एपिसोड 79 में श्रुतदेव की कुटिया में प्रेम स्वीकारने के बाद, भगवान श्रीकृष्ण एक और परम भक्त राजा बहूलाश्व से मिलने विदेह जाते हैं। इस दिव्य मिलन के बाद, कृष्ण अपनी रानियों के साथ कुरुक्षेत्र पहुंचते हैं, जहां एक सूर्यग्रहण के दौरान सभी दिव्य आत्माएं एकत्रित होती हैं। यहाँ, उनकी रानियाँ, विशेषकर रुक्मिणी, सत्यभामा और जामवंती, अपने अद्वितीय और चमत्कारी विवाहों की कहानियाँ सुनाकर भगवान कृष्ण की महिमा का बखान करती हैं। यह एपिसोड सच्ची भक्ति, असाधारण प्रेम और भाग्य के अटूट बंधनों की एक अद्भुत गाथा है। #BhagavataPurana #KrishnaLeela #QueensOfKrishna #DivineLove #HinduMythology #KrishnaMarriageStories #Rukmini #Satyabhama #Bahulasva #Kurukshetra
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00:00भगवान श्री कृष्ण ने शुरुपदेव की कुटिया से निकल कर विदेह की पावन भूमी की और अपनी यात्रा प्रारंब की,
00:07जहां धर्मात्मा राजा बहुलाश्व उनकी आतुर्ता से प्रतीक्षा कर रहे थे।
00:13कृष्ण का रत देवत्व और तेज से दीप्तिमान धूल उड़ाता हुआ प्राचीन पथों पर अग्रसर हो रहा था, मानो स्वयंकाल
00:21भी उनके पीछे चल रहा हो।
00:24वनो में पुष्प अनायास ही खिल उठते, नदिया मंदमंद गती से प्रवाहित होती और पक्षी मधुरगान से उनका स्वागत करते,
00:33जैसे प्रकृती स्वयं उनके आगमन की घोशना कर रही हो।
00:38उधर्क विदेह राज्य में, राजा बहुलाश्व के महल में एक शांत किन्तु गहरी उत्सुकता का माहौल था, हर कोई दिव्य
00:46अतिथी के आगमन की प्रतीक्षा में था।
00:49राजा बहुलाश्व अपने पूजा कक्ष में एकांत में बैठकर भगवान श्री कृष्ण के कमल चर्णों का ध्यान कर रहे थे,
00:58उनके हृदय में भक्ती का अखंड दीप प्रजवलित था।
01:01अपने नेत्र मुंद कर उन्होंने प्रभु से प्रार्थनाकी की वे शीघर ही उनके दर्शन दें, उनके राज्य को अपनी पवित्र
01:10उपस्थिती से धन्य करें।
01:12तभी एक अप्रत्याशित सुगंध पूरे महल में फैल गई और आकाश में एक शुभर प्रकाश चमका, जो बहुलाश्व को उनके
01:21आराध्य के निकट आगमन का संकेत दे रहा था।
01:25राज्य के गुप्तचरों ने शीघर ही राजा को सूच ना दी की भगवान श्री कृष्ण कुछ ही दिनों में विदेह
01:31की सीमाओं में प्रवेश करने वाले हैं।
01:35यह शुब समाचार सुनते ही राजा बहुलाश्व का मुखमंडल दिव्य आनन से जग्मगा उठा, उनकी आखों में अशुरुधारा बह निकली।
01:45ततकाल उन्होंने अपने मंत्रियों और अधिकारियों को आदेश दिया कि वे प्रभु के भव्य स्वागत के लिए समस्त राज्य को
01:53सजा दें और हर घर में उत्सव का माहौल हो।
01:57राज्य की गलिया फूलों की मालाओं और तोर्नों से सजाई जाने लगी, हर ओर स्वच्छता और सौंदर्य का अनूठा संगम
02:05दिखने लगा।
02:07प्रजाजन भी अपने प्रिय भगवान के आगमन की खबर सुनकर हरशित हो उठे, उनके चहरों पर एक नई आशा और
02:15उत्सा जलक रहा था।
02:17रानिया अपने महल के अंतहपुर में प्रभु के आगमन की तयारियों में जुटी थी, उनके मन में कृष्ण और उनकी
02:25रानियों से मिलने की उच्सुकता थी, विशेश्टह प्रेम विवाहों के रहस्यों को जानने की।
02:31भगवान श्री कृष्ण अपने रत पर बैठे, दूर से विदेह की मनोरम भूमी को निहार रहे थे, जहां उनके एक
02:39अनन्य भक्त की पवित्र भावनाएं उनका आहवान कर रही थी।
02:43जैसे जैसे रत आगे बढ़ता गया, बहुलाश्व का हृदय और भी अधिक अधीर होता गया, वे उसक्षन की कलपना कर
02:52रहे थे, जब उनके नेत्र प्रभु के दिव्यरूप को देखेंगे।
02:57राजा बहुलाश्व अपने राजसी वेशभूशा में मंत्रियों और पुरोहितों के साथ नगर के प्रवेश द्वार पर प्रभु का स्वागत करने
03:05के लिए आतुर्ता से प्रतीक्षा कर रहे थे।
03:09अंत्र दूर्क्षितिच पर भगवान श्री कृष्ण का रत प्रकट हुआ, जिसकी दिव्य आभा से पूरा वातावर्ण प्रकाशित हो उठा।
03:19राजा बहुलाश्व ने जैसे ही अपने आराध्य को देखा, वे अपनी सुधबुध खो बैठे, उनकी आखें प्रभु के अलोकिक सौंदर्य
03:27को निहारती रह गई।
03:30भक्ती से अभिभूत होकर, राजा बहुलाश्व ने ततकाल अपने मुकुट को उतार कर प्रित्वी पर रख दिया और प्रभु के
03:38चर्णों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया।
03:41भगवान श्री कृष्ण ने एक मधुर मुस्कान के साथ अपने भक्त को उठाया और स्नेह पूर्वक उनके मस्तक पर हाथ
03:49रख कर उन्हें आशिरवाद दिया।
03:51मानो युगों की प्रतीक्षा आज पूरी हुई हो।
03:55भगवान के अलौकिक स्पर्ष से राजा बहुलाश्व में एक नई उर्जा का संचार हुआ।
04:01उनके रोम्रोम में दिव्यता का अनुभव हुआ और वे श्रधा पूर्वक धीरे धीरे उठखडे हुए।
04:07हाथ जोड कर अपनी आवाज में कापती हुई भक्ती के साथ, बहुलाश्व ने प्रभु से अपने महल में पधारने और
04:16अपने हंबल निवास को पवित्र करने की प्रार्थना की।
04:20करुणा सागर भगवान श्री कृष्ण ने राजा की अन्मोल भक्ती को स्विकार करते हुए, एक मधुर मुसकान के साथ उनके
04:28निमंतरन को सहर्ष स्विकार कर लिया।
04:31ततकाल राजा ने अपने मंत्रियों और सेवकों को आदेश दिया कि प्रभु के स्वागत के लिए विदेह की राजधानी को
04:38भव्य रूप से सजाया जाए, मानो स्वर्गी धर्ती पर उतर आया हो।
04:44पूरे राज्य में उत्सव का माहौल छा गया, हर गली, हर चौराहा फूलों की सुगंध और अगरबत्तियों के धुए से
04:52महकने लगा, जो प्रभु के आगमन की घोशना कर रहा था।
04:56भगवान श्री कृष्ण, राजा बहुलाश्व और उनके मंत्रियों द्वारा निकाली गई एक भव्य शोभायात्रा के बीच, धोलन गाडों की गूंज
05:05और शंकनाद के साथ महल की ओर प्रस्थान करने लगे।
05:09राज महल के भव्यद्वार पर पहुँचते ही, सोने और रत्नों से जड़े हुए कपाट अपने आप खुल गए, मानोस्वयन प्रकृती
05:18प्रभु का स्वागत कर रही हो।
05:20प्रभु ने जैसे ही महल में कदम रखा, भीतर की हर चीज एक स्वर्गिय आभा से जगमगा उठी, हर कोने
05:28से दिव्य सुगंध आने लगी और वातावर्ण पवित्र हो गया।
05:33राजा बहुलाश्व ने प्रभु को सीधे अपने राजसिनहासन की ओर ले गए, जो सोने और रतनों से जड़ा हुआ था
05:40और विदेह की गरिमा का प्रतीक था।
05:44विनीत भाव से राजा ने अपने हाथों से प्रभु को उस सिनहासन पर बिठाया, मानो वह स्वय इश्वर को उनके
05:52सर्वोच स्थान पर प्रतिष्थित कर रहे हुँ।
05:55प्रभु के आसन ग्रहन करते ही, बहुलाश्व ने ततकाल उनके चरण धोय, पाद प्रक्षालन, फिर चंदन और केसर से उनके
06:03चरणों का अभिशेक किया, जो परम भक्ती का प्रतीक था।
06:08इसके बाद उन्होंने सुगंधित पुष्पों और तुलसी के पत्तों की मालाय प्रभु को अर्पित की, उनकी पूजा में कोई कमी
06:16न रहे, इस बात का विशेश ध्यान रखा गया।
06:20राजा बहुलाश्व ने फिर धूप, दीप और विभिन प्रकार के नैविध्य अर्पित किये, अपनी सारी इंद्रियों को प्रभु की सेवा
06:28में समर्पित करते हुए।
06:30उनकी आखें प्रेम और कृतज्यता के आसुओं से भरी थी, उनका हृदय प्रभु के प्रती असीन भक्ती से उमड रहा
06:38था, मानो जीवन का एक मात्र उद्देश्य आज पूरा हो गया हो।
06:43उन्होंने अपनी सारी संपत्ती, राज्य और यहां तक की अपनी आत्मा को भी भगवान के चर्णों में समर्पित कर दिया,
06:51यह घोशना करते हुए कि उनका सब कुछ प्रभु का ही है।
06:56प्रभु श्री कृष्ण ने अपनी द्रिष्टी से राजा को आशिरवाद दिया, उनके त्याग और समर्पन की सराहना करते हुए, यह
07:05दर्शाते हुए कि सच्ची भक्ती ही सबसे बड़ा धन है।
07:10बहुलाश्व ने फिर अपनी कृतग्यता व्यक्त करने के लिए एक हार्दिक प्रार्थना की, जिसमें उन्होंने अपने जीवन को प्रभु की
07:18सेवा में समर्पित करने का संकल्प दोहराया।
07:21इसी बीच भगवान श्रीकृष्ण की आठ पत्रानिया दिव्य सौंदर्य से सुशोभित होकर, महल के भीतर एक कक्ष से ग्रेसफुली प्रकट
07:30हुई, जिससे वातावर्ण और भी दिव्य हो उठा।
07:34राजा बहुलाश्व उनके अद्वितिय सौंदर्य और दिव्य आभा से विस्मित होकर, श्रद्धा और सम्मान के साथ उनके स्वागत के लिए
07:43खड़े हुए।
07:44प्रभु ने अपनी पत्रानियों को राजा बहुलाश्व से परिचित कराया, उनकी भक्ती और त्याग की प्रशंसा करते हुए, जिससे रानिया
07:54भी प्रभावित हुई।
07:56सभी पत्रानियों ने राजा बहुलाश्व के निस्वार्थ प्रेम और अटूट भक्ती को अपने हृदय से स्विकार किया, उनके मुखमंडल पर
08:04श्रद्धा का भाव स्पष्ट जलक रहा था।
08:07उनकी भक्ती से प्रेरित होकर, देवी रुकमिनी ने मृदु वानी में बहुलाश्व से पूछा कि कैसे उन्होंने इस नश्वर संसार
08:16में रहते हुए भी ऐसी अविचल निष्ठा बनाये रखी।
08:20राजा बहुलाश्व ने अत्यंत विनमरता पूर्वक उत्तर दिया कि उनकी निष्ठा केबल भगवान के नाम और लीलाओं के निरंतर स्मरण
08:29तथा जीवन के हर पल में उनकी उपस्थिती का अनुभव करने से ही संभव हुई।
08:34भगवान श्रीकृष्ण राजा की निष्कपट भक्ती और उनकी सहज आध्यात्मिक समझ से अत्यंत प्रसन्न हुए और उनके मुख पर एक
08:44दिव्यमुस्कान खिल उठी।
08:46प्रेम और करुणा से भरे हृदय से प्रभु ने बहुलाश्व की ओर देखा उनके भीतर के ज्यान के दीपक को
08:53प्रजवलित करने और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने के लिए तयार।
08:58तब श्रीकृष्ण ने अपनी मधुर और गंभीर वानी में राजा को समझाया कि यह भौतिक संसार एक शनभंगुर भ्रम है,
09:06जहां हर वस्तु परिवर्तनशील और दुख का मूल है।
09:11उन्होंने धर्म के महत्व पर जोर दिया, जहां निश्कान कर्म ही आत्मा को शुद्ध करता है और संसार के बंधनों
09:19से मुक्ती दिलाकर परम सत्य की ओर ले जाता है।
09:23राजा बहुलाश्व एक शिश्य की तरहे एकाग्रचित्त होकर भगवान के प्रत्येक शब्द को अपने हृदय में उतार रहे थे, उनकी
09:32आखें श्रधा और ज्यान की प्यास से चमक रही थी।
09:36श्री कृष्ण ने फिर भक्ती योग के गूड रहस्य का अनावरण किया, बताते हुए कि केवल प्रेम्मई भक्ती ही परम
09:44सत्य और भगवान के साथ आत्मा के मिलन का मार्ग है।
09:48प्रभु ने आत्मा और परमात्मा की एक्ता का सिध्धान्त समझाया कि कि किस प्रकार हर जीव में विद्यमान आत्मा ही
09:57परम चेतना का अंश है।
10:00बहुलाश्व को अपने भीतर एक गहरा आध्यात्मिक परिवर्तन महसूस हुआ, जैसे सदियों का अज्ञान मिट गया हो और दिव्यज्यान का
10:09प्रकाश उनके रोमरों में समा गया हो।
10:12श्री कृष्ण ने वासनाओं, इच्छाओं और सांसारिक मोह से मुक्ती के महत्व पर बल दिया, क्योंकि यही बंधन आत्मा को
10:20परम आनंद से दूर रखते हैं।
10:24अंत्य प्रभु ने मोक्ष की अंतिम स्थिती का वर्णन किया, जन्म और मृत्यु के चक्र से पूर्ण स्वतंत्रता, जो सीधे
10:32वैकुंठ धाम में परम आनंद की प्राप्ती है।
10:36राजा बहुलाश्व का चेहरा अब दिव्य अनुभूती से दमक उठा था, उनके नैनों से प्रेम और कृतग्यता के अश्रु निर्बाध
10:44रूप से बह रहे थे।
10:46तब भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कृपा से बहुलाश्व को अपने विराठ दिव्य स्वरूप का एक शनिक दर्शन कराया, जिससे
10:55राजा का मन पूर्णता शुद्ध हो गया।
10:57इस अलौकिक अनुभव से राजा बहुलाश्व अभिभूत हो गए, उन्हें लगा जैसे उनके सभी सांसारिक बंधन एक एक कर धीले
11:06पड़ रहे थे और वे मुक्त हो रहे थे।
11:09उनके शरीर में कोई हलचल नहीं थी, आखे भगवान पर स्थिर थी और उनके चारों और एक अलौकिक प्रकाश फैल
11:18गया, जो उनके आत्मा के प्रस्थान का संकेत था।
11:22राजा बहुलाश्व की आत्मा एक तेजस्वी प्रकाश पुन्ज के रूप में उनके नश्वर देह को त्याग कर भगवान श्रीकृष्ण के
11:31चरण कमलों की और वैकुंठ धाम की और उपर की और बढ़ने लगी।
11:36श्रीकृष्ण ने एक शांत मुस्कान के साथ बहुलाश्व की मुक्त आत्मा को स्वर्ग की और बढ़ते देखा, उनकी रानिया भी
11:44इस अग्भुत द्रिश्य को देख कर विस्मित थी।
11:48पूरा महल एक दिव्य आभा से जग्म का उठा, जैसे बहुलाश्व की आत्मा ने परमधाम में अपना शाश्वत स्थान प्राप्त
11:56कर लिया हो और उनकी लीला पूर्ण हुई।
12:00बहुलाश्व की आत्मा को परमधाम की ओर प्रस्थान करते देख, भगवान श्री कृष्ण ने अपनी रानियों और द्वारका के निवासियों
12:08को कुरुक्षेत्र में होने वाले आगामी सूर्य ग्रहन पर्व की सूचना देने का संकेत किया।
12:15उनकी आग्या पर द्वारका से एक तीवरगामी दूद को भेजा गया, जिसने सभी प्रमुख नगरों और आश्रमों में सूर्य ग्रहन
12:23के पावन अफसर पर कुरुक्षेत्र में होने वाले महामिलन का संदेश पहुँचाया।
12:29भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी प्रिय रानियों को एकत्र कर कुरुक्षेत्र के महत्व और आगामी पर्व के दिव्य अनुष्ठानों के विशय
12:37में विस्तार से बताया, जिससे उनमें उत्साह और भक्ती का संचार हुआ।
12:43रानियों ने जो पहले ही बहुलाश्व के वैकुंठ गमन की साक्षी बन चुकी थी, इस नए आध्यात्मिक अफसर को लेकर
12:51असीम प्रसन्नता और उत्साह से अपनी यात्रा की तयारी शुरू कर दी।
12:57इसके बाद द्वारका से एक विशाल और भव्य काफिला निकला, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण, उनकी रानिया, राजकुमार, सेना और अंगिनत भक्तगन
13:07कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान करने लगे, जिससे मार्ग में उत्सव का माहौल बन गया।
13:13जैसे जैसे काफिला आगे बढ़ा, विभिन राज्यों के राजा और रिशिमुनी जो पहले से ही सूर्य ग्रहेन के लिए कुरुक्षेत्र
13:21जा रहे थे, श्रीकृष्ण के दिव्य दर्शन पाकर उनके साथ जुरने लगे, जिससे यात्रा और भी भव्य हो गई।
13:30देवताओं और गंधर्वों ने भी आकाश मार्ग से इस अध्वितिय समागम को देखा और पुश पवर्शा कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त
13:38की, जिससे पूरी यात्रा एक दिव्य उच्सव में परिवर्तित हो गई।
13:43कुरुक्षेत्र के पवित्र मैदान में पहुचने पर भगवान श्री कृष्ण ने अपने काफिले के लिए एक विशाल और अलंकृत शिविर
13:51स्थापित करने का आदेश दिया, जो उनकी दिव्य उपस्थिती के अनुरूप था।
13:57धीरे-धीरे कुरुक्षेत्र का मैदान भारतवर्ष के कोने-कोने से आय भक्तों, राजाओं और रिशियों के आगमन से भर गया,
14:05जिससे एक अभूत-पूर्व आध्यात्मिक समागम का द्रिश उत्पन हुआ।
14:11महा भारत युद्ध के पश्चात यह पहला ऐसा अवसर था जब समस्थ भारतवर्ष के प्रमुख व्यक्ती एक ही स्थान पर
14:18एकत्रित हुए, जिससे पुरानी स्मृतिया और नए संबंधों की उर्जा प्रवाहित हुई।
14:25महर्शी व्यास, नारद मुनी और अन्यश्रिष्ठ विशियों ने भी अपनी दिव्य उपस्थिती से इस समागम को और अधिक पवित्र बना
14:33दिया, उनके आगमन से क्षेत्र में अलौकिक शान्ती छा गई।
14:37पवित्र सरोवर और नदियों के तटपर भक्त गण सूर्य ग्रहन से पहले स्नान करने और मंत्रों चार करने लगे, जिससे
14:46वातावर्ण शुद्ध और आध्यात्मिक उर्जा से भर गया।
14:50भगवान श्रीकृष्ण अपनी रानियों के साथ उस पवित्र सरोवर के पास गए जहां भक्त स्नान कर रहे थे और उनकी
14:58उपस्थिती ने उस स्थान को और अधिक दिव्य बना दिया।
15:02सूर्य धीरे धीरे ग्रहन के प्रभाव में आने लगा, आकाश में एक अलौकिक परिवर्तन होने लगा, जिससे भक्तों में उच्सुकता
15:11और भक्ती की लहर दोड़ गई।
15:14ग्रहन के चरम पर जब सूर्य एक अगनिवलय के रूप में दिखाई दिया, तो कुरुक्षेत्र का पूरा मैदान हरी बोल
15:22और जय श्री कृष्ण के नारों से गूंज उठा।
15:25चारों और यग्यों की अगनी प्रजवलित हुई, रिशियों के मंत्रों चार वायुमंडल में घुल गए और भक्तों की आखों में
15:33एक अध्वितिय शांती और विश्वास जलक रहा था।
15:37इस गेहन आध्यात्मिक क्षण में भगवान श्री कृष्ण ने भक्तों के बीच विचर्ण किया, उनकी दिव्य आभासे प्रक्तेक प्राणी को
15:46असीम शांती और सांत्वना प्राप्थ हुई, उन्होंने विभिन रिशियों और राजाओं से भेंट की, उनकी कुशलक्ष
15:54पूछी और इस पवित्र समागम के उद्देश्य पर चर्चा की, जिससे सभी में उद्साह और आध्यात्मिक प्रेणा का संचार हुआ।
16:38उनके मुखमंडल पर संतोष और असीम प्रेम की अभिव्यक्ती थी।
16:55रुकमिनी ने अपनी शांट आखों से सभा में दूर दूर तक देखा, मानो ब्रज के किसी चिरपरिचित चहरे की तलाश
17:02कर रही हो।
17:04तब सत्यभामा ने उद्साह से कहा, स्वामी क्या हम भी नीचे जाकर इन पुन्यात्माओं से मिल सकते हैं, विशेशकर ब्रजवासियों
17:12से।
17:13श्री कृष्ण ने स्नेह से मुस्कुराते हुए अपनी रानियों की ओर देखा और अनुमती दी, अवश्य मेरी प्रियत्माओं तुम्हारा मिलन
17:22निश्चित रूप से इस उत्सव को और दिव्य बनाएगा।
17:26उनकी अनुमती पाकर रानिया धीरे-धीरे उचे स्थान से नीचे उतरने लगी, उनके चहरों पर एक नई आशा और उच्सा
17:35जलक रहा था।
17:37भीड के बीच से गुजरते हुए, उन्होंने ब्रज के निवासियों को ढूढ़ना शुरू किया, जिनके प्रेम और भक्ती ने उनके
17:45मन में एक विशेश स्थान बना लिया था।
17:48जल्द ही, उनकी आखें कुछ गोपियों पर पड़ी, जिनके चहरे पर वर्षों का विरह और कृष्ण प्रेम की अमिट छाप
17:56स्पष्ट थी।
17:58रानियों ने भावुक होकर उन गोपियों की ओर कदम बढ़ाए, जिनके आचल में ब्रच की पावन धूल और कृष्ण के
18:05बचपन की सुगंध बसी थी।
18:08गोपियों ने अपनी प्रिय रानियों को देख कर सहसा आहलादित हो गई, उनके हृदय वर्षों के विरह के बाद सने
18:16से भर उठे।
18:18दोनों और से अश्रुधाराय बह निकली, जो प्रेम और भक्ती की पवित्रता का प्रमाण थी, जैसे दो नदिया अनंत सागर
18:26में मिल रही हो।
18:28रानियों ने गोपियों को सांत वना दी, यह कहकर की भगवान कृष्ण कभी भी ब्रज को नहीं भूले हैं और
18:35उनका प्रेम सदा उनके हृद्यों में विद्यमान है।
18:39वे सब मिलकर कृष्ण की व्रिंदावन लीलाओं को याद करने लगी, उनके बचपन की शरारतें, रासलीलाएं और ब्रज के मनोरम
18:48द्रिश्य उनके मानस पटल पर सजीव हो उठे।
18:51इसी बीच ब्रज के अन्यनिवासी जैसे नंद बाबा और यशोदा मया भी वहाँ पहुँचे, उनके हृदय में अपने लाडले कनहया
19:00के प्रती अगाध प्रेम भरा था।
19:02नंद और यशोदा मया को देख कर रानिया भी भावुखो उठीन और तुरंत उनके चर्णों में प्रणाम करने के लिए
19:10आगे बढ़ी।
19:12उन्होंने कृष्ण को पालपोस कर बढ़ा करने के लिए उनका आभार व्यक्त किया और उन्हें अपने मातापिता के रूप में
19:20स्विकार किया।
19:22इस हृद्यसपर्शी मिलन के बाद रानिया कुछ प्रसिध रिशियों और तपस्वियों से आशिरवाद लेने के लिए आगे बढ़ी जो सभा
19:30में उपस्थित थे।
19:32उन्होंने महरशी व्यास, नारद मुनी और अन्य तपस्वियों को प्रणाम किया, जिनकी उपस्थिती मात्र से ही वातावर्ण पवित्र हो गया
19:41था।
19:43रिशियों ने उन्हें आशिरवाद दिया, उनके धर्म प्रायन जीवन और भगवान कृष्ण के प्रती अटूट भक्ती की सराहना की।
19:51इसके उपरांत रानियों ने रिशियों से धर्म, मोक्ष और जीवन के गूढ रहसियों पर चर्चा की, जिससे उनके आध्यात्मिक ज्यान
20:00में वृद्धी हुई।
20:01इस प्रकार रानियों ने वृद्धावन के निवासियों और रिशियों के साथ अपने भावनात्मक और आध्यात्मिक समवादों से स्वयं को आनंदित
20:11और धन्य महसूस किया।
20:14रिशियों के ज्ञान से त्रिप्थ होकर, रानिया अब आपस में एक दूसरे की ओर देखने लगी, मानो एक नए और
20:21मधुर समवाद की प्रतीक्षा कर रही हो, उनके चहरों पर एक नई उचसुपता का भाव जलक रहा था
20:29रुक्मिनी ने अपने कमलस्मान नेत्रों में एक गहरी चमक लिये, धीरे से मुस्कुराते हुए अपनी सक्खियों की ओर संकेत किया,
20:37उनकी आखों में एक अनकही प्रेन गाथा का आहवान था
20:42सत्यभामा अपनी चंचल और तेजस्वी प्रकृती के अनुरूप उच्साह से भर उठीन और खिलखिला कर बोली
20:50जामवती ने अपनी मधोर और शांत वानी में सत्यभामा का समर्थन किया
20:56कालिंदी यमुना देवी का साक्षात रूप थोड़ी संकोची थी, पर उनके श्याम मुखमंडल पर भी अपने अनुभव साजा करने की
21:05गहरी इच्छा जलक रही थी
21:08मित्रविंदा ने सिरहिला कर अपनी सहमती दी, उनके भीतर भी अपने प्रियतम के साथ जुड़ी स्मृतियों का सागर उमड रहा
21:16था, जिसकी लहरें उनके शांत मुखमंडल पर जलक रही थी
21:21भगवती लक्षमना ने मृदुता से कहा
21:25भगवती भद्रा ने एक रहस्य में मुस्कान बिखेरी, जैसे वह पहले से ही अपने अतीत के पन्नों को पलट रही
21:32हो और उन अन्मोल क्षणों को अपने मन में संजो रही हो
21:37इस दिव्य सभा में उपस्थित महान रिशिमुनिगन अपनी गहन तपस्या के बावजूद रानियों के इस पारस्परिक समवात को गहरी रुची
21:46और स्नेह के साथ देख रहे थे
21:49देवर्शी नारद अपनी वीना लिये इस दिव्यक्षन के एक मौन और आनन्दित साक्षी बन रहे थे उनके मुख पर एक
21:57शांत अनुमोदन और गहरी प्रसन्निता का भाव था
22:02भगवान श्रीक्रिश्न अपनी दिव्य और मोहक मुस्कान के साथ अपनी प्रिया रानियों की ओर देख रहे थे उनके हिदय में
22:09प्रेम और करुणा का अनन्द सागर लहरा रहा था
22:14रुकमिनी ने सबसे जेश्ट और प्रतिष्ठित होने के नाते अपनी सक्खियों की ओर मुर कर मधुर्ता से पूछा
22:22एक शन के लिए सभी रानिया आपस में एक दूसरे को देखने लगी
22:26मानो यह तै कर रही हो कि उनमें से कौन सबसे पहले अपने हृदय की गाथा को शब्दों में ढालेगा
22:34सत्यभामा अपनी अधीर्ता को रोक न सकी और कहने लगी
22:39उनकी चंचल बात सुनकर सभी रानिया एक मधुर हास्य में डूब गई
22:44इस पवित्र और प्रेम्मय वातावर्ण में एक सुखद और हल्की फुल की लहर दोड़ गई
22:51रुकमिनी ने अपनी सक्खियों के आनंद और सहमती को भाम्पते हुए
22:55एक दिव्य मुस्कान के साथ स्वीकृती में सिरहिलाया और उनकी ओर देखा अपनी कथा कहने को तैयार
23:03रिश्यमुनिगन अपनी ध्यान मुद्रा से बाहर आकर उचसुकता पूर्वक रानियों की ओर उनमुख हुए
23:09प्रभु की अद्भुत लिलाओं को सुनने की गहरी लालसा उनके चहरे पर थी
23:15आकाश से दिव्य देवगन और गंधर्व भी इस अद्रिश्य सभा में शामिल होने लगे
23:20अपनी अपनी कहानियों के श्रवन का अफसर पाकर वे आनंदित हो उठे
23:26पूरा वातावर्ण एक अनूठी अपेक्षा और भक्ती से भर उठा
23:30जहां हर कोई प्रभु की अद्भुत प्रेम कथाओं को सुनने के लिए अपनी आत्मा की गहराई से लालायत था
23:38रुकमिनी ने एक गहरी श्वास ली और अपनी दिव्य आखों से चारों और देखा
23:44जैसे अपनी हृदय की गाथा को शब्दों में ढालने से पहले एक आग्र और शांत हो रही हो
23:51अपनी कथा को सुनाने के लिए तैयार रुकमिनी ने अपनी मधुर वानी में द्वारका के दिव्य दर्बार को संबोधित करते
23:58हुए
23:59अपने हृदय के गहरे प्रेम का रहस्य उजागर करना आरंभ किया
24:04वह बताती हैं कि कैसे बचपन से ही उन्होंने भगवान कृष्ण के वीरतापूर्ण कारियों और अध्वितिय गुनों के बारे में
24:12सुना था
24:12जिससे उनके हृदय में उनके प्रती अटूट श्रधा और प्रेम अंकुरित हो गया था
24:19वृद्ध ब्राह्मनों और रिशियों के मुख से कृष्ण की महिमा और उनके परम पुरुष होने के गुनों को सुनकर रुक्मिनी
24:26ने उन्हें ही अपना एक मात्र पती मान लिया था
24:30जब उन्हें पता चला कि उनके पिता विदर्भराज भी कृष्ण से विवाह की इच्छा रखते हैं तो उनके हृदय में
24:38आशा की एक नई किरण जगी
24:41परंतु उनके जेश्ट भ्राता रुक्मी ने जो कृष्ण को अपना शत्रु मानते थे इस पवित्र संबंध का घोर विरोध किया
24:49और शिशुपाल से उनका विवाह तै कर दिया
24:53शिशुपाल चेदिराज एक अभिमानी और क्रूर राजा था जिससे विवाह का विचार ही रुक्मिनी के हृदय को भय और निराशा
25:01से भर देता था
25:03अपने भाग्य के इस अन्याय पूर्ण मोर को स्वीकार करने के बजाएं उन्होंने अपने अटूट प्रेन और विश्वास के बल
25:11पर एक सासिक निर्नय लिया
25:14उन्होंने अपनी सबसे विश्वस्निय दासी के माध्यम से एक व्रिद्ध और पवित्र ब्राहमन को गुप्त रूप से अपने पास बुलाया
25:22ताकि वे अपनी हृदय की व्यथा को कृष्ण तक पहुँचा सकें
25:27अपनी कलम से उन्होंने एक मारमिक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कृष्ण को अपने पती के रूप में स्विकार करने की
25:35अपनी इच्छा, अपनी दैनी अस्थिती और शिशुपाल के साथ जबरन विवाह को रोकने की प्रार्थना की
25:43ब्राहमन ने तुरंत द्वार्का की ओर प्रस्थान किया, अपने कंधों पर राजकुमारी के हृदय के सबसे गहरे विश्वास और पुकार
25:51का भार लिये
25:52द्वार का पहुचकर ब्राहमन ने सीधे कृष्ण के राजदर्बार में प्रवेश किया और रुकमिनी का गुप्ट संदेश उनके कमलवत चर्णों
26:01में प्रस्थुत किया
26:03पत्र पढ़ते ही कृष्ण के दिव्य नेत्रों में एक क्षण के लिए गंभीर्ता और फिर द्रिड संकल्प की चमक आ
26:10गई उन्होंने रुकमिनी के हृदय की पुकार को समझ लिया था
26:15बिना एक पल गवाए भगवान ने ब्राह्मन को आश्वासन दिया और स्वय रुकमिनी को बचाने तथा अधर्मी राजाओं को सबक
26:23सिखाने के लिए रत पर सवार होकर कुंदिनपूर की ओर प्रस्थान किया
26:28कुंदिनपूर में रुकमिनी विवाह से पूर्व की देवी पूजा के लिए नगर के बाहर स्थित गिरिजा देवी मंदिर की ओर
26:36चली उनका हृदय आशा और भय के द्वंदों में डूबा हुआ था
26:41जैसे ही वह मंदिर से बाहर निकली उनके नेत्रों ने कृष्ण को अपने रत पर प्रतीक्षा करते हुए देखा एक
26:49ऐसा क्षण जिसने नेती की धारा को हमेशा के लिए मोर दिया
26:54कृष्ण ने बिना किसी देरी के उनका हाथ थामा और उन्हें अपने रत पर बिठा कर तूफान की गती से
27:01बिवाह समारो स्थल से दूर ले गए जिससे सभी उपस्थित राजा हत प्रभ है गए
27:07शिशुपाल, जरासंध और अन्य अभिमानी राजा अपने अपमान से क्रोधित होकर कृष्ण और रुक्मिनी का पीछा करने लगे जिससे एक
27:16भयंकर युद्ध छिड़ गया
27:19बल्राम और अन्य यादव वीरों ने क्रिश्ण का बचाव करते हुए क्रोधित राजाओं की सेनाओं का सामना किया और उन्हें
27:27रणभूमी में बुरी तरहे परास्त किया
27:30कृष्ण ने अपने अहंकारी भ्याता रुक्मी को भी पराज़ित किया उसके सिर के बाल काट कर उसे अपमानित किया लेकिन
27:38बल्राम के आग्रह पर उसके प्रान बक्ष दिये
27:42विजी होकर कृष्ण रुक्मिनी के साथ द्वारका लोटे जहां उनका भव्य स्वागत किया गया और प्रेम वधर्म की इस विजयगाथा
27:50का उच्सव मनाया गया
27:53अंतर द्वारका में कृष्ण और रुक्मिनी का विवाह वैदिक रीति रिवाजों के अनुसार संपन हुआ जो उनके शाश्वत प्रेम और
28:01अटूट विश्वास का प्रतीक बन गया
28:04द्वारका में नविवाहित कृष्ण और रुक्मिनी ने प्रेम और शांती से भरे दिन बिताए, उनके अलोकिक सम्बंध से नगरी में
28:12आनंद और सम्रध्धी फैल गई
28:15इसी बीच द्वारका के एक धनी यादव, सत्राजित, सूर्यदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर उनसे बहुमूल्य स्यमंतक मनी प्राप्त करते
28:24हैं, जो अद्भुत आभा से चमक रही थी
28:29स्यमंतक मनी के आगमन से सत्राजित के ग्रह में अद्भुत सम्रिध्धी और प्रकाश फैल गया, उसकी चमतकारी आभासे द्वार का
28:37नगरी भी आलोकित हो उठी
28:40भगवान कृष्ण स्यमंतक मनी की शक्ती को लोखित में उप्योग करने का विचार कर सत्राजित से विनमर्ता पूर्वक अनुरोध करते
28:48हैं कि वे इसे यादवों के कल्यान के लिए उग्रसेन को समर्पित कर दें
28:54परंतु सत्राजित अपनी संपत्ती के प्रती अत्यधिक आसकती और घमंड के कारण भगवान कृष्ण के लोखितकारी प्रस्ताव को ठुकरा देते
29:03हैं जिससे उनके मन में अहंकार और भी बढ़ जाता है
29:08कुछ समय बाद सत्राजित का भाई प्रसेन स्यमंतक मनी को पहन कर शिकार के लिए वन में जाता है जहां
29:16एक क्रूर सिन उस पर हमला कर उसे मार डालता है
29:20जब प्रसेन का शव बिना मनी के पाया गया तो सत्राजित ने क्रोध और दुहक में अंधा होकर भगवान कृष्ण
29:28पर मनी चुराने और अपने भाई की हत्या का जूठा इल्जाम लगा दिया
29:33अपने उपर लगे इस अपमान जनक आरोप से द्रवित होकर भगवान कृष्ण ने अपनी निशकलंग प्रतिष्ठा को पुनह स्थापित करने
29:42और स्यमन तक मनी को खोजने का द्रिड संकल्प लिया
29:46कृष्ण प्रसें के मार्ग का अनुसर्ण करते हुए पहले एक मृत सिह को पाते हैं, जिसे किसी अन्य शक्तिशाली प्राणी
29:54ने मार डाला था और फिर एक भालू के पच्चहनों का पता लगाते हैं
30:01पच्चिहनों का पीछा करते हुए, कृष्ण एक विशाल अंधेरी गुफा के प्रवेश द्वार पर पहुँचते हैं, जो किसी प्राचीन और
30:09शक्तिशाली प्राणी का निवास स्थान प्रतीत होती थी
30:13गुफा के अंदर प्रवेश कर, कृष्ण देखते हैं कि एक छोटी बालिका स्यमंतक मणी से खेल रही है, जिसे उसने
30:21अपने पिता भालुश्रिष्ट जामवान से प्राप्त किया था
30:25तभी गुफा में भालुओं के राजा, जामवान प्रवेश करते हैं और अपनी पुत्री के पास एक अजनबी को देखकर क्रोधित
30:34हो उठते हैं, अंजाने में कृष्ण को चुनौती देते हैं
30:39क्रोधित जामवान और मनी तथा अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा में खड़े कृष्ण के बीच एक भयंकर और अप्रत्याशित युद्ध आरंभ
30:47होता है, जिससे गुफा के भीतर कमपन उठने लगता है
30:5228 दिनों तक दोनों योध्धाओं के बीच भीशन युद्ध चलता रहा, गुफा में गुंजती उनकी गर्जनाय और प्रहारों की ध्वनी
31:01त्रिलोग को विचलित करती रही
31:0229 अंतह अपने हर प्रहार को व्यर्थ होते देख और कृष्ण की अलौकिक शक्ती से अभिभूत होकर, जामवान ने उन्हें
31:11त्रेता युग के भगवान राम के रूप में पहचान लिया
31:1430 अपने अपराध का पश्चाताप करते हुए, जामवान ने स्यमंतक मनी के साथ साथ अपनी सुन्दर और गुणी पुतरी जामवनती
31:37को भी भगवान क्रिश्न को पत्नी के रूप में समर्पित कर दिया
31:42स्यमंतक मनी और अपनी नवधु जामवनती के साथ द्वार का लोटते ही, भगवान क्रिश्न ने अपनी निर्दोष्टा प्रमानित की, जिससे
31:51सभी यादव आनंदित हो उठे
31:54अपनी भयानक गलती का एहसास होने पर सत्राजित पश्चाताप की अगनी में जलते हुए क्रिश्न के पास आते हैं और
32:02उनसे क्षमा याचना करते हुए अपनी पुतरी सत्यभामा को भेंट करते हैं
32:08इस प्रकार भगवान कृष्चन ने न्याय और प्रेम के प्रतीक के रूप में स्यमंतक मनी को वापस पाकर जामवंती और
32:16सत्यभामा दोनों से वैदिक रीतिरिवाजों के अनुसार विवाह किया, जिससे द्वारका में हर्शोल लास्चा गया
32:24द्वारका के भव्य और दीप्तिमान अंतहपुर में सूर्य पुत्री कालिंदी अत्यंत विनीत भाव से अपनी भक्ती और असाधारन तपस्या की
32:33पावन कथा सुनाने लगती हैं
32:37कालिंदी बताती हैं कि कैसे उन्होंने यमुना नदी की शीतल और नीली गहराईयों में भगवान विश्नु को पती रूप में
32:44पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी
32:48जल के भीतर निरंतर ध्यानमगन कालिंदी के चारों और एक दिव्य और अलौकिक तेज उत्पन्न हो गया था जो उनके
32:56परम प्रेन को प्रकट कर रहा था
32:59एक दिन वन विहार और आखेट के दौरान महान धनुर्धर अर्जुन ने यमुना के मध्य एक अत्यंत सुन्दर कन्या को
33:07घोर तपस्या में लीन देखा और वे चकित रह गए
33:11अर्जुन के निकट जाकर पूछने पर उस तेजस्वी तपस्विनी ने अत्यंत संकोच और गरिमा के साथ अपना परिचय भगवान सूर्यदेव
33:20की पुत्री कालिंदी के रूप में दिया
33:23कालिंदी ने अत्यंत विनम्रता पूर्वक अपने हृदय की वह अभिलाशा प्रकट की की उन्होंने केवल साक्षात भगवान श्रीकृष्ण को ही
33:32अपने पती के रूप में चुना है
33:35तभी भग्तों के संकट मोचन भगवान श्रीकृष्ण अपनी अलोकिक छवी के साथ स्वय यमुना तट पर प्रकट हुए और कालिंदी
33:43की वर्षों की तपस्या सफल हो गई
33:46करुणामई भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत स्नेह से कालिंदी का हाथ थामा और उन्हें अपने विशाल स्वर्ण रत पर बिठा कर
33:54द्वारका की ओर प्रस्थान किया
33:58द्वारकापुरी में वेदमंत्रों की गूंज और देवताओं के पुश्पवरिष्टी के बीच भगवान श्रीकृष्ण और देवी कालिंदी का यह पावन विवाह
34:06उत्सव अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ
34:10कालिंदी की इस भक्तिपून गाथा को सुनकर अवन्ती देश की राजकुमारी मित्रविंदा आगे बढ़ती हैं और अपने साहसी प्रेम और
34:19विवाह का वृत्तान्त सुनाने लगती हैं
34:23मित्रविंदा भावुक होकर बताती हैं कि वे बच्पन से ही भगवान कृष्ण के परमरूप और उनके अनन्त गुनों की अनन्य
34:30उपासक बन चुकी थी
34:33परंतु उनके अहंकारी और दुराचारी भाई विंद और अनुविंद दुर्योधन के वश में होकर उनकी इस पवित्र इच्छा के घोर
34:41शत्रू बन चुके थे
34:44जब मित्रविंदा के विवाह हेतु अवन्ती में एक विशाल स्वयमवर का आयोजन किया गया तब उनके भाईयों ने बलपूर्वक श्री
34:52कृष्ण को आमंत्रित करने से मना कर दिया
34:56स्वयमवर सभा में बैठी मित्रविंदा अपने हाथों में वर्माला लिये अत्यंत व्याकुल थी और मन ही मन केवल अपने स्वामी
35:04कृष्ण से रक्षा की पुकार कर रही थी
35:07ठीक उसी समय सेहं की भाती भीशन गर्जना करते हुए भगवान श्री कृष्ण अपने दिव्यरत पर सवार होकर स्वयमवर सभा
35:15के मुख्य द्वार पर आ पहुँचे
35:18क्रोध से लाल होकर विंद और अनुविंद ने अपने अस्त्रशस्त्र उठा लिये और द्वार काधीश श्री कृष्ण को बंदी बनाने
35:26के लिए अपनी विशाल सेना को आगे बढ़ने का आदेश दिया
35:31रणभूमी में भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कौमोद की गदा और शार्णग धनुष धारन कर पलक जपकते ही विरोधी योध्धाओं
35:39और उनके रथों को छिन्न भिन्न कर दिया
35:42कृष्ण ने विंद और अनुविंद के अहंकार को धूल में मिला दिया परंतु मित्रविंदा के भाई होने के कारण उन्हें
35:50प्रांदान देकर उनके सम्मान की रक्षा की
35:53पराजित राजाओं के समक्ष श्रीकृष्ण ने अत्यंत गर्व से राजकुमारी मित्रविंदा का हाथ थामा और उन्हें अपने रत पर बिठाकर
36:02द्वारका के लिए प्रस्थान किया
36:05इस प्रकार द्वारका में देवी मित्रविंदा और श्रीकृष्ण का पावन विवाह संपन हुआ, जिसने सिद्ध किया कि सच्ची भक्ती के
36:13समक्ष कोई भी बाधाटिक नहीं सकती
36:17मित्रविंदा के विवाह के पश्चात, भगवान श्री कृष्ण अपनी अन्यरानियों के साथ राजमहल के एक भव्यकक्ष में विराजमान हुए, जहां
36:26प्रेम और भक्ती की कहानियों का अध्भुत अध्याय आगे बढ़ना था
36:31इसी क्रम में कैके के राजा ध्रिष्ट केतु की सुन्दर पुत्री देवी भद्रा, जिनकी आखों में कृष्ण प्रेम की जोती
36:39जग्मदा रही थी, अपनी कहानी सुनाने को तत्पर हुई
36:43भद्रा, जो अपने भाईयों समवर्धन, भद्रसेना, सुदर्शन, दिगदर्शन और घ्रिष्ट केतु के साथ राजसी ठाटबाट में पलीब्धी थी, खृदय से
36:53केवल भगवान केशव को ही अपना पती मान चुकी थी
36:58कैके के राजकुल ने स्वेच्छा से अपनी पुत्री भद्रा का विवाह स्वय भगवान श्रीकृष्ण से करने का प्रस्ताव द्वार का
37:05भेजा, जिसे पाकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए
37:10अपने प्रियतम से मिलन की उतकंठा लिए, देवी भद्रा एक भव्य रत पर सवार होकर स्वन आभूष्णों से सुसजित द्वार
37:18का की ओर प्रस्थान कर रही थी, उनका हृदय भक्ती से उतप्रोथ था
37:24इस प्रकार द्वार का में देवी भद्रा और श्रीकृष्ण का शुब विवाह पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चार और उत्सव के साथ संपन
37:32हुआ, जो प्रेम और समर्पन का एक और अनुपम उदाहरन बन गया
37:38ततपश्चात महाराज मगराधिप्ती की सुपुत्री परम सुंदरी देवी लक्षमना, जिनके सौंदर्य की ख्याती तीनों लोकों में फैली थी, अपनी अद्वितिय
37:48प्रेन कथा सुनाने को आगे आई
37:51लक्षमना के स्वयंबर में एक विशालकाय मत्स्य को लक्षय भेदने की कठिन शर्प रखी गई थी, जिसे कई पराक्रमी राजा
37:59और राजकुमार भी भेदने में असमर्थ रहे
38:03जब सभी दिगजों ने हार मान ली, तब भगवान श्रीकृष्ण ने सहचता से धनुष उठाया, जलकुंड में प्रतिबिम देख मत्स्य
38:11को भेद दिया, और सबके आश्चर्य के बीच स्वयंबर जीत लिया
38:17विजी होने पर देवी लक्षमना ने निर्भैता पूर्वक भगवान श्रीकृष्ण के गले में वर्माला डाली, जिससे सभी उपस्थित राजा क्रोधित
38:26हो उठे और युद्ध की घोशना कर दी
38:29परंतु भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी माया से उन समस्त अहंकारी राजाओं को पराजित कर बिना किसी रक्तपात के लक्षमना को
38:38अपने रत में बिठा कर द्वारका के लिए प्रस्थान किया
38:42इस प्रकार द्वारका में देवी लक्ष्मना और भगवान श्री कृष्ण का विवाह संपन्न हुआ, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि
38:50भाग्य और प्रेम के मार्ग में कोई शक्ती बाधा नहीं बन सकती
38:55अब बारी थी सूर्य देव की तपस्विनी पुत्री परम पावन देवी कालिंदी की, जिन्होंने यमुना नदी में तपस्या करते हुए
39:03भगवान विश्णु को पती रूप में पाने का प्रण लिया था
39:08एक बार वन में मृग्या करते हुए भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन यमुना के तट पर पहुँचे जहां एक दिव्य
39:15कन्या को गेहन तपस्या में लीन देखकर वे विस्मित रह गए
39:20अर्जुन ने कौतु हलवश उस तपस्विनी के समीप जाकर उसका परिचय पूछा तब कालिंदी ने स्वयं को सूर्य पुत्री बताकर
39:28अपने तपस्या का उद्देश्य भगवान विश्णु को पती रूप में पाने की इच्छा व्यक्त की
39:35श्री कृष्ण जो सर्वव्यापी और सर्वग्य थे कालिंदी की भक्ती और ग्रिड संकल्प से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने स्वयं
39:44विवाह का प्रस्ताव रखकर उनके मनोरत को पूर्ण किया
39:48अपनी प्रतिग्या पूर्ण होती देख देवी कालिंदी हर्शोल लास के साथ भगवान श्री कृष्ण के साथ द्वारका की ओर प्रस्तान
39:56कर रही थी उनके चहरे पर एक अलौकिक तेज था
40:01द्वार का पहुच कर भगवान श्री कृष्ण ने विधिवत देवी कालिंदी से विवाह किया, जिससे सूर्य पुत्री का सदियों पुराना
40:09सप्ना साकार हुआ और वे अनंत प्रेम की अधिकारिनी बनी
40:14इस प्रकार प्रत्येक रानी की प्रेम कथा ने भगवान कृष्ण की लीलाओं, उनके भक्तों के प्रती अगाध प्रेम और उनकी
40:22दिव्य शक्ती का प्रदर्शन किया, जिससे सभी उपस्थित श्रोतागन अभिभूत हो उठे
40:28ये कथाए केवल विवाहों का वर्णन नहीं थी, बलकि यह परम ज्यान का स्रोत थी, जो यह दर्शाती थी की
40:36कैसे भाग्य, भक्ती और भगवान की क्रिपासे आत्मा को पर्मानंद की प्राप्ती होती है
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