नारद मुनि के बाद, द्वारका में हुआ ऋषियों का दिव्य समागम! 🤩 महर्षि भृगु से लेकर विश्वामित्र तक, सभी पहुंचे भगवान श्रीकृष्ण के पास धर्म के गूढ़ रहस्यों को जानने। इस विशेष एपिसोड में देखें कैसे द्वारकाधीश ने अपनी वाणी से ऋषियों को मोक्ष, भक्ति और कलियुग में धर्म के महत्व का ज्ञान दिया। एक अद्भुत आध्यात्मिक यात्रा, जहाँ गुरु और शिष्य के बीच संवाद से खुले ब्रह्मांड के गहरे रहस्य! #BhagavataPurana #Krishna #Dwarka #Rishis #Dharma #Moksha #KaliYuga #HinduMythology #SpiritualWisdom #Puranas
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00:00देवर्शी नारद द्वारका की अतुल्निय शोभा, उसके सुनहरे महल और शांत सागर तट को अंतिम बार निहारते हुए अपने हृदय
00:08में दिव्यता का एक अध्भुत समंदर समेट रहे थे।
00:13परमपिता श्री कृष्ण के समक्ष पहुँचकर नारद मुनी ने उन्हें प्रणाम किया, उनके मुखमंडल पर एक अलोकिक संतोष की आभास
00:21पष्ट दिखाई दे रही थी।
00:24भगवान श्री कृष्ण ने नारद के प्रस्थान को अपनी मंद मुस्कान और शांत नेत्रों से स्विकार किया, मानों वे अनंत
00:32याक्राओं के साक्षी हों और हर विदाई में एक नया आगमन देखते हों।
00:37अपनी दिव्यवीना बजाते हुए, नारद मुनी आकाश गंगा के पत पर अग्रसर हुए, उनके मधुर गान से ब्रहमांड के कंकन
00:46में आनंद की लहर दौड गई।
00:48देवर्शी के प्रस्थान के पश्चात, द्वार का नगरी ने पुनह अपनी चिरपरिचित दिव्यशांती की चादर ओढली, जहां जीवन की धारा
00:57एक शांत नदी की भाती प्रवाहित हो रही थी।
01:01अपने महल के एकांट कक्ष में, भगवान श्रीकृष्ण पदमासन मुद्रा में बैठकर ब्रहमांड के गूड रहसियों और आगामी घटनाओ पर
01:10गेहन चिंतन कर रहे थे।
01:13महारानी रुकमिनी अपने महल में अत्यंत शालींता और कुशलता से ग्रिहस्थी के कारियों का संचालन कर रही थी। उनके हर
01:21कार्य में प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा जहलक रही थी।
01:25महारानी सत्यभामा अपने मनमोहक उपवन में खिले फूलों की देखभाल करती हुई, प्रकृती के साथ एकाकार होकर अपनी जीवन्त उर्जा
01:35का प्रदर्शन कर रही थी।
01:38द्वारका के नागरिक अपने दैनिक कार्यों में लीन, प्रसन्नचित और धर्म प्रायन जीवन जी रहे थे, जहां हर घर में
01:45भक्ती और समरिद्धी का वास्था।
01:48द्वारका को घेरे हुए अनन्त सागर अपनी शांत लहरों के साथ नगरी के दिव्य सौंदर्य को और भी गहरा कर
01:56रहा था, मानो वह भी किसी विशेश घटना की प्रतीक्षा में हो।
02:01इस परम शांती के बीच भी द्वारका के सूक्षम वातावर्ण में एक असपष्ट, फिर भी रोमाचक, नए आध्यात्मिक समागम की
02:10आहट महसूस की जा रही थी।
02:13आकाश में इंद्रधनुशी रंग बिखर गए, फूलों की वर्षा हुई और पक्षियों का मधुर कलरव एक अध्वितिय शकुन की घोशना
02:21कर रहा था, जो एक महान आध्यात्मिक सभा का सूचक था।
02:26अपने अंतर्मन में भगवान श्रीकृष्ण ने इन दिव्य संकेतों को अनुभव किया, उनके मुख पर एक रहस्य में मुस्कान फैल
02:34गई, जो आने वाले समय के गूड अर्थ को जानती थी।
02:39दूर घने वनों के बीच एक शांत आश्रम में कई तेजस्वी रिशिगन आगामी पुन्य यात्रा के विशय पर गंभीर विचार
02:47विमर्ष कर रहे थे, उनके चहरे पर आध्यात्मिक तेज जलक रहा था।
02:53उनमें से एक प्रमुख रिशी, जिनके नेत्रों में गहरा तप और ज्ञान समाया था, ने द्वारका की ओर अपनी यात्रा
03:00का संकल्प व्यक्त किया, मानों वे एक पवित्र कर्तव्य का आहवान कर रहे हूं।
03:06आध्यात्मिक उर्जा से उतप्रोत, वे सभी रिशिगन अपनी कुटिया छोड़कर द्वारका की ओर अपनी पवित्र यात्रा पर निकल पड़े, उनके
03:15कद्मों में अटूट श्रधा और उत्साह था।
03:19स्वर्गलोक से देवगन इस असाधारन समागम के आगमन को उत्सुक्ता से देख रहे थे, उनकी आखों में उत्सुक्ता और श्रधा
03:28का अध्भुत मिश्रण था।
03:30द्वारका के भव्य प्रवेश द्वारों पर शाही प्रहरी और सेवक गण अतिथियों के सम्मान पूर्ण आगमन की तैयारियों में जुटे
03:38थे, हर तरफ एक विशेश उत्साह और व्यवस्था थी।
03:42अपने सिनहासन पर आसीन भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से भविश्य का अवलोकन करते हुए आने वाले ज्यानवर्धक
03:52सम्वाद के लिए स्वयं को मानसिक रूप से तैयार किया।
03:56द्वार का के क्षितिच पर एक नई दिव्य प्रभा का उदे हुआ, जो धर्म और मोक्ष के रहसियों को उदगाटित
04:03करने वाले एक महान आध्यात्मिक युग की शुरुवात का प्रतीक था।
04:08द्वारका के क्षितिच पर उदे हुई दिव्य प्रभा अब और भी अधिक प्रखर हो उठी, जो सहसरों महान रिशियों के
04:16पवित्र आगमन का स्पष्ट संकेट दे रही थी और वायुमंडल में एक अलौकिक सुगंध घुल गई थी.
04:23नगर के प्रत्येक निवासी की आखें उस अद्भुत जोती की ओर मुड़ गई, उनके चहरों पर विस्मय और श्रधा का
04:31भाव स्पष्ट जलक रहा था, मानो वे किसी महान आध्यात्मिक घटना के साक्षी बन रहे हो.
04:39दूरक्षितिज पर धूल के एक सुनहरे बादल के बीच संतों की एक विशाल पंक्ती धीरे धीरे द्वारका की ओर बढ़ती
04:46हुई दिखाई दी, मानो ज्यान की एक चलती फिरती नदी सागर से मिलने आ रही हो.
04:53सबसे आगे वसिष्ट, विश्वामित्र, पराशर और भेगु जैसे तेजस्वी संत चल रहे थे, जिनकी आभासे पूरा वातावर्ण प्रकाशित हो रहा
05:02था और प्रत्येक पग में गेहन तपस्या का तेज समाहित था.
05:07जैसे जैसे वे द्वार्का के समीप आ रहे थे, पवित्र मंत्रो चार और वैदिक स्तोत्रों की ध्वनी वायुमंडल में गूंजने
05:15लगी, जो हृदय को शुद्ध करने वाली एक दिव्य उर्जा से भर गई थी.
05:21द्वार्का के भव्य मुख्य द्वार, जो स्वर्ण और रत्नों से सुसजित थे, अब सम्मान पूर्वक चौड़े खुल गए थे, और
05:29शाही प्रहरी श्रधा पूर्वक मस्तक जुका कर उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे.
05:35अपने रत्नश्टित सिन्हासन पर आसीन भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ रिशियों के आगमन को स्विकृती प्रदान की,
05:44उनके मुख मंडल पर एक शांत और गहरा संतोष पश्ट था.
05:49भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रमुख मंत्रियों और सेनाप्तियों को भव्य स्वागत समारोह की तैयारियों का निर्देश दिया, ताकि रिशियों का
05:58आगमन एक एतिहासिक उच्सव बन सके.
06:02द्वारका के नागरिक सडकों के किनारे कतार बद्ध खड़े हो गए, उनके हाथों में पुश्पों की वर्षा करने के लिए
06:09तैयार थी और उनके मस्तक श्रधा से जुके हुए थे.
06:14रिशी वसिष्ट, जिनकी आभा सूर्य के समान तेजस्वी थी, प्रोसेशन का नेत्रित्व कर रहे थे, उनके चहरे पर एक अदमय
06:22शान्ती और दिव्य ज्यान का प्रकाश जलक रहा था.
06:26उनके पीछे रिशी विश्वामित्र चल रहे थे, जिनकी तपस्या की प्रचंड अगनी उनके व्यक्तित्व से स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी,
06:35उनकी आखों में एक अटल संकल्प था.
06:38रिशी पराशर, जिनके नेत्रों में गेहन ज्यान और सौमेता का संगम था, एक शान्त और चिंतनशी मुद्रा में आगे बढ़
06:46रहे थे, उनके हर कदम में ब्रहमांड की समझ जलक रही थी.
06:51और फिर रिशी भेगु, जिनकी तेजस्वी उपस्थिती में एक प्राचीन अधिकार और अगनी के समान पवित्रता थी, वे भी अपनी
07:00शान्त गती से रिशियों के समूह के साथ प्रवेश कर रहे थे.
07:05जैसे ही रिशियों ने द्वारका की सीमा में प्रवेश किया, शंकनाद की मधुर ध्वनी और वैदिक मंत्रों के गंभीर स्वर
07:13पूरे नगर में गूंज उठे, जो एक पवित्र उर्जा का संचार कर रहे थे.
07:19भगवान श्रीकृष्ण अपने राजसी दल के साथ रिशियों का स्वागत करने के लिए नगर के प्रवेश द्वार की ओर बढ़ते
07:26हुए दिखाई दिये, उनके आगमन से वातावर्ण में दिव्यता और बढ़ गई.
07:32समस्त रिशियों का समोह रुक गया, जब उन्होंने स्वया भगवान श्रीकृष्ण को अपनी ओर आते देखा, उनके चहरों पर सम्मान
07:40और एक गेहन आध्यात्मिक पहचान का भाव था.
07:44देवों के देव होते हुए भी, भगवान श्रीकृष्ण ने रिशियों के सम्मान में विनम्रता पूर्वक मस्तक जुकाया, जो उनके अद्वितिय
07:53गुनों और धर्म के प्रती उनकी निष्ठा को दर्शाता था.
07:57रिशी वसिष्ठ ने भी उसी प्रेम और आदर के साथ श्रीकृष्ण के अभिवादन का प्रत्युप्तर दिया, उनकी आखों में एक
08:06पिता समान स्नेह और गुरु समान मार्ग दर्शन का भाव था.
08:11जैसे ही भगवान और रिशियों का यह दिव्य मिलन हुआ, द्वारका पर आध्यात्मिक उर्जा की एक पवित्र लेहर उमड पड़ी,
08:18जिसने प्रत्येक आत्मा को शुद्धी और शान्ती से भर दिया.
08:23अब द्वारका नगरी एक साधारन स्थान न रहकर, धर्म और मोक्ष के रहसियों को उद्धाटित करने वाले एक पावन तीर्थ
08:31में परिवर्तित हो चुकी थी, जहां ज्यान की गंगा प्रवाहित होने वाली थी.
08:37रिशियों के आगमन और भगवान के दिव्य मिलन से द्वारका का प्रत्येक कन, प्रत्येक जीव एक अप्रत्याशित, गहन शान्ती और
08:45अन्मोल उर्जा से भर गया था, जैसे स्वयम ब्रहमा का अंश यहां साकार हो उठा हो.
08:51अब राजपत से होते हुए, श्वेत वस्त्रधारी, तेजस्वी रिशियों का दल, जिन में नारद, वसिष्ट, विश्वामित्र और व्यास जैसे महान
09:01संथ सम्मिलित थे, अपनी दिव्य आभासे मार्ग को प्रकाशित करते हुए राजमहल की ओर बढ़ रहा था.
09:08समराटों के भी समराट, भगवान श्रीकृष्ण ने अपने अग्रस बलराम के साथ सिनहासन छोड़कर स्वय आगे बढ़कर रिशियों का स्वागत
09:17करने का निश्चय किया, जो उनकी परम विनमरता और आतिथ्य सतकार की भावना को दर्शाता था.
09:25निमेग श्यामल श्रीकृष्ण ने जैसे ही रिशियों को देखा, उनके हृदय में गुरुजनों के प्रती अगाद श्रधा उमड़ पड़ी और
09:33वे ततकाल जुपकर धर्ती पर साश्टान प्रणाम करने लगे.
09:37उनके पीछे-पीछे, श्वेत्वर्ण बलराम ने भी, जिनका तेज चंद्रमा के समान शीतल और शांत था, श्रधा पूर्वक अपने शरीर
09:46को रिशिवर के चर्णों में समर्पित करते हुए, उनके सम्मान में दंडवत प्रणाम किया.
09:53समस्त यादव सेना, जिनमें वीर सात्य की उद्धव और अन्य प्रमुख योधा सम्मिलित थे, अपने राजाओं का अनुसर्ण करते हुए,
10:02पूर्ण सम्मान और भक्ती भाव से रिशियों के सम्मुख नत्मस्तक हो गई, जिससे पूरा वातावर्ण पवित्रता से भर ग
10:21मानो वे स्वय गंदा को स्पर्श कर रही हूँ, उसी क्षणक बलराम ने भी अपने भाई के पवित्र भाव का
10:29अनुसर्ण करते हुए, देवर्शी नारत के पावन चर्णों का प्रक्षालन किया, उनके मन में गुरु के प्रती असीम आदर का
10:36भाव चलक रहा था,
10:39चरण धोने के बाद उन्होंने सुगंधित चंदन, केसर और कमल के पुषपों से रिशियों के चर्णों का अभिशेक किया, जिससे
10:47पूरा वातावर्ण दिव्य सुगंध से महक उठा, मानो स्वर्ग से पुषपवर्शा हो रही हो,
10:53इसके पश्चात, अत्यंत को मलता और सम्मान के साथ, भगवान और उनके अग्रजने प्रत्येक रिशी को उनके महत्व के अनुसार
11:02प्रत्नजडित उच्च आसन प्रदान किये, जो उनके तप और ज्यान के प्रतीक थे,
11:08रिशिवर्ख अपनी शांत और गरिमामई चाल से आगे बढ़ते हुए, उन अलंकरन युक्त आसनों पर विराजमान हुए, जिससे राजमहल का
11:17वातावर्ण और भी दिव्य और गंभीर हो गया,
11:21भगवान श्रीकृष्ण हाथ जोरकर विनमरता पूर्वक रिशियों के समक्ष खड़े हुए, और मधुरवानी में उनके आगमन को द्वार्का का परम
11:30सौभाग्य बताते हुए, हार्दिक अभिनंदन किया,
11:34बलराम भी अपने भाई के विचारों का समर्थन करते हुए, रिशियों के प्रती अपनी गहरी कृतग्यता व्यक्त की और उनकी
11:42उपस्थिती को द्वार्का के लिए एक अमूल्य आशिर्वात बताया,
11:47इसके पश्चात द्वार्का के सेवकों ने भगवान के निर्देश पर रिशियों को पवित्र गंदाजल, ताजे फल, मिश्थान्न और सुगंधित पे
11:56पदार्थ अर्पित किये, जो सभी शुद्धता और भक्ती से तयार किये गए थे,
12:02रिशिवर ने अत्यंत शान्त और संतुष्ट भाव से उन सात्विक भेंटों को ग्रहन किया, उनके मुख मंडल पर एक अलोकिक
12:10त्रिप्ती और प्रसन्नता की आभा जहलक रही थी, जो उनकी आत्मिक शान्ती का प्रमान थी,
12:17यह दुरलब द्रिशे, जहां परब्रहम स्वया अपने गुरुजनों की सेवा में लीन थे, ने द्वारका नगरी को एक अध्वितिय आध्यात्मिक
12:26केंद्र में बदल दिया, जहां प्रेम, श्रद्धा और ज्ञान की त्रिवेनी प्रवाहित हो रही थी,
12:32भगवान श्रीकृष्न पुना विनमरता पूर्वक रिशियों की ओर मुडे और अत्यंत श्रद्धा भाव से अपने हाथों को जोड़ कर, उनसे
12:41धर्म के गूढ रहसियों और मोक्ष के मार्ग पर मार्ग गर्शन प्रदान करने की प्रार्थना की,
12:47उनकी इस परम विनमरता को देख कर देवर्शी नारत का हृदय वातसल्य और आनन्द से भर गया, और उन्होंने एक
12:55हलकी मुस्कान के साथ भगवान के अनुरोध को स्वीकार करते हुए, उन्हें अहोभाग्यशाली बताया,
13:03जैसे ही रिशिवर ने भगवान के समक्ष ज्यान की बातें आरंभ करने की सहमती दी, आकाश में देवों की ध्वनी
13:10सुनाई दी, जो इस अध्भुत संगम के साक्षी बन रहे थे,
13:15इस प्रकार द्वार का नगरी में रिशियों और भगवान श्री कृष्ण का यह महा संगम, ज्यान, भक्ती और मोक्ष के
13:22रहसियों को उद्घाटित करने के लिए तैयार हो चुका था, जो आने वाले समय के लिए एक पावनपत प्रदर्शित करेगा,
13:30देवर्शी नारद ने सर्वप्रथम अपने हाथ जोडे और अपनी दिव्यवीना के मधूर स्वरों को शांत करते हुए, भगवान श्री कृष्ण
13:39के समक्ष अपनी स्तुती आरंभ की, उनके हृदय में उमर्ती भक्ती का सागर आखों में जलक रहा था,
13:47उन्होंने अपनी वानी से ओम नमो भगवते वासुदेवाय का उच्चारण करते हुए, श्री कृष्ण को समस्त ब्रहमांड के मूल और
13:55परम पुरुशोत्तम भगवान के रूप में संबोधित किया, जिनकी महिमा का वर्णन कर पाना असंभव है,
14:03देवर्शी के भक्ति पूर्ण शब्दों ने तुरंत ही अन्य रिशिग्नों के हृदय को भी स्पर्श किया, और वे सभी एक
14:10साथ अपने आसन से उठकर भगवान के गुनगान में सम्मिलित हो गए, मानो उनके कंट से स्वया वेदों की रिचाय
14:17फूट पड़ी हो,
14:19उन्होंने कृष्ण को ही समस्थ स्रिष्टी का आधार, समस्थ यग्यों का भोगता, और सभी तपस्याओं का अंतिम फल बताया, जिनके
14:28बिना कोई भी कर्म या ज्यान पूर्ण नहीं हो सकता,
14:31एक व्रिध रिशी ने आगे बढ़ते हुए, श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का स्मरण किया, जैसे पूतना वध और कालिया
14:39मर्गन यह दिखाते हुए कि कैसे उन्होंने शैश्वावस्था में ही राक्षसों का सहार कर धर्म की रक्षा की,
14:47उनकी वाणी में अध्भुत श्रद्धा थी जब उन्होंने कहा कि इन लीलाओं के माध्यम से ही भगवान ने यह सिद्ध
14:54किया कि वे केवल एक बालक नहीं, अपितु स्वयंपर ब्रह्म हैं, जो अपनी माया से मनुष्यों को मोहित करते हैं,
15:03एक अन्य तेजस्वी रिशी, जिनकी आखों में ब्रह्मांड का ज्यान जलक रहा था, ने कृष्ण को समस्थ अवतारों का सुरोत
15:11बताया और कहा कि वे ही नारायन हैं, जो विभिन्न युगों में धर्म की स्थापना हेतु प्रकट होते हैं,
15:19उन्होंने कृष्ण के प्रत्येक कार्य को धर्म की सुक्ष्म स्थापना का प्रतीक बताया, चाहे वह साधारन प्रतीत हो या अलोकिक,
15:27प्रत्येक लीला में गेहन आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है,
15:32रिशियों की इस अन्वरत स्थुती से द्वार का नगरी का वातावर्ण और भी अधिक पवित्र और उर्जावान हो उठा, मानोस्वय
15:40वैकुंट से दिव्य सुगंध और प्रकाश उतर आया हो,
15:45श्रीकृष्ण इस निस्वार्थ प्रेम और गहरी श्रग्धा को शांत भाव से स्विकार कर रहे थे, उनके चहरे पर एक हलकी
15:52रहस्य में मुस्कान थी जो ब्रहमांड के रहस्यों को समेटे हुए थी,
15:58देवर्शी नारद ने अपनी स्थुती को आगे बढ़ाते हुए बताया कि कैसे भगवान अपनी योगमाया से मोहित कर स्वयंको साधारन
16:06मनुष्य रूप में प्रदर्शित करते हैं, जबकि वेकाल, कर्म और गुनों से परे हैं,
16:13उनके प्रत्येक लीला, प्रत्येक संबंध और प्रत्येक वचन में अनंत ज्ञान और वैराग्य का सार छिपा है, जिसे केवल शुद्ध
16:21भक्ती से ही समझा जा सकता है,
16:25एक अन्य तपस्वी रिशी ने कृष्ण के चिरंतन धाम, गोलोग का वर्णन करना आरंभ किया, जहां वे अपनी अंतरंगा शक्ती
16:33के साथ नित्य निवास करते हैं, जो सभी लोकों से परे हैं,
16:39उनकी वाणी में उस दिव्य लोक की अनुपम सौंदर्य और आध्यात्मिक आनंद का ऐसा वर्णन था कि श्रोताओं के मन
16:46में भी उस परमधाम की एक जलक उभराई,
16:50उन्होंने श्री कृष्ण को ही समस्ट अवतारों का मूल स्रोत, आधी पुरुष और सनातन ब्रह्मा बताया, जिनसे ब्रह्मा, विष्णू और
16:59महेश सहित सभी देवता प्रकट होते हैं,
17:03रिशिग्णों की आखों में अश्रुधारा बहने लगी, उनके हृदय प्रेम और भक्ती के सागर में डूब गए थे, वे जानते
17:11थे कि उन्हें स्वयं परब्रम के समक्ष उपस्थित होने का सौभाग्य प्राप्थ हुआ है,
17:17श्री कृष्ण का दिव्य मुख मंडल और भी अधिक कान्तिमान हो उठा, उनकी मुस्कान गहरी होती जा रही थी, जो
17:25उनकी लीलाओं के प्रती रिशियों की समझ और निष्ठा को स्वीकार कर रही थी,
17:30इसी क्षण आकाश में देवताओं की ध्वनी सुनाई दी, जो पुश पवर्षा कर रहे थे, और मृदंग तथा शंकनाद के
17:39साथ इस अध्भुत महासंगम की दिव्यता की घोशना कर रहे थे,
17:43वे सभी रिशिगन अब अपने घुटनों पर आ गए, भगवान श्री क्रिश्न के चर्णों में अपना मस्तक जुका कर, उन्हें
17:51तीनों लोकों का स्वामी और परम आराध्य स्वीकार करते हुए,
17:56श्री क्रिश्न ने अपने कर कमलों से उन्हें पुना उठने का संकेत दिया, मानों उनके हर एक शब्द को उन्होंने
18:03हृदै से स्वीकार कर लिया हो और अब वे उन्हें आगे के ज्ञान के लिए तैयार कर रहे हुँ,
18:10श्री कृष्ण के उठने के संकेत पर सभी रिशिगन धीरे-धीरे सम्मान पूर्वक अपने स्थान पर खड़े हो गए, उनके
18:18चहरों पर गहन श्रद्धा और ज्यान प्राप्ती की तीवर उठकंठा स्पष्ट जलक रही थी
18:24समस्त रिशियों में से तेजस्वी भ्रेगु रिशी अपनी सफेद दाढ़ी और उननत भाल के साथ धीरे से आगे बढ़े उनकी
18:33आखे भगवान के प्रती गहन श्रद्धा से चमक रही थी
18:37उन्होंने एक बार फिर अपनी कमर जुका कर प्रणाम किया और फिर अत्यंत विनमर्ता तथा सम्मान से अपनी बाते भगवान
18:45के समक्ष रखनी शुरू की
18:48ग्रेगु रिशी ने अपनी वाणी में कृतज्यता भरते हुए कहा कि वे सभी रिशिगन भगवान के द्वारका में इस पावन
18:56दर्शन से धन्य महसूस कर रहे हैं
18:59उन्होंने कहा कि उनके मन में धर्म के सही स्वरूप और उसके गूढ रहसियों को लेकर अनेक संशय और प्रशन
19:07उठ रहे हैं
19:09रिशी ने विशेश रूप से यह जानने की इच्छा व्यक्त की की विभिन्न युगों में धर्म का स्वरूप किस प्रकार
19:16परिवर्तित होता है और इसके मूल सिध्धान्थ कैसे बने रहते हैं
19:21उन्होंने आसन्न कलियुग का उल्लेक किया जिसे धर्म के लिए सबसे चुनोती पून समय माना जाता है और पूछा की
19:29इस युग में मनुष्य को किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए
19:34रिशी ने अन्तह मनुष्य के लिए मोक्ष प्राप्ती के सर्वोत्तम और सहज मार्ग के बारे में जानने की जिग्यासा व्यक्त
19:41की विशेशकर कलियुग जैसे कठिन समय में
19:46ध्रेगु रिशी के प्रश्न समाप्त होते ही अन्य रिशिगण भी एक स्वर में अपना समर्थन व्यक्त करने लगे उनके मुख
19:53मंडल पर समान जिग्यासा और मोक्ष की लालसा जहलक रही थी
19:58भगवान श्री कृष्ण ने रिशियों की ओर देखा और उनके मुख पर एक शांत सरवग्य मुस्कान फैल गई, मानो वह
20:06उनके सभी प्रश्नों को पहले ही जान चुके हूँ
20:10उन्होंने अपने कर कमलों से रिशियों को बैठने का संकेत दिया, उनकी कृपा द्रिश्टी सभी पर समान रूप से पढ़
20:17रही थी
20:19रिशिगन अत्यंत कृतज्यता और सम्मान के साथ भगवान के संकेत का पालन करते हुए, अर्धवरित्ताकार रूप में उनके चारों और
20:28आसन ग्रहन करने लगे
20:30जैसे ही सभी रिशी शान्त होकर बैठ गए, भगवान श्री कृष्ण ने अपनी मधुर और गंभीर वानी में ज्यानवर्धक उपदेश
20:39देना प्रारंब किया
20:41उन्होंने रिशियों के प्रश्णों की महत्ता को स्विकार करते हुए कहा कि ये जिग्यासाएं मनुष्य की आत्मा के उध्थान के
20:49लिए अत्यंत आवश्चक हैं
20:52श्री कृष्ण ने संकेट दिया कि धर्म का स्वरूप यद्यपी शाश्वत है किन्तु काल और परिस्थिती के अनुसार उसकी अभिव्यक्ती
21:01और पालन के तरीके जटिल हो जाते हैं
21:05उन्होंने समझाया कि वास्तविक धर्म तो आत्मग्यान और ईश्वर के प्रती प्रेम में नहित है जो सभी युगों में अप्रिवर्थित
21:13रहता है पर उसके बाहरी आचन बदलते रहते हैं
21:18श्रीकृष्ण ने युगों के क्रम का उल्लेख किया बताते हुए कि कैसे सत्ययुग से कलियुग तक धर्म के चार स्तंभ
21:25तप, शौच, गया और सत्यप धीरे-धीरे क्षीन होते जाते हैं
21:31उन्होंने कहा कि कलियुग में यद्यपी अधर्म का बोलबाला होता है, पर यह युग आध्यात्मिक उनती के लिए अनोखे और
21:39तीवर अफसर भी प्रदान करता है
21:43भगवान ने आश्वस्त किया कि कलियुग में भी मोक्ष की प्राप्ती सरल है, केवल निष्ठावान भक्ती और भगवान के नाम
21:50का स्मरण ही सर्वोच मार्ग है
21:54जैसे ही उन्होंने अपनी बात पूरी की, उनके मुखमंडल पर एक दिव्य तेज और बढ़ गया, मानो वह आगे और
22:02गहरे रहसियों को उदगाटित करने के लिए तयार थे
22:06भगवान श्री कृष्ण के मुखमंडल पर एक अद्वितिय शान्ती और असीम ज्यान का तेज और भी प्रखर हो उठा, मानो
22:14वह समस्त ब्रहमांड के रहसियों को समेटे हुए थे, जिससे उपस्थित सभी रिशिगन एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूती में डूब गए
22:23देवर्शी नारद, जिनकी आखे भगवान के इस अलौकिक रूप पर टिकी थी, उनके हृदय में जिग्यासा की लहरें उठने लगी,
22:32और उन्होंने अत्यन्त विनमर्ता से श्री कृष्ण से धर्म के गूढ रहसियों को और अधिक स्पष्ट करने का अनुरोध किया
22:40श्री कृष्ण ने सभी रिशियों की ओर करुणामय द्रिश्टी से देखा और अपनी मधुरवानी में जो सीधे आत्मा को स्पर्श
22:48करती थी, धर्म के वास्तविक स्वरूप पर अपना दिव्य प्रवचन आरंभ किया
22:54उन्होंने समझाया कि धर्म केवल कर्मकांड और बाहरी अनुष्ठानों का समोह नहीं है, बल्कि यह आत्मा की शुद्धता, दूसरों के
23:02प्रती करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने का आंतरिक संकल्प है
23:08फिर उन्होंने भागवत धर्म के सार का वर्णन किया, जिसे शुद्ध भक्ती का मार्ग कहते हैं, जहां जीव केवल इश्वर
23:15की प्रसंता के लिए अपने सभी कर्म अर्पित करता है
23:21उन्होंने निश्काम कर्म के महत्व पर जोर दिया, जहां फल की इच्छा किये बिना कर्तव्य का पालन किया जाता है,
23:28क्योंकि यही सच्चा योग और आत्मशुद्धी का साधन है
23:33रिशिगन उनकी अमरित्मई वानी को सुनकर मंत्र मुग्ध हो गए, उनके चहरों पर गेहन एकागरता और आंतरिक शांती जहलक रही
23:41थी, मानो प्रत्येक शब्द उनके हृदय में उतर रहा हो
23:46श्री कृष्ण ने आगे समझाया कि निश्काम कर्म ही कैसे आत्मा को कर्म के बंधनों से मुक्त करता है और
23:54जीव को जन्मुमृत्यू के चक्र से परेले जाता है
23:58उन्होंने गुरू और संतों के संग के अतुलनिय महत्व पर बल दिया, क्योंकि उनके मार्ग गर्षन से ही अज्ञान का
24:05अंधकार दूर होता है और सत्य का मार्ग प्रशस्थ होता है
24:10श्री कृष्ण ने एक सच्चे गुरू के लक्षणों का वर्णन किया, जो शांत, वेराग्यवान, सरवग्य और सदैव शिष्य के कल्यान
24:19में लीन हो
24:20उन्होंने समझाया कि संतों का संग, चाहे वह क्षणिक ही क्यों न हो, आत्मा को पवित्र करता है और उसे
24:28परमात्मा की ओर अग्रसर करता है
24:31इन दिव्य वचनों को सुनकर रिशियों के हिदय में एक अलोकिक आनंद और स्पष्टता उमर पड़ी, उनके सभी संशय दूर
24:39हो गए और वे परमशांती का अनुभव करने लगे
24:44इसके पश्चात श्री कृष्ण ने भगवान के प्रती अटूट प्रेम निर्मल भक्ती की शक्ती का वर्णन किया, जो सभी बंधनों
24:52को तोड़कर जीव को सीधा परमात्मा से जोडता है
24:57उन्होंने समझाया कि यह प्रेम केवल व्यक्तिगत इच्छाओं से परे होता है, यह आत्मा की सहच प्रवृत्ती है, जो अपने
25:05मूल स्रोत भगवान के प्रती स्वत्ह आकर्शित होती है
25:10श्री कृष्ण ने एक गहरे तालाब में कमल के पुष्प का उदाहरन दिया, जो कीचर में उत्पन होकर भी निर्मल
25:17और पवित्र रहता है, ठीक उसी तरह आत्मा भी संसार में रहते हुए भी शुद्ध प्रेम से निर्मल रह सकती
25:24है
25:26उन्होंने स्पष्ट किया कि मोक्ष कोई दूर का लक्ष नहीं, बलकि इस अटूट प्रेम और निशकाम सेवा के माध्यम से
25:33इसी जीवन में प्राप्थ होने वाली एक आंतरिक स्थिती है
25:38इस मार्ग पर चलकर जीव धीरे धीरे अपनी व्यक्तिगत पहचान को खोकर परमात्मा के साथ एकाकार हो जाता है, यही
25:47परम मुक्ती है
25:49रिशियों के मन से सभी भ्यानतिया और अज्ञान के बादल छंट गए, उनके चहरे पर एक ऐसी दिव्य चमक आ
25:57गई, जो हजारों सूरियों के प्रकाश से भी अधिक उज्वल थी
26:02देवर्शी नारद ने साश्टाम दंडवत प्रणाम किया, उनके हृदय में कृतग्यता का सागर उमड रहा था, क्योंकि भगवान ने उन्हें
26:10धर्म और मोक्ष का सबसे सुगम और परम रहस्य प्रदान किया था
26:15श्री कृष्ण ने अपने प्रवचन का समापन एक दिव्य मुस्कान के साथ किया, जिसने समस्थ सभा को आशिरवाद और प्रेम
26:23से भर दिया, और सभी रिशियों ने परम शांती का अनुभव किया
26:28श्री कृष्ण के दिव्य प्रवचन से प्राप्त परमशान्ती और अज्यान के बादलों के छंट जाने के बाद सभी रिशिगण एक
26:36गहन आध्यात्मिक आनंद में लीन थे, उनके चहरे पर अलौकिक संतोष की आभा फैल रही थी
26:44देवर्शी नारद, जिनके हृदय में श्री कृष्ण के प्रती अपार कृतग्यता और प्रेम उमड रहा था, उन्होंने विनमरता पूर्वक अपने
26:52वीना को एक और रखा और एक और गहन प्रशन पूछने के लिए तत्पर हुए
26:58नारद ने हाथ जोड़ कर विनय किया, हे प्रभू
27:02आपने धर्म और मोक्ष के रहसियों को अत्यन्त सरलता से प्रकट किया है, किन्तु आने वाले कलियुग में मनुश्यों की
27:09क्यागती होगी, जब धर्म का हरास होगा
27:13श्री कृष्ण ने अपने भक्त की जग्यासा को समझ कर एक गहरी सांस ली और अपने मुखमंडल पर एक चिंता
27:21मुक्त फिर भी गंभीर भाव लिये हुए कलियुग की विशेश्ताओं का वर्णन करना आरंब किया
27:27उन्होंने बताया की कलियुग में धर्म केवल एक चौथाई रह जाएगा और अधर्म असत्य तथा पाप का बोलबाला इतना बढ़
27:35जाएगा की मनुष्य अपनी वास्तविक प्रकृती को भूल जाएगा
27:40लोब, इर्श्या, क्रोध और स्वार्थ की अगनी इतनी प्रबल होगी की फैमिलियल और सामाजिक संबंध छिन्नभिन हो जाएगे और सत्य
27:49की पहचान करना अत्यंत कठिन हो जाएगा
27:53परंपरागत यग्यत, तपस्या और जटिल धार्मिक अनुष्ठान इस युग में अपनी प्रभावशील ताखो देंगे क्योंकि शुद्धता और समर्पन की भावना
28:03दुरलब हो जाएगी
28:05किन्तु करुनावश श्री कृष्ण ने तुरंथी कलियुग के लिए एक परम सरल और शक्तिशाली समाधान प्रस्तुत किया, केवल हरी नाम
28:13का स्मरण ही सभी पापों का नाश कर सकता है
28:18उन्होंने घोशनाकी की कलियुग में भगवान के पवित्र नाम का बार-बार उच्चारन करना ही एक मात्र ऐसा साधन है
28:26जो सभी प्रकार के बंधनों से मुक्ती दिला सकता है
28:31भक्ती, विशेशकर नामस्मरण की भक्ती, इतनी सरल और सुलब है कि यह किसी भी व्यक्ती द्वारा, किसी भी स्थान पर
28:39और किसी भी परिस्थिती में की जा सकती है
28:43जाती वर्ण, लिंग्या, सामाजिक स्थिती के भेद के बिना, कोई भी शुद्ध हरदय से भगवान का नाम जपने से परमपद
28:50को प्रात्त कर सकता है
28:53यह भक्ती का मार्ग, ज्यान या कर्म के जटिल मार्गों की तुलना में सीधा और सरल है, जो सीधे आत्मा
29:00को परमात्मा से जोडता है
29:03श्री कृष्ण ने समझाया कि कलियुग में भले ही चारों और अंधकार और निराशा हो, परन्तु भक्ती की जोती सबसे
29:11तेज चमकेगी और मोक्ष का द्वार खोलेगी
29:15उन्होंने एक क्षण के लिए अपनी आखें बंद की और फिर उन्हें खोलते हुए एक दिव्यदर्शन कराया, जिसमें असंख्य भक्त
29:24आनन से जुमते हुए हरी नाम का कीर्टन कर रहे थे
29:28यह निरंतर स्मरण मन को शुद्ध करता है, रिदय को प्रेम से भरता है और सभी प्रकार के भौतिक आसक्तियों
29:36से मुक्ती दिलाता है
29:38अन्य युगों के जटिल योग, तपस्या और ज्यानमार्ग कलियुग में अत्यंत दुशकर हो जाते हैं, जबकि भक्ती का मार्ग सहज
29:46और सुगम बना रहता है
29:49यह सक्य सभी वेदों, पुराणों और शास्त्रों का सार है, जो विशेश रूप से कलियुग के मनुश्यों के उद्धार के
29:57लिए प्रकट किया गया है
30:00रिशियों के मन में कलियुग के प्रती जो भय था, वह अब पूरी तरह से दूर हो गया था, उनके
30:06चहरे पर एक नई आशा और संकल्प की चमक थी
30:11देवर्शी नारद ने साष्टान प्रणाम करते हुए अपने हिदय में व्याप्त पर्मानंद को शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास किया
30:18और इस परम रहस्य को प्रदान करने के लिए धन्यवाद किया
30:23श्री कृष्ण ने एक बार फिर अपनी दिव्य मुस्कान बिखेरी और कहा कि कलियुग में यह हरे कृष्ण महामंत्र ही
30:31भवसागर पार करने का सबसे बड़ा और सरल जहाज है
30:36भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अन्मोल वानी में सपश्ट किया कि जैसे हरे कृष्ण महामंत्र भवसागर पार करने का सरलतम
30:44साधन है उसी प्रकार आत्म ज्यान की प्राप्ती ही मानव जीवन का परम लक्ष है जो केवल एक सच्चे गुरु
30:51के मार्ग दर्शन में ही स
30:55समस्त रिशियों के मुखमंडल पर अब एक गेहन जिग्यासा और अदमय ज्यान पिपासा ज्छलक रही थी मानो वे इस ज्यान
31:03गंगा में और अधिक गहराई तक गोता लगाना चाहते हूं
31:08भगवान ने अपनी दर्श्टी रिशियों पर डालते हुए समझाया कि मैं कौन हूँ इस प्रश्न का उत्तर ही समस्त दुखों
31:15की जड़ को समाप्त कर देता है क्योंकि यह मैं ही शरीर और मन से परे आत्मा है
31:21उन्होंने आगे बताया कि यह भौतिक जगत जिसकी क्षन भंगुर्ता में हम उल्जे रहते हैं वास्तव में केवल एक माया
31:29भी आवर्ण है जो हमें अपने वास्तविक अविनाशी स्वरूप से दूर रखता है
31:36इस माया के भंवर से स्वया को निकालना अत्यंत दुश्कर है और इसलिए ही एक ऐसे पथप्रदर्शक की आवश्शक्ता होती
31:44है जो हमें सत्य की ओर ले जा सके एक सच्चा गुरू
31:49श्री कृष्ण ने गुरू के गुणों का वर्णन करते हुए कहा कि एक सच्चा गुरू वही है जो स्वया आत्म
31:56ज्यानी हो जिसने माया के बंधनों को तोर दिया हो और जिसका हृदय करुणा वज्ञान से परिपून हो
32:03उन्होंने समझाया कि गुरू अपने शिष्य के अज्ञान के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करते हैं ठीक वैसे
32:11ही जैसे सूर्य बादलों को चीर कर धर्ती पर अपनी किरने बिखेरता है
32:17समस्त्र शिगण जिनमें देवर्शी नारत भी शामिल थे अब आखे बंद करके श्री कृष्ण के एक एक शब्द को अपने
32:25हृदय में उतार रहे थे उनके चहरे पर गेहन शांती और आत्मचिंतन के भाव थे
32:31श्री कृष्ण ने प्राचीन गुरु शिष्य परंपरा के महत्व पर बल दिया जहां ज्यान केवल शब्दों से नहीं बलकि गुरु
32:39के आचर्ण, कृपा और शिष्य की श्रधा से प्राप्थ होता है
32:44उन्होंने समझाया कि एक सच्चे गुरु के सानिध्य में शिष्य का अहंकार मिटता है, चित्च शुद्ध होता है और वह
32:52धीरे-धीरे अपने भीतर छिपे दिव्यस्वरूप को पहचानने लगता है
32:57इस आत्मज्यान का परमफल है मोक्ष जन्ममर्ण के चक्र से मुक्ती और पर्मानन्द की शाश्वत अवस्था की प्राप्ती
33:06देवर्शी नारद ने गहरे प्रभावित होकर श्रीकृष्ण से पूछा की कल्यग में जब सच्चे गुरूओं का मिलना दुलब होगा, तब
33:14मनुष्य कैसे इस आत्मज्यान की यात्रा को पूर्ण कर पाएगा
33:19श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि गुरू केवल देह नहीं होते, बलकि गुरू तत्व प्रत्येख रिदय में विद्यमान है,
33:28जो विवेक और अंतरात्मा के रूप में मार्ग गर्शन करता है
33:33परंतु इस आंतरिक गुरू को पहचानने के लिए सत्संग यानी संतमहात्माव और ज्ञानी पुरुषों का संग अत्यंत आवश्चक है, जो
33:42मन को शुद्ध कर विवेक को जागरित करता है
33:46और फिर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मधुरवानी में उस परं सत्य को दोहराया, रिशियों का संगी सबसे बड़ातीर्थ है, क्योंकि
33:55वहाँ ज्ञान का सागर उमरता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्थ होता है
34:00यह सुनकर समस्त रिशियों ने एक साथ जयगोश किया, उनके हृदय कृतग्यता और पर्मानन से भर उठे, मानो उन्हें अपने
34:09जीवन की सबसे बड़ी पहेली का उत्तर मिल गया हो
34:14द्वारका के उस भव्य सभागार में एक अलौकिक शान्ती और उर्जा का संचार हो रहा था, जहां श्रीकृष्ण के दिव्य
34:22सानिध्य में ज्ञान की गंगा अविरल बह रही थी
34:26भगवान श्रीकृष्ण ने रिशियों को आशिरवाद देते हुए कहा कि जो कोई भी इस ज्ञान को अपने जीवन में धारण
34:33करेगा, वह निश्चित रूप से भवसागर को पार कर मेरा परमधाम प्राप्त करेगा
34:39समस्त रिशियों ने गहन संतोष और नवोदित चेतना के साथ अपनी यात्रा जारी रखने और इस ज्ञान को संसार में
34:47फैलाने का संकल्प लिया
34:50देवर्शी नारद ने एक बार फिर भगवान श्री कृष्ण के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया, उनका हृदय प्रेम, श्रद्धा और
34:58ज्यान की पूर्णता से आपलावित था, इस परम रहस्य को प्रदान करने के लिए धन्यवाद देते हुए
35:05देवर्शी नारद जिनके हृदय में परम ज्यान की किरने प्रजवलित हो रही थी, त्रेम और कृतग्यता से उतप्रोथ होकर धीरे
35:13धीरे भगवान श्री कृष्ण के समक्ष से उठे
35:17उनकी आखों में एक गहन चमक थी, जो उन दिव्य रहस्यों को दर्शा रही थी, जो उन्होंने अभी अभी प्रत्यक्षत
35:25हैं अनुभव किये थे, और उन्होंने एक बार फिर भगवान की महिमा को स्वीकार किया
35:31भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अनंत करुणा और प्रेम से परिपूर्ण एक अंतिन दिव्य द्रिश्टी रिशियों और नारत पर डाली,
35:39जो उनके भविश्य के पत को प्रकाशित करने वाली थी
35:44समस्त रिशिगण एक नई उर्जा और उद्देश से प्रेरित होकर परम संतुष्टी के भाव के साथ भगवान श्री कृष्ण के
35:52चर्णों में अंतिन प्रणाम कर अपनी यात्रा के लिए मुड़े
35:56उनकी आखों में अब संसार में भागवत धर्म का संदेश फैलाने का द्रिड संकल्प चमक रहा था, जैसा कि स्वयं
36:04भगवान ने उन्हें निर्देशित किया था
36:07धीरे धीरे वे रिशिगन दिव्य ज्यान के वाहक बनकर द्वारका के भव्य द्वारों से बाहर निकल कर संसार की ओर
36:14अग्रसर हुए
36:16भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य सिन्हासन पर विराजमान शांत चित्त से उन्हें दूर जाते हुए देखते रहे, उनके मुख पर एक
36:25रहस्यमई और सरवग्य मुस्कान थी
36:28नारद मुनी रिशियों से थोड़ा प्रिथक होकर अपने मन में भगवान के उपदेशों का चिंतन करते हुए एक नए मार्ग
36:36पर निकल पड़े, उनके हृदय में भागवत धर्म की अन्मोल निधी थी
36:42संसार के विभिन कोनों में रिशिगन अब भगवान श्री कृष्ण के प्रेम्मय संदेश को जनवरी से जनवरी तक पहुचाने लगे,
36:50भेदभाव रहित भक्ती के मार्ग को प्रकाशित करते हुए
36:54गाव-गाव में नगर्णगर में रिशियों की वानी से भागवत धर्म की मधूर गूंच फैलने लगी, जो सभी हृद्यों को
37:02भगवान के प्रती प्रेम से भर रही थी
37:05यह धर्म सिखाता था कि ईश्वर की प्राप्ती केवल शुद्ध प्रेम और अटूट भक्ती से संभव है, न की कर्मकांडों
37:13या बाहरी आडंबरों से
37:16नारद मुने अपनी वीना के मधूर स्वरों के साथ दूरदराज के क्षेत्रों में घूमते रहे, जहां भी वेजाते भगवान की
37:24महीमा और प्रेम का संदेश फैलाते
37:28उन्होंने देखा की कैसे भागवत धर्म, जातिया सामाजिक स्थिती के सभी भेदों को पार कर लोगों को एक सूत्र में
37:35पिरो रहा था
37:37द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण अपने भव्य महल के शांत कक्ष में ब्रहमांड के इस प्रेम्मय विस्तार को अपने योगमाया से
37:46अनुभव कर रहे थे
37:48उनकी दिव्य चेतना में हर भक्त का प्रेम और हर हृदय में प्रजवलित होती भक्ती की लौस पश्ट रूप से
37:55परिलक्षित हो रही थी
37:58भागवत धर्म जैसा की उन्होंने रिशियों को समझाया था वास्तव में सभी धर्मों का सार था जो आत्मा को सीधे
38:05परमात्मा से जोड़ता था
38:08यह वह मार्ग था जहा ज्यान, कर्म और योग की अंतिम परिंती प्रेम और समर्पन में होती थी
38:16नारद एक पवित्र नदी के तट पर बैठ कर अपनी वीना बजाते हुए उन सभी आत्माओं के लिए प्रार्थना कर
38:23रहे थे जो इस भागवत मार्ग की तलाश में थी
38:27समय बीटता गया और भागवत धर्म की महिमा धीरे-धीरे पूरे विश्व में फैलने लगी जिससे हर जगह शांती और
38:35सद्भाव स्थापित हुआ
38:38इस प्रकार द्वारका में प्रकट हुआ वह दिव्यग्यान अनंत काल तक जीव मात्र का मार्ग दर्शन करता रहा भागवत धर्म
38:46की सर्वोच्छता को सिध्ध करते हुए
38:49द्वारका में भगवान श्री कृष्ण से प्राप्ट दिव्यग्यान और अमरत्मई शिक्षाओं से रिशिगन पूर्णतय संतुष्ट और आत्म विभोर थे उनके
38:58हृदय आनंद और कृतज्यता से भर उठे थे
39:02वे सभी रिशिगन एक दूसरे की ओर देख रहे थे, उनकी आखों में असीम शान्ती और नवचेतना की चमक थी,
39:10मानो उन्हें जीवन का परम सत्य मिल गया हो
39:14ज्यान की पराकाश्ठा को प्राप्त कर, उनमें से एक प्रमुख रिशी ने विनम्रता पूर्वक कहा कि अब उनके प्रस्थान का
39:22समय निकट आ गया है, ताकि वे इस दिव्य संदेश को जनवरी से जनवरी तक पहुँचा सकें
39:28इस आध्यात्मिक मिलन के समापन की वेला में, सभी रिशिगन भगवान श्रीकृष्ण को अंतिम प्रणाम करने और उनकी क्रिपा को
39:37हृदय में धारन करने हेतु उचसुकता से एकत्रित हुए
39:41तभी अपने अलोकिक सौंदर्य और मंद मुस्कान के साथ भगवान श्रीकृष्ण ने वहाँ प्रवेश किया, जिससे पूरा वातावर्ण दिव्य उर्जा
39:51से उत्प्रोथ हो गया और सभी रिशिगन विस्मय में डूग गए
39:56रिशियों ने गदगद कंट से अपनी कृतग्यता व्यक्त की, उनके शब्दों में भगवान के प्रती असीम प्रेन और श्रधा का
40:04सागर उमड रहा था
40:06देवर्शी नारद अपनी वीना के मधूर सुरों के साथ भावविभोर होकर आगे बढ़े और उन्होंने भगवान श्री कृष्ण की महिमा
40:14का गुनगान करते हुए अपनी गेहन अनुभूतियों को व्यक्त किया
40:19भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अमोग कृपाद रिष्टी से सभी रिशियों को निहारा और अपनी मधूर वानी में उन्हें भागवत
40:28धर्म के प्रचार प्रसार हेतु आशिर्वात प्रदान किया
40:32फ्रिदय में दिव्य ज्यान और प्रभु के आशिर्वात को धारण कर रिशिग्नों ने धीरे धीरे द्वारका से अपने अपने गंतव्य
40:40की ओर प्रस्थान करना आरंभ किया
40:42उनके मुख मंडल पर संतोष और नई प्रेना का तेज चमक रहा था
40:48द्वारका नगरी स्वय एक आध्यात्मिक उत्सव का साक्षी बनी रिशियों के प्रस्थान के साथ एक अनुपम शान्ती और पवित्रता से
40:56आच्छादित हो गई
40:58जैसे दिव्य उर्जा का प्रवाह अब हर कोने में व्याप्थ हो गया हो
41:02वे रिशिगन भगवान श्री कृष्ण के साक्षात दर्शन और उनके उपदेशों को अपनी आत्मा में गहराई से संजोए हुए थे
41:11मानो प्रत्येक हृदय एक चलताफिर्ता धर्मगरंथ बन गया हो
41:16देवर्शी नारद अपनी वियापर हलकी धुन बजाते हुए
41:20आने वाली यात्रा और इस दिव्य अनुभव के प्रसार की महत्ता पर गहन विचार कर रहे थे
41:27रिशियों के प्रस्थान के पश्चात भी द्वारका में वह आध्यात्मिक उर्जा और दिव्य स्पंदन विद्यमान रहा
41:35जो श्री कृष्ण के साननिध्य और भागवत धर्म की शिक्षाओं से उत्पन हुआ था
41:41अपने भव्य महल की बालकनी से भगवान श्री कृष्ण ने रिशियों को प्रस्थान करते हुए देखा
41:47उनके मुख पर एक शांत और संतोश प्रद मुस्कान थी
41:51मानो उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वहन सफलता पूर्वक कर लिया हो
41:56जैसे जैसे रिशिगन आगे बढ़ते गए
41:59श्री कृष्ण की अदरिश्य कृपा उन्हें मार्ग दिखाती रही
42:03उनके पत को आलोकित करती और उन्हें अपने दिव्य उद्देश्यों की ओर प्रेरित करती रही
42:10अपनी यात्रा के दोरान रिशिगन जहां कहीं भी रुकते
42:13वे साधारन जन्मानस को भगवान श्री कृष्ण के अध्भुत उपदेशों और भागवत धर्म के सिध्धानतों से अवगत कराते
42:21जिससे अज्ञानता का अंधकार दूर होता
42:25इस प्रकार उन महान रिशियों के अधक प्रयासों से भागवत धर्म का प्रकाश धीरे धीरे भारतवर्ष के कोने कोने में
42:33फैलने लगा
42:34ज्ञान और भक्ती की एक नई लहर उत्पन हुई
42:38द्वारका में हुए इस दिव्य समागम का प्रभाव युगों युगों तक बना रहा
42:43जिसने अंगिनत आत्माओं को धर्म, मोक्ष और परम शांती का मार्ग दिखाया
42:49भगवान श्रीकृष्ण की पावन भूमिद्वार का अनंत काल तक दिव्यग्यान और आध्यात्मिक प्रेणा का एक अक्षुनस रोत बनी रही
42:57जहां से धर्म का प्रकाश सदैव प्रवाहित होता रहा
43:01और भगवान श्रीकृष्ण अपनी शाश्वत लीलाओं के माध्यम से इस संपूर्ण ब्रहमांड को निरंतर संचालित करते रहे
43:09जिसमें धर्म की स्थापना और जीव मात्र का कल्यान सर्वोप्री था