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इस अद्भुत एपिसोड में, हम भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम भक्त मित्र सुदामा की हृदय-विदारक गाथा का अन्वेषण करते हैं। अत्यंत गरीबी में जी रहे सुदामा, अपनी पत्नी के आग्रह पर, द्वारकाधीश श्रीकृष्ण से मिलने निकलते हैं, मन में कोई याचना नहीं, केवल अपने बचपन के मित्र का दर्शन। श्रीकृष्ण किस प्रकार सुदामा का भव्य स्वागत करते हैं, गुरु संदीपनि के गुरुकुल की यादें ताज़ा करते हैं और कैसे सुदामा के लाए मुट्ठी भर चावल (पोहा) से उनके जीवन को अलौकिक धन-धान्य से भर देते हैं, यही इस कहानी का सार है। भक्ति, मित्रता और निष्काम प्रेम का यह प्रसंग आपके हृदय को छू जाएगा। #कृष्णसुदामा #द्वारकाधीश #भागवतपुराण #सुदामाकथा #मित्रता #भक्ति #कृष्णलीला #पौराणिककथाएँ
Transcript
00:00पांडवों के वन्वास और अन्य महत्वपून घटनाओं के बाद हम द्वारका की चकाचौंद से दूर एक शांत जरजर आश्रम में
00:08पहुँचते हैं, जहां ब्राहमन सुदामा अपने परिवार के साथ घोर दारिद्य में जीवन यापन कर रहे थे.
00:15सुदामा का क्रिशकाय शरीर उनकी आंतरिक तपस्या और आध्यात्मिक गहराई का प्रमाण था, किन्तु यह उनके परिवार की भूख और
00:24कश्टों की मुख गवाही भी देता था.
00:28उनकी धर्म प्रायन पत्नी सुशीला अपने बच्चों के लिए भोजन जुटाने की अथक कोशिश में जुटी रहती थी, पर अक्सर
00:36खाली हाथ लोटती.
00:38आश्रम में बच्चों की भूख से व्याकुल रुदन की आवाजें हर दिन गूंजती रहती थी, जो उनके माता-पिता के
00:46हृदय को विदीन कर देती थी.
00:49सुदामा अपनी आध्यात्मिक साधना में लीन होने का प्रयास करते, पर अपने बच्चों की दारुन दशा उनके मन को अशांत
00:57कर देती.
00:59रात का भोजन बस नाम मात्र का था, जिसमें परिवार के सभी सदस्य अपनी भूख को नियंत्रित कर एक दूसरे
01:06की ओर करुना से देखते.
01:09अपने बच्चों की असहय भूख देखकर, सुशीला का हृदय करुना से भर गया और उसने निश्चय किया कि वह सुदामा
01:17से बात करेगी.
01:19संकोच और दर्च से भरी सुशीला, अपने पती सुदामा के पास पहुँची, उसकी आवाज में एक अजीब सी याचना छिपी
01:27थी.
01:28उसने धीरे से सुदामा को अपने बाल सखा, भगवान श्री कृष्ण की याद दिलाई, जो अब द्वारका के वैभवशाली राजा
01:37थे.
01:38सुदामा अपने अटूट विनमरता और गरिमा के कारण अपने समरिध मित्र से सहायता मांगने में जिजक रहे थे.
01:56सुदामा के मन में अपने गुरुकुल के दिनों की एक धुन्धली मधूर स्मृती कौंध गई, जहां उनकी मित्रता निर्दोष आनंद
02:04में पगी थी.
02:06बच्चों की निरंतर बढ़ती हुई भूख और अशुरुधारा देखकर सुशीला की याचना और भी प्रबल हो गई.
02:14अपने परिवार के अस्तित्व और अपनी आंतरिक गरिमा के बीच फन से सुदामा एक गेहन आंतरिक संधर्ष से जूज रहे
02:22थे.
02:23अंतर सुशीला ने हाथ जोड़ कर अशुरुपूर्ण नेतरों से अपने पती से द्वार का जाने की हृदय विदारक याचना की.
02:32अपनी पतनी के आसुओं और बच्चों की दैनिय दशा से विवश होकर सुदामा की द्रिड़ता तूट गई और उन्होंने द्वार
02:40का जाने का मन बनाया.
02:42परंतु एक निर्धन ब्राह्मन भगवान कृष्ण को क्या उपहार दे सकता था, यह सोच कर एक नई चिन्ता ने उन्हें
02:50घेर लिया.
02:51अपनी अध्भुत सूजबूज और अटूट भक्ती से सुशीला ने पास की पडोसन से कुछ मुठी भर चावल के पोहे जुटाने
02:59का फैसला किया.
03:01प्रेम और पवित्रता से भर कर सुशीला ने उन मोटे चावल के पोहों को एक पुराने फटे कपड़े में बांध
03:09दिया, जो कृष्ण के लिए उनका एक मात्र उपहार था.
03:13अपने बच्चों और पत्नी को चिंता से भरे नयनों से देखते हुए, सुदामा उस छोटी सी पोटली को थामे, द्वारका
03:21की ओर अपने संकल पबध मार्ग पर निकल पड़े.
03:25निर्जन पगडंडियों पर चलते हुए, सुदामा के मन में द्वारका की भव्यता और अपनी दीनता का द्वंद्व लगातार चल रहा
03:33था, फिर भी उनकी आखों में कृष्ण से मिलने की आस्टिम्टिमा रही थी.
03:39धूल भरी राहों और तपते सूरच के नीचे सुदामा के पैर ठके नहीं, क्योंकि उनके हृदय में अपने परम मित्रद्वार
03:47काधीश से मिलने का अटूट विश्वास उन्हें उर्जा दे रहा था.
03:52मार्ग में उन्हें गुरु सांदीपनी के आश्रम के वो दिन याद आने लगे, जब वे और कृष्ण एक साथ शिक्षा
03:59ग्रहेन करते, जंगल में लकडिया चुनते और निश्चल मित्रता की डोर में बंधे थे.
04:05हर कदम पर उन्हें अपने सखा कृष्ण का तेजस्वी और करुणामय मुखडा स्मरण आता, जिसकी अलोकिक आभा उनके मन की
04:14सारी गलानी और संकोच को मिटा देती थी.
04:18उन्होंने कई छोटे बड़े गावों को पीछे छोड़ा, जहां जीवन की चहल पहल थी, लेकिन सुदामा की आखें सिर्फ अपने
04:26गंतव्य द्वारका की ओर लगी हुई थी.
04:29रात के घने अंधेरे में, सुदामा एक विशाल वट व्रिक्ष के नीचे अपनी वही छोटी सी पोहे की पोटली सिर्हाने
04:37रखकर, अपनी पतनी और बच्चों के भूखे चहरों को याद करते हुए सो गए.
04:43भूकमपी पेट और प्यास से सूखे कंठ के बावजूद, सुदामा के मन में अपने मित्र की छवी उन्हें निरंतर बल
04:51प्रदान कर रही थी, जिससे उनकी यात्रा का संकल्प और भी द्रिढ होता गया.
04:56कई दिनों के अथत परिश्रम के पश्चात, शितिच पर अन्तह उन्हें स्वर्ण नगरी द्वारका के भव्य शिखर दूर से दिखने
05:04लगे, जो किसी स्वर्गिक स्वपन से कम नहीं थे.
05:09द्वारका के विशालकाय, रतनों से जड़े महल और उंचे-उंचे प्राचीर देखकर सुदामा अवाक रह गए, जहां हर कोना एश्वर्य
05:17और दिव्य वैभव से सुशोगित था.
05:20एक क्षण के लिए उन्हें अपनी दीन हीं दशा का भान हुआ, पर कृष्ण की मित्रता पर भरोसा कर वे
05:27विशाल स्वर्णच्टित द्वारका के मुख्य द्वार की ओर बढ़ते चले गए.
05:32द्वारपालों ने सुदामा की फटी हुई धोती और दुर्बल काया देखकर, उन्हें उपेक्षा भरी द्रिष्टी से देखा और उनके प्रवेश
05:41पर संदेह व्यक्त किया.
05:43विन्मरता से हाथ जोड़कर सुदामा ने द्वारपालों से कहा कि वे भगवान श्री कृष्ण के बालसखा हैं और उनसे भेंट
05:51करने आये हैं.
05:53यह सुनकर द्वारपाल हसी से लोट-पोट हो गए और उफास करते हुए बोले तुम एक निर्धन ब्राहमन द्वारकाधीश के
06:02मित्र.
06:03सुदामा ने अपने मुख पर शांत भाव रखते हुए बार-बार अपनी मित्रता की पवित्रता पर बल दिया, यह जानते
06:11हुए भी कि उनकी बात पर कोई विश्वास नहीं कर रहा था.
06:15अंतह एक दयालू द्वारपाल ने सुदामा की करुण पुकार और अडिक विश्वास को देखकर यह संदेश भीतर पहुचाने का निर्णय
06:24लिया.
06:25सुदामा द्वारका के भव्यद्वार के बाहर धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करते रहे, अन्य लोगों की अचरच भरी और उफास्पून द्रिष्टियों को
06:34सहते हुए.
06:36संदेश लेकर वह दयालू द्वारपाल तेजी से महल के भीतर दोड़ा और गलियारों से होते हुए सीधे द्वारकाधीश के कक्ष
06:44की ओर बढ़ा.
06:45कक्ष में पहुँचकर द्वारपाल ने अपनी श्रद्धा से गर्दन जुकाकर परमतेजस्वी, शांत और करुणामय भगवान श्रीकृष्ण को एक निर्धन ब्राहमन
06:56के आगमन की सूचना दी.
06:59जैसे ही द्वारपाल ने सुदामा नाम उच्चारित किया, श्रीकृष्ण के दिव्य नेत्रों में एक गहरी चमक उभ्री और उनके मुख
07:07पर अपने प्रिय सखा के लिए असीम प्रेम का भावा गया.
07:12तक्षनक द्वारकाधीश ने अपना भव्य सिनहासन छोड़कर अपने बालसखा सुदामा से मिलने के लिए दौड़ पड़े, उनके हिदय में वर्षों
07:21पुरानी मित्रता का वेग हिलोरे ले रहा था.
07:25वर्षों की दूरी मिटाकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र सुदामा को अपने दिव्य आलिंगन में भर लिया, जैसे दो
07:33आत्माई चिरकाल के बाद एक हो रही हो.
07:37क्रिष्ण के नेत्रों से प्रेमाश्रूओं की धारा बह निकली, और सुदामा भी अपने सखा के प्रेम में डूबे अश्रुपूर्ण नैनों
07:44से भीग गए, उनकी मित्रता का बंधन और भी गहरा हो गया.
07:49अवा खड़े द्वारपाल और महल के सेवक इस अग्भुत द्रिश्य को देख विस्मित थे, जहां द्वारकाधीश स्वयन एक निर्धन ब्राहमण
07:58को ऐसे सम्मान दे रहे थे.
08:01अपने परम सखा का हाथ थाम कर, कृष्ण उन्हें अत्यंत प्रेम पूर्वक अपने भव्य महल के भीतर ले गए, जैसे
08:08कोई राजा अपने सबसे प्रिय अतिथी का स्वागत कर रहा हो.
08:13जब उन्होंने देखा कि स्वयन द्वारकाधीश एक निर्धन ब्राहमण के चरण स्पर्श कर रहे हैं, तो राणिया और महल के
08:21अन्य सदस्य आश्चर यच्कित और भाव विभोर हो गए.
08:25अपने हाथों से एक स्वर्ण पात्र में पवित्र जल लेकर, क्रिश्ण ने अपने बाल सखा के धूलधूसरित चरणों को धोया,
08:33उनके हृदय में अथास नेह उमड रहा था.
08:37राणियों ने जो पहले कभी ऐसा द्रिश्ण नहीं देखी थी, सुगंधित चंदन का लेप और दिव्य पुष्प लेकर सुदामा के
08:45चरणों की सेवा की.
08:47ततपश्चात, कृष्ण ने सुदामा को अपने ही सिनहासन के पास एक दिव्यत प्रत्नजडित आसन पर बिठाया, मानो वह स्वयन द्वारका
08:56के अधिपती हूँ.
08:58अपने हाथों से भगवान श्री कृष्ण ने अपने मित्र के थके हुए चरणों की कोमलता से मालिश की, उनके स्पर्ष
09:05में असीम प्रेम और सेवाभाव जलक रहा था.
09:09रानिया हाथ में स्वर्ण पंखे लिए सुदामा को शीतल वायु प्रदान कर रही थी और सुगंधित जलके पात्र उनके पास
09:18प्रस्तुत किये जा रहे थे.
09:20कृष्ण ने अपने बाल स्खा से सांदीपनी मुनी के आश्रम के दिनों को याद करते हुए पूछा.
09:27सुदामा ने भी उन दिनों को याद करते हुए भावुख होकर कहा.
09:32हसी और स्नेह के बीच कृष्ण ने सुदामा से पूछा.
09:38संकोच और लज्जा से सुदामा ने अपनी कांख में छिपी उस छोटी सी पोटली को और भी कसकर पकड़ लिया,
09:45उसमें केवल थोड़े से सूखे चावल थे.
09:48कृष्ण ने अपने मित्र के मन को भामपते हुए, मुस्कुराते हुए कहा, छिपाओ मत सखा.
09:55मुझे पता है तुम मेरे लिए कुछ लाए हो और धीरे से उसकी पोटली छीन ली.
10:02पोटली खोलते ही, कृष्ण ने उसमें सूखे चावल पोहा देखे और उनके मुख पर वही असीम प्रेम और प्रसन्नता का
10:10भावा गया.
10:12उन्होंने प्रेम से पोहे का एक मुठ़्ी भर लिया और उसे परम स्वादिष्ट प्रसाद मानकर अपने मुख में डाला, उनकी
10:19आखों में असीम त्रिप्ती थी.
10:22दूसरे मुठ़्ी भर पोहे को उठाते हुए, कृष्ण ने कहा.
10:27पर जैसे ही कृष्ण तीसरी मुठ़्ी भरने को उध्यत हुए, महारानी रुक्मिनी ने उनके हाथ को कोमलता से थाम लिया,
10:35उनके चहरे पर एक रहस्य में मुस्कान थी.
10:39मुस्कुराते हुए रुक्मिनी ने कहा.
10:46भगवान श्री कृष्ण रुक्मिनी के इस दिव्य हस्तक शेप को समझते हुए, एक गहरी और रहस्य में मुस्कान के साथ
10:53अपने मित्र सुदामा की ओर देखा, जिनकी आखों में अभी भी बालपन की मासूमियत जलक रही थी.
11:01सुदामा इस दिव्य लीला से पूर्णत है अन्भिग्य केवल अपने मित्र के प्रेन और आतिथ्य में खोया हुआ था, मानो
11:09समस्थ संसार का वैभव उसक्षन उनके चर्णों में बिच गया हुँ.
11:14कृष्ण ने बड़े प्यार से सुदामा का हाथ थामा और उन्हें स्नानग्रेह की ओर ले गए, जहां सुगंधित जल और
11:21रेश्मी वस्त्र उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे.
11:25स्नान के बाद सुदामा को बहुमूल्य वस्त्र और चंदन का लेप लगाया गया, जिससे उनके शरीर की ठकान मिट गई
11:33और एक नई उर्जा का संचार हुआ.
11:37तत्पश्चात, कृष्ण ने अपने मित्र को सोने की थाली में सजाए गए छपपन भोग का दिव्य भोजन परोसा, जिसकी सुगंध
11:44से पूरा महल महक उठा.
11:47सुदामा ने कभी ऐसे भोजन की कलपना भी नहीं की थी, और हर कौर के साथ उनके मन में अपने
11:54मित्र के प्रती अगात, प्रेम और कृतग्यता उमड रही थी.
11:59द्वापर युग की उस दिव्य मित्रता को देखकर महल की समस्तरानिया और सेविकाय भी आश्चर यच्कित्थी, उनकी आखों में श्रध्धा
12:08और कौतुहल का अध्भुत मिश्रन था.
12:11कई दिनों तक सुदामा द्वार का में रुके, अपने बालसखा कृष्ण के साथ बच्पन की यादों में खोए रहते, हर
12:18पल उन्हें अपने जीवन का सबसे सुखद अनुभव प्रतीत होता.
12:23उन्होंने कृष्ण के साथ अपने विद्याकाल के दिनों की चर्चा की, गुरु सांदीपनी के आश्रम की कथाए दोहराईं और हर
12:31बात्चीत में उनके मन को अध्भुत शान्ती मिली.
12:35परंतु समय बीतने के साथ सुदामा को अपने परिवार और अपनी कुटिया की याद आने लगी, एक सुक्ष्म खिंचाव उन्हें
12:44अपने साधारन जीवन की ओर खींच रहा था.
12:48अंतह उन्होंने अपने मित्र कृष्ण से विदा लेने का मन बनाया, यद्यपी उनके हृदय में एक अजीव सी उदासी थी
12:56कि वे उनके लिए कुछ भी लेकर नहीं जा रहे थे.
13:00जब सुदामा ने विदाई मांगी, तो कृष्ण ने उन्हें अत्यन्प्सने से गले लगाया, मानो उस आलिंगन में समस्त ब्रहमांड का
13:08प्रेम समाहित हो गया हो.
13:10विदा के क्षण कृष्ण ने सुदामा को कोई भौतिक उपहार नहीं दिया, केवल अपने अगात प्रेम और आध्यात्मिक आशिरवाद से
13:19उन्हें परिपूर्ण किया.
13:21हृदय में कुछ निराशा और कुछ आध्यात्मिक आनंद लिये सुदामा ने द्वार का छोर दी, अपने मन में कृष्ण के
13:29प्रेन को समेटे हुए वे अपने गाव की ओर चल पड़े.
13:33वे सोचते रहे कि उनके मित्र ने उन्हें कुछ भी क्यों नहीं दिया, क्या उन्हें मेरी गरीबी का एहसास नहीं
13:40हुआ था, या यह सब उनकी लीला का ही एक हिस्सा था.
13:45दूर तक पैदल चलने के बाद, जब सुदामा अपने गाव के निकट पहुँचे, तो उनकी आखें एक अध्भुत द्रिश्य पर
13:53ठेहर गई.
13:54उनकी जीर्ण शीर्ण कुटिया के स्थान पर एक विशाल स्वर्ण निर्मित महल जग्म का रहा था, जिसकी भव्यता ऐसी थी
14:02कि उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं देखी थी.
14:07जैसे ही वे महल के समीप पहुँचे, उनकी पतनी और बच्चे, दिव्यवस्त्रों और आभूशनों से सजे, मुस्कान लिए उनका स्वागत
14:16करने के लिए बाहर आए.
14:18तब सुदामा को अपने परम मित्र कृष्ण के महादान का रहस्य समझाया, कि उन्होंने बिना कुछ मांगे ही उन्हें तीनों
14:26लोकों का सबसे बड़ा एश्वर्य प्रदान कर दिया था.
14:30अपने जीरनशियन घर के स्थान पर स्वर्ण महल और दिव्य वस्त्रों में सजे परिवार को देखकर सुदामा की आखों से
14:37कृतग्यता के अश्रु अन्वरत बहने लगे, उनका हृदय अनकहे प्रेम और आश्चर्य से भर गया था.
14:45उनकी पतनी अब पहले से कहीं अधिक प्रसन्न और शांत, उनके समी पाईं और धीरे से उनके कंधे पर हाथ
14:53रखकर बिना कुछ कहे ही भगवान कृष्ण की कृपा की पुष्टी की.
14:58सुदामा का मन प्रेम, कृतग्यता और एक छोटे से अपराध बोध से व्याकुल था कि उन्होंने अपने सखा से कुछ
15:05भी नहीं मांगा था, फिर भी उन्हें यह अकूद संपदा मिली.
15:10अपने हृदय में कृष्ण के प्रती एक नया और भी गहरा प्रेम लिये, सुदामा ने तुरंत द्वारका लोटने का निश्चय
15:18किया, इस बार केवल अपने सखा का धन्यवाद करने के लिए.
15:23पुना द्वारका की ओर जाते हुए, सुदामा का मन कृष्ण की अटूत मित्रता और उनके अप्रत्याशित प्रेम से उत्प्रोत था,
15:31जो हर पक पर उन्हें विस्मित कर रहा था.
15:35द्वारका पहुँचकर, इस बार सुदामा ने आत्मसम्मान और कृतग्यता के भाव से राजमहल में प्रवेश किया, न कि किसी याचक
15:43की विनमरता से, क्योंकि वह अब एक धन्यमित्र था.
15:48जैसे ही सुदामा ने द्वारका नगरी में कदम रखा, भगवान कृष्ण ने अपने दिव्य ज्यान से अपने प्रिय सखा के
15:55आगमन को महसूस किया, और उससे मिलने के लिए आतुरता से आगे बढ़े.
16:02द्वारपालों को अचरज में छोडते हुए, क्रिश्ण ने सुदामा को देखते ही उन्हें अपनी बाहों में भर लिया, दोनों मित्रों
16:09के हृदय एक पवित्र मिलन में धड़क उठे.
16:13क्रिश्ण ने सुदामा का हाथ थामा और उन्हें राजसी महल के भीतर एक आरामदायक कक्ष में ले गए, जहां वे
16:20शांती और प्रेम के साथ बैठ सके.
16:24एक शांत कक्ष में मखमली आसन पर बैठ कर दोनों मित्र एक दूसरे को देख मुस्कुरा रहे थे, उनकी आखों
16:32में वर्षों की मित्रता और अटूट स्नेह की गहराई थी.
16:36कृष्ण ने इस नहभरी दृष्टी से सुदामा की ओर देखा और अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए गुरुकुल
16:43की उन मधुर स्मृतियों को ताजा करने लगे.
16:47कृष्ण बोले, सखा, क्या तुम्हें गुरु संदीपनी के आश्रम के वे दिन याद हैं, जब हम जंगल में लकडी काटने
16:54जाया करते थे और कितनी कठिनाईयों का सामना करते थे?
16:59द्रिश्य बदलता है और हम तरुन कृष्ण और सुदामा को गुरुकुल की साधी वेशभूशा में देखते हैं, जो गुरु के
17:07लिए सूखी लकडिया इकठा करने के लिए घने जंगल में भटक रहे हैं.
17:13कृष्ण याद करते हुए कहते हैं, एक बार गुरुकुल पतनी ने हमें सूखी लकडिया लाने के लिए भेजा था, और
17:20हम उस दिन बहुत दूर जंगल में भटक गए थे.
17:24उस दिन अचानक घनगोर वर्षा होने लगी थी, और हम दोनों मित्र ठंड से कापते हुए जंगल में आश्रे की
17:31तलाश में भटक रहे थे, हमारी लकडियों का गठर भीग चुका था.
17:37कृष्ण ने मुस्कुराते हुए छेडा, और तुम्हें याद है, जब गुरुपत्नी ने हमें रास्ते के लिए चने दिये थे, और
17:44तुमने सारे चने अकेले ही खा लिये थे.
17:47तब सुदामा ने थोड़ा संकोच करते हुए, उस दिन के चने खाने की घटना को याद किया, जब भूख से
17:54व्याकुल होकर उन्होंने अपने हिस्से के साथ कृष्ण के हिस्से के चने भी चुपचाप खा लिये थे.
18:01कृष्ण ने आगे कहा, गुरुदेव संदीपनी चिन्तित होकर हमें ढूढने आये थे और अंत्ता हमें उस घने जंगल में खोज
18:09निकाला था, उनकी आखों में हमारे लिए प्रेम और चिन्ता थी.
18:14गुरु संदीपनी उनके चहरे पर चिन्ता और फिर राहत के भाव के साथ हमें जंगल में पाकर गले लगा रहे
18:21थे, उनका स्पर्ष पित्रितुलिस ने से भरा था.
18:26सुदामा उन स्मृतियों में खोकर भावुखो उठे और बोले हाँ, सखा, उन दिनों की पवित्रता ही हमारे इस अटूट संबंध
18:34की नीम है, जिसे कोई नहीं तोड सकता.
18:38भगवान कृष्ण ने सुदामा की आखों में छिपी हुई बात को अपनी दिव्यद रिष्टी से तुरंत भांप लिया, उनके चहरे
18:45पर एक मनमोहक मुस्कान आ गई.
18:48प्रेम और उच्सुकता से भरे श्रीकृष्ण ने सुदामा से अत्यंत विनमर्ता से पूछा की उनके मित्र ने उनके लिए क्या
18:56अध्भुत भेंट लाई है.
18:59सुदामा के मन में दीनता और संकोच का गेहन द्वंद्व उमड रहा था, उन्हें अपनी तुछ भेंट प्रस्तुत करने में
19:06अत्यंत लज्जा महसूस हो रही थी.
19:10उन्होंने जिजगते हुए अपनी भेंट से इनकार किया, किन्तु अंजाने में ही उनका हाथ अपने बगल में छिपी हुई पोहे
19:18की पोटली पर जाटिका.
19:20भगवान कृष्ण ने सुदामा की दीनता और उनके भोलेपन को भामपते हुए एक रहस्यमई, करुणामई मुस्कान बिखेरी, जो उनके दिव्य
19:29ज्यान का प्रतीक थी.
19:31तब श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक सुदामा की ओर हाथ बढ़ाया और चंचल भाव से उनकी वेशभूशा में कुछ खोजने लगे, मानो
19:40कोई छिपा हुआ खजाना ढूड रहे हुँ.
19:44सुदामा ने संकोचवश धीरे से श्रीकृष्ण के हाथ को रोकने का प्रयास किया, उनके चहरे पर अपनी गरीबी के कारण
19:51गहरा आत्म गलाने का भाव था.
19:55भगवान की अलोकिक द्रिष्टी और वात्सल्यपूर्ण स्पर्ष ने अन्ता सुदामा के बगल में छिपी हुई, छोटी साधारन पोहे की पोटली
20:03को खोज निकाला.
20:05अपनी भेंट का रहस्य खुल जाने पर सुदामा की आखें विस्मय और लज्जा से चौड़ी हो गई, जैसे उनका सबसे
20:13बड़ा रास सब के सामने आ गया हो.
20:16श्री कृष्ण ने उस छोटी सी पोटली को प्रेम से बाहर निकाला, उनके चहरे पर कोई उपहास नहीं बलकी केवल
20:24अपने प्रियमित्र के प्रती असीम्स ने जलक रहा था.
20:28उन्होंने उस साधारन सी भेंट को पहचानते ही अत्यंत प्रसन्नता और उल्लास से कहा, वा, मेरे मित्र यह तो वही
20:37मेरे प्रियपोहें हैं।
20:40कृष्ण के ऐसे निश्चल प्रेम और स्विकार्यता को देख कर सुदामा की आखें सजल हो गई और उन्होंने कृतग्यता तथा
20:48लज्जा के भाव से अपनी द्रिष्टी नीचे कर ली।
20:51श्री कृष्ण ने बड़े जतन से उस पोटली की गाठ खोली और तुरंथ ही ताजे भुने हुए पोहे की मनमोहक
20:59सुगंध पूरे राजमहल में फैल गई।
21:02उन्होंने अत्यंत स्नेह और लालसा से एक मुठी पोहा उठाया, उसे अपने मुख में डाला और ऐसा स्वादलिया जैसे वह
21:10स्वर्ग का अम्रित हो।
21:12यह अध्भुत द्रिश देखकर रुकमिनी और अन्यरानिया भी आश्चर यच्कित थी, किन्तु उन्होंने भगवान के प्रेन को समझकर सम्मान पूर्वक
21:22इस क्षण को देखा।
21:24तब भगवान कृष्ण ने अपनी प्रिय पत्नी रुकमिनी की ओर देखा और उन्हे भी अपने परम मित्र की इस पवित्र
21:32भेंट का एक भाग ग्रहन करने का संकेट दिया।
21:35रुकमिनी ने भगवान के इस अनुठे प्रेन को समझते हुए अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ उस साधारन से पोहे
21:43को स्विकार किया।
21:45परम संतुष्टी के साथ श्री कृष्ण ने पुनह एक और मुठी पोहा उठाया और उसे बड़े प्रेन से खाया, जिससे
21:53ब्रहमान के कणकण में त्रिप्ती की लहर दोड गई।
21:57इसी क्षण कैलास परवत पर भगवान शिव और देवी पारवती इस अलौकिक मित्रता के विहंगम द्रिश्य को अपनी दिव्यद्रिष्टी से
22:06निहार रहे थे।
22:26आश्वर्य और अनंत सुख प्रदान करने वाले हूँ।
22:30किन्तु ठीक उसी क्षण देवी रुकमिनी ने, जिनकी दिव्यद्रिष्टी क्रिष्ण के हृदय के हर स्पंदन को पहचानती थी, उनके हाथ
22:39को धीरे से थाम लिया।
22:41उनकी आखों में एक गहरा प्रेम, सम्मान और ब्रहमांडिय ज्यान की चमक थी, मानो वह परम सत्य को व्यक्त करने
22:49वाली हो।
22:51रुकमिनी ने मधूर और द्रेड स्वर में कहा, प्रभुक दो मुठी पोहे से ही आपने सुदामा को सभी लोकों का
22:58अतुलनिय एश्वर्य प्रदान कर दिया है, इससे अधिक की आवश्शक्ता नहीं।
23:04श्री कृष्ण ने अपनी प्रिय पत्नी की ओर देखा, उनकी आखों में शरारत पून प्रेम और गहरी स्वीकृती का भाव
23:11था, क्योंकि वह रुकमिनी के दिव्य अंतर ज्यान को समझते थे।
23:16वास्तव में उन दो मुठी पोहे के दान ने सुदामा के भाग्य में तीनों लोकों की संपदा और अनंत सुख
23:23का लेखा जोखा लिख दिया था।
23:26कैलास पर भगवान शिव और देवी पार्वती ने रुकमिनी के ज्यानपून हस्तक शेप को मुस्कुराते हुए देखा, जो उनकी लीला
23:34का ही एक अंश था।
23:37रुकमिनी ने फिर कहा, इतने प्रेम और समर्पन से अर्पित इस पोहे का एक कणभी किसी भी भौतिक संपदा से
23:44कहीं अधिक मूल्यवान है, प्रभू।
23:47श्री कृष्ण ने एक मीठी मुस्कान के साथ अपना हाथ पूरी तरह से वापस ले लिया, उनकी आखों में सुदामा
23:55के लिए असीम प्रेम और भविश्य की योजनाए जलक रही थी।
23:59दो मुठी पोहेने सिर्फ सुदामा के भाग्य को ही नहीं बदला था, बलकि यह निस्वार्थ मित्रता के एक शाश्वत अध्याय
24:08को भी अमर कर दिया था।
24:10सुदामा अपनी गरीबी से बेखबर, कृष्ण के स्नहपूर्ण आतिथ्य में डूबे हुए, इस दिव्य लेंदेन से पूरी तरह अनभिग्य थे।
24:20यह मित्रता एक असाधारन बंधन था जहां प्रेम, भक्ती और निहस्वार्थता की कोई सीमा नहीं थी।
24:28द्वार्का के राजमहल में उसक्षन की शांती ने एक गहरी आध्यात्मिक महत्वता को परिभाशत किया, जो आने वाली पीढियों के
24:36लिए एक प्रेना थी।
24:39रुक्मिनी ने अपनी अनुपम अंतरग्रिष्टी से कृष्ण की लीला का सम्मान किया और उनके भक्तों के प्रती उनके प्रेम की
24:47गहराई को प्रकट किया।
24:49यह पल न केवल सुदामा के जीवन का एक निनायक्षन था, बलकि यह कृष्ण के भक्तवत्सल स्वरूप का भी एक
24:57ज्वलंत प्रमान था।
24:59सुदामा ने अपने हृदय में कृष्ण के प्रेम को समेटे हुए, अपने मेजबान को धन्यवाद दिया और विदाई की तैयारी
25:07करने लगे।
25:09इस प्रकार एक साधारन से पोहे ने एक अनुपम मित्रता और ईश्वर के असीम अनुग्रह की गाथा लिख दी, जिसे
25:16युगो युगो तक स्मरण किया जाएगा।
25:20कैलास परवत पर, शिव और पारवती ने इस पवित्र घटना के सार को आत्म साथ करते हुए, अपने मौन में
25:27दिव्य आशिरवाद दिया।
25:29और इस प्रकार द्वारका नगरी में एक निर्धन ब्राहमन की यात्रा ने स्वयं परमेश्वर के हृदय को स्पर्श किया, जो
25:37सभी भक्तों के लिए एक शाश्वत सत्य बन गया।
25:41जैसे ही सुदामा ने द्वारका से अपनी वापसी की यात्रा प्रारंभ की, एक अनोखी त्रिप्ती और आध्यात्मिक पूर्णता उनके अंतरंग
25:50में बस गई थी, यद्यपी उनके पास अब भी कुछ भी भौतिक नहीं था।
25:56सुदामा द्वारका के राजसी द्वारों से दूर एक धूल भरे ग्रामेन पत्थ पर चलते हुए, अपने हृदय में कृष्ण के
26:03आतिथ्य की मधुर स्मृतियों को संजोए हुए थे।
26:07उन्हें भली भानती ज्यात था कि द्वारकाधीश केवल उनके बचपन के मित्र ही नहीं, बलकि तीनों लोकों के स्वामी और
26:15साक्षात परमिश्वर हैं।
26:18मन के किसी कोने में एक शनिक विचार कौनधा की क्या उनके सखाने उनकी दरिद्रता पर ध्यान नहीं दिया, या
26:26वे उन्हें भूल गए।
26:28परंतु अगले ही पल, उनके हृदय में प्रेम की अथा धाराने समस्त शंकाओं को बहा दिया, और उन्होंने अपने मित्र
26:36के प्रती असीन भक्ती को पुना पुष्ट किया।
26:40श्री कृष्ण के स्नहपून आलिंगन की गर्माहट अब भी उनकी आत्मा में समाई हुई थी, जो उन्हें बाहरी अभावों से
26:48कहीं अधिक सम्रिद्ध महसूस करा रही थी।
26:51वे कई छोटे-छोटे गावों से होकर गुजरे, जहां किसानों के श्रम और ग्रामीनों की सादगी ने उनके मन को
26:59और भी शांत कर दिया।
27:01उन्हें बोध हुआ की भौतिक संपत्तीक शनभंगुर है, जबकि कृष्ण प्रेम का अमूल्य धन उन्हें अनंतकाल तक त्रिप्त रखेगा।
27:11सुर्य आकाश में अपनी यात्रा पूरी करता रहा और सुदामा के कदम बिना रुके अपने घर की ओर बढ़ते रहे,
27:18प्रत्येक मील उन्हें अपने गंतव्य के करीब लाता गया।
27:23उनके मन में अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने की उतकंठा थी, पर साथ ही यह सोचकर थोड़ी आशंका भी
27:30हुई की वे खाली हाथ लोट रहे हैं।
27:34उन्होंने कलपना की की उनकी पत्नी की आखों में निराशा होगी जब उन्हें पता चलेगा की उनके मित्र ने उन्हें
27:42कुछ नहीं दिया।
27:44उन्होंने आंतरिक शक्ती के लिए एक मौन प्रार्थना की यह विश्वास करते हुए कि इश्वर की इच्छा ही सर्वोपरी है
27:53जैसे जैसे वे आगे बढ़े परिचित पेड और जहरने दिखाई देने लगे जो उनके गाउं की निकट्ता का संकेत दे
28:01रहे थे
28:02अब उन्हें अपने बच्पन के पोखर और उस बर्गत के पेड की पहचान हो गई जहां वे अकसर अपने मित्रों
28:10के साथ खेला करते थे
28:12अपने परिवार से मिलने की तीवर इच्छा ने उनके कदमों में नई उर्जा भर दी और वे उच्छुपता से आगे
28:19बढ़ चले
28:21जैसे ही वे अपने गाउं की सीमा के करीब पहुँचे उन्हें हवा में एक अजीब सी अप्रिचित सुगंध और उर्जा
28:29का अनुभव हुआ
28:31जहां उनकी जीनशेन कुटिया होनी चाहिए थी वहां कुछ और ही दिखाई दे रहा था जो उनकी आखों को विस्मय
28:39से भर रहा था
28:41उनकी आखों के सामने एक भव्य और अलंकृत महल खड़ा था जिसकी स्वर्णमंदित मीनारे सूर्य की किर्णों में चमक रही
28:49थी जहां कभी उनकी साधारन जोपड़ी थी
28:53उनका मन इस असाधारन परिवर्तन को स्वीकार करने में असमर्थ था और वे बार-बार अपनी आखों को मलकर यह
29:01सुनिश्चित कर रहे थे कि यह कोई भ्रम तो नहीं
29:04तभी महल के विशाल द्वारों से मूल्यवान वस्त्रों से सजे हुए सेवक और दासिया बाहर निकली और सम्मान पूर्वक उनकी
29:13ओर बढ़ने लगी
29:15और फिर उनकी अपनी पत्नी जो अब रेश्मी वस्त्रों और आभूशनों से सुसजजित थी मुस्कुराते हुए आसुओं के साथ उनकी
29:24ओर दोड़ी जो इस अद्भुत चमतकार की गवाह थी
29:29उनकी पत्नी जिनके मुख पर अब दिव्य तेज था और आखों में असीमित प्रेम दोड़कर अपने पती सुदामा को अपने
29:37आलिंगन में भर लेती हैं
29:39उनके लंबे वियोग और अब इस अद्भुत मिलन की खुशी में
29:44सुदामा अभी भी इस स्वपनिल वास्तविक्ता पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे
29:49जबकि उनकी पत्नी के आसुओं ने उनके हृदय को स्ने और विस्मय से भर दिया
29:55उन्होंने अपनी पत्नी के कंधों पर हाथ रख कर पीछे खड़े अपने बच्चों को देखा
30:13उनकी गरीबी से परिचित थे अब आदर और विनमरता से उनके सामने जुप गए मानो किसी राजा का सम्मान कर
30:20रहे हूँ
30:21यह सब देखकर सुदामा के मन में एक ही नाम गूंज रहा था श्रीकृष्ण जिन्होंने अपनी अहेतु की क्रिपा से
30:29उनके जीवन को पूरी तरह से बदल दिया था
30:33उनकी पतनी अब धैर्य खो चुकी थी अपने पती का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने नए शांदार महल के भव्य
30:41द्वारों की ओर ले गई जहां उनका नया जीवन प्रतीक्षा कर रहा था
30:46जैसे ही उन्होंने भव्य प्रवेश द्वार से भीतर कदम रखा उनकी आखों ने एक ऐसी भव्यता देखी जिसकी उन्होंने अपने
30:55जीवन में कभी कलपना भी नहीं की थी
30:58महल के अंदरूनी हिस्से में दीवारों पर मूल्यवान रत्नों से जड़े हुए अध्भुत चित्र थे, छत पर स्वर्नतलश और फर्ष
31:06पर कोमल मखमली कालीन बिछे थे
31:10उनके बच्चे जो अब दिव्यवस्त्रों में थे, महल के विशाल कक्षों में खुशी से दौड रहे थे, हर कोने की
31:17भव्यता को देख कर अचम्भित हो रहे थे
31:21सुदामा को उनकी पत्नी ने एक अत्यंत आराम दायक स्वर्नज्रित सिनहासन पर बिठाया, जहां वे अभी भी अपने भाग्य पर
31:29विश्वास नहीं कर पा रहे थे
31:32उनकी पत्नी ने प्रेम पूर्वक उन्हें ताजे फल, स्वादिष्ट मिश्थान और शीतल पे परोसे, जो उनकी यात्रा की ठकान को
31:40मिटाने वाले थे
31:42शांत क्षणों में सुदामा ने अपनी पत्नी से पूछा की यह चमतकार कैसे हुआ, यह भव्य महल और यह अतुलनिय
31:51समरिध्धी कहां से आई
31:53उनकी पत्नी ने मुस्कुराते हुए समझाया की यह सब श्रीकृष्ण की अलौकिक क्रिपा का परिणाम था, जो उन्होंने बिना किसी
32:01इच्छा के ही प्रदान कर दी थी
32:04उसने बताया की जब सुदामा द्वार का गए थे, तभी एक रात उनके जोपडे में एक दिव्य प्रकाश फैला और
32:12देखते ही देखते वह भव्य महल में बदलने लगा
32:16उसने अपनी शुरुवाती घबराहट को याद किया, जब उसे लगा कि यह कोई भ्रम है, लेकिन खिर धीरे धीरे उसने
32:24इस अलौकिक परिवर्तन को भक्ती से स्विकार किया
32:28उसके बच्चे भी इस अद्भुत द्रिश्य को देखकर भयभीत होने की बजाय खुशी से उचल पड़े थे, जब उनके पुराने
32:36कपड़े दिव्य वस्त्रों में बदल गए
32:39पतनी की कहानी सुनकर, सुदामा को श्री कृष्ण की निस्वार्थ कृपा की पूरी गहराई का एहसास हुआ, जिन्होंने अपने मित्र
32:47के लिए बिना मांगे ही सब कुछ प्रदान कर दिया था
32:51उनकी आखों से श्रद्धा के आसू बह निकले, जो उनके हृदय में श्री कृष्ण के प्रती अटूत प्रेम और भक्ती
32:58को दर्शाते थे
33:00उन्हें द्वारका से लोटते समय, श्री कृष्ण का वह मधुर, स्नहमई मुस्कान याद आई, जो अब इस महादान का रहस्य
33:09बन गई थी
33:11सुदामा ने समझा कि सच्ची मित्रता और भक्ती का प्रतिफल कभी धनसमपदा नहीं होता, बलकि वह दिव्य प्रेम है, जो
33:19आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाता है
33:22उनके मन में अब किसी धनसमपदा का लोब नहीं था, बलकि श्री कृष्ण के उस निहस्वार्थ प्रेम का अनुभव था,
33:30जिसने उनकी आत्मा को सदा के लिए त्रिप्ट कर दिया
33:34अपने भव्य ग्रह में प्रवेश करते हुए भी, सुदामा का हृदय उसी सरलता और वैराग्य से भरा था, जो उन्हें
33:42वर्षों से प्रिये था
33:44उनकी धर्म पतनी सुशीला ने भी अपने पती के इस दिव्य भाव को समझा और सांसारिक वैभव से उपर उठकर
33:52भक्ती मार्ग पर अग्रसर हुई
33:55उन्होंने कभी धन का संचय नहीं किया, बलकि उसे दीनदुखियों और ब्राहमनों की सेवा में लगाया, जिससे उनकी आंतरिक शांती
34:04और बढ़ गई
34:06सुदामा ने अपनी शेश आयू भगवान की भक्ती में समर्पित की, जहां प्रति दिन वे श्री कृष्ण के नाम का
34:13जप और ध्यान में लीन रहते थे
34:16उनकी ख्याती दूर दूर तक फैल गई और लोग उनकी सादगी, भक्ती तथा श्री कृष्ण के प्रती उनके अटूट प्रेम
34:24को जानने के लिए उनके पास आने लगे
34:27सुदामा ने विनमरता पूर्वक अपने जीवन की गाथा सुनाई, जिसमें उन्होंने श्री कृष्ण की असीम कृपा और सच्ची भक्ती के
34:36महत्व को रेखांकित किया
34:38उनके बच्चे भी इस पवित्र वातावर्ण में पलेब्धे, जहां उन्हें सांसारिक मोह से अधिक भगवत भक्ती का पाठ सिखाया गया
34:47अपनी समरिध स्थिती के बावजूद, सुदामा ने कभी भी अपने सरल जीवन को नहीं त्यागा और हमेशा एक तपस्वी की
34:56भानती जीवन व्यतीत किया
34:58उनके घर से अब केवल धन की चमक नहीं, बलकि असीम शांती और भक्ती की दिव्य उर्जा का संचार होता
35:06था
35:08सुदामा की कथा सच्ची मित्रता, निशकाम भक्ती और भगवान की असीम क्रिपा का एक शाश्वत उदाहरन बन गई, जो दूर
35:16दूर तक फैल गई
35:18द्वारका में भगवान श्री कृष्ण अपने भक्त सुदामा की अविचल भक्ती को अनुभव कर मंदमंद मुस्कुराते हुए उनकी आंतरिक शांती
35:27से अवगत थे
35:29उनकी पट्रानिया, प्रुक्मिनी और सत्यभामा सहित, कृष्ण और सुदामा के इस अलोकिक प्रेम और मित्रता पर विस्मय से भर जाती
35:37थी
35:39श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया कि सच्ची भक्ती केवल निस्वार्थ प्रेम और समर्पण में निहित है न कि किसी भौतिक
35:46लाभ की इच्छा में
35:49उधर सुदामा अपने वैभव में भी निरलिप्त रहकर निरंतर भगवान के चर्णों में अपना मन लगाए हुए थे जो उनकी
35:57भक्ती की पराकाश था थी
35:59उनके पुराने मित्र और पडोसी जो उनकी पूर्व गरीबी के साक्षी थे उनकी इस अध्भुत स्थिती और अडिक भक्ती से
36:08चकित और प्रेरित हुए
36:10सुदामा ने उन्हें समझाया कि असली धन आत्मा की शुद्धी और भगवान के प्रती प्रेम है न की बाहरी भौतिक
36:18वस्तुए
36:19अपनी अंतिन सासों तक सुदामा भगवान के नाम का जब करते रहे और अंत्य पर्मानंद में लीन होकर वैकुंठ धाम
36:28को प्रस्थान किया
36:29इस प्रकार सुदामा की अमर कथा सदियों तक भगतों को सची श्रद्धा, निस्वार्थ प्रेम और अटूट मित्रता का पाठ पढ़ाती
36:38रही
36:39यह कथा भगवान और भक्त के बीच के अलौकिक संबंध को दर्शाती है, जहां धन संपत्ती नहीं, बलकि हृदय की
36:47पवित्रता ही सर्वोप्री होती है
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