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कुरुक्षेत्र में महा-मिलन के बाद, भगवान श्रीकृष्ण, बलराम, वसुदेव, देवकी और अन्य महानुभावों के बीच गहन आध्यात्मिक चर्चाएँ होती हैं। इस एपिसोड में, वसुदेव और देवकी अपने पुत्र श्रीकृष्ण से मुक्ति का मार्ग पूछते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें अपने दिव्य स्वरूप का रहस्य समझाते हैं और उनके जन्मों-जन्मों की तपस्या का फल बताते हुए मोक्ष प्रदान करते हैं। यह प्रसंग दिव्य ज्ञान, माता-पिता के प्रति भगवान की लीला और कुरुक्षेत्र में हुए एक विशाल यज्ञ की कहानी है। देखिए कैसे भगवान कृष्ण अपने माता-पिता को परमसत्य का अनुभव कराते हैं! #BhagavataPurana #KrishnaLeela #VasudevaDevaki #Moksha #Kurukshetra #SpiritualJourney #HinduMythology
Transcript
00:00कुरुक्षेत्र के पावन मैदानों पर संध्या की स्वर्णिम आभा बिखर रही थी, जहां पवित्र यग्यों का धुआ और वेद मंत्रों
00:07का गूंजता स्वर पूरे वातावर्ण को एक अलोकिक तपोवन में बदल रहा था.
00:13इस दिव्य सभा के केंद्र में भगवान श्री कृष्ण एक सुसजित स्वर्ण शिला पर विराजमान थे, जिनका दिव्य तेज और
00:21मंद मुस्कान समस्थ उपस्थित भक्तों के हरिद्यों को असीम शांती प्रदान कर रही थी.
00:27श्री कृष्ण के ठीक बगल में बलशाली बलराम जी विराजमान थे, जिनका श्वेट वर्ण और नील वस्त्र उनकी अदमय शक्ती
00:36और शांत गामभीर्य को प्रकट कर रहे थे.
00:40महाराज वसुदेव और माता देव की अपने पुत्रों के समीप बैठे थे, जिनकी आखों में वर्षों के वियोग के बाद
00:47आज संतोश और पर्मानंद के अश्रु बह रहे थे.
00:51दिव्यरिशी वेदव्यास और देवर्षी नारत का सभा में आगमन हुआ, जिन्हें देखकर धर्मराज युधिष्थिर ने अत्यंत आदर पूर्वक उठकर उनका
01:01स्वागत किया.
01:03व्रिंदावन के सीधे साधे निवासी, नंद बाबा और माता यशौदा इस भव्य आध्यात्मिक वातावर्ण में बैठकर अपने कनहया के मुख
01:12मंडल को एक टक निहार रहे थे.
01:15महान धनुर्धर अर्जुन हाथ जोड कर श्री कृष्ण के सम्मुख बैठे थे, जिनके मुख पर अपने सखा और गुरु से
01:23परम ज्यान प्राप्त करने की तीवर जिग्यासा स्पष्ट दिखाई दे रही थी.
01:28सभा की शुरुवात करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने आत्मा की अमर्ता और परमात्मा के साथ उसके शाश्वत संबंध पर
01:36बोलना प्रारंभ किया, जिससे पूरा वातावर्ण शान्थ हो गया.
01:41व्यास जी और नारद मुनी जैसे परम ज्यानियों ने श्री कृष्ण के वचनों पर अपनी सहमती व्यक्त करते हुए मंद
01:48मुस्कान के साथ अपना सिरहिलाया.
01:52महारानी कुंती और माता देव की एक दूसरे का हाथ ठामे हुए अपने जीवन के संघर्षों और अंत्य भगवान विश्नु
02:00की असीम क्रिपा पर चर्चा कर रही थी.
02:03बलराम जी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कर्मयोग के महत्व को समझाया और बताया की कैसे अनासक्त होकर किया
02:11गया करतव यही मनुष्य को बंधनों से मुक्त करता है.
02:16विरिंदावन की गोपिया और गोपिया जो श्रीकृष्ण के प्रेम में मगन थी, एक कोने में शांत बैठी थी, मानोवे केवल
02:24उनके मुख की वानी को नहीं बलकि उनके अंतर्मन के स्पंदन को सुन रही हो.
02:31श्रीकृष्ण ने आकाश की ओर संकेत करते हुए माया के रहस्य को उजागर किया, और बताया कि यह संसार केवल
02:38एक क्षण भंगुर स्वपन है, जिसे अज्ञानी सक्यमान लेते हैं.
02:44वसुदेव जी ने जब श्रीकृष्ण के इन वचनों को सुना, तो उनके मन के संशय दूर होने लगे और उन्हें
02:51अपने पुत्र में परमेश्वर के दर्शन की अनुभूती होने लगी.
02:56द्रौपदी और सुभद्रा एक साथ बैठी थी, जो भक्ती और शर्नागती के रहसियों को सुनकर अपने हृद्यों में एक अध्भूत
03:05शान्ती का अनुभव कर रही थी.
03:07पूरी सभा में दीपकों की कतारें प्रजवलित हो उठीन, जिससे कुरुक्षेत्र का वह शिविर किसी अलौकिक देवलोग के समान चमकने
03:16लगा.
03:18देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों को जंकृत किया, और उनके मधुर कंट से निकले हरिनाम संकीर्तन ने संपूर्ण
03:26वातावर्ण को भक्तिरस से सराबोर कर दिया.
03:30धर्मराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनमरता पूर्वक श्री कृष्ण से पूछा की अशांत समय में भी एक राजा अपने धर्म और
03:37सत्य के मार्ग पर कैसे अडिग रह सकता है.
03:42माता देव की अपने वात्सल्य भाव से उपर उठकर अब यह अनुभव कर रही थी कि उनका पुत्र वास्तव में
03:49समस्त ब्रहमांड का स्वामी और आदिपुरुष है.
03:54कुरुक्षेत्र के उपर तारों से भरा आकाश और चारों और फैला सन्नाटा उस महान सत्य के प्रक्तिकरण की प्रतीक्षा कर
04:02रहा था, जो मानव इतिहास को बदलने वाला था.
04:07कुरुक्षेत्र के विशाल शिविर के एकांत कोने में बैठे वसुदेव और देवकी के मन में संसार की समस्त सुख सुविधाव
04:14के बीच एक गहरा और अनिर्वचनिय वैराग्य उत्पन हो रहा था.
04:19माता देवकी ने वसुदेव की ओर देखते हुए अत्यंत शान्त स्वर में कहा कि कंस के कारागार का वह भीशन
04:26कष्ट और आज का यह राजसी वैभव दोनों ही उन्हें एक बहते हुए स्वपन के समान प्रतीत होते हैं.
04:35वसुदेव ने कुरुक्षेत्र की शान्त रात्री की ओर देखते हुए सहमती में सिरहिलाया और स्विकार किया कि इस विशाल सामराज्यका
04:43एश्वर्य भी उनकी आत्मा को वह परम शान्ती नहीं दे पा रहा है जिसकी उन्हें खोज है.
04:51देवकी के नयनों में आसु भराये जब उन्होंने अपनी अंतरात्मा की इस सत्यता को प्रकट किया कि उनका कनिष्ठ पुत्र
04:59श्रीकृष्न कोई साधारन बालत नहीं, बलकि स्वयन साक्षात नारायन है जो समस्थ स्रिष्टी के नियनता है.
05:08उन्होंने अपनी तीवर अभिलाशा व्यक्त करते हुए कहा कि वे अब इस नश्वर संसार के जन्म और मृत्यू के अन्थीन
05:16चक्र से सदा के लिए मुक्त होकर श्रीकृष्न के चर्णों में मोक्ष प्राप्त करना चाहती हैं.
05:23वसुदेव ने भी अपने हरिदय के द्वंद्व को उजागर करते हुए कहा कि पुत्र मोह का यह अद्रिश्य और कोमल
05:30बंधन ही मुक्ती के मार्ग में सबसे बड़ा स्वर्ण पाश बन गया है जिसे काटना अनिवार्य है.
05:37दोनों ने उन विगत वर्षों का स्मरण किया जब वे अपने मृत बालकों के शोक में डूबे रहे, जबकि साक्षात
05:45ब्रहमाडनायक उनकी गोद में खेल रहे थे और वे उनके वास्तविक स्वरूप को पहचान न सके.
05:52वसुदेव ने तब यह द्रिढ निश्चय किया कि वे श्री कृष्ण के समीप मातापिता के अधिकार से नहीं, बलकि एक
06:00विनीत और ज्यान पिपासु शिष्य के रूप में जाएंगे ताकि वे सत्य का साक्षात कर सके.
06:06शिविर के भीतर की मंद प्रकाशमेई लौ में देवकी के मुख पर छाई वैराग्य की आभा उनके आंतरिक रुपांतरण की
06:14गवाही दे रही थी, जो सांसारिक बंधनों के तूटने का संकेट थी.
06:20अपने मन के संकल्प को सुद्रिढ कर वे दोनों कुरुक्षेत्र की शीतल और तारों से जगमगाती रात में अपने शिविर
06:27से बाहर निकले, जहां दूर कृष्ण का दिव्य निवास चमक रहा था.
06:32हवा में तैरती हुई सुगंधित अगर्बत्ती की महेक और दूर से आती वेदमंत्रों की मंदध्वनी उनके पगों को सीधे श्रीकृष्ण
06:41के भव्य और शांत कक्ष की ओर ले जा रही थी.
06:45जब वे श्रीकृष्ण के निजी कक्ष के समीप पहुँचे, तो उन्हें वहां से एक अलोकिक और शीतल सुवर्ण प्रकाश उचसर्जित
06:53होता हुआ दिखाई दिया जो नक्षत्रों की कांती को भी फीका कर रहा था.
06:58द्वार पर खड़े मौन यादव प्रहरी इस दिव्य युगल को आदर पूर्वक प्रणाम कर पीछे हट गए, मानो वे इस
07:06आध्यात्मिक मिलन के साक्षी बनने के लिए पहले से ही तयार थे.
07:11जैसे ही वसुदेव और देवकी ने कक्ष के भीतर प्रवेश किया, उन्होंने श्रीकृष्ण को अत्यंत शांत और ध्यानमई मुद्रा में
07:19विराजमान देखा, जिनके दर्शन मात्र से ही उनकी सारी चिंताये विलीन हो गई.
07:26श्रीकृष्ण के उस दिव्यश्यामल शरीर से निकलने वाली नीलध्वल किरने पूरे कक्ष को आलोकित कर रही थी, और उनके होटों
07:34की मंद मुस्कान उनके मातापिता के अंतर्मन के विचारों को पहले से ही जानती हुई प्रतीत होती थी.
07:41देवकी का हृदय अब मात्रित्व की मंतामई चिंता से मुक्त होकर पूर्णत शर्नागती के भाव से भर गया, जब उन्होंने
07:49अपने पुत्र के दिव्य और विशाल नेत्रों में संपूर्ण ब्रहमांड की जलक देखी.
07:55वसुदेव ने अत्यंत श्रधापूर्वक अपना मस्तक जुका दिया और उन्हें अपने मस्तक पर धारन किया हुआ राजमुकुट श्रीकृष्ण के चर्णों
08:04की धूल के सम्मुख अत्यंत तुछ प्रतीत होने लगा.
08:08अपने इस अलोकिक पुत्र के सम्मुख खड़े होकर दोनों ने अपने हाथ जोड लिये और अपने लोकिक संबंधों की सीमाओं
08:16को पार कर मोक्ष की उस गुहार को लगाने के लिए स्वयन को तैयार किया.
08:21उस दिव्यकक्ष का वातावर्ण एक तीवर और पवित्र आध्यात्मिक उर्जा से स्पंदित होने लगा, जिसने भौतिक संसार के अस्तित्व को
08:30उनके लिए क्षणभर में समाप्त कर दिया.
08:34श्रीकृष्ण ने अपनी असीम करुणा से भरी आखें उपर उठाई और अपने मातापिता के जन्मजन्मांतर के बंधनों को काटने के
08:42लिए उस महाज्यान के प्रक्टिकरण की भूमिका तैयार की.
08:47श्रीकृष्ण की आखों में एक असीम सर्वग्यता पूर्ण चमक थी, जिसने उसक्षण हर भौतिक बंधन और अपेक्षा को जलाकर राख
08:56कर दिया.
08:57तभी उस दिव्यकक्ष में एक अभूत पूर्व सुगंध और उर्जा का संचार हुआ, जैसे स्वयं ब्रह्मांड के द्वार किसी अलौकिक
09:06उपस्थिती के लिए खुल रहे हो.
09:09आकाश से एक स्वर्णिम प्रकाश पुंज धर्ती की ओर उत्रा, जो धीरे-धीरे आकार लेने लगा, जैसे कोई अद्रिश्य शक्ती
09:17दिव्य ज्ञान को साकार कर रही हो.
09:20उस प्रकाश के मध्य से महर्शी नारद, वेदव्यास, असित, देवल और कई अन्य तपस्वी रिशिगन प्रकट हुए, जिनकी आभा से
09:29पूरा कक्ष और भी डैदी प्यमान हो उठा.
09:33समस्त रिशिगनों के मुख मंडल पर तपस्या का तेज और ज्यान की शांती स्पष्ट जहलक रही थी, मानोवे स्वय वेदों
09:41के सजीव प्रतीख हुँ.
09:43वसुदेव और देवकी ने उन महान रिशियों को अपने सम्मुख देख कर तुरंट साष्टान प्रणाम किया, उनके मन में श्रध्धा
09:51और कृतज्यता का अपार सागर उमड पड़ा.
09:55नारद मुनी अपनी दिव्यवीना के मधुर कमपन के साथ वसुदेव और देवकी को संबोधित करते हुए संसार की क्षणभंगुर्ता और
10:04आत्मा की अमर्ता पर उपदेश देने लगे.
10:08उन्होंने समझाया कि यह भौतिक शरीर केवल एक वस्त्र के समान है, जिसे आत्मा बार-बार धारन करती और त्याक्ती
10:16है, जबकि आत्मा स्वया अविनाशी और शाश्वत है.
10:21वेदव्यास जी ने अपने गंभीर और प्रभावशाली स्वर में कर्म के गूढ नियमों का वर्णन किया, बताते हुए की कैसे
10:28हर क्रिया, चाहे वह शुब हो या अशुब अपने फल को अवश्य जन्म देती है.
10:35उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मफल से मुक्ती केवल निश्काम भाव से किये गए कर्मों और इश्वरिय शर्नागती से
10:43ही संभव है.
10:45असित मुनी ने माया के आवर्ण और संसार के भ्रमजाल को खोल कर समझाया, जिससे जीवात्मा बार-बार जन्ममृत्यू के
10:53चक्र में भटकती रहती है.
10:56देवल रिशी ने मोक्ष की परम अवस्था को प्राप्त करने के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण और मन की एकागरता के
11:03महत्व पर जोर दिया.
11:06अन्य रिशिग्णों ने भी सामुहिक रूप से आत्मा परमात्मा के संबंध, प्रकृती के त्रिगुनों और जीवन के अंतिम लक्ष्य के
11:14विशय में गेहन विवेच ना की.
11:17वसुदेव और देवकी के मन में इन उपदेशों से एक नई जागरती उत्पन हुई, मानो वर्षों से धका अज्ञान का
11:24परदा हट गया हो.
11:26नारग मुनी ने फिर से वानी संभाली, अब भक्ती मार्ग के सर्वोप्री महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह
11:34सभी दुखों का अंतिम समाधान है.
11:37उन्होंने समझाया कि निशकाम प्रेम और निरंतर स्मरण से ही मनुष्य इश्वर के निकट्तम आ सकता है, और यही परम
11:45मुक्ती का एक मात्र सुगमपत है.
11:49व्यास जी ने पुष्टीकी की साक्षात भगवान श्रीहरी ही सर्वोच आराध्य हैं, जिनकी भक्ती से सभी संशय और बंधन स्वतह
11:57ही मिट जाते हैं.
12:00देवकी की आखों से अश्रुधारा बहन निकली, उनके मात्रि प्रेम ने अब एक अलोकिक विशुद्ध भगवत प्रेम का रूप ले
12:08लिया था.
12:10वसुदेव का मन भी संसार के सभी बंधनों से मुक्त होकर, केवल अपने पुत्र रूपी परमिश्वर की और पूर्णत है
12:17समर्पित हो गया.
12:19अपने उपदेशों को पूर्ण कर, सभी रिशिग्णों ने एक साथ भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और फिर धीरे धीरे उसी
12:27स्वर्णिन प्रकाश पुंझ में विलीन होकर अग्रिश्य हो गए.
12:32रिशियों के दिव्य प्रकाश पुंझ के विलीन होते ही, वसुदेव जी और देवकी के हृदय में एक गहन शान्ती और
12:39परमार्थ की तीवर आकांक्षा जागरत हो उठी, जिसने उन्हें सांसारिक बंधनों से मुक्ती की ओर प्रेरित किया.
12:47इस आत्मिक जागर्ण के क्षण में, वसुदेव जी ने अपनी द्रिश्टी सामने बैठे अपने पुत्र भगवान श्री कृष्ण और बलराम
12:55पर केंद्रित की, उनके दिव्य स्वरूक में वे अब केवल पुत्र नहीं, अपितु स्वयं परमेश्वर को देख रहे थे.
13:03उनके मन में रिशियों द्वारा प्रदान किया गया ज्यान गूंज रहा था, जिसने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि उनके समक्ष
13:11साक्षात मुक्षदाता विराजमान हैं, और यह क्षण उनसे परमार्थ की प्रार्थना करने के लिए सबसे उप्युक्त है.
13:19एक गहरी सांस भरकर वसुदेव जी ने अपने मन में संकल्प लिया और विनमर्ता पूर्वक परंतु द्रिड़ता के साथ भगवान
13:28श्रीकृष्ण और बलराम की ओर बढ़ने लगे, प्रतेक कदम उनके आध्यात्मिक पत्थ पर बढ़ता एक मील का पत्थर था.
13:37देव की अपनी आखों में पवित्र अश्रुलिये, अपने पती के इस पवित्र संकल्प को समझ गई और मौन रहकर अपने
13:45हृदय की गहराई से उन्हें समर्थन और शुभकाम नाय दी, उनकी आत्माए एक ही लक्षे की ओर उनमुख थी.
13:54वसुदेव जी अंत्तह भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के समक्ष एक सम्मान जनक दूरी पर रुके उनका हृदय भावों से भरा
14:01था, किन्तु उनके मुख पर एक शांत और पवित्र द्रिड़ता स्पष्ट थी.
14:07भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य मुस्कान और करुणामई द्रिष्टी से अपने पिता के हृदय की समस्थ इच्छाओं को जानते हुए, उन्हें
14:16एक्स नही और आश्वासन देने वाली मुद्रा में स्विकार किया.
14:20गहरे सम्मान और अटूट श्रद्धा के साथ वसुदेव जी ने भगवान श्रीकृष्ण और भगवान बलराम के चर्णों में साष्टान प्रणाम
14:29किया, उनके आसूओं ने उनके दिव्य चर्णों को पवित्र कर दिया.
14:34करुणामय भगवान श्रीकृष्ण ने तुरंट अपने पिता को अपने कोमल हाथों से उठाया, और बलराम जी ने भी अपने बड़े
14:42भाई के रूप में प्रेम पूर्वक सहारा दिया, मानों वे उनके पिता के हरिदय की पीड़ा को शांत कर रहे
14:48हों.
14:50अपनी आखों में नमरता और मुख पर आध्यात्मिक भोख लिये, वसुदेव जी ने कापते हुए स्वर में अपनी प्रार्थना आरंभ
14:58की, जो उनके हरिदय की अनंत श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक थी.
15:03उन्होंने अत्यंत विनमरता से अपने पुत्रों से प्रार्थना की कीवे उन्हें और देवकी को जन्ममरत्यू के इस गहन चक्र से
15:11मुक्ती दिलाएं, जिससे वे अनेक जन्मों से बंधे हुए थे, और उन्हें परम गती प्रदान करें.
15:18उन्होंने अपने पुत्रों से यह भी याचना की की वे उन्हें उस परम सत्य का ज्यान प्रदान करें, जिससे वे
15:25सभी सांसारिक आसक्तियों मोह और अज्यानता के बंधनों से उपर उठ सकें
15:32देव की वसुदेव जी के पीछे खड़ी होकर अपने हृदय में उन्ही भावनाओं को दोहराती हुई, मौन रहकर अपने पती
15:40की प्रार्थना में सहभागी बनी, उनकी आखों में मोक्ष की आशा चमक रही थी
15:46भगवान श्रीकृष्ण अपने पिता की इस गेहन और निश्कपट प्रार्थना को अत्यंत गंभीरता और प्रेन से सुन रहे थे, उनके
15:55दिव्यमुख पर ब्रहमांड की अनंत करुना और ज्यान जलक रहा था
16:00भगवान बल्राम भी अपने भाई के साथ खड़े होकर अपनी शांत और सौमे उपस्थिती से उस पवित्र वातावर्ण को और
16:08अधिक गरिमामय बना रहे थे, उनकी आखों में असीन धैर्य और करुना थी
16:14वसुदेव जी ने अपने जीवन के सभी संधर्षों, कारावास की यातनाओं और अपने दिव्य पुत्रों की लीलाओं को देखने के
16:22अनमोल अनुभवों को शब्दों में पिरोया, जिससे उनकी प्रार्थना और भी मारमिखो उठी
16:29उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपी वे स्वयन परम भगवान के मातापिता होने का सौभाग्य रखते हैं, फिर
16:37भी बिना परम सत्य के ज्यान के वे अभी भी भौतिक अस्थित्व के बंधनों से जक्रे हुए हैं
16:44अंतिम बार उन्होंने पूरी आस्था और अटूट विश्वास के साथ अपने और देवकी के लिए ही नहीं, बलकि उन सभी
16:52उपस्थित आत्माओं के लिए भी आध्यात्मिक स्वतंत्रता की भीख मांगी, जो उनके दोहक की साक्षी रही थी
17:01वसुदेव जी की निश्कपट प्रार्थना को सुनकर, भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य मुस्कान और भी गहरी हो गई, जो उनके पिता
17:09के पवित्र हरिदय और उनकी असीन भक्ती को स्विकार कर रही थी
17:14पूरे कुरुक्षेत्र के सभा में एक गहरी शान्ती चा गई, सभी उपस्थित आत्माय भगवान के दिव्य उत्तर की प्रतीक्षा में
17:23थी, जैसे अनंतकाल से एक क्षण में सिमट गया हो
17:27कुरुक्षेत्र की शान्त सभा में श्री कृष्ण ने अपने गंभीर और मधुर स्वर में बोलना प्रारंभ किया, जिससे संपूर्ण वातावर्ण
17:35दिव्य तरंगों से गुंजायमान होग उठा
17:39भगवान श्री कृष्ण ने धीरे से अपना दाहिना हाथ उठाया और उनके शरीर से एक सौमय स्वर्णिम ब्रहमान्डिय प्रकाश निकल
17:47कर वसुदेव और देवकी को अपनी शरण में लेने लगा
17:52उन्होंने अपने व्याकुल मातापिता से कहा कि वे साधारन मनुष्य नहीं है और उनका यह संबंध केवल इसी एक अस्थाई
18:01जीवन तक सीमित नहीं है
18:04श्रीकृष्ण ने उनके समक्ष अपनी पहली ब्रहमान्डिय लीला का अनावरण किया जिससे उनके मानस पटल पर सत्यूप के प्राचीन काल
18:12के चित्र सजीव हो उठे
18:15उन्होंने उन्हें स्मरण कराया कि पूर्व जन्म में वे प्रिश्नी और प्रजाप्ती सुथपा थे जिन्होंने भगवान को प्राप्त करने के
18:23लिए हजारों वर्षों तक घोर तपस्या की थी
18:27हवा और सूखे पत्तों पर जीवित रहकर उन्होंने शीत, ग्रीश्म और वर्षा के भयानक थपेडों को सहते हुए अपने मन
18:35को केवल परब्रम में विलीन कर दिया था
18:38उनकी इस अनन्य और निश्चल तपस्या से अत्यंत प्रसन्न होकर साक्षात चतुर्भुज भगवान विश्नु शंक, चक्र, गदा और पद्मधारण कर
18:48उनके सामने प्रकट हुए थे
18:51जब भगवान ने उनसे वर्दान मांगने को कहा, तो उनकी दिव्य माया से मोहित होकर उन्होंने भगवान के समान ही
18:58दिव्य गुनों वाले पुत्र की कामना कर ली थी
19:02चुंकि इस अनन्त ब्रह्मांड में परमात्मा के समान दूसरा कोई नहीं है, इसलिए स्वयं भगवान ने ही उनके गर्भ से
19:10प्रिश्निगर्भ के रूप में पहला अवतार लिया था
19:14इसके पश्चात दूसरे जन्म में वे देव माता अदिती और महर्शी कश्यप के रूप में अवतरित हुए जो देवताओं के
19:22पूझनिय माता पिता कहलाए
19:24उस समय भगवान ने उनके यश को बढ़ाने और इंद्र को स्वर्ग का राज्य पुनह दिलाने के लिए वामन अवतार
19:31धारण किया था
19:33और अब इस तीसरे जन्म में वे देवकी और वसुदेव बने हैं और उन्होंने अपने उसी पुरातन वचन को पूर्ण
19:41करने के लिए कृष्ण के रूप में जन्म लिया है
19:45जैसे जैसे श्री कृष्ण यह रहस्य प्रकट कर रहे थे उनका मानविय रूप अत्यंत विशाल और अलौकिक आभा से युक्त
19:53होने लगा
19:55वसुदेव और देवकी ने विस्मय से देखा कि उनके पुत्र के चारों और अनंतकाल, तारे, नक्षत्र और पूरा ब्रहमांड चक्कर
20:03लगा रहा था
20:06देवकी के हृदय से सांसारिक मोह और दुहक का अंधकार मिट गया और उसका स्थान आत्म ज्यान और परम शांती
20:13ने ले लिया
20:15वसुदेव जी को भी अनुभव हुआ कि उनका पुत्र ही संपूर्ण स्रिष्टी का स्वामी और परम मोक्ष का एक मात्रद्वार
20:23है
20:24श्री कृष्ण ने उन्हें आशिर्वाद देते हुए आश्वासन दिया कि उनके इस दिव्य ज्यान से वे जन्म और मृत्यू के
20:32चक्र से सदा के लिए मुक्थ हो जाएंगे
20:35इस परम सत्य के प्रक्टी करण को देख कर स्वर्ग से देवताओं ने हर्शित होकर पुष्पों की वर्शा करना प्रारंभ
20:43कर दिया
20:45बलराम जी भी कृष्ण के पास खड़े होकर अपनी दिव्य मुस्कान बिखेर रहे थे जो उनके इस सन्युक्थ परम अवतार
20:52की महिमा को दर्शा रही थी
20:55कुरुक्षेत्र की उस पवित्र भूमी पर वसुदेव और देव की परम आनंद की स्थिती में मगन होकर बैठ गए जहां
21:03उन्हें मोक्ष का वास्तविक रहस्य प्राप्थ हो चुका था
21:07श्रीकृष्ण के अलौकिक तेज में विलीन होते ही वसुदेव जी ने अपनी आखे मूंद ली और उनके हृदय से संसार
21:15के सभी मोहबंधन पल भर में विलीन होने लगे
21:19देवकी के नैनों से बहते हर्ष के अश्रु उनके अंतर्मन की उस परम शान्ती को दर्शा रहे थे जहां जन्मों
21:26की पीड़ा अब शाश्वत आनंद में बदल चुकी थी
21:30अपने मातापिता की इस अगाद श्रद्धा को देख कर भगवान श्री कृष्ण ने अपना अभय हस्त उठाया जिससे संपून ब्रहमांड
21:39में शान्ती की एक नई लहर दौड गई
21:43बलराम जी ने भी अपनी सौमय मुस्कान के साथ अपने हल को भूमी पर टिकाया, मानों वे अपने मातापिता के
21:50जीवन के संधर्शों के अंत की घोशना कर रहे हूँ
21:55वसुदेव जी के हरिदय से निकला एक दिव्यस वर्णिन प्रकाश सीधे श्री कृष्ण के चर्णों में जाकर विलीन हो गया,
22:02जो उनकी आत्मा के पूर्ण समर्पन का प्रतीक था
22:06उसी क्षण देवकी को अपने भीतर ओम की अनाहत ध्वनी सुनाई देने लगी, जिसने उनके शरीर के रोमरों को परम
22:14आनन्द से स्पंदित कर दिया
22:17कुरुक्षेत्र की वह पवित्र भूमी, जहां कभी युद्ध की विभीशिका अनकित थी, अब वसुदेव देवकी के मोक्ष के तेज से
22:25सोने की तरहे चमकने लगी थी
22:28श्रीकृष्ण ने अत्यंत मधूर स्वर में कहा कि हे माता, हे पिता, अब आपके प्रित्वी पर आगमन का उद्देश पूर्ण
22:36हो चुका है और आप परमधाम के अधिकारी बन चुके हैं
22:41आकाश में देवर्शी नारद और महर्शी व्यास प्रकट हुए, जिन्होंने अपनी वीना और मंत्रो चार से इस दिव्यमोक्ष उत्सव का
22:49स्वागत किया
22:51वसुदेव जी का वृद्ध शरीर अब एक दिव्य तेजस्वी स्वरूप में बदलने लगा, मानो उनकी नश्वर काया ने देवत्व को
23:00धारण कर लिया हो
23:02माता देवकी के चहरे पर भी वही शाश्वत योवन लौट आया, जो उनके गोलोग की नित्यदासी होने के दिव्य स्वरूप
23:10को प्रकट कर रहा था
23:12एक अत्यंत पवित्र और शीतल प्रकाश की धारा स्वर्ग से उत्री और उसने दोनों पतिपत्नी को एक दिव्य सुरक्षा चक्र
23:20में पूरी तरह से लपेट लिया
23:23श्री कृष्ण ने उन्हें आश्वस्त किया कि संसार का यह जन्म मन का चक्र अब आपके लिए सदा के लिए
23:30समाप्थ हो गया है
23:33बलराम जी ने अपने हाथों को जोड कर अपने मातापिता के इस महाप्रयान को नमन किया जिससे उनके परम आदर
23:41और श्रद्धा का प्रक्टिकरण हुआ
23:44स्वर्ग के गंधरवों ने अपने दिव्य वाध्यों पर मधूर संगीत बजाना शुरू कर दिया जिससे कुरुक्षेत्र का कंकन भक्तिरस में
23:52डूग गया
23:54वसुदेव और देवकी के पार्थिव शरीर अब पूरी तरह से कपूर की भाती बिना कोई अवशेश छोड़े उस दिव्य जोती
24:01में विलीन हो गए
24:03श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य इच्छा से गोलुक वरिंदावन का द्वार खोल दिया, जहां से अलोकिक सुगंध और मयों का
24:11मधूर स्वर आने लगा था
24:14परमधान से दो अत्यंत सुंदर प्रकाशमान दिव्य रत कुरुक्षेत्र की भूमी पर उत्रे जिन्हें देखकर उपस्थित सभी राजा दंग रह
24:22गए
24:24अपने दिव्य बालकों को अंतिनबार कृतग्यता से देखते हुए, वसुदेव और देवकी की आत्माएं उन दिव्य रतों पर आरूढ होकर
24:32वैकुंठ की ओर बढ़ चली
24:35कुरुक्षेत्र में उपस्थित संपूर्ण जनसमूह ने इस परम मोक्ष के दर्शन कर भगवान श्री कृष्ण की जय जयकार की, जिससे
24:43तीनों लोग गुंच गुठे
24:46कुरुक्षेत्र की पावन भूमी पर देवताओं के प्रस्थान के बाद फैली उस परम शांती के बीच संपूर्ण सभा आध्यात्मिक चेतना
24:54से सराबोर हो उठी
24:57अपने माता पिता के परम मोक्ष के इस अलोकिक द्रिश्य से विस्मित होकर वसुदेव जी ने लोग कल्यान और पूर्वजों
25:04के उद्धार हेतु एक महान अश्वमेध यग्य का पावन संकल्प लिया
25:10पिता के इस धर्ममय संकल्प को सुनकर पूर्ण पुरुशोत्तम भगवान श्री कृष्ण ने मंदमंद मुस्कुराते हुए अत्यंत प्रेम और आदर
25:18से अपनी सहमती प्रदान की
25:21भगवान बलराम ने भी अपने विशाल कंधे पर हल धारन किये हुए अपने पिता के इस कल्यानकारी संकल्प का पूर्ण
25:29समर्थन किया और अपनी दिव्य शक्ती से यग्य की रक्षा का दायत्व संभाला
25:35वेद व्यास और देवर्शी नारद जैसे महान रिशियों ने कुरुक्षेत्र की भूमी पर आकर इस महायग्य के विधान को शास्त्रसंबत
25:44रूप से संचालित करने का दायत्व अपने हाथों में लिया
25:47इस विशाल यग्य के संकल्प की घोशना सुनते ही कुरुक्षेत्र में उपस्थित संपूर्ण आर्यावर्थ के राजाओं में अत्यंत हर्ष और
25:57भक्ती का संचार हो गया
25:59देवशिल्पी के मार्ग दर्षन में कुशल कारीग्रों ने कुरुक्षेत्र के पावन मैदान में सोने, चांदी और मूल्यवान रत्नों से सुसजित
26:08एक भव्य यग्यशाला का निर्मान आरंभ किया
26:11इस यग्य के लिए एक अत्यंत सुन्दर, तेजस्वी और श्यामकर्ण श्वेत अश्व का चयन किया गया, जिसके मस्तक पर विजय
26:20पत्र और स्वर्ण की पट्टि का बांधी गई
26:23पवित्र मंत्रो चार के बीच गंगा और अन्य पवित्र नदियों के जल से उस दिव्य अश्व का अभिशेक किया गया,
26:31जिससे उसका तेज और अधिक बढ़ गया
26:34अंत्र विजय के प्रतीक उस पावन अश्व को प्रित्वी की परिक्रमा के लिए छोड़ दिया गया, जिसकी रक्षा के लिए
26:42यादव सेना के वीर योध्धा ततपरता से उसके पीछे चले
26:46तभी देवर्शी नारद अपनी महती वीना बजाते हुए आकाश मार्ग से अवत्रित हुए और नारायन के दिव्य नाम संकीर्तन से
26:55यज्य भूमी को गुंजाय मान कर दिया
26:58देश देशांतर से आये राजाओं ने अपने अपने राज्यों की सर्वोत्तम मनिया, स्वर्ण आभूशन और बहुमूल्य वस्त्र इस महायज्य में
27:07समर्पित करने के लिए प्रस्तुत किये
27:10वैदिक पुरोहितों ने अर्णी मन्थन द्वारा यग्य की पावन अगनी को प्रकट किया, जिसकी स्वर्ण में लप्ते आकाश की ओर
27:18उठकर दिशाओं को पवित्र करने लगी
27:21वसुदेव जी अपनी धर्म पत्नी देवकी के साथ यजमान के रूप में कुषके आसन पर विराजमान हुए और उन्होंने अत्यंत
27:30श्रधा पूर्वक यग्य का संकल्प पूर्ण किया
27:33भगवान श्रीकृष्ण अपने मातापिता के पीछे विराजमान होकर अपनी दिव्यद्रिष्टी से यग्य की हर क्रिया को आशिर्वात प्रदान कर रहे
27:42थे
27:44बलराम जी ने यग्य की सामगरी और सुवर्ण पात्रों की व्यवस्था संभालते हुए यह सुनिश्चित किया कि वैदिक नियमों का
27:52रत्ती भर भी उलंगन न हो
27:54सक्डो मूर्धन यब्राहमनों के कंट से फूटते हुए सामवेद के मंत्रों ने संपूर्ण कुरुक्षेत्र के वातावर्ण को एक अलोकिक और
28:03दैवियस पंदन से भर दिया
28:05इस अफसर पर लाखों निर्धनों और सन्यासियों को मंचाहा अन्न, वस्त्र और स्वर्ण दान किया गया जिससे यग्यभूमी पर संतोष
28:14और आनंद का सामराच जिछा गया
28:17यग्य की इस पवित्रता से प्रसन्न होकर देवलोक के देवता बादलों के पीछे से प्रकट हुए और उन्होंने यग्यशाला पर
28:26मंदार के पुश्पों की वर्षा की
28:28इस प्रकार कुरुक्षेत्र में आरंभ हुआ यह अश्वमेध यग्य समस्थ संसार के पापों के शमन और एक नए धर्मयुक की
28:37स्थापना का साक्षी बन गया
28:40कुरुक्षेत्र की पावन यग्यभूमी पर उपस्थित समस्त रिशियों और मुनियों ने भगवान श्री कृष्ण की दिव्य लीलाओं का गान करने
28:48के लिए एक परम पवित्र सभा का आयोजन किया
28:52व्यासपीट पर विराजमान परम ज्यानी महर्शी वेदव्यास ने अत्यंत गंभीर और सुरीले स्वर में भगवान के अजन्मा और अविनाशी स्वरूप
29:01की व्याख्या करना आरंभ किया
29:04देवर्शी नारद ने अपनी महती वीना के तारों को जंकरित करते हुए भगवान श्री कृष्ण के गोकुल और व्रिंदावन के
29:11मधुर बालचरित्रों का कीर्टन शुरू किया जिससे संपूर्ण सभा मंत्र मुग्ध हो गई
29:18यग्यशाला के पवित्र वातावर्ण में रिशियों ने उस अद्भुत क्षण का स्मरण किया जब नन्हे कृष्ण ने कंस द्वारा भेजी
29:25गई भयंकर राक्षसी पूतना का उद्धार कर उसे परमगती प्रदान की थी
29:31सभा में उपस्थित मुनियों ने यमुना के विशैले जल को शुद्ध करने वाले कालिय नाग के मरगन की रोमाचक कथा
29:39का सजीव वर्णन किया
29:41गोवर्धन परवत को अपनी कनिष्ट उंगली पर उठा कर इंद्र के अहंकार को नश्ट करने और व्रजवासियों की रक्षा करने
29:49वाली प्रभु की लीला का गान सुनकर सभी भक्त-भक्त भाव विभोर हो उठे
29:55रिशियों ने उस विस्मयकारी क्षण की चर्चा की जब माता यशोदा ने बालक कृष्ण के ननहे से मुख में संपून
30:02ब्रहमांड, चर्रचर और कोटी-कोटी नक्षत्रों के दर्शन किये थे
30:07परम ज्यानी रिशी पिप्पलायन ने गंभीर वानी में भगवान श्री कृष्ण को प्रकृती से परे, समस्ट स्रिष्टी के आदी, मध्य
30:15और अंत के एक मात्र परम पुरुष के रूप में स्थापित किया
30:20यग्य के मध्य में ज्यानी संतों ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के आदर्श चरित्र और उनके धर्मसंस्थापन के महान
30:28संकल्प का स्मरण करते हुए कृष्ण के साथ उनकी अभिंता बताई
30:34रिशियों ने अत्यंत श्रद्धा पूर्वक भगवान के वराह अवतार का गुनगान किया जिन्होंने पाताल लोक से प्रित्वी देवी का उद्धार
30:42कर स्रिष्टी की मर्यादा को अक्षुन रखा था
30:46भक्त प्रहलाद की रक्षा हेतु खंभे को चीर कर प्रकट होने वाले भगवान द्रिसिन्ह के उग्र और करुनामय स्वरूप की
30:54चर्चा से पूरी यग्यशाला में असीम श्रद्धा का संचार हो गया
30:59अपने प्राणप्रिय पुत्र की इन अलौकिक लीलाओं और अनंत महिमा को सुनकर महाराज वसुदेव और माता देवकी के नेत्रों से
31:07प्रेमाश्रूओं की अविरल धारा बहने लगी
31:10कुलगुरु महर्शी गरगाचार्य नेकाराग्रेह में प्रभू के प्राकट्य और उनके जन्म से जुड़े उन गुप्त रहसियों को उजागर किया जिन्हें
31:19सुनकर वसुदेवजी का हृदय गदगद हो उठा
31:23सभा में उपस्थित रिशियों ने गोलोक व्रिंदावन के उस नित्य आनंदमय धाम का वर्णन किया जहां प्रभू अपनी हलादिनी शक्ती
31:31श्री राधाजी और गोपियों के साथ महारास रचाते हैं
31:36पवित्र यज्यवेदी की प्रजवलित अगनी से उठती हुई दिव्य रश्मियों में उपस्थित भक्तों को भगवान विश्नु के अनंतरूपों और शंक्च
31:45क्रकदाधारी चतुर्भुच स्वरूप की अलोकिक जलक दिखाई देने लगी
31:50ज्यानी रिशियों ने स्पष्ट किया कि कर्मकांड और कठिन तपस्या की तुलना में भगवान श्री कृष्न के प्रती अनन्य प्रेन
31:57और निश्काम भक्ती ही मोक्ष प्राप्ती का सबसे सुगम्मार्ग है
32:03सभा के मध्य में विराजमान योगेश्वर श्री कृष्न स्वयं अत्यंत सौमय और शांत भाव से रिशियों द्वारा किये जा रहे
32:11अपने ही यश्गान को मंदमंद मुस्कुराते हुए सुन रहे थे
32:15श्री कृष्न के पार्श्व में खड़े बलशाली बलरामजी अपने दिव्यहल और मुसल को धारण किये हुए अपने अनुचकी इस महिमा
32:24को सुनकर अत्यंत हर्षित और गौरवानवित हो रहे थे
32:27इस पावन चर्चा से प्रसन्न होकर देवलोग के देवताओं ने यग्यमंडप पर दिव्यकल्पवरिक्ष के सुगंधित पुष्पों की वर्षा की और
32:37गंधर्वों ने आकाश से मधुर दुन्दु भी बजाई
32:41अंतह संपूर्ण सभा, समस्त राजागन, रिशिमुनी और सामान्य जन भगवान श्रीकृष्ण के परब्रहम स्वरूप के ध्यान में लीन होकर परमशान्ती
32:50और मोक्ष के सागर में गोता लगाने लगे
32:54जब ध्यान की गहेन निरवता कुरुक्षेत्र की इस पावन सभा में छाई, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने होठों पर एक
33:02अत्यंत मनमोहक और दिव्य मुस्कान लाते हुए अपने उपदेशों का अमरित प्रवाहित करना प्रारंभ किया
33:09परमज्यानी देवर्शी नारद और महर्शी वेदव्यास जैसे महान संत उनके सम्मुख बैठकर इस दिव्य प्रवचन को सुनने के लिए अपने
33:18हाथ जोड़कर अत्यंत उच्सुकता और गहरी श्रधा प्रकट करने लगे
33:23श्री कृष्ण ने सर्वप्रथम कर्मयोग की व्याख्या की और बताया कि किस प्रकार इश्वर को समर्पित होकर किये गए निश्काम
33:32कर्म मनुष्य को संसार के बंधनों से पूर्णता मुक्त कर देते हैं
33:37इस गेहन उपदेश को सुनकर सभा में उपस्थित अनेक राजा और महारत ही अपने मुकुट जुकाए निश्काम कर्म के वास्तविक
33:46अर्थ को गहराई से समझते हुए अपने अहंकार को त्यागने लगे
33:51फिर भगवान ने ज्ञानयोग का द्वार खोला जिसमें उन्होंने आत्मा की अमर्ता और शरीर के नश्वर होने का परम सत्य
33:59अत्यंत सहट शब्दों में प्रकट किया
34:02महामुणी वेदव्यास ने भगवान के इस ज्ञान को सुनकर अत्यंत प्रसंता पूर्वक अपना सिरहिलाया मानोवे शास्त्रों के परम रहस्य को
34:11साकार होते देख रहे हुँ
34:14तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने भक्तियोग का वर्णन आरंभ किया और इसे सभी मार्गों में सबसे सरल श्रिष्ट तथा स्वयन से सीधे
34:23जोडने वाला दिव्य मार्ग घोशित किया
34:26गोपी गोपियों की आखों से अश्रूओं की धारा बहने लगी जब उन्होंने सुना की केवल अनन्य प्रेम और पूर्ण समर्पन
34:34से ही उस परमिश्वर को वश में किया जा सकता है
34:39भगवान के परम्मित्र और अनन्य भक्त उद्धव ने अपने दोनों हाथ जोड कर अत्यंत भाव विभोर होकर अपने नेत्र बंद
34:46कर लिए और इस भक्तिरस में पूरी तरह डूब गए
34:51माता देव की और पिता वसुदेव अपने पुत्र के इस अलौकिक ज्यान को सुनकर विस्मित रह गए और वे सोचने
34:58लगे कि यह केवल उनका पुत्र नहीं बलकी साक्षात परब्रहम है
35:03इस पावन बेला में देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों को छुआ और भगवान के वचनों के साथ एक
35:11अत्यंत मधुर और दिव्यराग छेड़ दिया जिससे समस्त वातावर्ण गुंजायमान हो उठा
35:17श्री कृष्ण ने समझाया कि भक्ती में न कोई जाती होती है, न कोई वर्ग और जो भी जीव प्रेम
35:24से उन्हें केवल एक पत्र पुष्प्या जल अर्पित करता है, उसे वे स्विकार करते हैं
35:31नंद बाबा और माता यशोदा, जो सभा के एक कोने में बैठे थे, अपने कनहया की इस विराट महिमा को
35:39देखकर वातसल्य और आध्यात्मिक आनंद के सागर में डूब गए
35:44यग्य की पावन अगनी भी भगवान की वानी के प्रभाव से और अधिक प्रजवलित हो उठी, मानो वह भी इस
35:51दिव्यज्ञान के प्रकाश को संपून ब्रहमांड में फैलाना चाहती हो
35:57दूर्दराज के राज्यों से आये राजाओं ने अपने अहंकार के प्रतीक अस्त्रशस्त्रों को भूमी पर रख दिया और वे पूर्णता
36:04भगवान श्रीकृष्ण के चर्णों में नत्मस्तक हो गए
36:09बल्शाली बल्रामजी अपने अनुज श्रीकृष्ण के निकट खड़े होकर अत्यंत गर्व और प्रसन्नता से मुस्कुरा रहे थे और उनका दिव्यहल
36:17और मुसल भी शांत भाव से सुशोभित था
36:21श्रीकृष्ण ने उद्गोष किया कि जो मनुष्य सब धर्मों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आता है वे स्वयं उसके
36:29समस्ट पापों का नाशकर उसे मोक्ष प्रदान करते हैं
36:34उसी क्षण भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह से एक अत्यंत कोमल और दिव्य स्वर्निन प्रकाश पुंज निकला जिसने कुरुक्षेत्र के उस
36:43विशाल मैदान में उपस्थित प्रत्येक जीव को अपनी गोध में ले लिया
36:48संपूर्ण सभा ने एक स्वर में हरी बोल और जै श्रीकृष्ण का महागोश किया जिससे कुरुक्षेत्र की भूमी और आकाश
36:56दोनों ही उस पावन ध्वनी से गुंजायमान हो उठे
37:01अंतह महान रिशियों ने इस परम ज्ञान के सम्मान में दिव्यार्ती की थाली सजाई जिससे इस अलोकिक प्रवचन का समापन
37:09और सभी के कल्यान की कामना पूर्ण हुई
37:13महार्ती के संपन होते ही कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमी पर संध्या की शांत लालिमा बिखर गई और सभी रिशियों तथा
37:21राजाओं के हिरिदय में एक अलोकिक मौन व्याप्थ हो गया
37:25महाराज युधिष्ठेर और अन्यपांडवों ने अत्यंत भावुक होकर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के चर्णों में शीश जुकाया और उनकी आखों
37:35से विरह के आसु बह निकले
37:38श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय सखा अर्जुन को गले लगाया और दोनों के मौन आलिंगन में युगो युगो की गहरी मैत्री
37:45और कुरुक्षेत्र की भूमी पर साज़ा किया गया दिव्यज्ञान जीवन्थो उठा
37:51महाबली बलराम ने भीन सेन को अपनी विशाल भुजाओं में समेट कर विदा दी जिससे दोनों वीरों का अपार्सने और
37:59कुरुक्षेत्र का वीर रस एकाकार हो गया
38:02इसके बाद व्रिंदावन के वासी और नंद बाबा अत्यंत भारी मन से श्री कृष्ण के समी पाए क्योंकि उनका मातरित्व
38:10और पितरित्व स्ने फिर से वियोग की आशंका से व्याकुल था
38:15मया यशोदा ने कमपकमपाते हाथों से अपने कनहया के कोमल गालों को छुआ और फूट फूट कर रोने लगी जैसे
38:23वे गोकुल के उन बीते पलों को कभी छोड़ना ही नहीं चाहती थी
38:28भगवान श्रीकृष्ण ने मया यशोदा और नंद बाबा को सांत्वना दी और उन्हें आश्वस्त किया कि उनका प्रेम भागोलिक दूरियों
38:37से परे सदा उनके हृद्यों में जीवित रहेगा
38:41एक और खड़ी गोपिया मूख समर्पन और अश्रुपूरित नेत्रों से अपने प्राणप्रिये श्यामसुंदर को निहार रही थी जिनके हृदय में
38:50कुरुक्षेत्र का यह मिलन सदैव के लिए अंकित हो गया था
38:54महर्शी वेदव्यास, देवर्शी नारद और अन्य महान रिशियों ने यदुवन्शियों की सुरक्षित यात्रा के लिए कल्यानकारी वैदिक मंत्रों का गान
39:04करते हुए दिव्य आशिरवाद प्रदान किया
39:07धर्म और ज्यान के इस महासागर से त्रिप्थ होकर महाराज वसुदेव और देवकी ने रिशियों के चर्णों की धूल सिर
39:15पर लगाई और द्वार का लोटने की तयारी की
39:19महारानी रुकमिनी, सत्यभामा और अन्यपटरानिया अत्यंत गरिमा और राजसी ठाठबाट के साथ अपने विशाल स्वर्णिम रथों पर सवार हुई
39:30ततपश्चात धगवान श्रीकृष्ण और बलराम अपने सूर्य के समान चमकते हुए और रतनों से जडित दिव्यरत पर विराजमान हुए जो
39:39अलौकिक तेज से दमक रहा था
39:42यदु सेना के सेनाप्तियों ने विशाल शंखों का नाद किया और नगाडों की ध्वनी से संपूर्ण कुरुक्षेत्र का आकाश गुंज
39:50उठा जिससे यात्रा के प्रस्थान की घोशना हुई
39:55कुरुक्षेत्र के नागरिकों और मार्ग में आये अन्य लोगों ने भगवान के दर्शन पाकर अपने घरों की छटों से रंग
40:02बिरंगे पुश्पों की वर्शा की
40:04श्री कृष्ण ने रथ पर खड़े होकर अपने भगतों की ओर देखा और अत्यंत वात्सल्य तथा कृपा से अपना दाहिना
40:12हाथ उठा कर सभी को अंतिम आशिरवाद दिया
40:16यह विशाल राजसी का फिला हरे भरे मैदानों, पवित्र नदियों और घने जंगलों को पार करते हुए आगे बढ़ा जिसमें
40:24सभी कुरुक्षेत्र की दिव्यस मृतियों में खोए थे
40:28कई दिनों की निरंतर यात्रा के बाद अंत्त अरब सागर की विशाल नीली लहरेंग शितिच पर दिखाई देने लगी जो
40:36द्वारका के समीप आने का संकेत थी
40:40द्वारका के भव्यस्वर्ण द्वारों को सूर्य की किर्णों में चमकते देख सभी यात्रियों के मुख पर संतोष और ग्रिहवापसी का
40:48आनन्द छा गया
40:50द्वार्का के नाग्रिकों ने अपने प्रिय आराध्यका स्वागत करने के लिए पूरे नगर को दीपों की मालाओं, तोर्नों और आनंदोच्षव
40:58के संगीत से सरोबार कर दिया
41:01अंत में अपने महल के जरोखे से अनंत सागर की लहरों को देखते हुए, श्री कृष्ण ने मंद मुस्कान के
41:08साथ कुरुक्षेत्र के इस दिव्य महाग्यान को समय के पन्नों में अमर कर दिया
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