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पिछले एपिसोड में, हमने देखा कैसे चक्रवर्ती सम्राट भरत, एक मृगशावक के प्रति आसक्ति के कारण अगले जन्म में मृग योनि में जन्मे। इस एपिसोड में, हम उनकी उस असाधारण यात्रा का अनुसरण करेंगे, जहाँ वे मृग के रूप में अपनी पिछली गलतियों से सीखते हैं, फिर एक ब्राह्मण परिवार में 'जड़ भरत' के रूप में जन्म लेते हैं। वे संसार से विरक्ति दिखाने के लिए जड़ता का अभिनय करते हैं, लेकिन उनके भीतर ज्ञान का सागर छिपा है। उनकी यह अद्वितीय अवस्था उन्हें राजा रहूगण से मिलाती है, जहाँ जड़ भरत अपने गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान से राजा को परम सत्य का मार्ग दिखाते हैं। यह कहानी आसक्ति के दुष्परिणामों, वैराग्य की महिमा और आत्मज्ञान की पराकाष्ठा का एक शक्तिशाली उदाहरण है। #JadaBharata #BhagavataPurana #SpiritualJourney #Moksha #KingRahugana #HinduMythology #SanatanDharma #ज्ञानयोग
Transcript
00:00पिछले जन्म की मोपाश में फसकर, भरत चक्रवर्ती ने एक हिरन के रूप में पुनह जन्म लिया, जहां उनकी चेतना
00:07अपने म्रिग शरीर में भी अडिग रही.
00:10जो ही वह नवजात म्रिग अपने पैरों पर खड़ा हुआ, पूर्वजन्म की स्मृतिया उसकी चेतना में लहरों सी टक्राने लगी,
00:18एक राजा के वैभव और त्याग का चित्र उसके मानस पटल पर उभराया.
00:24उसे स्मरन हुआ कैसे वह एक प्रतापी समराठ था, जिसकी ख्याती तीनों लोकों में गुंजती थी और जिसके नाम पर
00:32यह भूमी भारतवर्ष कहलाई.
00:34फिर उसे याद आया अपना राजपाट त्यागना, राजसी वस्त्रों का परित्याग कर वन की एकांत कुटिया में प्रवेश करना, जहां
00:44उसने कठोर तपस्या आरंभ की थी.
00:48मानसून की मूसलाधार वर्षा में उसने एक भयभीत और असहाय म्रिग्षिशु को बहती नदी से बचाया था, जो उसकी तपस्या
00:56में एक नया मोड ले आया.
00:58उस म्रिग्षिशु के प्रती बढ़ता मोह, उसकी हर आहट पर चिंता, उसकी सुरक्षा का सतत विचार धीरे धीरे उसकी तपस्या
01:07को लीलने लगा.
01:09अंतह उसी म्रिग्षिशु के विचार में खोया हुआ, म्रित्यु के अंतिन क्षणों में उसने अपने प्रभो को छोड़ कर केवल
01:16उसी शिशु को स्मरण किया.
01:19और फिर वह अभागाक्षन आया जब उसके प्राणों ने देह त्यागी और अगले ही पल उसने स्वयं को उसी म्रिग्षिशु
01:27के गर्भ में पाया.
01:29यह पुनरजन्मक उसके लिए एक भयंकर पश्चाताप की अगनी लेकर आया, जहां वह अपने म्रिग शरीर में भी पिछली भूलों
01:37पर निरंतर जलता रहा.
01:40वह समझ गया की आसक्ती का यह बंधन कितना प्रबल होता है, जो एक तपस्वी को भी अपने मार्ग से
01:47भटका कर पशुयोनी में धकेल सकता है.
01:51अब इस म्रिग देह में भी उसका लक्षिस पश्ट था, इस जन्म को आत्मशुद्धी का एक कठोर किन्तु आवश्यक अफसर
01:59बनाना.
02:01अन्यम्रिगों की भाती वह अहार निग्रा में लिप्त न रहकर, एकांत में बैठकर, अपने अंतर्मन की गहरायों में गोता लगाता.
02:10वह प्रकृती के हर स्पंदन में भगवत तत्व को खोजने का प्रयास करता, जैसे कभी एक राजा के रूप में
02:17उसने अपने सामराज्य में धर्म का पालन किया था.
02:21उसके रोमरोम में पूर्वजन्म की शिक्षाए गूंजती थी, जिससे उसका हर कदम, हर ग्रिष्टी एक रिशी के समान प्रतीत होती
02:29थी.
02:30उसे भय था कि कहीं फिर से वह किसी सांसारिक बंधन में न फंस जाए, इसलिए वह मनुश्यों और अन्य
02:38प्राणियों से दूर एकांत में रहता था.
02:41यद्यपी वह म्रिग शरीर में था, उसकी आत्मा निरंतर ओम के नाद में लीन रहती थी, इश्वर के प्रती उसकी
02:49निष्ठा अखंड थी.
02:51उसका जीवन अब एक मौन तपस्या बन गया था, जहां हर सास, हर चाल मुक्ती की ओर एक बढ़ा हुआ
02:58कदम था.
03:00उसकी आखों में भूटकाल का पश्चाताप और भविश्य की मुक्ती की आशा स्पष्ट जलकती थी, एक ऐसा विरोधाभास जो उसे
03:08अध्वितिय बनाता था.
03:11इस मृगयोनी में भी वह अपने आराध्य देव की कृपा का स्मरण करता और अपनी हर क्रिया को उनही को
03:18समर्पित करता चला गया.
03:21इस प्रकार भरत चक्रवर्ती ने मृगरूप में भी अपने पूर्वजन्म के ज्ञान और ग्रिड संकल्प के साथ अपनी आत्मा को
03:29शुद्ध करने का अध्भुत मार्ग अपनाया.
03:33म्रिडशावक के रूप में भरत अपनी हिरनी मा के कोमल स्पर्ष और साथी म्रिगों की निश्चिंत क्रीडा में एक स्वाभाविक
03:40ममत्व का अनुभव करता था.
03:43किन्तु उसके भीतर पूर्वजन्म का ज्यान एक ज्वालासा प्रजवलित था, जो इस नश्वर देह के क्शनभंगुर स्नहबंधन से उसे बार
03:51-बार सावधान करता था.
03:54वह अक्सर ज्वंड से दूर एकांत में बैठकर अपनी म्रिग प्रवरित्ती पर अंकुष लगाने और मन को परमात्मा में स्थिर
04:02करने का अभ्यास करता.
04:04जब उसकी म्रिगमा उसे खोजने आती और अपने कोमल स्वर में पुकारती, तो आसकती की डोर फिर से उसे अपने
04:13मुहपाश में खीच लेती.
04:15वह वापस जुंड में लौट आता, साथियों के साथ घास चरता, किन्तु उसका अंतर्मन इस बाहरी संसार से विरक्ट अपनी
04:24मुक्ती के मार्ग पर अटल रहता.
04:27एक दिन एक भयंकर बाग ने जुंड पर हमला किया, जिससे सभी मृगों में भगदर मच गई, पर भरत का
04:34मन उस भय में भी शांत बना रहा.
04:37बाग भरत की असामान्य स्थिर्ता देख चकित रह गया, मानो उसने किसी ऐसे प्राणी को देखा हो जो मृत्यू के
04:45भैसे परे हो.
04:46इस अप्रत्याशित पलायन ने उसे अपने आध्यात्मिक अभ्यास की शक्ती का बोध कराया और आसक्ती के बंधनों को तोड़ने का
04:55संकल्प और ग्रिड किया.
04:58रितुए बदलती गई और एक कठोर शीत काल आया, जिसने वन में भोजन और जल की कमी पैदा कर दी,
05:05जिससे सभी प्राणीयों का जीवन संकट में पड़ गया.
05:10जहां अन्य म्रिग भूख और ठंड से व्याकुल थे, वहीं भरत अपने मन को शांत रखता और परमात्मा पर ध्यान
05:17केंद्रित कर इस विप्रीत परिस्थिती को सहन करता.
05:21एक दिन जंगल में शिकारियों के पच्चाप सुनाई दिये, जिससे म्रिग जुंड में पुनह भय और बेचैनी खैल गई.
05:30भरत ने आसन्न खत्रे को भामपा, पर पूर्वजन्म के ज्यान ने उसे सिखाया था कि आसकती ही भय का मूल
05:37है, और वह अपने मन को स्थिर रखने का प्रयास करता.
05:41उसने अपनी बुद्धी का उप्योग करते हुए, जुंड को धीरे-धीरे शिकारियों के मार्ग से दूर एक सुरक्षित दिशा में
05:49निर्देशित किया.
05:51जुंड बिना किसी विशेश संकेत के, अनजाने में भरत के मार्ग गर्शन का अनुसर्ण करता रहा और इस प्रकार वे
05:59सब आने वाली विपत्ती से बच निकले.
06:02शन भर के लिए उसे अपने इस रक्षक होने पर संतोश हुआ, पर तुरंथ ही उसने स्वयन को धिकारा की
06:09यह भी तो आसकती का ही एक सुक्ष्म रूप था.
06:13इस घटना के बाद भरत और भी गहन एकांत में चला गया, जहां वह अपनी चेतना को प्रकृती के शोर
06:21से परे आत्मा की गहराईयों में केंडरित करने लगा.
06:25कभी-कभी रातरी के सन्नाटे में उसे एक दिव्य प्रकाश या अलौकिक ध्वनी का अनुभव होता, जो उसके आध्यात्मिक मार्ग
06:34पर प्रक्ती का संकेत देता.
06:37धीरे-धीरे उसने जुंड के प्रती अपनी आसक्ती को त्यागना शुरू किया, केवल एक साक्षी भाव से उन्हें दूर से
06:44देखता बिना किसी लगाव के.
06:47उसे स्पष्ट रूप से बोध हुआ कि किस प्रकार आ सकती, चाहे कितनी भी सुक्ष्म क्यों न हो, पुनर्जन्म के
06:55चक्र का कारण बनती है और आत्मा को बांधे रखती है.
07:00अंतह उसने इस म्रिग शरीर में ही समस्थ सांसारिक बंधनों को तोड़ने और परम्मोक्ष की प्राप्ती के लिए एकांतवास का
07:09अटल संकल्प लिया.
07:11व्रिद्ध म्रिग ने समस्थ संसारिक प्रपंचों से स्वयं को पूर्णता विरक्त कर एक घने शांत वन खंड में अपना अंतिम
07:19आश्रय ढूढा, जहां केवल प्रकृती की मौन गूंच सुनाई देती थी.
07:25वहां उसने अपने म्रिग शरीर को त्यागने और परमिश्वर श्रीहरी के चर्णों में लीन होने के अटल निश्चय के साथ
07:33गहन ध्यान में स्वयं को समर्पित कर दिया.
07:36उसके शरीर की कांती धीरे-धीरे क्षीन होती गई, किन्तु उसकी आखों में दिव्य प्रकाश और संकल्प की अद्भुत अगनी
07:44और भी प्रखर होती जा रही थी.
07:47म्रिग देह में रहते हुए भी भरत अपने पूर्व मानव जन्म की स्मृतियों को स्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा
07:55था, जिसमें एक छोटी सी आसक्ती ने उसे इस योनी में धकेला था.
08:00उसने अपने हृदय में चतुर्भुज श्रीहरी के नीलकमल से भी सुन्दर पावन चर्णों का ध्यान एकागरता से किया, जिनके दर्शन
08:09मात्र से परम आनंद की अनुभूती होती है.
08:13धीरे धीरे म्रिग शरीर की चेतना क्षीन होती गई और भरत का शुद्ध चेतन मन परम ब्रह्मा में विलीन होने
08:20लगा, जैसे नदी सागर में मिलती है.
08:24अंत्ह अपने अंतिम क्षणों में उसने परमेश्वर के चर्णों का ही चिंतन करते हुए, पूर्ण था आसकती मुक्थ होकर शान्ती
08:33से अपने प्राण त्याग दिये.
08:35म्रिग शरीर से मुक्थ हुई आत्मा एक जोतिर्मय प्रकाश पुन्ज के रूप में समस्त कर्म बंधनों से रहित होकर सुक्ष्म
08:43लोक की ओर अग्रसर हुई.
08:46उसे किसी भी लोक में नहीं रुकना पड़ा, क्योंकि उसने अपने समस्त कर्मों को आसकती रहित होकर पूर्णता शुद्ध कर
08:54लिया था.
08:55इश्वरिय कृपा और उसके गहन तप के फल से वह आत्मा अब एक नए पवित्र जन्म के लिए तैयार थी,
09:03जहां उसकी आध्यात्मिक यात्रा पूर्णता की ओर बढ़ती.
09:08कर्मों के शुद्धिकरण के परिणामस्वरूप उसे इस बार एक अत्यंत पवित्र और ज्यानी ब्राहमन परिवार में जन्म लेने का अफसर
09:16प्राप्थ हुआ.
09:18पश्चिमी भारत के विदर्भ शेत्र में एक धर्मनिष्ट ब्राहमन दमपत्ती संतान प्राप्ती की कामना से परमेश्वर का निरंतर भजन कर
09:26रहे थे.
09:28एक शुब मुहूर्त में उस पवित्र ब्राहमन पत्नी के गर्भ में वही जोतिर्मय आत्मा प्रवेश कर गई, जिससे उनके मुख
09:36पर एक अलौकिक तेज छा गया.
09:39नौ मास उप्रांत उस दमपत्ती के घर तीसरे पुत्र का जन्म हुआ, जिसकी आखें जन्म से ही ज्ञान और वैराग्य
09:46के भाव से भरी थी.
09:49उसका नाम जड़ भरत रखा गया, क्योंकि वह देखने में किसी जड़ प्राणी जैसा निश्क्रय और उदासीन प्रतीत होता था,
09:57किन्तु भीतर से वह परम ज्यानी था.
10:00जैसे जैसे वह बड़ा होता गया, उसकी जड़ता और भी बढ़ती गई, वह संसारिक शिक्षाया व्यवहार में कोई रुची नहीं
10:08दिखाता था.
10:10उसके मातापिता उसे वेजशास्त्रों का ज्यान देना चाहते थे, पर वह केवल मौन रहकर अपने आंतरिक ध्यान में लीन रहता
10:18था.
10:20वह सभी संसारिक क्रियाय केवल शरीर के निर्वाह हेतु करता था, बिना किसी लगाव या इच्छा के, जैसे एक यंत्र
10:28कार्य करता है.
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