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गंगा अवतरण के बाद सूर्यवंश की गाथा जारी! 🌊 इस एपिसोड में हम जानेंगे चक्रवर्ती सम्राट कलुषपाद (जिन्हें सौदास और मित्रसह भी कहा जाता है) की हैरान कर देने वाली कहानी। कैसे एक धर्मात्मा राजा, एक ब्राह्मण के शाप के कारण एक भयानक नरभक्षी राक्षस में बदल गया? 🔥 ऋषि वशिष्ठ का क्या रहा इसमें योगदान? देखें अहंकार, शाप और मोक्ष की यह अलौकिक गाथा जो बदल देगी आपकी सोच! #BhagavataPurana #PuranicStories #HinduMythology #KingKalmashapada #Suryavansha #Vashishta #Rakshasa #Curse #Dharma #SpiritualJourney #MythologicalSeries #HindiStories #AncientIndia #Karma #SanatanDharma #EpicTales
Transcript
00:00महाराज भागेरत द्वारा गंगा को प्रित्वी पर लाने के महान और पवित्र कार्य के उपरांत, उन्होंने अपने यशस्वी पुत्र शुरुत
00:08को अयोध्या का राजपाट सौपकर वानप्रस्थ का मार्ग अपनाया।
00:13महाराज शुरुत ने सूर्यवंश की गरिमा को बनाये रखते हुए धर्म पूर्वक शासन किया और अपने सामराज्य की सीमाओं को
00:21सुरक्षित करते हुए प्रजा का पुत्रवत पालन किया।
00:25शुरुत के पश्चात उनके धर्मात्मा पुत्र नाभाग ने अयोध्या का सिंहासन संभाला, जिनके सतकर्मों और न्यायप्रियता से पूरी प्रित्वी पर
00:34सुख और शान्ती का सामराज्य स्थापित हुआ।
00:37राजा नाभाग ने न केवल प्रजा की भौतिक समरिध्धी सुनिश्चित की, बलकि उनके आध्यात्मिक कल्यान के लिए अनेक भव्ययग्यों और
00:47धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी करवाया।
00:51नाभाग के प्रतापी पुत्र सिंधुद्वीप ने जब राज्य की बागदोर संभाली, तब उनके शौर्य और पराक्रम की कीर्ती तीनों लोकों
00:59में फैलने लगी।
01:01महाराज सिंधुद्वीप ने अपने पुत्र अयुतायू को बचपन से ही शस्त्र और शास्त्र दोनों का उत्तम ज्यान प्रदान किया, जिससे
01:10वह एक आदर्ष भावी समराट बन सके।
01:12पिता के बाद अयुतायू ने सूर्यवंश की गद्धी को सुशोगित किया और अपनी कुशल युध नीतियों से शत्रों को सदैव
01:21भयभीत और वश में रखा।
01:24अयुतायू के पुत्र रितुपर्ण एक अत्यंत पराक्रमी और बुद्धिमान राजा हुए जो रत हाकने की कला और पासे के खेल
01:32के रहसियों में संपूर्ण विश्व में सर्वश्रिष्ट माने जाते थे।
01:37महाराज रितुपर्ण ने अपने ज्ञान और कौशल से न केवल अयोध्या का गौरव बढ़ाया, बलकि निशत देश के राजा नल
01:45के साथ प्रगाड मित्रता स्थापित की।
01:48रितुपर्ण के धर्म प्रायन पुत्र सर्वकाम ने राज्य का संचालन इस प्रकार किया कि उनके शासनकाल में अकाल और दुख
01:56का नामों निशान मिट गया।
01:59सर्वकाम के तेजस्वी पुत्र सुदास ने सूर्यवंश की कीर्थी पताका को और भी उचा लहराया और अनेक दुष्ट राजाओं का
02:07दमनकर धर्म की पुनह स्थापना की
02:11महाराज सुदास के यहां एक परम प्रतापी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम मित्रसह रखा गया, जो आगे चल कर
02:19अपने महान कर्मों से चक्रवर्ती समराट बना
02:22युवा मित्रसह का राज्याभिशेक अत्यंत भव्य तरीके से संपन हुआ, जहां देवगणों ने भी आकाश से पुष्पवर्शा कर सूर्यवंश के
02:31इस नए सूर्य का अभिनन्दन किया
02:35समराट मित्रसह ने अपनी परम सुन्दरी और धर्म प्रायन पत्नी रानी मध्यन्ती के साथ मिलकर गुरु वशिष्ट के चर्णों में
02:42शीश नवाया और उनका दिव्य आशिरवाद प्राप्त किया
02:47एक दिन समराट मित्रसह आखेट के लिए घने और भयानक जंगलों में प्रविष्ट हुए जहां हिंसक पशुओं के साथ साथ
02:55भयंकर मायावी शक्तिया भी वास करती थी
02:59वन के एकांट में राजा ने दो विशालकाय बागों को देखा जो वास्तव में मायावी राक्षस थे और वन के
03:07निरीष जीवों का बेरहमी से सहार कर रहे थे
03:11समराट ने त्वरित गती से अपने धनुष पर दिव्यबान चड़ाया और एक भीशन गर्जना के साथ एक राक्षस रुपी बाग
03:19को यमलोक का मार्ग दिखा दिया
03:22अपने भाई की मृत्यू से क्रोधित दूसरा मायावी राक्षस अंतरध्यान हो गया और उसने राजा से अत्यंत भीशन और क्रूर
03:30प्रतिशोध लेने की भयानक प्रतिग्या की
03:34प्रतिशोध की आग में जलते हुए उस राक्षस ने कपटपूर्वक राजा के महल में एक शाही रसोये का रूप धारन
03:41कर लिया ताकि वह अपने शड्यंत्र को अंजाम दे सके
03:46जब कुलगुरु महर्शी वशिष्ठ महल में पधारे तब उस चद्म वेशी राक्षस ने राजा को अपकीर्थ करने के लिए भोजन
03:53में वर्जित और अपवित्र मास परोस दिया
03:57कुलगुरु महर्शी वशिष्ट पवित्र भोजन में वर्जित मास देखकर अत्यंत क्रोधित हो उठे उनकी आखों में दिव्य अगनी प्रजवलित हो
04:05गई और उनके माथे पर चिन्ता की लकीरें गहरा गई
04:10बिना एक पल भी रुके महर्शी ने राजा को शाप दिया कि वह नर्भक्षी राक्षस बन जाएगा और अगले बारह
04:18वर्षों तक अपनी प्रजा और देवताओं के लिए एक भयानक खत्रा बना रहेगा
04:24राजा जिसने उस शड्यंत्र से अन्भिग्य होकर वह भोजन स्विकार किया था ने अपने गुरु के समक्ष अपनी निर्दोष्टा का
04:32दावा किया और अपनी विवश्टा को व्यक्त किया
04:36गुरु के इस अन्याय पूर्ण शाप से क्रोधित होकर राजा ने भी प्रतिशोध में अपनी हथेली में जल लेकर महरशी
04:44को शाप देने की तयारी की
04:47लेकिन राजा को यह ज्यात नहीं था कि उनके ही हाथों में गुरु के शाप का जल पहले से ही
04:53उनके पैरों पर गिर चुका था, जिसने अंजाने में ही उनके भाग्य को तै कर दिया था
05:00जब राणी ने देखा कि राजा क्रोधवश स्वया गुरु को शाप देने के लिए तत्पर हैं तो वह डर गई
05:06की इससे और बड़ा अनर्थ होगा
05:10राणी अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए तुरंत राजा के पास पहुँची और उनके क्रोध को शांत करने का प्रयास
05:17करने लगी, उन्हें ऐसे विनाशकारी कदम से रोकने की विन्ती की
05:23राणी ने राजा से समझाया कि गुरु को शाप देना और भी भयंकर पाप होगा, जिससे न केवल उनका बलकी
05:30पूरे राज्यका नाश हो जाएगा
05:33अपनी प्रियरानी के विवेक पूर्ण शब्दों को सुनकर, राजा का क्रोध धीरे-धीरे शांत होने लगा, और उन्होंने गुरु को
05:41शाप देने का विचार त्याग दिया
05:44क्रोध शांत होने पर राजा ने अपने हाथों में रखा शाप का जल अपने ही पैरों पर गिरा दिया जिससे
05:51उनके पैर तुरंत विक्रित होकर कलुषपाद के नाम से विख्यात हुए
05:57अपने ही शाप से विक्रित हुए पैरों के साथ, कलुषपाद नाम से जाने जाने वाले राजा ने प्रायश्चित और शाप
06:04की शक्ती को शांत करने के लिए महल छोड़ दिया और घने वन की ओर निकल पड़े
06:10महर्शी वशिष्ट इस पूरी घटना के साक्षी बनकर राजा के इस दुखत भाग्य पर गहरा पश्चाताप और विलाप करने लगे
06:18उनका दिव्यहरिदय करुना से भर उठा
06:22वहीं महल के भीतर छिपावह मायावी राक्षस अपनी चाल सफल होते देखकर एक क्रूर और दुष्ट मुस्कान के साथ अपने
06:31भयावह प्रतिशोध पर गर्व महसूस कर रहा था
06:35वन में भटकते हुए शाप के प्रभाव से राजा कलुषपाद का शरीर धीरे धीरे एक भयानक नर्भक्षी राक्षस में परिवर्तित
06:44होने लगा उनकी शाही गरिमा विलीन होती गई
06:48अपनी ही पतनी को वन में देखकर शापग्रस्त राजा राक्षस रूप में उन्हें भी एक शिकार समझ कर खाने का
06:56प्रयास करने लगा उनका मन भ्रम और भूख से विक्षिप्थ था
07:00ठीक समय पर महर्शी वशिष्ठ वहां प्रकट हुए और अपने दिव्य हस्तक शेप से राजा को उसकी अपनी ही पतनी
07:08को नुकसान पहुचाने से रोका
07:11महर्शी ने अपने दिव्य ज्यान से शाप की अवधी को घटा कर बारह वर्ष से केवल बारह महीने कर दिया
07:18जिससे राजा को कुछ राहत मिली
07:21यद्यपी शाप की अवधी कम हो गई थी राजा कलुषपाद को अपने राज्य में एक राक्षस के रूप में ही
07:28लोटना पड़ा अपनी प्रजा के लिए एक भयानक द्रिष्टी बन गए
07:33शाप के प्रभाव में राक्षस रूपी राजा कलुषपाद ने कई निर्दोष रिशियों को अपना शिकार बनाया जिससे धर्म और शान्ती
07:42भंग हो गई
07:43उन दुहकी रिशियों ने जिनके साथियों को राक्षस ने खा लिया था अपनी पीडा व्यक्त करने और सहायता मांगने के
07:52लिए महर्शी वशिष्ट के आश्रम की ओर प्रस्थान किया
07:56महर्शी वशिष्ट के पावन आश्रम में पहुँचकर उन शोकाकुल रिशियों ने जिनके नेत्रों में भय और दुहक का सागर उमड
08:04रहा था
08:05करुन पुकार के साथ अपनी पीडा व्यक्त की मानो प्रकृती भी उनके रुदन से काप उठी हो
08:12रिशियों के हृदय विदारक वर्नन को सुनकर वशिष्ट जी की शांत मुद्रा पर भी चिन्ता की एक हलकी चाया मंडरा
08:20गई
08:20क्योंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कौन सा दुष्ट इतना अधर्मी हो सकता है
08:27उन्होंने थर्थराते हुए स्वर में बताया की कैसे एक भयंकर राक्षस ने उनके निर्दोष साथियों को बेरहमी से निगल लिया
08:35और कैसे वह अबवन प्रांतों में आतंक का परियाय बन चुका है
08:40वशिष्ट जीने गहन विचार में डूब कर रिशियों से उस भयावः प्राणी का विस्तृत विवर्ण मांगा यह जानने के लिए
08:48कि कौन सा जीव अपनी प्रकृती के विरुध इतना कुरूर हो गया है
08:53आखों में दहशत लिए रिशियों ने उस राक्षस के विशालकाई और विक्रित स्वरूप का वर्णन किया जिसके नक्तीक्ष न थे
09:01और जिसकी आखों से अगनी निकलती थी जिसने उनके गुरुभाईयों का रक्तपान किया था
09:08जैसे जैसे रिशियों ने दानव के विक्राल रूप और उसके द्वारा किये गए अमानविय कृत्यों का बर्णन किया
09:15वशिष्ट जी के मस्तिश्क में एक भयावह सक्चाई धीरे-धीरे उभरने लगी
09:21उन्हें सहसा ही उस श्राब की घटना स्मरण हो आई
09:24जब राजा सौदास को एक ब्राहमन के क्रोध के कारण विक्राल राक्षस में परिवर्तित होना पड़ा था
09:31और यह विचार उनके हृदय को छेद गया
09:34अपने प्रिय शिश्य धर्मात्मा राजा मित्रसह कलुषपाद की यह दुर्धशा जानकर वशिष्ट जी का हृदय विदीर्ण हो गया
09:43और उनके मुखमंडल पर गहरी वेदना उभराई
09:47उन्होंने दोहखी रिशियों को शान्त करते हुए आश्वासन दिया कि वे इस संकट का समाधान अवश्य करेंगे और उस राक्षस
09:56रूपी राजा को उसके श्राप से मुक्ती दिलाएंगे
10:00अपने परमशिष्य को इस भयानक बंधन से मुक्त कराने के लिए वशिष्ठ जी ने ततकाल अपनी यात्रा की तैयारी आरंभ
10:08की उनका मंद्रिड संकल्प से भरा था
10:12शांत और गंभीर मुद्रा में महर्शी वशिष्ठ ने अपने आश्रम से प्रस्थान किया उनका दिव्य तेज वन के गेहन अंधकार
10:20को भी प्रकाशित करने लगा
10:23इसी बीच राक्षस रूपी राजा कलुशपाद अपने विक्राल और भयावह स्वरूप में वन के भीतर निर्दोष जीवों का सहार करता
10:31हुआ घूम रहा था
10:32उसकी आखे रक्त की प्यासी थी
10:36उसकी हर दहार से वन प्रांट काप उठता था और उसके करूर कृतियों से प्रकृती भी भयाक्रांथ होकर मौन साध
10:44लेती थी
10:46अंधेरे वन की गहराईयों में भटकते हुए महर्शी वशिष्ठ ने अपने अंतरग्यान से उस छेत्र को पहचान लिया जहां राक्षस
10:54का आतंप चरम पर था
10:56जैसे ही वशिष्ठ जी उस भयावह स्थान के निकट पहुँचे राक्षस रूपी कलुषपाद ने एक अलौकिक शक्ती का अनुभव किया
11:05जिससे उसकी क्रूरता क्षन भर के लिए शिथिल पढ़ गई
11:09क्रूरता और बर्बरता के पर्याय बन चुके कलुषपाद के समक्ष महर्शी वशिष्ठ एक परवत की भाती अडिक खड़े थे उनके
11:17मुखमंडल पर दिव्य शान्ती और द्रिड संकल्प का तेज था
11:22अपनी गुरू की उपस्थिती को पहचान कर राक्षस के भीतर कहीं गहरे दबा हुआ राजा का अंश एक पल को
11:29जागरित हुआ
11:30जिससे उसकी आखों में क्रूरता के साथ साथ एक अजीब सी व्याकुलता भी जलक उठी
11:37वशिष्ठ जी ने अपनी दिव्यद्रिष्टी और आध्यात्मिक शक्ती का प्रयोग करते हुए उस श्राप के गहन अंधकार को भेदने का
11:45प्रयास किया
11:46जिससे राक्षस का शरीर चटपटाने लगा
11:50श्राप और गुरु की शक्ती के बीच राक्षस के भीतर राजा का आत्मा संधर्श कर रहा था
11:56उसका शरीर एक युद्ध भूमी बन गया था जहां अच्छाई और बुराई टक्रा रही थी
12:03गुरु वशिष्ट की अमोग शक्ती के प्रभाव से राक्षस के भयावह रूप में धीरे-धीरे एक परिवर्तन आने लगा
12:10मानो अंधकार पर प्रकाश की विजय सुनिश्चित हो रही हो
12:15गुरु वशिष्ट की तपोबल की अगनी जैसे ही राजा के शरीर पर पड़ी
12:20उनके भयानक राक्षस रूप की त्वचा पिघलने लगी और भीतर से सुकोमल मानविय आभा प्रकट होने लगी
12:28पीड़ा और कृतग्यता के आशू बहाते हुए राजा सौदास अपने गुरु के चर्णों में गिर पड़े उनके भीतर का दानव
12:35अब शांत हो रहा था
12:38जब राजा ने बोलने का प्रयास किया तो उनके मुख से शब्द नहीं बलकि उनके अतीत की काली स्मृतिया धुए
12:45के रूप में प्रकट होकर हवा में तैरने लगी
12:49स्मृतियों के उस घुमते चक्र में राजा ने देखा कि कैसे वर्षों पूर्व वे अपने वैभवशाली रत पर सवार होकर
12:57शिकार के लिए एक घने रहस्यमई वन में गए थे
13:01उस वन के एकांत में राजा ने एक भयानक और विशालकाय राक्षस को देखा जो रिशियों के यग्यों को भंग
13:09कर रहा था और वन्य जीवों में भय फैला रहा था
13:13रिशियों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए राजा सौदास ने अपने दिव्य धनुष पर एक तीक्षन बान चढ़ाया
13:21और उसे राक्षस की ओर छोड़ दिया
13:23वह अचूक बान सीधे राक्षस के हरिदय में जाधनसा और वह तडपते हुए भूमी पर गिर पड़ा परन्तु दम तोड़ते
13:32ही उसका राक्षसी मायाजाल समाप्त हो गया
13:36उसी क्षन व्रिक्षों के जुर्मुट से एक परम तपस्वी ब्राहमन प्रकट हुए जो अपने भाई की निर्जीव देह को देखकर
13:44शोक और क्रोध से तडप उठे
13:46अपने भाई के पार्थिव शरीर को गोद में लेकर उस ब्राहमन ने राजा सौदास की ओर देखा और उनकी आखों
13:54में प्रल्यकारी अगनी प्रजवलित हो उठी
13:58राजा सौदास ने तुरंट अपने रत से उतर कर अत्यंत ग्लानी के साथ ब्राहमन के चर्णों में अपना मस्तक रख
14:05दिया और अपनी अंजानी भूल के लिए क्षमा मांगी
14:10किन्तु क्रोध और शोक की ज्वाला में जल रहे उस ब्राहमन ने राजा की प्रार्थना को अंसुना कर दिया और
14:17उनका तपोबल एक संहारक उर्जा में बदलने लगा
14:21थर्थराते हाथों से अपने कमंडलू से जल लेते हुए, ब्राहमन ने राजा को एक ऐसा दंड देने का निश्चय किया
14:29जो उनके वंश को कलंकित कर दे
14:32ब्राहमन ने गर्जना करते हुए शाप दिया कि जिस प्रकार राजा ने एक राक्षस का वध किया है, वे स्वय
14:39भी एक नर्भक्षी राक्षस बनकर वनवन भटकेंगे
14:44शाप के उच्चारण के साथ ही आकाश से काली बिजली गिरी, जिसने राजा के सुंदर स्वर्ण शरीर को अंधकार और
14:52राक्षसत्व में लपेटना शुरू कर दिया
14:55स्मृतियों का वह मायावी चक्र समाप्थ हुआ और वर्तमान में राजा सौदास पुनह गुरू वशिष्ट के सामने असहनिय दर्द में
15:03छटपटाने लगे
15:05गुरू वशिष्ट ने अपनी आखे बंद कर ली और इस दुखद नेती के पीछे छिपे हुए कर्मों के विधान को
15:12अपनी अंतरग्रिष्टी से देखा
15:15गुरू ने राजा को सांत्वना देते हुए कहा कि यद्यपी एक ब्राह्मन का शाप कभी निश्पल नहीं हो सकता परंतु
15:23धर्म और तपस्या से इसके प्रभाव को सीमित किया जा सकता है
15:28अपने गुरू के वचनों से राजा को शक्ती मिली और उन्होंने स्विकार किया कि वे इस राक्षस रूप को धारण
15:36कर अपने पापों का प्रायश्चित करेंगे
15:39महर्शी वशिष्ठ ने अपने कमंडलू से अभिमंतरित जल छिड़का जिससे राजा के भीतर की हिंसक और तामसित प्रवृत्तिया शान्थ हो
15:47गई
15:49इस प्रकार राजा सौदास जिन्हें अब कलमशपाद कहा जाने लगा अपने गुरु की आध्या पाकर प्रायश्चित के लिए घने वन
15:57की ओर बढ़ गए
15:59घने वन में प्रवेश करते ही, राजा सौदास, जिन्हें अब कलमशपाद कहा जाने लगा था, अपने अस्तित्व में एक असहच
16:08खिंचाव महसूस करने लगे, जैसे कोई अद्रिश्य शक्ती उनके भीतर के मानविय सार को कुरेद रही हो
16:16शाप की प्रबल शक्ती उनके रक्त में घुलने लगी थी, जिससे उनके मन में एक भीशन द्वंद्व छिड़ गया, एक
16:23और प्रायश्चित की द्रिड़ता, दूसरी और एक अदमें, हिंसक आवेग का उदे
16:29उनके हाथों और पैरों की त्वचा काली पढ़ने लगी, उनकी आकरिती विक्रित होने लगी, और एक असहनिय पीडा की लेहर
16:37उनके पूरे शरीर में दोड़ गई
16:40उनकी मानविये चेतना एक धुन्धले सपने की तरह दूर होती जा रही थी, और उसके स्थान पर एक आदिम, पाश्विक
16:48वृत्ती हावी होती जा रही थी
16:51एक भीषण गर्जना ने पूरे वन को कमपकमपा दिया, जो अब राजा का स्वर नहीं, बलकि किसी भयानक राक्षस की
16:59क्रूर चीख थी
17:01उनके शरीर में भयानक मानसल वृद्धी हुई, नाखून खंजर की तरह लंबे और नुकीले हो गए, और मुखमंडल पर नुकीले
17:10दात और दरावनी आखें उभराई
17:13राजा सौदास का मानविय रूप पूरी तरह से विलुप्थ हो गया, और उनके स्थान पर एक भयानक नर्भक्षी राक्षस खड़ा
17:21था, जिसका नाम अब कलमशपाद था
17:25अपनी नई असीमित शक्ती और क्रोध में उसने आसपास के पेरो और चट्टानों को एक ही जटके में तोड़ना शुरू
17:33कर दिया, जैसे वे मिट्टी के खिलोने हुँ
17:37उसके नए राक्षस रूप की आभार इतनी विकट थी कि वन के सभी प्राणी भयभीत होकर प्राण बचा कर भागने
17:44लगे
17:45फिर एक अनियंत्रित भीशन भूख उसके भीतर जागरित हुई, जिसने उसे शिकार की ओर धकेला, जो पहले एक निरी वन
17:54प्राणी था
17:56रक्त और मास का पहला स्वाद उसके राक्षसी स्वरूप की पुष्टी कर रहा था, और उसकी आखों में एक नई
18:03भयावा चमक आ गई
18:05शन भर के लिए उसकी आखों में एक दुख भरी जलक दिखी, जैसे बीटे हुए मानविय जीवन की कोई धुन्धली
18:13स्मृती उसकी राक्षसी चेतना को भेदने की कोशिश कर रही हो
18:18परंतु शाप का भयानक बल इतना प्रचंड था कि मानविय भावनाओं की वह क्षीन किरन तुरंत उस अंधकार में विलीन
18:26हो गई
18:27अब वह एक भटकता हुआ, निर्दही राक्षस था, जो अपनी क्रूर भूख मिटाने के लिए घनेवन के अज्यात पथों पर
18:35भटकता रहा
18:37कई दिन और रातें बीट गई, और वह राक्षस अपनी अदमे भूख से प्रेरित होकर वन में घूमता रहा, जहां
18:45उसकी नजर अचानक कुछ तपस्वियों पर पड़ी
18:49मानव रूप देखते ही उसकी भीतर की नर्भक्षी वृत्ती जागरित हो गई, और एक नई भयावभ भूख ने उसे बुरी
18:56तरह जकड लिया
18:58शाप की भयावध्वनी उसके मस्तिश्क में गूंजने लगी, जो उसे मानव मास का उपभोग करने का आदेश दे रही थी
19:07उसके भीतर का राजा सौदास इस पाश्विक इच्छा से लड़ रहा था, लेकिन शाप की शक्ती इतनी प्रचंड थी कि
19:15उसकी अंतिम मानविय भावनाय भी हार मानने लगी
19:19और फिर वह अदमय इच्छा इतनी प्रबल हो गई कि कलमशपाद अपनी क्रूर वृत्ती को रोक न सका और तपस्वियों
19:27की ओर बढ़ने लगा, मानो वे मात्र शिकार हो
19:31वन में अचानक एक भयावह चीख गूंज उठी, जो किसी निरिह तपस्वी के भय और पीडा का अंतिम प्रमाण थी,
19:40जिसे क्रूर कलमशपाद ने अपना पहला शिकार बनाया
19:44अपने पहले शिकार को निगलते ही, कलुशपाद की विक्रित आखों में एक अमानविये चमक कौंध गई, जो उसकी नवजात राक्षसी
19:53भूख को दर्शाती थी
19:56मान्सभक्षन की इस पाश्विक क्रिया ने वन की शांती भंकर दी, जहां अब केवल भयानक हड्डियों के चटकने और खून
20:03के जमने की अस्वाभाविक ध्वनी गूंज रही थी
20:07उसके मन के गहरे कोनों से राजा सौदास की स्मृती पूरी तरह मिच्चुकी थी, अब केवल भूख और हिंसक वृत्ती
20:15का अंधकार में सामराज्य था
20:17एक के बाद एक शिकार करते हुए उसकी पाश्विक इच्छाय अनियंत्रित हो गई और जंगल का हर प्राणी उसकी भयावा
20:26उपस्थिती से काप उठा
20:28उसने निर्दोश यात्रियों और वनवासियों का कुरूरता पूर्वक भक्षन करना शुरू कर दिया, जिससे हर राहगीर के हृदय में मृक्यू
20:37का भय भर गया
20:39कुछ दिनों बाद चरवाहों और लकड़ारों ने वन में कटेफ्टे वस्त्र और मानव अवशेश पाए जो एक अनकहे आतंक की
20:47कहानी बया कर रहे थे
20:49गाव-गाव में यह भयानक समाचार आग की तरह फैल गया कि वन में एक अज्यात नर्भक्षी राक्षस सक्रिय हो
20:57गया है जो मनुश्यों का शिकार कर रहा है
21:01अब सूर्यास्त के बाद कोई भी अपने घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करता था और हर रात दर्वाजों
21:08के पीछे से डरावनी फुस्फुसाहटे सुनाई देती थी
21:13नर्भक्षी कलुशपाद अब घने जंगलों से निकल कर खेतों और गावों की सीमाओं तक पहुँच गया था जिसकी भयावह छाया
21:21पूरे ख्षेतर पर मंडराने लगी
21:24राज्य के वीर सैनिक जिन्हें इस रहस्यमय उपद्रव को शांत करने के लिए भेजा गया था उन्होंने भी विक्रित पच्चहन
21:32और खून से सने रास्ते देखे
21:35उन पच्चहनों और अवशेशों को देख कर सैनिकों के मन में खौफ बैठ गया क्योंकि वे उनमें अपने प्रिय राजा
21:42सौदास की पहचान के कुछ भयानक निशान पा रहे थे
21:47अंत्य महल में भी फुस्फुसाहटें फैलने लगी जिससे रानी और मुख्य मंत्रियों के कान तक यह भयाव संदे पहुचने लगा
21:55कि वन का नर्भक्षी स्वय उनका राजा हो सकता है
22:00रानी अपने पती के भयानक परिवर्तन की बात सुनकर गहरी निराशा और अविश्वास में डूग गई उनके हृदय में एक
22:08अथा पीड़ा उमड़ पड़ी
22:11जैसे जैसे उसका नर्भक्षन बढ़ता गया कलुशपाद का रूप और भी विक्रित भयाव और पाश्विक होता गया मानो उसके भीतर
22:19की मानवता सदा के लिए मर चुकी हो
22:23अंधकार भरी रातों में वह एक भूखे शिकारी की तरह जंगलों में भटकता जिसकी भयावः गड़गडाहट और दरावनी फुफकार हवा
22:32में गूंजती
22:33उसकी उपस्थिती ने पूरे जंगल को आतंकित कर दिया था जहां अब केवल भयानक सन्नाटा और मौत का ठंडा एहसास
22:42व्याप्त था
22:43इस बढ़ते हुए अनिष्ट को भामपते हुए दूर-दूर के आश्रमों से कई सिधरिशी एकत्रित हुए जो इस भयानक संकट
22:51के मूल कारण पर विचार विमर्ष करने लगे
22:55गेहन ध्यान और अपनी दिव्यद्रिश्टी से उन्होंने उस शाप और राजा के दुर्भाग्यपूर्ण परिवर्तन को समझा जिसने एक समराट को
23:04नर्भक्षी राक्षस में बदल दिया था
23:07शाप की शक्ती के साथ ही कलुषपाद की राक्षसी ताकत और कुरूर्ता भी बढ़ती जा रही थी जिससे उसका हर
23:15वार और भी घातक होता गया
23:17इस प्रकार राजा सौदास का गौरवशाली राज्य एक भयावः छाया के नीचे आ गया जहां हर व्यक्ती दिन रात एक
23:26नर्भक्षी समराट के आतंक में जी रहा था
23:29अपने पती के इस भयावह रुपांतरण को देखकर पत्रानी मध्यन्ती का हृदय अथाह पीड़ा और अविश्वास से भर गया
23:37उनका सारा संसार एक पल में बिखरता प्रतीत हुआ
23:42समराट के राक्षसी रूप और उसके आत्ताई कृत्यों से पूरा राज्य भयभीत होकर पलायन कर रहा था
23:49किन्तु मध्यन्ती ने अपने पती और सूर्यवंश की मर्यादा त्यागने से इनकार कर दिया
23:55वह अकेली ही उस वीरान होते महल में एक खूंखार दानव में बदले अपने पती के पास रही
24:02अपनी उपस्थिती से उसे शायद अपने मनुश्यत्व की थोड़ी सी याद दिलाने की व्यर्थ चेश्टा करती रही
24:10प्रत्येक दिन मध्यन्ती अपने दानव रूपी पती को भोजन और जल अर्पित करती इस आशा में की एक दिन वह
24:17इस शाप से मुक्थ होकर अपने सच्चे स्वरूप में लोट आएगा
24:22किन्तु शाप के प्रभाव में कलुशपाद की राक्षसी भूख और कुरूरता दिन बदिन बढ़ती ही जा रही थी जिससे उसके
24:30आसपास कोई भी प्राणी सुरक्षित नहीं रह गया था
24:34अपने पती के अनियंत्रित राक्षसी स्वभाव से स्वयम मध्यन्ती को भी कई बार प्राणों का भय सताने लगा जब उसकी
24:42विक्राल भूख ने उसे अपनी पत्नी की ओर भी आकर्षित किया
24:47उस अंधकार्मय समय में जब सब कुछ खोया हुआ प्रतीत होता था मध्यन्ती ने अपनी सारी आशाएं दिव्य शक्तियों पर
24:56केंद्रित कर एकांत में गेहन प्रार्थनाएं की
25:00उनकी करोन पुकार और अडिग निष्ठा को अनुभव कर परम ज्यानी और तपस्वी महर्शी वशिष्ठ अपनी दिवेद्रिष्टी से मध्यन्ती की
25:08पीडा को भांप गए
25:11रिशी वशिष्ठ तुरंट अपनी योग शक्ती से मध्यन्ती के पास प्रकट हुए उनकी उपस्थिती से उस भयानक वातावर्ण में आशा
25:19की एक नई किरन जगमगा उठी
25:23वशिष्ठ ने मध्यन्ती को शाप की पूरी अवधी और उसके निवारण की विधी समझाई जिससे उसे यह ज्यात हुआ की
25:30यह अंधकार अस्थाई है
25:34महर्शी ने मध्यन्ती को धैर्य रखने और सूर्यवंश की निरंतर्ता को सुनिश्चित करने के लिए विशेश उपाय करने का परामर्श
25:42दिया
25:42क्योंकि इस भयानक दौर में राज्य को एक उत्तराधिकारी की आवश्शकता थी
25:48चुंकि राजा कलुषपाद अपनी राक्षसी अवस्था में संतानोत पत्ती के योग्य नहीं थे
25:54इसलिए वंश को आगे बढ़ाने की चुनोती मध्यन्ती के सामने पहाड बनकर खड़ी थी
26:01वंश को बचाने के लिए महर्शी वशिष्ठ ने मध्यन्ती को पुत्र प्राप्ती हेतु एक दिव्य अनुष्ठान और आशिर्वाद प्रदान करने
26:09का प्रस्ताव रखा
26:10जिससे सूर्य वंश का दीपक प्रजवलित रहे
26:14अपने पती के प्रती अगाध प्रेम और वंश की रक्षा के कर्तव्य के बीच मध्यन्ती ने भारी मन से महर्शी
26:21वशिष्ठ के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया
26:25तक पश्चात महर्शी वशिष्ठ ने एक पवित्र यग्य का आयोजन किया
26:30जिसमें देवताओं का आहवान कर मध्यन्ती को पुत्र रत्न की प्राप्ती का आशिरवाद दिलाया
26:37देवताओं के आशिरवाद और वशिष्ठ के तब से मध्यन्ती गर्भवती हुई
26:41जिससे सूर्यवंश में एक नए जीवन के आगमन की आशा जगी जो उस अंधेरे काल में एक प्रकाश किरण थी
26:50माँ पूरे होने पर मध्यन्ती ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया जिसने सूर्यवंश की परंपरा को आगे बढ़ाने की
26:58शक्ती और गौरव का वादा किया
27:01महर्शी वशिष्ठ ने नवजात शिशु को अश्मक नाम दिया जिसका अर्थ है वह जो पाशान से जन्मा हो क्योंकि उसकी
27:09उत्पत्ती असाधारन परिस्थितियों में हुई थी
27:13इस प्रकार पुत्र अश्मक का जन्म उस घोर अंधकार में सूर्यवंश के लिए एक नई सुभह लेकर आया जिसने वंश
27:21के अस्तित्व को संकट से उबार लिया
27:24मध्यन्ती अपने पुत्र अश्मक को गोद में लेकर एक बार फिर शक्ती और संकल्प से भर गई
27:31अब उनका लक्ष था अपने पती की वापसी और पुत्र का भव्य भविश्य सुनिश्चित करना
27:38मध्यन्ती ने अपने पुत्र अश्मक को अपनी ममतामई बाहों में भर कर उस अद्रिश शक्ती से प्रार्थना की जो उनके
27:45पती को राक्षस रूप से मुक्त कर पुना मानव जीवन प्रदान कर सके
27:50उन्ही भयानक वर्षों में जहां अयोध्या का राजमहल अपने राजा के बिना सूना था
27:56वही कलुषपाद राक्षस रूप में घने वनों और परवतों में भटकते रहे
28:01उनकी चेतना के कुछ अंश कभी-कभी भयानक कृत्यों पर सिसकते थे
28:06समय ने अपने करूर चक्र में धीरे-धीरे 12 वर्ष पूरे किये
28:11और जैसे ही अंतिम क्षन निकट आया, शाप की काली छाया कलुषपाद के शरीर से हटने लगी
28:17जिससे एक अद्रिश्य उर्जा का कमपन हुआ
28:21शाप के बंधनों से मुक्त होते ही, राक्षसी रूप कलुषपाद के शरीर से एक धुंध की तरह वाश्पीकृत होने लगा
28:29जिससे उनकी वास्तविक मानविय पहचान धीरे-धीरे प्रकट होने लगी
28:35एक तीखे दर्द और फिर परमशान्ती के साथ, राजा कलुषपाद अपनी मानविय चेतना में वापस आ गए, उनके शरीर से
28:43राक्षसी शक्ती अंतिम रूप से बाहर निकल गई
28:47अपनी मानविय काया में वापस लोट कर, कलुषपाद ने पहले तो अपने आस्पास के जंगल और अपने स्वयं के शरीर
28:55को अविश्वास से देखा, मानो वह एक भयानक स्वपन से जागरित हुए हो
29:02जैसे ही चेतना पूर्ण रूप से वापस लोटी, उन्हें राक्षसी रूप में किये गए अपने हर जगने कार्य की यादे
29:09बाढ़ की तरह घेरने लगी, हर शिकार, हर हत्या, हर चीख उनके मन में गूझ उठी
29:16अपराध बोध की अगनी में जलते हुए, उन्होंने अपने आप को धिकारा, उस क्रूर भाग्य को कोसा जिसने उन्हें एक
29:24ऐसे दानव में बदल दिया था, जिसने अपने ही लोगों पर अत्याचार किये
29:29अपने हाथों को देखकर, जिनमें कभी शाही तलवार थी और अब निर्दोश रक्ट से सने होने का आभास था, वे
29:37कांप उठे और गहरी गलानी में डूग गए
29:41अपनी आत्मा को शुद्ध करने की तीवर इच्छा से प्रेरित होकर, कलुषपाद ने उस स्थान को छोड़ने का निश्चय किया,
29:49जहां उसकी राक्षसी यात्रा का अंथ हुआ था, और प्रायश्चित के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया
29:56वे गहरे जंगलों और उँची परवत श्रिंखलाओं की ओर बढ़े, सांसारिक मोहमाया और राजसी सुखों का त्याग कर एकांत और
30:05आत्मन रिक्षन की तलाश में
30:07कई दिनों तक उन्होंने बिना भोजन या जल के यात्रा की, उनके भीतर पश्चाताप की ज्वाला उनके शरीर को जला
30:15रही थी और उनके संकल्प को और भी मजबूत कर रही थी
30:20एक शांत गुफा में शरण लेकर कलुषपाद ने गहन तपस्या आरंभ की, अपनी आखे बंद कर अपने मन को राक्षसी
30:28रूप में किये गए सभी पापों से शुद्ध करने का प्रयास किया
30:33उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि उनका शरीर मात्र अस्थिपंजर बन गया, पर उनकी आत्मा का संकल्प हिमालय की तरह
30:42अडिग रहा
30:43प्रत्येक स्वास के साथ उन्होंने अपने राक्षसी काल के भयानक ग्रिश्यों और अपनी पत्नी मद्यन्ती के प्रेमपूर्ण चहरे की कल्पना
30:52की, जो उन्हें मोक्ष की ओर धकेल रहा था
30:56देवताओं ने उपर से उनकी असाधारन तपस्या और पश्चाताप की गहराई को देख कर विस्मय और सम्मान से सिर जुकाया
31:05उनकी तपस्या से उत्पन ऊर्जा इतनी प्रचंड थी कि उसने तीनों लोकों में कमपन उत्पन कर दिया, जिससे सभी को
31:14उनके महान बलिदान का आभास हुआ
31:17अंतिम रूप से एक दिन परम प्रकाश की एक किरण उनकी गुफा में प्रविष्ठ हुई, जो उनकी शुद्धी और इश्वर
31:25द्वारा उनके तपकी स्वीकृती का संकेत थी
31:29इस दिव्यक्षन में कलुषपाद ने अपने अपराधों की भारी गठरी को अपनी आत्मा से गिरते हुए महसूस किया और एक
31:37अपार शान्ती ने उनके हृदय को भर दिया, जो बारह वर्षों के कष्ट के बाद प्राप्थ हुई थी
31:44उन्होंने अपनी आखें खोली, अब उनकी दृष्टी में एक नई चमक थी, जो ग्यान, शान्ती और मोक्ष की यात्रा पर
31:52निकले एक शुद्ध आत्मा की थी
31:55गुफा के भीतर, कलुषपाद ने उस दिव्य प्रकाश को अपने रोम्रोम में समाते हुए महसूस किया, जिसने उनके शरीर और
32:03आत्मा को गहन रूप से शुद्ध कर दिया, जैसे सहसरों सूरियों का तेज उन्हें भीतर से प्रकाशित कर रहा हो
32:11उनकी आत्मा में एक गहरी शान्ती और कृतग्यता उमड पड़ी, क्योंकि उन्होंने अपने पिछले पापों के बोज से मुक्ती का
32:19अनुभव किया, जिससे उनका हृदय अपार आनन से भर गया
32:24राजा अब पापों से मुक्त होकर अपने अतीत के दुशकर्मों के प्रायश्चित और भविश्य के मार्ग के लिए एक दिव्य
32:32मार्ग गर्शन की गहन इच्छा रखते थे
32:35इसी क्षन सुदूर अपने आश्रम में महाज्यानी रिशी वशिष्ठ ने अपने अंतरग्यान से कलुशपाद की आत्मा के गहन परिवर्तन और
32:44उनकी पुकार को महसूस किया
32:47ततकाल रिशी वशिष्ठ ने अपनी दिव्य शक्तियों का आवाहन किया और कलुषपाद के पास जाने के लिए अपनी आध्यात्मिक यात्रा
32:56प्रारंभ की उनका मार्ग दिव्य प्रकाश से प्रकाशित हो रहा था
33:01कुछ ही क्षणों में रिशी वशिष्ठ अपनी शान्त आभा के साथ कलुषपाद की गुफा के प्रवेश द्वार पर प्रकट हुए
33:08उनके आगमन से वातावर्ण में एक पवित्र उर्जा का संचार हुआ
33:14अपने सामने परम गुरु को देखकर कलुषपाद तुरंत घुटनों के बल बैठ गए और अत्यंत श्रद्धा और विनमर्ता के साथ
33:22रिशी के चर्णों में अपना शीष जुका दिया
33:26रिशी वशिष्ठ ने करुणापूर्ण दिष्टी से कलुषपाद को उपर उठाया और उनके शुद्ध हरदय को पहचानते हुए उन्हें अपने बगल
33:34में बैठने का संकेत दिया
33:37वशिष्ठ ने अपनी शांत गहरी आवाज में कर्म, पाप और शुद्धी के गूड सिधानतों पर प्रवचन देना आरंभ किया
33:45प्रत्येक शब्द ब्रहमांडिये ज्यान से उतप्रोथ था
33:49राजा कलुषपाद एक आगरता से सुन रहे थे, उनके चहरे पर गहन चिंतन और ज्यान की प्यास साफ जहलक रही
33:57थी, जैसे वर्षों की आध्यात्मिक भूख शांत हो रही हो
34:02वशिष्ट ने समझाया की कर्म मात्रक्रिया नहीं, बलकी इरादों और परिणामों का एक जटिल जाल है और सच्ची शुद्धी केवल
34:10पश्चाताप से नहीं, बलकी कर्मों के परिवर्तन से आती है
34:15गुरु ने प्रायश्चित के विशिष्ट मार्गों को रेखांकित किया, जिसमें तपस्या, दान, ध्यान और उन सभी आत्माओं के प्रती विनमर
34:24सेवा शामिल थी, जिन्हें उन्होंने अतीत में अंजाने में चोट पहुँचाई थी
34:30कलुषपाद ने बिना किसी संदेह के रिशी के प्रत्येक निर्देश को स्विकार किया, उनके हृदय में एक अटल संकल्प था
34:37कि वे निर्धारित प्रायश्चितों को पूरी निष्ठा से पूरा करेंगे
34:42उन्होंने अपने शाही वस्त्रों और सभी सांसारिक सुखों का पूर्ण त्याग किया, केवल एक साधारन धोती और एक भिक्षापात्र के
34:51साथ अपना नया जीवन आरंब किया
34:55अपनी तपस्या के हिस्से के रूप में कलुषपाद ने विनमर्ता से गावो और बस्तियों में भिक्षाटन करना शुरू किया, प्रत्येक
35:03दर्वाजे पर अपनी विनमर्ता और सेवा का पाठ सीखा
35:07कभी कभी पूर्व राजसी अहंकार उन्हें जकडने का प्रयास करता, परंतु वे प्रत्येक आंतरिक संधर्श को रिशी के वचनों और
35:16अपने तीवर पश्चाताप की अगनी से परास्त करते थे
35:20रिशी वशिष्ट दूर से ही अपनी दिव्यद्रिष्टी से कलुषपाद की प्रत्येक तपस्या और आंतरिक प्रक्ती का अवलोकन कर रहे थे,
35:29उनके हृदय में अपने शिश्च के लिए गर्व और संतुष्टी थी
35:34कलुषपाद ने वशिष्ट के वचनों को अपने जीवन में गहराई से आत्म साथ किया, प्रत्येक श्वास और प्रत्येक कार्य उनकी
35:42आत्मा की शुद्धी और ज्ञान की प्राप्ती की दिशा में एक कदम था
35:47वर्षों की तपस्या और निरंतर आत्म निरीक्षण के बाद कलुषपाद ने महसूस किया कि उनके हृदय से सभी विकार मिट
35:55गए थे और वे पूर्ण आध्यात्मिक शुद्धी को प्राप्त कर चुके थे
36:01रिशी वशिष्ट एक बार फिर कलुषपाद के समक्ष प्रकट हुए अब उनके मुख पर गहरा संतोष था और उन्होंने शिश्य
36:09को उनके सफल प्रायश्चित और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए आशिरवाद दिया
36:16वशिष्ट के आशिरवाद से अभिभूत होकर कलुषपाद ने महसूस किया कि अब उनका जीवन पूर्ण हो चुका था और सांसारिक
36:24कर्तवियों से मुक्ती का क्षणा गया है
36:28उन्होंने ततकाल अपने पुत्र, अश्मक और राज्य के प्रमुख मंत्रियों को बुलाकर अपने सिनहासन त्यागने और वानप्रस्थ आश्रम स्विकार करने
36:37का द्रिढ निश्चय सुनाया
36:40अश्मक ने अपने पिता के निर्नय को स्विकार किया, उनके मुख पर गेहन सम्मान और एक नए युग की जिम्मेदारी
36:47का भार स्पष्ट जलक रहा था
36:50पूरे अयोध्या में एक नए राजा के राज्याभिशेक की तैयारिया बड़े उच्साह और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ आरंभ हो गई,
36:58जो एक नए सुभा का संकेत था
37:02शुभ मुहूर्ट पर महर्शी वशिष्ठ की उपस्थिती में अश्मक को वैदिक मंत्रो चार और शुग ध्वनी के साथ इक्षवाकू वंश
37:10के सिनहासन पर प्रतिश्ठित किया गया
37:14राजमुकुट धारन करने के बाद अश्मक ने अपने पिता से आशिरवाद लिया, जो अब एक शान्त भिक्षु के रूप में
37:21अंतिम विदाई लेने के लिए तयार थे
37:25कलुषपाद ने राजसी वस्त्रों को त्याग कर साधारन भगवा वस्त्रधारन किये और एक तपस्वी के रूप में शान्ति पूर्वक जंगल
37:33की ओर प्रस्थान किया, अपने पीछे एक पवित्र विरासत छोड़ते हुए
37:39युवा समराठ अश्मक ने तुरंत राज्य की बागदोर संभाली अपने पूर्वजों की मर्यादा और धर्म की स्थापना के लिए द्रिड
37:47संकल्पित
37:49उनके न्यायपूर्ण शासन और प्रजाप्रेम ने शीधर ही अयोध्या की खोई हुई गरिमा को पुनह स्थापित करना आरंभ कर दिया,
37:57जिससे समरिध्धी और शान्ती का मार्ग प्रशस्थ हुआ
38:01अश्मक ने राज्य के हित में महत्वपूर्ण निर्नय लेने और धर्म के सिध्धान्तों का पालन करने के लिए अनुभवी रिशियों
38:09और विद्वानों से परामर्श लिया
38:12उन्होंने अपनी प्रजा के दुअहक सुख को अपना मान कर व्यक्तिगत रूप से उनकी समस्याओं का समाधान किया, जिससे राज्य
38:20में हर व्यक्ती संतुष्ट और सुरक्षित महसूस करने लगा
38:24अयोध्या फिर से धर्म, न्याय और वैभव का केंद्र बन गई, जहां इक्षवा को वंश का गौरव पुन्ह अपनी चरम
38:31सीमा पर पहुँच रहा था
38:34अश्मक ने अपने वंश की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए एक योग्यरानी से विवाह किया और उनके पुत्रों ने सूर्यवंश
38:42की महिमा को चिरस्थाई बनाया
38:45राज्य की शुद्धी और देवताओं के आशिरवाद के लिए अश्मक ने एक भव्य अश्वमेध यग्य का आयोजन किया, जिसमें अनेक
38:54राजा और रिशी उपस्थित हुए
38:57देवलोग से देवतागन अश्मक के धर्म प्रायन शासन को देख कर प्रसन्न हुए और उन्होंने अयोध्या पर अपनी अमरित वर्शा
39:05की
39:07कलुषपाद के आध्यात्मिक परिवर्तन की कथा, जिसने एक राजा को तपस्वी में बदल दिया, अश्मक के शासन के लिए प्रेणा
39:15का स्रोत बनी रही
39:17इस प्रकार अश्मक ने न केवल अपने राज्य को पुना स्थापित किया, बलकि सूर्यवन्ष की प्रतिष्ठा को भी उच्चतम शिखर
39:25पर पहुँचाया
39:27उनका शासन एक स्वर्ण युग के समान था, जहां धर्म का बोलबाला था और प्रजा सुक्षान्ती से परिपूर्ण थी
39:35यह प्रकरन धर्म के लची लेपन और सूर्यवन्ष की स्थाई विरासत पर प्रकाश डालते हुए समाप्थ होता है, जो अधिक
39:43पौरानिक राजाओं के लिए मंच तयार करता है
39:48और इस प्रकार कलुषपाद के अभिशाप से मुक्त होकर सूर्यवन्ष ने एक नए राजा और एक उजजवल भविश्य के साथ
39:56पुनह अपनी महीमा स्थापित की
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