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कुरुक्षेत्र में गहन आध्यात्मिक चर्चाओं और पुनर्मिलन के बाद, भगवान श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव एक भव्य महायज्ञ का संकल्प लेते हैं। इस एपिसोड में देखें कैसे द्वारका में ऋषि-मुनियों और राजाओं का विशाल समागम होता है, जहाँ वैदिक मंत्रों से पूरी नगरी गूंज उठती है। उद्धव का दिव्य उपदेश भक्ति योग का मार्ग प्रशस्त करता है, और वसुदेव को परम ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह गाथा सच्ची श्रद्धा, भगवद-भक्ति और मोक्ष की अद्भुत यात्रा को दर्शाती है। #BhagavataPurana #KrishnaLeela #VasudevaYajna #Dwarka #BhaktiYoga #SpiritualJourney #HinduMythology #UddhavaGita #Moksha #SanatanDharma
Transcript
00:00कुरुक्षेत्र के युद्ध भूमी पर विदाई की घडिया पहुची थी, जहां विजी पांडवों और प्रसन्य यादवों ने अन्य राजाओं वरिशियों
00:08को स्नेह पूर्वक विदा किया।
00:11कृतज्यता से भरे पांडवों ने अपने उध्धारक और सार्थी भगवान श्री कृष्ण को बारंबार नमनकर उनके प्रती अटूट श्रधा और
00:20प्रेम व्यक्त किया।
00:21तब विजय और आध्यात्मिक शांती के साथ भगवान श्री कृष्ण बलराम और समस्त यादव सेना ने द्वारका की ओर अपनी
00:30भव्य यात्रा का श्री ग्नेश किया।
00:32पथ पर चलते हुए यादव सेना ने हरे भरे खेतों, घने वनों और शांत नदियों को पार किया। प्रत्येक द्रिश्य
00:41प्रकृती की असीन सुन्दर्ता का प्रतीक था।
00:45द्वारका नगरी में भगवान श्री कृष्ण की वापसी की खबर सुनकर नागरिक उच्सुकता से सडको पर उमड पड़े, हर हृदय
00:53में अपने प्रिय राजा के दर्शन की अभिलाशा थी।
00:57भगवान के बिनाभी द्वारका की स्वर्ननगरी अपनी अनुपम आभा और स्थापत के कला से दैविय सौन्दर्य का प्रतीक बनी हुई
01:05थी। मानो स्वयन देवताओं ने इसे गढ़ा हो।
01:09अंतह यादव सेना द्वारका के विशाल स्वर्नजरित द्वारों पर पहुँची जहां सैकडो नागरिक अपने राजाओं के स्वागत में उमड़ पड़े
01:18थे।
01:39को और भी अधिक प्रकाशित कर दिया, मानो सूर्य और चंद्रमा एक साथ उदित हुए हूँ।
01:45राजसी प्रोसेशन धीरे-धीरे भव्य महल की ओर बढ़ी जिसकी स्वर्नमंदित मीनारे आकाश को छू रही थी और द्वार पर
01:54शाही सेवक वराज परिवार के सदस्य प्रतीक्षा कर रहे थे।
01:59महल में पहुँचकर श्री कृष्न का उनकी रानियों से हृद्यस परशी पुनर मिलन हुआ, जहां प्रेम और आनंद के आसुओं
02:07ने कुरुक्षेत्र की स्मृतियों को धो दिया।
02:10उधर परम ज्यान प्राप्त कर चुके वसुदेव और देव की अपने कक्ष में बैठे, शांत चित और दिव्य प्रकाश से
02:18युक्त थे, उनके चहरों पर गहन शान्ती की आभा थी।
02:22अपने शाही कक्ष में बैठे, भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र की गहन शिक्षाओं और ब्रह्मांडिय रहसियों पर चिंतन किया, जिनके वे
02:31स्वयन सूत्रधार थे।
02:34परम ज्ञान से प्रकाशित वसुदेव के हृदय में अब एक गहन इच्छा जागरित हुई, पित्रों के प्रती अपना रिंचुकाने और
02:42धर्म की स्थापना हेतु एक महायग्य करने की।
02:46इस पुनीत विचार को उन्होंने अपनी सहधर्मिनी देवकी के साथ साजा किया, जिन्होंने भी परम सत्य को आत्म साथ कर
02:54लिया था, और उनकी आखों में समान संकल्प देखा।
02:58गेहन विचार विमर्ष के पश्चात वसुदेव ने पित्री रिंचुकाने और समस्त लोक के कल्यान हेतु एक भव्य अश्वमेध महायग्य करने
03:08का द्रेढ निश्चय किया।
03:10इस विशाल कार्य के लिए वसुदेव ने ततकाल परम ज्यानी रिशियों और ब्रहम ज्यानी ब्राहमनों को परामर्श हेतु आमंत्रित किया,
03:19ताकि अनुष्ठान विधिपूर्वक संपन्न हो सके।
03:22रिशियों के मार्ग दर्शन में महायग्य की विस्तरित योजना आकार लेने लगी, जिसमें वेदियों के निर्मान, सामगरी संग्रहें और आमंत्रणों
03:32के प्रारूप पर चर्चा की गई।
03:34द्वारका नगरी में भव्य महायग्य की प्रारंभिक तैयारिया शुरू हो गई। शिल्पकार वेदियों के लिए पत्थर तराशने लगे और सेवक
03:44यग्य सामगरी जुटाने में लग गए।
03:47वसुदेव ने अपने महायग्य के लिए सभी देवों, रिशियों और लोकपालों को पवित्र मंत्रों और विशेश दूतों द्वाराद्वारका में उपस्थित
03:56होने का दिव्य निमंत्रण भेजा।
03:58दिव्य दूतों द्वारा भेजा गया निमंत्रन जब स्वर्ग लोग पहुँचा तो देवराज इंद्र ने अत्यंत आदर के साथ उस पवित्र
04:07संदेश को स्विकार किया
04:09ब्रहम लोक में चतुर्थ मुख भगवान ब्रहमा ने वसुदेव जी के महायग्य का पावन संदेश पाते ही प्रसन्नचित्थ होकर अपनी
04:18स्विकृती प्रदान की
04:20कैलाश परवत्पर विराजमान भगवान शिव ने भी द्वारका में होने वाले इस महान धर्मोच सव का संदेश पाकर अपनी सहमती
04:29दी
04:30पवंदेव, वरुंदेव और अगनिदेव जैसे प्रमुख दिशापाल भी अपने अपने दिव्य रथों को द्वारका की ओर ले जाने की तैयारी
04:38में जुट गए
04:40सब्तर्शी महर्शी नारद और वेदव्यास सहित अनेक ब्रहमज्यानी संथ अपने पवित्र यग्यपात्र और कमंडलु लेकर यात्रा के लिए तत्पर हुए
04:50विभिन राज्यों के महान राजा और यादव सेनापती भी रत्नजडित रथों पर सवार होकर द्वारका की सीमाओं पर पहुँचने लगे
05:00वसुदेव और माता देवकी ने परम पवित्र कुशा के वस्त्रधारन करके शास्त्रिय नियमों के अनुसार महायग्य की दीक्षाली
05:09भगवान श्री कृष्ण और श्री बलराम ने स्वयन उपस्थित होकर आने वाले सभी देवों और रिशियों का द्वारका की सीमापर
05:17भाव विभोर स्वागत किया
05:20ग्वारका के उपर का आकाश दिव्य विमानों की जगम गाहट से भर गया जिससे दिन में ही हजारों सूर्यों का
05:26प्रकाश सा प्रतीत होने लगा
05:29देवराज इंद्र अन्य देवताओं के साथ धर्ती पर उत्रे और उन्होंने श्री कृष्ण तथा राजा वसुदेव के चर्णों में नमन
05:37किया
05:39भगवान द्रह्मा और भगवान शिव के आगमन से पूरी यग्यशाला में एक अलोकिक और पवित्र उर्जा का संचार हो गया
05:48वसुदेव जी ने अत्यंत नमर्ता से स्वर्ण पात्र में जल लेकर पधारे हुए सभी देवों और रिशियों के चरण धोकर
05:55उनका आतित्य किया
05:58द्वारका की विशाल यग्यशाला सैकडों, वेदियों और प्रजवलित अगनिकुंडों से सुसजित होकर अत्यंत दिव्य दिखाई दे रही थी
06:07प्रधान रित्विकों ने मुख्य यग्यकुंड के चारों और अपना स्थान ग्रहन किया और वेदमंत्रों का सुंधुर स्वर गूझने लगा
06:16वसुदेव जी ने हाथ में सुरुक और सुरुवा लेकर यग्य के मुख्य देवता भगवान श्रीहरी का ध्यान करते हुए अनुष्ठान
06:24का आरंभ किया
06:26पवित्र अर्निकाष्ट के घर्षन से जैसे ही प्रथम अगनी प्रकट हुई संपून वातावर्ण में एक अध्भुत उर्जाचा गई
06:35प्रज्वलित होती हुई यग्य अगनी की मुची लप्टों ने देव की और वसुदेव के मुख मंडल को एक दिवय कांती
06:42से दीप्त कर दिया
06:44मंत्रों के तीवर घोश के साथ जब शुद्ध घृत और सोम्रस की आहुतिया दी गई तो अगनी देव ने उन्हें
06:51सहर्ष स्वीकार किया
06:52द्वारका का संपूर्ण वायुमंडल वैदिक रिचाओं की ध्वनी से गुंजायमान हो उठा जिससे वसुदेव के पूर्वजन्मों के रिन समाप्थ होने
07:02लगे
07:03यग्य की परमशुद्धी का अनुभव करते हुए वसुदेव जी ने अश्रुपूरित नेत्रों से अपने पुत्र श्रीकृष्ण की ओर भक्तिभाव से
07:12देखा
07:13पिता वसुदेव के अगाध भक्तिभाव को देखकर भगवान श्री कृष्ण और श्री बलराम ने अत्यंत प्रेम से उन्हें गले लगाया
07:21और उनके इस धर्म कार्यारंभ पर अपनी पूर्ण सहमती प्रदान की
07:27ततपश्चात भगवान श्री कृष्ण ने द्वारका के निश्थावान दूतों को भारतवर्ष के प्रतेक प्रांत और तपोवन में आमंत्रित करने की
07:35आग्या दी
07:37श्री कृष्ण की आग्या पाते ही सोने और चान्दी के रथों पर सवार दूट द्वारका के विशाल स्वर्ण द्वारों से
07:44निकल कर चारों दिशाओं में तीवर गती से प्रस्थान करने लगे
07:49घने जंगलों और दुर्गम परवतों की शांत तपो भूमी में पहुँचकर दूटों ने महान रिशिमुनियों को स्वर्ण पत्र पर उकेरे
07:57गए निमंतरन सहर्ष भेंट किये
08:00महर्षी व्यास, वशिष्ट, विश्वामित्र और अगस्त्य जैसे परम ज्यानी रिशियों ने वसुदेव के इस धर्मयज्य के समाचार को पाकर इसे
08:09सहर्ष स्विकार किया
08:11उधर देवर्षी नारद ने अपनी वीना की मधुर जंकार के साथ समस्त देवलोक और रिशियों के मध्य इस भव्य महायग्य
08:20की महिमा का गान किया
08:22आर्यावर्थ के कोने-कोने से धार्मिक राजाओं और मुकुट धारी नरेशों ने बहुमूल्य उपहारों और रत्नों के साथ द्वारका की
08:30ओर अपनी यात्रा आरंभ की
08:33देखते ही देखते, समुद्र की उत्तुम तरंगों के बीच बसी स्वर्ण पुरी द्वारका की ओर मुनियों, विद्वानों और राजाओं की
08:41विशाल पंक्तिया बहने लगी
08:44द्वारका नगरी के प्रवेश द्वारों को तोर्णों और सुगंधित पुष्पमालाओं से सजाया गया, जहां सभी अतिथी विद्वानों का धोलनगाडों और
08:53पुष्पवर्शा से भव्य स्वागत हुआ
08:56यग्य के आयोजन हेतु द्वारका में विशाल और भव्य यग्यशालाओं का निर्मान किया गया, जो स्वर्नस तंभो और दिव्य शिल्पकला
09:05से सुशोभित थी
09:07भगवान श्री बल्राम जी ने स्वया आगे बढ़कर पधारे हुए महर्शियों के चरण धोकर उन्हें सम्मान पूर्वक आसनों पर विराजमान
09:16कराया
09:17भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्शी व्यास और अन्य गुरुजनों के चरणों में नत्मस्तक होकर अपनी अनन्य गुरु भक्ती और
09:25विनीट स्वभाव का अनुपम उदाहरन प्रस्तुत किया
09:29देखते ही देखते सैक्रो हवन कुन प्रजवलित हो उठे और उनसे उठने वाले सुगंधित धुए से संपूर्ण द्वार्का का आकाश
09:37आच्छादित हो गया
09:40सहसरों वेदान्तियों के एकस्वर में सामवेद और रिगवेद की रिचाओं का पाठ करने से द्वार्का का कोना-कोना अलौकिक स्पंदन
09:48से भर उठा
09:49इस अलौकिक द्रिश्य से प्रसन्न होकर स्वर्गलोक के देवगण और गंधर्व बागलों की ओट से मंदार और पारिजात के पुश्पों
09:58की निरंतर वर्शा करने लगे
10:01विविध मंदपो में आत्म ज्यान, ब्रहमा सत्य और परम मोक्ष पर गंभीर तत्वचर चाय आरंभ हुई जिससे द्वार का आध्यात्मिक
10:10ज्यान का सागर बन गई
10:12इस विशाल ज्यान संगम को देख कर राजा वसुदेव और माता देवकी के नेत्रों से परम त्रिप्ती और आनंद के
10:19अशुरुच हलक पड़े
10:22जाती और पद के भेज से परे राजा, रंक, रिशी और सामान्य नागरिक एक साथ बैठ कर शुद्ध महाप्रसाद ग्रहें
10:30करने लगे
10:31इस प्रकार द्वार का नगरी केवल वैभव की नहीं, बलकी भक्ती, ज्यान और यग्यकर्म के त्रिवेनी संगम की प्रत्यक्ष प्रतीक
10:40बन गई
10:42संध्या के समय, समुद्र तट पर उठती लहरों के साथ, गूंजते शंकनाद और वेद मंत्रों ने इस संपूर्ण वातावर्ण को
10:49मुक्षदाई और परम पवित्र बना दिया
10:53प्रतयकाल के स्वर्णिम सूर्य की प्रथम किर्णे जैसे ही द्वारका के विशाल यग्यमंड पर पड़ी, अग्निहोत्र के मंत्रों के साथ
11:01वसुदेव के महायग्य का विधिवत आरंध हुआ, जिसने पूरे वातावर्ण को दिव्यता से भर दिया
11:09देवर्शी नारद, महर्शी व्यास, असित, देवल और अन्य ब्रहमग्यानी रिशियों के साननिध्य में यग्यकी प्रतेक प्रक्रिया, अत्यंत, शुद्धता और वैदिक
11:18विधिविधान के साथ संपन्न हो रही थी, जिससे ब्रहमांड में एक पवित्र कंपन उत्पन ह
11:53हो रहा था.
11:58बलराम, सात्यकी और समस्त यादव कुल के प्रमुक सदस्य भी श्रधापूर्वक उपस्थित थे, जो अपने राजा और परिवार के इस
12:06महान संकल्प के साक्षी बन रहे थे.
12:10दूर दूर से आये अनेक राजा, राज कुमार और उनके प्रतिनिधी भी अपनी अपनी निर्धारित आसनों पर बैठकर इस अद्वितिय
12:18धार्मिक अनुष्थान की भव्यता पर विस्मय पूर्ण द्रिष्टी से निहार रहे थे.
12:24केवल राजा ही नहीं, अपितु द्वारका के सामान्य नागरिक, व्यापारी और भक्त जन्भी, श्रध्धा और भक्ती से उतप्रोथ होकर दूर
12:33से ही यग्य की पवित्र उर्जा को अनुभव कर रहे थे.
12:37यग्य के मंत्रों की ध्वनी, जैसे जैसे बढ़ती गई, वैसे वैसे वातावर्ण में एक गेहन आध्यात्मिक तरंगे उठने लगी, जिससे
12:46पूरा शेत्र एक दिव्य उर्जा से आबरित्थ हो गया.
12:51शुद्धगी की धाराये, सुगंधित समिधाये और अन्य पवित्र आउश्धियों की आहुतिया निरंतर अगनी में समर्पित की जा रही थी, जिससे
13:00यग्य कुंड से उठती दिव्य सुगंध दूर दूर तक फैल रही थी.
13:04यग्य की शक्ती से प्रेरित होकर, प्रकृती भी अपनी प्रसंता व्यक्त कर रही थी, मंदमंद पवन बह रही थी, और
13:12आकाश में श्वेत बादलों के मनोहर आकृती बन रही थी.
13:17जैसे जैसे यग्य अपने मध्य चरण में पहुँचा, देवर्शी नारग ने अपनी दिव्य दृष्टी से अनुभव किया कि ब्रहमांड के
13:25विभिन लोकों से अदृष्य शक्तिया द्वारका की ओर अग्रसर हो रही हैं.
13:31तक पश्चात यग्य मंडप में एक अदृष्य शीतल सुगंध का संचार हुआ, जैसे किसी उच्च लोक से पवित्र पवन का
13:39जोंका आया हो, जिसने सभी उपस्थित जनों को एक अलौकिक अनुभव प्रदान किया.
13:46ब्रहमा जी अपने सत्यलोक में स्थित होकर द्वारका में चल रहे इस दिव्य महायग्य की महिमा को अपनी सुक्ष्म द्रिष्टी
13:53से देख रहे थे, और उनके मुख पर एक शांत मुस्कान थी.
13:58उसी क्षण वैकुंठ में योगनिद्रा में लीन भगवान विश्णू ने अपनी पलके खोली, और उनकी अनंत आखों ने द्वारका के
14:07यग्यकी और अपनी कृपा द्रिष्टी डाली, जिससे स्रिष्टी में एक नई उर्जा का संचार हुआ.
14:14आकाश मार्क से दिव्य संगीत की मधुर ध्वनिया गूंजने लगी और स्वर्ग से पुष्पवरिष्टी होने लगी, जो गंधर्वों, अपसराओं और
14:23विद्याधरों के आगमन का संकेत था.
14:27देवराज इंद्र अपने श्वेत एरावत हाथी पर विराज मान होकर, अपनी अपसराओं और गणों के साथ भव्यता के साथ द्वारका
14:35के यग्यमंडप की ओर अग्रसर हुए, उनका आगमन संपूर्ण वातावर्ण को प्रकाशित कर रहा था.
14:43तत्पश्चात, स्रिष्टी के रचिता, चतुर्मुखी भगवान ब्रह्मा अपने दिव्यहंस पर आरूढ होकर यग्यस्थल पर अवत्रित हुए, जिनके तेज से दिगदिगंट
14:53आलोकित हो उठा.
14:55यम्राज अपने महिश पर, वायुदेव अपने मृग पर, अग्निदेव अपने मेश पर और वरुंदेव अपने मकर पर सवार होकर अपने
15:04अपने लोकों से यग्य में उपस्थित हुए, जिससे स्वर्ग और प्रित्वी का भेड मिट गया.
15:10देवाधि देवों और समस्थ लोकपालों का ऐसा अद्भुत समागम देखकर, वसुदेव के नेत्रों से आनंद के अश्रुबह निकले, उनका हृदय
15:19कृतग्यता और परमानंद से भर उठा.
15:23इस प्रकार, द्वार का नगरी एक दिव्यतीर्थ में परिवर्तित हो गई, जहां देवताओं, रिशियों, राजाओं और भक्तों का ऐसा अनूठा
15:32संगम हुआ, जिसने इस महायग्य को ब्रहमांडिय आयाम प्रदान किया.
15:37अद्भुत यज्य की दिव्य सुगंध से परिपूर्ण वायू में अब गेहन शांती व्याप्त थी, जहां सभी उपस्थित गणमान्यजन देवताओं की
15:46उपस्थिती से अभिभूत होकर, परम ज्यान की पिपासा शांत करने के लिए उच्सुक्ता से प्रतीक्षा कर रह
15:54तब रिशियों के समोह में से एक तेजस्वी रिशी, जिनकी आखों में ब्रहमांड का ज्यान जलक रहा था, उन्होंने अपनी
16:02करुणापूर्ण द्रिश्टी चारों और घुमाई और गंभीर स्वर में पहला प्रश्न प्रस्तुत किया
16:08रिशी ने पूछा, हे ज्यानी जनो, इस अद्भुत स्रिश्टी का मूल क्या है, यह कैसे उत्पन हुई और इसका संचालन
16:16किस शक्ती द्वारा होता है
16:19वसुदेव जो अब तक आनन्दित थे, इस गहन प्रश्न से विन्मर्ता पूर्वक अभिभूत हुए और उन्होंने अपने हाथों को जोड
16:27कर रिशियों की ओर देखा
16:30उन्होंने अपनी आवाज में नमर्ता घोलते हुए कहा, हे तपस्वी रिशियों आपके प्रश्न गहन हैं, जिनकी व्याख्या आप जैसे ज्ञानियों
16:39द्वारा ही संभव है
16:42भगवान श्रीक्रिष्न अपनी दिव्य मुस्कान के साथ सभी को ध्यान से सुन रहे थे, उनके मुखमंडल पर परमशांती और अनंत
16:51ज्ञान का आभास था
16:53उनकी उपस्थिती मात्र से ही वातावर्ण में एक अद्भुत उर्जा का संचार हो रहा था, जो सभी के मन को
17:00शांत कर रही थी और जिग्यासा को बढ़ा रही थी
17:05देवराज इंद्र भी अपने दिव्य सिंधासन पर विराज मान होकर रिशियों के प्रशनों में गहरी रुची दिखा रहे थे, क्योंकि
17:13वे जानते थे कि ये चर्चाए ब्रहमांडिय रहस्यों को उजागर करेंगी
17:18अन्य लोकपाल और देवतागन भी अपने अपने स्थानों पर शांत मुद्रा में बैठे थे, प्रत्येक शब्द और विचार को आत्म
17:26साथ करने का प्रयास कर रहे थे
17:29एक अन्य रिशी ने माया के गूढ रहस्य पर प्रकाश डालने का अनुरोध किया, कि कैसे यह ब्रहमांड को मोहित
17:37करती है और जीव को सक्य से दूर रखती है
17:41उनके प्रश्ण ने सभागार में एक हलचल पैदा कर दी, क्योंकि माया का सिध्धान्त सबसे जटिल और समझने में कठिन
17:49विश्यो में से एक था
17:51इसके बाद आत्मा पर मात्मा के अविनाशी संबंध पर प्रश्ण उठा कि कैसे जीव आत्मा पर मात्मा का ही अंश
17:59है और उससे विलग होकर संसार में भटकती है
18:04मुक्त आत्मा का स्वरूप क्या है और ध्रम के बंधनों से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है यह जिग्यासा सभी
18:12के हृद्यों में गूंज उठी
18:14फिर धर्म के गूड सिध्धानतों पर चर्चा शुरू हुई जिसमें कर्म के फल, कर्तव्य की अवधारना और निश्काम कर्म के
18:22महत्व पर विस्तृत विचार विमर्ष हुआ
18:26राजागन भी इस चर्चा में सक्रिय रूप से भाग ले रहे थे, क्योंकि एक शासक के लिए धर्म और कर्तव्य
18:32का ज्यान अत्यन्त आवश्चक था
18:35मोक्ष के मार्ग पर गहन चिंतन हुआ, विभिन्न योगों भक्ती, ज्यान, कर्म और ध्यान योग के माध्यम से परम सत्य
18:43को प्राप्ट करने के तरीकों पर विचार विमर्ष किया गया
18:48मुक्ती की सच्ची प्रकृती क्या है, और यह भौतिक संसार के बंधनों से कैसे भिन्न है, इस प्रश्ण ने सभी
18:55की आध्यात्मिक आकांक्षाओं को उत्तेजित कर दिया
18:58फिर वसुदेव अपने हृदय में पित्री रिन और स्वयं के मोक्ष की प्रबल इच्छा लिये हुए बड़े विनमर्ता पूर्वक भगवान
19:07श्रीकृष्ण की ओर मुखातिब हुए
19:10उनकी आखों में श्रद्धा और आशा दोनों थी, जैसे वे अपने पुत्र में ही समस्थ ज्ञान और मोक्ष का स्रोत
19:17देख रहे हुँ
19:19समस्थ सभा की आखें अब भगवान श्रीकृष्ण पर टिक गई थी, जो अपनी दिव्या आभा से मंदित होकर अब इस
19:27परम ज्ञान को प्रकट करने के लिए उद्यक थे
19:31तब भगवान श्रीकृष्ण जिन्होंने अपनी लीला से समस्थ ब्रहमांड को मोहित कर रखा था, वसुदेव के हृदैगत भावों को समझते
19:39हुए, अपनी दिव्या मंद मुस्कान के साथ अपने परम प्रियभक्त और मंत्री उद्धव की ओर संकेत किया, जो विनमर्त
19:50श्रीकृष्ण ने उद्धव को संबोधित करते हुए कहा, कि मोक्ष और परम ज्यान का मार्ग भले ही कठिन प्रतीत होता
19:57हो, परन्तु उनके प्रियभक्त उद्धव में वह सामर्थ्य है, कि वे इसे सरल और सुगम बनाकर सभी के समक्ष प्रस्तुत
20:05कर सकें।
20:07भगवान के इस आदेश को शिरोधार्य करते हुए, परम ज्यानी उद्धव ने विनमर्ता पूर्वक्षीश जुकाया और अपनी वानी को भगवान
20:16की महिमा और उनके भक्ती योग के गूर सिध्धानतों की ओर उन्मुख किया।
20:21उद्धव ने अपनी मधुर और ज्यानपूर्ण वानी में कहा कि संसार के सभी जीव त्रिगुनात्मक माया के वशीभूत होकर अज्यानता
20:30और मोह के अंधकार में भटकते रहते हैं, स्वयं को शरीर मान कर भौतिक सुखों के पीछे भागते हैं।
20:38उन्होंने समझाया कि सच्चा ज्यान वह है, जिससे व्यक्ति अपने आत्मस्वरूप को पहचानता है। यह समझता है कि वह शरीर
20:47नहीं, बलकि शाश्वत आत्मा है जो परमात्मा का ही अंश है।
20:53उद्धव ने आगे कहा कि इस आत्म ज्यान की प्राप्ती के लिए विभिन मार्ग सुझाये गए हैं। जैसे कर्म योग,
21:00ज्यान योग और ध्यान योग परंतु इन सभी में एक उच्चतर और सरल मार्ग भी विद्यमान है।
21:08उन्होंने जोर दिया कि वह सर्वोच मार्ग जो सभी बंधनों को तोड़ता है और सीधे परमात्मा से जोड़ता है, भक्ती
21:16योग ही है, जहां प्रेम और सेवा ही एक मात्र साधन बनते हैं।
21:22उद्धव ने विस्तार से निशकाम भक्ती के सार को समझाया, जहां भक्त बिना किसी फल की इच्छा के, केवल भगवान
21:29श्री कृष्ण को प्रसंद करने के उद्देश्य से सभी कर्म समर्पित करता है।
21:35उन्होंने कहा कि निशकाम भक्ती में भक्त अपना मैं और मेरा भाव त्याक कर स्वयन को पूरी तरह से भगवान
21:42के चर्णों में समर्पित कर देता है, जिससे अहंकार का नाश होता है।
21:48एक सच्चे भक्त के लक्षनों का वर्णन करते हुए उद्धव ने बताया कि वह सभी प्राणियों में भगवान को देखता
21:56है, किसी से द्वेश नहीं करता और सदैफ प्रेम वह करुणा से परिपूर्ण रहता है।
22:03उन्होंने समझाया कि भक्ती मन को पवित्र करती है, इंद्रियों को नियंत्रित करती है और सांसारिक इच्छाओं के जाल से
22:11निकाल कर आत्मा को परमाक्मा से जोडती है।
22:15उद्धव ने भक्ती के नौ प्रकारों का भी वर्णन किया, जैसे श्रवनम, सुनना, कीर्टनम, गाना, स्मर्णम, याद करना, पादसेवन, सेवा
22:24करना, इत्यादी, जिनसे कोई भी सरलता से भगवान के करीब आ सकता है।
22:31उन्होंने विशेश रूप से भगवान श्री कृष्ण का निरंतर स्मरण करने के महत्व पर बल दिया, क्योंकि उनके दिव्यनाम, रूप,
22:38गुन और लीलाओं का चिंतन ही समस्थ पापों का नाश करता है।
22:44उद्धव ने ज्ञान योग की कठिनाईयों और कर्म योग के जटिलताओं की तुलना में भक्ती योग की सरलता और सहचता
22:51को रेखांकित किया, जो किसी भी वर्ण, आश्रम या लिंके व्यक्ति द्वारा अपनाया जा सकता है।
22:59उन्होंने समझाया कि भक्ती योग वास्तव में सभी अन्य योगों को समाहित कर लेता है, और उन्हें एक उच्चतर अधिक
23:07सार्थक उद्देश प्रदान करता है, जिससे संपूर्ण जीवन ही भगवान की सेवा बन जाता है।
23:14जैसे जैसे उद्धव अपने उपदेश में गहरे उतरते गए, सभा में उपस्थित सभी लोगों के हृदय में अद्भुत शांती और
23:22प्रेम का संचार होने लगा, मानोवे स्वय भगवान की उपस्थिती का अनुभव कर रहे हूं।
23:29वसुदेव और देवकी की आखों में अब मोक्ष की तीवर इच्छा के स्थान पर श्री कृष्ण के प्रती अन्मोल प्रेम
23:36और अगाद श्रधा की नई चमक थी, उनके चहरों पर एक अलोकिक संतोष पष्ट दिखाई दे रहा था।
23:44स्वयं देवगण और रिशिगण जो इस अग्भुत उपदेश को सुनने के लिए उपस्थित थे, अपने अपने आसनों पर शांत और
23:52स्तब्ध बैठे थे, उनके हृदय में भी भक्ती की अमरित्थारा प्रवाहित हो रही थी।
23:58उद्धव ने अपने उपदेश का समापन करते हुए घोशनाकी की भगवान श्री कृष्ण ही समस्त लोकों के परम आश्रय हैं
24:06और उनकी निष्ठा पूर्वक की गई भक्ती ही भवसागर से पार पाने का एक मात्र नौका है।
24:13उनके उपदेश से द्वारका की वह पवित्र सभादिव्य प्रेम और शान्ती से भर गई जहां प्रत्येक हृदय में भगवान श्री
24:21कृष्ण के प्रती अनन्य भक्ती का बीज रोपित हो चुका था।
24:26उद्धव के उपदेश के समाप्त होते ही ब्रहमर्शी नारद अपनी वीना संभाल कर जन समुह के मध्य खड़े हुए और
24:33श्री कृष्ण की अनन्त महिमा का गान प्रारंब किया।
24:38नारद जी ने अपनी वीना की मधूर जनकार के साथ यह उद्धोष किया कि भगवान श्री कृष्ण ही समस्त स्रिष्टी
24:45के मूल कारण सर्वव्यापी परब्रहम और काल के भी परम नियनता है।
24:51इस अलोकिक स्तुती को सुनकर चार मुखों वाले स्रिष्टिर चैता भगवान ब्रहमा अपने हनसासन से उठे और श्री कृष्ण के
24:59चर्णों में श्रधावन्त हो गए।
25:02ब्रहमा जी ने गदगद कंट से स्वीकार किया कि वेस्वयन और संपूर्ण देवगन श्री कृष्ण की योगमाया के एक छोटे
25:10से अंश को भी पूर्णत ह समझने में असमर्थ हैं।
25:15ततपश्चात भगवान शिव ने अपनी समाधि में द्रिष्टी खोलते हुए मंद मुस्कान के साथ कहा कि श्री कृष्ण ही समस्त
25:23सांसारिक बंधनों से मुक्ती प्रदान करने वाले परम्तत्व हैं।
25:28महादेव ने श्री कृष्ण के विभिन धर्मरक्षक रूपों का समरण करते हुए धर्म की पुनरस्थापना के लिए उनकी अग्भुत लीलाओं
25:36की मुक्तकंट से सराहना की।
25:39देवराज इंद्र ने अपने अतीत के अहंकार का समरण करते हुए अत्यंत विनमर्ता से हाथ जोडे और श्री कृष्ण को
25:47परम करुणामय रक्षक के रूप में नमन किया।
25:51महर्शी वेदव्यास ने रिगवेद और उपनिश्दों के महामंत्रों का सुरीला उच्चारन करते हुए घोषणाकी की समस्त ग्यान का अंतिम धे
25:59केवल श्री कृष्ण का ही आश्रय है।
26:03कुलगुरु गरगाचार्य ने प्रभु की बालेकाल की असीन सामर्थे को याद दिलाया जब उन्होंने माता यशोदा को अपने छोटे से
26:11मुख में संपून ब्रह्मांड के दर्शन कराये थे।
26:15महर्शी विश्वामित्र और अंगिराने भगवान के मत्स्य, कूर्म, वराह और निसिन्ह अवतारों की पावन गाथा गाकर उनके सार्वभौमिक रक्षक स्वरूप
26:25की वंदना की।
26:26रिशियों की इस भावपूर्ण स्तुती के साथ ही, आकाश से कल्पवरिक्ष के अलौकिक सुगंधित पारिजात पुष्पों की अनवरत वर्षा द्वारका
26:35की सभापर होने लगी।
26:38अगनी वरुनक वायू, सूर्य और चंद्रदेव ने सामुहिक रूप से जुक कर स्विकार किया कि उनकी समस्थ शक्तिया भगवान श्री
26:46कृष्ण की ही इच्छा से प्रवाहित होती हैं।
26:50पिता वसुदेव और माता देवकी की आखों से आनंद के अश्रु बह रहे थे जब उन्होंने अपने पुत्र को संपूर्ण
26:58ब्रहमांड के स्वामियों द्वारा पूजत होते देखा।
27:01व्रिध महाराजा उग्रसेन और यादव वंश के वीर योध्धा अपने स्वामी श्री कृष्ण की इस असीम सार्वभामिक महिमा को देखकर
27:11गर्व और भक्ती से सराबोर हो गए।
27:13श्री कृष्ण के ठीक पार्श्व में विराजमान शेशनाग अवतार श्री बलराम जी का कंचन जैसा श्वेट स्वरूप इस सामुहिक जैजैकार
27:23से अत्यंत हर्शित दिखाई दे रहा था।
27:25अपने रत्नजडित सिनहासन पर विराजमान स्वय भगवान श्री कृष्ण अपनी मनमोहक मुस्कुराती द्रिष्टियों से समस्त भक्तों की श्रधा को अंगीकार
27:35कर रहे थे।
27:36गंधर्वों के मधुर वीनावादन और अपसराओं की घुंधर्वों की जंकार से पूरा यग्यप्रांगन साक्षात वैकुंठ लोग के समान प्रतीत होने
27:46लगा।
27:47यग्यवेदी में प्रजवलित पवित्र अगनी से उठती सुवर्ण लप्ते आकाश को छू रही थी, मानो साक्षात अग्निदेव भी इस स्तुती
27:56में निरित्य कर रहे हो।
27:59द्वारका के हर कोने में केवल भक्ती, प्रेम और आनंद की तरंगे प्रवाहित हो रही थी, जिससे समस्त प्राणियों का
28:06मन सांसारिक मोह से मुक्त हो गया।
28:09अंत्य देवों और रिशियों की यह महान स्तुती इस उद्गोश के साथ पूर्ण हुई की श्री कृष्ण ही शाश्वत सत्य,
28:17मोक्ष के एक मात्रदाता और जगत के परम नियनता हैं।
28:22स्तुती के पूर्ण होते ही, वसुदेव ने अपनी आखें खोली और उनके हृदय में भगवान श्री कृष्ण के प्रती अगात
28:30श्रद्धा और कृतग्यता का जवार उमड़ पड़ा, जिसने उनके रोमरोम को पुलकित कर दिया।
28:36उसी क्षण भगवान श्री कृष्ण ने अपने पिता वसुदेव की ओर देखा, उनकी द्रिष्टी में एक अनंत प्रेम, करुणा और
28:44दिव्य ज्ञान की आभा थी, जो सीधे वसुदेव की आत्मा को स्पर्ष कर गई।
28:50श्री कृष्ण के उस दिव्यक टाक्ष से एक सुनहरी ब्रहमांडिय उर्जा की किरण वसुदेव के हरिदय में समा गई, जिसने
28:58उनके अंतरंग में एक अभूत पूर्व प्रकाश और स्पंदन उत्पन कर दिया।
29:04उस दैवी उर्जा के प्रवेश से वसुदेव ने अनुभव किया कि उनका मन और इंद्रिया शान्थ हो रही हैं, जैसे
29:12किसी गहरे सरोवर का जल स्थिर हो जाता है और एक नई चेतना जागरित हो रही है।
29:19धीरे धीरे उनके नेत्रों के समक्ष संसार का मोहमाया का परदा हटने लगा, और वे अपने ही पुत्र श्री कृष्ण
29:26को एक साधारन बालत नहीं, अपितु अखिल ब्रहमांड के परम नियंता के रूप में देखने लगे।
29:33उनके स्मृती पटल पर अपने पूर्व जन्मों की तपस्या और भगवान नारायन की प्राप्ती के लिए किये गए कठोर प्रयासों
29:41के विहंगम द्रिश चल्चित्र की भांती उभरने लगे, हर तपस्या का अर्थ अब स्पष्ठ हो रहा था।
29:48यह बोध होते ही कि समस्थ जगत केवल माया का एक ध्रम है और एक मात्र सत्यतो स्वयन श्रीकृष नहीं
29:56है, वसुदेव के समस्थ सांसारिक बंधनों का ततकाल ही नाश हो गया।
30:02उनके मन में अब कोई कामना नहीं थी, कोई भय नहीं था, केवल एक असीम शांती और पर्मानंद की अनुभूती
30:10थी, जो उन्हें पूर्ण मोक्ष की ओर ले जा रही थी।
30:14इस गहन आध्यात्मिक अनुभव से उनकी आत्मा निर्मल हो गई, और वे अपने ही पुत्र में समस्थ स्रिष्टी के आदी,
30:22मध्य और अंत को सपष्ट रूप से देखने में सक्षम हो गए।
30:27प्रेमा श्रू उनकी आखों से अविरल बह निकले, ये अश्रू केवल आनंद और कृतग्यता के थे, उस परम्पिता के प्रती
30:35जिसने उन्हें इस जन्मुमृत्यू के चक्र से मुक्त कर दिया था।
30:39वसुदेव के साथ ही, उनकी धर्मपत्नी देव की भी, अपने पती के इस अलौकिक अनुभव की साक्षी बनकर दिव्य ज्यान
30:47के स्पर्ष से अभिभूत हो गई, उनके मुख पर भी वही शान्ती और संतोष जलक रहा था।
30:54द्वारका के यग्यस्थल पर उपस्थित समस्थ देवगण, रिशिमुनी और श्रेश्थजन वसुदेव और देवकी के इस मुक्षलाब को देखकर, उनके प्रती
31:04मौन श्रद्धा और सम्मान से नत्मस्तक हो गए।
31:08अत्यंत गेहन शान्ती के साथ वसुदेव ने यग्य के अंतिम अनुष्थानों को पूर्ण किया, प्रत्येक आहुती अब केवल लकडी और
31:16घी नहीं, अपितु उनके विरक्त हरिदय की परम समर्पन भावना थी।
31:22यग्यवेदी से उठती पवित्र अग्नी की लप्टें अब और भी तीवर और शुद्ध हो गई थी। मानोस्वय अग्निदेव भी वसुदेव
31:30की परम निष्था और ज्यान की प्राप्ती का अनुमोधन कर रहे हूं।
31:35जैसे ही अंतिम आहुती दी गई, एक दिव्य सुगंध संपूर्ण द्वारका में फैल गई, जिससे समस्त वातावर्ण पवित्र और सकारात्मक
31:44उर्जा से भर उठा।
31:47वसुदेव के अंतरंग में अब एक ऐसी शान्ती स्थापित हो गई थी, जो न तो किसी उपलब्धी से आती है
31:53और नहीं किसी हानी से जाती है, यह तो केवल परम तत्व के साक्षातकार से प्राप्त होने वाली अक्षय शान्ती
32:01थी।
32:02वे अब पूरी तरह से सांसारिक मुहमाया के चक्र से मुक्त थे, पुत्रत पत्नी, धन और यश के बंधन उनके
32:10लिए अर्थहीन हो चुके थे, उनकी आत्मा परम ब्रह्मा में लीन हो चुकी थी।
32:16भगवान श्री कृष्ण ने अपने प्रिय पिता की ओर एक और बार देखा, उनके मुख पर एक दिव्य संतोष भरा
32:23मुस्कान थी, जैसे वे कह रहे हूं, पिता श्री, आपकी तपस्या अब पूर्ण हुई।
32:30यग्य की समाप्ती और वसुदेव को परम ज्यान की प्राप्ती के उपरांत, उपस्थित सभी देवगण, रिशिमुनी और अन्य श्रिष्ठजन भगवान
32:39श्री कृष्ण की जैजैकार करते हुए अपने अपने लोकों को प्रस्थान करने लगे।
32:44अब वसुदेव और देवकी के लिए संसार केवल एक मंच था जहां वे अपने दिव्य जीवन को परम ज्यान की
32:52जोती से आलोकित करते हुए, मोक्ष की अनंत अवस्था में जीवन यापन कर रहे थे।
32:58वसुदेव और देवकी के मुखमंडल पर अब केवल शाश्वत शान्ती और असीम आनंद का प्रकाश था, मानो उन्होंने ब्रहमांड के
33:07सभी रहसियों को स्वय में समाहित कर लिया हो।
33:10उनकी अलोकिक आभा से प्रभावित होकर, यग्य में उपस्थित सभी रिशिमुनी, ब्राहमन और राजागन उनके दिव्य स्वरूप को नमन करते
33:19हुए श्रधावंत खड़े थे।
33:22अब विदाई की बेला थी और वसुदेव अपने पुत्र भगवान श्रीकृष्ण के साथ समस्थ अतिथियों को सम्मान पूर्वक विदा करने
33:31की तैयारी में जुट गए।
33:33सर्वप्रथम अनेक श्रिष्ट ब्राहमन अपने शिश्यों सहित वसुदेव और भगवान श्रीकृष्ण के समीप आये उनके मुखमंडल पर कृतग्यता और विनय
33:43का भाव था।
33:45वसुदेव ने उन सभी ब्राहमनों का हृदय से अभिनंदन किया और उन्हें बहुमूल्य रत्न, स्वन, मुद्राय और उत्तम वस्त्र भेंट
33:53किये अपनी गहन कृतग्यता व्यक्त करते हुए।
33:58फिर भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं एक एक ब्राहमन को दिव्यस पर्ष और आशिर्वाद प्रदान किया, जिससे उनके हृदय आनंद
34:06और ज्यान से भर गए।
34:08अप्रिमित प्रसनता और परम ज्यान के आशिर्वाद से उत्प्रोथ होकर वे सभी ब्राहमन वसुदेव और श्री कृष्ण को प्रणाम कर
34:16अपने अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर गए।
34:21ततपश्चात दूर दूर से पधारे अनेक पराक्रमी राजा और उनके राजकुमार वसुदेव तथा भगवान श्री कृष्ण के समक्ष अपनी श्रधा
34:30अर्पित करने हेतु आगे बढ़े।
34:32श्री कृष्ण ने सभी राजाओं को धर्म, नीती और प्रजापालन के गूड सिध्धान्त समझाए, उनके राजधर्म को पुनह जागरित करते
34:41हुए।
34:43वसुदेव ने तब उन सभी राजाओं और राज कुमारों को उत्तम अश्व हाथी और स्वर्नर्जत के आभूशन प्रदान किये, उनकी
34:51निष्ठा का सम्मान करते हुए।
34:54कृतग्यता और विस्मय से भरे हुए, वे सभी राजागन वसुदेव और श्री कृष्ण को प्रणाम कर अपनी प्रजा का कल्यान
35:02करने के संकल्प के साथ अपने अपने राज्यों को लोट गए।
35:06यग्य की सफलता से पूरी द्वार का नगरी दिव्य उर्जा से स्पंदित हो रही थी, प्रतेक घर में उत्सव और
35:14आनंद का वातावर्ड था।
35:16समस्थ कर्तव्यों की पूर्ती के उपरांट वसुदेव और देवकी ने एक दूसरे की ओर देखा, उनकी आखों में असीम शांती
35:24और एक दूसरे के प्रती अटूत प्रेन जलक रहा था।
35:29भगवान श्रीकृष्ण अपने प्रिय मातापिता को इस परम आनंद की अवस्था में देख कर एक दिव्य मुस्कान के साथ संतुष्ट
35:37भाव से उन्हें निहार रहे थे।
35:40द्वारका के नागरिक अपनी गलियों में निरित्य करते, गीत गाते और पकवानों का आदान प्रदान करते हुए इस अविस्मनिय महायग्य
35:49की सफलता का जश्न मना रहे थे।
35:51अंत में कुछ विशेश रिशी और महत्वपूर्ण संत जिनोंने यग्य में सक्रिय भूमि का निभाई थी, वसुदेव और श्रीकृष्न से
36:01व्यक्तिगत रूप से विदालेने आये।
36:04भगवान श्री कृष्ण ने प्रत्येक रिशी को व्यक्तिगत रूप से आशिर्वाद दिया, कुछ को प्रेम पूर्वक गले लगाया और उन्हें
36:12जीवन के अंतिम सत्य का स्मरण कराया।
36:15वसुदेव ने सभी उपस्थित गण्मान्य व्यक्तियों, सेवकों और द्वार का वासियों को यग्य की सफलता में उनके योगदान के लिए
36:23हार्दिक धन्यवाद दिया।
36:45और एक नए दिव्य अध्याय का आरंभ नहित था।
36:50मौन की उस गहनता में जहां युगों की तपस्या फलित हुई थी, वसुदेव और देवकी के हृदय में श्रीकृष्ण की
36:57एहतु की क्रिपासे परमशान्ती और संतोष का उदे हुआ।
37:02भगवान श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता के हृदय की उस पवित्र भावना को समझा और उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी
37:10समस्थ आध्यात्मिक यात्रा अब पूर्णता को प्राप्थ हो चुकी है।
37:15अपने पुत्र के दिव्यस्पर्ष और ज्यान से अभिभूत, वसुदेव और देवकी ने अनुभव किया कि वे अब सभी सांसारिक बंधनों
37:24और पित्री रिनों से मुक्थ होकर परमधाम की ओर अग्रसर हैं।
37:29द्वारका में भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अद्भुत लीलाओं को जारी रखते हुए, अपने भक्तों के कल्यान और धर्म की
37:37स्थापना के लिए निरंतर कार्य किये।
37:40उनकी दिव्य उपस्थिती से द्वारका नगरी सदैव आनन्दित और आलोकित रहती थी, मानो प्रत्येक कन उनकी परम उर्जा से स्पंदित
37:49हो रहा हो।
37:51इसी बीच, तीनों लोकों में विचर्ण करने वाले देवर्शी नारद दिव्य संकेतों को अनुभव करते हुए, एक महत्वपून आध्याक्मिक घटना
38:00की आहट पाकर द्वारका पहुँचे।
38:03नारद मुनी ने भगवान श्री कृष्ण के समक्ष उपस्थित होकर श्रद्धा पूर्वक प्रणाम किया और द्वारका में हो रहे अलोकिक
38:11स्पंदनों के विशय में जिग्यासा व्यक्त की।
38:14श्री कृष्ण ने मंदमंद मुस्कुराते हुए नारद का स्वागत किया और उन्हें बताया कि यह दिव्य स्पंदन ब्रहमांड में होने
38:22वाली एक महान भविश्य की घटना की प्रस्तावना है।
38:27नारद ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से ब्रहमांड में एक गहरा बदलाव महसूस किया, जो किसी अग्रिश्य परंतु शक्तिशाली दिव्य योजना
38:36के आरंभ का संकेत था।
38:38यह प्रसंग वसूदेव और देवकी के पित्री रिण के अंतिम आध्यात्मिक विमोचन और उनकी मुक्ती की पूर्णता से भी जुडा
38:47था, जिसका संग्यान स्वय भगवान श्री कृष्ण को था।
38:51वसूदेव ने यद्यपी परंग्यान प्राप्त कर लिया था, फिर भी अपने वन्ष की पूर्ण आध्यात्मिक समरिध्धी के लिए एक अंतिम
39:00सुक्ष्म इच्छा मन में संजोई थी।
39:03भगवान श्री कृष्ण ने अपने पिता के हरिदय की इस अंकही इच्छा को तुरंट पहचान लिया और इसे पूरा करने
39:11का दिव्य संकल्प लिया।
39:13तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने माता पिता को समझाया कि सच्ची मुक्ती केवल व्यक्तिगत नहीं, अपितु यह समस्त वंश
39:21को परम ज्ञान से जोड़कर उपर उठाती हैं।
39:25इस दिव्य संकल्प और श्री कृष्ण की परम उर्जा से आकरशित होकर विभिन लोकों से अनेक देवगन द्वारका की ओर
39:33अद्रिश्य रूप से बढ़ने लगे।
39:56द्वारका के उपर आकाश में एक विशाल स्वर्नर्जत प्रकाश का पोर्टल खुला, जिससे दिव्य सुगंध और अमरित तुल्य वायू प्रवाहित
40:05होने लगी।
40:27इस दिव्य सभा के केंद्र में भगवान श्री कृष्ण अपनी परम मोहिनी छवी में विराजमान थे, जो ब्रहमांड के अगले
40:35महान रहस्य को प्रकट करने वाले थे।
40:37झाल वे भी हुआवान थायू
40:38झाल श्री को झाल
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