री कृष्न सभी भक्तों के विदा होने से पूर्व कुछ वृद्ध रिशिमुनियों और पूजनिय संतों से अंतिम आशिर्वात प्राप्त
46:12करने के लिए उनके समक्ष उपस्थित हुए, विन्मर्ता और सम्मान से परिपूर्ण।
46:18वृद्धावन के निवासी, जिनमें नंद बाबा और यशोदा मया भी शामिल थे।
46:24अपने हृदय में कृष्ण के दिव्य प्रेम की स्मृतियों को संजोए हुए, अपनी वापसी की यात्रा के लिए तैयार थे,
46:31उनकी आखों में एक मीठी उदासी थी।
46:34नंद और यशोदा, कृष्ण की ओर एक अंतिम मूक और अश्रुपूर्ण विदाई देते हुए, अपने पुत्र के रूप में उनके
46:42दिव्य स्वरूप को स्विकार करते हुए, फ्रिदय में गहन शान्ती के साथ आगे बढ़े।
46:48एक अंतिम भव्य भाव के साथ, श्री कृष्ण ने सभी उपस्थित भक्तों को जो अब यात्रा के लिए तयार थे,
46:56अपना दिव्य आशिर्वात प्रदान किया, जिससे उनके हृदय आध्यात्मिक उर्जा से भर उठे।
47:03फिर कुरुक्षेत्र से विभिन दिशाओं में रथों और पालकियों का एक लंबा धीमा काफिला निकलना शुरू हुआ, जो अपने साथ
47:12अमोग स्मृतियों और गहरी आध्यात्मिक शान्ती को ले जा रहा था।
47:17सुर्य अस्थ होने के साथ कुरुक्षेत्र का मैदान धीरे धीरे शान्त और खाली होता गया, अपने भीतर एक दिव्य समागम
47:25की गहन उर्जा और अनकही कहानियों को समेटे हुए।
47:30व्रिंदावनवासी अपनी वापसी की यात्रा पर एक दूसरे के साथ कृष्ण के अध्भुत गुनों और उनके साथ हुई दिव्य मुलाकातों
47:38की कहानिया साज़ा कर रहे थे, उनके चहरे पर आनंद और विस्मय का मिलाजुला भाव था।
47:45यादव सेना द्वारका की ओर बढ़ते हुए अपनी आध्यात्मिक जागरिती और कर्तव्य प्रायंता की भावना से उत्परोथ थी, उनके हृदय
47:54में इस महामिलन की चाप स्पष्ट थी।
47:57भगवान श्री कृष्ण और बलराम कारत संभवता अंतिम लोगों में से एक कुरुक्षेत्र की भूमी को पीछे छोड़ता हुआ, एक
48:06नए युग की ओर अग्रसर था, जहां धर्म की स्थापना उनका अगला लक्ष्य था।
48:11जैसे जैसे कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमी क्षितिज में विलीन होती गई, कृष्ण का चहरा शांत और चिंतनशील हो गया, मानोवे
48:21समय के प्रवाह में अपने दिव्यकारियों के अगले चरण का मनन कर रहे हुँ।
48:26कुरुक्षेत्र का मैदान अब खाली और मौन अपने उपर एक अद्रिश्य शाश्वत आध्यात्मिक उर्जा का अनुगूंच धारन किये हुए था,
48:35जो आने वाले युगों के लिए एक पवित्र स्मृती बन गई।
48:40व्रिंदावन के हर घर में, गोपियों के हर गीत में और हर हिदय में अब कृष्ण का प्रेम एक अद्रिश्य
48:47जोती के समान जड़ रहा था, जो उनके जीवन को निरंतर प्रकाशित कर रहा था।
48:54व्रिंदावन में हर सुबह एक नई आध्यात्मिक उर्जा के साथ उदे होती थी, कृष्ण की शाश्वत उपस्थिती के कारण हर
49:02फूल, पत्ती और पक्षी भी दिव्य प्रेम से उतप्रोत लगते थे।
49:07कुरुक्षेत्र के उस महामिलन की स्मृती, व्रिंदावन के हर कण में एक शाश्वत गीत की तरह गुंजती रही, प्रेम और
49:15भक्ती की अमर कहानी को पीधी दरपीधी जीवन्त रखती हुई।
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