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ब्रह्मांड के रहस्यमय वर्णन के बाद, शुकदेव गोस्वामी अब एक ऐसी गाथा का अनावरण करते हैं जहाँ अहंकार और भक्ति का महासंग्राम छिड़ा। इस एपिसोड में हम दैत्यराज हिरण्यकशिपु के क्रोध, प्रतिशोध और अद्भुत तपस्या को देखेंगे। अपने भाई हिरण्याक्ष की मृत्यु का बदला लेने के लिए, हिरण्यकशिपु ब्रह्माजी से ऐसा वरदान प्राप्त करता है जो उसे लगभग अमर बना देता है। उसकी शक्ति और अहंकार तीनों लोकों में आतंक मचाते हैं, देव और ऋषि त्राहिमाम करते हैं। परंतु, अंधकार के चरम पर ही दिव्य प्रकाश का प्राकट्य होता है – भक्त शिरोमणि प्रह्लाद का अलौकिक जन्म, जो आने वाले समय में एक महान आध्यात्मिक क्रांति का सूत्रपात करेगा। यह एपिसोड दिखाता है कि कैसे दुष्टता का अंत निश्चित है और भक्ति की शक्ति सबसे बढ़कर है। #Hiranyakashipu #Prahlada #Bhakti #Narasimha #BhagavataPurana #HinduMythology
Transcript
00:00शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को संबोधित करते हुए अनन्त भगवान शेशनाद की अलोकिक महिमा का वर्णन आरंभ करते हैं।
00:09ब्रहमांड की समस्ट निचली प्रणालियों के भी परे अतल और रसातल के नीचे भगवान अनन्त का परमधाम विद्यमान है।
00:19सहस्र फणों वाले भगवान शेशनाद इस संपूर्ण विशाल ब्रहमांड को अपने एक फण पर सरसों के दाने की भांती धारन
00:28किये हुए हैं।
00:30उनके मनियों से जड़े फणों की प्रकाशमान किर्णों से समस्ट पाताल लोग का अंधकार क्षण भर में छट जाता है।
00:39नीले वस्त्रधारन किये श्वेत मनियों के हार और कांतिमान रूप वाले भगवान अनन्त शांत मुद्रा में स्थिर हैं।
00:48भगवान शेशनाग अपने सहस्र मुखों से निरंतर भगवान श्री हरी विष्णु के अनन्त गुनगान का गान करते रहते हैं।
00:57जब प्रलय का समय आता है, तब उनके भवोहों के मध्य से संकर्षन रूपी ग्यारा रुद्र प्रकट होकर ब्रहमांड का
01:04सहार करते हैं।
01:07समस्त ब्रहमांडिय महासागर और भौतिक तक्त्व भगवान अनन्त की दिव्य इच्छा शक्ती के आधार पर संतुलन में स्थिर रहते हैं।
01:16महाराज परीक्षित अत्यंत श्रद्धा और विस्मय से भरकर शुकदेव गोस्वामी के वचनों को अपने हृदय में उतारते हैं।
01:26शुकदेव जी समझाते हैं कि भगवान अनन्त वास्तव में साक्षात श्री हरी विष्नु के ही अनन्त स्वरूप और आधार शक्ती
01:34हैं।
01:35समस्ट ग्रहंक्षत्र और कालचक्र भगवान विश्णु के सूक्ष्म न्याय और अचूक विधान के अनुसार ही अपनी अपनी कक्षाओं में गतिमान
01:44है
01:46यह द्रिश्य संसार केवल भौतिक तत्वों का समोह नहीं, बलकि भगवान के परम धर्म और कर्म विधान की सुविवस्थित रचना
01:54है
01:56ब्रहमांड की एक सूक्ष्म से सूक्ष्म घटना भी परमेश्वर की परम इच्छा और सर्वव्यापी द्रिश्टी से कभी छिपी नहीं रह
02:04सकती
02:05जगत की रक्षा और न्याय स्थापित करने के लिए भगवान का कालचक्र निरंतर घूमता रहता है
02:13देवर्शी नारद और अन्यसिद्ध गण भगवान अनन्त के चर्णों में पुषपार्चन करते हुए उनके अनन्त प्रभाव की स्तुती करते हैं
02:22जो प्राणी अपने क्षनभंगुर सांसारिक बल पर अहंकार करता है वह इस अनन्त ब्रहमांडिय सत्य से सर्वथा अन्भिग्य रहता है
02:33जब-जब ब्रहमांड में अहंकार और अधर्म की सीमाए तूटती हैं तब-तब भगवान का सुक्ष्म विधान परिवर्तन की नीव
02:41रखता है
02:43भौतिक संपत्ती और राज्य का अभिमान करने वाले असुर यह भूल जाते हैं कि उनका अस्तित्व एक तिनके से अधिक
02:51कुछ नहीं
02:53महाराज परिक्षित हाथ जोड़ कर पूछते हैं कि जब अहंकार चरम पर पहुचता है तब भगवान किस प्रकार धर्म की
03:00रक्षा करते हैं
03:03शुकदेव गोस्वामी अब महाराज परिक्षित को हिरन्यक्षिपू के भयप्रत प्रकोप और प्रहलाद के अलोकिक अवतरण की कथा की ओर ले
03:11चलते हैं
03:14शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को संबोधित करते हुए दिती और महर्शी कश्चप के पवित्र आश्रम से आरम्ध होने वाले दैठ्यवंश
03:22की उत्पत्ती का वृत्तांत सुनाते हैं
03:26कामातुर होकर दिती संध्याकाल के अती पवित्र और वर्जित समय में अपने पती महर्शी कश्चप के समीग पहुँचकर संतान प्राप्ती
03:35की तीवर अभिलाशा प्रकट करती हैं
03:39महर्शी कश्चप दिती को समझाते हैं कि यह संध्या समय भगवान शिव और उनके रुद्रग्नों का भ्रमण काल है इसलिए
03:47इस बेला में समागम धर्म के विरुद्ध है
03:51कामावेग के प्रबल प्रभाव में दिती महर्शी की चेतावनी को अनसुना कर देती हैं जिसके परिणामस्वरूप संध्या के उस अशुब
03:59काल में ही उनका मिलाप संपन होता है
04:03मिलाप के तुरंट पश्चात पश्चाताप से भरी दिती लजजित होकर महर्शी कश्यप के चर्णों में जुपती हैं और देवताओं के
04:11कोप से रक्षा की याचना करती हैं
04:15महर्शी कश्यप दुखी होकर दिती को बताते हैं कि अनुचित समय के कारण उनके गर्ब से दो अत्यंत कुरूर और
04:22शक्तिशाली दैत्य जन्म लेंगे जो तीनों लोकों में हाहाकार मचाएंगे
04:28कशप मुनि दिती को धांधस बंधाते हुए कहते हैं कि उनके उन्ही कुख्यात पुत्रों के कुल में एक महान पौत्र
04:36जन्म लेगा जो भगवान विश्नु का अनन्य भक्त बनेगा
04:40भावी विनाश से ब्रह्मांड की रक्षा करने के उद्देश से दिती उस्तेजस्वी और भयंकर गर्भ को पूरे सौ वर्षों तक
04:48अपने शरीर के भीतर रोके रखती हैं
04:51सौ वर्षों तक दिती के गर्भ में पल रही आशुरी उर्जा इतनी भयानक हो गई कि उसने सूर्य और चंद्रमा
04:59के प्रकाश को क्षीन कर दसों दिशाओं में अंधकार फैला दिया
05:04ब्रहमांड में छाए इस निरंतर अंधकार और अमंगल से भयभीत होकर समस्थ देवता ब्रहमाजी के धाम सत्यलोक पहुँचकर रक्षा की
05:13गुहार लगाते हैं
05:16ब्रहमाजी देवताओं को वैकुंठ लोग के द्वारपाल जय और विजय को सनकादी मुनियों द्वारा दिये गए उस प्राचीन श्राप का
05:24स्मरण कराते हैं
05:26ब्रहमाजी प्रकट करते हैं कि वे ही जय और विजय अब दिती के गर्ब से प्रथम आसुरी जन्म लेकर ब्रहमाण्ड
05:34में अवतरित होने वाले हैं
05:37अंतह सौ वर्षों की कठिन अवधी पूर्ण होते ही दिती के गर्ब से हिरण्याक्ष और हिरण्यक्षिपु नामक दो विशालकाय और
05:45भयानक असुरों का जन्म हुआ
05:47उन असुरों के जन्म लेते ही तीनों लोकों में भीशन भूकम्प आ गए आकाश से रक्त की वर्षा होने लगी
05:55और सर्वत्र अमंगलकारी अप्शकुन प्रकट होने लगे
05:59दसो दिशाओं में भयंकर आंधिया चलने लगी पर्वत शिखर तूटने लगे और गगन से गिरते हुए उलकापिंडों ने समस्त प्राणियों
06:08को भयभीत कर दिया
06:09वे नवजात जुर्वा असुर्क्षन भर में ही गगन्चुम्बी पर्वतों के समान विशाल हो गए जिनका वजर जैसा शरीर ब्रहमांड के
06:18लिए महासंकट बन गया
06:21जेश्ट भ्राता हिरन्याक्ष ने असीम शारिरिक बल का प्रदर्शन करते हुए अपनी विशाल गदा के एक ही प्रहार से दिशाओं
06:29को थर्रा दिया
06:31वही अनुज हिरन्यक्षिपू के हरिदय में देवताओं के प्रती भायंकर द्वेश और ब्रहमांड पर एक छत्र राज करने का अनियंत्रित
06:39अहंकार प्रजवलित हो उठा
06:42दोनों दैत्य भायों ने स्वर्ण जडित अभेद्य कवच धारण कर अपने विध्वन्सकारी अस्त्रशस्त्रों के साथ तीनों लोकों को चुनोती देना
06:50प्रारंभ कर दिया
06:53शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि इस प्रकार दिती के इन दो शक्तिशाली पुत्रों का प्राकट्य स्रिष्टी में एक अत्यंत अंधकार्मय
07:01और भयानक युग के आगमन की पूर्वसंध्या थी
07:05हिरण्याक्ष ने अपनी प्रचेंड शक्ती के मद में अंधा होकर समस्त दिशाओं में त्राहित्राही मचादी और देवताओं को उनके दिव्यपदों
07:14से वंचित कर दिया
07:16अंकार के चरम पर पहुँचकर उस विशालकाय दैत्यने संपूर्ण प्रिथवी को उठाकर रसातल के अगाध और अंधकार्मय जल में छिपा
07:25दिया
07:26प्रिथवी के जल मगन होने पर समस्त देवगण और मुनी अत्यंत व्याकुल होकर भगवान श्री हरी विश्नु की स्तुती करते
07:34हुए रक्षा की गुहार लगाने लगे
07:37तब श्री हरी ने स्रिष्टी की रक्षा हेतु विशाल वराह रूप धारन किया और गर्जना करते हुए प्रिथवी का उध्धार
07:45करने हेतु उस अनंत महासागर में प्रवेश किया
07:49भगवान वराह ने अपने तीचन दंतों के अगरभाग पर प्रिथवी देवी को सुरक्षित उठा कर जल से बाहर निकाला और
07:56ब्रहमांडिय कक्षा में स्थिर कर दिया
07:59अपनी योजना विफल होती देख हिरन्याक्ष ने अत्यंत क्रोध से भरकर भगवान वराह को महासागर के भीतर ही भीशन
08:08युद्ध के लिए ललकारा
08:10दोनों बलशाली योद्धाओं के मध्य समुद्र के भीतर ऐसा भीशन और भयानक गदायुद्ध हुआ जिससे तीनों लोग थर-थर कामपने
08:19लगे
08:21अंत्य भगवान वराह ने अपने अतिशक्तिशाली प्रहार से उस दुर्दांत असुर हिरन्याक्ष का वध कर धर्म की पुनह स्थापना की
08:30हिरन्याक्ष का विशालकाय मृत शरीर परवत के समान समुद्र में गिर पड़ा जिससे दैत्य सेना में शोक और भय का
08:38कोहराम मच गया
08:40जब अनुज हिरन्याक्ष के वध का दुहखद समाचार दैत्यराज हिरन्यक्षिपु तक पहुँचा तो वह अवाक और स्तब्ध रह गया
08:49भाई के बिचोह के इस भीशन समाचार से हिरन्यक्षिपु का हृदय आघात से काम्प उठा और उसकी आखों में अश्रु
08:57तैर गए
08:58वह तुरंत युद्ध भूमी की ओर गौड़ा और अपने प्रियभ्राता के निश्चेत पड़े शरीर को देखकर शोक के अगाध सागर
09:06में डूब गया
09:08शन भर का यह शोक शीघर ही एक भयंकर क्रोधागनी में परिवर्तित हो गया जिससे उसकी सांसे ज्वाला की भांती
09:16तपने लगी
09:18हिरन्यक्षि पुने अपने भाई के मृत शरीर के समक्ष यह भीशन प्रतिग्याकी की वह विश्णू का समूल विनाश करके ही
09:26चैन की सांस लेगा
09:28महल लोटकर उसने अपनी माता दिती और भ्राता की पत्नी को धीर बंधाते हुए कहा कि कायरों की भांती रोना
09:35दैतियों को शोभा नहीं देता
09:38उसने अपनी दानव सेना को सपष्ट आदेश दिया कि त्रिलोकी में जहां भी विश्णू की पूजाया यग्य हो उसे तुरंत
09:46नश्ट कर दिया जाए
09:47दैत्य सेनाप्ती हिरन्यक्षिपू की आग्या पाकर रिशियों के आश्रमों को जलाने लगे और पवित्र यग्यनुष्ठानों को विध्वन्स करने लगे
09:59हिरन्यक्षिपू समझ चुका था कि केवल सामान्य बल से वह नारायन को पराजित नहीं कर सकता इसके लिए उसे अमर्त्व
10:06प्राप्त करना होगा
10:09उसने निश्चे किया कि वह ब्रहमा जी को प्रसंद करने के लिए ऐसा घोर और कठोर तब करेगा जिसकी किसी
10:16ने कलपना भी न की हो
10:19प्रतिशोध की यह प्रचंड अगनी हिरन्यक्षिपू के हरिदय में प्रजवलित हो चुकी थी जो संपून ब्रहमांड की व्यवस्था को हिला
10:26देने वाली थी
10:29प्रतिशोध की प्रचंड अगनी में जलता हुआ दैत्यराज हिरन्यक्षिपु परम अमर्त्व का वर्दान पाने हेतु मंदराचल पर्वत की एकांत और
10:37दुर्गम उचायों की ओर प्रस्थान करता है
10:42मंदराचल पर्वत के सबसे उच्चतम और निर्जन शिखर पर पहुँचकर हिरन्यक्षिपु अपने कठोर तपका स्थान चुनता है
10:50उसने अपने बाएं पैर के अंगुठे पर संतुलन बनाते हुए दोनों भुजाओं को उपर की ओर उठाकर अचल खड़े होने
10:58की अत्यंत दुशकर मुद्राधारण कर ली
11:02अपनी ग्रिष्टी को आकाश में केंद्रित कर उसने ब्रहमांड के स्रिष्टिकरता भगवान ब्रहमा को प्रसन्न करने के लिए एकनिष्ठ होकर
11:10अपना संपूर्ण ध्यान समाधी में लगा दिया
11:14वर्षों ग्यतीत होने लगे लेकिन हिरन्यक्षिपु ने अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहेन किये बिना अपनी एकागरता को
11:22तनिक भी भंग नहीं होने दिया
11:25मंदराचल पर मूसलाधार वर्षा और गर्जते आकाशिय वजर्पात भी दैत्यराज की अडिक तपस्या को हिलाने में पूरी तरह असमर्थ सिद्ध
11:34हुए
11:36द्रिश्मरितु की प्रचंड धूप और दहकती ज्वालाओं के बीच भी उसका शरीर परवत की भांती निश्चल और अविचल खड़ा रहा
11:45दीर्ग काल बीट जाने पर उसके चारों और बांबियों का निर्मान होने लगा और चींटियों तथा कीट पतंगों ने उसके
11:52शरीर को धकना प्रारंभ कर दिया
11:56चींटियों ने हिरन्यक्षिपु के मास, त्वचा और रप्त को भक्षन कर लिया, किन्तु उसकी अस्थियों के भीतर जीवन का प्रांतत्व
12:04अक्षन बना रहा
12:06केवल अस्थिशेश रह जाने के बाद भी, हिरन्यक्षिपु का वह कंकाल एक पैर पर खड़ा रहकर संपूर्ण ब्रहमांड को चकित
12:14करने वाला घोर तप करता रहा
12:16उसके ब्रहमरंध्र और कंकाल से तपस्या की ऐसी भीशन तापगनी उत्पन होने लगी कि वह आकाश को चीरते हुए चारों
12:25और फैलने लगी
12:27यह अलोकिक तपोगनी मंदराचल से निकल कर त्रिलोग के वातावर्ण को भयंकर उत्ताप से भरने लगी
12:35पर्वत धधकने लगे, नदिया उबलने लगी और समुद्र प्रचंड उत्ताप के कारण अशान्थ होकर तरंगित होने लगे
12:44तपस्या की वह विनाशकारी उश्मा अंतरिक्ष को पार कर उच्छतर लोकों की ओर प्रविष्ठ होने लगी
12:52स्वर्गलोक में उपस्थित अमरावती पुरी की स्वर्ण अट्टालिकाएं और नंदन्वन की गलियां उस भयंकर ताप से तप्थ होने लगी
13:01देवराज इंद्र और समस्थ देवगण उस अप्रत्याशित संकट और असहाय कर देने वाली ज्वाला से अत्यंत भयभीत हो उठे
13:10स्वर्ग के निवासी अत्यंत व्याकुल होकर अपने दिव्याभूशनों और वस्त्रों की चिंता किये बिना सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे
13:20कोई अन्यमार्ग न देखकर इंद्रदेव समस्थ देवताओं का नेत्रित्व करते हुए सहायता मांगने के लिए सत्यलोक की ओर वेग से
13:28आगे बढ़े
13:30देवगन सत्यलोक में भगवान ब्रहमा के परमदिव्य और प्रकाशमान दर्बार में पहुँचे और रक्षा हेतु करुन पुकार करने लगे
13:40देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान ब्रहमा ने संपून ब्रहमांड में मच्ते इस महान हाहाकार का समाधान करने का निश्चय किया
13:50सत्य लोक से प्रस्थान कर स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा अपने भव्यहन सरत। पर सवार होकर मंदराचल परवत की दिशा
13:58में तीवर गती से उतरने लगे
14:01मंदराचल परवत पर पहुँचकर भगवान ब्रह्मा ने देखा कि हिरन्यक्षिपु का संपूर्ण शरीर दीम को द्वारा बनाई गई बावी में
14:09पूरी तरह धक चुका था और केवल उसकी प्रकाश्मान अस्थिया शेश बची थी
14:16परम्पिता ब्रह्मा ने अपने दिव्य कमंदलू से अभिमंत्रित जल की धारा उस दीमक की बावी पर छिड़क दी जिससे संपूर्ण
14:24परवत चैतन्य हो उठा
14:26कमंदलू के दिव्यस पर्ष से वह दीमक की बावी क्षन भर में तूट गई और उसमें से हिरन्यक्षिपू एक नवनिर्मित
14:34अत्यंत बल्वान और स्वर्ण के समान चमकते शरीर के साथ बाहर निकला
14:40पुनरजीवित होकर जब हिरन्यक्षिपू ने आकाश मेहंस पर विराजे चार मुखवाले भगवान ब्रहमा को देखा तो उसने तुरंत प्रित्वी पर
14:49दंडवत होकर उन्हें प्रणाम किया
14:52भगवान ब्रह्माने मंद मुस्कान के साथ हिरनेक्षिपु को उठने का संकेत दिया और उसकी असीम तपस्या की प्रशंसा करते हुए
15:01उससे कोई भी मनचाहा वर्दान मांगने को कहा
15:05अपने भीतर विश्णु से प्रतिशोध लेने की भयंकर ज्वाला छिपाए हुए हिरनेक्षिपु ने अत्यंत विनमर्ता का प्रदर्शन करते हुए अपना
15:14हाथ जोडा और वर्दान मांगना आरंभ किया
15:17उसने चतुराई से पहला वर्दान मांगा कि ब्रहमाजी द्वारा रची गई किसी भी स्रिष्टी चाहे वह मनुष्य हो देव हो
15:26दानव हो या कोई पशूप के हाथों उसकी मृत्यू कभी न हो
15:31उसने आगे शर्ट रखी कि उसकी मृत्यू न तो किसी घर या भवन के भीतर हो और नहीं खुले आकाश
15:38के नीचे किसी घर के बाहर हो
15:41अपनी अमर्ता को और अधिक पक्का करते हुए हिरन्यक्षिपु ने मांगा कि न तो दिन के उजाले में उसका अंथो
15:48और नहीं रात के घने अंधकार में
15:51उसने यह भी वर्दान मांगा कि उसकी मृत्यू न तो इस कठोर प्रित्वी के धरातल पर हो और नहीं उपर
15:59विस्त्रित आकाश में
16:01हिरन्यक्षिपु ने द्रिर्टा से कहा कि दुनिया का कोई भी अस्त्र या शस्त्र चाहे वह तलवार हो भाला हो या
16:08दिव्यबान उसका वध करने में असमर्थ रहे
16:12इसके अतिरिक्ट उसने मांगा कि उसे न तो कोई जीवित प्राणी मार सके और नहीं कोई निर्जीव वस्तु या सूखी
16:20वस्तु उसकी मृत्यू का कारण बन सके
16:22उसने संपूर्ण तीनों लोकों का एक छत्र स्वामी बनने और सभी जीवधारियों तथा देवताओं पर अपना सर्वोप्री आधिपत्य स्थापित करने
16:33की अंतिम इच्छा प्रकट की
16:36किरन्यक्षिपु ने यह भी मांगा कि युद्ध के मैदान में उसकी शक्ती कभी कम न हो और उसे वे सभी
16:42अष्ट सिधिया प्राप्थों जो केवल परम पुरुशों को मिलती हैं
16:48किरन्यक्षिपु के इस अत्यंत विचार पूर्वक मांगे गए और लगभग अमर्ता प्रदान करने वाले वर्दान को सुनकर भगवान ब्रह्मा अत्यंत
16:57गंभीर और विचार मगन हो गए
17:00यद्यपी यह वर्दान अत्यंत दुलब और कठिन था फिर भी तपस्या के नियम का पालन करते हुए भगवान ब्रह्मा ने
17:07अपना दाहिना हाथ उठा कर कहा तथास्तुक तुम्हारी मनोकामना पूरी हो
17:13वर्दान प्रदान करने के पश्चात भगवान ब्रहमा देवताओं द्वारा पूजे जाते हुए तुरंट अपनी दिव्य जोती के साथ सत्यलोग की
17:22ओर अंतरध्यान हो गए
17:25ब्रहमा जी के जाने के बाद हिरन्यक्षिपु का हृदय परम अहंकार और घमन से भर गया क्योंकि उसे विश्वास हो
17:32गया था कि अब ब्रहमांड की कोई भी शक्ती उसे नहीं मार सकती
17:37अमर्ता का अहंकार धारण कर हिरन्यक्षिपु ने एक ऐसी भयंकर गर्जना की जिससे दसों दिशाय काम उठीन और वह अपने
17:46शत्रु भगवान विश्णु से बदला लेने के लिए तत्पर हो गया
17:51वर्दान की असीमित शक्ती को अपने भीतर महसूस करते हुए हिरन्यक्षिपु ने अपनी शक्तिशाली भुजाओं को देखा और स्वयन को
17:59अमर् समझने की भूल कर बैठा
18:01परम सत्ता के अहंकार से उनमत्ध होकर उसने तुरंट अपने प्रधान सेनाप्तियों और असुर नायकों को राजसभा में उपस्थित होने
18:11का भीशन आदेश दिया
18:13अपनी विशाल असुर सेना के समक्ष हुंकार भरते हुए उसने घोशना की की अब ब्रहमांड में कोई भी देव, दानव
18:21या प्राणी उसके समक्ष टिक नहीं सकता
18:25समराठ की इस अभूत पूर्व गर्जना को सुनकर पूरी दानव सेना ने अपने अस्त्रशस्त्र हवा में लहराते हुए विजय के
18:32हुंकार भरे नारे लगाए
18:35प्रतिशोध की अगनी में जलते हुए हिरन्यक्षिपु ने अपनी सेना को सम्पूर्ण तीनों लोकों पर आधिपत्य स्थापित करने और देवों
18:43को कुचलने का निर्देश दिया
18:46आग्या मिलते ही असुरों का विशाल काला सागर मंदराचल परवत की तलहटी से निकल कर स्वर्ग और प्रित्वी की ओर
18:54प्रचंड गती से बढ़ चला
18:56स्वय हिरन्यक्षिपू सोने और काले लोहे से बने अपने भव्यरत पर सवार होकर दसों दिशाओं को थर्राता हुआ स्वर्ग लोक
19:04की ओर बढ़ा
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