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सूर्यवंश की अद्भुत गाथा जारी है! 👑 इस नए एपिसोड में, शुकदेव जी राजा परीक्षित को महाराज कलुषपाद (सौदास) के वंशज, राजा असमक और उनके वीर पुत्र मूलक की कहानी सुनाते हैं। एक ओर जब भगवान परशुराम अपने क्रोध से पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन कर रहे थे, तब कैसे मूलक ने अपनी मां की बुद्धि से सूर्यवंश की जड़ों को बचाया? 🛡️ उनकी इस अनोखी गाथा के बाद, हम मिलेंगे महान राजा खट्वांग से, जिन्होंने मृत्यु को हराकर परम सत्य का साक्षात्कार किया। यह एपिसोड आपको धर्म, त्याग और भक्ति के नए आयामों से परिचित कराएगा! #BhagavataPurana #Suryavamsa #Parashurama #Mulaka #Khatvanga #HinduMythology #Puranas #Vishnu #Dharma
Transcript
00:00शुकदेव जी, शांत भाव से बैठे महाराज परीक्षित को सम्बोधित करते हुए, सूर्यवंश के महान शासक महाराज कलुषपाद की कथा
00:09का अगला अध्याय सुनाने लगे, जिसमें उनके गहरे पश्चाताप और मुक्ती की गाथा छिपी थी.
00:16महाराज कलुषपाद, जिन्हें सौदास और मित्रसह भी कहा जाता था, अपने महल के एकांत कक्ष में गहन वेदना और अपराध
00:25बोध से घिरे हुए थे, उनके अतीत के कर्मों का भार उनकी आत्मा को कुछ ले जा रहा था.
00:32रानी मध्यन्ती अपने पती के कष्टों को देखकर स्वयभी गहरी पीडा में थी, उनकी आखों में एक अनकही चिंता और
00:40उनके हृदय में एक मौन प्रार्थना थी, कि इस अभिशाप से मुक्ती मिले.
00:46अपने राज्य और प्रजा के घट्ते वैभव को देखते हुए, कलुषपाद ने अन्तह अपने पापों का प्रायश्चित करने और रिशी
00:54वशिष्ट से मार्ग दर्शन प्राप्त करने का द्रेड संकल्प किया.
00:59महाराज कलुषपाद ने राजसी वस्त्रत्याग कर एक सामान्य तपस्वी का वेश धारण किया और गेहन आत्म खोज के मार्ग पर
01:07चलते हुए, रिशी वशिष्ट के पवित्र आश्रम की ओर प्रस्थान किया.
01:13अनेकों दिनों की यात्रा के पश्चात, कलुषपाद उस शान्त कुटिया के समक्ष पहुँचे जहां रिशी वशिष्ट अपनी दिव्य आभा से
01:20वातावर्ण को पवित्र कर रहे थे, और उनके दर्शन मात्र से ही उनके मन को कुछ शान्ती मिली.
01:28कलुषपाद ने रिशी वशिष्ट के चर्णों में स्वयं को समर्पित करते हुए, अपने समस्थ पापों और अभिशापों की कथा विस्तार
01:36से सुनाई, रिशी ने धैर्य पूर्वक और करुणा से भरी आखों से उनकी व्यथा सुनी.
01:42समस्थ वृत्तांत सुनने के बाद, रिशी वशिष्ट ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से कलुषपाद की आत्मा को देखा और उन्हें शुद्धिकरन तथा
01:51पापों से मुक्ती हेतु कठोर प्रायश्चित और विशिष्ट अनुष्ठानों का मार्ग सुझाया.
01:57कलुषपाद ने रिशी के आदेश का पालन करते हुए भोर की शीतल वेला में एक पवित्र नदी के घाट पर
02:04स्नान किया और उसके बाद ध्यान मुद्रा में बैठ कर अपने मन को एकाग्र किया.
02:10वन की गेहन शांती में महाराज कलुषपाद ने कई दिनों तक कठोर तपस्या की निराहार और निश्चर रहकर उन्होंने अपनी
02:18आत्मा को शुद्ध करने का हर संभव प्रयास किया.
02:23उनकी तपस्या की अगनी से उनके शरीर और मन से पापों का कलुष धुलने लगा और धीरे धीरे उन्हें उस
02:30भयानक ब्राहमन शाप से मुक्ती का अनुभव होने लगा.
02:34कई महीनों के कठोर तप के उपरांत कलुष पाद के चहरे पर एक अलौकिक शांती और उनके हृदय में निर्मलता
02:42का वास हुआ, वे अब वास्तविक अर्थों में शुद्ध और पाप मुक्त थे.
02:47पुनह अपने राज्य लोटते ही, महाराज कलुष पाद ने अपने सिनहासन पर एक नए राजा के रूप में विराजमान होकर,
02:55अपनी प्रजा पर अपनी शुद्धी का प्रकाश फैलाया और न्यायपूर्ण शासन स्थापित किया.
03:02राणी मध्यन्ती अपने पती के इस अद्भुत परिवर्तन को देखकर अत्यंत हर्शित हुई, उनके हृदय में एक गहरी शान्ती और
03:11आखों में वर्षों बाद सच्ची प्रसन्ता के आसु उमड़ आए.
03:15राज्य में सुक्षान्ती लौट आई थी, किन्तु सूर्यवंश की निरंतर्ता और भविश्य की आशा के लिए महाराज और महारानी के
03:24हृदय में एक योग्य उत्तराधिकारी की कामना अभी भी शेश थी.
03:29एक शांत संध्या में, राणी मध्यन्ती ने अपने पती कलुषपाद के समक्ष अपनी हार्दिक इच्छा प्रकट की, कि अब उन्हें
03:38सूर्यवंश के गौरव को आगे बढ़ाने वाला एक पुत्र चाहिए.
03:42अपनी राणी की कामना को सुनकर, महाराज कलुषपाद पुनह रिशी वशिष्ट के पास पहुँचे, और उनसे सूर्यवंश के लिए एक
03:51तेजस्वी उत्तराधिकारी के जन्म हेतु आशिरवाद मांगा.
03:55रिशी वशिष्ट ने अपनी तप शक्ती से एक पुत्रिष्टी यग्य का विधान किया, जिसके प्रभाव से राणी मध्यन्ती को एक
04:03पराक्रमी पुत्र रत्न की प्राप्ती का आशिरवाद मिला.
04:08शुभ महूर्त में राणी मध्यन्ती ने एक सुन्दर और स्वस्थ शिशु को जन्म दिया, जिससे पूरे महल में आनंद की
04:15लेहर दोड़ गई और भविश्य के लिए एक नई आशा का संचार हुआ.
04:21उस नवजात शिशु का नाम अस्मक रखा गया, जो सूर्यवन्ष की निरंतरता और एक उजजवल भविश्य का प्रतीक बना, जैसे
04:29अंधकार के बाद एक नई भोर का उदे होता है.
04:34अस्मक ने अपनी माता मध्यन्ती और गुरु वशिष्ट के साननिध्य में एक धर्म प्रायन और वीर राजकुमार के रूप में
04:42अपना बचपन व्यतीत किया, जहां उन्होंने धर्म और शस्त्रविद्या दोनों में निपुन्ता प्राप्त की.
04:49योवन की दहलीज पर कदम रखते ही अस्मक का राज्या भिशेक हुआ और उन्होंने सूर्यवन्ष की पवित्र गद्धी संभाली प्रजा
04:57ने एक न्यायप्रिय और कुशल शासत की आशा में उनका हर्शोलास से स्वागत किया.
05:04अस्मक के शासनकाल के आरंभिक वर्ष शांती और समरिध्धी से ओतप्रोथ थे, जहां धर्म और न्याय की पता का हर
05:12दिशा में लहराती थी और प्रजा सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी.
05:17किन्तु जैसे जैसे समय बीटता गया, प्रित्वी के कुछ क्षत्रिय राजाओं के हरिदय में अहंकार और सत्ता का लोग धीरे
05:25-धीरे जड़े जमाने लगा, जिससे धर्म की मर्यादा भंग होने लगी.
05:30छोटे-मोटे विवाद और स्थानिय जगडे अब न्याय के बजाय बल और भय से सुलजाए जाने लगे, जो समाज में
05:38बढ़ती हुई अराजक्ता का स्पष्ट संकेट था.
05:42प्रजा के चहरों पर पहले की प्रसन्नता अब धीरे-धीरे चिन्ता और भय में बदलने लगी, क्योंकि न्याय की पुकार
05:49अक्सर अनसुनी रह जाती थी.
05:52दूरस्थ वनों और आश्रमों में तपस्यारत रिशियों ने प्रिथवी पर बढ़ते इस अधर्म को अपनी दिव्यद रिष्टी से देखा, और
06:00उनके शान्त हृद्यों में भी चिन्ता की लहरें उठने लगी.
06:05एकत्रत होकर उन्होंने प्रिथवी पर व्याप्थ होते अन्याय और अनैतिक्ता पर गंभीर विचारविमर्श किया, यह समझते हुए कि अब एक
06:14बड़े परिवर्तन की आवश्चक्ता है.
06:17उनकी चर्चा में यह स्पष्ट हो गया कि कुछ राज्यों में धर्म के सिध्धान्तों का घोर उलंगन हो रहा था,
06:24जहां बलही अधिकार और सत्ता का अंतिन निर्नायक बन चुका था.
06:29अपने महल में राजा अस्मक को विभिन स्रोतों से बढ़ते हुए अत्याचारों और अशान्ती की खबरें मिलती रही, जिससे उनके
06:37न्यायप्रिय हृदय में गहरी व्यथा उत्पन हुई.
06:41विशेश रूप से एक शक्तिशाली और अहंकारीक शत्रिय राजा ने अपने सामराज्ज में रिशियों और ब्राहमनों का भी अपमान करना
06:50शुरू कर दिया था, जिससे धार्मिक मर्यादाय भंग हो रही थी.
06:55गावों में भय का माहौल व्याप्त था, जहां भूखे बच्चे और लाचार वृद्ध अपनी किस्मत को कोस्ते हुए, केवल जीवित
07:03रहने के लिए संधर्ष कर रहे थे.
07:07प्रित्वी स्वय अपने उपर बढ़ते इस अधर्म के बोज से कराह रही थी, जैसे उसकी उर्वर्ता और शांती क्षीन होती
07:15जा रही हो.
07:16एक गहरे वन में ध्यानमगन एक महान रिशी अपने गहन समाधी से विचलित होते हुए, प्रित्वी से उठती करून पुकारों
07:25और अधर्म की तरंगों को स्पष्ट रूप से महसूस करने लगे.
07:30स्वर्गलोक में भी देवगन प्रित्वी पर बढ़ते इस अनैतिक्ता और पाप को देखकर चिंतित हो उठे, यह समझते हुए कि
07:38अब दैविय हस्तक्षेप अप्रिहार यहो गया है.
07:42प्रित्वी से उठती निरीः प्रजा की करून पुकारें और रिशियों की तपस्या की शक्ती एक अधरिश्य धारा के रूप में
07:49स्वर्गलोक तक पहुँचने लगी, जो देवताओं के हृद्यों को विचलित कर रही थी.
07:56जैसे एक विशाल काली छाया धीरे-धीरे सूर्य के प्रकाश को ढख लेती है, वैसे ही अधर्म की बढ़ती शक्ती
08:03ने प्रित्वी के कोने-कोने में अपनी पकड मजबूत कर ली थी.
08:08अस्मक अपने महल में उदास बैठे थे, उनके कंधों पर सूर्यवंश के सम्मान और अपनी प्रजा के कल्यान की भारी
08:16जिम्मेदारी का बोज स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था.
08:20प्रित्वी पर हर दिशा से असहाय लोगों की सामुहिक चीखें अब इतनी तीवर हो चुकी थी, कि वे मौन को
08:27चीर कर न्याय के लिए एक असहनिय पुकार बन गई थी.
08:32इस प्रकार प्रित्वी पर बढ़ते अधर्म ने एक ऐसी प्रिष्ठ भूमी तैयार कर दी थी, जहां प्रकृती के संतुलन को
08:39पुनह स्थापित करने के लिए एक भयावा, किन्तु आवश्यक, दैविय हस्तक्षेप, अप्रिहार यहो चला था.
08:47इस प्रकार प्रित्वी पर बढ़ते अधर्म और अनाचार ने एक ऐसी प्रिष्ठ भूमी तैयार कर दी थी, जहां प्रकृती के
08:54संतुलन को पुनह स्थापित करने के लिए एक भयावा, किन्तु आवश्यक, दैविय हस्तक्षेप, अप्रिहार यहो चला था, जिसकी प्रत
09:32दीक्षा में स्वय देवगण भी थे।
09:33के छठे अंश के रूप में इस धर्ती पर अवतरित हुए थे।
10:14कर रहा था, जिसने उनकी बुद्धी को दूशित कर दिया था।
10:20जहां उन्हें आश्रय की आवश्यक्ता थी।
10:24महरशी जमदगनी ने अपने आश्रम में आय थके हुए राजा और उनकी विशाल सेना का अपनी दिव्य कामधेनु के अध्भुत
10:32सामर्थ्य से भव्य आतिथ्य सतकार किया, जिसने सभी को विस्मय से भर दिया।
10:38कामधेनु के चमतकारी गुनों और उसकी असीम प्रचुर्ता को देख कर राजा कार्तवीर्य अर्जुन का मन लोब से भर गया
10:47और उन्होंने रिशी से उस अध्भुत गाय को उन्हें सौंपने की अभिमानी मांग की।
10:52महर्शी जमदगनी ने अपनी कामधेनु, जिसे वे अपनी पुत्री समान मानते थे, देने से स्पष्ट इनकार कर दिया, यह जानते
11:01हुए भी कि इस इनकार का परिनाम उनके लिए भयंकर हो सकता है।
11:07रिशी के इनकार से क्रोधित होकर, कार्तवीर्य अर्जुन ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे बलपूर्वक कामधेनु को आश्रम
11:16से छीन लें और उसे उनके राज्ज में ले जाएं।
11:20कामधेनु ने अपनी दिव्य शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए असंख्य शक्तिशाली योधदाओं को उत्पन्न किया जिन्होंने राजा के अहंकारी सैनिकों
11:29को पल भर में परास्त कर दिया, जिससे अर्जुन का अभिमान और भी आहत हुआ।
11:35अपनी सेना की हार और इस घोर अपमान से तिलमिलाय कार्तवीर्य अर्जुन ने स्वय अपने सहस्त्र भुजाओं से आश्रम पर
11:43हमला कर दिया, अपनी सारी शक्ती का उप्योग कर रिशी के पवित्र स्थान को नश्ट करने लगे।
11:50आमकार में चूर राजा ने तपस्वी रिशी का घोर अपमान किया, उनकी पवित्र जटाओं को खींचा और उन्हें अमानवी यातनाय
11:59दी, जिससे आश्रम की पवित्रता भंग हुई और रिशी का आत्म सम्मान खंडित हुआ।
12:04अपनी क्रोधागनी को शांत करने के लिए पापी कार्तवीर्य अर्जुन ने अंतह महर्शी जमदगनी का निर्ममता से वध कर दिया,
12:13जिससे आश्रम का वातावर्ण चीखों और विलाप से भर उठा और धर्म कांप उठा।
12:19अपने पती के मृत शरीर को देख कर माता रेनुका ने हृदय विदारक रुदन किया और 21 बार अपने सीने
12:27पर हाथ पीट कर अपने प्रिय पुत्र भारगव राम को चीख-चीख कर पुकारा मानो न्याय के लिए आवाहन कर
12:34रही हो।
12:36इसी क्षण अपने पिता के आश्रम लोटते हुए भारगव राम ने दूर से ही चीखों, धुएं और अशुब संकेतों को
12:44महसूस कर लिया, उनका युवा हृदय अप्रत्याशित आशंका से भर उठा।
12:49आश्रम पहुचकर भारगव राम ने अपने पूजय पिता के रक्तरंजित शरीर और शोक में डूबी माता रेनुका को देखा, यह
12:58भयावध द्रिश्य उनकी आत्मा को जखजोर गया और समय थमसा गया।
13:03अपने पूजय पिता की ऐसी हृदय विदारक मृत्यु देखकर भारगव राम क्षण भर के लिए स्तब्ध रह गये, उनके मन
13:11में पहले गहन पीडा और फिर प्रतिशोध की असहनिय ज्वाला प्रजवलित हुई, जिसने उनकी आखों में क्रोध भर दिया।
13:19अपने हाथों में पिता के रक्त से सनी पवित्र मिक्टी उठाकर, भारगव राम ने एक भयंकर शपतली की वे प्रित्वी
13:27को अहमकारी और अन्याईक शत्रियों से 21 बार विहीन कर देंगे, जिन्होंने उनके पिता का निर्ममता से वद किया था।
13:36इस प्रकार भारगव राम, भगवान विश्नु के छठे अवतार परशुराम के रूप में वे क्रोध और प्रतिशोध के प्रतीक बन
13:44गए, जिन्होंने अपने हाथों में देवदार के व्रिट्ष को काट कर बनाया हुआ अपना भयानत परशु उठा लिया, जो उनके
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14:06उज्य पिता का वद किया था, और जिनके अत्याचारों से प्रित्वी त्राहित राही कर रही थी, उनके फरसे की एक
14:14एक धार न्याय की गड़गड़ा हट थी, जो अन्याय क्षत्रियों के शीशों को धर्ती पर ऐसे गिरा रही थी, जैसे
14:21भीशन आंधी में सूखे पत्ते
14:23तूटकर गिरते हैं, हर एक विजय के साथ परशुराम का क्रोध और भी गहरा होता चला गया, और प्रित्वी क्षत्रियों
14:32के रक्ट से ऐसे लाल होती चली गई, जैसे संध्याकाल में क्षितिज रक्तवर्ण हो जाता है, उनके भीशन अभियान की
14:41खबरें प्रचंड वाय
14:43के वेग से चारों दिशाओं में फैल गई, जिससे दूर-दूर के राज्यों में भय और आतंत की एक ठंडी
14:49लहर डौड गई, कई राजाओं ने भयभीत होकर अपनी सेनाए परशुराम के विरुध एकत्रित करने का प्रयास किया, यह सोचते
14:58हुए कि वे एक जुठ होकर �
15:11इस अदमय शक्ती को रोक सकते हैं।
15:30विचलित हो उठी। देवताओं ने भी आकाश से इस अपरतिम युद्ध को देखा, जहां परशुराम की शक्ती के सामने क्षत्रियों
15:39की एकत्रित सेनापत्तों की भाती बिखर गई, उनका गर्व धूल में मिल गया।
16:00विहीन करने की अपनी भीशन प्रतिग्या को पूरा करने के लिए पहाडों, जंगलों और नदियों को पार करते हुए, एक
16:08अनवरत और अविराम अभियान छेड़ दिया।
16:12जब 21 चक्रों में धर्ती पर क्षत्रियों का लगभग पूर्ण सहार हो गया, तब परशुराम ने शांत मन से अपनी
16:19प्रतिग्या की पूर्ती के लिए महान यग्य किया, जहां उन्होंने अपने पित्रों को तरपन किया।
16:25इस भीशन प्रलय में सूर्यवंश पर भी एक गहरा संकट मंदरा रहा था, जिसके कई राजकुमार और राजकुमारिया अपनी जान
16:34बचाने के लिए गुप्ट स्थानों पर छिपने को विवश्ट थे।
16:38एक ऐसी ही संकट ग्रस्त राणी, जो गर्भवती थी, अपने पती की मृत्यू के बाद एक घने और दुर्गम वन
16:46में शरण लिये हुए थी, जहां उसे अपने अजन में शिशु की सुरक्षा की चिन्ता सता रही थी।
16:53उसी गुप्ट वन में सभी संकटों से परे, उस राणी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जो सुर्यवंश की
17:01बुच्चती हुई लौ में आशा की एक नई किरन लेकर आया।
17:05बालक के जन्म के समय उसका मुख एक प्राकृतिक मुखोटे से ढका हुआ था, एक विशिष्ट पहचान जिसने उसे मूलक
17:13का नाम दिया, और उसकी रहस्यमय उत्पत्ती का संकेत दिया।
17:18बुद्धिमान रिशियों और वफादार मंत्रियों ने मिलकर इस शिशु को परशुराम की क्रोध द्रिश्टी से बचाने के लिए उसे एक
17:26सुरक्षित और अज्यात स्थान पर छुपाने का निर्णय लिया।
17:30परशुराम अपनी 21 प्रतिग्याओं को पूर्ण कर, शान्त होकर महेंद्र परवत पर तपस्या करने चले गए, जहां उन्होंने अपने भीतर
17:40के क्रोध की अगनी को शान्त किया।
17:43इस प्रकार मुलक की रक्षा ने सूर्यवंश की अंतिम लौ को बुझने से बचाया, और एक नए युग की निवरखी
17:50जहां धर्म और क्षमा का महत्व पुनह स्थापित होना था।
17:55परंतु यह केवल एक विराम था, क्योंकि नेती के चक्र में शत्रियों का उदे एक बार फिर होना था, और
18:02उनके साथ धर्म की स्थापना के लिए नए संधर्ष भी आने थे।
18:07महेंद्र पर्वत पर तपस्या करते हुए भी परशुराम के मन में यह ज्यान सदैव जीवित्था की संसार को पूर्णता शांत
18:16करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
18:20इधर महेंद्र पर्वत की छाया से परे सूर्यवंश के धर्मात्मा समराट असमक को अपने राज्य पर घिरते हुए विध्वन्सकारी कालों
18:29का आभास होने लगा था।
18:32शत्रियों का सहार करते हुए परशुराम के आगमन का समाचार सुनकर राजा असमक ने अपने दर्बार में अंतिम युद्ध की
18:39घोशना कर दी।
18:41हाथ में अपना प्रचंड परशु धारन किये भगवान परशुराम क्रोधागनी में प्रज्वलित होते हुए असमक के राज्य की सीमाओं की
18:50ओर बढ़ चले।
18:52प्रजा की रक्षा और क्षत्रिय धर्म के सम्मान की खातिर राजा असमक निर्भीक होकर परशुराम के समक्ष युद्ध भूमी में
19:00आखडे हुए।
19:01युद्ध भूमी में राजा अस्मक द्वारा चलाए गए दिव्यास्त्र परशुराम के तपोबल और अलौकिक तेजोवलय के सामने निश्फल होकर तूट
19:10गए
19:11परशुराम ने अपने अमोग परशु का एक तीवर प्रहार किया जिसने बिजली की कौन्ध के साथ राजा अस्मक के प्राण
19:19हर लिए
19:20रक्त रंजित धूमी पर अस्मक के गिरते ही सूर्यवंश का गौरवशाली सिनहासन अचानक शून्यता और महासंकट के अंधकार में डूग
19:29गया
19:30महल में जैसे ही राजा अस्मक के वीरगती पाने का दुखद समाचार पहुँचा, पूरे राजप्रासाद में हाहाकार मच गया
19:39अपने प्राणप्रिय पती के निधन का समाचार सुनते ही अस्मक की गर्भवती महारानी बजरपात से पीडित होकर पूजाग्रेह में मूर्चित
19:48हो गई
19:49चेतना लोटने पर शोकाकुल महारानी ने अत्यंत करोन करंदन करते हुए अपने गर्भ पर हाथ रखा, जहां सूर्यवंश की अंतिम
19:58सास धड़क रही थी
20:00परशुराम के भारी चर्णों की चाप महल की ओर बढ़ती देख, महल की दीवारे भय और अनिष्ट की आशंका से
20:08कामपने लगी
20:10सूर्यवंश को पूर्णतह समाप्थ होने से बचाने के लिए वयोवरिध राजपुरोहितों ने गुप्त कक्ष में एकत रहोकर गहन विचार विमर्ष
20:18किया
20:20बिल्खती हुई रानी ने भगवान श्रीहरी विश्णू के चर्णों में अपने अजन में शिशु के जीवन की रक्षा के लिए
20:26कातर प्रार्थ ना की
20:29कुलगुरु ने महारानी को सचेट करते हुए कहा कि परशुराम के क्रोध से इस बालक को बचाने के लिए उन्हें
20:36तुरंत वन की शरण लेनी होगी
20:39राजसी वस्त्रों का त्याद कर साधारन तापसी का वेश धर कर महारानी अंधकार में रात्री में महल के गुप मार्क
20:47से बाहर निकल गई
20:49परशुराम जब सुने पड़े राजदर्बार में पहुँचे तो उन्हें खाली सिनहासन और नेती के किसी बड़े संकेत का आभास हुआ
20:58भयानक और सघन वन के पथरीले रास्तों पर चलती हुई गर्भवती रानी अपने पेट को दोनों हाथों से थाम कर
21:06अपने कदम आगे बढ़ाती रही
21:09अन्ता उन्होंने एक सुरक्षित और गुप्त परवत गुफा की शरण ली जहां परशुराम की तीक्ष्न ग्रिष्टी का पहुँचना असंभव था
21:18दूर क्षितिच पर जलती अपनी राजधानी की ओर देखते हुए महारानी ने संकल्प लिया कि वे सूर्यवंश की इस अंतिम
21:26जोती को किसी भी कीमत पर बुझने नहीं देंगी
21:30उस एकांत गुफा में बैठकर महारानी ने अपने होने वाले पुत्र की कुशलक्षेम के लिए अनवरत्तप और ईश्वर आराधना प्रारंभ
21:39कर दी
21:40गुफा के उसी पवित्र और एकांत वातावर्ण में महारानी के गर्भ से एक अत्यन्त दिव्य और तेजस्वी शिशु का प्राकट्य
21:48होता है
21:50नवजात शिशु के प्रथम रुदन की गूँज गुफा की शिलाओं से टकराती है जिससे महारानी का हृदय एक साथ वात्सल्य
21:58और अज्यात भय से आंदोलित हो उठता है
22:03बालक के अंगों पर अंकित राजसी और सूर्यवन्शी लक्षणों को देखकर सभी स्त्रिया आनंदित होती हैं किन्तु बाहर मंदराते परशुराम
22:12के भय से उनका मन काम उठता है
22:16उसी क्षन द्वार पर तैनात गुप्तचर व्रिद्धा समाचार देती है कि महात्पस्वी परशुराम क्षत्रिय वंश का समूल विनाश करने के
22:24धे से निकटवर्ती सघन वन में प्रवेश कर चुके हैं
22:29इस भयावः समाचार को सुनते ही भयभीत महारानी अपने नवजात बालक को अपने हृदय से और कसकर भीच लेती हैं
22:37तथा उसकी प्रानरक्षा हेतु इश्वर से विकल होकर प्रार्थना करने लगती हैं
22:44तब समुह की एक वयोवरिध और परम बुद्धिमान दासी महारानी को स्मरण कराती है कि भगवान परशुराम कभी किसी असहाय
22:52स्त्री पर अस्त्र का प्रहार नहीं करते
22:55इस युक्ती को सुनते ही महारानी ने अविलंब निर्ने लिया और गुफा में उपस्थित सभी स्त्रियों को बालक के चारों
23:03और एक अभेद्य मानविय कवच निर्मित करने का आदेश दिया
23:08सभी स्त्रियों ने अपने अपने विशाल पीतामबरो और आभूशनों के आवर्ण से उस नवजात राजकुमार को पूरी तरह आच्छादित कर
23:16दिया
23:17जिससे बालक का अस्तित्व पूरी तरह अद्रिश्य हो गया
23:21ठीक उसी समय गुफा के बाहर की धूमी भारी पच्चाप से कामपने लगी और भगवान परशुराम का उग्र और भयानक
23:29स्वरूप निकट आता हुआ प्रतीत होने लगा
23:33प्रचंड क्रोध से भरे परशुराम भारी पधरते हुए गुफा के द्वार तक पहुँचे, किन्तु भीतर का द्रिश देखकर उनके कदमक्षन
23:41भर के लिए ठिठक गए
23:44अपनी तीक्षन और अंतर्यामी द्रिश्टी से गुफा के वातावर्ण को मापते हुए वेक्षत्रिय रक्त की गंध और संधान का प्रयास
23:52करने लगे
23:54भामपते ही स्त्रियों का वह समूह भगवती आध्याशक्ती का मन ही मन स्मरण करते हुए उच्चस्वर में कारुने कृदन और
24:01क्रंदन करने लगा ताकि बालक की सांसों का शब्द भी दब जाए
24:06अपने सम्मुख केवल असहाय, भैभीत और रोती हुई नारियों को देखकर परशुराम का उग्रक्रोध शास्त्र मर्यादा के कारण स्वतही शांत
24:16होने लगा
24:18नारियों के उस अभेद्य और पवित्र सुरक्षा घेरे का सम्मान करते हुए भगवान परशुराम गुफा के भीतर चरण रखे बिना
24:26ही मौन भाव से आगे की ओर प्रस्थान कर गए
24:30परशुराम के प्रस्थान करते ही स्त्रियों का समूह राहत की गहरी सांस लेता है और महारानी अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने
24:38जीवित शिशु को उठा कर अपने हृदय से लगा लेती है
24:43नारियों के इस अध्भुत बुद्धिकोशल और रक्षाक्वच द्वारा सुरक्षित होने के कारण उस दिव्य बालक का नामकरण नारीक्वच के रूप
24:51में किया गया
24:53सुर्यवंश की सूखी हुई मूल जड़ों को पुनरजीवित करने और वंश्वरिक्ष को नश्ठ होने से बचाने के कारण उस बालक
25:01को मूलक के नाम से भी इतिहास में प्रसिधी प्राप्थ हुई
25:06महारानी और उनके वयोवरिध सहायकों ने बालक मूलक को पूर्ण रूप से सुरक्षित स्थान पर ले जाकर उनके कड़े सनरक्षन
25:14में गुप्ट शिक्षादीक्षा की योजना बनाए
25:17वर्षा और रितूओं के बीतने के साथ गुप आश्रम में बढ़ता हुआ बालक मूलक सूर्यवंश के महान धर्म, शास्त्रग्यान और
25:26क्षत्रिय नीतियों में पारंगत होने लगा
25:29इस प्रकार नारियों के अदमय साहस, विवेक और रक्षाकवच से सूर्यवंश का अंतिम अंकुर भस्म होने से बच गया
25:37जिसने भविश्य के महान राजाओं के आगमन का मार्ग प्रशस्त किया
25:42मूलक ने अपनी बाल्यकाल की अज्ञानता को गुरुजनों के मार्ग गर्शन में ज्ञान के प्रकाश से दूर कर दिया
25:49जहां वे वेदों और उपनिश्दों के गहरे रहसियों को समझने लगे
25:54शस्त्रविद्या में भी मूलक ने असाधारन निपुन्ता प्राप्त की, उनके गुरुओं ने उन्हे धनुर्विद्या और युद्धकला की हर बारी की
26:02सिखाई
26:04जैसे जैसे वे बड़े हुए, उनमें नेत्रित्व के गुन्स पष्ट रूप से जलकने लगे, उनकी आखों में न्याय और धर्म
26:11का तेज था
26:13गुप्ट आश्रम की वयोवरिद्ध नारिया, जिन्होंने मूलक को जन्म से पाला था, उनके विकास को देख कर संतोश और गर्व
26:21महसूस करती थी
26:23एक दिन गुरुजनोंने मूलक को उनके महान सूर्यवंश के एतिहास और परशुराम के क्रोध के कारण हुए विनाश की भयावः
26:32गाथा सुनाई
26:34अपने वंश के गौरवशाली अतीत और वर्तमान की त्रास्दी को जानकर मूलक में सूर्यवंश को पुनह स्थापित करने का द्रिड
26:42संकल्प लिया
26:44उधर बीती हुई सदियों और अंगिनत क्षत्रियों के रक्ट से त्रिप्थ होकर भगवान पर शुराम का प्रचंड क्रोध धीरे-धीरे
26:51शान्त होने लगा था उनकी आत्मा में वैराग्य का भाव जन्म ले रहा था
26:57अपने गुरुजनों और पालक माताओं से आशिरवाद प्राप्त कर युवा मूलक ने अपने वन्ष की पुनररचना के लिए एक नई
27:05यात्रा पर निकलने का निश्चय किया
27:08एक शान्त भोर में मूलक ने आश्रम का त्याग किया, उनकी आखों में भविश्य की आशा और चुनोतियों का सामना
27:16करने का साहस था
27:18मार्ग में उन्हें कुछ निश्ठावान, ब्राहमन और तपस्वी मिले, जिन्होंने सूर्यवंश के पुनरुथान के इस नेक कार्य में उनका साथ
27:27देने का वचन दिया
27:29एक उपजाओ धूमी पर पहुँचकर, मूलक ने अपने साथियों के साथ मिलकर एक छोटे से गाउं की स्थापना की, जो
27:37भविश्य के राज्य का बीज बनने वाला था
27:41उन्होंने न्याय और धर्म के सिध्धानतों पर आधारित एक शासन व्यवस्था स्थापित की, जहां प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार और
27:50सम्मान प्राप्ट था
27:52उनकी ख्याती दूर-दूर तक फैलने लगी और अन्य प्रदेशों से लोग उनके आदर्श राज्य में आकर बसने लगे, जिससे
28:00उनका राज्य धीरे-धीरे बढ़ने लगा
28:03मूलक ने प्रजाहित को सर्वोप्री रखा, वे एक आदर्श शासक के रूप में सभी के प्रिय बन गए, जो अपनी
28:10प्रजा के लिए सदैव समर्पित रहते थे
28:14उन्होंने युवा पीधी को क्षत्रिय धर्म और युद्धतला की शिक्षा देना प्रारम्ध किया, ताकि भविश मेवे अपने राज्य की रक्षा
28:22कर सकें
28:24जैसे जैसे परशुराम का वैराग्य गहराता गया, धर्ती पर पुनह शान्ती और स्थिर्ता का वातावर्ण निर्मित होने लगा, मानो प्रकृती
28:33ने भी क्षत्रियों के पुनृत्थान को स्वीकार कर लिया हो
28:37एक भव्य समारोह में मूलक को विधिवत सूर्यवंश के नए राजा के रूप में राज्याभिशेक किया गया, जिससे एक नए
28:45युग का सूत्र पात हुआ
28:48उन्होंने अयोध्या की प्राचीन महिमा को पुनह स्थापित करने का संकल्प लिया और उसके भगनावशेशों पर एक नए भव्य नगर
28:56का निर्मान प्रारंब किया
28:59मूलक के नेतरित्व में सूर्यवंश पुनह गौरवशाली उचाईयों को छूने लगा, जिसने अंगिनक महान राजाओं और धर्मात्मा शास्कों को जन्म
29:08दिया
29:09इस प्रकार मूलक ने न केवल अपने वन्ष को विलुप्थ होने से बचाया, बलकि धर्म और न्याय पर आधारित एक
29:17ऐसे सामराज्य की नीव रखी, जिसकी कीर्ती युगो युगो तक गूंजती रही
29:23मूलक ने राज्य को पुनह समरिध्धी और शांती के शिखर पर पहुँचाया, जहां हर ओर धर्म और न्याय का डंका
29:30बच्ता था, और प्रजा अपने राजा के साये में निश्चिन्त जीवन जी रही थी
29:36उसने अपने राजपाट को स्थिर्ता और सुव्यवस्था प्रदान की, जिससे सूर्यवन्ष की नीम्व पहले से कहीं अधिक मस्बूत हो गई,
29:45मानो वह स्वय धर्म का साक्षात प्रतिरूप हो
29:49और फिर शुब घड़ी आई जब रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम विश्वसहा रखा गया, जो
29:56उनके वन्ष का अगला उज्वल दीपक बनने वाला था
30:01विश्वसहा ने गुरुकुल में वेदों, शस्त्रविद्या और राजधर्म का गेहन अध्ययन किया, जहां उन्होंने अपने गुरुजनों के मार्ग दर्शन में
30:10एक कुशल शासक के सभी गुन सीखे
30:13युवा राजकुमार ने अपनी वीर्ता और बुद्धिमत्ता से सभी को चकित कर दिया, उसके प्रत्येक कार्य में भावी समराट की
30:21जहलक स्पष्ट दिखाई देती थी
30:24समय बीतने के साथ मूलक ने अपनी बढ़ती उम्र को देखते हुए युवा और योग्य विश्वसहा को राज्य का भार
30:32सौंपने का निर्णय लिया, ताकि सूर्यवंश की जोती अविचल बनी रहे
30:38महाराज विश्वसहा ने राज्याभिशेक के बाद अपने पूर्वजों के दिखाई मार्ग पर चलते हुए धर्म प्रायंता और न्याय के साथ
30:46शासन किया, जिससे अयोध्या में स्वर्ण युग का सूत्र पात हुआ
30:51वह नित्यप्रती यग्य और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते थे, जिससे राज्य में सुक्समरिध्धी और देवताओं का आशिरवाद निरंतर बरस्ता
31:00रहा
31:02उनके कुशल प्रशासन में राज्य की सीमाय सुरक्षित थी और प्रजा हर प्रकार से संतुष्ठ थी, मानो स्वयन स्वर्ग धर्ती
31:10पर उतर आया है
31:13लेकिन इस शान्ती के बीच भी कभी-कभी राज्य के दूरदराज के कोनों से कुछ छोटी-मोटी चुनोतिया उभर आती
31:20थी, जो राजा की सतर्कता और न्यायप्रियता की परीक्षा लेती थी
31:26विश्वसा ने अपनी दूरदर्शिता और द्रिड़ता से इन सभी बाधाओं का निवारण किया, हर संकट को अपनी प्रजा के लिए
31:34एक अफसर में बदल दिया
31:37इन्ही शुभ वर्षों में रानी ने एक और पराक्रमी पुत्र को जन दिया, जिसका नाम दीरघबाहु रखा गया, जो अपनी
31:45भुजाओं की शक्ती के लिए विख्यात था
31:49दीरघबाहु ने अपनी बाल्यावस्था से ही शस्त्र विद्या में अग्भुत पराक्रम दिखाया, उसकी लंबी और शक्तिशाली भुजाए भावी युद्ध कौशल
31:58की कहानी कह रही थी
32:00महाराज विश्वस्था ने अपने पुत्रों को धर्म और नीती के उच्च आदर्शों पर चलना सिखाया, यह सुनिश्चित करते हुए कि
32:08वे सूर्यवंश की महान परंपराओं को आगे बढ़ाएंगे
32:13दीर्घबाहु अपने पिता के मार्ग दर्शन में एक पराक्रमी योध्धा और एक न्यायप्रिय राजकुमार के रूप में विख्सित हुआ, जो
32:21हर चुनौती का सामना करने को तयार था
32:25विश्वसा ने जब देखा कि उसका पुत्र राज्यभार संभालने के लिए पूरी तरह सक्षम है, तो उसने स्वेच्छा से राजपाट
32:33दीर्घबाहु को सौंपने का निर्णय लिया
32:37इस प्रकार दीर्घबाहु ने अपने पिता के बाद सूर्यवन्ष का अगला समराट बन धर्म की पताका को और उचा उठाया,
32:45जिससे राज्य में नई उर्जा का संचार हुआ
32:49दीर्घबाहु ने अपनी अतुल्निय शक्ती और न्याय प्रियता से राज्य को सुरक्षित रखा, शत्रूओं को दूर भगाया और प्रजा को
32:57भयमुक्त जीवन दिया
33:00उसके शासनकाल में धर्म और न्याय सर्वोच रहे, जिससे अयोध्या का गौरवशाली इतिहास एक नई उचाई पर पहुँच गया
33:09इस प्रकार मूलक से लेकर विश्वसहा और दीरघबाहु तक सुर्यवन्ष की परंपरा अविचल रूप से आगे बढ़ती रही, जिसने युगो
33:18युगो तक धर्म और सुशासन का मार्ग प्रशस्त किया
33:22दीरघबाहु के पश्चात, सुर्यवन्ष में एक ऐसे तेजस्वी राजा हुए जिनका नाम खटवांग था, जिन्होंने अपनी असाधारन वीर्ता और धर्म
33:32प्रायंता से तीनों लोकों में ख्याती प्राप्त की
33:36उनकी धर्मनिष्ठा और प्रजाप्रेम इतना गहरा था कि अयोध्या की भूमी पर न्याय और सम्रिध्धी का नया अध्याय लिखा गया,
33:44जहां हर प्राणी, सुख और शान्ती से जीवन व्यतीत करता था
33:49एक बार जब देवता दानवों के अत्याचार से पीडित होकर स्वर्गलोक में संकट में फस गए, तो उन्होंने सहायता के
33:57लिए महाराज खटवां का आहवान किया
34:01देवताओं के निवेदन पर खटवां ने बिना किसी विलम के अपने रत पर आरूढ होकर स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया,
34:09जिसका तेज संपून ब्रहमांड में खैल गया
34:13स्वर्ग पहुँचते ही, खटवां ने देखा कि दानव अपनी विशाल सेना के साथ देवताओं पर भयानक आक्रमन कर रहे थे,
34:21और पूरा स्वर्ग युद्ध के कोलाहल से गूंज रहा था
34:25उन्होंने अपनी अद्वितिय युद्धकला और दिव्य अस्त्रों से दानवों पर ऐसा प्रहार किया कि उनकी सेना में हाहाकार मच गया
34:34और वे तितरवितर होने लगे
34:37खटवांग ने दानवों के सबसे शक्तिशाली युद्धाओं को एक एक करके परास्त किया, उनकी वीरता और पराक्रम से स्वर्ग का
34:45युद्धक्षेत्र गुंज उठा
34:47उनके हाथों से निकले दिव्यबानों ने आकाश में रोश्नी की धाराय बना दी और दानवों की सेना को पूरी तरह
34:55से विखंडित कर दिया
34:57अंतह खटवानों ने दानवों के मुखिया का वध कर देवताओं को उनकी विजय दिलाई और स्वर्ग लोक में शांती पुनह
35:05स्थापित की
35:06उनकी अद्वितिय वीर्ता से प्रसन्न होकर सभी देवताओं ने एक स्वर में महाराज खटवां की जय जयकार की और उनके
35:15प्रती अपनी कृतग्यता व्यक्त की
35:18देवताओं ने उन्हें अपनी पसंद का कोई भी वर्दान मांगने को कहा जो उनकी सेवाओं के लिए एक उचित प्रतिदान
35:26होगा
35:27महाराज खटवां ने कुछ क्षणों के लिए विचार किया, वे अपनी निस्वार्थ सेवा के लिए किसी व्यक्तिगत लाब की कामना
35:35नहीं करते थे
35:37तब उन्होंने देवताओं से पूछा कि उनके जीवन का कितना समय प्रिथवी लोग पर शेश है, ताकि वे अपने शेश
35:44काल को धर्म में समर्पित कर सकें
35:48देवताओं ने उन्हें आश्चर यच्खित करते हुए बताया कि पृत्वी पर उनकी वापसी के लिए केवल एक घड़ी, अर्थात कुछ
35:56ही क्षण शेश है
35:58यह जानकर खटवांग चकित रह गए, उनके मन में संसार की नश्वर्ता और कर्म के महत्व का बोध गहरा हो
36:06गया
36:07उन्होंने तुरंत देवताओं से अपने सभी पापों से मुक्ती और परम्ती प्राप्त करने का वर्दान मांगा, ताकि वे शेश समय
36:15का सदुप्योग कर सकें
36:18देवताओं ने उन्हें यह भी समझाया कि केवल निरंतर हरी स्मरन और धर्म का पालन ही इस अल्पकाल में भी
36:25मोक्ष की प्राप्ती करा सकता है
36:28इस गेहन ज्यान को प्राप्त कर, खटवां का मन निर्मल हो गया और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों को
36:36परमात्मा में लीन करने का द्रिड संकल्प लिया
36:40वे तुरंत प्रित्वी लोग की ओर लोट चले, उनका हर कदम अब धर्म और भक्ती की ओर अग्रसर था, एक
36:47क्षण भी व्यर्थ न गवाने के निश्चय के साथ
36:51अयोध्या पहुचते ही, उन्होंने अपने राजसी वस्त्रों का त्याग कर सन्यास का मार्ग अपनाया और अंतिम सांस तक भगवान विश्णु
36:59के नामों का जब करते रहे
37:02उन्होंने अपनी समस्त उर्जा को इश्वरिय ध्यान में केंद्रित किया, उनकी सासे अब केवल परंब्रम के स्मरण में ही प्रवाहित
37:10हो रही थी
37:12दिन सप्ताह और महीने बीटते गए, पर उनकी तपस्या में रत्ती भर भी कमी नहीं आई, उनकी एकागरता हिमालय सी
37:20अटल थी
37:22उनके शरीर में भले ही क्षीनता आ गई थी, किन्तु उनका मन और आत्मा इश्वरिय तेज से परिपूल्ण होकर निरंतर
37:30प्रदीप्थ हो रहे थे
37:32मृत्यू निकट थी और वे जानते थे कि अब इस नश्वर देह को त्यागने का क्षणा पहुँचा है, जिससे उनका
37:40चित्त विचलित नहीं हुआ
37:42उनकी अंतिन सास में भी ओम नमो भगवते वासुदेवाय का मधुर गुंजन समाया था, जैसे वह स्वया वैकुंठ का प्रवेश
37:51द्वार बन गया हो
37:53उसक्षण उनकी आत्मा ने शरीर का बंधन त्याग दिया और एक दिव्य जोतिपुंच के रूप में आकाश की ओर उपर
38:00उठने लगी
38:02यह जोतिपुंच समस्थ सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर ब्रहमांड के अनंत विस्तार में तेजी से उपर की ओर बढ़ता चला
38:11गया
38:12देवलोक के देवताओं ने इस पावन आत्मा को उपर उठते देखा और श्रधा से नत्मस्तक हो गए
38:19हर लोक में जहां से होकर वह आत्मा गुजरी वहां केवल हरी हरी का जैगोश गुण्ज गुठा
38:27अन्तर वह दिव्य जोतिपुंच वैकुंध धाम के भव्यद्वार पर जा पहुँचा जो सहस्त्र सूरियों के समान प्रकाशित था
38:36स्वय भगवान विश्नु के पार्षद, जया और विजया उस पावन आत्मा का स्वागत करने के लिए वहां उपस्थित थे
38:45उन्होंने उस आत्मा को आदर पूर्वक भीतर प्रवेश करने का मार्ग दिखाया जहां परमशांती और आनंद का सामराज्य था
38:54वैकुंठ की भूमी पर कदम रखते ही, वह जोति पुंज एक दिव्य रूप में परिवर्तित हो गया, जो स्वय खटवान
39:01के समान था
39:03वैकुंठ का कंकन इश्वरिय सौंदर्य और प्रेम से उतप्रोत था, जहांकी वायू में सनातन संगीत गूँज रहा था
39:11और फिर उन्होंने देखा स्वय भगवान विश्णु को अपने अनंत शया पर विराजमान, जिनकी आभासे पूरा वैकुंठ प्रकाशित था
39:22खटवांग ने परंबरम के चर्णों में अपना शीष जुका दिया, उनकी आखों से प्रेमाश्रूओं की अविरल धारा बह निकली
39:31भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए उन्हें अपने समीप गुलाया और अपनी अलौकिक शक्ती से उन्हें अपने ही स्वरूप में समाहित
39:39कर लिया
39:40इस प्रकार राजा खटवांग ने मोक्ष प्राप्त किया, यह दर्शाते हुए की भक्ती और वैराग्य से जीव परमधाम को पासकता
39:49है
39:51शुकदेव जी ने परीक्षित को बताया कि खटवांग का वैराग्य एक उजजवल उदाहरण है जो हर प्राणी को जीवन के
39:58अंतिन लक्षे की याद दिलाता है
40:01उन्होंने समझाया कि सांसारिक उपलब्धियाक शनभंगुर है जबकि भगवत प्राप्ती ही सच्चा और स्थाई सुख है

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