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श्रीमद्भागवत पुराण के 67वें अध्याय में देखें: जरासंध के कारागार में बंद 20,000 राजाओं की करुण पुकार और द्वारका में श्रीकृष्ण का दिव्य दरबार! जब देवर्षि नारद ने इंद्रप्रस्थ में राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का समाचार लाया, तो श्रीकृष्ण के समक्ष एक बड़ा धर्मसंकट खड़ा हुआ। जानिए कैसे उद्धव की बुद्धिमत्ता और कूटनीति ने जरासंध के अंत और राजसूय यज्ञ के संकल्प का मार्ग प्रशस्त किया! #BhagavataPurana #Krishna #Jarasandha #RajasuyaYajna #Dwarka #Uddhava #Pandavas #HinduMythology
Transcript
00:00रात्री के अंतिम प्रहर में जब ब्राहम महूर्थ का पावन आगमन हुआ, तब स्वर्ण में द्वारकांगरी समुदर की उत्तुंग तरंगों
00:07के बीच दिव्य प्रकाश से आलोकित होग उठी.
00:11अपने दिव्य अंतहपुर में योगेश्वर श्री कृष्ण ब्राहम मुहूर्थ में निद्रा त्याक कर शया पर उठ बैठे, जहां महारानी रुकमिनी
00:20उनके निकट विराजमान थी.
00:22शया से उतरने से पूर्व भगवान श्री कृष्ण ने अपने करकमलों का दर्शन किया और स्वय निश्काम परब्रहम होते हुए
00:30भी ग्रिहाश्रम के धर्मानुसार परमात्मा का ध्यान किया.
00:47सुगंधित द्रव्यों, केशर और कुमकुम मिश्रित पवित्र जल से स्नान करते हुए श्री कृष्ण ने वैदिक मंत्रों के उच्चारन के
00:54साथ प्रातहकालीन अभिशेक संपन्न किया.
00:58स्नान उपरांत प्रभु ने अत्यंत निर्मल, पीत्वर्ण का रेश्मी वस्त्रधारन किया और अपने घुंधराले के शागरों को बांध कर मुकुट
01:07धारन करने की तैयारी की.
01:10विशाल महल की खुली छट पर आकर श्री कृष्ण ने उदित होते सूर्य देव की ओर मुख करके प्रातहकालीन संध्यावंदन
01:18और गायतरी मंत्र का निश्ठापूर्वक जब किया.
01:21इसके बाद उन्होंने तामबे के पात्र से उदित हो रहे सूर्य देव को अर्ग्य समर्पित किया, जिससे बहती जलधारा सूर्य
01:30किर्णों से सत्रंगी होकर चमक उठी.
01:33तत्पश्चात भगवान श्री कृष्ण ने यग्यशाला में प्रवेशकर पवित्र अग्निदेव को समिधा और घृत की आहुतिया अर्पित करते हुए नित्य
01:42अग्निहोत्र कर्म संपन्न किया.
01:45यग्यवेदी के समक्ष बैठे वेदग्य ब्राहमनों के साथ श्री कृष्ण ने मधूर स्वर में सामवेद के दिव्य मंत्रों का सस्वर
01:53पाठ किया.
01:54नित्य नियमों का पालन करते हुए प्रभु ने वरिष्ट ब्राह्मनों और रिशियों के चर्णों का स्पर्ष कर उनसे राज्य और
02:02समस्त प्रजा के कल्यान का आशिर्वाद लिया
02:06इसके बाद श्री कृष्ण राज किये गौशाला में गए और वहां दिव्यकामधेनू स्वरूपा गायों की प्रेमपूर्वक सेवा कर उनका तिलक
02:14और अर्चन किया
02:17ग्रिहाश्रम का सर्वोत क्रिष्ट उदाहरन प्रस्तुत करते हुए उन्होंने स्वर्ण जडित सींगों और रेश्मी वस्त्रों से सुसजित सवा लाख दुधारू
02:25गायों का ब्राहमनों को दान दिया
02:28गायों के साथ साथ प्रभूने निर्धन प्रजा और याचकों को प्रचुर मात्रा में स्वर्ण, वस्त्रत, तिल और भूमी का दान
02:36देकर उनके कश्ट दूर किये
02:39अंतहपुर से बाहर निकलने से पूर्व श्री कृष्ण ने मंगल चेहनों जैसे गौ, स्वर्ण, देवप्रतिमा और दर्पन का स्पर्ष करके
02:47शुब शकुन प्राप्त किये
02:49इसके उप्रांत उन्होंने अपने वक्षस्थल पर कौस्तुभ मनी और गले में वैजनती माला धारन की, जिससे उनका रूप कोटी-कोटी
02:58कंदर्पो को लजजित करने लगा
03:01तभी उनके परंभक्त और सार्थी दारुक चार सुसजित श्वेत घोडो वाले दिव्यरत को लेकर महल के विशाल प्रांगण में उपस्थित
03:09हुए
03:11भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए उस गरुर्धवज अंकित स्वर्नरत पर आरूढ हुए और द्वारकापुरी के मुख्य राजमार्ग पर आगे बढ़े
03:21राजमार्ग के दोनों और खडी प्रजा और नारियों ने छतों से पुष्पवर्शा करते हुए अपने प्रियस्वामी के दर्शन कर अपने
03:29जीवन को धन्यमाना
03:30इस प्रकार नित्य नियमों को पूर्ण कर श्री कृष्ण सुधर्मा राजसभा में पहुँचे जहां उद्धव और उग्रसेन सहित समस्त यादव
03:40योध्धा उनके स्वागत हेतु तक पर थे
03:43जैसे ही भगवान श्री कृष्ण सुधर्मा सभा के अपने भव्यस्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हुए, संपूर्ण सभा भवन उनके दिव्यतेजों में
03:53आभास से प्रकाशित हो उठा
03:56उसी क्षन द्वारपाल की अनुमती से धूल से सना हुआ, अत्यंत थकामान्दा एक गुप्ट दूत सभा के द्वार पर उपस्थित
04:04हुआ और उसने श्री कृष्ण के समक्ष नत्मस्तक होकर प्रणाम किया
04:09दूत ने कापते हुए हाथों से प्रणाम करते हुए कहा कि वह मगद के कारागार में सिसक रहे 20,000
04:16बंदी राजाओं का अत्यंत करुन संदेश लेकर आया है
04:21भगवान श्री कृष्ण ने अत्यंत करुनामई द्रिष्टी से उस दूत की ओर देखा और उसे बिना किसी भय के संपूर्ण
04:29वृत्तांत निसंकोच कहने की आग्यादी
04:32दूत ने व्यथित हरिदय से बताना प्रारंब किया कि कैसे अत्यंत क्रूर और अत्याचारी मगधराज जरासंध ने छल एवा अधर्म
04:41से भारतवर्ष के 20,000 राजाओं को पराजित कर बंदी बना लिया है
04:47उसने बताया कि गिरिवरस दुर्ग के गहन, अंधकार्मय और सीलन भरे पाताल तुल्य तहखानों में उन राजाओं को लोहे की
04:55भारी-भारी बेडियों में जकड कर रठा गया है
04:58दूत के अनुसार मगद के निष्ठुर पहरेदार प्रति दिन उन सम्मानित और धर्मनिष्ठ राजाओं को भुखप्यास से तड़पाते हैं तथा
05:07उनका भयानक मानसिक वशारिरिक उतपीडन करते हैं
05:12दूत ने कापतेस्वर में उस महाभयानक शड्यंत्र का उदगाटन किया कि जरासंध अपनी शक्ती के दंभ में उन सभी 20
05:20,000 राजाओं की पशुओं की भांती बली देने हेतु एक क्रूर नर्मेध यग्य की तयारी कर रहा है
05:28दूत ने आसू बहाते हुए बंदी राजाओं का संदेश सुनाया कि हे द्वारकाधीश इस त्रिभुवन में आपके अतिरिक्त कोई भी
05:36बलशाली जरासंध के इस पाश्विक अत्याचार से हमें मुक्त कराने में समर्थ नहीं है
05:43दूत के मुक्से जरासंध के इस धेनित और अधर्मी कृत्य को सुनते ही सुधर्मा सभा में बैठे बलराम और उग्रसेन
05:51सहित समस्त यादव योध्धाओं के क्रोध की सीमा न रही और उनके हाथ अपने अस्त्रों की मुठिया पर कस गए
05:59दूत ने आगे कहा कि वे असहार राजा प्रतिदिन केवल आपके श्रीचर्णों का ध्यान करते हैं और रात दिन यही
06:07प्रार्थना करते हैं कि आपका सुधर्शन चक्र उनकी लोहे की श्रिंखलाओं को काट दे
06:13उन बंदी राजाओं को अब अपने खोए हुए राजियों या राजसी सुखों की लेशमात्र भी लालसा नहीं हैं वे तो
06:21केवल आपके अभय चरण कमलों में स्थाई शरण पाने के लिए व्याकुल हैं
06:27राजा उग्रसेन का मुख भी जरासंध की इस महाकरूर्ता और अधर्म पर अत्यंत गंभीर तथा कृद्ध हो उठा और उन्होंने
06:35राजसभा में गहरा असंतोश व्यक्त किया
06:39संपूर्ण सुधर्मा सभा में एक पल के लिए भारी सन्नाटा चा गया और सभी उपस्थित सभासद उतकंठा से भगवान श्री
06:47कृष्ण के निर्णय की प्रतीक्षा करने लगे
06:51भगवान श्री कृष्ण की दिव्य आँखों में शर्नागत भक्तों के दुख को देखकर अपार अनुकमपा और साथ ही अधर्म के
06:59विनाश का एक द्रिड संकल्प जलक उठा
07:02दूत ने अपने वस्त्रों में चुपाया हुआ वह भोजपत्र श्री कृष्ण के चर्णों में रख दिया जिस पर उन बीस
07:09हजार तडपते राजाओं के आसूँ से भीगे हुए हस्ताक्षर अनकित थे
07:15श्री कृष्ण ने अत्यंत करुणा के साथ उस भोजपत्र को उठाया और अपने भक्तों के आर्थनात को सुनकर उनका हृदय
07:23भर आया
07:25चतुर राजनीतिग्य उधव ने श्री कृष्ण की भावी योजना को भामपते हुए इस गंभीर स्थिती पर अत्यंत सुक्षमता से विचार
07:33करना आरंभ कर दिया
07:36दूत ने हाथ जोड कर गिड़गिडाते हुए विंती की किहे प्रभु मुझे कोई ऐसा सांत्वना संदेश दे जिसे लेकर मैं
07:43उन निराशा के गर्त में डूबे राजाओं के पास शीघर लोट सकूँ
07:49भगवान श्री कृष्ण ने गंभीर और मेगगर्जन जैसे अडिक स्वर में घोशनाकी की जरासंध के पाप का घड़ा भर चुका
07:56है और बहुत जल्द उन सभी राजाओं की मुक्ती का द्वार खुलने वाला है
08:02दूट ने द्वारका की सभा में थर्थराते स्वर में बताया कि किस प्रकार मगद के अंधेरे कारगार में बंदी बीस
08:10हजार राजाओं ने अपना सर्वस्व त्याग कर श्री कृष्ण की शरण ली थी
08:15मगद के गिरिबरज किले की अत्यंत तंग और अंधकारमई भूमिगत गुफाओं में विशाल लोहे की जंजीरों में जक्डे हुए वेक्षत्रिय
08:24राजा भारी कष्ट सहन कर रहे थे
08:27कभी चक्रवर्ती बनने का स्वपन देखने वाले वे स्वाभिमानी नरेश अब जरासंध के अत्याचारों से पूरी तरहे तूट चुके थे
08:35और उनका सारा अहंकार मिख चुका था
08:39अपनी अपनी सेनाओं और विशाल सामराज्य के वैभव पर गर्व करने वाले राजाओं को यह भली भानती समझा गया था
08:47कि काल चक्र के सामने संसार का कोई भी बल्स थाई नहीं है
08:52जब जरासंध ने उन्हें अपने पशुबली यग्य के लिए पिंजरे में बंध पशुओं की तरह बांध दिया तब उनकी आखों
09:00से पश्चाताप के अश्रु अविरल बहने लगे
09:03उन बंधियों में से एक वयोवरिध राजा ने सभी को प्रेरित करते हुए कहा कि हमें इस विनाशकारी अभिमान को
09:11त्याग कर केवल जगत गुरु श्री कृष्ण की शरण ग्रहन करनी चाहिए
09:16सभी राजाओं ने तुरंट एक स्वर में अपने लोहे से बंधे हुए हाथों को आकाश की ओर उठाया और भगवान
09:23वासुदेव के चर्णों में अपना मस्तक जुका दिया
09:28उन्होंने अत्यंत कातर भाव से प्रार्थना रची की है प्रभु
09:31आप ही समस्त ब्रहमांड के नियंता, असीम शक्ती के स्रोत और दुखियों के एक मात्र रक्षक हैं
09:40राजाओं ने स्विकार किया कि उनके अपारधन चतुरंगिनी सेना और विशाल राजमलों ने उन्हें केवल धमित किया था और सत्य
09:49से दूर कर दिया था
09:51उन्होंने विलाप करते हुए कहा कि नाशवान सांसारिक सुखों के अंधकार में डूब कर वे उस परम तत्व को भूल
09:59गए थे जो मनुष्य जीवन का वास्तविक धे है
10:03राजाओं ने कहा कि यह बंदीग्रह वास्तव में उनके लिए कोई अभिशाप नहीं बलकि आपकी कृपा है जिसने उनकी अज्ञानता
10:12की पट्टियों को सदा के लिए खोल दिया है
10:16उन्होंने गिड़गिडाते हुए विंती की किहे गोविंद
10:19हमारे अहंकार को भस्म कर दीजिए और हमें अपने चरंत्मलों की निशकाम भक्ती प्रदान कीजिए
10:27उन्होंने कहा कि हम केवल जरासंध की लोहे की श्रिंखलाओं से मुक्ती नहीं चाहते
10:33बलकि इस जन्मुमृत्यू के भयानक संसार से सदा के लिए मोक्ष चाहते है
10:39जब उन सभी राजाओं का हरिदय श्री कृष्न के नामस्मरण में पूरी तरहलीन हो गया
10:45तब उस कालकोठरी का घना अंधकार दिविर शान्ती से भर गया
10:50तकपश्चात राजाओं ने चुपके से एक विश्वासी और दयालू कारागार रक्षक की सहायता से अपना यह करुनाजनक संदेश ताड़ पत्र
10:59पर अंकित किया
11:01वह गुप्त संदेश वाहक उस पत्र को अपने वस्त्रों में छिपा कर रात्री के पहरेदारों से बच्चता हुआ गिरिबरच के
11:08विशाल दुर्ब द्वार से बाहर निकल गया
11:12दूत ने द्वारका की सभा में अंत में रोते हुए कहा कि है प्रभु जरासंध के यग्य का समय निकट
11:19आ रहा है अब आप ही उन निर्पराध राजाओं का एक मात्र सहारा है
11:25अपने शर्णागत भक्तों की यह करुण पुकार सुनकर भगवान श्री कृष्ण के कमल नयन करुणा से भर गये और उनका
11:33मुखमंडल दिव्य तेज से दमकने लगा
11:36बुद्धिमान उद्धव ने श्री कृष्ण के नेत्रों में चाई इस अपार करुणा को देखा और समझ गए कि धर्म की
11:43रक्षा का समय अब पूर्ण रूप से आ चुका है
11:48संपूर्ण द्वार का नगरी में एक गंभीर संकल्प की लहर गौड गई क्योंकि श्री कृष्ण अब बंदियों की मुक्ती और
11:55युधिष्ठिर के राजसु यग्य दोनों को सिध्ध करने वाले थे
11:59द्वार का की भव्य सुधर्मा सभा में जब महाराज युधिष्ठिर के संदेश पर विचार चल रहा था तभी सभा कक्ष
12:07की छत से एक अलौकिक दिव्य प्रकाश पुंज नीचे उतरने लगा
12:12सभा के विशाल सुवर्ण द्वार अपने आप खुल गए और समस्त वातावर्ण पारिजात पुष्पों की अती मनमोहक और दिव्य सुगंध
12:21से सराबोर हो उठा
12:23स्वर्गलोक से उतरते हुए उस देधी प्यमान प्रकाश के मध्य से देवर्शी नारद मुनी अपनी महती वीना बजाते हुए सभा
12:31ग्रह में प्रकट हुए
12:33नारद जी के तेजोमय मुखमंडल और उनकी वीना की मधुर जंकार ने सभा में उपस्थित प्रत्येक राजा और सेनाप्ती के
12:42मन को शांत और आनन्दित कर दिया
12:45अपने परंप्रिय भक्त और देवर्शी को देख कर भगवान श्री कृष्ण तुरंत अपने स्वर्ण सिनहासन से उठ खड़े हुए और
12:53आदर पूर्वक आगे बढ़े
12:56बुद्धिमान उद्धव और बल्देव सहित द्वारका के सभी श्रिष्ट सभास्दों ने भी खड़े होकर देवर्शी नारत के चर्णों में श्रधा
13:04पूर्वक शीष जुकाया
13:07भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं अपने हाथों से देवर्शी नारत को एक सुसजजित स्वर्ण आशन प्रदान किया और उनके चर्णों
13:15को धोने के लिए जल मंगवाया
13:18देवर्शी नारत ने मुस्कुराते हुए अपने वरध हस्त को उठाया और द्वार्का की संपूर्ण सभा को अपना कल्यानकारी आशिरवात प्रदान
13:27किया
13:28आसंद रहन करने के पश्चात नारत मुनी ने अपनी महती वीना के तारों को शांत किया और सभा का कौतुहल
13:36शांत होने की प्रतीक्षा करने लगे
13:38श्री कृष्ण ने अत्यंत मधुर्वानी में पूछा हे देवर्शी आपका आगमन सदैव संपूर्ण जगत के कल्यान के लिए होता है
13:48आज क्या विशेश संदेश लेकर आये हैं
13:52नारत मुनी ने गंभीर किन्तु अत्यंत प्रसन्नस्वर में कहा हे अच्चुग
13:57मैं पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ से आ रहा हूँ जहां धर्मराज युधिष्थिर आपका स्मरण कर रहे हैं
14:06नारत जी ने रहस्योध धाटन किया कि महाराज युधिष्थिर अब परम पवित्र और अत्यंत वैभवशाली राजसु यग्य का अनुष्ठान करने
14:15के लिए पूरी तरह संकल्पित हैं
14:19उन्होंने समझाया कि यह महायग्य पृत्वी पर धर्म की पुनर्स्थापना, विश्वशान्ती और युधिष्थिर के धर्मराज पद को सिद्ध करने के
14:28लिए अत्यंत आवश्चक है
14:31परंतु देवर्शी ने यह भी स्पष्ट किया कि महाराज युधिष्थिर आपकी दिव्य उपस्थिती और मार्क दर्शन के बिना इस महान
14:39यज्य का आरंभ कदापी नहीं करना चाहते
14:43नारद जी ने इंद्रप्रस्थ में चल रही विशाल और अभूत पूर्व तैयारियों का वर्णन किया जहां संसार भर के रिशिमुनी
14:51और राजा एकत्रित होने वाले हैं
14:55ततपश्चात देवर्शी ने युधिष्थिर द्वारा भेजा गया एक राज किये निमंत्रन पत्र निकाला जो सोने के तारों से बुने रेश्मी
15:03वस्त्र पर अनकित था
15:06नारद मुनी ने एक गंभीर सत्य की ओर भी संकेत किया कि जब तक मगट का क्रूर समराट जरासंध जीवित
15:13है तब तक कोई भी राजा पूर्ण चक्रवर्ती नहीं बन सकता
15:18यह सुनकर बुद्धिमान उद्धव के चहरे पर एक मंद मुस्कान तैर गई क्योंकि वे समझ गए कि नारद जी की
15:26यह सूचना उनकी योजना से बिलकुल मेल खाती थी
15:30भगवान श्री कृष्ण के कमल नयन अध्भुत तेज से चमक उठे क्योंकि वे इस आमंत्रण में जरासंध के अंत और
15:38धर्म की विजय का दिव्य मार्ग देख रहे थे
15:42संपूर्ण सुधर्मा सभा जय श्री कृष्ण और धर्म की जय होके गगनभेदी जय घोष से गूझ उठी और कृष्ण ने
15:49इंद्रप्रस्थ प्रस्थान करने का द्रिढ निश्चय कर लिया
15:53सुधर्मा सभा में सर्वसम्मती बनते ही भगवान श्री कृष्ण ने इंद्रप्रस्थ की यात्रा और जरासंध के दमनहेतु सुसज्जित रथों के
16:02साथ प्रस्थान की आपचारिक घोशना कर दी
16:06महाराज उग्रसेन और वासुदेव जी के आशिर्वाद लेकर द्वारका का विशाल चतुरंगिनी सैन्यदल यात्रा की पहली पंक्ती में तैनात हो
16:15गया
16:16अपनी माताओं और पूजे जनों की आग्या पाकर श्री कृष्ण ने यात्रा के लिए अपने अलौकिक गरुर्धवज रथ का रुख
16:24किया
16:26महारानी रुकमिनी और अन्यरानिया भव्य स्वर्ण पालकियों और अलंक्रित रथों में आरूढ होकर इस धर्मयात्रा में सम्मिलित हुई
16:35सार्थी दारुक ने जैसे ही स्वर्ण अलगामों को साधा भगवान श्री कृष्ण के दिव्य रथ ने द्वार्का की मुख्य वीथी
16:42पर कदम बढ़ाए
16:45परमज्यानी उद्धव जी भी श्री कृष्ण के निकट रथ में सवार होकर सामरिक और राजनीतिक चक्रवियों पर विचार विमर्ष करते
16:52दिखे
16:54द्वार्का के नागरिक अपनी छतों और जहरोखों से भगवान पर पुष्पवर्षा करते हुए अश्रुपूरित नेत्रों से जैजैकार करने लगे
17:03भजाओं, पताकाओं और चम्चमाते हतियारों से सुसजजित द्वारका की सेना सागर्तट से होकर पूर्व दिशा की ओर बढ़ चली
17:13दिव्य दुन्दुभियों और शंकों के गंभीर नाज से समुद्र की लहरें भी जैसे भगवान की इस विजय यात्रा का स्वागत
17:20कर रही थी
17:22श्री कृष्ण के मुखारविंद पर हल्की मुस्कान थी क्योंकि वे जानते थे कि यह यात्रा न केवल यग्य को पूर्ण
17:30करेगी अपितु अधर्म का नाश भी करेगी
17:33मार्ग में सुंदर्वनों, बहटी नदियों और सुरमय परवतों को पार करता हुआ यह विशाल लशकर आनंद पूर्वक आगे बढ़ता रहा
17:43विभिन आश्रमों के रिशियों और तपस्वियों ने मार्ग में ठहर कर भगवान श्री कृष्ण का वेदमंत्रों के साथ भव्य स्वागत
17:51किया
17:52श्री कृष्ण ने भी मुनियों का यतोचित सम्मान किया और उन्हे धर्म वशानती के प्रसार का आश्वासन दिया
18:00संध्या समय सरोवर के तटपर पड़ाव डाल कर द्वारकाधीश ने उद्धव और शीर्ष सेनाप्तियों के साथ आगामी रणनीती बनाई
18:10इंद्रप्रस्थ में जब यह समाचार पहुचा कि श्री कृष्ण आ रहे हैं तो पांडवों के राजमहल में अपार हर्ष की
18:17लहर दोड़ गई
18:19धर्मराज युधिश्थिर ने पूरी इंद्रप्रस्थ नगरी को दुलहन की तरह सजाने और स्वागत की भव्य तैयारिया करने का निर्देश दिया
18:29भीम और अर्जुन अपने प्रिय सखा और स्वामी का स्वागत करने के लिए रथों पर सवार होकर नगर सीमा की
18:36ओर प्रस्थान कर गए
18:39कुरुजांगल के हरे भरे मैदानों में जैसे ही दोनों पक्ष मिले भाईयों का परस पर प्रेम और उल्लास देखते ही
18:46बनता था
18:48इंद्रप्रस्थ की सीमाओं में प्रवेश करते समय नागरिकों ने पुष्पों की व्रिष्टी की और माधव के नारों से आकाश गुम्ध
18:55उठा
18:56राज महल के मुख्य द्वार पर धर्मराज जुधिष्थिर ने श्रीकृष्न के चरनों में वन्दन कर उनका भावधीना स्वागत किया जिससे
19:05राजसु यग्य का मार्ग प्रशस्थ हो गया
19:09धर्मराज युधिष्थिर ने इंद्रप्रस्थ की भव्य राज सभा में भगवान श्री कृष्ण, पांडवों और महर्शियों के समक्ष राजसु यग्य करने
19:17की अपनी तीवर इच्छा व्यक्त की
19:20युधिष्थिर ने हाथ जोड कर श्री कृष्ण से निवेदन किया कि केवल उनकी कृपा और मार्गदर्शन से ही यह कठिन
19:28और महान अनुष्ठान सिद्ध हो सकता है
19:32परंतु युधिष्थिर ने अपनी चिन्ता साजा करते हुए कहा कि मगद के अत्याचारी राजा जरासंद के भय और प्रभाव के
19:40रहते संपूर्ण भारतवर्ष पर प्रभुत्व स्थापित करना असंभव सा प्रतीत होता है
19:46उन्होंने स्मरण कराया कि जरासंध ने बीस सहसर से अधिक धर्मात्मा राजाओं को गिरिवरच के अंधकार्मय कारागार में बंदी बनाकर
19:55अत्यंत पीडित कर रखा है
19:58मगधप्ती के इस आतंक की बात सुनते ही राजसभा में सन्नाट आचा गया और महाबली भीन ववीर अर्जुन की भुजाएं
20:06क्रोध से फड़कने लगी
20:09भगवान श्रीकृष्ण ने शांत भाव से संपूर्ण परिस्थिती का आकलन किया क्योंकि वे जानते थे कि धर्म की स्थापना के
20:17लिए जरासंध का अंट और बंदियों का उध्धार अनिवार्य है
20:22तदोपरांथ श्रीकृष्ण ने अपने परम बुद्धिमान सखा और कूटनीती के ज्याता उध्धव की ओर देखकर उनसे इस धर्मसंकट का समाधान
20:31प्रस्तुत करने का आग्रह किया
20:34महामती उध्धव नमरता पूर्वक सभा के मध्य खड़े हुए जिनका मुखमंडल ग्यान, विवेक और अनुपम कूटनीतिक प्रतिभा से आलोकित हो
20:43रहा था
20:45उध्धव ने युधिष्ठिर को संबोधित करते हुए कहा कि एक समराट के रूप में राजसुई यग्य करने हेतु संपूर्ण दिशाओं
20:53के राजाओं पर विजय पाना अनिवार्य नियम है
20:57उन्होंने समझाया कि जरासंध का सामना करना यग्य का बाधक नहीं, अपितु राजसुई की दिग्विजय यात्रा का एक अनिवार्य और
21:06प्राथमिक अंगी है
21:08उद्धव की इस अद्भुत कूटनीती ने सपश्ट कर दिया कि जरासंध को परास्ट करने से एक और यग्य का उद्देश्य
21:16सिद्ध होगा और दूसरी और बंदी राजाओं को मुक्ती मिलेगी
21:20उन्होंने आगे चेतावनी दी की जरासंध की विशाल सेना के विरुद्ध प्रत्यक्ष युद्ध करने से केवल निर्दोष सैनिकों का अपार
21:29रक्तपात होगा जो धर्म संगत नहीं है
21:33इसलिए उद्धव ने एक अत्यंत गुप्त और अचूक योजना का सुझाव दिया जिसके अंतरगत केवल तीन महार्थियों को ब्राहमन के
21:42चद्म वेश में मगध भेजना तय हुआ
21:45उद्धव ने तर्क दिया कि जरासंध ब्राहमनों का परमभक्त और दानी है इसलिए वह ब्राहमन वेशधारी अतितियों की मल्ल युद्ध
21:54की भिक्षा को कदापी अस्विकार नहीं कर सकेगा
21:58उन्होंने बलपूरवक कहा कि यदि महाबली भीमसेन जरासंध को द्वंध्व युद्ध के लिए ललकारेंगे तो निश्चित रूप से मगध का
22:06वह अभिमानी समराट भीम के हाथों मारा जाएगा
22:11उद्धव की इस दूरदर्शी और चतुर कूटनीती को सुनकर राजसभा में उपस्थित सभी महर्शी, मंत्री और पांडव आश्चर्य और आनन
22:20से जूम उठे
22:22धर्मराज युधिष्ठिर का हरिदय अपार संतोष और प्रसंता से भर गया, क्योंकि उनका धर्मसंकट क्षन भर में छट गया था
22:31भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय उद्धव की सूश्म बुद्धी और अध्भुत राजनीतिक समझ की प्रशंसा करते हुए मंदमंद मुस्कान बिखेरी
22:41भीम और अर्जुन का उत्साह चरम पर पहुँच गया और वे श्रीकृष्ण के नेत्रित्व में मगध की और प्रस्थान करने
22:49के लिए तत्पर हो गये
22:50इस प्रकार उद्धव के विवेक पूर्ण परामर्ष से राजसुई यग्य और जरासंधवत की महान योजना का मार्ग पूर्णत है निश्कंटक
22:59और स्पष्ट हो गया
23:02द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण ने राजसुई यग्य में सम्मिलित होने हेतु द्वारका की संपूर्ण सेना, प्रानियों और मंत्रियों के साथ इंद्रप्रस्थ
23:11की और प्रस्थान करने का दिव्य आदेश दिया
23:15भगवान का आदेश प्राप्थ होते ही संपूर्ण द्वारका नगरी शंकध्वनी, दुन्दुभी और सुवर्ण तुर्ही के गूंजते मंगलाचार से निनादित हो
23:24उठी
23:25यदुवन्शी सेनाप्ती अपनी दिव्य वाहिनी के साथ सहसरों स्वर्ण ज्रित रथों, मदमस्थ हाथियों और घुडस्वारों की विशाल पंक्तियों को अनुशासित
23:35रूप से सजाने लगे
23:38परमभक्त सार्थी दारुक ने भगवान श्री कृष्ण के चार अलोकिक घोडो वाले भव्य स्वर्ण रत को राजप्रासाद के द्वार पर
23:45लाकर खड़ा कर दिया
23:47महारानी रुकमिनी और सत्यभामा सहित सभी प्रमुख रानिया बहुमूल्य मनियों, रेश्मी वस्त्रों और आभूशनों से सुसज्जित दिव्यातिदिव्य पालकियों में विराज
23:58मान हुई
23:59भगवान बलराम स्वय विशाल गदाधारन कर अपनी अजे नाराइनी सेना के व्यूह की समीक्षा करते हुए अगरभाग का नेत्रित्व संभालने
24:08लगे
24:10महाराजा उग्रसेन और अन्य यदुवन्शी व्रिद्ध जनों ने राजप्रासाद के जहरोखों से हाथ उठाकर प्रस्थान करती विशाल वाहिनी को अपना
24:19स्नेहिल आशिरवाद दिया
24:22शामवर्ण प्रभु श्रीक्रिष्न अपने अलौकिक पीतामबर और किरीक में सुशोभित होकर मंद मुस्कान के साथ अपने दिव्य स्वर्ण रत पर
24:30आरूढ हुए
24:32वायू के तीवर वेग से फहराता गरुर्धवज रत के शिखर पर लहराते हुए द्वार्का की संप्रभुता और विजय का उद्धोश
24:40करने लगा
24:42द्वार्का के स्वर्ण द्वारों से जब विशाल प्रस्थान प्रारंभ हुआ तब प्रित्वी यदुवंशियों के पच्चाप और रथों के पहियों की
24:50गड़गडाहट से काम उठी
24:53द्वार्का की पुर्णारियों ने अट्टालिकाओं से पुश पवर्षा करते हुए जगत के स्वामी श्रीहरी की आरती उतारी और मंगल गीतों
25:01का गायन किया
25:03मंत्री प्रवर उद्धव श्री कृष्ण के समीप रथ में विराज मान होकर इंद्रप्रस्थ की भावी कूटनीती और जरासंध वध की
25:11योजना पर गेहन मंत्रणा करते रहे
25:14स्वर्ण कवच से ढके सैकडों उत्तुम गजराज अपनी चिंधार से दसों दिशाओं को गुंजायमान करते हुए जुलूस के सबसे अग्रिन
25:23दस्ते में चलने लगे
25:25सात्य की और कृत्वर्मा जैसे महारती हाथ में चम्चमाते धनुष और ढाल लेकर यदुवन्शी वीरों की टुकडियों का बड़े गौरव
25:33के साथ संचालन कर रहे थे
25:36समराट युधिष्ठिर के राजसुय यग्यहेतु बहुमूल्य मनिया, दिव्यवस्त्र और अतुल्य उफार सामगरी से लदे सैकडों सुसजजित यान इस जुलूस के
25:46मध्य में चल रहे थे
25:48जैसे जैसे यह दिव्यवाहिनी विभिन राज्यों और नदियों के तटों से गुजरी तटिय नरेशों ने नत्मस्तक होकर श्री कृष्ण का
25:56भव्य स्वागत किया
25:59मध्याहन के सूर्य की स्वर्णिन किर ने विशाल यदुवंशी सेना के ध्वजपता का उपर पढ़कर एक अलोकिक और देधी प्यमान
26:07द्रिश उत्पन कर रही थी
26:09भगवान श्री कृष्ण ने सागर की तरंगों से घिरी अपनी प्रियद्वार का पुरी की ओर एक अंतिम सौमय द्रिश्टी डाली
26:17और फिर अपनी लीला की दिशा इंद्रप्रस्थ की ओर मोडी
26:21घने वनों, हरित घाटियों और विशाल समतल मैदानों को पार करते हुए यह राजसी का फिला कुरू सामराज्य की समरिध
26:29सीमाओं में प्रवेश करने लगा
26:32अनंत क्षितिच पर इंद्रप्रस्थ के गगंचुमबी स्वर्ण शिखर उंचे द्वार और धोजाएं दिखाई देने लगी जो अपने इश्टदेव श्री कृष्ण
26:41के आगमन की प्रतीक्षा कर रही थी
26:44जैसे ही श्री कृष्ण का स्वर्ण रत इंद्रप्रस्थ के मुख्य द्वार पर पहुँचा, धर्मराज युधिष्थिर अधीर होकर नंगे पैर उनकी
26:53ओर दोडे
26:54उनके पीछे भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव भी भ्रात्रि प्रेम में बहते अश्रूओं के साथ अपने आराध्य का स्वागत करने
27:03आगे बढ़े
27:05युधिष्थिर ने अत्यंत भावुक होकर भगवान श्रीकृष्ण को अपने गाड आलिंगन में भर लिया और उनके नयन खुशी के आसुओं
27:13से छलचला उठे
27:16पीतामबरधारी श्रीकृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ रत से उतर कर धर्मराज के इस अगाध प्रेमपूरित आलिंगन को सहेश स्वीकार
27:24किया
27:26गदाधारी भीम ने अपनी विशाल भुजाओं से अपने प्रियवासुदेव को गले लगाया और उनका हृदय भ्रात्रिसने से गदगधो उठा
27:35धनुर्धर अर्जुन ने परमभक्ती भाव से अपने सखा और मार्गदर्शक श्रीकृष्ण के चरण कमलों को स्पर्ष किया जिन्हें श्रीकृष्ण ने
27:44उठा कर अपने हृदय से लगा लिया
27:47नकुल और सहदेव ने अत्यंत विनमर्ता से अपने मस्तक श्रीकृष्ण के चरणों में नवाए और भगवान ने अनुग्रह पूर्वक दोनों
27:56के सिर पर अपना वर्देहस्त रखा
27:59इंद्रप्रस्थ के गोपुरों और अटारियों से नगरवासियों ने इस अलौकिक मिलाप पर सुगंधित पुष्पों की अविरल वर्षा आरंभ कर दी
28:09वेदपाथी ब्राहमनों ने शंकध्वनी और मंत्रो चारण के साथ इस मांगलिक ख्षण को संपूर्ण वातावर्ण में दिव्य रूप से गुंजायमान
28:17कर दिया
28:19पांडवों ने स्वन पात्रों में चर्णामरित और अर्भ्य लेकर द्वारकाधीश का सर्वोट्च राजसी और धार्मिक विधियों से पूजन किया
28:28सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने पांडवों की निशकाम भक्ती से प्रसन्न होकर अपनी दिव्यकांती से समस्त इंद्रप्रस्थ को आनन्दित कर दिया
28:38राजप्रासाद के भीत्री प्रांगन से राजमाता कुंती अपने पूज भ्राता के पुत्र श्रीकृष्ण को देखकर वातसले से सराबोर हो उठी
28:48श्रीकृष्ण ने तुरंत आगे बढ़कर अपनी बुआ कुंती के चर्णों में मस्तक जुकाया और कुंती ने अत्यंत प्रेम से उन्हें
28:56उठाकर अपने गले से लगा लिया
28:59महारानी द्रौपदी ने हाथ में प्रजवलित स्वर्ण आर्ती का थाल लेकर अपने परम बंधु श्रीकृष्ण का भावभीना मंगलति लग किया
29:08श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की ओर आत्मी द्रिष्टी से देख कर उनके अटूट विश्वास और भक्ती का सहर्ष सम्मान किया
29:17ततपश्चात धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण का हाथ थामकर उन्हें रिश्मी ध्वजपताकाओ से सजे मुख्य राजपत की ओर ससम्मान आगे बढ़ाया
29:28संपूर्ण मार्ग में मधुर मृदंग, वीना और दुन्दुभी की मंगल ध्वनिया इंद्रप्रस्ट के आकाश में गूँजने लगी
29:36यह दिव्य जुलूस इंद्रप्रस्थ के भव्य मनिकंचन से सुसज्जित राजसभाभवन मै सभा के अंतरंग में प्रविष्ठ हुआ
29:45महाराज युधिष्ठिर ने स्वयन श्रीकृष्ण को सर्वोच रतनष्टित स्वर्ण सिनहासन पर आसीन कराकर उन्हें सर्वोप्री सम्मान प्रदान किया
29:55पांडवों और परिजनों से घिरे भगवान श्रीकृष्ण ने उस दिव्य सिनहासन पर विराजमान होकर राजसु यग्य की आगामी कूटनीती का
30:04मार्ग प्रशस्थ किया
30:06राजसभा के भव्य वातावर्ण से निकल कर देवकी नंदन श्रीकृष्ण मंदमंद मुस्कुराते हुए इंद्रप्रस्थ के अत्यंत सुरक्षित और पवित्र अंतहपूर
30:16की ओर बढ़ने लगे
30:18अंतहपूर के मुख्यद्वार पर पूज माता कुंती और महारानी द्रौपदी ने सुसजित स्वर्ण थाल में दीप जलाकर भगवान श्रीकृष्ण के
30:27स्वागत की प्रतीक्षा की
30:29जैसे ही श्रीकृष्ण ने चौखट पर कदम रखा, माता कुंती की आखों में वातसल्य और कृतग्यता के अश्रु उमड पड़े
30:37और उनका हृदय आनन्द से भर गया
30:41माता कुंती ने कापते हाथों से भगवान श्रीकृष्ण की आरती उतारी और उनके दिव्य विग्रह पर अक्षत एवं पुष्पों की
30:49वर्षा कर उनकी मंगल कामना की
30:52आरती संपन्न होते ही जगत के स्वामी श्रीकृष्ण ने अत्यंत विनम्रता पूर्वक जुपकर अपनी पूजनिय बुआ माता कुंती के चर्णों
31:01का स्पर्श किया
31:03माता कुंती ने तुरंट श्रीकृष्ण को उठा कर अपने हृदय से लगा लिया और उनके मस्तक पर हाथ रखकर लाक्षाग्रह
31:11से लेकर हर संकट में उनकी रक्षा करने के लिए धन्यवाद दिया
31:15इसके पश्चात महारानी द्रौपदी ने आगे बढ़कर अपने परम रक्षक गोविंद के चर्णों में अत्यंत आदर और भक्ती भाव से
31:24प्रणाम किया
31:26द्रौपदी ने गदगद कंट से श्रीकृष्ण के प्रती अपनी कृतग्यता व्यक्त की जिन्होंने भरी सभा में उनकी लाज बचाकर उन्हें
31:35नवजीवन प्रदान किया था
31:37भगवान श्रीकृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ अपना अभ्यहस्त उठाया और द्रौपदी को आश्वस्त किया कि उनका यह भाई सदैव
31:46उनकी और पांडवों की रक्षा के लिए ततपर रहेगा
31:51इसी बीच महाराज युधिष्ठिर और उनके चारों भाई भी अंतहपुर में आप पहुँचे जिससे पूरा वातावर्ण परिवार के दिव्य मिलन
31:59के आनन से सराबोर हो गया
32:02माता कुंती ने युधिष्ठिर की ओर देखते हुए कहा कि श्रीकृष्ण की उपस्थिती ही उनके राजसु यग्य की सफलता का
32:10सबसे बड़ा आधार है
32:13महाराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनमरता पूर्वक श्रीकृष्ण के समक्ष हाथ जोड़कर राजसु यग्य प्रारंभ करने की अपनी अभिलाशा और अनुमती
32:23मांगी
32:24श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर का मार्ग दर्शन करते हुए यग्य की धर्म सम्मत मर्यादाओं और सम्पून आर्यावर्त में शांती स्थापित करने
32:33की कूटनीती पर प्रकाश डाला
32:36इसके उपरांथ पांडवों के कुलगुरु महर्शी धौमे ने पवित्र ग्रंथों और यग्य की रूपरेखा के साथ कक्ष में प्रवेश किया
32:45महर्शी धौमे ने यग्यशाला के निर्मान और विभिन वैदिक अनुष्ठानों की जटिलताओं को विस्तार से समझाना प्रारंभ किया
32:54श्रीकृष्ण के निर्देश परभीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने यग्य के लिए विभिन दिशाओं के राजाओं को आमंत्रित करने और
33:02संसाधन जुटाने का दायत्व संभाला
33:05इंदरप्रस्थ के विशाल मैदानों में सैकडों, निपुन, शिल्पियों और कारीग्रों ने मिलकर भव्य और विशाल यग्यशाला का निर्मान कार्यतीवर गती
33:14से आरंभ कर दिया
33:17दूरदराज के क्षेत्रों से बैलगाडियों और रथों पर पवित्र समिधा, शुद्ध घृत, सुगंधित, जड़ी बूटिया और बहुमूल्य रत्न महल के
33:25द्वारों पर पहुँचने लगे
33:28महारानी द्रौपदी और माता कुंती ने महल के भंडारों में जाकर स्वय पवित्र अन्नों और यग्य सामगरी के भंडारन की
33:35व्यवस्था का निरीच्षन किया
33:38संध्या की स्वर्ण आभा में पूरा इंद्रप्रस्थ दीपों से जग्मगा उठा जहां श्री कृष्ण और पांडव यग्यशाला के बढ़ते शिखरों
33:47को देखकर धर्म की विजय के प्रती आश्वस्थ थे
33:51इंद्रप्रस्थ के गुप्त मंत्रणा कक्ष में दीपों की मंद रोष्णी के बीच धर्मराज युधिष्थिर, श्री कृष्ण, उधव, भीम और अर्जुन
33:59एक अत्यंत महत्वपूर्ण सभा के लिए एकत्र हुए
34:04धर्मराज युधिष्थिर ने अत्यंत चिन्ताकुल स्वर में कहा कि जब तक मगध के कारागार में अस्सी से अधिक निश्पाप राजा
34:12बंदी हैं, तब तक राजसु यग्य की पूर्णता असंभव है
34:17बुद्धिमान उद्धव ने सभा को संबोधित करते हुए मगध की दुर्गम भौगोलिक स्थिती और जरासंध की विशाल अक्षोहिनी सेना के
34:26दुर्जय बल का विशलेशन प्रस्तुत किया
34:28उद्धव ने सचेत किया कि जरासंध पर सीधे सैने आक्रमन से संपून आर्यावर्त में एक भीशन और विनाशकारी युद्ध छिड़
34:38जाएगा, जिसमें अंगिनत निर्दोष सैनिक मारे जाएंगे
34:41तब द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण ने आगे बढ़कर अपने अलोकिक मुखमंडल पर मंद मुस्कान बिखेरी और जरासंध के विनाश की एक
34:52गुप्त कूटनीतिक योजना उजागर की
34:55श्रीकृष्ण ने सपश्ट किया कि जरासंध को उसकी विशाल सेना के साथ खुले युद्ध में हराना कठिन है, किन्तु उसे
35:03द्वंद्व युद्ध के लिए चुनौती देकर परास्त किया जा सकता है
35:08श्रीकृष्ण ने बताया कि जरासंध ब्राह्मनों का अत्यधिक सम्मान करता है और दान की बेला में किसी भी ब्राह्मन की
35:16याचना को अस्विकार नहीं कर सकता
35:19यह सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर के मन में आशा की नई किरण जगी और वे श्रीकृष्ण की इस गुप्त और अचूक
35:27योजना की सुक्षमताओं को ध्यान से सुनने लगे
35:31श्रीकृष्ण ने विशालकाय भीन सेन की ओर संकेट करते हुए कहा कि केवल भीन में ही जरासंध के वजरसमान शरीर
35:39को द्वंधव युध में चीर देने की अपार शक्ती है
35:43भीन सेन की भुजाएं फड़क उठीन उनकी चाती गर्व से चौड़ी हो गई और उन्होंने श्रीकृष्ण के आदेश को शिरोधार्य
35:51करते हुए हुंकार भरी
35:54धनुर्धर अर्जुन ने आगे आकर अपने गांडीव धनुष को स्पर्श किया और प्रणलिया की किसी भी संभावित छल अथवा गुप
36:02संकट से वे दोनों की रक्षा करेंगे
36:05श्रीकृष्ण ने योजना का स्वरूप प्रस्तुत किया कि वे स्वयं भीम और अर्जुन सनातक ब्राहमनों का छद्मवेश धारण कर छिपकर
36:14मगध की सीमा में प्रवेश करेंगे
36:17वे संध्याकाल में बिना किसी सेना के मगध की राजधानी गिरिवरच के द्वार में प्रवेश करेंगे और जरासंद से उसके
36:25दान सत्र में द्वंधव युद्ध की भिक्षा मांगेंगे
36:29युधिष्ठिर के मन में अपने प्रियभाईयों और श्रीकृष्ण को इस अत्यंत घातक और जोखिम भरे अभियान पर भेजने को लेकर
36:37क्षणिक संकोच हुआ
36:40श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को आश्वस्त करते हुए कहा कि धर्म की रक्षा करने वालों की रक्षा स्वय धर्म करता है
36:47और इस उपाय से रक्तपात के बिना धर्म की विजय होगी
36:52भीम सेन ने अग्रज युधिष्ठिर के चरण स्पर्ष किये और दंभी जरासंध के अहंकार को चूर-चूर करने के लिए
36:59प्रसन्चित होकर आशिरवाद मांगा
37:03धर्मराज युधिष्ठिर ने अपनी चिंता त्याग कर भीम और अर्जुन के शीश पर हाथ रख कर उन्हें विजय और मंगल
37:10का अशिश आशिरवाद प्रदान किया
37:13ज्यानी उद्धव ने श्रीकृष्ण की इस महान नीती की भूरी-भूरी प्रशंसा की जिसने बिना विशाल विनाश के अधर्म के
37:21विनाश का मार्ग प्रशस्ट कर दिया था
37:25तत्पश्चात श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन ने अपने राजसी आभूशन और मुकुट उतार कर छाल के वस्त्रधारन किये और हाथों में
37:33पवित्र कुशा घास ले ली
37:36तारों से भरे रात्री के आकाश के नीचे तीनों दिव्यवीर आर्यावर्त को जरासंध के भै से मुक्त कराने के गुक्त
37:44अभियान पर मगद की और प्रस्थान कर गए
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