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- #s3ep39
इस एपिसोड में, स्वर्ग से निष्कासित देवगण अपनी माता अदिति के पास सहायता के लिए पहुंचते हैं। अदिति अपने पति, महर्षि कश्यप के मार्गदर्शन में भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठोर 'पयोव्रत' अनुष्ठान करती हैं। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु स्वयं उनके गर्भ से वामन रूप में प्रकट होने का वचन देते हैं। वामन देव का अद्भुत जन्म होता है, और वे एक छोटे ब्राह्मण के रूप में शक्तिशाली दैत्यराज बलि के अश्वमेध यज्ञ में पहुंच जाते हैं, जहाँ वे ब्रह्मांड के संतुलन को पुनर्स्थापित करने के लिए एक असाधारण याचना करते हैं। क्या होगा जब एक बौना ब्राह्मण एक महाबली राजा से दान मांगेगा? जानें इस दिव्य गाथा में! #वामनअवतार #भागवतपुराण #विष्णु #बलि #अदिति #कश्यपमुनि #पयोव्रत #पौराणिककथाएं #हिन्दूधर्म #S3Ep39 #त्रिविक्रम #वामनकथा
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00:00असुर्राज बलिद्वारा स्वर्ग लोग पर अधिकार कर लेने के पश्चात पराजित देवता अत्यंत हताश होकर दसों दिशाओं में भटकने लगे
00:09मुकुट और आभूशनों से विहीन देवराज इंद्र अपने भ्राताओं के साथ कांतिहीन होकर दुखों के सागर में डूब गए
00:17कोई अन्यमार्ग न देखकर समस्थ देवताओं ने अपनी जन्नी माता अधिती के पावन आश्रम की ओर प्रस्थान करने का निर्णय
00:26लिया
00:28महर्शी कश्यप और माता अधिती का आश्रम वेदमंत्रों की पावन ध्वनियों और शांत प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छा दित्था
00:37माता अधिती अपने आश्रम में पवित्र यग्य कुंड के समीप बैठ कर नित्य संध्यावंदन और अगनिहोत्र कर रही थी
00:45उसी क्षन धूलधूसरित और दैनिय अवस्था में समस्थ देवता अपनी माता के आश्रम के प्रांगण में प्रविष्ठ हुए
00:54अपने ओजस्वी और तेजस्वी पुत्रों को इस भांती दीनहीन अवस्था में देखकर माता अधिती का हृदय कांप उठा
01:03देवराज इंद्र अश्रुपूरित नेत्रों के साथ माता अधिती के चर्नों में गिर पड़े और अपना दुखी मस्तक उनके चर्नों में
01:11रख दिया
01:12अत्यंत स्नहमई माता अधिती ने अपने पुत्र इंद्र को उठा कर गले से लगा लिया और उनके आसू पोंचने लगी
01:21अगनिदेव, वायुदेव और वरुंदेव ने भारी मन से माता को असुर राज बली के स्वर्ग पर आधिपत्य का दुखद वृत्तान्त
01:29सुनाया
01:31इंद्र ने रुंधे हुए गले से बताया कि शुक्राचार्य के निर्देशन में किये गए महायग्यों के बल से दैत्यों ने
01:38उन्हें स्वर्ग से निश्कासित कर दिया है
01:41अपने पुत्रों के मुकुठीन सिर्ख और निश्टेज मुखमंडल को देखकर माता अधिती का वात्सले वेदना से भरूठा
01:50समस्त देवगण हाथ जोड़कर अपनी माता से याचना करने लगे कि वे उनके इस निश्कासन और अपमान का कोई समाधान
01:58धूंढे
02:00माता अधिती सोच में पढ़ गई कि अत्यंत धर्मनिष्ट और महादानी राजा बली को केवल शक्ती से पराजित करना संभव
02:08नहीं है
02:10उन्होंने स्मरण किया कि राजा बली भक्त प्रहलाद के पौत्र है और उनका धर्मबल अत्यंत प्रबल है
02:19देवताओं ने व्यथा व्यक्त की की बिना यग्यभाग के उनका अस्तित्व और संपूर्ण स्रिष्टी का संतुलन संकट में पढ़ गया
02:26है
02:28अपने बालकों को इस भांती निराश देखकर माता अधिती का संकल्प जागा कि वे अपने पुत्रों को उनका अधिकार पुन्प
02:36दिलाएंगी
02:38माता अधिती ने विचार किया कि इस विकट संकट के निवारण हेतु वे अपने पती महर्शी कश्यप से मार्गदर्शन प्राप्त
02:46करेंगी
02:47जहन चिंता में डूबी माता अधिती ने अंतरात्मा से भगवान श्री हरी विश्नु का ध्यान धरकर समाधान की भिक्षा मांगी
02:56अंता माता अधिती ने अपने पुत्रों के कल्यान हेतु कठिन तपस्या और पयोवरत अनुष्ठान करने का अटल निश्चय किया
03:05अपनी समाधी से उठते ही महर्शी कश्यप ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से माता अधिती के हृदय में छिपे असीम शोक और
03:14चिंताओं को तुरंट भांप लिया
03:16अपनी समाधी पूर्ण कर शांत और तेजस्वी पगों से महर्शी कश्यप अपनी पत्नी अधिती के पास जाने के लिए कुटिया
03:24की ओर अग्रसर हुए
03:27व्याकुलता से राह तक्ती माता अधिती ने जब अपने स्वामी महर्शी कश्यप को अपनी कुटिया की ओर आते देखा, तो
03:35उनके मुर्जाय चहरे पर आशा की एक नई किरण चमक उठी
03:40कुटिया में प्रवेश करते ही महर्शी कश्यप के दिव्य और तेजोमय व्यक्तित से वहां का सारा वातावर्ण, पवित्रता और शांती
03:48से सराबोर हो गया
03:50माता अधिती ने अत्यंत श्रधापूर्वक आगे बढ़कर अपने पती महर्शी कश्यप के चर्णों का स्पर्श कर उन्हें सादर प्रणाम किया
04:00कश्यप मुनी ने स्नेहपूर्वक अपनी भार्या अधिती को उठा कर बैठाया और उनके अश्रुपूर्ण नैनों को देखकर उनका हृदय करुणा
04:09से भर गया
04:11महर्शी कश्यप ने अत्यंत कोमल वाणी में अधिती से पूछा कि उनके मन में ऐसी कौन सी भारी चिनता है
04:18जिसने उनके चहरे के तेज को पूरी तरह से छीन लिया है
04:23अत्यंत दुखी होकर माता अधिती ने अपने पती को बताया कि किस प्रकार असुरों ने स्वर्ब पर अधिकार कर उनके
04:31देव पुत्रों को उनके ग्रह से निश्कासित कर दिया है
04:35अदिती ने रुंधे हुए गले से अपने पुत्रों की दैनिय दशा का वर्णन किया और अपने पती से उनकी रक्षा
04:43और खोया हुआ गौरव लोटाने की आचना की
04:47कशप मुनी ने अदिती की व्यथा को शांत मन से सुना और स्रिष्टी के इस संकटकाल पर गहन विचार करने
04:54के लिए क्षण भर को मौन धारन कर लिया
04:57सांत्वना देते हुए महर्शी कशप ने अदिती से कहा कि इस ब्रह्माड में सुख और दुख का चक्रतो कर्मों के
05:04अनुसार निरंतर चलता ही रहता है
05:08उन्होंने अदिती को समझाया कि केवल परमेश्वर श्री हरी विश्णु ही इस विकट परिस्थिती से मुक्ती दिला सकते हैं
05:15बशर्ते उन्हें पूर्ण भक्ती से प्रसन्न किया जाए
05:20तब महर्शी कश्यप ने अदिती को अत्यंत गुप्त और पवित्र पयोवरत नामक अनुष्ठान का उपदेश दिया
05:27जो समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है
05:31कश्यप मुनी ने बताया कि फालगुन मास के शुकलपक्ष के प्रथम बारह दिनों में इस पयोवरत का अनुष्ठान अत्यंत नियमपूर्वक
05:39और पवित्रता से किया जाना चाहिए
05:43उन्होंने इस व्रत की कठिन विधी समझाते हुए कहा कि इन बारह दिनों में केवल गाय के दूध का ही
05:49आहार ग्रहन कर पूर्ण ब्रहमचर्य का पालन करना होता है
05:54कशप मुनी ने आगे कहा कि इस अवधी में मन, वचन और कर्म को पूरी तरह से सन्यमित कर केवल
06:01भगवान विश्णू के ध्यान में मगन रहना अनिवार्य है
06:06महर्शी कशप ने बताया कि किस प्रकार प्रत्येक दिन भगवान श्री हरी की दूध, उश्प और पवित्र मंत्रों से विशेश
06:13पूजा अर्चना की जानी चाहिए
06:16स्वामी के मुख से इस परम कल्यानकारी मार्ग को सुनकर माता अधिती के मन का भय और संशय पूरी तरह
06:23से समाप्थ हो गया
06:26महर्शी कश्यप ने पवित्र मंत्रों का उच्चारण करते हुए अपनी प्रिय पत्नी अधिती को दीक्षा दी और उन्हें इस कठिन
06:33संकल्प को पूर्ण करने का आशिर्वाद दिया
06:36पती का आशिर्वाद पाकर माता अधिती अत्यंत ग्रिढ निश्चय के साथ भगवान विश्णु को प्रसंद करने हेतु कठिन पयोवरत अनुष्ठान
06:46का आरंभ करने के लिए तत्पर हो उठी
06:50पतिदेव महर्शी कश्यप से दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात माता अधिती ने परमश्रधा के साथ केवल दुग्ध का आहार लेकर
06:58बारा दिवसी अत्यंत कठिन पयोवरत अनुष्ठान का द्रिड़ता से शुभारंभ किया
07:03प्रथम दिन की कठोर तपस्या में माता अधिती ने अपनी समस्त बाहिर इंद्रियों को समेट कर अपना संपूर्ण चित केवल
07:12भगवान नारायन के दिव्य चरंकमलों में एकाग्र कर लिया
07:17जैसे जैसे दिन बीटते गए माता अधिती के शरीर की भौतिक शक्ती क्षीन होने लगी किन्तु उनके अंतर्मन में सुलक्ती
07:25भक्ती की अगनी और तीवर होती चली गई
07:29पाँचवे दिन तपोवन में तीवर हवाएं चलने लगी और प्रकृती भी उनकी परीक्षा लेने लगी परंतु माता अधिती परवत की
07:38भांती अडिग होकर अपने संकल्प पर डटी रही
07:42माता अधिती की इस निहस्वार्थ और घोर तपस्या के प्रभाव से स्वर्गलोग का सिनहासन हिल उठा और समस्त देवता उनके
07:50इस अलोकिक संकल्प को विस्मय से देखने लगे
07:54नौवे दिन तक आते आते माता अधिती का अस्तित्व केवल प्रभु के नामस्मरण में लीन हो गया जहां न उन्हें
08:01भूख का भान था और नहीं प्यास की कोई सुध थी
08:06ज्यार हवे दिन माता अधिती के हरिदय मंदिर में केवल और केवल भगवान श्री हरी के चतुर भुज स्वरूप की
08:13छवी ही जागरत और आलोकित हो रही थी
08:17पयोवरत के बारहवे और अंतिम दिन माता अधिती ने जब पूर्ण श्रद्धा भाव से अपनी अंतिम आहुती यग्यवेदी में समर्पित
08:25की तब वहां की वायू अत्यंत दिव्य सुगंध से महक उठी
08:29उसी क्षन संपूर्ण कुटिया अचानक करोडों सूरियों की एक महाज्योती से आलोकित हो उठी जिसके सामने सूर्य का प्रकाश भी
08:39अत्यंत फीका प्रतीत होने लगा
08:42उस परम दिव्य प्रकाश के पुन्च के मध्य से साक्षात जगत पालक भगवान विश्नु अत्यंत मनमोहक और करुणामई रूप धारन
08:50कर प्रकट होने लगे
08:53भगवान श्री हरी अपने अलोकिक चतुर्भुज स्वरूप में प्रकट हुए, जिनके हाथों में शंक, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हो
09:01रहे थे और मुख पर मंद मुस्कान थी
09:05प्रभु के इस अध्भुत और मनभावन दर्शन को पाकर माता अधिती के नेत्रों से प्रेमाश्रूओं की धारा बह निकली और
09:12उनकी बारह दिनों की सारी ठकान ख्षन भर में लुप्थ हो गई
09:17माता अधिती ने परमादर और श्रद्धा भाव से भगवान विश्नु के श्री चर्णों में अपना शीष जुका कर उन्हें साष्टान
09:25प्रणाम किया
09:27चर्णों से उठकर माता अधिती हाथ जोड कर खड़ी हो गई और गदगद कंट से जगत के स्वामी नारायन की
09:34स्तुती एवं वंदना करने लगी
09:37भगवान नारायन ने अत्यंत मधुर और गंभीर स्वर में माता अधिती से कहा कि वे उनकी इस कठिन तपस्या और
09:45पयोवरत से अत्यंत प्रसन्न है
09:49प्रभु ने कहा हे देव माता आपकी भक्ती निश्क पठ है इसलिए आप जो भी वर्दान चाहती है निहसंकोच होकर
09:58मुझसे मांग लीजिए
10:00तब माता अधिती ने अत्यंत दीन स्वर में अपने पुत्रों, देवताओं के कश्टों और असुरों द्वारा उनके राज्य को छीने
10:08जाने की व्यथा प्रभु के सम्मुख व्यक्त की
10:12अधिती ने प्रार्थना की कि है प्रभु, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो आप स्वय मेरे गर्भ से जन्म
10:19लेकर मेरे पुत्रों के दुखों का अंत करें
10:22माता की यह निश्काम और मम्तामई प्रार्थना सुनकर, भगवान विश्णों ने मुस्कुराते हुए उन्हे वर्दान दिया की वे स्वय उनके
10:31पुत्रवामन के रूप में अवतार लेंगे
10:34माता अधिती को यह परम कल्यानकारी वर्दान देकर, भगवान विश्णु पुन्ह अपनी उस दिव्य अनंत जोती में विलीन हो गए,
10:43जिससे संपूर्ण कुटिया आनंद से भर गई
10:46जब भगवान श्रीहरी की वह दिव्य जोती धीरे-धीरे ओजल हुई, तब कुटिया की वायु में एक अलोकिक सुगंध और
10:54असीम शान्ती व्याप्थ हो गई
10:56उस प्रशांत वातावर्ण में अचानक एक अत्यंत सुक्ष्म, स्वर्णिम और निल्मनी के समान चमकता हुआ प्रकाश पुंज माता अदिती के
11:05सम्मुख प्रकट हुआ
11:06यह सुक्ष्म प्रकाश और कुछ नहीं, बलकि स्वयन स्रिष्टी के पालनहार भगवान नारायन का वह अंश्था जो ब्रहमांड की समस्थ
11:16शक्तियों को अपने भीतर समेटे हुए था
11:20माता अदिती ने श्रद्धा पूर्वक अपने हाथ जोड लिये और उनकी आखों से हर्ष के आसु बहने लगे, मानों वे
11:28उस दिव्य जोती का स्वागत कर रही हुँ
11:31वह परम पावन प्रकाश पुंज मंद गती से आगे बढ़ा और माता अदिती के हरिदय स्थल को स्पर्ष करते हुए
11:38उनके भीतर विलीन होने लगा
11:41जैसे ही भगवान ने उनके हरिदय में प्रवेश किया, अदिती का संपूर्ण शरीर एक अत्यन्त जाजवल्यमान स्वन आभा से दीप्थो
11:50उठा
11:51वह दिव्य तेज उनके हरिदय से प्रवाहित होकर उनके गर्भ में स्थापित हो गया, जिससे उस पावन गर्भ को स्वय
11:59आदिपुरुष की उपस्थिती का गौरव प्राप्थ हुआ
12:03माता अदिती ने अपने दोनों हाथ अपने उदर पर रखे और उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो संपून ब्रह्मांड का भार
12:11और उसका परम आनंद उनके भीतर समा गया हो
12:15इस दिव्य घटना के घटित होते ही कुटिया के चारों ओर लगे व्रिक्षों पर असमई ही अत्यंत सुन्दर और सुगंधित
12:22पुष्प खिल उठे
12:24उधर अंतरिक्ष में ध्यानमगन महर्शी कश्यप को अचानक स्रिष्टी में एक महान और शुद परिवर्तन का आभास हुआ
12:32जिससे वे तुरंट अपनी कुटिया की ओर लोट पड़े
12:36जब महर्शी कश्यप ने कुटिया में प्रवेश किया तो वे अपनी पत्नी अधिती के शरीर से फूटती उस असीन दिव्य
12:44जोती को देख कर स्तमभित रह गए
12:47उन्होंने तुरंट माता अधिती के सम्मुख अपनी अंजली जोडी और उस परम सत्ता को प्रणाम किया
12:54जो उनके ग्रह में एक अजन में शिशु के रूप में विराजमान थी
12:59अधिती ने धीरे से अपनी आखें खोली जिन में अब स्वय लक्ष्मिक्ती की कृपा जहलक रही थी और उन्होंने अपने
13:07पती को उस महान वर्दान के बारे में बताया
13:11महर्शी कश्यप ने परम संतोष के साथ अपनी पतनी के चर्णों को स्पर्श किया क्योंकि वे जानते थे कि अब
13:19संसार से अधर्म का नाश निश्चित है
13:23स्वर्ग लोक में देवराज, इंद्र और अन्य देवताओं को अपने भीतर खोई हुई शक्ती और तेज के पुनह वापस लोटने
13:30का अनुभव होने लगा
13:33दूसरी और असुरों के राजा बली को अचानक अपने स्वर्ण सिन्हासन पर बैठे हुए एक अज्यात भय और हृदय में
13:40कमपन की अनुभूती हुई
13:43माता अधिती का गर्भ दिनों दिन अधिक दीप्तिमान होने लगा जिसने समस्ट असुरों के तेज और उनकी मायावी शक्तियों को
13:51निश्प्रभ करना शुरू कर दिया था
13:54अधिश्य रूप में आकाश में एकत्र हुए रिशिमुनी और देवगन माता अधिती के इस पवित्र रूप की वंदना करते हुए
14:02उन पर पुश्पों की वर्षा करने लगे
14:05अधिती अब केवल एक माता नहीं बलकि संपून स्रिष्टी के उद्धारक को धारन करने वाली साक्षात ब्रहमांडिय जन्नी के रूप
14:14में शुभाय मान थी
14:15इस प्रकार भगवान श्रीहरी के आगमन की प्रतीक्षा में माता अधिती अत्यंत प्रसन्नचित और कृतग्य भाव से अपने परम कर्तव्य
14:25की ओर अग्रसर हुई
14:27श्रावन मास के शुकलपक्ष की पावन द्वाजशी तिथी को जब आकाश में श्रवन नक्षत्र का उदे हुआ तब संपूर्ण ब्रहमांड
14:36में एक अलोकिक उर्जा का संचार होने लगा
14:39माता अधिती के पवित्र गर्भग्रे से एक ऐसा तीवर और दिव्यस्वर्ण प्रकाश फूट पड़ा जिसने आश्रम के कणकण को आलोकित
14:48कर दिया
14:49उसी क्षन संपूर्ण स्रिष्टी में एक अत्यंत शीतल और सुगंधित मंद पवन बहने लगी, मानो प्रकृती स्वय उस परम पुरुष
14:58के स्वागत की तयारी कर रही हो
15:01देवलोक में दुन्दुभी और शंक स्वतह ही बजने लगे और अपसराएं एवं गंधर्व आनन्दित होकर नृत्य और गायन करने लगे
15:10ब्रहम लोक में विराजमान चतुरानन भगवान ब्रहमा ने अपनी आखे खोली और स्रिष्टी में व्याप्त इस परम शांती को देखकर
15:19अत्यंत हर्शित हुए
15:21कैलाश परवतपर समाधिस्थ भगवान शिव ने अपनी चेतना को जागरित किया और प्रित्वी की ओर देखते हुए उस आने वाले
15:30अवतार को प्रणाम किया
15:32माता अधिती की कुटिया के भीतर का द्रिश्य अब किसी दिव्य मंदिर के समान दिव्य स्वन आभा और सुगंधित धुए
15:40से भर गया था
15:42अचानक उस तीवर प्रकाश के बीच से चतुर्भुज रूप में भगवान नारायन प्रकट हुए जिनके हाथों में शंक, चक्र, गदा
15:50और पद्म सुशोभित थे
15:52उनके मस्तक पर लगा दिव्यकिरीट मुकुट और वक्षस्थल पर चमकता कौस्तुभ मनी पूरे कक्ष को अपनी दिव्यकिर्णों से चमका रहा
16:01था
16:02इस अध्भुत और तेजों में रूप को देखकर महर्शी कशप भाव विभोर हो गए और हाथ जोड कर अश्रुपूर्ण नेत्रों
16:10से भगवान की स्तुती करने लगे
16:13माता अधिती ने भी अपने समक्ष खड़े साक्षात स्रिष्टी के पालनहार को देखा और उनके मन में मातरित्व और परम
16:21भक्ती का अध्भुत संगम उमर पड़ा
16:24भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ अपने मातापिता को देखा और उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी कठोर तपस्या का
16:33फल देने का समया गया है
16:36मातापिता के देखते ही देखते भगवान का वह विशाल और दिव्य चतुर्भुज रूप धीरे धीरे एक अलोकिक नीले स्वर्ण प्रकाश
16:44पुंज में सिमटने लगा
16:46उस दिव्य प्रकाश पुंज के शान्थ होने पर वहां एक अत्यंत मनमोहक, तेजस्वी और छोटे कद के ब्रहमचारी बालक का
16:55प्राकट्य हुआ
16:56इन छोटे से वामन देव के मस्तक पर सुन्दर जटाएं थी, कंधे पर यग्योप वीथ था और वे अपने हाथों
17:04में एक छोटा छत्र और कमंडल धारन किये हुए थे
17:09आकाश में स्थित देवराज, इंद्र और अन्य देवताओं ने इस अद्भुत वामन रूप को देखकर श्रधापूर्वक उन पर कल्पुरिक्ष के
17:17फूलों की वर्शा की
17:19आश्रम के समीप बहने वाली नदिया अत्यंत निर्मल हो गई और कश्यप मुनी के यग्यकुंड की अगनी बिनाधुएं के अत्यंत
17:27पवित्र होकर प्रजवलित हो उठी
17:30आश्रम के चारों और एकत्र हुए महर्शियों ने वेदमंत्रों का सस्वर पाठ आरंभ कर दिया जिससे संपूर्ण वातावर्ण अत्यंत पवित्र
17:39और मंगलमय हो गया
17:41माता अधिती ने परम आनन्दित होकर उस ननहे तेजस्वी बालक को अपनी गोध में उठा लिया और उनके स्थनों से
17:49वातसल्य की धारा बह निकली
17:52अपने अवतरण के मुख्य उद्देश को पूरा करने के लिए ननहे वामन देव ने हाथ में दंड और छत्र लेकर
17:59धर्म की स्थापना हेतु आगे बढ़ने का संकल्प लिया
18:04धर्म की स्थापना के लिए अपने संकल्प को साकार करते हुए, ननहे वामन देव यग्योपवीत संसकार के लिए सजे हुए
18:12यग्यमंदप की ओर अग्रसर हुए, जहां दिव्य उर्जा प्रवाहित हो रही थी
18:18प्रजापती कश्यप ने अपने पुत्र के अलोकिक रूप को निहारते हुए, अत्यंत श्रद्धा और विधिविधान के साथ यग्योपवीत संसकार की
18:27प्रारंभिक क्रियाओ का आहवान किया
18:30समस्थ देवी देवताओ और रिशियों की उपस्थिती में, तेजस्वी वामन देव ने पूल्न विनमरता और एकाग्रता के साथ धधक्ती पवित्र
18:39अगनी के समक्ष अपना स्थान ग्रहेन किया
18:43वैदिक मंत्रों की गुन्जन से आश्रम गूंध उठा, जैसे स्वयन ब्रहमांड वामन के यग्योपवीत संसकार की दिव्यता का साक्षी बन
18:51रहा हो
18:53कश्य प्रिशी ने विधिपूर्वक वामन के शरीर पर पवित्र यग्योपवीत धारण कराया, जो उनके ब्रहमचर्य और ज्ञान मार्ग पर अग्रसर
19:01होने का प्रतीक था
19:04जैसे ही यग्योपवीत संसकार संपन हुआ, कमलनाभ ब्रहमाजी अपने श्वेत हंस पर आरूड होकर आकाश से अवत्रित हुए, उनके आगमन
19:13से वातावर्ण दिव्यप्रकाश से भर गया
19:17स्रिष्टी के रचिता ब्रहमा ने वामन को पवित्र कमंडल भेंट किया, जो ब्रहमचारी के जीवन में जलके महत्व और त्याग
19:25का प्रतीक था
19:27तत्पश्चात स्वर्ण रथपर आरूड सहसर किर्णों से सुशोभित सूर्य देव आकाश गंगा को चीरते हुए वामन के समक्ष उपस्थित हुए
19:37प्रकाशपुंच सूर्य देव ने वामन को एक दिव्य छत्र भेंट किया, जो उन्हें सभी ताप और बाधाउं से बचाने का
19:44प्रतीक था, और उनके तेज को और भी बढ़ा रहा था
19:49देवराज इंद्र एरावत पर आरूड वजर्धारन किये अपनी दिव्य सेना के साथ स्वर्ग से प्रित्वी पर अवत्रित हुए
19:57गर्व और भव्यता से परिपून इंद्र देव ने वामन को एक दिव्य भिक्षा पात्र प्रदान किया, जो ब्रह्मचारी के भिक्षाटन
20:06धर्म का प्रतीक था
20:08तभी स्वयं प्रित्वी देवी हरितकंचन आभूशनों से सजजित, उश्पों से अलंकरित होकर धर्ती से प्रकट हुई, उनकी उपस्थिती से पूरी
20:17धर्ती धन्य हो उठी
20:20वसुंधरा, प्रित्वी देवी ने वामन को एक पवित्र म्रिक्चर्म प्रदान किया, जो ब्रह्मचारी के सादगी और वनवास जीवन का प्रतीक
20:28था
20:29अन्य सभी देवी देवताओ और रिशियों ने भी वामन को अपने सामर्थ्य अनुसार दिव्य उपहार अर्पित किये, जिससे उनकी महिमा
20:38और भी बढ़ गई
20:41शीतलता के प्रतीक चंद्र देव ने वामन को एक दिव्य श्वेत वस्त्र भेंट किया, जो उनकी पवित्रता और मन की
20:48निर्मलता को दर्शाता था
20:51पवन देव वायु ने अपनी सुक्षम शक्ती का प्रदर्शन करते हुए वामन को एक दिव्य दंड भेंट किया, जो उनके
20:58धर्म यात्रा का सहायक बनेगा
21:01अगनी देव ने अपनी तेजस्विता से परिपूर्ण वामन को पवित्र समिधा, यग्य की लकडिया, अर्पित की, जो उनके यग्य और
21:10तपस्या के लिए आवश्चक थी
21:13वामन देव ने सभी देवताओं और रिशियों के उफारों को अत्यंत विनमर्ता और कृतग्यता के साथ स्विकार किया, और प्रत्येक
21:22भेंट के साथ उनका दिव्य तेज और भी प्रखर होता गया
21:27समस्थ दिव्य भेंटों को धारण कर वामन देव एक तेजस्वी, ज्यानवान और एश्वर्य पूर्ण ब्रहमचारी के रूप में सुशोगित हुए,
21:35जो धर्म के पुनृत्थान के लिए पूर्णता सज्ज थे
21:40उपस्थित समस्थ देवी देवता और रिशियों ने वामन के इस अद्भुत और तेजस्वी रूप को देखकर विस्मय और श्रद्धा से
21:47नमन किया, उनके मुखमंडल पर वामन की लीला का साक्षी बनने का संतोश जलक रहा था
21:54सभी देवताओं से विदा लेकर वामन देव ने अपनी आगामी लीला के लिए पृत्वी लोग की और प्रस्थान किया, उनके
22:02प्रत्येक कदम में ब्रहमांडिय संकल्प की प्रतिध्वनी थी
22:07आकाश गंगाओं और नक्षत्रों को पार करते हुए, वामन देव ने नर्मदा के पवित्र तटों की और अपनी यात्रा जारी
22:14रखी, जहां दैत्यराज बली का अश्वमेध यग्य चल रहा था
22:20इधर नर्मदा के सुरमय तट पर दैत्यराज बली का विशाल अश्वमेध यग्य अपने पूरे वैभव और भव्यता के साथ आरंभ
22:28होने को तट पर था, जिसमें सैक्डों ब्राहमन और रिशी एकत्र हुए थे
22:34दैत्यराज बली अपने सिनहासनासीन स्थान से एक महान समराठ की तरह इस भव्य आयोजन की निग्रानी कर रहे थे, जिनकी
22:43उपस्थिती स्वयन शक्ती और उदार्ता का प्रतीक थी
22:47उनके बगल में दैत्यों के कुल गुरु, शुक्राचार्य, अपनी गेहन विद्या और तपस्या के तेज से प्रजवलित, यग्य की प्रत्येक
22:55प्रक्रिया का सुक्ष्मता से मार्ग दर्शन कर रहे थे
23:00जैसे ही पवित्र अग्नी प्रजवलित हुई और मंत्रों का उद्गोश गूंजने लगा, यग्य शाला में एक अद्भुत आध्यात्मिक उर्जा का
23:08संचार हुआ, जिसने वातावर्ण को दिव्य बना दिया
23:12इसी भव्य आयोजन के मध्य, एक नन्हे ब्रहमचारी के रूप में वामन देव ने दूर से ही यग्यस्थल की गोर
23:19अपने कदम बढ़ाएं, उनके मुख मंडल पर एक अलौकिक मुस्कान थी
23:25अचानक यग्य की सुरक्षा में लगे कुछ दैत्य सैनेकों ने एक अद्वितिय तेज वाले नन्हे बालक को दूर से आते
23:32देखा, जिससे उनके मन में विस्मय और जिग्यासा उत्पन हुई
23:38शीघर ही यह खबर दैत्य राज बली तक पहुँची की एक तेजस्वी दिव्य बालक यग्यस्थल की ओर आ रहा है,
23:45जिसका आगमन असामान्य प्रतीत होता है
23:49अपनी उदारता और आतिथ्य सतकार के लिए प्रसिध बली ने तुरंट अपने प्रमुख मंत्रियों को उस बालक का सम्मान पूर्वक
23:58स्वागत करने और यग्य में लाने का निर्देश दिया
24:02जैसे ही वामन देव ने यग्यशाला में प्रवेश किया, उनकी दिव्य आभा से पूरा वातावर्ण प्रकाशित हो उठा और उपस्थित
24:10जन्मानस उन्हें देख कर विस्मय और श्रद्धा से स्तब्ध रह गया
24:15स्वयन दैत्यराज बली जो तीनों लोकों के अधिपती थे, उस नन्हे ब्रहमचारी के सम्मान में अपने स्वर्ण सिनहासन से उठ
24:24खड़े हुए, यह उनके महान हृदय का परिचायक था
24:28बली ने विनमरता पूर्वक वामन देव का स्वागत किया, उन्हें अपने पास बुलाकर उनके चरण धोये, जो किसी भी अतिथी
24:37के लिए सर्वोच्छ सम्मान का प्रतीक था
24:40अपने राजसी आसन के समीट, बली ने वामन देव को एक विशेश सम्मान जनक स्थान पर बिठाया, मानोवे साक्षात परमिश्वर
24:49का आदर कर रही हूँ
24:51वामन देव के अलौकिक तेज और शान्त मुद्रा से मोहित होकर, बली ने हाथ जोड़कर उनसे पूछा की वे क्या
24:59इच्छा रखते हैं, और वे उसे पूरा करने को तयार हैं
25:04वामन देव ने बली की ओर अपनी शान्त, गहरी द्रिष्टी डाली, उनकी आखों में ब्रहमांडिय ज्यान और लीला का एक
25:12अवर्णनिय भाव था, जो अब अपनी बात कहने को तयार थे
25:17अपनी मधुरवानी में वामन देव ने सर्वप्रथम बली के महान पूर्वजों की प्रशंसा की, उनकी दानशीलता और धर्म प्रायंता को
25:26सराहा, जिससे बली का हृदय गर्व से भर गया
25:30वहीं गुरु शुक्राचारिय अपनी योगिक ग्रिष्टी से उस नन्हे ब्रहमचारी को अत्यंत सावधानी से देख रहे थे, उनके मस्तिश्क में
25:39एक अंजानी आशंका का बीज अंकुरित हो रहा था
25:43अपनी प्रशंसा के बाद वामन देव ने अत्यंत विनमरता पूर्वक बली से कहा कि उन्हें दान में केवल इतनी भूमी
25:51चाहिए, जितनी उनके छोटे से तीन कदमों से मापी जा सके
25:56हे दानवीर राजन वामन देव ने कहा, मुझे अपने लिए केवल तीन पक भूमी चाहिए, जिसे मैं अपने छोटे चर्णों
26:05से माप सकू, यहीं मेरी एक मात्र इच्छा है
26:09ननहे ब्रहमचारी वामन देव की तीन पक भूमी की तुछ मांग सुनकर राजा बली मुस्करा उठे और इसे अपने दानवीर
26:17स्वरूप का अनादर समझने लगे
26:20बली ने अत्यंत स्वाभिमान से कहा कि वेत्रिलोग के स्वामी हैं, इसलिए वामन देव को तीन पक के बजाए विशाल
26:28द्वीप, स्वर्ण, गाएं या पूरा राज्य मांगना चाहिए
26:33भगवान वामन ने मुस्कुराते हुए राजा बली को समझाया कि जो पुरुष अपनी इंद्रियों को शांत नहीं रख पाता, वह
26:40पूरे ब्रहमांड को पाकर भी असंतुष्ठ ही रहता है
26:45वामन देव के इस परम ज्यानवर्धक उत्तर को सुनकर दैत्यराज बली का हरदय उस छोटे से बटुक के प्रती अपार
26:53श्रद्धा और आदर से भर गया
26:56राजा बली ने बिना किसी संकोच के वामन देव की इच्छा पूरी करने का संकल्प लेते हुए दान का जल
27:03अर्पित करने के लिए अपना स्वर्ण कलश उठा लिया
27:07किन्तु तभी गुरु शुक्राचार्य ने अपनी सुक्ष्म द्रिष्टी से वामन रूपी छल को पहचान लिया और वे बली का हाथ
27:14रोकने के लिए तेजी से आगे बढ़े
27:18शुक्राचार्य ने बली के कान में गुप रूप से चेतावनी दी कि यह कोई साधारन बालत नहीं बलकि स्वयन साक्षात
27:25भगवान नारायन है जो छल से तुम्हारा सब कुछ छीनने आये हैं
27:31गुरु ने आगाह किया कि यह नन्हा ब्रह्मचारी दो ही पग में पूरी धर्ती और आकाश नाप लेगा और तीसरे
27:39पग के लिए तुम्हारे पास कुछ शेश नहीं रहेगा
27:43शुक्राचार्य ने बली को परामर्ष दिया कि वे अपने वचन से पीछे हट जाएं और इस दान को देने से
27:50साफ इनकार कर दें ताकि उनका राज्य सुरक्षित रहे
27:55राजा बली कुछ क्षणों के लिए मौन हो गए उनका मन धर्म सत्य और अपने गुरु की आग्या के बीच
28:02एक प्रचंड द्वंधों में उलज गया
28:05अंतह बली ने अपने गुरु से विनमरता पूर्वक कहा कि प्रहलाद का वंशज होने के नातेवे कभी भी असत्य का
28:12सहारा लेकर अपने दिये वचन से नहीं मुकर सकते
28:17बली ने गर्व से कहा कि यदि स्वय जगतपालक विश्णु मेरे द्वार पर याचक बन कर आये हैं तो उन्हें
28:23दान देना मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य होगा
28:28राजा बली द्वारा अपनी आग्या की अभेलना होते देख महर्शी शुक्राचार्य का क्रोध अपनी सीमाओं को लांध गया और उनकी
28:37आखें अंगारों की भांती जलने लगी
28:40क्रोधित होकर शुक्राचार्य ने बली को भयंकर शुराप दिया की गुरु का अनादर करने के कारण तुम्हारा समस्ट एश्वर्य, राज्य
28:49और धन संपदा शीघर ही नश्ट हो जाएगी
28:52श्राप मिलने के बाद भी राजा बली के मुख मंडल पर रत्ती भर भी भाय नहीं आया और वे अपने
28:59धर्म पर अडिग रहते हुए शांत बने रहे
29:02उसी समय बली की पतिवर्ता पत्नी महारानी विंध्यावली रत्नजडित स्वन परात लेकर वामन देव के चरण धोने के लिए आगे
29:11बढ़ी
29:12राजा बली ने अत्यंत श्रधा पूर्वक वामन देव के छोटे-छोटे कमल रूपी चरणों को धोया और उस पवित्र जल
29:20को अपने और अपनी पत्नी के शीश पर छिड़का
29:24वामन देव ने मुस्कुराते हुए बली की इस निश्चल भक्ती और सत्यनिष्ठा को स्विकार किया जिससे पूरा यग्यमंडप अलोकिक कांती
29:33से जगमगा उठा
29:35चरण वंदना के पश्चात राजा बली ने फिर से स्वर्ण कलश हाथ में लिया ताकि वे तीन पक भूमी दान
29:42करने का अंतिम जल संकल्प पूर्ण कर सकें
29:46जैसे ही जल की धारा वामन देव की हथेली पर गिरी दसों दिशाएं कांप उठीन और ब्रहमांड में एक नए
29:53महाचमतकार का आगाज होने लगा
29:57जैसे ही संकल्प का पवित्र जल वामन देव की हथेली को स्पर्श करता है उनके बाल रूप से एक अत्यंत
30:04तीवर और अलौकिक प्रकाश पुन्च फूट पड़ता है जो संपूर्ण यग्यशाला को चमका देता है
30:11राजा बली अपनी आखों के सामने होते इस महा प्रिवर्तन को देख कर जड रह जाते हैं क्योंकि वह नन्हा
30:19ब्राहमन बालक अब पलपल विस्मयकारी रूप से विशाल होने लगा है
30:24दैत्य गुरु शुक्राचार्य का हरिदय अज्यात भय से काम्प उठता है और वे समझ जाते हैं कि यह कोई साधारन
30:32बालक नहीं बलकी स्वयन स्रिष्टी के स्वामी नारायन है
30:37वामन देव के कोमल चरण अब ब्रहमांडी अगती से बढ़ने लगते हैं और जैसे ही वे यग्यभूमी पर ग्रिड़ता से
30:44टिकते हैं धर्ती गहरे कमपन से डोल उठती है
30:49बालक का सौमे मुखमंडल अब अनंत कोटी सूरियों के समान दीप्तिमान हो उठता है जिसमें संपूर्ण चराचर ब्रहमांड की भव्यता
30:58समाहित दिखाई देती है
31:00उस विराट शरीर से अनेक दिव्यभुजाएं प्रकट होती हैं जिन में सुदर्शन चक्र, पांच जन्य शंक, कौमोद की गदा और
31:09नंदक खड़क जैसे अचूक अस्त्रशस्त्र चमकने लगते हैं
31:14आकाश के मेग छिन्न भिन्न हो जाते हैं और इंद्र सहित समस्त देवगण स्वर्ग से इस महाविस्तार को देखकर अत्यंत
31:22भाव विहवल होकर हाथ जोड लेते हैं
31:25अब त्रिविक्रम का महाकाय रूप इस प्रिथवी को अत्यंत छोटा बना देता है उनका निचला हिस्सा भूलोक को और धड़
31:33अंतरिक्ष को पूरी तरह से ढख लेता है
31:37राजा बली भाई को त्याग कर अपने आराध्य के इस अनुपम विराठ स्वरूप के सामने पूर्ण शर्णागती के भाव से
31:45घुटनों के बल बैठ जाते हैं
31:48त्रिविक्रम अपना बाया चरण अत्यंत सहज्ता से उठाते हैं जो पल भर में वायुमंडल और बादलों को चीरते हुए सीधे
31:56आकाश गंगा की उचाईयों की ओर बढ़ जाता है
32:00उनका विशाल चरण सत्यलोक में पहुँचता है जहां श्वेत कमल पर विराजमान स्रिष्टी के रचिता ब्रह्मा अत्यंत प्रसन्निता से भगवान
32:10का स्वागत करते हैं
32:12पितामा ब्रह्मा अपने कमंडलू के पवित्र जल से त्रिविक्रम के अंगूठे का प्रक्षालन करते हैं जिससे पूरा सत्यलोक दिव्यमंत्रों चार
32:21से गुंजायमान हो उठता है
32:24वह चरण प्रक्षालिक जल ही दिव्यमंदाकिनी गंगा का रूप धारन कर लेता है जो तारों और नक्षत्रों के मार्ग से
32:32होती हुई स्वर्ग की ओर बहने लगती है
32:36प्रथम पग से संपून प्रिथ्वी और स्वर्गलोक को मापने के बाद भगवान त्रिविक्रम दूसरे पग के विस्तार के लिए अपनी
32:44स्थिती बदलते हैं
32:46उनका दूसरा पग तीवर गती से नीचे की ओर बढ़ता है और पाताल तथा रसातल सहित दैतियों के सभी अधोलोकों
32:55को अपने दाएरे में ले लेता है
32:58यग्यशाला में उपस्थित असुरसैनिक भयभीत और क्रोधित होकर अपने अस्त्र शस्त्र उठा लेते हैं परन्तु त्रिविक्रम के तेज से वे
33:07तुरंत ही जड़ हो जाते हैं
33:10त्रिविक्रम का विशालकाय और प्रदीप्त पैर पूरे ब्रहमांड को आच्छादित कर देता है जिससे पूरी स्रिष्टी में कहीं भी कोई
33:18स्थान खाली नहीं बचता
33:19अब महाप्रभुत्र विक्रम अपनी द्रिष्टी नीचे जुकाते हैं और बादलों के बीच से उनकी गर्जना जैसी गंभीर आवाज राजा बली
33:29के कानों में गूझती है
33:32भगवान कहते हैं हे दानवीर बली
33:35मेरे दो पगोंने तो संपूर्ण प्रिथवी, स्वर्ग और पाताल को माप लिया है अब बताओ मैं अपना तीसरा पक कहा
33:43रखूँ
33:44बिना किसी संकोच के, राजा बली अपनी आखों में भक्ती के आसू भर कर मुस्कुराते हैं और अपने सिर को
33:52ही भगवान के तीसरे पैर के लिए समर्पित कर देते हैं
33:57जैसे ही राजा बली अपना मस्तप जुकाते हैं, महा प्रभुत रिविक्रम अपना तीसरा दिव्य चरण उनके सिर पर रखने के
34:05लिए उठाते हैं और पूरा ब्रहमांड इस अध्भुत द्रिश्य को थाम कर देखने लगता है
34:11इस महास्मरपन को देखकर दैत्यगुरु शुक्राचार्य अत्यंत क्रोधित और चिंतित होकर आगे बढ़ते हैं और राजा बली को चेतावनी देते
34:21हैं कि यह दानवकुल का अंत करने की भगवान की लीला है
34:26शुक्राचार्य बली का हाथ पकड़कर उन्हें संकल्प का जल छोड़ने से रोकने का प्रयास करते हैं और अपनी मायावी शक्तियों
34:34से कमंडलू के मुख में जाकर बैठ जाते हैं
34:38भगवान वामन जो सर्वव्यापी हैं शुक्राचार्य की इस चेश्टा को जानकर एक कुशा धास का तिनका उठाकर कमंडलू की टोंटी
34:48में डाल देते हैं जिससे शुक्राचार्य की एक आख फूट जाती है
34:53कमंडलू से बाहर निकल कर शुक्राचार्य अत्यंत पीड़ा में अपनी आख पकड़ते हैं और क्रोधवश बली को श्रीहीन तथा राज्यहीन
35:02होने का भयंकर श्राप दे देते हैं
35:06गुरू के इस घोर श्राप से विचलित हुए बिना राजा बली अटूट श्रद्धा के साथ कहते हैं कि नारायन के
35:13हाथों सब कुछ खो देना भी संसार के किसी भी राज्य को पाने से श्रेष्ट है
35:19तब स्वर्ग से परमभक्त प्रहलाद प्रकट होते हैं और अपने पौत्र बली के इस अग्वितिय त्याग और धर्म निष्ठा को
35:27देखकर गर्व से उनके मस्तक पर पुष्प वर्शा करते हैं
35:32अब भगवान त्रिविक्रम अपना अत्यंत प्रकाशमान और ब्रहमांडिय चरण राजा बली के मस्तक पर रखते हैं जिससे दिव्य प्रकाश की
35:41किर्णे दसों दिशाओं में फैल जाती हैं
35:45जैसे ही प्रभु का चरण बली के मस्तक को स्पर्श करता है बली का अहंकार पूर्णत भस्म हो जाता है
35:52और वे पाताल लोग की गहराईयों की ओर धीरे-धीरे जाने लगते हैं
35:57राजा बली के इस पतन को देख कर कुछ उग्र असुर क्रोधित होकर भगवान पर आक्रमन करने के लिए अपनी
36:05तलवारें और गदाएं उठा लेते हैं
36:08लेकिन पाताल जाते-जाते भी राजा बली अपने सैनिकों को रोकते हैं और आदेश देते हैं कि वे भगवान की
36:16इच्छा का सम्मान करें और शस्त्रन न उठाएं
36:20भगवान त्रिविक्रम अब अपने विराट रूप को समेट कर अपने परम मनमोहक चतुर्भुज शंक्च क्रगदाधारी नारायन रूप में प्रकट होते
36:29हैं
36:31भगवान नारायन मुस्कुराते हुए पाताल के सबसे सुन्दर और सम्रिध लोक सुतल लोक का निर्मान करते हैं जो स्वर्ग से
36:39भी अधिक वैभवशाली और सुरक्षित है
36:43भगवान विश्णु स्वयन सुतल लोक में प्रकट होते हैं और राजा बली से कहते हैं कि वे उनकी अनन्य भक्ती
36:51और त्याक से अत्यंत प्रसन्न है
36:54वर्दान स्वरूप भगवान विश्नु घोषणा करते हैं कि वे स्वयन सदा के लिए राजा बली के महल के द्वारपाल बनेंगे
37:02और उनके राज्य की रक्षा करेंगे
37:04इस अद्भुत द्रिश्य को देखकर देवराज, इंद्रक और सभी देवता स्वर्ग में अत्यंत हर्शित होते हैं और प्रित्वी तथापाताल पर
37:14दिव्य फूलों की वर्शा करने लगते हैं
37:18देवी लक्ष्मी भी वहां प्रकट होती हैं और राजा बली को उनकी अपार दानवीर्ता के लिए आशिरवाद देती हैं जिससे
37:26सुतल लोक सदा के लिए समरिध्धी से भर जाता है
37:30गुरु शुक्राचार्य भी भगवान की इस असीम क्रिपा को देखकर अभिभूत हो जाते हैं और अपनी भूल स्विकार करते हुए
37:39भगवान विश्नु के चर्मों में शीष जुकाते हैं
37:43देवर्शी नारद अपनी वीना बजाते हुए तीनों लोकों में राजा बली की कीर्ती और भगवान की इस अद्भुत लीला का
37:50गान करने लगते हैं
37:53इस प्रकार भगवान का वामन अवतार न केवल देवताओं के कल्यान के लिए बलके राजा बली को अमर ख्याती और
38:01अपना परम सानिध्य प्रदान करने के लिए सिध्ध हुआ
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