00:00शुक्देव जी ने राजा परीक्षित को बताया कि कैसे परमत्यागी राजा रंतिदेव ने निस्वार्थ भाव से अपना सब कुछ त्याग
00:07कर अंत्ह अविनाशी मोक्ष को प्राप्त किया, जिसकी महिमा तीनों लोकों में गूंज उठी थी
00:15रंतिदेव के परमत्याग की गाथा सुन राजा परीक्षित की आखें विस्मय और श्रधा से भराई और उन्होंने विचार किया कि
00:23इस नश्वर संसार में धर्म का मार्गी शाश्वत है
00:28शुकदेव जी ने तब चंद्रवंश के अन्यप्रतापी शाखाओं की और कथा को मोड़ा, विशेष्ट यदू के वंशजों की और, जो
00:36कालांतर में भगवान क्रिश्न के प्राकट्य का कारण बना
00:40उन्होंने राजा परीक्षित को स्मरण कराया कि कैसे समराट ययाती ने अपनी वृद्धावस्था से मुक्ती पाने हेतु अपने पुत्रों से
00:48योवन का विनिमय करने का आग्रह किया था
00:52किंतु राजकुमार यदू ने अपने पिता समराट ययाती के इस आगरह को धर्म की मर्यादा का विचार करते हुए अत्यंत
01:00विनमर्ता से अस्विकार कर दिया
01:03यदु के इनकार से रुष्ट होकर ययाती ने यदुवंश को मुख्य सिनहासन पर कभी राज न करने का श्राप दिया
01:11परंतु साथ ही एक महान और धर्मनिष्ट वंश के उद्धव का वर्दान भी दिया
01:17अपने पिता के वचन को स्वीकार कर राजकुमार यदुने स्वयं के लिए एक नवीन मार्ग चुना और एक स्वतंत्र गौरवशाली
01:25राज्ज की स्थापना हेतु प्रस्थान किया
01:28इस प्रकार यदुवंश की नीम पड़ी एक ऐसा वंश जो साहस न्याय और धर्म प्रायंता के सिध्धान्तों पर आधारित था
01:37और जिसकी महीमा दूर दूर तक फैलने वाली थी
01:41वर्षों तक यदुवंश के प्रतापी राजाओं ने अपने राज्ज पर न्याय और धर्म के साथ शासन किया जिससे उनकी प्रजा
01:49सुक्समृद्धी और शांती से जीवन व्यतीत करती रही
01:54शुक्देव जी ने एक गंभीर स्वर में कहा कि यह वन्ष केवल एक साधारन राज्वन्ष नहीं था अपितु यह वह
02:01पवित्र धरा थी जहां स्वय भगवान अपनी लीला करने के लिए अवतरित होने वाले थे
02:07इसके पश्चात शुक्देव जी ने एक महान रिशिक अत्री मुनी की तपस्या और उनकी धर्म प्रायन पत्नी अनुसुया की अध्भुत
02:16कथा का वर्णन करना आरंभ किया
02:19रिशी अत्री की संगिनी पतिवर्ता अनुसुया अपनी पवित्रता अटूट भक्ती और अद्वितिय सेवा भाव के लिए तीनों लोकों में विख्यात
02:28थी
02:30अनुसुया की अलोकिक पतिवर्ता धर्म को देखकर देवराज इंद्र के सुझाव पर त्रिदेव, ब्रहमा, विश्नु, शिव ने उनकी पवित्रता की
02:39परीच्षा लेने का निर्णय किया
02:42अत्रि मुनी की अनुपस्थिती में तीनों देवता साधारन ब्रहमन साधुओं के वेश में अनुसुया के आश्रम पहुँचे, उनके मुख पर
02:50एक दिव्य ओज विध्यमान था
02:54ब्रहमनों ने अनुसुया से भोजन मांगा, परंतु साथ ही एक अत्यंत विचित्र शर्ट रखी की वह उन्हें पूल्न नगन होकर
03:01भोजन परोसे
03:03अपनी योग शक्ती और पवित्रता के बल पर अनुसुया ने ततकाल ही उन ब्रहमनों के असली स्वरूप को पहचान लिया
03:11और उनके हृदय में पतिवर्ता धर्म का द्रिध निश्चय था
03:15अपनी पतिवर्ता शक्ती का प्रयोग करते हुए अनुसुया ने तीनों देवताओं को वादसल्य पूर्वक अपनी गोद में लेकर छोटे निर्दोष
03:24शिशुओं में परिवर्तित कर दिया
03:26कुछ समय पश्चात रिशी अत्री अपने आश्रम लोटे और अपनी प्रिय पत्नी अनुसुया को तीन दिव्य बालकों के साथ देखकर
03:36विस्मय से भर गए
03:38तीनों देवों ने बाल रूप में ही अनुसुया से प्रार्थना की की वे उनके पुत्र बनकर इसी रूप में उनके
03:45साथ रहें क्योंकि उनके वादसल्य ने उन्हें मुहलिया था
03:50अत्री और अनुसुया के असीम प्रेम से प्रसन होकर, तीनों देवों ने उन्हें वर्दान दिया कि वे उनके तीन पुत्रों
03:58के रूप में जन्म लेंगे, जिन में से एक महान दत्तात्रे होंगे
04:03अत्री और अनुसुया के त्याग वप्रेम से अभिभूत होकर, त्रिदेवों ने अपने वचन के अनुसार, उनके यहां चंद्र, सोम, दुर्वासा
04:12और दत्तात्रे के रूप में तीन तेजस्वी पुत्रों के रूप में जन्म लिया, जिससे आश्रम दिव्य प्रकाश से �
04:18जग्म का उठा। बाल दत्तात्रे ने अपनी शैश्वावस्था से ही असाधारन ज्यान और वैराग्य के लक्षन प्रदर्शित किये, उनकी शांत्मुग्रा
04:28और गेहन दृष्टी साधारन बच्चों से कहीं अधिक विलक्षन थी।
05:17अनुभूतियों की ओर अग्रसर हुआ।
05:21उनकी तपस्या की शक्ती से उनकी आभा अलौकिक हो गई और वे ब्रह्मांड के गुप्त रहसियों के ग्याता बन गए
05:28जो त्रिदेवों की समगर शक्ती को अपनी शांत उपस्थिती में समाहित किये हुए थे।
05:34इसी कालखंड में चंद्रवंश में महाराजा यदू का जन्म हुआ, जो अपने पराक्रम, धर्मनिष्ठा और प्रजाप्रेन के लिए दूर-दूर
05:43तक विख्यात थे, जिन्होंने अपने राज्य को समरिध्धी और शांती के शिखर पर पहुँचाया।
05:50महाराजा यदू ने अपने राज्य को धन, धान्य और सुक समरिध्धी से परिपूर्ण किया, उनके शासनकाल में प्रजा सुखी और
05:58संतुष्ट थी, और उनकी ख्याती चारों दिशाओं में फैल गई थी।
06:04बाहरी वैभव के बावजूद, यदू के मन में एक गहरा प्रश्न उठने लगा था, क्या यह भौतिक सुख ही जीवन
06:11का परमलक्ष है, या इससे परे कोई और शाश्वत सत्य है।
06:16उन्होंने अनुभव किया कि राज्य, शक्ती और संपदा सभीक शनभंगुर हैं, और वास्तविक शांती बाहरी वस्तूओं में नहीं, बलकि स्वयन
06:25के भीतर ही विद्यमान है।
06:29उनकी आत्मा में एक गहरी आध्यात्मिक प्यास जागरित हुई, जिसने उन्हें परम सत्य की खोजकी और प्रेरित किया, जो उन्हें
06:37भौतिक संसार की सीमाओं से परे ले जा सके।
06:40इस आंतरिक पुकार का अनुसर्ण करते हुए, राजा यदू ने अपने मंत्रियों और परिवार से परामर्ष लिया और उन्हें अपनी
06:49इस आध्यात्मिक यात्रा के विशे में अवगत कराया।
06:53राज्य का भार अपने योग्य पुत्रों को सौंप कर, महाराजा यदू ने राजसी वस्त्रों और अलंकारों का त्याग किया और
07:01एक सामान्य यात्री के वेश में ज्ञान की तलाश में निकल पड़े।
07:06उन्होंने राजसी सुखों का त्याग कर वन और परवतों में ध्रमन करना प्रारंभ किया
07:12प्रकृती की गोद में शांती और एकांत की खोज करते हुए अपने अंतर्मन की गहराईयों में जाका
07:19एक दिन जब वे एक घने जंगल से गुजर रहे थे तो उन्हें दूर से एक अध्भुत प्रकाश दिखाई दिया
07:27जिससे वातावर्ण में एक दिव्य उर्जा का स्पंदन महसूस हुआ
07:32उस प्रकाश की ओर आकरशित होकर यदू आगे बढ़े और उन्होंने देखा कि एक विशाल वट्वरिक्ष के नीचे एक तेजस्वी
07:40अवधूत शांत मुद्रा में विराजमान हैं जिनकी आभासे पूरा वन आलोकित हो रहा था
07:47दत्तात्रे भगवान जो ब्रहमांड के गूड रहसियों के ग्याता थे अपनी दिव्य उपस्थिती से उस स्थान को पवित्र कर रहे
07:55थे उनके चारों और एक अद्वितिय शांती का धेरा था
08:00यदू ने तुरंक पहचान लिया कि यह कोई साधारन रिशी नहीं बलकि स्वय अवधूत दत्तात्रे हैं जिनके दर्शन मात्र से
08:09ही उनके हृदय में असीम शांती और श्रधा उमड पड़ी
08:14अत्यंत नमरता और भक्तिभाव से उतप्रोथ होकर महाराजा यदू ने उस परम ज्ञानी अवधूत के चर्णों में दंडवत प्रणाम किया
08:22अपने मस्तक को धर्ती पर टेक कर अपनी विनमरता व्यक्त की
08:27उठकर बैठते हुए यदू ने अपने अंतरमन की सारी शंकाएं व्यक्त की और परम शांती तथा आत्म ज्ञान के मार्ग
08:35को जानने की तीवर इच्छा से दट्तात्रे से मार्ग दर्शन की याचना की
08:41तत्काल अवधूत दत्तात्रे ने अपनी असीम शांती और ज्यान से उत्प्रोथ होकर राजा यदू की ओर देखा उनके मन की
08:50जिग्यासा को पहचानते हुए एक गंभीर फिर भी शांत मुस्कान बिखेरी
08:56दत्तात्रे ने अपने अंतर ज्यान से यदू के प्रश्न का उत्तर देने का मन बनाते हुए धीरे से अपने मुख
09:03से ज्यान की सरिता प्रवाहित करनी आरंभ की जो जीवन के परम सत्य की ओर संकेत कर रही थी
09:10अवधूत ने बताया कि आत्म ज्यान और शान्ती प्राप्त करने के लिए उन्हें किसी एक गुरु की आवश्चक्ता नहीं पड़ी
09:18बलकि उन्होंने इस विशाल स्रिष्टी के 24 तत्वों को अपना गुरु बनाया
09:22सबसे पहले उन्होंने प्रिथवी को अपना गुरु बताया जिससे उन्होंने सहनशीलता धैर्य और परोपकारिता का अलोकिक पाठ सीखा बिना किसी
09:34अपेक्षा के सब को धारन करना
09:36फिर उन्होंने वायू को अपना गुरु माना, जिससे उन्होंने अनासक्ती का गुन सीखा, जैसे वायू सभी जगहे विचर्ण करती है,
09:45पर कहीं रुकती नहीं, किसी से लिप्त नहीं होती
09:49ततपश्चात, उन्होंने आकाश से सबक लिया कि कैसे आत्मा सभी देह में व्याप्थ होते हुए भी उनसे अप्रभावित रहती है,
09:58ठीक जैसे आकाश सर्वव्यापी और निरलिप्थ है
10:02फिर उन्होंने अगनी से सीखा कि वह कैसे विभिन रूपों में प्रकट होती है, फिर भी अपनी शुद्धता नहीं खोती
10:10और सभी अशुद्धियों को जलाकर भस्म कर देती है
10:15अगले गुरु के रूप में उन्होंने जल को स्वीकारा, जिससे उन्होंने पवित्रता, सरलता और हर परिस्थिती में ढलने की क्षमता
10:23का अनुपम गुन आत्म साथ किया
10:26उन्होंने चंद्रमा से सीखा की कैसे संसार की माया विभिन अवस्थाओं में बदलती रहती है, परन्तु आत्मा अविनाशी और अपने
10:35मूल स्वरूप में सदास्थिर रहती है
10:39सूर्य को गुरु मानकर दक्तात्रे ने यह ज्ञान प्राप्त किया कि जैसे सूर्य अपना प्रकाश और उर्जा सबको समान रूप
10:47से देता है, वैसे ही ज्ञानी को भी ज्ञान का वितर्ण करना चाहिए
10:52इसके बाद उन्होंने कबूतर के जोड़े से सीखा की अत्यधिक आ सकती और मोह कैसे दुहक का कारण बनते हैं
11:00और अंत्ता बंधन में डाल देते हैं
11:03फिर अजगर ने उन्हें सिखाया की संतोश और भाग्य पर निर्भरता कैसे परमशान्ती और चिंतामुक्त जीवन प्रदान कर सकती है
11:12बिना किसी प्रयास के स्विकार करना
11:16समुद्र को गुरु मानकर दत्तात्रे ने सीखा की कैसे एक ज्यानी व्यक्ति को सभी इच्छाओं और भावनाओं के बावजूद स्थिर,
11:24गहरा और शांत रहना चाहिए
11:27उन्होंने पतंगे से यह सीख ली की कैसे अज्यानी व्यक्तिक्षनिक इंद्री सुखों की मायावी चमक में फसकर अपना विनाश कर
11:35लेता है
11:38मधुमक्षी ने उन्हें सिखाया कि कैसे एक साधक को हर जगह से थोड़ा-थोड़ा ज्यान एकत्र करना चाहिए, जैसे मधुमक्षी
11:46विभिन फूलों से पराग लेती है
11:49उन्होंने हाथी से यह महत्वपून पाठ ग्रहन किया कि कैसे कामवासना और इंद्रिय सुखों की अत्यधिक इच्छा व्यक्ति को आसानी
11:58से फंसा सकती है
12:01हिरन से उन्होंने सीखा कि कैसे मधुर ध्वनी और सांसारिक मोह मनुष्य को मृत्यू के जाल में फंसा सकता है
12:10मचली ने उन्हें यह सिखाया कि स्वाद और इंद्रिय भोग की लोलुकता कैसे जीवन के लिए घातक सिध्ध हो सकती
12:17है
12:19उन्होंने पिंगला वेश्या की कहानी से सीखा कि कैसे सभी इच्छाओं को त्यागने पर ही सच्ची शांती और आत्मसंतोष प्राप्थ
12:27होता है
12:29कुरर पक्षी ने उन्हें यह शिक्षादी की कैसे किसी भी वस्तूया संपत्ती से चिपके रहना भय और चिंता का कारण
12:36बनता है और मुक्ती त्याग में नहित है
12:40अंत में उन्होंने शिशु को अपना गुरु बताया जिससे उन्होंने सीखा कि कैसे एक निर्दोश और चिंतामुक्त बालक अपनी सहज
12:49अवस्था में परम आनंद का अनुभव करता है
12:54यदुराज अवधूत की प्रशान्त मुदरा और तेजस्वी मुखमंडल को देख अपने मन में उठ रहे प्रशनों को अत्यंत विनमरता पूर्वक
13:02व्यक्त करने के लिए तत्पर हुए
13:05अवधूत ने राजा यदु की जिग्यासा और उनकी भक्ती को अपनी दिव्य अंतरद्रिष्टी से भामपते हुए मंद मुस्कान के साथ
13:13उन्हें उत्तर देने के लिए अपनी आखें खोली
13:18उन्होंने यदु को समझाया कि उनके इस ज्ञान का स्रोत न तो कोई शास्त्र है और नहीं कोई आश्रम बलकि
13:25यह संपून स्रिष्टी ही उनका सबसे बड़ा विद्यालय है
13:30अवधूत ने अपनी यात्रा का वर्णन करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने प्रिथवी को अपना पहला गुरु मानकर उससे धैर्य
13:38और सहनशीलता का अमूल्य पाठ सीखा
13:42उन्होंने प्रिथवी से सीखा कि कैसे हर भार को सहते हुए भी, वह बिना किसी शिकायत के सभी जीवों का
13:49पालन पोशन करती है, अपनी स्थिर्था कभी नहीं खोती
13:53फिर उन्होंने वायू को अपना गुरू बताया, जिससे उन्होंने यह ज्ञान प्राप्त किया कि कैसे जीवन में रहते हुए भी
14:01किसी वस्तुया परिणाम से निरलिप्त रहना चाहिए
14:05वायू बिना किसी भेदभाव के हर जगह व्याप्त रहती है, सभी गंधों को वेहन करती है, फिर भी स्वयन किसी
14:13भी गंध से दूशित नहीं होती, यही उसकी निर्मलता का रहस्य है
14:18इसके पश्चात उन्होंने आकाश को अपने गुरु के रूप में स्विकार किया, जिसने उन्हें आत्मा की सर्वव्यापक्ता और अप्रभावित प्रकृती
14:28का बोध कराया
14:30आकाश बादलों, तारों और तूफानों को अपने भीतर समाय रहता है, फिर भी वह स्वयन उनसे कभी प्रभावित नहीं होता,
14:38सदा अपने विशाल और अविकारी स्वरूप में रहता है
14:43आगे बढ़ते हुए अवधूत ने जल को अपना गुरू बताया, जिसने उन्हें पवित्रता, सरलता और परिस्थितियों के अनुसार ढलने की
14:52क्षमता सिखाई
14:54जल अपनी प्राकृतिक अवस्था में हमेशा शुद्ध रहता है, दूसरों को भी शुद्ध करता है और बाधाओं के बावजूद अपने
15:02मार्क को सहच्ता से ढूंड लेता है
15:05इसके उपरांत उन्होंने अगनी से सीखा की कैसे सभी अशुद्धियों को भस्म करके भी स्वयं को शुद्ध रखा जा सकता
15:13है और संसार में रहकर भी अलिप्त रहा जा सकता है
15:18अगनी अपनी तेज लप्टों से सब कुछ जला देती है पर स्वयं कभी किसी वस्तु के दोश से दूशित नहीं
15:25होती और सभी दिशाओं में बिना भेदभाव के प्रकाश फैलाती है
15:31अवधूत ने फिर चंद्रमा को अपना गुरु बताया जिससे उन्होंने सीखा की शरीर में परिवर्तन के बावजूद आत्मा कैसे अपरिवर्तित
15:40रहती है
15:42चंद्रमा की कलाय घट्ती बढ़ती रहती है पर चंद्रमा स्वयंग पूल्न और अखंड रहता है खीक वैसे ही जैसे आत्मा
15:50देह के परिवर्तनों से अप्रभावित रहती है
15:55ततपश्चात उन्होंने सूर्य को अपना मार्क दर्शक बताया जिससे उन्होंने यह ज्ञान प्राप्त किया कि कैसे बिना किसी आसकती के
16:03संसार में रहते हुए भी कर्म किया जा सकता है
16:08सूर्य जल को वाश्पित करता है और फिर उसे वर्षा के रूप में लोटाता है, पर स्वयन कभी जल से
16:14लिप्थ नहीं होता, इसी तरह ज्यानी भी संसार में कर्म करते हुए अलिप्थ रहते हैं
16:21उन्होंने कभूतर की कहानी सुनाई, जिससे उन्होंने यह सीखा की अत्यधिक आ सकती कैसे दुख और बंधन का कारण बनती
16:29है, चाहे वह प्रेम की ही क्यों न हो
16:33कबूतर अपने घोसले और बच्चों से अत्यधिक प्रेम में इतना डूब जाते हैं कि उन्हें अपनी सुरक्षा की भी सुध
16:40नहीं रहती और इसी कारण वे शिकारी के जाल में फंस जाते हैं
16:46अवधूत ने यदू से कहा कि इन सभी गुरूओं से मिले ज्यान ने ही उन्हें संसार के सुखदुख से उपर
16:53उठकर अविचल शान्ती और वैराग्य प्रदान किया है
16:58अवधूत अपने चहरे पर एक अलौकिक मुस्कान लाते हैं और राजा यदू से कहते हैं कि प्रकृती का हरकन हमें
17:06इश्वर की ओर ले जाने का मार्ग दिखाता है
17:10राजा यदू अपने दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत श्रद्धा पूर्वक सिर जुकाते हैं ताकि वे अवधूत के मुख से इन अलौकिक
17:18सत्यों को ग्रहन कर सकें
17:21अवधूत कहते हैं कि उनके प्रथम गुरु स्वय माता प्रिथवी हैं जिन्होंने उन्हें जीवन का सबसे कठिन और आवश्यक पाठ
17:29सिखाया
17:31मनुष्य प्रिथवी को खोदता है उस पर प्रहार करता है और उसे प्रदूशित करता है फिर भी वह बदले में
17:38केवल मीठे फल अनाज और जीवन दाइने नदिया ही प्रदान करती है
17:44अवधूत ने प्रिथवी से सीखा की चाहे कोई हमारे साथ कितना भी बुरा व्यवहार करे हमें अपनी सहनशीलता और परोपकार
17:53का मार्ग कभी नहीं छोड़ना चाहिए
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