00:00शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को संबोधित करते हुए अनन्त भगवान शेशनाद की अलोकिक महिमा का वर्णन आरंभ करते हैं।
00:09ब्रहमांड की समस्ट निचली प्रणालियों के भी परे अतल और रसातल के नीचे भगवान अनन्त का परमधाम विद्यमान है।
00:19सहस्र फणों वाले भगवान शेशनाद इस संपूर्ण विशाल ब्रहमांड को अपने एक फण पर सरसों के दाने की भांती धारन
00:28किये हुए हैं।
00:30उनके मनियों से जड़े फणों की प्रकाशमान किर्णों से समस्ट पाताल लोग का अंधकार क्षण भर में छट जाता है।
00:39नीले वस्त्रधारन किये श्वेत मनियों के हार और कांतिमान रूप वाले भगवान अनन्त शांत मुद्रा में स्थिर हैं।
00:48भगवान शेशनाग अपने सहस्र मुखों से निरंतर भगवान श्री हरी विष्णु के अनन्त गुनगान का गान करते रहते हैं।
00:57जब प्रलय का समय आता है, तब उनके भवोहों के मध्य से संकर्षन रूपी ग्यारा रुद्र प्रकट होकर ब्रहमांड का
01:04सहार करते हैं।
01:07समस्त ब्रहमांडिय महासागर और भौतिक तक्त्व भगवान अनन्त की दिव्य इच्छा शक्ती के आधार पर संतुलन में स्थिर रहते हैं।
01:16महाराज परीक्षित अत्यंत श्रद्धा और विस्मय से भरकर शुकदेव गोस्वामी के वचनों को अपने हृदय में उतारते हैं।
01:26शुकदेव जी समझाते हैं कि भगवान अनन्त वास्तव में साक्षात श्री हरी विष्नु के ही अनन्त स्वरूप और आधार शक्ती
01:34हैं।
01:35समस्ट ग्रहंक्षत्र और कालचक्र भगवान विश्णु के सूक्ष्म न्याय और अचूक विधान के अनुसार ही अपनी अपनी कक्षाओं में गतिमान
01:44है
01:46यह द्रिश्य संसार केवल भौतिक तत्वों का समोह नहीं, बलकि भगवान के परम धर्म और कर्म विधान की सुविवस्थित रचना
01:54है
01:56ब्रहमांड की एक सूक्ष्म से सूक्ष्म घटना भी परमेश्वर की परम इच्छा और सर्वव्यापी द्रिश्टी से कभी छिपी नहीं रह
02:04सकती
02:05जगत की रक्षा और न्याय स्थापित करने के लिए भगवान का कालचक्र निरंतर घूमता रहता है
02:13देवर्शी नारद और अन्यसिद्ध गण भगवान अनन्त के चर्णों में पुषपार्चन करते हुए उनके अनन्त प्रभाव की स्तुती करते हैं
02:22जो प्राणी अपने क्षनभंगुर सांसारिक बल पर अहंकार करता है वह इस अनन्त ब्रहमांडिय सत्य से सर्वथा अन्भिग्य रहता है
02:33जब-जब ब्रहमांड में अहंकार और अधर्म की सीमाए तूटती हैं तब-तब भगवान का सुक्ष्म विधान परिवर्तन की नीव
02:41रखता है
02:43भौतिक संपत्ती और राज्य का अभिमान करने वाले असुर यह भूल जाते हैं कि उनका अस्तित्व एक तिनके से अधिक
02:51कुछ नहीं
02:53महाराज परिक्षित हाथ जोड़ कर पूछते हैं कि जब अहंकार चरम पर पहुचता है तब भगवान किस प्रकार धर्म की
03:00रक्षा करते हैं
03:03शुकदेव गोस्वामी अब महाराज परिक्षित को हिरन्यक्षिपू के भयप्रत प्रकोप और प्रहलाद के अलोकिक अवतरण की कथा की ओर ले
03:11चलते हैं
03:14शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित को संबोधित करते हुए दिती और महर्शी कश्चप के पवित्र आश्रम से आरम्ध होने वाले दैठ्यवंश
03:22की उत्पत्ती का वृत्तांत सुनाते हैं
03:26कामातुर होकर दिती संध्याकाल के अती पवित्र और वर्जित समय में अपने पती महर्शी कश्चप के समीग पहुँचकर संतान प्राप्ती
03:35की तीवर अभिलाशा प्रकट करती हैं
03:39महर्शी कश्चप दिती को समझाते हैं कि यह संध्या समय भगवान शिव और उनके रुद्रग्नों का भ्रमण काल है इसलिए
03:47इस बेला में समागम धर्म के विरुद्ध है
03:51कामावेग के प्रबल प्रभाव में दिती महर्शी की चेतावनी को अनसुना कर देती हैं जिसके परिणामस्वरूप संध्या के उस अशुब
03:59काल में ही उनका मिलाप संपन होता है
04:03मिलाप के तुरंट पश्चात पश्चाताप से भरी दिती लजजित होकर महर्शी कश्यप के चर्णों में जुपती हैं और देवताओं के
04:11कोप से रक्षा की याचना करती हैं
04:15महर्शी कश्यप दुखी होकर दिती को बताते हैं कि अनुचित समय के कारण उनके गर्ब से दो अत्यंत कुरूर और
04:22शक्तिशाली दैत्य जन्म लेंगे जो तीनों लोकों में हाहाकार मचाएंगे
04:28कशप मुनि दिती को धांधस बंधाते हुए कहते हैं कि उनके उन्ही कुख्यात पुत्रों के कुल में एक महान पौत्र
04:36जन्म लेगा जो भगवान विश्नु का अनन्य भक्त बनेगा
04:40भावी विनाश से ब्रह्मांड की रक्षा करने के उद्देश से दिती उस्तेजस्वी और भयंकर गर्भ को पूरे सौ वर्षों तक
04:48अपने शरीर के भीतर रोके रखती हैं
04:51सौ वर्षों तक दिती के गर्भ में पल रही आशुरी उर्जा इतनी भयानक हो गई कि उसने सूर्य और चंद्रमा
04:59के प्रकाश को क्षीन कर दसों दिशाओं में अंधकार फैला दिया
05:04ब्रहमांड में छाए इस निरंतर अंधकार और अमंगल से भयभीत होकर समस्थ देवता ब्रहमाजी के धाम सत्यलोक पहुँचकर रक्षा की
05:13गुहार लगाते हैं
05:16ब्रहमाजी देवताओं को वैकुंठ लोग के द्वारपाल जय और विजय को सनकादी मुनियों द्वारा दिये गए उस प्राचीन श्राप का
05:24स्मरण कराते हैं
05:26ब्रहमाजी प्रकट करते हैं कि वे ही जय और विजय अब दिती के गर्ब से प्रथम आसुरी जन्म लेकर ब्रहमाण्ड
05:34में अवतरित होने वाले हैं
05:37अंतह सौ वर्षों की कठिन अवधी पूर्ण होते ही दिती के गर्ब से हिरण्याक्ष और हिरण्यक्षिपु नामक दो विशालकाय और
05:45भयानक असुरों का जन्म हुआ
05:47उन असुरों के जन्म लेते ही तीनों लोकों में भीशन भूकम्प आ गए आकाश से रक्त की वर्षा होने लगी
05:55और सर्वत्र अमंगलकारी अप्शकुन प्रकट होने लगे
05:59दसो दिशाओं में भयंकर आंधिया चलने लगी पर्वत शिखर तूटने लगे और गगन से गिरते हुए उलकापिंडों ने समस्त प्राणियों
06:08को भयभीत कर दिया
06:09वे नवजात जुर्वा असुर्क्षन भर में ही गगन्चुम्बी पर्वतों के समान विशाल हो गए जिनका वजर जैसा शरीर ब्रहमांड के
06:18लिए महासंकट बन गया
06:21जेश्ट भ्राता हिरन्याक्ष ने असीम शारिरिक बल का प्रदर्शन करते हुए अपनी विशाल गदा के एक ही प्रहार से दिशाओं
06:29को थर्रा दिया
06:31वही अनुज हिरन्यक्षिपू के हरिदय में देवताओं के प्रती भायंकर द्वेश और ब्रहमांड पर एक छत्र राज करने का अनियंत्रित
06:39अहंकार प्रजवलित हो उठा
06:42दोनों दैत्य भायों ने स्वर्ण जडित अभेद्य कवच धारण कर अपने विध्वन्सकारी अस्त्रशस्त्रों के साथ तीनों लोकों को चुनोती देना
06:50प्रारंभ कर दिया
06:53शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि इस प्रकार दिती के इन दो शक्तिशाली पुत्रों का प्राकट्य स्रिष्टी में एक अत्यंत अंधकार्मय
07:01और भयानक युग के आगमन की पूर्वसंध्या थी
07:05हिरण्याक्ष ने अपनी प्रचेंड शक्ती के मद में अंधा होकर समस्त दिशाओं में त्राहित्राही मचादी और देवताओं को उनके दिव्यपदों
07:14से वंचित कर दिया
07:16अंकार के चरम पर पहुँचकर उस विशालकाय दैत्यने संपूर्ण प्रिथवी को उठाकर रसातल के अगाध और अंधकार्मय जल में छिपा
07:25दिया
07:26प्रिथवी के जल मगन होने पर समस्त देवगण और मुनी अत्यंत व्याकुल होकर भगवान श्री हरी विश्नु की स्तुती करते
07:34हुए रक्षा की गुहार लगाने लगे
07:37तब श्री हरी ने स्रिष्टी की रक्षा हेतु विशाल वराह रूप धारन किया और गर्जना करते हुए प्रिथवी का उध्धार
07:45करने हेतु उस अनंत महासागर में प्रवेश किया
07:49भगवान वराह ने अपने तीचन दंतों के अगरभाग पर प्रिथवी देवी को सुरक्षित उठा कर जल से बाहर निकाला और
07:56ब्रहमांडिय कक्षा में स्थिर कर दिया
07:59अपनी योजना विफल होती देख हिरन्याक्ष ने अत्यंत क्रोध से भरकर भगवान वराह को महासागर के भीतर ही भीशन
08:08युद्ध के लिए ललकारा
08:10दोनों बलशाली योद्धाओं के मध्य समुद्र के भीतर ऐसा भीशन और भयानक गदायुद्ध हुआ जिससे तीनों लोग थर-थर कामपने
08:19लगे
08:21अंत्य भगवान वराह ने अपने अतिशक्तिशाली प्रहार से उस दुर्दांत असुर हिरन्याक्ष का वध कर धर्म की पुनह स्थापना की
08:30हिरन्याक्ष का विशालकाय मृत शरीर परवत के समान समुद्र में गिर पड़ा जिससे दैत्य सेना में शोक और भय का
08:38कोहराम मच गया
08:40जब अनुज हिरन्याक्ष के वध का दुहखद समाचार दैत्यराज हिरन्यक्षिपु तक पहुँचा तो वह अवाक और स्तब्ध रह गया
08:49भाई के बिचोह के इस भीशन समाचार से हिरन्यक्षिपु का हृदय आघात से काम्प उठा और उसकी आखों में अश्रु
08:57तैर गए
08:58वह तुरंत युद्ध भूमी की ओर गौड़ा और अपने प्रियभ्राता के निश्चेत पड़े शरीर को देखकर शोक के अगाध सागर
09:06में डूब गया
09:08शन भर का यह शोक शीघर ही एक भयंकर क्रोधागनी में परिवर्तित हो गया जिससे उसकी सांसे ज्वाला की भांती
09:16तपने लगी
09:18हिरन्यक्षि पुने अपने भाई के मृत शरीर के समक्ष यह भीशन प्रतिग्याकी की वह विश्णू का समूल विनाश करके ही
09:26चैन की सांस लेगा
09:28महल लोटकर उसने अपनी माता दिती और भ्राता की पत्नी को धीर बंधाते हुए कहा कि कायरों की भांती रोना
09:35दैतियों को शोभा नहीं देता
09:38उसने अपनी दानव सेना को सपष्ट आदेश दिया कि त्रिलोकी में जहां भी विश्णू की पूजाया यग्य हो उसे तुरंत
09:46नश्ट कर दिया जाए
09:47दैत्य सेनाप्ती हिरन्यक्षिपू की आग्या पाकर रिशियों के आश्रमों को जलाने लगे और पवित्र यग्यनुष्ठानों को विध्वन्स करने लगे
09:59हिरन्यक्षिपू समझ चुका था कि केवल सामान्य बल से वह नारायन को पराजित नहीं कर सकता इसके लिए उसे अमर्त्व
10:06प्राप्त करना होगा
10:09उसने निश्चे किया कि वह ब्रहमा जी को प्रसंद करने के लिए ऐसा घोर और कठोर तब करेगा जिसकी किसी
10:16ने कलपना भी न की हो
10:19प्रतिशोध की यह प्रचंड अगनी हिरन्यक्षिपू के हरिदय में प्रजवलित हो चुकी थी जो संपून ब्रहमांड की व्यवस्था को हिला
10:26देने वाली थी
10:29प्रतिशोध की प्रचंड अगनी में जलता हुआ दैत्यराज हिरन्यक्षिपु परम अमर्त्व का वर्दान पाने हेतु मंदराचल पर्वत की एकांत और
10:37दुर्गम उचायों की ओर प्रस्थान करता है
10:42मंदराचल पर्वत के सबसे उच्चतम और निर्जन शिखर पर पहुँचकर हिरन्यक्षिपु अपने कठोर तपका स्थान चुनता है
10:50उसने अपने बाएं पैर के अंगुठे पर संतुलन बनाते हुए दोनों भुजाओं को उपर की ओर उठाकर अचल खड़े होने
10:58की अत्यंत दुशकर मुद्राधारण कर ली
11:02अपनी ग्रिष्टी को आकाश में केंद्रित कर उसने ब्रहमांड के स्रिष्टिकरता भगवान ब्रहमा को प्रसन्न करने के लिए एकनिष्ठ होकर
11:10अपना संपूर्ण ध्यान समाधी में लगा दिया
11:14वर्षों ग्यतीत होने लगे लेकिन हिरन्यक्षिपु ने अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहेन किये बिना अपनी एकागरता को
11:22तनिक भी भंग नहीं होने दिया
11:25मंदराचल पर मूसलाधार वर्षा और गर्जते आकाशिय वजर्पात भी दैत्यराज की अडिक तपस्या को हिलाने में पूरी तरह असमर्थ सिद्ध
11:34हुए
11:36द्रिश्मरितु की प्रचंड धूप और दहकती ज्वालाओं के बीच भी उसका शरीर परवत की भांती निश्चल और अविचल खड़ा रहा
11:45दीर्ग काल बीट जाने पर उसके चारों और बांबियों का निर्मान होने लगा और चींटियों तथा कीट पतंगों ने उसके
11:52शरीर को धकना प्रारंभ कर दिया
11:56चींटियों ने हिरन्यक्षिपु के मास, त्वचा और रप्त को भक्षन कर लिया, किन्तु उसकी अस्थियों के भीतर जीवन का प्रांतत्व
12:04अक्षन बना रहा
12:06केवल अस्थिशेश रह जाने के बाद भी, हिरन्यक्षिपु का वह कंकाल एक पैर पर खड़ा रहकर संपूर्ण ब्रहमांड को चकित
12:14करने वाला घोर तप करता रहा
12:16उसके ब्रहमरंध्र और कंकाल से तपस्या की ऐसी भीशन तापगनी उत्पन होने लगी कि वह आकाश को चीरते हुए चारों
12:25और फैलने लगी
12:27यह अलोकिक तपोगनी मंदराचल से निकल कर त्रिलोग के वातावर्ण को भयंकर उत्ताप से भरने लगी
12:35पर्वत धधकने लगे, नदिया उबलने लगी और समुद्र प्रचंड उत्ताप के कारण अशान्थ होकर तरंगित होने लगे
12:44तपस्या की वह विनाशकारी उश्मा अंतरिक्ष को पार कर उच्छतर लोकों की ओर प्रविष्ठ होने लगी
12:52स्वर्गलोक में उपस्थित अमरावती पुरी की स्वर्ण अट्टालिकाएं और नंदन्वन की गलियां उस भयंकर ताप से तप्थ होने लगी
13:01देवराज इंद्र और समस्थ देवगण उस अप्रत्याशित संकट और असहाय कर देने वाली ज्वाला से अत्यंत भयभीत हो उठे
13:10स्वर्ग के निवासी अत्यंत व्याकुल होकर अपने दिव्याभूशनों और वस्त्रों की चिंता किये बिना सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे
13:20कोई अन्यमार्ग न देखकर इंद्रदेव समस्थ देवताओं का नेत्रित्व करते हुए सहायता मांगने के लिए सत्यलोक की ओर वेग से
13:28आगे बढ़े
13:30देवगन सत्यलोक में भगवान ब्रहमा के परमदिव्य और प्रकाशमान दर्बार में पहुँचे और रक्षा हेतु करुन पुकार करने लगे
13:40देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान ब्रहमा ने संपून ब्रहमांड में मच्ते इस महान हाहाकार का समाधान करने का निश्चय किया
13:50सत्य लोक से प्रस्थान कर स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रहमा अपने भव्यहन सरत। पर सवार होकर मंदराचल परवत की दिशा
13:58में तीवर गती से उतरने लगे
14:01मंदराचल परवत पर पहुँचकर भगवान ब्रह्मा ने देखा कि हिरन्यक्षिपु का संपूर्ण शरीर दीम को द्वारा बनाई गई बावी में
14:09पूरी तरह धक चुका था और केवल उसकी प्रकाश्मान अस्थिया शेश बची थी
14:16परम्पिता ब्रह्मा ने अपने दिव्य कमंदलू से अभिमंत्रित जल की धारा उस दीमक की बावी पर छिड़क दी जिससे संपूर्ण
14:24परवत चैतन्य हो उठा
14:26कमंदलू के दिव्यस पर्ष से वह दीमक की बावी क्षन भर में तूट गई और उसमें से हिरन्यक्षिपू एक नवनिर्मित
14:34अत्यंत बल्वान और स्वर्ण के समान चमकते शरीर के साथ बाहर निकला
14:40पुनरजीवित होकर जब हिरन्यक्षिपू ने आकाश मेहंस पर विराजे चार मुखवाले भगवान ब्रहमा को देखा तो उसने तुरंत प्रित्वी पर
14:49दंडवत होकर उन्हें प्रणाम किया
14:52भगवान ब्रह्माने मंद मुस्कान के साथ हिरनेक्षिपु को उठने का संकेत दिया और उसकी असीम तपस्या की प्रशंसा करते हुए
15:01उससे कोई भी मनचाहा वर्दान मांगने को कहा
15:05अपने भीतर विश्णु से प्रतिशोध लेने की भयंकर ज्वाला छिपाए हुए हिरनेक्षिपु ने अत्यंत विनमर्ता का प्रदर्शन करते हुए अपना
15:14हाथ जोडा और वर्दान मांगना आरंभ किया
15:17उसने चतुराई से पहला वर्दान मांगा कि ब्रहमाजी द्वारा रची गई किसी भी स्रिष्टी चाहे वह मनुष्य हो देव हो
15:26दानव हो या कोई पशूप के हाथों उसकी मृत्यू कभी न हो
15:31उसने आगे शर्ट रखी कि उसकी मृत्यू न तो किसी घर या भवन के भीतर हो और नहीं खुले आकाश
15:38के नीचे किसी घर के बाहर हो
15:41अपनी अमर्ता को और अधिक पक्का करते हुए हिरन्यक्षिपु ने मांगा कि न तो दिन के उजाले में उसका अंथो
15:48और नहीं रात के घने अंधकार में
15:51उसने यह भी वर्दान मांगा कि उसकी मृत्यू न तो इस कठोर प्रित्वी के धरातल पर हो और नहीं उपर
15:59विस्त्रित आकाश में
16:01हिरन्यक्षिपु ने द्रिर्टा से कहा कि दुनिया का कोई भी अस्त्र या शस्त्र चाहे वह तलवार हो भाला हो या
16:08दिव्यबान उसका वध करने में असमर्थ रहे
16:12इसके अतिरिक्ट उसने मांगा कि उसे न तो कोई जीवित प्राणी मार सके और नहीं कोई निर्जीव वस्तु या सूखी
16:20वस्तु उसकी मृत्यू का कारण बन सके
16:22उसने संपूर्ण तीनों लोकों का एक छत्र स्वामी बनने और सभी जीवधारियों तथा देवताओं पर अपना सर्वोप्री आधिपत्य स्थापित करने
16:33की अंतिम इच्छा प्रकट की
16:36किरन्यक्षिपु ने यह भी मांगा कि युद्ध के मैदान में उसकी शक्ती कभी कम न हो और उसे वे सभी
16:42अष्ट सिधिया प्राप्थों जो केवल परम पुरुशों को मिलती हैं
16:48किरन्यक्षिपु के इस अत्यंत विचार पूर्वक मांगे गए और लगभग अमर्ता प्रदान करने वाले वर्दान को सुनकर भगवान ब्रह्मा अत्यंत
16:57गंभीर और विचार मगन हो गए
17:00यद्यपी यह वर्दान अत्यंत दुलब और कठिन था फिर भी तपस्या के नियम का पालन करते हुए भगवान ब्रह्मा ने
17:07अपना दाहिना हाथ उठा कर कहा तथास्तुक तुम्हारी मनोकामना पूरी हो
17:13वर्दान प्रदान करने के पश्चात भगवान ब्रहमा देवताओं द्वारा पूजे जाते हुए तुरंट अपनी दिव्य जोती के साथ सत्यलोग की
17:22ओर अंतरध्यान हो गए
17:25ब्रहमा जी के जाने के बाद हिरन्यक्षिपु का हृदय परम अहंकार और घमन से भर गया क्योंकि उसे विश्वास हो
17:32गया था कि अब ब्रहमांड की कोई भी शक्ती उसे नहीं मार सकती
17:37अमर्ता का अहंकार धारण कर हिरन्यक्षिपु ने एक ऐसी भयंकर गर्जना की जिससे दसों दिशाय काम उठीन और वह अपने
17:46शत्रु भगवान विश्णु से बदला लेने के लिए तत्पर हो गया
17:51वर्दान की असीमित शक्ती को अपने भीतर महसूस करते हुए हिरन्यक्षिपु ने अपनी शक्तिशाली भुजाओं को देखा और स्वयन को
17:59अमर् समझने की भूल कर बैठा
18:01परम सत्ता के अहंकार से उनमत्ध होकर उसने तुरंट अपने प्रधान सेनाप्तियों और असुर नायकों को राजसभा में उपस्थित होने
18:11का भीशन आदेश दिया
18:13अपनी विशाल असुर सेना के समक्ष हुंकार भरते हुए उसने घोशना की की अब ब्रहमांड में कोई भी देव, दानव
18:21या प्राणी उसके समक्ष टिक नहीं सकता
18:25समराठ की इस अभूत पूर्व गर्जना को सुनकर पूरी दानव सेना ने अपने अस्त्रशस्त्र हवा में लहराते हुए विजय के
18:32हुंकार भरे नारे लगाए
18:35प्रतिशोध की अगनी में जलते हुए हिरन्यक्षिपु ने अपनी सेना को सम्पूर्ण तीनों लोकों पर आधिपत्य स्थापित करने और देवों
18:43को कुचलने का निर्देश दिया
18:46आग्या मिलते ही असुरों का विशाल काला सागर मंदराचल परवत की तलहटी से निकल कर स्वर्ग और प्रित्वी की ओर
18:54प्रचंड गती से बढ़ चला
18:56स्वय हिरन्यक्षिपू सोने और काले लोहे से बने अपने भव्यरत पर सवार होकर दसों दिशाओं को थर्राता हुआ स्वर्ग लोक
19:04की ओर बढ़ा
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