द्वारका में वसुदेव के महायज्ञ के समापन के बाद, एक गहरी शांति छाई हुई है। लेकिन कृष्ण की माता देवकी के हृदय में अपने छह खोए हुए पुत्रों के लिए एक अनकहा दुःख अभी भी छिपा है। इस भावुक कड़ी में, भगवान श्रीकृष्ण अपनी माता की इच्छा पूरी करने के लिए एक अविश्वसनीय यात्रा पर निकलते हैं – सुतल लोक, जहां धार्मिक राजा बलि का शासन है। देखें कैसे श्रीकृष्ण अपनी दिव्य शक्ति से मृत्युलोक से देवकी के पुत्रों को वापस लाते हैं, और एक माँ को अपने बिछड़े हुए बच्चों से मिलाते हैं। यह अलौकिक पुनर्मिलन और मुक्ति की कहानी आपको भावुक कर देगी! #BhagavataPurana #KrishnaLeela #Devaki #SutalaLoka #KingBali #DivineLove #HinduMythology #YouTubeSeries #Mahayagya #KrishnaStory
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00:00वसुदेव के महायज्य की पूर्णा हुती के बाद द्वार का नगरी दिव्यशान्ती, सुंगधित धूप और वेदमंत्रों की मंगलकारी ध्वनी से
00:08सराबोर थी.
00:10महल के जरोखे से ढलते हुए सूर्य को देखते हुए माता देवकी के हृदय में अपने छै मृत पुत्रों की
00:17पुरानी पीडा एक बार फिर ताजा हो उठी.
00:21यग्य की वेदी के समीप शांत चित बैठे महाराज वसुदेव अपने अंतर्मन में इश्वर की अनन्य कृपा का अनुभव कर
00:29रहे थे.
00:31तभी कक्ष में द्वार काधीश भगवान श्री कृष्ण ने प्रवेश किया, जिनके निलवर्ण शरीर से उचसर्जित होने वाली दिव्य आभा
00:39पूरे वातावर्ण को आलोकित कर रही थी.
00:42उनके पीछे बलराम भी गंभीर मुद्रा में चले आ रहे थे, जिनका गोरा और सुद्रिड शरीर उनके भीतर के अनन्त
00:50बल को प्रदर्शित कर रहा था.
00:53दोनों भाईयों को अपने सम्मुख पाकर भी देवकी की आखों में छिपे हुए आसू उनके मात्रित्व के अधूरेपन और पुराने
01:01घावों को बया कर रहे थे.
01:04देवकी के मस्तिष्क में कंस के उस अंधकार्मय कारागार की डरावनी यादें कौन्ध गई, जहां उनके नवजात शिशूओं को बेरहमी
01:12से चीन लिया गया था.
01:15अपने आसूओं को छुपाने का प्रयास करते हुए, देवकी ने तुरंट अपने आचल से आखों को पोच्छा और अपने होठोन
01:23पर एक जूठी मुस्कान लाने की कोशिश की.
01:27परंतु सरवग्य और घट-घट वासी भगवान श्रीकृष्ण से अपनी प्यारी माता के हृदय का यह गहरा और अनकहा दुहक
01:34तनिक भी छिपा न रह सका.
01:37श्रीकृष्ण अत्यंत कोमलता से देवकी के समीप गए और उन्होंने अपना कोमल हाथ अपनी माता के कापते हुए हाथों पर
01:45रख दिया.
01:47अपने पुत्र का स्पर्श पाते ही देवकी का सबर का बांध तूट गया और वे सिसकते हुए अपने उन्चै नवजात
01:55बच्चों के वियोग का विलाप करने लगी जिन्हें वे कभी स्तनपान भी न करा सकी थी.
02:01पीछे खड़े दाव भया बलराम का गंभीर मुखमंडल धी अपनी माता के इस अपार मात्रित्व शोक को देखकर अत्यंत ग्रवित
02:09और करुनामई हो उठा.
02:12देवकी ने रुंधे गले से कहा कि यद्यपी उनके पास साक्षात पूर्ण पुरुशोत्तम भगवान पुत्र रूप में हैं, फिर भी
02:20उन छै अभागे शिशुओं का चेहरा उनकी आखों के सामने से नहीं हटता.
02:26अपनी माता की आखों में बहते अविरल अशुरूओं को देखकर भगवान श्रीकृष्ण के नयनों में अलौकिक करुणा और एक द्रिड
02:34संकल्प की जोती चमक उठी.
02:37श्रीकृष्ण ने अपनी माता को सांत वना देते हुए अत्यंत शांत स्वर में वचन दिया कि वे उनके उन छै
02:44मृत पुत्रों को मृत्यू लोग से वापस लेकर आएंगे.
02:47इस अकल्पनिय और अलौकिक प्रतिग्या को सुनकर देवकीने विस्मय और आशा से भरी नजरों से अपने कनहया के अलौकिक और
02:57तेजस्वी मुख की ओर देखा.
03:00श्रीकृष्ण ने अपनी माता को रहस्य बताते हुए कहा कि उनके वे छै भाई वर्तमान में पाताल लोग के सुतर
03:07राज्ज में असुर्राज बली के सनरक्षण में सुरक्षित हैं.
03:12बल्शाली बल्राम ने भी अपनी गदा और हल को नमन करते हुए द्रिड़ता से सिर हिलाया और माता को आश्वस्त
03:20किया कि वे इस कार्य में कनहया के साथ हैं.
03:24उस विशाल कक्ष की वायू में अब शोक का स्थान एक अत्यंत दिव्य, सुनहरी और नीली आभावाले संकल्पने ले लिया,
03:32जिससे द्वारका के देवस्तम्भ चमक उठे.
03:36अपनी माता के वर्षों पुराने मातरित्व के घाव को भरने के लिए दोनों परम प्रतापी भाई श्रीकृष्ण और बलराम पाताल
03:44लोग की ओर प्रस्थान करने के लिए तत्पर हो गए.
03:48माता देवकी ने नयन भर जल के साथ श्रीकृष्ण और बलराम के मस्तक पर वादसल्य पूर्वक हाथ फेरते हुए पाताल
03:56लोग की यात्रा हेतु अपनी भावुक अनुम्ती और आशिरवाद दिया
04:01परमपुरुष्ण श्रीकृष्ण और बल्शाली बलराम ने संकल्प करते ही द्वारका की भूमी पर पैर रखकर अंतरिक्ष में एक संकीर्ण सुनहरी
04:10जोतिर्मय सुरंग उत्पन्न की
04:13दिव्य आभा फैलाते हुए दोनों भ्याता अधो लोग के विभिन क्षेत्रों अतल, वितल और सुतल को लांगते हुए पाताल लोग
04:21की गहन गहराईयों की ओर अग्रसर हुए
04:24जब श्रीकृष्ण और बलराम ने सुतल लोग में प्रवेश किया, तो उस अंधकार में पाताल नगरी के मनियुक्त महल और
04:32स्वर्ण स्तंभ उनकी देह की नीली और श्वेत कांती से जगमगा उठे
04:38भगवान के आगमन का आभास होते ही परम वैशनव राजा बली तुरंत अपने स्वर्ण सिनहासन से उठे और उनके श्रीचर्णों
04:46में साष्टान प्रणाम करते हुए अश्रुपूर्ण नेत्रों से स्वागत में जुप गए
04:52दानवीर राजा बली ने परम श्रद्धा के साथ श्रीकृष्ण और बलराम के चरण धोए और उस पवित्र जल को अपने
05:00और अपने मंत्रियों के मस्तक पर अत्यंत विनमर्ता से छिड़का
05:05सुतल लोक के अपने दिव्य राजसभा भवन में राजा बली ने दोनों दिव्य भाईयों को मनियुक्त आसनों पर बिठा कर
05:12अत्यंत नमर्ता पूर्वक उनके आगमन का कारण पूछा
05:17भगवान श्री कृष्ण ने अत्यंत मधूर स्वर में कहा कि उनकी माता देव की अपने उन छे नवजात पुत्रों के
05:24दर्शन पाना चाहती हैं जो इस समय सुतल लोक में विश्राम कर रहे हैं
05:30श्री कृष्ण ने राजा बली को स्मरण कराया कि पूर्वजन में मरीची रिशी के शापवश कंस द्वारा वद किये जाने
05:37के बाद ये छे दिव्य शिशु योगमाया की कृपा से सुतल लोक में सुरक्षित थे
05:43श्री कृष्ण की इस इच्छा को सुनते ही राजा बली के हृदय में अपार भक्ती उमड पड़ी और उन्होंने तुरंत
05:51अपने सेवकों को उन्चै बालकों को राजसभा में लाने की आग्या दी
05:56सेवक शीघर ही रेश्मी वस्त्रों में लिप्ते हुए उन्चै अत्यंत सुन्दर निद्रामगन नवजात शिशुओं को स्वर्ण की एक विशाल शया
06:05पर लेकर राजसभा में उपस्थित हुए
06:08राजा बली ने परमभक्ती भाव से अपने हाथ जोड कर उन्चै बालकों को जगन्नात श्री कृष्न और बलराम के करक्मलों
06:16में समर्पित कर दिया
06:19दोनों भ्राताओं ने उन्चै निद्रामगन शिशुओं को वातसले पूर्वक अपनी भुजाओं में लिया और राजा बली को आशिरवात देते हुए
06:27पुनह द्वारका के लिए प्रस्थान किया
06:30पाताल लोग की गहरायों से उपर की ओर बढ़ते हुए श्री कृष्न और बलराम की दिव्य जोती पाताल के अंधकार
06:38को चीरती हुई मृत्यो लोग की दिशा में तीवर वेग से बढ़ी
06:42द्वारका के राजमहल में उतकंठा से प्रतीक्षा कर रही माता देवकी और पिता वसुदेव के समक्ष दोनों भ्राता छै बालकों
06:51के साथ सहसा प्रकट हो गए
06:54अपने मृत पुत्रों को जीवित और सुरक्षित श्रीक्रिश्न तथा बलराम की गोद में देखकर माता देवकी का हृदैस तब्ध रह
07:01गया और उनके हाथों से पूजा की थाली छूट गई
07:06श्रीक्रिश्न ने अत्यंत प्रेम पूर्वक अपनी माता देवकी की ओर बढ़कर उन छै सुन्दर शिशुओं को उनकी त्रिशित गोद में
07:14एक एक करके रख दिया
07:16वर्षों के शोक को भूल कर माता देवकी ने अपने छै पुत्रों को सीने से लगा लिया और उनके वातसले
07:24से बहते दुग्धने बालकों को नवजीवन प्रदान किया
07:28जगदंबा देवकी का दुग्धपान करते ही वे छै शिशु अपने प्राचीन शाप से मुक्थ हो गए और तुरंत तेजस्वी देव
07:36पुत्रों के रूप में परिवर्तित हो गए
07:39शाप मुक्थ होकर वे छै दिव्यदेव पुत्र श्रीकृष्ण बलराम और माता देवकी के चर्णों में सादर प्रणाम करके परमधाम वैकुंठ
07:47की ओर प्रस्थान कर गए
07:50माता देवकी ने अश्रुपूरित नेत्रों से उस भयानक अतीत का स्मरण करते हुए श्रीकृष्ण और बलराम को कंस के भीशन
07:58अत्याचारों की गाथा सुनाना आरंभ किया
08:02उन्होंने याद किया कि कैसे मथुरा के राजमार पर आकाशवानी ने राजा कंस को सचेट किया था कि देवकी का
08:09आठवा पुत्र ही उसका काल बनेगा
08:13उस भविश्यवानी से भैभीत होकर दुष्ट कंस ने अपनी ही बहन देवकी के बाल पकड़ कर तलवार खींच ली और
08:20उसे मारने के लिए तत्पर हो गया
08:23तब वसुदेव जी ने देवकी के प्राणों की रक्षा करने के लिए कंस को वचन दिया कि वे अपने प्रत्येक
08:30नवजात शिशु को स्वयं उसके हाथों में सौंप देंगे
08:35कंस ने उन दोनों को मथुरा की अत्यंत भयानक और अंधकार्मई कारागार में भारी लोहे की जंजीरों में जकड कर
08:42बंदी बना दिया
08:44समय आने पर जब कारावास के सन्नाटे में देवकी के प्रत्थम सुन्दर बालक का जन्म हुआ तो माता का हृदय
08:52वात्सल्य और भय दोनों से भर उठा
08:55लेकिन काल बनकर आये कंस ने कारागार के द्वार तोर दिये और उसकी आँखों में केवल मृत्यु का क्रूर उनमात
09:03दिखाई दे रहा था
09:05माता देवकी अपने प्रत्थम शिशु को छाती से चिपका कर कंस के चर्णों में गिर पड़ी और अपने मासूम बालक
09:12के प्राणों की भीख मांगने लगी
09:15परन्तु निर्दई कंस का हरिदय तनिक भी नहीं पिघला और उसने देवकी की सिस्कियों को अनसुना करके बालक को क्रूरता
09:23से चीन लिया
09:24और उस पाशान हरिदय राजा ने उस निश्पाप नवजात शिशु को कारागार की कठोर शिला पर निर्देता पूर्वक पटक दिया
09:34इस हृदय विदारक घटना की पुनरावरित्ती तब हुई जब देवकी का दूसरा बालक जन्मा और उसे भी उसी निश्थुर भांती
09:42मार डाला गया
09:44तीसरे और चौथे पुत्र के समय भी कारागार की दिवारें देवकी की करुन पुकार से काम उठीन परंतु कंस का
09:51अत्याचार रुखने का नाम नहीं ले रहा था
09:55जब पांचवा बालक इस संसार में आया तो वसुदेव जी की असहाय आखे भी लोहे की जन्जीरों में बंध कर
10:02केवल अश्रु बहाती रह गई
10:05छठे पुत्र के वध के पश्चात माता देवकी की गोध पूरी तरह सूनी हो गई और उनका संपूर्ण जीवन अन्थीन
10:13शोक के अंधकार में डूब गया
10:16देवकी ने कापतेस्वर में कहा कि वर्षों तक वे उन छहों नवजात बालकों के अधूरे सपनों और उनकी अंतिन चीखों
10:24के बोज को अपने हृदय में ढोती रही
10:28वसुदेव जी ने भी याद किया कि कैसे मथुरा के बंदीग्रह का प्रत्येक पाशान उनकी मौन पीड़ा और निरुपाय रुदन
10:36का साक्षी बना था
10:38माता देवकी ने अत्यंत वातसल्य से श्री कृष्ण की ओर देखते हुए कहा कि उनके जन्म ने उस असीम अंधकार्मई
10:46रात्री में परम प्रकाश की पहली किरण बिखेरी थी
10:50और आज पुत्र कृष्ण की दिव्य लीला के कारण ही उन छहों निश्पाप आत्माओं को शाप से मुक्ती मिली और
10:57वे परमधाम की ओर प्रस्थान कर सके
11:01भगवान श्रीकृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ अपनी माता के चर्णों का स्पर्ष किया और उनके पुराने घावों को अपने
11:09असीम वातसल्य और स्पर्ष से सदा के लिए भर दिया
11:13द्वारका की संपूर्ण सभा इस भावुक द्रिश्य को देख कर गदगद हो उठी और धर्म की विजय तथा देवकीव सुदेव
11:21के धैर्य की जैजयकार करने लगी
11:24परंतु देवकी का मातरित वहरिदय अभी भी अपने उन्चै निश्पाप शिशूओं के लिए विलाप कर रहा था जिनकी मृत्यू कंका
11:32के शाप के कारण हुई थी और जिनकी आत्माए अभी भी पातालोक में प्रतीक्षा कर रही थी
11:40समस्त लोकों के स्वामी भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से अपनी माता के अंतर्मन में छिपे उस अथा दुहक
11:48को तुरंत भाप लिया जो उनकी मुस्कान के पीछे भी छिपा नहीं था
11:53देव की शब्दों से व्यक्त न कर पाने वाले अपने मातरु प्रेम और पीडा को लेकर कृष्ण की ओर अश्रुपूर्ण
12:01नेत्रों से देखने लगी मानों उनके नेत्रों से एक मुग प्रार्थना बाहर आ रही हो
12:07भगवान श्री कृष्ण ने अपनी मा के मर्म को समझते हुए असीम वातसल्य से उनके कंधों पर अपना हाथ रखा
12:14उनका स्पर्ष किसी दिव्य मरहम के समान था जो हर घाव को भरने में सक्षम था
12:21फिर एक गंभीर किंटु शान्तिपूर्ण अभिव्यक्ति के साथ भगवान कृष्ण ने अपनी माता के दूहक को दूर करने और उनके
12:30हृदय के सबसे गहरे घाव को भरने के लिए अपना दिव्य वचन देना आरंभ किया
12:36मा भगवान कृष्ण ने कोमलता से कहा आपके वे शे पुत्र जो कंका के शाप के कारण पहले मारे गए
12:43थे उन्हें मैं स्वयम्रक्यों लोग से आपके समक्ष वापस लाऊंगा
12:48कृष्ण के इन अविश्वसनिय शब्दों को सुनकर देव की का हृदय एक क्षन के लिए ठहर सा गया
12:55उनकी आखें अविश्वास और एक असाधारन नई आशा के मिश्रन से चौड़ी हो गई
13:02वसुदेव अपने पुत्र की इस असीम शक्ती और करुणा के दर्शन कर भाव विभोर हो उठे और उनके दिव्य संकल्प
13:10को मन ही मन अत्यंत श्रद्धा और प्रेम से सराहा
13:14द्वारका की संपूर्ण सभा भगवान के इस असाधारन प्रण को सुनकर एक गहरी विस्मयकारी चुप्पी में डूब गई जहां हर
13:23व्यक्ती अवाक होकर इस दिव्य लीला का साक्षी बन रहा था
13:27भगवान कृष्ण की आखों में एक अटल संकल्प चमक रहा था
13:32मानों तीनों लोग भी उनके इस महान प्रण के आगे नत्मस्तक थे और कोई भी बाधा उनके मार्ग को रोक
13:39नहीं सकती थी
13:41पुतरक देवकी ने कापतेस्वर में कहा
13:44क्या यह सचमुच संभव है कि मेरी आखें उन्हें एक बार फिर देख सकें मेरे विच है बालक जो मुझसे
13:51बिछड गए थे
13:53कृष्ण ने अपनी मा की आतुर्ता को समझते हुए प्रेम और आश्वासन से सिरहिलाया अवश्यक म
14:00मैं उन्हें आपके समक्ष पुना प्रस्तुत करूंगा यह मेरा वचन है भगवान कृष्ण के इन अटल वचनों ने उनके संकल्प
14:10को और भी द्रिढ कर दिया जिससे उनके दिव्य स्वरूप से एक अप्रतिम शक्ती और द्रिढता का आभा मंडल प्रस्पुतित
14:17होने ल�
14:30जिसे वह अपनी दिव्य यात्रा पर ले जा सके भगवान कृष्ण ने अपनी योगमाया और अंतरनिहित शक्ती से प्रेरित होकर
14:39स्वयं को इस महत्वपुन दिव्य यात्रा के लिए मानसिक और आत्मिक रूप से पूरी तरह से तयार किया
14:47जाने से पहले उन्होंने अपनी मादेवकी की ओर एक और प्रेमपून आश्वस्त करने वाली द्रिष्टी डाली अपने वातसल्य और भक्ती
14:56की असीमित गहराई से अपने वचन को और भी द्रेड करते हुए
15:01फिर एक अत्यंत सुक्षमता से भगवान कृष्ण की दिव्य उपस्थिती द्वारका की सीमाओं को पार करने लगी अपने खगोलिये और
15:10असंभव प्रतीत होने वाले अभियान पर प्रस्थान करते हुए
15:14देव की जिनके आसु अब एक शांत आशा में बदल चुके थे उस स्थान को निहारती रही जहां उनके पुत्र
15:22थे उनके हृदय में अपने बच्चों के चमतकारी पुनर्मिलन की प्रतीक्षा धड़क रही थी
15:29भगवान कृष्ण ने अपने असीमित योगबल और द्रेड संकल्प के साथ तुरंत पाताल लोग की ओर अपनी सुक्ष्म यात्रा का
15:37आरंभ किया जहां उनके पूर्वजन्म के च्छै पुत्रों की आत्माए विश्राम कर रही थी
15:44वे सहच्टा से ब्रहमांडिय माया के स्तरों और आयामी बाधाओं को भेदते हुए अपने पवित्र गंतव्यकी ओर तीवरता से आगे
15:52बढ़ने लगे जहां उन्हें अपनी मा के पुत्रों को पुना लाना था
15:58द्वारका के दिव्य प्रांगण में भगवान श्रीकृष्ण और उनके जैष्ट भ्राता बलराम सुतल लोग की इस असाधारन यात्रा पर प्रस्थान
16:06करने के लिए एक साथ खड़े हुए
16:10अपने कंधे पर हल धारन किये हुए बलशाली बलराम ने अपनी अनन्त उर्जा को श्रीकृष्ण के संकल्प के साथ जोड़ा
16:17जिससे पूरे वातावर्ण में एक दिव्य कमपन उत्पन हो गया
16:22दोनों भाईयों के दिव्य योगबल से भूमी और आकाश के बीच एक अद्रिश्य द्वार खुलने लगा जो सीधे पाताल के
16:30सुतल लोग की ओर जाता था
16:33द्वार्का के रिशिमुनी और यदुवन्शी इस अभूत पूर्व द्रिश को देख कर विस्मय से भर गए क्योंकि दोनों भाताओं का
16:41शरीर अलोकिक स्वर्ण कांती से दीप्धो उठा था
16:45भगवान श्रीकृष्ण ने अपने पांच जन्य शंख को अपने होठों से लगाया और एक ऐसी गमभीर ध्वनी उत्पन की जिससे
16:53दसो दिशाये और ब्रहमांडिये परते गूझ उठी
16:58बलराम जी ने भी अपने अस्त्रहल्धर को उपर उठा कर आकाश की ओर घुमाया जिससे निकलने वाली रजत किर्णों ने
17:05पाताल की ओर जाने वाले अंधकार्मय मार्ग को आलोकित कर दिया
17:10एक अत्यंत तीवर और जादूई प्रकाश के साथ दोनों दिव्यभाई द्वारका के समुदर की गहराईयों को चीरते हुए सुतल लोक
17:19की सीमा में प्रवेश करने लगे
17:22सागर के तल में निवास करने वाले नागराज और जल देवता इन दोनों परम पुरुषों को देखकर श्रधापूर्वक हाथ जोड़कर
17:30उनके मार्ग में नत्मस्तक हो गए
17:33जैसे जैसे वे प्रित्वी की गहराईयों में जा रहे थे उनके चारों और एक अभेद्य सुरक्षा कवच बन गया जिसने
17:41उन्हें पाताल के भीशन दबाव और गुरुत्वाकर्शन से सुरक्षित रखा
17:45वे बिलस्वर्ग के उन विशाल और अंधकार्मय कंदराओं से गुजरे जहां प्राचीन काल के चमकीले रत्न और मनिया अपनी मध्धम
17:54रोशनी बिखेर रही थी
17:57मार्ग में स्थित अत्यंत विशालकाय और फन फैलाए हुए नागों ने जब स्रिष्टी के इन दो महान सनरक्षकों को देखा
18:04तो उनका क्रोध तुरंट शान्थ हो गया
18:08अनंत शेश के साक्षात अवतार बलराम जी की उपस्थिती को पहचान कर पाताल के सभी सर्पों ने अपने मस्तक जुका
18:16लिये और उनके चर्णों की धूल को चुमा
18:19अंतह उनके सामने सुतल लोक की सीमा दिखाई देने लगी जिसका प्रवेश द्वार स्वर्ण और मूल्यवान रतनों से निर्मित विशाल
18:28द्वारों से सुशोगित था
18:31प्रित्वी की गहराईयों में होने के बावजूद सुतल लोक की वायू दिव्य पुश्पों की सुगंध से महक रही थी जो
18:38राजा बली के धार्मिक और समरिध शासन का प्रतीक थी
18:42उस परमेश्वर के आगमन को पहचान कर जिसने कभी वामन रूप में तीन पगों से संपूर्ण ब्रहमांड को नाप लिया
18:50था सुतल लोक के द्वार स्वतह ही धीरे धीरे खुलने लगे
18:55प्रवेश द्वार पर तैनात विशालकाय और बलशाली दैत्य सैनिकों ने जब इन तेजस्वी भाईयों को देखा तो उन्होंने अपने अस्त्र
19:04डाल दिये और दंडवत प्रणाम किया
19:07सुतल लोक की सुंदर भव्यता उनके सामने प्रकट हुई जहांके रत्नज्रित महल, सरोवर और उद्ध्यान देवराज इंद्र के अमरावती स्वर्ग
19:16से भी कहीं अधिक वैभवशाली थे
19:20सुतल लोक के राजा, दानवीर बली ने अपने राजसिनहासन पर बैठे ही अपने हृदय में एक अपूर्व दिव्यस पंदन और
19:28आनंद का अनुभव किया
19:30श्री कृष्ण और बलराम, जिनके चरण भूमी का स्पर्ष भी नहीं कर रहे थे
19:35सुतल के भव्य राजदर्बार में प्रविष्ठ हुए और पूरे पाताल लोक को अपनी कांती से भर दिया
19:43परमभक्त राजा बली तुरंट अपने आसन से दौरते हुए आये और भक्ति भाव से गदगद होकर अपने प्रभु के चरणों
19:51में साश्टान प्रणाम करने के लिए जुप गए
19:54साश्टांग प्रणाम करने के पश्चात, राजा बली ने अत्यंत श्रद्धाभाव से सोने के कलश से पवित्र जल निकाल कर श्री
20:02कृष्ण और बलराम के कमल चर्णों को पखारा
20:06अपने प्रभु के चर्णों को धोकर, दानवीर बली ने उस पावन चर्णामरित को परम भक्ती से अपने सिर, मुकुट और
20:14अपने समस्त मंत्रियों तथा प्रजा पर छिड़का
20:17हाथ जोड़कर खड़े राजा बली का विशाल शरीर प्रभुप्रेम के अतिरेक से कांप रहा था और उनके नेत्रों से अश्रूओं
20:25की धारा निरंतर बह रही थी
20:28राजा बली ने सरवेश्वर श्रीकृष्ण और बलराम के अर्चन हेतु दिव्य पीतामबर, सुगंधित मल्यच चंदन, बहुमुल्य रत्न और मोतियों की
20:37मालाय सादर भेंट की
20:40भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दोनों हाथों से राजा बली को आशिरवात का अभ्यमुद्रा दिया, जिससे उनका संपूर्ण मुखमंडल सूर्य के
20:49समान आलोकित हो उठा
20:51इसके उपरांत राजा बली ने अपने परम पूज प्रभु को अपने स्वय के रत्नों से जडित स्वर्ण सिन्हासन पर विराजमान
20:59किया और स्वय भूमी पर बैठ गए
21:02राजा बली ने गदगद स्वर में स्टवन करते हुए कहा कि कैसे वामन अवतार में प्रभु ने उनका सब कुछ
21:09छीन कर भी उन्हें अपना नित्यसानिध्य प्रदान किया था
21:14बली ने भावुक होकर कहा कि जिनके दर्शन ब्रह्मा और शिव जैसे देवताओं के लिए भी दुलब हैं वही त्रिलो
21:22की नाथ आज स्वया उनके द्वार पर पधारे हैं
21:26सुतल लोग के समस्त मंत्री, असुर श्रिष्ट और वरिष्ट प्रजाजन अपने प्रभु को अपने राजा के आसन पर देखकर परम
21:34आनंद से नत्मस्तक हो गए
21:37आकाश मार्ग और सुतल लोग की मनियों से जड़े प्रासाद के शिखर से प्रभु के स्वागत में दिव्य पारिजात पुष्पों
21:44की अन्वरत वर्षा होने लगी
21:47बलराम जी ने अपनी गंभीर और स्नेहपूर्ण वाणी में राजा बली के धर्म प्रायन चरित्र और उनके अटूट भक्तिभाव की
21:55भूरी-भूरी प्रशन साकी
21:58तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी मेग गंभीर वाणी में कहा कि बली जैसे अनन्य भक्त के प्रासाद का द्वारपाल स्वयन
22:06वे सदैव बने रहते हैं
22:09राजा बली ने अत्यंत विनमर्ता से प्रश्ण किया कि उनके इस तुछ सेवक के लिए प्रभू की क्या आग्या है
22:16और वे उनकी क्या सेवा कर सकते हैं
22:20श्री कृष्ण ने सुतल आने का अपना उद्देश प्रकट करते हुए बताया कि वे देवकी के उन छै पुत्रों को
22:27लेने आये हैं जिन्हें कंस ने मार दिया था
22:31प्रभू ने रहस्य उद्घाटित किया कि ये वही छै शडगर्भ बालक हैं जो अपने पूर्वजन्म के शापवश देवकी के गर्भ
22:39से उत्पन हुए थे और वर्तमान में यहां निवास कर रहे हैं
22:45अपने स्वामी की इच्छा सुनते ही राजा बली ने तुरंट अपने अंगरक्षकों को अंतहपूर से उन छै बालकों को ससम्मान
22:53लाने का आदेश दिया
22:55राजसी अंगरक्षक तुरंट सुतल लोक के पावन अंतहपूर की ओर बढ़े जहां वे छहों तेजस्वी दिव्य बालक आपस में क्रीडा
23:04कर रहे थे
23:06अंगरक्षक उन छहों परम कांतिमान बालकों को राजगरबार में ले आए जहां श्रीकृष्ण को देखते ही उन बालकों के चहरे
23:13अपूर्व आनन से खिल उठे
23:16वे छहों बालक दोड़कर श्रीकृष्ण और बलराम के चर्णों में गिर पड़े क्योंकि उन्हें अपने परमरक्षक और आदिपुरुष का आभास
23:25हो चुका था
23:27दानवीर राजा बली ने हाथ जोड़कर उन चहों बालकों को पूर्ण निष्ठा के साथ श्रीकृष्ण को सौंक दिया ताकि वे
23:35अपनी माता देवकी के पास लोट सकें
23:38दानवीर राजा बली ने अत्यंत विनीत भाव से अपने दोनों हाथ जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के समक्ष अपना मस्तक
23:47जुका दिया
23:49बली ने अपने गदगद कंट से कहा कि प्रभू के कमलचर्णों की धूली से उनका संपूर्ण सुतल लोक आजपरम पवित्र
23:57और धन्य हो गया है
23:59उन्होंने वर्णन किया कि यद्यपी सुतल पाताल लोक में स्थित है फिर भी भगवान की निरंतर कृपा के कारण यह
24:07स्वर्ग से भी अधिक व्यभवशाली दिखाई देता है
24:11सुतल लोक के भव्यस्वर्ण भवन, रत्नजडित प्राचीर और दिव्य उपवन श्रीहरी के सनरक्षन की अटूट गवाही दे रहे थे
24:21राजा बली ने स्मरण किया कि किस प्रकार वामन अवतार में भगवान विश्णू ने उनसे सब कुछ छीन कर भी
24:28उन्हें अपना सर्वोच्च वर्दान और निश्चल भक्ती प्रदान की थी
24:33आनन्दाश्रु बहाते हुए बली ने कहा कि संसार का कोई भी राजसिहासन प्रभु के श्री चर्णों के अनन्य प्रेम की
24:41तुलना में तुछ है
24:43सुतल लोग के सभी दानव सभासद और प्रजाजन भी अपने स्वामी के पच्चहनों पर चलते हुए भगवान श्री कृष्ण के
24:51चर्णों में नत्मस्तक हो गए
24:54महल के प्रांगण में सुतल लोग की अलोकिक पुषपवरिष्टी होने लगी जिससे संपूर्ण वातावर्ण भीनी भीनी सुगंध से महक उठा
25:03बली ने अपने राज्य के सर्वश्रिष्ट बहुमूल्य रत्न, सुगंधित चंदन और रेश्मी वस्त्रलाकर श्री कृष्ण और बलराम को भेंट स्वरूप
25:12समर्पित किये
25:14भगवान श्री कृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ बली की ओर देखा और सुतल लोग की इस अभूत पूर्व भक्ती
25:22को सहर्ष स्विकार किया
25:24श्री कृष्ण ने अपने मधूर स्वर में दानवीर बली के सत्यनिष्ठा, धर्म प्रायंता और अनन्यत्याग भाव की मुक्तकंट से प्रशन
25:33साकी
25:34प्रभू ने बली को आश्वस्त किया कि उनकी यह निश्चल भक्ती तीनों लोकों में युगो-युगो तक सनातन धर्म का
25:42अनुपम उदाहरन बनी रहेगी
25:45भगवान बलराम ने भी अपनी गदा को थोड़ा उठा कर राजा बली के महान कुल और उनके अडिक धर्म पालन
25:52की भूरी-भूरी सराहना की
25:54बली ने प्रभु से विंती की की वे सदैव उनके हृदय में निवास करें और सुतल लोक के द्वार पर
26:01अपनी रक्षात्मक द्रिष्टी बनाये रखें
26:04वह क्षण भी अत्यंत मनमोहक था जब वे छहों पुनरजीवित बालत पूर्णतह स्वस्थ और कांतिमान होकर श्रीकृष्ण और बलराम के
26:13समीप खड़े थे
26:15राजा बली ने उन बालकों की ओर वात्सल्य भाव से देखा और संतुष्ठ हुए कि वे माता देवकी की बहुप्रतीक्षित
26:23अभिलाशा को पूर्ण करने जा रहे हैं
26:27बली की परमपतिवर्ता रानी विंध्यावली ने भी आगे बढ़कर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के पावन चर्णों में अपनी श्रधा निवेदित
26:36की
26:37अंतर श्रीकृष्ण ने उन छहों बालकों का हाथ थामते हुए सुतल लोक से विदा लेने का संकेत दिया
26:56हृदय में अटूट भक्ती और सर्वस्व समर्पन का भाव लिये सुतल लोक को पीछे छोड़ते हुए भगवान श्रीकृष्ण चहों बालकों
27:04के साथ प्रित्वी लोक की ओर प्रस्थान कर गए
27:08अनन्त अंतरिक्ष को पार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण और बलराम उन चहों बालकों को लेकर प्रित्वी लोक की ओर तीवर
27:16वेक से आगे बढ़ने लगे
27:18शन भर में ही द्वारकापुरी के विशाल स्वर्ण द्वार पर एक अलोकिक नीली और स्वर्णिन प्रभा का अवतरण हुआ जिससे
27:26संपूर्ण नगर जगमगा उठा
27:30उधर राजप्रासाद के अंतहपुर में माता देव की अपने मृत पुत्रों की स्मृती में अत्यंत भावुक होकर भगवान के ध्यान
27:37में लीन बैठी थी
27:40महाराज वसुदेव भी अपनी पत्नी के निकट बैठे थे जब अचानक कक्ष में बहने वाली शीतल पवन ने अध्भुत अलोकिक
27:48सुगंध का प्रसार कर दिया
27:51तभी कक्ष के द्वार खुले और भगवान श्री कृष्ण तथा बलराम छै निश्पाप सुन्दर बालकों का हाथ थामे कक्ष में
27:58प्रविष्ठ हुए
28:00सामने खड़े बालकों को देखते ही माता देवकी की द्रिष्टी ठिठक गई और उनका हृदय ममता की तीवर तरंगों से
28:08उद्वेलित हो उठा
28:09कई वर्षों का संचित वातसल्य अश्रूओं के रूप में बह निकला और देवकी अपने आसन से उठकर अपने बिछडे पुत्रों
28:18की ओर दोड़ी
28:20माता देवकी ने उन चहों बालकों को एक साथ अपने आचल में समेट लिया और उनके मस्तक को बारंबार चुमने
28:28लगी
28:29पिता वसुदेव भी भाव विभोर होकर अपने चहों बालकों के शीश पर हाथ फेरने लगे और उनकी आखे भी कृतग्यता
28:37के आसुओं से भर गई
28:39माता देवकी ने अपने हाथों से बालकों को मिश्ठान खिलाया और उनके स्तन से वाथसले का दुग्ध प्रवाहित होने लगा
28:48जिससे बालकों का क्षुधा निवारन हुआ
28:52साक्षात जगजन्नी के वाथसल्य में दुग्ध का पान करते ही उन बालकों के जन्मांतर के पाप और प्राचीन शाप ततकाल
28:59भस्म हो गए
29:01देखते ही देखते उन साधारन बालकों का शरीर दिव्य तेज से प्रदीप्थो उठा और उनके चारों और अलौकिक स्वर्णिम आभा
29:10फैल गई
29:12श्रीक्रिष्ण ने मुस्कुराते हुए माता को बताया कि ये बालक पूर्वजन्म के मरीचिक्षेपक रिशिपुत्र थे जो अब अपने शाप से
29:20पूर्णतह मुक्थ हो चुके हैं
29:23शाप मुक्थ होकर वे चहों दिव्य आत्माए हाथ जोड कर पूर्ण पुरुशोत्तम भगवान श्रीक्रिष्ण और बलराम के श्रीचर्णों में दंडवत
29:32प्रणाम करने लगी
29:35तत्पश्चात उन दिव्य बालकों ने माता देव की और पिता वसुदेव के चर्णों की धूली अपने मस्तक पर लगाई और
29:42उनका आभार व्यक्त किया
29:45उसी क्षण स्वर्गलोग से एक अतिसुंदर मनिक्षित दिव्य विमान राजप्रासाद के आंगन में उत्रा और आकाश से पुष्पवरिष्टी होने लगी
29:55वे चहों दिव्य स्वरूप धारण कर उस अलौकिक विमान में विराजमान हुए और देव लोग की ओर उर्धवगमन करने लगे
30:04माता देवकी ने नयन भर के अपने पुत्रों को परमधाम जाते देखा और उनका वर्षों पुराना शोक सदास्दा के लिए
30:12समाप्थ हो गया
30:14महाराज वसुदेव ने हाथ जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण की स्तुती की और उन्हें स्रिष्टी के समस्त जीवों का उध्धारक स्विकार किया
30:23भगवान श्रीकृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ अपने मातापिता के चर्णों में मस्तक नवाया और संपूर्ण द्वारका में आनंद का
30:32जैगोश गूझ गुठा
30:47महाराज वसुदेव ने अपने दोनों तेजस्वी और दिव्य पुत्रों क्रिष्ण और बलराम को निहारते हुए महसूस किया कि उनके सांसारिक
30:55बंधन अब सदा के लिए समाप्थ हो चुके है
31:00द्वारका की राजसभा में उपस्थित देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों को जंकृत करते हुए भगवान की इस दिव्य
31:07लीला और मातापिता के पुनर्मिलन का गान प्रारंब किया
31:12संपूर्ण सभा मंडप में वेदों के पवित्र और मंगलकारी मंत्रों की गूंच सुनाई देने लगी जिससे द्वारका का वातावर्ण किसी
31:20तपोवन की भानती पावन हो गया
31:24भगवान श्री कृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ अपने मातापिता के निकट जाकर उन्हें इस नश्वर संसार की माया और
31:32आत्मा की अमर्ता का परंग्यान देना प्रारंब किया
31:36कृष्ण के मुख से निकले ब्रहमग्यान के वचनों को सुनकर माता देवकी का संशय सदा के लिए मिट गया और
31:43उनका मुखमंडल अलोकिक आध्यात्मिक कांती से चमक उठा
31:48महाराज वसुदेव ने समझ लिया कि उनके ग्रह में साक्षात परब्रहम ने पुत्र बनकर अवतार लिया है और उन्होंने मौन
31:56रहकर मन ही मन प्रभु को नमन किया
32:00बलराम जी ने अपने विशाल और तेजस्वी विग्रह के साथ अपने मातापिता को आश्वासन दिया कि धर्म की रक्षा के
32:08लिए वे सदैव उनके रक्षक रहेंगे
32:11द्वारका के राजप्रासाद की अटारियों से नगरवासियों ने देखा कि कैसे एक अलौकिक और दिव्यप्रकाश पूरे महल को अपनी ओट
32:19में लिये हुए था
32:22द्वारका के नागरिकों ने नगर के चौराहों और प्राचीरों पर दीप जलाकर इस पावन मिलन और छै पुत्रों की मुक्ती
32:29के उच्सव को मनाना शुरू कर दिया
32:32यदुवंश के वृद्ध राजा उग्रसेन ने राजसभा में आकर भगवान कृष्ण की इस अद्भुत सामर्थ्य की प्रशंसा की और उनके
32:40चर्नों में भक्ति पूर्वक पुष्प अर्पित किये
32:44महर्शी व्यास और अन्यमहान रिशियों ने भगवान कृष्ण और बलराम को आशिर्वाद दिया कि उनका यह यश्टीनों लोकों में युगो
32:53-युगो तक अमर रहेगा
32:55भगवान श्रीकृष्ण की प्रेणा से महल के प्रांगण में उपस्थित सभी निर्धनों और ब्राहमनों को अमूल्य रत्न, वस्त्र और सजी
33:03हुई गौ माताएं दान में दी गई
33:06आकाश में उपस्थित देवों और गंधर्वों ने दुन्दुभी बजाई और अपसराओं ने पुष्प वर्षा करके इस अलोकिक और पवित्र लीला
33:15की भरपूर सराहना की
33:18माता देवकी और पिता वसुदेव ने एक बार फिर अपने दोनों तेजस्वी पुत्रों को गले से लगाया, जिससे उनके जीवन
33:26का समस्थ संताप सदा के लिए मिट गया
33:29कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपने माता पिता से कहा कि उनका यह संबंध केवल लीला मात्र है और उनकी वास्तविक
33:37शरण केवल परमाक्मा के चर्णों में ही है
33:41इसके पश्चात बलराम जी ने सभा के सभी बड़ों का यतोचित अभिवादन किया और द्वार्का की सुरक्षा व्यवस्था को और
33:50अधिक सुद्रिड करने के निर्देश दिये
33:54संध्याकाल में द्वारका के समुद्र तट पर लहरेंभी मानो भगवान के इस पावन मिलन के उत्सव में जुमती हुई तट
34:01से बार-बार तकरा रही थी
34:03श्रीकृष्ण और बलराम अपने महल के जरोखे से शांत भाव से अपनी प्रजा और संपूर्ण नगरी को निहार रहे थे
34:11जहां केवल शांती और आनंद व्याप्थ था
34:15इस प्रकार भगवान की लीला से देवकी के मृत पुत्रों की मुक्ती और पुनर्मिलन की यह पावन कथा द्वारका के
34:23इतिहास में सदा के लिए अमर हो गई
34:26द्वारका के राजभवन में रात्री के प्रथम पहर के साथ ही वे छै बालत भगवान श्रीकृष्ण और बल्राम के सम्मुख
34:34अलोकिक कांती से सुशोभित होकर खड़े थे
34:38माता देव की और पिता वसुदेव अपने इन छै पुत्रों की और अश्रुपूरित नेत्रों से देख रहे थे जहां वात्सल्य
34:45और परम भक्ती का अध्भुत संगम झलक रहा था
34:50भगवान श्रीकृष्ण ने मंद मुस्कान के साथ अपने चहों भ्राताओं पर अपनी सर्वस्मर्थ कृपा द्रिष्टी डाली जिससे उनके समस्त भौतिक
34:59कर्मबंधन स्वतही क्षीन होने लगे
35:02श्रीकृष्ण की असीम अनुकमपा से उन बालकों के चारों और फैली माया की यवनिका हट गई और उनके अंतर्मन में
35:10ज्ञान का अमिट प्रकाश प्रजवलित हो उठा
35:14देखते ही देखते उन बालकों के पांच भौतिक शरीर से स्वर्णमई दिव्यकिर्णों की तीवर ज्वालाएं फूटने लगी जो उनके नश्वर
35:22आवर्ण का त्याग कर रही थी
35:25माता देवकी ने स्तब्ध और भक्तिभाव में लीन होकर देखा कि उनके मृत पुत्र अब मृत्यू लोग के मानव न
35:33रहकर भव्य देवस्वरूप में परिवर्तित हो रहे हैं
35:37पूर्व जन्म के शाप से मुक्त होकर वे छहों मरीचि पुत्र अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान गये और उन्हें परमात्मा
35:45की लीला का मर्म समझा गया
35:47अपने देवस्वरूप को प्राप्त कर उन्चहों भाईयों ने अत्यंत नमर्तापूर्वक भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के चरणकमलों में कोटी-कोटी प्रणाम
35:57किया
35:59शेशनाग के अवतार भगवान बलराम ने अपने अभय हस्त से उन छहों देवपुत्रों को आशिरवाद दिया जिससे उनका संपूर्ण शापकाल
36:08सदा के लिए समाप्त हो गया
36:10उसी क्षन द्वारका के निर्मल आकाश से स्वर्ण और रतनों से मढ़े दिव्य विमान जग्मगाते हुए नीचे उतरने लगे जिनकी
36:19कांती से दिशाएं आलोकित हो उठी
36:23देवलोक से देवताओं और अपसराओं ने इस अध्भुत क्षन के साक्षी बनकर आकाश से पारिजात के सुगंधित पुष्पों की वर्षा
36:31प्रारंभ कर दी
36:33उन छहों मुक्ट आत्माओं ने अपने नश्वर शरीरों का पूर्ण त्याग कर दिया और परमपद की ओर गमन करने के
36:40लिए वायू में धीरे-धीरे उपर उठने लगे
36:44अपने पुत्रों को मोक्ष की ओर बढ़ते देख माता देव की का हरिदय किसी भी प्रकार के शोक से मुक्त
36:50होकर परमशान्ती और संतोश से भर गया
36:55वसुदेव जी ने भी शांत और स्थिर मन से हाथ जोड़ कर भगवान की इस अपार लीला को नमन किया
37:01जिससे उनका जन्मो पुराना संताप सदा के लिए मिट गया
37:06वे चहों देव पुत्र दिव्यवस्त्रों और आभूशनों से सुसज्जित होकर आकाश में स्थित स्वन विमानों पर प्रतिष्थित हो गए
37:15आकाश गंगा में दुन्दुभी का गंभीर नाद गूंच उठा और गंधर्वों के मधुर गान से संपून ब्रहमान श्री कृष्ण की
37:23जैजैकार करने लगा
37:25श्री कृष्ण के अनुग्रह से वे छहों मुक्त आत्माएं अपने मूल देव लोक में पुन्ह प्रतिष्थित होकर जन्ममर्ण के चक्र
37:33से सदा के लिए छूट गई
37:35महल के जरोखे पर खड़े भगवान श्री कृष्ण और बलराम ने मुस्कुराते हुए उन दिव्य विमानों को अपने अपने लोकों
37:43की ओर प्रस्थान करते देखा
37:46अपने कक्ष में जाकर माता देव की ध्यान मगन हो गई जहां उनका हृदय अब केवल श्री कृष्ण की भक्ती
37:53और असीम वात्सले से सराबोर था
37:56इस प्रकार द्वारका की यह पावन भूमी श्री कृष्ण की कृपा से घटे इस महान मोक्षवत्सव की गवाह बनकर युगों
38:04-युगों के लिए अमर हो गई
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