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भागवत पुराण के ७२वें अध्याय में देखिए कैसे भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल के भाई दंतवक्र और विदूरथ का वध कर उनके तीसरे जन्म का उद्धार किया। वहीं दूसरी ओर, महाभारत युद्ध की विभीषिका से दूर रहने के लिए बलराम जी ने तीर्थयात्रा का मार्ग चुना। नैमिषारण्य में रोमहर्षण सूतजी के अहंकार का अंत और उग्रश्रवा सौती का उदय कैसे हुआ? जानिए इस अद्भुत गाथा में! #BhagavataPurana #KrishnaLeela #Balarama #DantavakraVadh #Naimisharanya #Mahabharat
Transcript
00:00जब करुष देश के महाशक्तिशाली राजा दंतवक्र को अपने परम मित्र साल्व और शिशुपाल की मृत्यु का समाचार मिला, तो
00:08उसका हृदय दारुन शोक और भीशन क्रोध की अगनी से धधक उठा.
00:13क्रोध से कापते हुए दंतवक्र ने अपने सिनहासन से खड़े होकर प्रतिज्याकी की वह अपनी गदा से श्रीकृष्ण के मस्तक
00:21के टुक्रे-टुक्रे करके ही दमलेगा.
00:24बिना किसी रत, घोडे या सेना के, उसने केवल अपनी विशाल गदा को उठा कर नंगे पैर ही द्वारका की
00:32ओर अकेले कूच करने का अटूट संकल्प लिया.
00:35अपने हाथों में शत्रों का काल बनने वाली उस वजर जैसी भारी गदा को संभालते हुए दंतवक्र महल की सीधियों
00:43से नीचे उतर आया.
00:45जब दंतवक्र करुष देश की सीमाओं से बाहर निकला, तो उसकी आखों में प्रतिशोध की ज्वाला और मन में केवल
00:53द्वारकापती श्रीकृष्ण का वध करने का उन्माद था.
00:58उसके भारी और क्रोधपूर्ण कदमों की धमक से धर्ती काप रही थी, और उसके मार्ग में आने वाले बड़ेब्रे पत्थर
01:05भी तूटकर बिखर रहे थे.
01:08मार्ग में पढ़ने वाले घने जंगलों को वह अपने विशाल हाथों से उजारता हुआ, एक विनाशकारी बवंदर की तरह द्वारका
01:16की ओर बढ़ता चला गया.
01:18उसका यह रौद्र रूप देखकर वनों के हिंसत पशुभी भयभीत होकर अपनी कंदराओं में छिप गए, क्योंकि साक्षात यमराज का
01:27अंश उसमें समाया हुआ प्रतीत हो रहा था.
01:31जैसे जैसे वह द्वारका के निकट पहुँच रहा था, उसका पुराना असुर भाव जागरत हो रहा था, जो कभी वैकुंठ
01:38का द्वारपाल जय था.
01:41उधर द्वारकापुरी में सरवग्य भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परमधाम की रक्षा और अपने भक्त के उध्धार के लिए दंतवक्र के
01:49आने की आहट को भाप लिया.
01:52द्वारका के भव्य पर कोटे और उसकी स्वर्णमे आभा को देखकर दंतवक्र के क्रोध की सीमान रही और उसने अपनी
02:00गदा को हवा में लहराया.
02:03समुद्र के तट पर पहुँचकर दंतवक्र ने इतनी भीशन गर्जनाकी की तीनों लोक डोल उठे और सागर की लहरे भी
02:11भै से उफनने लगी
02:13द्वारका के रक्षक और सैनिक उस भयानक दानव रूप राजा को देखकर भैभीत हो गए और तुरंट अपनी स्थिती मजबूत
02:21करने लगे
02:23बिना किसी भैके भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्यगदा कौमोदकी को धारण कर अकेले ही उस मदमत असुर का सामना करने के
02:31लिए आगे बढ़े
02:33जब दंतवक्र ने श्रीकृष्ण को अपनी ओर आते देखा तो उसकी पुरानी शत्रुता भड़क उठी और उसने अपनी गदा को
02:42भूमी पर पटक कर रेट उड़ा दी
02:45दंतवक्र ने चिल्लाते हुए कहा, हे कृष्ण, आज तु मेरे हाथों से नहीं बच सकता, मैं अपने भाई शिशुपाल और
02:54साल्व के वध का प्रतिशोध इसी क्षन लूँगा
02:58श्री क्रिश्ण ने अत्यंत शांत भाव से उसकी ओर देखा, क्योंकि वे जानते थे कि इस युद्ध के माध्यम से
03:05वे अपने द्वारपाल जय को शापमुक्त करने वाले हैं
03:10दंतवक्र ने अपनी पूरी शक्ती बटोरी और अपनी विशाल गदा को दोनों हाथों में पकड़ कर श्री क्रिश्ण पर प्रहार
03:18करने के लिए दोड़ पड़ा
03:20रेत के मैदान पर दोनों महायोधदा आमने सामने खड़े थे और एक महाविनाशकारी गदायुध का मंच पूरी तरह से तैयार
03:29हो चुका था
03:31दंतवक्र ने हवा में चलान लगाई और अपनी गदा से श्री क्रिश्ण के सिर पर प्रहार करने के लिए उसे
03:38पूरी ताकत से नीचे की ओर घुमाया
03:41दंतवक्र की विशाल भारी गदा श्री कृष्ण के सिर पर प्रचंड वेग से टक्राई परंतु भगवान हिमाचल की भांती पूर्णत्ह
03:49अविचल खड़े रहे
03:51इस विनाशकारी वार को भी निश्फल जाते देख दंतवक्र भय और अचरट से थर्थराते हुए दो कदम पीछे हट गया
04:00क्रोध से अंधे होकर दंतवक्र ने हुंकार भरी और श्री कृष्ण को उनके पिछले जन्मों के बैर की याद दिलाते
04:08हुए गालिया देनी शुरू कर दी
04:11दंतवक्र ने चिल्लाते हुए कहा कि आज वह यमुना के इसी पवित्र तट पर अपने भाई शिशुपाल और मित्र साल्व
04:19की मृत्यू का प्रतिशोध लेकर रहेगा
04:22उसकी कटू बातों और हुकारों को सुनकर भी जगतपालक श्री कृष्ण के मुखमंडल पर एक अलोकिक और शांत मुस्कान चाई
04:30रही
04:31भगवान श्री कृष्ण ने अत्यंत गंभीर वानी में कहा कि सनत कुमारों के शाप का अंत समया गया है और
04:39अब उसके वैकुंठ लोटने की घडिया पहुँची है
04:43क्रोध में पागल होकर दंतवक्र ने पुनह अपनी भारी लोहे की गदा को हवा में घुमाया और श्री कृष्ण पर
04:50दूसरा भयानक प्रहार करने के लिए जप्ता
04:53तब द्वार काधीश ने अपनी अलोकिक दिव्यगदा कौमोदकी का आहवान किया जो एक तीवर स्वर्णिन प्रकाश पुंच के साथ उनके
05:02हाथों में प्रकट हो गई
05:05दोनों महायोध्धाओं की विशाल गदाय आपस में टकराईं जिससे निकला भीशन गर्जन ऐसा था मानो आकाश में सैकडों बिजलिया एक
05:14साथ कड़क उठी हो
05:17दंतवक्र ने राक्षसी बल से एक के बाद एक कई घातक वार किये परन्तु श्रीकृष्ण ने अपनी कौमोदकी से उसके
05:25हर एक प्रहार को सहच्ता से विफल कर दिया
05:28यमुना का पावन जल उनके गदायुद के कमपन से अशान्त होकर उची लहरेन उठाने लगा और पूरा तट थर्थरा उठा
05:37अंत्य दंतवकर ने अपनी बची कुची शक्ती बटोरी और हवा में उचलकर श्रीकृष्ण के वक्षस्थल पर सीधे प्रहार का प्रयास
05:46किया
05:47श्री कृष्ण ने अत्यंत फूर्ती से एक ओर हटकर उसके वार को खाली कर दिया, जिससे दंतवक्र की गदा केवल
05:55रेत में जाधनसी
05:57अवसर पाते ही भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अलोकिक गदा कौमोदकी को आकाश में उपर उठाया और उसमें अपनी ब्रहमांडिय
06:05शक्ती का संचार किया
06:08श्री कृष्ण ने पूर्ण शक्ती के साथ अपनी कौमोदकी से दंतवक्र की चाती के मध्यभाग में एक अचूक और प्रल्यंकारी
06:16प्रहार किया
06:17उस प्रचन प्रहार से दंतवक्र का वक्षस्थल चकनाचूर हो गया और वह दूर रेत पर जागिरा
06:25मुह से रक्त की धारा बहाते हुए दंतवक्र कायाहीन होकर रेत पर पड़ा रहा और उसकी आखें श्री कृष्ण के
06:33शांत स्वरूप को निहारती रही
06:36जैसे ही दंतवक्र ने अपने अंतिम प्राण त्यागे उसके छिन्नभिन शरीर से एक अलोकिक और देधी प्यमान दिव्य जोती बाहर
06:44निकली
06:46वह प्रकाश पुंज आकाश को आलोकित करता हुआ सीधे भगवान श्री कृष्ण के श्री चर्णों में समाहित हो गया
06:54यमुना का तट पुना शान्थ हो गया और देवताओं ने वैकुंठ के अंतिम द्वारपाल के इस मुक्ति संग्राम पर प्रसन्न
07:01होकर आकाश से पुषपवर्शा की
07:05जैविजय के अंतिम शाप के निवारण के उपरांथ भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य कौमोद की गदा को विश्राम दिया
07:12और यमुना तट पर उपस्थित समस्त यादवों को आश्वस्त किया
07:18स्वर्गलोग से देवता और गंधर्व धोलन गाड़े बजाकर जगनात श्री कृष्ण की जैजैकार करने लगे क्योंकि वैकुंट के दोनों द्वारपाल
07:27पुनह निश्पाप होकर अपने परमधाम लोटने के योग्य बन चुके थे
07:31तत पश्चात श्रीहरी अपने सार्थी दारुक के साथ अपने सुवर्ण रथ पर सवार होकर द्वारकापुरी की ओर प्रस्थान कर गए
07:41द्वारका पहुचते ही भगवान श्रीकृष्ण को पांडवों के साथ हुए द्यूच्छल और द्रौपदी के अपमान की व्यथापूर्ण सूचना मिली
07:51इस महापाप का समाचार सुनकर श्रीकृष्ण की आखें क्रोध और न्याय के अटल संकल्प से प्रजवलित हो उठी
08:00दूसरी और शेशनाग के अवतार भगवान बलराम भारतवर्ष में घिरते हुए ग्रिह युद्ध के काले बादलों को देखकर अत्यंत दुहकी
08:08हुए
08:10बलराम जी के लिए भीम और दुर्योधन दोनों ही प्रियगदाशिश थे इसलिए उन्होंने किसी भी पक्षकी ओर से शस्त्रन न
08:18उठाने का धर्मनिष्ठ निर्णय लिया
08:21युद्ध के पाप और क्लेश से दूर रहने है तु बलराम जी ने भारत की पवित्र नदियों और तीर्थों की
08:27तीर्थ यात्रा पर निकलने का निश्चय किया
08:31उन्होंने प्रभास चेत्र से अपनी यात्रा प्रारंब की और पवित्र सरस्वती नदी के तटपर रिशियों के साथ तरपण एवा वैदिक
08:39अनुष्ठान किये
08:41अनेक राज्यों और वनों को पार करते हुए भगवान बलराम जहां भी जाते वहां के आश्रमों में रिशियों को शान्ती
08:49और भक्ती का दान देते
08:52निरंतर यात्रा करते हुए बलदेव अंतर परम पवित्र और रहस्यमय नैमिशारन्य क्षेत्र के घंगोर वनों में प्रविश्ठ हुए
09:00वहां हजारों वर्षों से रिशिमुनी संसार के कल्यान के लिए एक महान सहस्र वर्षिय सत्रयग्य का अनुष्ठान कर रहे थे
09:20प्रंतु व्यासपीट पर आसीन सूत जी, रोम हर्षन जो पुरानों का वाचन कर रहे थे अपने अहंकारवश बलराम जी को
09:28देख कर भी अपने स्थान से नहीं उठे
09:32बलराम जी ने भाप लिया कि व्यासपीट का अधिकारी होने के बावजूद इस वक्ता में नमरता और इश्वर भक्ती का
09:40अभाव है
09:42व्यासपीट की पवित्रता की रक्षा हे तू बलराम जी ने अपने हाथ में रखी कुशा घास के तिनके से सूतजी
09:49की ग्रीवा का स्पर्श किया
09:50उस अलोकिक तिनके के स्पर्शमात्र से रोम हर्शन सूत निश्प्रान होकर व्यासपीट से नीचे गिर पड़े और उनका अहंकार सदा
10:00के लिए समाप्थ हो गया
10:02यह देखकर रिशियों में खलबली मच गई उन्होंने बलराम जी से प्रार्थना की की उन्होंने सूतजी को दीरगायू का वर्दान
10:10दिया था
10:12बलराम जी ने रिशियों को आश्वस्त किया कि रोम हर्शन के परम ज्यानी और नमर पुत्र उग्रश्रवासू थी अब इस
10:20व्यासपीट को सुशोभित करेंगे
10:21इस प्रकार नैमिशारणे का यह महान धर्म संकट शांत हुआ और बलराम जी ने रिशियों के यग्ये को निशकंटक बनाने
10:30का उत्तरदायत्व स्विकार किया
10:33अपने भाई दंतवक्र को युद्ध भूमी की धूल में निश्प्रान पड़े देखकर वीर विदूरत का हृदय तीवरशोक और अत्यंत भयानक
10:42क्रोध से जल उठा
10:44अपने भाई की मृत्यू का प्रतिशोध लेने के लिए विदूरत ने अपनी विशाल तलवार को आकाश की ओर उठाया और
10:52भगवान श्री कृष्ण का अंत करने की भीशन प्रतिग्या की
10:55वह महाकरोधी असुर अपनी ढाल और तलवार को आपस में टकराते हुए सिंह की भांती दहाडा जिससे पूरी युद्धभूमी थर्थरा
11:05उठी
11:07अत्यंत तीवर गती से दौरते हुए विदूरत प्रित्वी को अपने पैरों तले कुचलते हुए सीधे भगवान श्री कृष्ण की दिशा
11:15में लपका
11:16दूसरी ओर शांत और अचुत भाव से खड़े भगवान श्री कृष्ण ने उस आते हुए भयानक दानव को अत्यंत सौमय
11:24और निर्भय द्रिष्टी से देखा
11:26श्री कृष्ण के समीप पहुचते ही विदूरत ने अपनी पूरी शक्ती बटोर कर अपनी विशाल तलवार से भगवान पर एक
11:34जानलेवा वार किया
11:37भगवान श्री कृष्ण ने अत्यंत सहर्ष्टा और अलौकिक चपलता से पीछे हटते हुए असुर के उस भारी प्रहार को व्यर्थ
11:44कर दिया
11:46अपना प्रहार खाली जाते देख विदूरत का क्रोध चरम सीमा पर पहुच गया और उसकी आखों से लाल अंगारे बरसने
11:54लगे
11:55वह असुर बार-बार अपनी धाल चमकाते हुए श्री कृष्ण को चुनोती देने लगा और अत्यंत कटू वचनों से उनका
12:03उपहास उड़ाने लगा
12:04तब लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपनी उंगली पर परम तेजस्वी और संहारक सुदर्शन चक्र का आहवान किया
12:15वह अलौकिक चक्र सूर्य के समान प्रजवलित होकर अत्यंत तीवर गती से घूमने लगा जिससे दिशाय प्रकाशमान हो उठी
12:25सुदर्शन चक्र के दिव्यतेज को देख कर भी काल के वश में आया विदूरत अपनी ढाल को आगे कर पागलपन
12:32में श्री कृष्ण की और जपता
12:35भगवान श्री कृष्ण ने बिना किसी प्रयास के अत्यंत मंद मुस्कान के साथ अपनी उंगली से उस महातेजस्वी चक्र को
12:42छोड़ दिया
12:44वह सुदर्शन चक्र कालगनी की भाती धधकता हुआ वायू को चीर कर विदूरत की ओर अत्यंत तीवर गती से आगे
12:52बढ़ा
12:53एक क्षण के भी तरही उस अमोग चक्र ने विदूरत की भारी धाल को छिन नभिन करते हुए उसका मस्तक
13:00धड़ से अलग कर दिया
13:02बिना मस्तक का वह विशाल असुर राज युद्ध भूमी की धूल में गिर पड़ा और उसके प्राण पखेरू उड़ गए
13:10उसी समयक विदूरत के शरीर से एक दिव्य जोती निकली और वह सीधे जाकर भगवान श्री कृष्ण के श्री चर्नों
13:18में बिलीन हो गई
13:20दुष्ट विदूरत के वध पर स्वर्ग के देवता हर्शित हो उठे और उन्होंने आकाश से भगवान पर पारिजात पुष्पों की
13:28वर्शा की
13:29अपना कार्य पूर्ण कर सुदर्शन चक्र वापस लोट आया और भगवान श्री कृष्ण ने अपने हाथ को नीचे कर युद्ध
13:37भूमी को शांत किया
13:39इस प्रकार विदूरत के विनाश के साथ ही संपूर्ण चेत्र में शांती स्थापित हुई और भगवान श्री कृष्ण परम गंतव्य
13:47की ओर अग्रसर हुए
13:50विदूरत के अंत के पश्चात जब भगवान श्री कृष्ण द्वार का लोटे तब समूचे भारतवर्ष पर महाभारत के विनाशकारी युद्ध
13:58के काले बादल चाने लगे थे
14:01द्वारका के राजसभा में पहुँचे दूतों ने जब पांडवों के द्युत क्रीडा में पराजित होने और द्रौपदी के चीरहरण का
14:08समाचार दिया तो संपूर्ण सभास्तब्ध रह गई
14:13दुर्योधन के अधर्म और शकुनी के छली शड्यंत्रों की गाथा सुनकर याद्वलोक में अत्यंत्रोश और शोक की ज्वाला भड़क उठी
14:22सात्यकी और प्रद्युम्न जैसे परंपराक्रमी यादव योध्धाओं ने अधर्मी कौर्वों का तत्काल विनाश करने हेतु सेनाप्ती के रूप में हस्तिनापुर
14:31पर आक्रमन की मांग की
14:34किन्तु सर्वग्य भगवान श्री कृष्ण ने कालचक्र के विधान को जानते हुए शांतचित रहकर युद्ध के सही समय और नीती
14:42का मर्म समझाया
14:44उसी समय अपने विशाल हल और गदा को धारण किये भगवान बलराम अत्यंत व्यथित हृदय से सभा मंडप के मध्य
14:51उपस्थित हुए
14:54बलराम का हृदय अपने दो प्रिय शिश्यों बलशाली भीम और गदा युद्ध में निपुन दुर्योधन के बीच होने वाले परस
15:01पर सहार को सोच कर काम उठा
15:04बलराम ने राजा उग्रसेन और कनहया की ओर देखते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे अपने दोनों ही शिश्यों
15:12पर शस्त्र उठाने का पाप कदापी नहीं करेंगे
15:16युद्ध में पूर्णत है तटस्त रहने का कठोर निर्नय लेते हुए बलराम ने घोशना की की वे इस भयंकर रक्तपात
15:23से दूर तीर थे आत्रा हेतु प्रस्थान करेंगे
15:27भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जैश्ट भ्राता बलराम के धर्मसंगत और निश्पक्ष निर्नय का पूर्ण आदर करते हुए उन्हें शीश जुका
15:36कर स्वीकृती प्रदान की
15:38द्वारका के भव्यस्वर्ण द्वारों पर वेदपाठी, ब्राहमनों और कुलपुरोहितों ने बलराम की महातीर थे आत्रा हेतु मांगलिक मंत्रों का पाठ
15:47प्रारंभ किया
15:49बलराम ने अपने राजसी रतनाभूशनों को त्याग कर सरल तीर थे आत्री वस्त्रधारन किये, किन्तु अपनी रक्षा हेतु अपना पवित्र
15:58हल और गदा साथ रखा
16:01महारानी रेवती और द्वारका के वयोवरिध नागरिकों ने आखों में अश्रु भरकर भगवान बलराम को भावुक विदाई दी
16:09द्वारका की पावन भूमी को नमन कर भगवान बलराम ने आर्यावर्थ की समस्थ पावन नदियों और तीर्थों की ओर अपने
16:17पक बढ़ा दिये
16:19आकाश मार्ग से देवगणों और महर्शियों ने बलराम के निश्पक्ष धर्मपत की सराहना करते हुए उन पर पुश्पवरिष्टी की
16:28उधर कुरुक्षेत्र की ओर संपूर्ण भारतवर्ष के राजा अपनी अपनी चतुरंगिनी सेना लेकर विनाशकारी महा युद्ध हेतु एकत्र होने लगे
16:37थे
16:39द्वारका के उचे जरोखे से बलराम को जाते देख श्री कृष्ण ने जान लिया कि अब उन्हें भी अर्जुन का
16:45सार्थी बनने की नियती पूर्ण करनी है
16:50राजनीतिक कोलाहल और भावी युद्ध की चाया से दूर बलराम पवित्र नदियों के तटों और रिशियों के शांत आश्रमों में
16:57विचर्ण करने लगे
16:59अपनी इस महातीर थे आत्रा के क्रम में भगवान बलराम का अगला गंतव्य प्रसिद्ध और रहस्यमई नैमिशारणे क्षेत्र बना जहां
17:08सहस्र वर्षों का महासत्र चल रहा था
17:11अपने हृदय में परमशांती और तपोबल संजोए बलराम ने नैमिशारणे के पवित्र तपोवन की सीमा में प्रवेश किया जहां एक
17:20नया इतिहास रचे जाने वाला था
17:24नैमिशारने के घने और पवित्र तपोवन में प्रवेश करते ही भगवान बलराम का सामना रिशियों की एक विशाल और शांत
17:32सभा से हुआ, जो यग्यकर्म में लीन थे
17:36बलराम जी के आगमन पर वहां उपस्थित, सभी महान, रिशी और तपस्वी आदरपूर्वक अपने स्थानों से उठ खड़े हुए, परंतु
17:44व्यास्पीठ पर आसीन सूत रोमहर्शन अपने स्थान पर ही बैठे रहे
17:50रोमहर्शन के इस अहंकार और मर्यादाहीन व्यवहार को देखकर बलराम जी के भीतर का धर्म प्रायन क्रोध जागरत हो उठा,
17:58क्योंकि पूजनिय अतिथियों का अनादर धर्म विरुद्ध था
18:03बिना किसी अस्त्रशस्त्र के मर्यादा की रक्षा हेतु बलराम जी ने केवल एक पवितर कुशाधास का तिनका उठाया और उसे
18:11अपनी आत्मिक शक्ती से अभिमंत्रित किया
18:15क्रोध में भरे बलराम ने अभिमंत्रित कुशा के तिनके से जैसे ही रोमहर्षन को स्पर्ष किया
18:21वैसे ही सूत जी के प्राण तत्क्षन उनके शरीर से मुख्थ हो गए
18:26सूत जी के निश्प्राण होकर भूमी पर गिरते ही संपून यग्यशाला में कोलाहल मच गया
18:32और सभी रिशिमुनी अत्यंत भयभीत और दुखी हो उठे
18:37रिशियों ने बलराम जी को बताया कि उन्होंने रोमहर्षन को इस यग्य के सुचारू संचालन के लिए
18:43दीरगायू और विशेश वर्दान दिये थे जो अब असमय ही समाप्थ हो गया
18:49अपनी भूल का असास होने पर परमार्थी बलराम ने रिशियों से इस ब्रहमहत्या के पाप का प्रायश्चित करने का मार्ब
18:57पूछा क्योंकि वे धर्म की रक्षा करना चाहते थे
19:01रिशियों ने प्रार्थनाकी की रोम हर्षन के पुत्र उग्रश्रवा को उनके पिता का सारा ज्यान, स्मृती और दीरघायू प्राप्थ हो
19:09ताकी यह महान कथा प्रमपरा जीवित रह सके
19:13बलराम जी ने तुरंट अपनी दिव्य शक्ती से उग्रश्रवा को आशिर्वाद दिया, जिससे वे समस्त पुराणों और वेदों के परमग्याता
19:21के रूप में प्रतिष्ठित हो गए
19:24प्रायश्चित के रूप में रिशियों ने बलराम जी को भारतवर्ष की सभी पवित्र नदियों और तीर्थों में एक वर्ष तक
19:31स्नान वध्यान करने का परामर्ष दिया
19:34इस प्रकार नैमिशारने की भूमी से विदा लेकर भगवान बलराम ने भारतवर्ष की एक महान और पावन तीर थेयात्रा का
19:43श्रीगनेश किया
19:45बलराम जी सबसे पहले पवित्र सरस्वती नदी के तट पर पहुँचे जहां उन्होंने वेदमंत्रों के सस्वर उच्चारन के बीच पावन
19:53जल में डुबकी लगाई
19:55इसके पश्चात उन्होंने मागंगा के हरिद्वार स्थित द्वार पर जाकर स्नान किया जहां की शीतल धारा ने उनके मन को
20:04अत्यंत शांती प्रदान की
20:06तीर्थ यात्रा को आगे बढ़ाते हुए बलराम जी प्रभास छेत्र पहुँचे जहां उन्होंने पवित्र समुद्र तट पर अनेक यज्य और
20:15दानपुने के कार्य संपन्न किये
20:18दक्षिन दिशा की ओर कदम बढ़ाते हुए वे घने विंध्याचल परवतों से गुजरे जहां उन्होंने एकांत गुफाओं में बैठकर मौन
20:26तपस्या की
20:28गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी दक्षिन की पवित्र नदियों के संग्मों पर जाकर उन्होंने पित्रितरपन किया और रिशियों का आशिरवाद
20:37लिया
20:38बलराम जी ने प्रसिद्ध कांची पुरम और श्रीरंदम के विशाल मंदिरों का दर्शन किया जहां उन्होंने परमेश्वर विश्नु के श्रीविग्रह
20:47की भावपून पूजा की
20:49समुद्र के अंतिम छोर पर स्थित कन्या कुमारी पहुँचकर उन्होंने मा भगवती के दर्शन किये और वहां सागर के गर्जन
20:57के बीच ध्यान लगाया
20:59अंतर रामेश्वरम में महादेव के दिव्य शिवलिंग का पूजन कर बलराम जी की यह एक वर्ष की महातीर थेयात्रा सफलता
21:07पूर्वक संपन हुई
21:10रामेश्वरम में महादेव का पूजन संपन करने के पश्चात भगवान बलराम सिद्धों की तपोभू में नैमिशारणय की ओर बढ़ चले
21:20नैमिशारणय के अत्यंत पवित्र और शांत वन में रिशियों का एक विशाल समूह बारा वर्षों तक चलने वाले महायग्य का
21:27अनुष्ठान कर रहा था
21:29नील वस्त्रों से सुशोभित और अलौकिक कांती से दीप्तिमान होकर भगवान बलराम ने उस विशाल यग्यस्भा में अपना दिव्यचरण रखा
21:40बलराम जी के प्रवेश करते ही संपूर्ण यग्यशाला शेशनाग की अलौकिक आभा और दिव्य उर्जा से प्रजवलित हो उठी
21:49अनंत शेश के इस तेजस्व स्वरूप को देखते ही सभा में उपस्थित समस्थ महर्शी और मुनि अत्यंत आदर से उठकर
21:57खड़े हो गए
21:58समस्थ ज्यानियों और संतों ने भगवान बलराम के श्रीचर्णों में विन्मृता पूर्वक मस्तक जुका कर उनका अभिनंदन किया
22:07किन्तु उचे व्यासपीठ पर आसीन महर्शी वेदव्यास के शिश्य रोमहर्शन सूट अपने स्थान पर गर्व से बैठे ही रहे
22:27और शास्त्रों के गहन अध्ययन के पश्चात भी रोमहर्शन का हृदय ज्यान के मिथ्या दंब से भर चुका था
22:35वे स्वयं को इस सभा का सर्वोप्री आचार्य मानकर बलराम जी को केवल एक साधारन यदुवन्शीक शत्रिय समझने की भूल
22:43कर बैठे
22:45भगवान बलराम ने रोमहर्शन के इस घोर अहमकार और व्यास्पीट के अनुचित दुरुप्योग को भलीभांती भांप लिया
22:54यग्यशाला में उपस्थित अन्यमुनिगन रोमहर्शन की इस धृष्टता को देखकर मन ही मनभय और चिंता से कांप उठे
23:03शास्त्र ज्यान के अभिमान द्वारा भक्ती और विनय के हनन को देखकर बलराम जी के नेत्रों में धर्मस्थापना का क्रोध
23:10उमड पड़ा
23:12बलराम जी ने सोचा कि यदि ज्ञान मनुष्य को नमर न बना सके तो वह ज्ञान केवल एक हानिकारक भार
23:19और अधर्म बन जाता है
23:22गंभीर और गर्जन्युक्त स्वर में बलराम जी ने व्यास्पीठ पर बैठे रोम हर्षन के इस अनुचित व्यवहार पर प्रशन उठाया
23:31आमकार के वशीभूत होकर रोम हर्षन सूत अब भी मौन रहे और उन्होंने इश्वर के अवतार से क्षमा मांगने की
23:39चेश्टा नहीं की
23:41संपूर्ण यग्यशाला का वातावर्ण अत्यंत स्थब्ध हो गया, मानो समय स्वयं ठहर कर आने वाले न्याय की प्रतीक्षा कर रहा
23:49हो
23:50बलराम जी ने एक कदम आगे बढ़ाया और उनका तेजस्वी स्वरूप अधर्म के विनाश के लिए तत्पर हो गया
23:59यग्यकुंड की पावन लप्ते बलराम जी के बढ़ते क्रोध के साथ और अधिक भीशन तथा लाल होकर धधकने लगी
24:08रोमहर्शन के इस अक्षमय दंभ का अंत करने और धर्म की मर्यादा स्थापित करने के लिए भगवान बलराम ने अंतिन
24:15निर्णय लिया
24:17भगवान बलराम ने भूमी पर पड़े एक साधारन पवित्र कुशा घास के तिनके को अपनी उंगलियों में धीरे से उठा
24:24लिया
24:26सभा में उपस्थित सभी रिशियों ने कौतु हल और भै से देखा कि बलराम जी ने अपने हल या गदा
24:32के स्थान पर केवल एक त्रिन उठाया है
24:37बलराम जी के अनन्त स्वरूप से प्रस्फुटित होती अलौकिक उर्जा उसकुशा घास के तिनके में बजर के समान समाहित होने
24:44लगी
24:46उच्च व्यासपीट पर विराजमान रोमहर्शन अब भी अपने शास्त्रग्यान के अहंकार में लीन होकर निश्चिंत बैठा रहा
24:54धर्म की मर्यादा पुनरस्थापित करने के लिए बलराम जी अत्यंत शान्त किंतु द्रिढ कदमों से व्यासपीट की ओर बढ़े
25:03बलराम जी ने बिना किसी प्रयास के उस कुशा घास की नोक से रोमहर्शन के मस्तक को धीरे से स्पर्श
25:10कर दिया
25:12स्पर्श होते ही एक अत्यंत तीवर और अलौकिक नीलासवन प्रकाश व्यासपीट से प्रसफुटित होकर पूरी यग्यशाला में फैल गया
25:21बिना किसी कश्ट अत्वा पीडा के रोमहर्शन का प्रान्प खेरू उसके अहंकारी देह को छोड़कर ततकाल मुक्त हो गया
25:30ज्यानी किन्तु दंभी सूत रोमहर्शन का निश्परान शरीर व्यासपीट पर धीरे से एक और जुप गया
25:36इस अकलपनी अघटना को देखकर नैमिशारने के समस्त मुनिगन स्तब्ध रह गये और पूरी सभा में सन्नाट आचा गया
25:46यज्यवेदी की पवित्र अगनी अचानक उपर उठी मानो उसने इश्वर के इस निश्पक्ष न्याय पर अपनी स्वीकृती की मुहर लगा
25:55दी हो
25:56भगवान बल्राम ने कुशा के तिनके को त्याग दिया और अपने शांत एवं गंभीर स्वरूप में धर्म के रक्षक के
26:04रूप में खड़े रहे
26:06उपस्थित ज्यानियों को यह महान सत्य समझ में आ गया कि भक्ती और नमर्ता के बिना ज्यान केवल एक व्यर्थ
26:13बोज है
26:15तत्पश्चात, महर्शिगन भय और आदर से हाथ जोड कर भगवान बल्राम के समक्ष अत्यंत नमर्ता पूर्वक उपस्थित हुए
26:24रिशियों ने कापते स्वर में निवेदन किया कि रोमहर्षन को उन्होंने दीरगायू और व्यास्पीट का विशेश अधिकार प्रदान किया था
26:34मुनियों ने प्रार्थना की कि इस घटना से रिशिवचन और पुरान कथा की अखंड परमपरा पर कोई आच ना आए
26:42भगवान बलराम ने रिशियों की चिन्ता को समझा और आश्वस्त किया कि अधर्म का दंड देने के बाद भी धर्म
26:50प्रमपरा अक्षुन रहेगी
26:52बलराम जी ने न्याय पूर्वक घोशना की की रोम हर्षन का अत्यंत विनम्र और भक्तिमान पुत्र उग्रश्रवा इस व्यास्पीट का
27:00नया अधिकारी होगा
27:03बलराम जी का यह परम क्रिपालू और धर्मयुक्त नेनै सुनकर समस्त नैमिशारने छेत्र रिशियों के जैजैकार से गुँझ गुठा
27:12युवा सूत उग्रश्रवा ने हाथ जोड कर नमरता पूर्वक व्यास्पीट को प्रणाम किया और पुराणों के इस पावन ज्यान को
27:20आगे बढ़ाने का संकल्प लिया
27:22इसके उपरांथ रिशियों ने अत्यन्त विनमरता पूर्वक भगवान बलराम से निवेदन किया कि उन्होंने पूर्व में रोमहर्शन को दीरधायू और
27:32व्यास्पीट का अमोग वर्दान प्रदान किया था
27:36मुनियों ने संकोच पूर्वक समझाया कि रोमहर्शन की असमय मृत्यू से उनके द्वारा दिये गए वर्दान में विधन पड़ा है
27:44जिसे दूर करना धर्म रक्षा के लिए अत्यन्त आवश्चक है
27:49भगवान बलराम ने रिशियों की चिंता और धर्म संकट को पूर्ण सहानु भूती के साथ समझा और उनके प्रती अपनी
27:57अगाद श्रद्धा व्यक्त की
28:00बल्देव जी ने रिशियों से मधूर स्वर में कहा कि वे ब्रह्मावर्थ और धर्म की सर्वोच मर्यादा की रक्षा के
28:07लिए हर संभव उपाय करने हेतु तत्पर है
28:11उन्होंने रिशियों से सहर्ष आग रह किया कि वे ऐसा उप्युक्त प्रायश्चित बताएं जिससे उनके वर्दान की सत्यता भी बनी
28:19रहे और धर्म का विधान भी सुद्रिड हो
28:22यह सुनकर महर्षी शौनक और अन्य तपस्वियों ने परस्पर विचार विमर्ष कर धर्म शास्त्रों के अनुकूल उत्तम समाधान की खोज
28:32प्रारंब की
28:34रिशियों ने बताया कि यद्यपी यह घटना अन्जाने में हुई फिर भी लोग कल्यान के लिए एक वर्ष की पवित्र
28:40भारत्तीर थे आत्रा का नियम उत्तम प्रायश्चित होगा
28:45इसके साथ ही रिशियों ने नैमिशारणिय में व्याप्त एक अन्य भयंकर संकट की ओर भगवान बलराम का ध्यान आकर्शित किया
28:54उन्होंने प्रकट किया कि इलवल का पुत्र बलवल नामक महाबलशाली राक्षस प्रत्येक पर्व तिथी पर उनके इस पवित्र यग्य में
29:02बाधा डालता है
29:05रिशियों ने दुखी होकर बताया कि वह पापी राक्षस यग्यवेदी पर रुधिर, मास और अपवित्र वस्तूओं की वर्षा करके समस्थ
29:13हवन को दूशित कर देता है
29:16तपस्वियों ने बलराम जी से कातर भाव से प्रार्थनाकी की वे उस दुष्ट बलवल का सहार करके इस महायग्य को
29:23पूर्णतह निशकन तक बनाए
29:26भगवान बलराम ने रिशियों के दोनों प्रस्तावों को सहर्ष स्विकार करते हुए असुर सनहार और तीर्थ हयात्रा का द्रिड संकल्प
29:34लिया
29:35बलभद्र जी ने आश्वस्ट किया कि वे सर्वप्रथम उस दुराचारी बलवल को यमलोक भेजेंगे और तत्पश्चात समस्थ पावन तीर्थों की
29:44यात्रा करेंगे
29:47बलराम जी के इस धर्मयुक्त आश्वासन को सुनकर समस्थ नैमिशारने के रिशियों के हृदय में अपार संतोष और आनंद की
29:55लहर दोड़ गई
29:57व्यास्पीट पर विराजमान उग्रश्रवा ने भी भगवान बलराम के इस अनुपम न्याय और संरक्षन हेतु अपने हाथ जोड़कर आभार व्यक्त
30:06किया
30:07पूरे आश्रम परिसर में होम की सुगंधित आहुतियों का धुआ उठने लगा और पवित्र वेद मंत्रों की ध्वनी पुनः गुंजायमान
30:15होने लगी
30:17भगवान बलराम ने आगामी युद्ध की तैयारी करते हुए अपने दिव्य हल और विशाल मुसल का ध्यान किया जो तुरंत
30:25उनके हाथों में प्रकट हो गए
30:28रिशियों ने उच्साह पूर्वक बलराम जी के मस्तक पर पवित्र भस्म, कुमकुम और अक्षत का विज्यतिलक लगा कर उन्हें आशिरवाद
30:36दिया
30:37भगवान बलराम ने अपने शांत किन्तु तेजस्वी रूप में रिशियों की चरंधूली को मस्तक से लगाया और धर्मरक्षा के लिए
30:45कटिबद्ध हुए
30:46इस प्रकार नैमिशारन्य की यह पावन सभा असुर के विनाश और भगवान बलराम की आगामी महातीर थेयात्रा की उच्सुकता से
30:56प्रतीक्षा करने लगी
30:58रिशियों के प्रेमपूर्ण आग्रह को स्वीकार करते हुए भगवान बलराम ने रोमहर्षन के पुत्र उग्रश्रवा सौती को अपने पिता का
31:06स्थान ग्रहन करने के लिए आगे बुलाया
31:10महर्शी शौनक ने अत्यंत आदर पूर्वक बलराम जी के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थनाकी की उग्रश्रवा को सभी पुरानों और शास्त्रों
31:19का परम ज्यान प्राप्थ हो
31:21भगवान बलराम ने मुस्कुराते हुए उग्रश्रवा को व्यास्पीट पर बैठने का निर्देश दिया ताकि वे सभी रिशियों को ज्यान गंगा
31:30से त्रिप्थ कर सकें
31:32उग्रश्रवा सौती ने परम श्रध्धा से अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ भगवान बलराम के चर्णों का स्पर्श किया और उनका आशिर्वाद
31:41मांगा
31:42बलराम जी ने अपने विशाल और कोमल हाथ को उग्रश्रवा के मस्तक पर रखा जिससे एक अलौकिक दिव्य चेतना का
31:50संचार होने लगा
31:52उस दिव्य स्पर्श के स्पर्श मात्र से उग्रश्रवा के अंतहकरण में संपूर्ण वेदों, पुराणों और इतिहास का संपूर्ण ज्ञान स्वतह
32:00ही प्रकट हो गया
32:03उपस्थित सभी रिशियों ने हर्शित होकर वैदिक मंत्रोच चार किया और नैमिशारने का कोना-कोना इस पवित्र ध्वनी से गूँझ
32:11उठा
32:12ज्यान के इस महान सागर में स्नान करने के बाद उग्रश्रवा सौती का मुखमंडल एक नए और अध्भुत तेज से
32:20चमकने लगा
32:22उन्होंने व्यास्पीट पर विराज मान होकर रिशियों को प्रणाम किया और अत्यंत मधुर स्वर में पहले पुरान प्रसंग की व्याख्या
32:30आरंभ की
32:31इस प्रकार उग्रश्रवा सौती का उदे हुआ जो भविश्य में संपूर्ण मानव जाती को महाभारत और पुरानों का दिव्य संदेश
32:40सुनाने वाले थे
32:42सूत जी के उत्तराधिकारी की स्थापना के पश्चात भगवान बलराम ने अपने प्रायश्चित और पवित्री करण के नियमों को पूर्ण
32:50करने का निश्चय किया
32:52वे पवित्र सरस्वती नदी के तटकी ओर बढ़े जहां शीतल और निर्मल जल कलकल ध्वनी के साथ बह रहा था
33:01बलराम जी ने विध्यविधान के साथ सरस्वती के पावन जल में डुबकी लगाई जिससे उनके मस्तक पर लगे सभी क्लेश
33:09और दोश समाप्थ हो गए
33:12नदी से बाहर निकल कर उन्होंने सूर्यदेव और पूर्वजों को तरपन अर्पित किया जिससे चारों और एक परमशान्ती का प्रसार
33:20हुआ
33:22वहां उपस्थित विद्वान ब्राहमनों को बलराम जी ने सोने के आभूशनों से सजी हजारों दुधारु गाएं दान में दी
33:30शुद्ध होकर और सभी दिव्य अनुष्थानों को पूरा कर बलराम जी का दिव्य रूप शरद रितु के चंद्रमा की भाती
33:37देदी प्यमान हो उठा
33:40रिशियों ने अत्यंत श्रद्धा पूर्वक बलराम जी के चर्नों में विदाई के पुष्प अर्पित किये और उनके यश्का गान किया
33:49नैमिशारने के रिशियों से विदा लेकर भगवान बलराम ने भारतवर्ष के अन्य पावन तीर्थों की ओर अपनी यात्रा पुनह प्रारंब
33:57की
33:58उनके जाने के बाद नैमिशारने का तपोवन फिर से शांत और दिव्य ज्यान की चर्चाओं से गुंजायमान हो उठा
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