श्रीमद्भागवत पुराण के 37वें अध्याय में देखिए दैत्यराज हिरण्यकशिपु के अत्याचार की पराकाष्ठा और भगवान नरसिंह के अलौकिक प्राकट्य की गाथा! जब प्रह्लाद ने अपने असुर सहपाठियों को भागवत धर्म और नवधा भक्ति का संदेश दिया, तो हिरण्यकशिपु का क्रोध सीमा लांघ गया। जानिए कैसे जलती हुई अग्नि में होलिका का दहन हुआ और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। जब अहंकार में अंधे दानवराज ने खंभा तोड़कर हरि की मौजूदगी पर सवाल उठाया, तब ब्रह्मांड को कंपा देने वाली गर्जना के साथ प्रकट हुए भगवान नरसिंह! संध्याकाल में, चौखट पर, न नर न पशु रूप में प्रभु ने कैसे हिरण्यकशिपु का वध कर ब्रह्माजी के वरदान का मान रखा और धर्म की स्थापना की, जानिए इस भव्य एपिसोड में। #BhagavataPurana #NarasimhaAvatar #Prahlada #HinduMythology #SrimadBhagavatam
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00:00प्रातर काल की बेला में दैत्यों की पाठशाला में गुरु शंड और अमर्क कुछ घरेलू कारियों के लिए निकलने की
00:07तैयारी में व्यस्थ थे, अपने चहरे पर दिंचर्या की थकावट और आने वाले कारियों की चिंता लिए हुए थे.
00:14अमर्क ने शंड को कुछ अंतिम निर्देश दिये, अपने गंभीर स्वर में पाठशाला की व्यवस्था और दैत्य पुत्रों की अनुशासन
00:22हींता पर संक्षिप्ट चिंता व्यक्त करते हुए, इससे पहले की दोनों अपने महत्वपूर्ण कारियों के लिए प्रस्थान क
00:31उनकी पीठ मुर्ते ही, युवा प्रहलाद अपने दिव्यशान्ति पूर्ण मुद्रा में शिक्षकों के जाने का अवलोकन कर रहे थे, उनके
00:39चहरे पर एक योजना की हलकी सी जलक और भीतर एक अटल संकल्प चमक रहा था
00:46शिक्षक के दूर जाते ही, प्रहलाद ने अपने दैत्य सहपाठियों की ओर मुड़ा, जिनकी आखों में शैतानी चमक थी और
00:54जो अब कक्षा में अराजकता फैलाने के लिए उच्शुक थे, लेकिन एक नई आवास सुनने को तयार नहीं थे
01:02एक क्षण के लिए मौन चा गया, फिर प्रहलाद ने अपनी सौमय और स्पष्ट वानी में उन्हें एक नई कथा
01:09सुनने के लिए आमंत्रित किया, जो उनके मन को मायावी जगत से परे ले जाने का वादा करती थी
01:17प्रहलाद की शांत और द्रिड आवाज ने शैतानी खेलों की उनकी इच्छा को क्षण भर के लिए शांत कर दिया,
01:24और युवादैत्य पुत्र धीरे-धीरे उनके चारों और इकठा होने लगे, उनके चेहरों पर एक अनकही जिग्यासा ज़लक रही थी
01:33फिर प्रहलाद ने अपनी मधुरवाणी में सांसारिक धन और भौतिक सुखों की क्षण भंगुर्ता के बारे में बात करना शुरू
01:41किया, यह समझाते हुए कि वे कैसे एक मायावी जाल हैं जो आत्मा को बांधते हैं
01:48उन्होंने समझाया कि भौतिक संपत्तीक्षणिक है, जबकि आत्मा अमर और अविनाशी है, एक सत्य जो इंद्रियों की सीमाओं से परे
01:58हैं
01:59धीरे धीरे उन्होंने भागवत धर्म के शाश्वत सिधानतों का परिचय दिया, भगवान विश्णों के प्रती निस्वार्थ भक्ती के मार्क को
02:08उजागर करते हुए, जो सभी बंधनों से मुक्ती दिलाता है
02:13उन्होंने भगवान विश्णों की महिमा का वर्णन किया, उनके असीम प्रेम, सार्वभामिक प्रभुत्व और प्रत्येक प्राणी में व्याप्त उनकी सर्वव्यापी
02:22उपस्थती का, जो सभी दुखों का अंत करती है
02:27आरंभ में दैत्य पुत्रों की आखे भ्रम और अविश्वास से भरी थी, उनके छोटे छोटे दिमाग प्रहलाद के बताये गए
02:35दिव्य सत्य को समझने के लिए संधर्श कर रहे थे, जो उनकी राक्षसी शिक्षाओं से बिलकुल विप्रीत था
02:43प्रहलाद ने धैर्य पूर्वक उनकी चिन्ताओं को सुना और अपने सरल शब्दों से उन्हें उत्तर दिया
02:49सहज दृष्टान्तों का उप्योग करते हुए यह समझाने के लिए कि भगवान की भक्ती कैसे सभी समस्याओं का समाधान है
02:59उन्होंने उन्हें समझाया कि सच्ची खुशी भौतिक इच्छाओं की पूर्ती में नहीं बलकी परम प्रभु की सेवा और उनके प्रती
03:07अटूट प्रेम में नहिट है जो एक स्थाई आनंद प्रदान करता है
03:12जैसे ही प्रहलाद ने अपने शब्दों में भक्ती और प्रेम की गहराई बुनी कुछ बच्चों के सक्ट चहरे धीरे-धीरे
03:20नरम पढ़ने लगे उनकी आखों में एक नया अवर्णनिय आकर्शन चमक उठा
03:26प्रहलाद ने उन्हें भगवान के पवित्र नामों का जाप करने का अभियास सिखाया
03:31समझाते हुए कि कैसे यह सरलकृत्य भी आत्मा को शुद्ध कर सकता है और सर्वोच्च सत्य से जोर सकता है
03:40कुछ दैत्य पुत्रों ने हिचकी चाते हुए लेकिन जिग्यासा से भर कर भगवान के नामों को दोहराने का प्रयास किया
03:48उनकी असपष्ट आवाजें दिव्यध्वनियों से धीरे-धीरे जुरने लगी
03:53उनकी प्रारंभिक हिचकी चाहट धीरे-धीरे पिघल गई एक नई शांती और विस्मय की भावना ने उन्हें घेर लिया
04:00जैसे उनके हृदय अज्यात भक्ती के स्पर्ष से जागरित हो रहे थे
04:06एक समय जो चंचल शरार्तों से भरा था अब वह दिव्यध्वनियों से गूँज रहा था
04:11थोटे दैत्य पुत्रों के शुद्धरिदै से भगवान विश्नु के नाम की मधुर गूँज उठ रही थी
04:18अचानक बाहर से शंड और अमर्क के कदमों की हलकी आहट सुनाई दी उनके वापस आने की सूचना देते हुए
04:26जिससे पाठशाला के भीतर की शांत भंग हो गई
04:30दैत्य पुत्रों ने घबरा कर अपनी सीटों पर वापस लोटने की कोशिश की अपने नए मिले भक्तिभाव को छिपाते हुए
04:38जबकि प्रहलाद शांत और अविचलित बने रहे उनकी आत्मा में कोई भय नहीं था
04:44शंड और अमर्क ने पाठशाला के द्वार से प्रवेश किया
04:48उनकी पैनी आखे भीतर के अजीब सन्नाटे और दैत्य पुत्रों के बदले हुए व्यवहार को भाप गई
04:56उनकी आखों में संदेह था
04:58जब उन्होंने अपने चात्रों से पूछा कि वे इतने शांत क्यों है और उनकी शिक्षाओं का अभ्यास क्यों नहीं कर
05:05रहे हैं
05:07दैत्य पुत्रों ने अपने डर से कोई उत्तर नहीं दिया
05:11उनकी आखें नीचे जुकी हुई थी और उनकी आत्मा में भक्ती की एक नई भावना दबी हुई थी
05:19क्रोधित होकर शंड और अमर्क ने पाठशाला के शांत और अविचल केंदर प्रहलाद की ओर मुरे जहां से यह सारा
05:26प्रभाव उत्पन हुआ था
05:29शंड ने कठोरता से पूछा हे प्रहलाद हमें बताओ कि इन सब बच्चों ने अपनी दैत्य शिक्षा क्यों छोड़ दी
05:36और यह अजीव शांती कहां से आई है
05:40प्रहलाद ने बिना किसी भय के उत्तर दिया कि उन्होंने अपने सहपाथियों को भगवान विश्णू की महिमा और सच्ची भक्ती
05:48के मार्क के बारे में सिखाया है
05:51यह सुनकर शंड और अमर्क का क्रोध और भी बढ़ गया उनके दैत्य चहरे भीशन और लाल हो गये क्योंकि
05:59उन्हें लगा कि उनके शिक्षण का अपमान हुआ है
06:03अमर्क ने अपनी गदा उठा कर प्रहलाद को धमकाया और उसे विश्णू भक्ती तुरंट त्याग देने का आदेश दिया
06:11नहीं तो भयानक परिणाम भुगतने की चेतावनी दी
06:15प्रहलाद ने शांत स्वर में कहा गुरुवर मैंने नवधा भक्ती के माध्यम से सीखा है कि भगवान का नाम सुनना
06:23श्रवनम और उनका गुनगान करना कीर्टनम ही परम आनंद का मार्ग है
06:29शंड ने उफास करते हुए हस्तक शेप किया यह सब निरर्थक है
06:35तुम्हारे पिता हिरन यक्षिपु ने स्वयं को तीनों लोकों का स्वामी घोशित किया है वही सर्वोच सत्ता है
06:44प्रहलाद ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा भगवान को सदैव स्मरण करना, स्मर्णम और उनके चर्णों की सेवा करना
06:52पादसेवन भी हमें मुक्ती की ओर ले जाता है
06:57युवा दैत्य पुत्रों ने प्रहलाद के प्रत्येक शब्द को सुना, उनके मन में डर और उच्सुकता के बीच एक आंतरिक
07:04ग्वंद्व चल रहा था
07:06प्रहलाद ने स्पष्ट किया, नारायन केवल स्वर्ग में नहीं, बलकि हर जीवित हृदय में निवास करते हैं, कणकण में उनकी
07:15उपस्थती है
07:17उनके लिए अर्चनम, पूजा करना, वंदनम, प्रणाम करना, और दास्यम, सेवा करना ही जीवन का सबसे शुद्ध और आनंदमय उद्देश
07:26है, प्रहलाद ने द्रिड़ता से समझाया
07:30उन्होंने आगे कहा, सच्ची मित्रता, सक्यम और अन्ता पूर्ण आत्मस्मरपन, आत्मनिवेदन भी हमें उस शाश्वत सुख तक पहुँचाता है, जो
07:40दैक्यबल से परे है
07:43शंड और अमर्क ने प्रहलाद के शब्दों को हिरन्यक्षिपु के राज्य के लिए एक सीधी चुनौती के रूप में देखा
07:50और उनका क्रोध अब अनियंत्रत हो गया
07:53उनकी आखों से आग बरस रही थी और वे गर्जना करते हुए प्रहलाद की ओर बढ़े उसे दैत्यगुरू के आदेशों
08:01की अवग्या करने के गंभीर परिनामों की याद दिलाते हुए
08:06परंतु प्रहलाद अपने स्थान पर अटल रहे, उनके चहरे पर कोई भय नहीं था, उनकी भक्ती की शक्ती उनके चारों
08:14और एक अद्रिश धाल बन गई थी
08:17शंड और अमर्क ने महसूस किया कि वे प्रहलाद को अपने तरीके से नहीं समझा सकते और क्रोधित होकर उसे
08:25हिरन्यक्षिपू के पास ले जाने का निरने लिया
08:29उन्होंने प्रहलाद को कठोरता से पकड़ कर उस पाठशाला से बाहर घसीटना शुरू किया
08:35एक ऐसे भाग्य की ओर जहां उसके पिता का क्रोध उसकी निश्ठा की परीक्षा लेने वाला था
08:42उनकी अनुपस्थिती में पाठशाला में एक अजीव सी खामोशी चा गई जहां अब प्रत्येक युवादैत्य पुत्र के हिरिदय में भक्ती
08:50का एक सुक्ष्म बीज बोया जा चुका था
08:54उनकी अनुपस्थिती में पाठशाला में एक अजीव सी खामोशी चा गई जहां अब प्रत्येक युवादैत्य पुत्र के हिरिदय में भक्ती
09:02का एक सुक्ष्म बीज बोया जा चुका था
09:06तभी एक ननहा दैत्य बालक जिसका मन अभी भी प्रहलाद की मधुर वानी से गुझाय मान था धीमे से नारायन
09:14नाम का उच्चारण करने लगा
09:16उसके स्वर की पवित्रता सुनकर पास बैठा एक और बालक जो अब तक संशय में था धीरे धीरे उस मन्त्रो
09:24चार में शामिल हो गया
09:26फिर एक एक करके पूरा दैत्य दल जो कभी अहंकार के गीत गाता था अब भगवान नारायन के नाम से
09:34गुझ उठा
09:36उधर क्षंड और अमर्क कुछ देर बाद लोट रहे थे यह सूचते हुए कि प्रहलाद के दंड से अब बच्चे
09:43शान्थ हो गए होंगे
09:45जैसे ही वे पाठशाला के द्वार के समीप पहुँचे उनके कानों में एक अप्रिचित येट पवित्र ध्वनी पड़ी जिसने उन्हें
09:53स्तब्ध कर दिया
09:55वे अविश्वास से पाठशाला के भीतर कदम रखे और जो द्रिश उन्होंने देखा वह उनके सबसे भयानक नाइटमेर्स से भी
10:04बढ़ कर था
10:05प्रत्येक दैत्य पुत्र जिसकी शिक्षा उन्हें असुर धर्म में करनी थी अब विश्णु के नाम का जाप कर रहा था
10:13और गुरुओं के चहरे पर भय और अविश्वास की गहरी लकीरें खिंच गई
10:18शंड ने क्रोध और घबराहट में चिलाते हुए बच्चों को शांत करने का प्रयास किया लेकिन उसकी आवास उस पवित्र
10:26गूज में खो गई
10:28अमर्क ने महसूस किया कि यह केवल प्रहलाद का प्रभाव नहीं था बलकि यह भक्ती की एक ऐसी लहर थी
10:36जिसने पूरे विद्ध्यालय को अपनी चपेट में ले लिया था
10:40दोनों गुरू ने एक दूसरे की ओर देखा उनकी आखों में एक ही प्रश्ण था यह सब हिरन्यक्षिपू को कैसे
10:48बताया जाए
10:50बिना एक पल गवाए उन्होंने ततकाल दैत्यराज हिरन्यक्षिपू को इस अन्होनी घटना की सूचना देने का निर्णय लिया
10:58वे महल के विस्तरित गलियारों से होकर तीजी से भागने लगे उनके मन में केवल हिरन्यक्षिपू का क्रोध और उसकी
11:06भयावः प्रतिक्रिया का डर था
11:09अंत्ह वे राजदर्बार के भव्य प्रवेश द्वार पर पहुँचे जहां हिरन्यक्षिपू अपनी महीमा में विराजमान था
11:18हिरन्यक्षिपू एक विशालकाय मानसल दैत्यराज अपनी भव्यता और क्रूरता का प्रतीक अपने काले सुनहरे सिनहासन पर आसीन था
11:27उसकी आखें आग की लप्टों सी धधक रही थी
11:31दर से कापते हुए शंड और अमर्क तुरंत उसके सामने साश्टान प्रणाम करने के लिए जुके उनके माथे ठंडी संगमर्मर
11:39की फर्ष को छू रहे थे
11:42हिरन्यक्षिपू ने अपनी गहरी गर्जनापूर्ण आवाज में पूछा क्या हुआ है
11:48तुम दोनों इतने भयभीत क्यों लग रहे हो उसकी आवाज में एक छिपा हुआ खत्रा था
11:55शंड ट्रेंबलिंग वॉइस में मुश्किल से बोल पाया
11:59अमर्क ने हिम्मत बटोरते हुए जोड़ा
12:03जैसे ही ये शब्ध हिरन्यक्षिपू के कानों में पड़े उसकी आखें और भी लाल हो गई
12:08और उसके चहरे पर एक भयानक क्रोधित एक्स्प्रेशन उभराया जो इम्मिनेंट विनाश का संकेत था
12:17हिरन्यक्षिपू का क्रोध एक जलते हुए ज्वाला मुखी की तरह फटा
12:21जिससे पूरा दर्बार थर्रा उठा और उसकी गर्जना आकाश में एक अशुब प्रतिध्वनी बन गई
12:28उसने अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि तुरंत प्रहलाद को उसके समक्ष लाया जाए
12:34मानो वह एक ऐसे अपराधी को बुला रहा हो जिसने राज्य के सबसे बड़े नियम का उलंधन किया हो
12:41कुछ ही क्षणों में बालक प्रहलाद को शाही सैने को द्वारा सभा में लाया गया
12:47जहां वह अपने पिता के भयानक क्रोध के सामने भी शांत और अडिक खड़ा रहा
12:53हिरन्यक्षिपुने अपने पुत्र को घ्रेना से देखा
12:56उसकी आखों में उस विश्वासखात का दर्थ था जिसे वह अपनी परमसत्ता के खिलाफ एक चुनोती मानता था
13:04अरे मूर्ख तुने मेरे आदेशों की अभहेलना की है और मेरे सबसे बड़े शत्रु विश्नु का नाम जपना जारी रखा
13:13है
13:13हिरन्यक्षिपु ने एक दहार के साथ कहा जिससे दर्बार की दीवारे भी काम उठी
13:20प्रहलाद ने शांत भाव से उत्तर दिया है पिताजी भगवान विश्नु ही परमसत्य है और उनकी भक्ती से ही मोक्ष
13:28प्राप्थ होता है
13:30पुत्र के इस अडिग उत्तर ने हिरन्यक्षिपु के क्रोध को और भी भड़का दिया और उसने कसम खाई कि वह
13:37प्रहलाद के शरीर से विश्नु भक्ती को जड़ से मिटा देगा
13:42आज मैं तुझे अगनी की परीक्षा दूँगा जहां तेरी यह विश्नु भक्ती जल कर राख हो जाएगी हिरन्यक्षिपु ने एक
13:50भयानक मुस्कान के साथ घोशित किया
13:53उसने अपनी बेहन होलिका को बुलाया जिसे एक वर्दान प्राप्ट था कि अगनी उसे कभी जला नहीं सकती थी
14:02होलिका हिरन्यक्षिपु ने आदेश दिया इस बालक को अपनी गोद में लेकर अगनी में बैठ जा ताकि इसकी मूर्खता पूर्ण
14:10भक्ती का अंथ हो
14:13होलिका ने एक क्रूर मुस्कान के साथ सहमती दी उसके मन में अपने वर्दान पर पूर्ण विश्वास था कि अगनी
14:20उसे चूभी नहीं पाएगी
14:23पूरे रज्ज में एक विशाल चिता का निर्मान किया गया जहां लकडियों का धेर आकाश को चूने लगा और धुआ
14:30बादलों को भेदने लगा
14:33प्रहलाद को चिता के पास लाया गया जहां वह दिव्यशान्ती के साथ मुस्कुरा रहा था जैसे उसे पता हो कि
14:40कोई भी अगनी उसे हानी नहीं पहुँचा सकती
14:44हुलिका ने प्रहलाद को अपनी गोद में बैठाया और आत्म विश्वास से दहक्ती हुई चिता में प्रवेश किया यह सोचकर
14:52कि वह भगवान विश्नु के भक्त को आसानी से परास्त कर देगी
14:57अगनी ने पूरी शक्ती से चिता को अपनी लप्तों में ले लिया और देखते ही देखते वह एक भयंकर नार्किये
15:04ज्वाला में बदल गई जिसकी गर्माहट दूर दूर तक महसूस की जा सकती थी
15:10जैसे जैसे अगनी प्रचंड हुई प्रहलाद के चारों और एक दिव्य शीतल आभा बढ़ने लगी जो उसे हर प्रकार की
15:19गर्मी से बचा रही थी
15:21उसी क्षण होलिका के वर्दान की शक्ती कम होने लगी क्योंकि भगवान की इच्छा से कोई भी माया या छल
15:28स्थाई नहीं रह सकता
15:31भईभीत होकर वोलिका ने अपनी गोध से प्रहलाद को हटाने की कोशिश की पर तब तक बहुत देर हो चुकी
15:38थी क्योंकि अगनी ने उसे अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया था
15:44भगवान की अध्भुत लीला से वोलिका स्वय अगनी में भस्म हो गई जबकी प्रहलाद भगवान विश्णु के नाम का जाप
15:52करते हुए बिलकुल अक्षोन और सुरक्षित रहा
15:55जब चिता की लप्टे शान्थ हुई तो प्रहलाद उसी पवित्र मुस्कान के साथ राख के ढेर के बीच से एक
16:03दिव्य जोती की तरह बाहर आया मानो वह अगनी से जन्मा हो
16:08हुलिका की राख और प्रहलाद की दिव्य चमक को देख कर हिरनेक शिपु का हृदय प्रतिशोध की अगनी में जल
16:15उठा
16:16उसकी राक्षसी आखे भयावा क्रोध से देहक उठी
16:20क्रोध की भयंकर गर्जना करते हुए, हिरन्यक्षिपु ने अपने विशाल हाथ से प्रहलाद को उठा लिया, उसकी पकड मौत के
16:29फंदेसी कसैली थी
16:31उसने प्रहलाद को महल के भव्य गलियारों से घसीटा, जहां कीम्ती रत्नों और सोने से सजे स्तंब उसके असीम क्रोध
16:39के मूख साक्षी बन रहे थे
16:42दर्बार में पहले से ही उपस्थित, भैभीत, दर्बारी और दैत्य सेनाप्ती इस अकल्पनिय द्रिशे को देख कर सन्न रह गए,
16:50उनकी आखें आतंक से फैली हुई थी
16:54धिरन्यक्षिप उन्हे प्रहलाद को अपने विशाल सिनहासन के सामने घसीट कर फैंक दिया, उसकी आखें प्रतिशोध की ज्वाला से धधक
17:02रही थी
17:04गर्जना करते हुए उसने प्रहलाद पर होलिका की मृत्यू का आरोप लगाया और उसकी अटल वैशनव निष्ठा को अपमानित किया
17:14प्रहलाद ने शांत और अडिक स्वर में उत्तर दिया कि भगवान ही उसकी रक्षा करते हैं और हर संकट में
17:21उसके साथ खड़े रहते हैं
17:24यह सुनकर हिरन्यक्षिपुने एक भयानक उफास भरी हसी छोड़ी जो विशाल कक्ष में गूंज उठी मानो उसके अहंकार ने देवों
17:33का भी मखौल उड़ाया है
17:36आमकार से भरकर उसने प्रहलाद को चुनोती दी कि यदि उसका भगवान इतना ही सर्वव्यापी है तो वह उसे अभी
17:44यहां उपस्थित क्यों नहीं होता
17:47प्रहलाद ने अपनी आखे बंद करके शांत और द्रिड़ता से उत्तर दिया कि भगवान तो हर कण में, हर स्थान
17:54पर विद्यमान है
17:57हिरन्यक्षिपु ने भयंकर क्रोध से अपने सामने एक विशाल पाशान स्तंभ की और इशारा किया, गर्जना करते हुए पूछा कि
18:05क्या उसका भगवान इस निर्जीव खंभे में भी है
18:10प्रहलाद ने अपनी आखें खोली और पूर्ण विश्वास के साथ बिना किसी हिचकी चाहट के कहा, हाँ, मेरे भगवान इस
18:18खंभे में भी है
18:21प्रहलाद के इस निर्भीक उत्तर से हिरन्यक्षिपु का क्रोध चरम पर पहुँच गया, उसने अपनी भारी गदा उठाई, उसकी आखें
18:29प्रतिशोध की लालसा से जल रही थी
18:32उसने गर्जनाकी की वह इस खंभे को तोड़ कर यह साबित कर देगा कि प्रहलाद का भगवान केवल एक ध्रम
18:40है
18:41एक क्षण के लिए पूरा दर्बार मृत्यु के समान सन्नाटे में डूब गया, केवल हिरन्यक्षिपु की सासों की घरघराहट सुनाई
18:50दे रही थी
18:52प्रहलाद ने अपनी आखे बंद कर ली, अपने भगवान पर पूर्ण विश्वास रखते हुए, आसन्न खत्रे से बिल्कुल अप्रभावित और
19:00शांत
19:02हिरन्यक्षिपु ने अपनी पूरी शक्ती से अपनी विशाल गदा को उठाया और उस पाशान स्तंभ पर प्रहार करने के लिए
19:09एक भयावह स्विंग लिया
19:12एक गगनभेदी गर्जना के साथ गदा ने खंभे से टक्रा कर एक भयानक गरार पैदा की, जिसने पूरे महल को
19:20कमपा दिया
19:21शन भर में पाशान स्तंभ हिंसक रूप से कापने लगा, दरारें तेजी से फैलने लगी और उसके भीतर से एक
19:29रहस्यमय दिव्य गर्जना सुनाई दी
19:32स्तंभ के भीतर से आती हुई गर्जना केवल एक ध्वनी नहीं थी, बलकि एक ऐसी प्रतिध्वनी थी जिसने दैट्य लोग
19:40की नीम को हिला दिया, एक अनिष्टकारी संकेट
19:45खंभे में पड़ी भयावह दरार से फूट्ती अलोकिक ज्वालाओं को देखकर हिरन्यक्षिपु आश्चर्य और क्रोध के मिलेजुले भाव से एक
19:53कदम पीछे हट गया
19:56प्रहलाद ने अत्यंत शांत और भक्तिभाव से भरे स्वर में अपने पिता की ओर देखा, जिनकी आखों में इश्वर का
20:03अटूट विश्वास चमक रहा था
20:06दरार से निकलती गगन भेदी गर्जना सुनकर सभा में मौजूद सभी दानव योध्धा और गुरु भय से कापने लगे
20:15अपनी गदा को कसकर थामते हुए हिरन यक्षिपुने प्रहलाद पर चिल्ला कर पूछा की क्या उसका विश्णू इस निर्जीव पत्थर
20:23के भीतर बंध है
20:25प्रहलाद ने पूर्ण द्रिड़ता के साथ उत्तर दिया कि उनके प्रभु केवल बैकुंट में ही नहीं बलकि संसार के हरकन
20:33और इस खंभे में भी व्याप्त है
20:37जैसे ही प्रहलाद के शब्द गुंजे, पाताल तक हिला देने वाले धक्के से महल के संगमर्मर के फर्ष में भी
20:44बड़ी ब्री दरारें पढ़ने लगी
20:47दैत्यराज का घमंड तूटने लगा था, फिर भी उसने अपने अस्त्र को हवा में लहराते हुए भगवान को बाहर आने
20:54की चुनोती दी
20:56स्तंभ की दरारों से बहटा हुआ अलौकिक प्रकाश इतना तीवर हो गया कि पूरे सभाभवन का अंधकार पल भर में
21:04छंट गया
21:05उधर आकाश में एकत्रित हुए देवगण भय और कौतुहल के साथ इस अद्भुत द्रिश्य को देख रहे थे और हरिनाम
21:14का स्मरण कर रहे थे
21:16हिरन्यक्षि पुने दहारते हुए कहा कि यदि उसका कोई अस्तित्व है तो वह सामने आकर अपनी शक्ती दिखाए
21:24प्रहलाद ने अपने नेत्र मूद लिये और ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जाप करते हुए अपने आराध्य के ध्यान में
21:32लीन हो गए
21:34स्तंभ के चारों और सोने की बारीक परतें पपड़ी बनकर जड़ने लगी और अंदर से एक अकलपनिय तेज बाहर आने
21:42लगा
21:43भईभीत होकर दानव सेनापतियों ने अपनी काली ढाले और तलवारे खीच ली और अपने राजा के चारों और घेरा बनाने
21:52की कोशिश की
21:54खंभे से निकलती प्रचंड उश्मा इतनी बढ़ गई की सभा के सोने के आभूशन और नकाशिदार दीग पिघलने लगे
22:02क्रोध से अंधा होकर हिरन्यक्षिपु खंभे पर दूसरा प्रहार करने के लिए अपनी विशाल गदा उठाने लगा
22:10तभी खंभे के भीतर से ऐसी भयंकर दहार निकली जिसने महल की काच की खिडकियों और रेश्मी धोजों को चित्रे
22:18चित्रे कर दिया
22:20प्रलेकारी उर्जा की तरंगों के बीच भी प्रहलाद एक दिव्य सुरक्षाचक्र के भीतर पूरी तरह सुरक्षित और अचल खड़े रहे
22:30दैत्यराज के चहरे पर पहली बार एक अज्यात भय की जलक दिखाई दी क्योंकि उसे आभास हो गया था कि
22:37उसका अंत निकट है
22:39स्थम्भ धीरे धीरे बाहर की ओर फूलने लगा जैसे उसके भीतर कोई विशाल और अप्रमे शक्ती प्रकट होने के लिए
22:47आकुल हो रही हो
22:50सभाभवन की हर आक हुस धधकते हुए स्थम्भ पर टिक गई क्योंकि अब इतिहास का सबसे भयानक और पवित्रक्षन आने
22:57ही बाला था
22:59अपनी शक्ती के चरम अहंकार में डूबा हिरन यक्षिपु प्रहलाद के अटूट विश्वास का उपहास करते हुए उस रहस्य में
23:07स्तंभ की ओर बढ़ा
23:10बालत प्रहलाद ने शांत और अडिक भाव से अपने पिता की ओर देखा उनके नेत्रों में केवल भगवान विश्णू के
23:17प्रती असीम प्रेम और श्रद्धा थी
23:20देत्यराज के हरिदय में क्रोध की ज्वाला धधक उठी क्योंकि उसे प्रहलाद की अविचल भक्ती अपनी संप्रभुता के लिए सबसे
23:29बड़ी चुनोती प्रतीत हुई
23:31असुरों के भयावह राजा हिरन्यक्षिपु ने अपने विशाल नकाशिदार गदा को पकड़ा जो उसकी क्रूर शक्ती का प्रतीक था और
23:40उसे अपने सिर के उपर उठाया
23:44सभाभवन में एक क्षण के लिए भयावह सन्नाटा चा गया जब हिरन्यक्षिपु ने अपनी पूरी शक्ती बटोर कर उस स्वन
23:51स्तंभ पर प्रहार करने का निश्चय किया
23:54एक गगनभेदी गरजना के साथ हिरन्यक्षिपु ने अपनी गदा से स्वर्ण स्तंध पर प्रचन प्रहार किया, जिससे पूरी सभाकाप उठी
24:04गदा के संपर्क में आते ही स्तंध पर एक गहरी भयावा दरार उभराई, जैसे कोई प्राचीन शिलाहरदय से विभाजत हो
24:13रही हो
24:15ततकाल एक गूड ब्रहमांडिय गरजना धीरे-धीरे गूंजने लगी, जो पहले दूर से आती हुई किसी अद्रिश्य शक्ती की चेतावनी
24:23सी लगी
24:25देवलोक में बैठे देवता और असुरलोक में उपस्थित सभी दैत्य, भय और विस्मय से उस अविश्वसनिय गरजना को सुनकर स्तब्ध
24:34रह गए
24:36गरजना की तीवर्ता बढ़ती गई, उसकी प्रतिध्वनी से महल की नीम भिलने लगी और हवा में एक अज्यात कमपन फैल
24:43गया
24:45हिरन्यक्षिपु के चहरे पर पहले एक शनिक विस्मय आया, जो तुरंथ ही उसकी हटधर्मी और चुनोती भरी क्रूरता में बदल
24:52गया
24:54उधर बालक प्रहलाद के मुख पर दिव्य शांती चाई हुई थी, उनके नेत्रों में एक गहरी श्रद्धा और ईश्वर पर
25:01पूर्ण विश्वास स्पष्ट जलक रहा था
25:05स्थम्ध की दरारें और चौडी होती गई और उसके भीतर से एक असहनिय स्वर्णिं प्रकाश फूटने लगा, जो सभी को
25:13अंधा करने वाला था
25:16सभाभवन की छट से प्लास्टर और छोटे पत्थर जहरने लगे, क्योंकि गर्जना की शक्ती से पूरी संरचना चर्मरा रही थी
25:25वह ब्रह्मांडिय गर्जना अपने चरम पर पहुँच गई, इतनी प्रचंड की ऐसा लगा मानो स्वयं कालचक्र अपने मार्ग से भटक
25:33गया हो
25:34एक भयानक विस्पोट के साथ स्वर्ण स्तंभ दो भागों में विभाजित हो गया, और उसके भीतर से एक तीवर प्रकाश
25:43पुंज निकला
25:44स्तंभ के विशाल टुकडे धूल और मलबे के साथ नीचे गिरे, जिससे एक घना बादलों का गुबार पूरे सभाभवन में
25:52फैल गया
25:54धूल के उस घने परदे के बीच से एक अत्यंत विशाल और भयावा आकरिती उभरने लगी, जिसकी केवल परचाई भी
26:02रोंग्टे खड़े करने वाली थी
26:05सभा में उपस्थित सभी दैत्य और दानव, भय और आतंग से काप उठे क्योंकि उन्हें आभास हो गया था कि
26:13वे किसी अप्रत्याशित प्रकोब के साक्षी बन रहे हैं
26:18हिरन्यक्षिपु का मुख आश्चर्य और भय से पीला पड़ गया, उसकी आखों में पहली बार अपनी मृत्यु का स्पष्ट प्रतिबिम
26:25दिखाई दिया, जब वह उस दिव्य और अकल्पनिय शक्ती के सम्मुख खड़ा था
26:31और फिर धूल का वह भयावह बवंदर शान्त हुआ, जिसने सभा के बीचों बीच एक ऐसे अलोकिक गरजनशील रूप को
26:39प्रकट किया, जिसकी कल्पना भी दैतियों ने कभी नहीं की थी
26:44उनके शरीर का उपरी हिस्सा एक क्रोधित गरचते हुए सिंह का था, जिसके नुकीले दात और भयंकर आखें ब्रहमांड को
26:52चुनौती दे रही थी, जबकि निचला हिस्सा एक शक्तिशाली मनुष्य का था, जो अटल और अजे खड़ा था
27:00एक ऐसी गरचना हुई जो तीनों लोकों में गूंश पुठी, जिसने आकाश गंगाओं को थर्रा दिया और स्वयन समय की
27:08धारा को भी एक क्षण के लिए रोक दिया
27:12उस भीशन गरजना से दैट्यों के हृदय फटने लगे, अस्त्रशस्त्र उनके हाथों से छूट गए और कुछ तो वहीं भय
27:20से मूर्चित होकर भूमी पर गिर पड़े
27:23जहां एक और पूरी सभा थर्रा रही थी, वहीं नन्हे प्रहलाद के मुख पर एक अध्भुत शान्ती और भक्ती का
27:31भाव था, उनकी आखें अपने आराध्य के विराट रूप को देखकर कृतज्यता से चमक रही थी
27:38हिरन्यक्षिपु का प्रारंभिक भय अब एक प्रचंड क्रोध में बदल चुका था, उसकी धधक्ती आखों में अपमान और प्रतिशोध की
27:46ज्वाला जल रही थी
27:48अपनी गर्जना को चुनोती देते हुए, हिरन्यक्षिपु ने उस विचित्र प्राणी की ओर उंगली उठाई और क्रोधित स्वर में पूछा,
27:57कौन है तू, जिसने मेरे राज्य में आकर यह धोंग रचा है
28:02भगवान नर्सिह ने हिरन्यक्षिपु की ओर देखा, उनकी लाल आखें किसी अनंत ब्रह्मांड के रहस्य को समेटे हुए थी, और
28:10उस एक द्रिष्टी में ही हिरन्यक्षिपु का सारा अभिमान जल कर राख होने लगा
28:16अपनी शक्ती के घमंड में चूर, हिरन्यक्षिपु ने भगवान नर्सिह को एक साधारन जीव समझने की भूल की, और उन्हें
28:24अपनी सभा से बाहर निकलने का आदेश दिया, मानो वह कोई मामूली उपदरवी हो
28:31इसे ततकाल पकड़ लो, हिरन्यक्षिपु ने अपने सेनाप्तियों को आदेश दिया, यह अवश्य ही विश्णु का कोई मायावी रूप है,
28:39जिसने मेरे राज्ज में आकर मुझे चुनौती देने का दुस्साहस किया है
28:45सहस्रों दैत्य योध्धा अपनी तलवारें, गदाएं और त्रिशूल लेकर उस अज्यात शक्ती पर तूट पड़े, मानो वे किसी साधारन शत्रु
28:54को पराजित करने चले हूँ
28:57दैत्यों के सारे प्रहार भगवान नर्सिंग के दिव्य शरीर पर वैसे ही व्यर्थ सिद्ध हुए, जैसे किसी विशाल परवत पर
29:04बरसाई गई जल की बूदें
29:07एक ही पल में भगवान नर्सिंग ने अपनी विशाल भुजाओं से एक दैत्य को ऐसे उठा लिया, जैसे कोई बच्चा
29:14किसी खिलोने को उठा ले
29:17दैत्य राज के देखते ही देखते, नर्सिंग ने उस दैत्य को अपने पंजों से फाट डाला, मानो वह कोई कागस
29:25का टुकरा हो और उसके रक्ट से सभाभवन की पवित्रता भंकर दी
29:30यह भयानक द्रिश देखकर बचे हुए दैत्य योद्धाओं की हिम्मत तूट गई और वे अपने प्राण बचाने के लिए चीखते
29:38हुए इधर उधर भागने लगे, युद्ध का मैदान छोड़ कर
29:42अब पूरी सभा खाली हो चुकी थी और भगवान नर्सिंग की भयंकर लाल आखें केवल एक ही लक्षे पर टिकी
29:50थी अहमकारी दैत्य राज हिरन्यक्षिपु पर
29:54मृत्यू को सामने देख कर भी हिरन्यक्षिपु का अहमकार नहीं तूटा, उसने अपनी विशाल गदा उठाई और अंतिम बार उस
30:02दिव्य शत्रू से भिढने को तैयार हो गया
30:06एक क्षण की देरी किये बिना, भगवान नर्सिह ने बिजली की गती से हिरन्यक्षिपु पर छलांग लगाई, जैसे कोई भूखा
30:14सिंह अपने शिकार पर जपटता है
30:18देत्यराज ने अपनी पूरी शक्ती से नर्सिह को रोकने का प्रयास किया, दोनों की टक्कर से सभाभवन की नीन भी
30:25हिल उठी और यह एक महाकाव्य युद्ध की शुरुवात थी
30:30अपनी पकड मजबूत करते हुए भगवान नर्सिह ने हिरन्यक्षिपु को घसीटना शुरू किया, उसे उस सभाभवन से बाहर की ओर
30:38खींचते हुए, जहां उसका अंथ होना तय था
30:42संध्या के इस विशेश काल में भगवान नर्सिंध दैत्यराज हिरन्यक्षिपु को घसीटते हुए राजमहल की मुख्य देहली पर ले आएं
30:52घलते हुए सूर्य की लालिमा और आती हुई रात की नीलिमा के संगम काल में हिरन्यक्षिपु ने भयभीत होकर देखा
31:00कि अब न दिन है और न राग
31:03महल की चोखट पर टिके हुए, हिरन्यक्षिपु को अहसास हुआ कि वह न तो घर के भीतर था और नहीं
31:10बाहर
31:11भगवान नर्सिपु ने गर्जना करते हुए उस विशालकाय दैत्य को अपनी जंगों पर उठा लिया, जिससे वह न तो भूमी
31:19पर रहा और नहीं आकाश में
31:22हिरन्यक्षिपु ने छट पटाते हुए अपने हाथों से प्रहार करने का अंतिम प्रयास किया, पर नर्सिपु देव की वजरस्मान पकड़
31:30के आगे उसकी शक्ती व्यर्थ सिद्ध हुई
31:34त्रिलोग को कपा देने वाली लालंगार आखों से भगवान नर्सिः ने उस पापी दैट्य की आखों में जहाका, जहां केवल
31:41मृक्यु का भय व्याप्ट था
31:44हिरनिक शिपु के मस्तिष्क में ब्रह्मा जी के वर्दान की एक-एक शर्थ कौंध उठी और उसे समझ आ गया
31:51कि इश्वर ने उसके हर चल का उत्तर रच लिया है
31:55भगवान नर्सिह ने अपनी उंगलियों से अस्त्रशस्त्रों से रहित, वजरस्मान कठोर तथा नुकीले नाखुनों को बाहर निकाला
32:05आकाश में थमे हुए मेगों के पीछे से ब्रह्मा, शिव और समस्थ देवता सांस रोक कर इस अध्भुत और उग्रद्रिश
32:12को निहार रहे थे
32:14भक्त प्रहलाद भक्तिभाव में डूब कर हाथ जोड़े खड़े थे, क्योंकि उनके प्रभु अपने दिये वचन और धर्म की रक्षा
32:22करने जा रहे थे
32:24एक प्रचंड और ब्रह्मांडिय गर्जना के साथ, भगवान नर्सिंह ने अपने तीखे नखों को हिरन्यक्षिपु की छाती में गहराई से
32:33गाड़ दिया
32:35शन भर में ही नर्सिंह देव ने दैत्यराज की छाती को चीर कर उसके अधर्म और अहंकार के सामराज्य का
32:42सदा के लिए अंत कर दिया
32:45मुख्य देहली पर बहती हुई रक्ताब धारा ने ब्रह्मा जी की वर्दान नीती को अक्षुन रखते हुए संसार को एक
32:52महापापी के अत्याचारों से मुक्त कराया
32:56अत्यंत रुद्र रूप में भगवान नरसिंह ने हिरन्यक्षिपु की आन्तों की माला अपने गले में धारन कर अधर्म के विनाश
33:04का उद्धोश किया
33:06भगवान की जंगों पर पड़े हुए हिरन्यक्षिपु के निश्प्राण शरीर से उसका अंधकार में प्राणवायु सदा के लिए विलीन हो
33:13गया
33:15अपने अमर समझे जाने वाले समराट की ऐसी दुर्दशा देखकर शेश असुर सेना प्राण बचाकर दसों दिशाओं में भाग खड़ी
33:23हुई
33:25महासंहार के पश्चात प्रजवलित क्रोधागनी से धधकते हुए भगवान नर्सिन असुर राज के सिनहासन पर जाविराजे
33:33आकाश से देवताओं ने राहत की सांस ली और नर्सिन देव के चर्णों में दिव्यपारिजात के पुष्पों की वर्षा होने
33:40लगी
33:42गंधर्वों के मधुर गायन और रिशियों के वेद मंत्रों की ध्वनी से समस्त ब्रह्मान पुना धर्म और शांती के आलोक
33:49से जग्मगा उठा
33:51अपने उग्रस्वामी के समक्ष छोटे से प्रहलाद ने परम भक्ती के साथ दंडवत प्रणाम किया जिससे प्रभू के नेत्रों में
33:59बातसल्य छलक आया
34:02नरसिन्ह देव का मुखमंडल अभी भी क्रोध की प्रचंड अगनी से देहक रहा था जिससे देवताओं और देवों के हृदय
34:09भय से काप रहे थे
34:11मानो सृष्टी का अंत निकट हो
34:14उनकी विक्राल गर्जना जो अभी भी ब्रहमांड में गूंज रही थी
34:19भयभीत देवताओं के कानों में मृत्यू की भेरिसी लग रही थी
34:23हर हृदय को हिला रही थी
34:26छोटे से प्रहलाद ने भयभीत देवताओं के बीच भी अपनी अटल भक्ती और अटूट श्रधा के साथ निर्भयता से अपने
34:34आराध्य की ओर देखा
34:37उसके छोटे से मुखमंडल पर कोई भय नहीं था, केवल गुरुदेव नारत के दिये गए भक्तिज्ञान का दिव्य तेज चमक
34:44रहा था
34:46जैसे ही प्रहलाद ने अपनी आखें उपर उठाई उसके नेत्रों में जलक्ती निश्चल भक्ती ने भगवान नर्सिं के क्रोधागनी को
34:54क्षणभर के लिए स्तब्ध कर दिया
34:58प्रहलाद ने धीरे-धीरे अपनी छोटी सी देह को घुटनों के बल जुकाते हुए परमश्रधा से प्रभु के रक्तरंजिक चर्णों
35:05की ओर अग्रसर हुआ
35:07उसकी छोटी सी आवाज ब्रहमांड के सबसे भयंकर शोर के बीच भी एक शांत निर्मल धारा की तरह उभी जिससे
35:16एक मंत्रमुग्ध करने वाली प्रार्थना आरंभ हुई
35:20प्रहलाद के मुख से निकले हर शब्द में, हर श्वास में भगवान विश्णु के प्रती उसकी अनंत श्रध्धा और पवित्र
35:28प्रेन की गुम्ष्थी
35:30उसने अपने आराध्य के गुनों का बखान करते हुए, स्रिष्टी के कल्यान और समस्थ जीवों की मुक्ती की याचना की
35:39प्रहलाद की प्रार्थना की दिव्यध्वनी ने भगवान नर्सिंग के हरिदय में गेहन वातसल्य की तरंगे जगाई, उनके क्रोध की लपतें
35:47धीमी पड़ने लगी
35:49देवता, जो अब तक भय से काप रहे थे, नर्सिंग देव के मुखमंडल पर बदलते भावों को देख कर आश्चर्यचकित
35:57और आशानवित हो उठे
36:00प्रभु के नेत्रों से क्रोध का तेज सिमट रहा था और उनके स्थान पर एक असी मित गया और स्नेह
36:07की किरने फूट रही थी, जो ब्रहमांड को शांती प्रदान कर रही थी
36:12नर्सिंध देव ने अपनी भयंकर गर्जना को शांत कर दिया और एक गहरी शांत श्वास के साथ उनके शरीर से
36:20निकलने वाला ताप धीरे-धीरे कम होने लगा
36:24प्रहलाद ने अपनी प्रार्थना समाप्त कर भगवान के विराठ स्वरूप के समक्ष अपने अश्रुपूरित नेत्रों से कृतग्यता पूर्वक देखा
36:33उसकी आखों से जरते प्रेम के अश्रु भगवान नर्सिंग के चरण कमलों पर ऐसे गिरे मानो मोतियों की वर्षा हो
36:41रही हो
36:43जैसे ही प्रहलाद ने अपने छोटे हाथों से प्रभू के चरण कमलों को स्पर्ष किया नर्सिंग देव का संपूर्ण क्रोध
36:50एक पल में अद्रिश हो गया
36:52उनकी उग्रता शान्त हो गई और एक अद्भुत शान्त सौमेता उनके मुखमंडल पर फैल गई मानो कोई प्रचंड तूफान थम
37:02गया हो
37:03भगवान नर्सिंह ने धीरे से अपना विशाल हाथ उठाया और उसे प्रहलाद के छोटे से सिर पर रखा मानो उसे
37:11अपने अनंत प्रेम और सुरक्षा का आश्वासन दे रहे हो
37:16ततपश्चात नर्सिंह देव ने प्रहलाद को अपनी विशाल भुजाओं में भर लिया और ब्रहमांड ने पहली बार उनके शान्त स्वरूप
37:24का दिव्य दर्शन किया
37:26उस आलिंगन से निकली शान्ती की तरंगों ने समस्थ ब्रहमांड को प्लावित कर दिया और हर जीव ने एक अभूत
37:34पूर्व दिव्य सुकून का अनुभव किया
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