00:00पिछले जन्म की मोपाश में फसकर, भरत चक्रवर्ती ने एक हिरन के रूप में पुनह जन्म लिया, जहां उनकी चेतना
00:07अपने म्रिग शरीर में भी अडिग रही.
00:10जो ही वह नवजात म्रिग अपने पैरों पर खड़ा हुआ, पूर्वजन्म की स्मृतिया उसकी चेतना में लहरों सी टक्राने लगी,
00:18एक राजा के वैभव और त्याग का चित्र उसके मानस पटल पर उभराया.
00:24उसे स्मरन हुआ कैसे वह एक प्रतापी समराठ था, जिसकी ख्याती तीनों लोकों में गुंजती थी और जिसके नाम पर
00:32यह भूमी भारतवर्ष कहलाई.
00:34फिर उसे याद आया अपना राजपाट त्यागना, राजसी वस्त्रों का परित्याग कर वन की एकांत कुटिया में प्रवेश करना, जहां
00:44उसने कठोर तपस्या आरंभ की थी.
00:48मानसून की मूसलाधार वर्षा में उसने एक भयभीत और असहाय म्रिग्षिशु को बहती नदी से बचाया था, जो उसकी तपस्या
00:56में एक नया मोड ले आया.
00:58उस म्रिग्षिशु के प्रती बढ़ता मोह, उसकी हर आहट पर चिंता, उसकी सुरक्षा का सतत विचार धीरे धीरे उसकी तपस्या
01:07को लीलने लगा.
01:09अंतह उसी म्रिग्षिशु के विचार में खोया हुआ, म्रित्यु के अंतिन क्षणों में उसने अपने प्रभो को छोड़ कर केवल
01:16उसी शिशु को स्मरण किया.
01:19और फिर वह अभागाक्षन आया जब उसके प्राणों ने देह त्यागी और अगले ही पल उसने स्वयं को उसी म्रिग्षिशु
01:27के गर्भ में पाया.
01:29यह पुनरजन्मक उसके लिए एक भयंकर पश्चाताप की अगनी लेकर आया, जहां वह अपने म्रिग शरीर में भी पिछली भूलों
01:37पर निरंतर जलता रहा.
01:40वह समझ गया की आसक्ती का यह बंधन कितना प्रबल होता है, जो एक तपस्वी को भी अपने मार्ग से
01:47भटका कर पशुयोनी में धकेल सकता है.
01:51अब इस म्रिग देह में भी उसका लक्षिस पश्ट था, इस जन्म को आत्मशुद्धी का एक कठोर किन्तु आवश्यक अफसर
01:59बनाना.
02:01अन्यम्रिगों की भाती वह अहार निग्रा में लिप्त न रहकर, एकांत में बैठकर, अपने अंतर्मन की गहरायों में गोता लगाता.
02:10वह प्रकृती के हर स्पंदन में भगवत तत्व को खोजने का प्रयास करता, जैसे कभी एक राजा के रूप में
02:17उसने अपने सामराज्य में धर्म का पालन किया था.
02:21उसके रोमरोम में पूर्वजन्म की शिक्षाए गूंजती थी, जिससे उसका हर कदम, हर ग्रिष्टी एक रिशी के समान प्रतीत होती
02:29थी.
02:30उसे भय था कि कहीं फिर से वह किसी सांसारिक बंधन में न फंस जाए, इसलिए वह मनुश्यों और अन्य
02:38प्राणियों से दूर एकांत में रहता था.
02:41यद्यपी वह म्रिग शरीर में था, उसकी आत्मा निरंतर ओम के नाद में लीन रहती थी, इश्वर के प्रती उसकी
02:49निष्ठा अखंड थी.
02:51उसका जीवन अब एक मौन तपस्या बन गया था, जहां हर सास, हर चाल मुक्ती की ओर एक बढ़ा हुआ
02:58कदम था.
03:00उसकी आखों में भूटकाल का पश्चाताप और भविश्य की मुक्ती की आशा स्पष्ट जलकती थी, एक ऐसा विरोधाभास जो उसे
03:08अध्वितिय बनाता था.
03:11इस मृगयोनी में भी वह अपने आराध्य देव की कृपा का स्मरण करता और अपनी हर क्रिया को उनही को
03:18समर्पित करता चला गया.
03:21इस प्रकार भरत चक्रवर्ती ने म्रिग रूप में भी अपने पूर्वजन्म के ज्यान और ग्रिड संकल्प के साथ अपनी आत्मा
03:29को शुद्ध करने का अध्भुत मार्ग अपनाया
03:33म्रिडशावक के रूप में भरत अपनी हिर्नी मा के कोमल स्पर्ष और साथी म्रिगों की निश्चिंत क्रीडा में एक स्वाभाविक
03:40ममत्व का अनुभव करता था
03:43किन्तु उसके भीतर पूर्वजन्म का ज्यान एक ज्वालासा प्रजवलित था जो इस नश्वर देह के क्शनभंगुर स्नहबंधन से उसे बार
03:51-बार सावधान करता था
03:54वह अकसर ज्वंड से दूर एकांत में बैठकर अपनी म्रिग प्रवरित्ती पर अंकुष लगाने और मन को परमात्मा में स्थिर
04:02करने का अभ्यास करता
04:04जब उसकी म्रिगमा उसे खोजने आती और अपने कोमल स्वर में पुकारती तो आसकती की दोर फिर से उसे अपने
04:13मुहपाश में खीच लेती
04:15वह वापस जुंड में लौट आता, साथियों के साथ घास चरता, किन्तु उसका अंतर्मन इस बाहरी संसार से विरक्ट अपनी
04:24मुक्ती के मार्ग पर अटल रहता
04:27एक दिन एक भयंकर बाग ने जुंड पर हमला किया, जिससे सभी मुरिगों में भगदर मच गई, पर भरत का
04:34मन उस भय में भी शांत बना रहा
04:37बाग भरत की असामान्य स्थिर्ता देख चकित रह गया, मानो उसने किसी ऐसे प्राणी को देखा हो जो मृत्यू के
04:45भैसे परे हो
04:46इस अप्रत्याशित पलायन ने उसे अपने आध्यात्मिक अभ्यास की शक्ती का बोध कराया और आसक्ती के बंधनों को तोड़ने का
04:55संकल्प और ग्रिड किया
04:58रितुए बदलती गई और एक कठोर शीत काल आया जिसने वन में भोजन और जल की कमी पैदा कर दी
05:05जिससे सभी प्राणीयों का जीवन संकट में पढ़ गया
05:10जहां अन्य म्रिग भूख और ठंड से व्याकुल थे वहीं भरत अपने मन को शांत रखता और परमात्मा पर ध्यान
05:17केंद्रित कर इस विपरीत परिस्थिती को सहन करता
05:21एक दिन जंगल में शिकारियों के पच्चाप सुनाई दिये जिससे म्रिग जुंड में पुनह भय और बेचैनी खैल गई
05:30भरत ने आसन्न खत्रे को भामपा पर पूर्वजन्म के ज्यान ने उसे सिखाया था कि आसकती ही भय का मूल
05:37है और वह अपने मन को स्थिर रखने का प्रयास करता
05:41उसने अपनी बुद्धी का उप्योग करते हुए जुंड को धीरे धीरे शिकारियों के मार्ग से दूर एक सुरक्षित दिशा में
05:49निर्देशित किया
05:51जुंड बिना किसी विशेश संकेत के अनजाने में भरत के मार्ग गर्शन का अनुसर्ण करता रहा और इस प्रकार वे
05:59सब आने वाली विपत्ती से बच निकले
06:02शन भर के लिए उसे अपने इस रक्षक होने पर संतोश हुआ पर तुरंथ ही उसने स्वयन को धिकारा की
06:09यह भी तो आसकती का ही एक सुक्ष्म रूप था
06:13इस घटना के बाद भरत और भी गहन एकांत में चला गया जहां वह अपनी चेतना को प्रकृती के शोर
06:21से परे आत्मा की गहराईयों में केंद्रित करने लगा
06:25कभी कभी रातरी के सन्नाटे में उसे एक दिव्य प्रकाश या अलौकिक ध्वनी का अनुभव होता जो उसके आध्यात्मिक मार्ग
06:34पर प्रक्ती का संकेत देता
06:36धीरे धीरे उसने जुन्ड के प्रती अपनी आसक्ती को त्यागना शुरू किया केवल एक साक्षी भाव से उन्हें दूर से
06:44देखता बिना किसी लगाव के
06:47उसे स्पष्ट रूप से बोध हुआ कि किस प्रकार आ सकती चाहे कितनी भी सुक्ष्म क्यों न हो पुनरजन्म के
06:55चक्र का कारण बनती है और आत्मा को बांधे रखती है
07:00अंतह उसने इस म्रिग शरीर में ही समस्थ सांसारिक बंधनों को तोड़ने और परम्मोक्ष की प्राप्ती के लिए एकांतवास का
07:09अटल संकल्प लिया
07:11व्रिद्ध म्रिग ने समस्थ संसारिक प्रपंचों से स्वयं को पूर्णता विरक्त कर एक घने शांत वन खंड में अपना अंतिम
07:19आश्रय ढूढ़ा जहां केवल प्रकृती की मौन गूंच सुनाई देती थी
07:25वहां उसने अपने म्रिग शरीर को त्यागने और परमिश्वर श्रीहरी के चर्णों में लीन होने के अटल निश्चय के साथ
07:33गेहन ध्यान में स्वयं को समर्पित कर दिया
07:36उसके शरीर की कांती धीरे-धीरे क्षीन होती गई किन्तु उसकी आखों में दिव्य प्रकाश और संकल्प की अध्भुत अगनी
07:44और भी प्रखर होती जा रही थी
07:47म्रिग देह में रहते हुए भी भरत अपने पूर्व मानव जन्म की स्मृतियों को स्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा
07:55था जिसमें एक छोटी सी आसक्ती ने उसे इस योनी में धकेला था
08:00उसने अपने हृदय में चतुर्भुज श्रीहरी के नीलकमल से भी सुन्दर पावन चर्णों का ध्यान एकागरता से किया जिनके दर्शन
08:09मात्र से परम आनंद की अनुभूती होती है
08:13धीरे धीरे म्रिग शरीर की चेतना क्षीन होती गई और भरत का शुद्ध चेतन मन परम ब्रह्मा में विलीन होने
08:20लगा जैसे नदी सागर में मिलती है
08:24अंतह अपने अंतिम क्षणों में उसने परमेश्वर के चर्णों का ही चिंतन करते हुए पूर्ण था आसकती मुक्थ होकर शान्ती
08:33से अपने प्राण त्याग दिये
08:35म्रिग शरीर से मुक्थ हुई आत्मा एक जोतिरमय प्रकाश पुन्ज के रूप में समस्त कर्म बंधनों से रहित होकर सुक्ष्म
08:43लोक की ओर अग्रसर हुई
08:46उसे किसी भी लोक में नहीं रुकना पड़ा क्योंकि उसने अपने समस्त कर्मों को आसकती रहित होकर पूर्णता शुद्ध कर
08:54लिया था
08:55इश्वरिय कृपा और उसके गहन तप के फल से वह आत्मा अब एक नए पवित्र जन्म के लिए तैयार थी
09:03जहां उसकी आध्यात्मिक यात्रा पूर्णता की ओर बढ़ती
09:07कर्मों के शुद्धिकरण के परिणामस्वरूप उसे इस बार एक अत्यंत पवित्र और ज्यानी ब्राहमन परिवार में जन्म लेने का अफसर
09:16प्राप्थ हुआ
09:18पश्चिमी भारत के विदर्भ शेत्र में एक धर्मनिष्ट ब्राहमन दमपत्ती संतान प्राप्ती की कामना से परमेश्वर का निरंतर भजन कर
09:26रहे थे
09:28एक शुब मुहूर्थ में उस पवित्र ब्राहमन पत्नी के गर्भ में वही जोतिर्मय आत्मा प्रवेश कर गई जिससे उनके मुख
09:36पर एक अलौकिक तेज छा गया
09:39नौ मास उप्रांत उस दमपत्ती के घर तीसरे पुत्र का जन्म हुआ जिसकी आखें जन्म से ही ज्ञान और वैराग्य
09:46के भाव से भरी थी
09:49उसका नाम जड़ भरत रखा गया क्योंकि वह देखने में किसी जड़ प्राणी जैसा निश्क्रय और उदासीन प्रतीत होता था
09:57किन्तु भीतर से वह परम ज्यानी था
10:00जैसे जैसे वह बड़ा होता गया उसकी जड़ता और भी बढ़ती गई वह संसारिक शिक्षाया व्यवहार में कोई रुची नहीं
10:08दिखाता था
10:10उसके मातापिता उसे वेजशास्त्रों का ज्यान देना चाहते थे पर वह केवल मौन रहकर अपने आंतरिक ध्यान में लीन रहता
10:18था
10:20वह सभी संसारिक क्रियाय केवल शरीर के निर्वाह हेतु करता था बिना किसी लगाव या इच्छा के जैसे एक यंत्र
10:28कार्य करता है
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