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श्रीमद्भागवत महापुराण के 57वें एपिसोड में प्रवेश करें! आज हम चंद्रवंश की उस शाखा में चलेंगे जहां राजा दुष्यंत और शकुंतला की अमर गाथा का आरंभ होता है। जानिए कैसे एक अंगूठी के खो जाने से शकुंतला को वियोग का दंश झेलना पड़ा, और कैसे जन्में पराक्रमी सम्राट भरत, जिनके नाम पर हमारे देश का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा!

इसके साथ ही हम श्रवण करेंगे परम दयालु राजा रंतिदेव की वह अद्भुत कथा, जिन्होंने भूख और प्यास की चरम सीमा पर जाकर भी अपनी अंतिम जल की बूंद तक एक प्यासे को दान कर दी। क्या था देवताओं का यह मायाजाल? और कैसे रंतिदेव ने निस्वार्थ भक्ति का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत किया?

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Transcript
00:00महर्शी शुकदेव ने शांत भाव से परिक्षित की ओर देखा और गंभीर स्वर में पुरु वंश के उन प्रतापी राजाओं
00:07की गाथा प्रारंब की, जिन्होंने धर्म और सत्य की अक्षोन जोती को सदैफ प्रजवलित रखा.
00:14उन्होंने बताया की कैसे महाराजा पुरु अपने पिता ययाती के प्रती अगाज श्रद्धा और धर्म निष्ठा के प्रतीक बनकर अपनी
00:23युवावस्था का बलिदान देकर संपूर्ण पुरु वंश के आदिपुरुष बने.
00:28इस महान त्याग के परिणामस्वरूप पुरु को ययाती ने अपना उत्तराधिकारी घोशित किया और तब से उनका वंश पौरव नाम
00:36से विख्यात हुआ, जो सदा सत्य और धर्म के पत्थ पर अग्रसर रहा.
00:42पुरु के पुत्र जनमेजय ने भी अपने पिता के आदर्शों का पालन करते हुए निश्पक्ष न्याय और प्रजापालन की अद्भुत
00:50मिसालें प्रस्तुत की, जिससे राज्ज में सुक्षान्ती का विस्तार हुआ.
00:55इस वन्ष के प्रत्येक राजा ने वेदों और शास्त्रों के ज्ञान को सर्वोच मान कर यग्यों और तपस्याओं के माध्यम
01:02से देवताओं को प्रसन्न किया, जिससे प्रित्वी पर धर्म का चक्र निरंतर गतिमान रहा.
01:09राजा प्राचीनवान, प्रवीर, मनस्यू और अनध्रिष्टी जैसे अनेक महान शास्कों ने अपनी वीर्ता, ज्ञान और धर्मनिष्था से इस वन्ष की
01:18कीर्ती को चारों दिशाओं में फैलाया.
01:21उनकी प्रजा ने भी इन न्यायप्रिय राजाओं के अधीन शांती और सम्रिध्धी का अनुभव किया, जिससे राज्ज में हर्ष और
01:29उल्लास का वातावर्ण बना रहा.
01:32इसी परमपरा में महाराजा दुश्यंत के पूर्वज रैकभानू का उदे हुआ, जिन्होंने अपने ज्ञान और शौर्य से शत्रों को परास्त
01:41किया और धर्म की स्थापना की.
01:44उन्होंने राजधर्म का पालन करते हुए अनेक यग्यों का अनुष्ठान किया और विद्वानों तथा संतों का सदैव सम्मान किया, जिससे
01:52उनकी ख्याती दूर-दूर तक फैल गई.
01:56रैटभानू के पश्चात उनके पुत्र सुहोत्र ने राजगद्दी संभाली और उन्होंने भी अपने पूर्वजों की भानती प्रजा की सेवा और
02:04धर्म की रक्षा को अपना परम करतव्यमाना.
02:08उनके शासनकाल में राज्ज की सीमाय विस्तारित हुई और कला तथा साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ, जो उनकी दूरगर्शिता और
02:17संरक्षन का प्रमान था.
02:20सुहोत्र के पुत्र हस्ती ने हस्तिनापूर नामक भव्यनगर की स्थापना की, जो भविश्य में इस वंश्की राजधानी और गौरव का
02:28केंद्र बना.
02:30उन्होंने अपनी प्रजा के लिए ऐसे नियम बनाए, जिनसे सामाजिक समर्स्ता और नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च स्थान प्राप्थ हुआ, जो
02:39उनके नाम को अमर कर गया.
02:41इसी क्रम में हस्ती के पुत्र अजमीड ने अपने युग में महान, योध्धा और धार्मिक राजा के रूप में ख्याती
02:49प्राप्त की, और उन्होंने भी अपने वंश्की गौरवशाली परंपरा को बनाए रखा.
02:55उनके पुत्र रिक्ष ने भी अपने पिता के पच्चहनों पर चलते हुए न्याय और शौर्य का अध्भुत प्रदर्शन किया, जिससे
03:03राज्य की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ी.
03:06रिक्ष के पुत्र संवरण ने वेदों के अध्ययन में गहरा रुची ली और अपने गुरुओं के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक ज्यान
03:14को प्राप्त किया, जिससे उनका शासन और भी न्याय संगत हो गया.
03:19उनकी तपस्या और ज्यान के कारण उन्हें देवत्व प्राप्त हुआ और उनका राज्य सम्रिध्धी और आध्यात्मिक उर्जा से उत्प्रोत रहा.
03:29शुकदेव जी ने कहा कि इन्ही महान पुर्खों की परंपरा में आगे चल कर वह वन्ष और भी तेजस्वी हुआ,
03:36जिसमें दुश्यंत जैसे पराक्रमी और धर्मात्मा राजा हुए.
03:41उन्होंने परिक्षित को समझाया कि यह वन्ष न केवल युद्ध भूमी में वीर था, बलकि ज्ञान, त्याग और प्रजाप्रेम में
03:49भी अतुलनिय था, जिसकी गाथाए अनंतकाल तक गाई जाएंगी.
03:54यह कहकर शुकदेव जी ने एक क्षण के लिए विराम लिया, जिससे परिक्षित को इन महान पुर्खों के त्याग और
04:01शौर्य पर चिंतन करने का अफसर मिला, जो आगे की कथा का आधार था.
04:07राजा दुश्यंत अपने विशाल रत पर सवार होकर सैनिकों के साथ एक घने और जीवन्त वन में आखेट के लिए
04:15निकले.
04:16वन की सघंता में एक अत्यंत तीवर और स्वर्ण जैसी चमक वाले म्रिग का पीछा करते हुए राजा का रत
04:23मुख्य सेना से बहुत दूर निकल गया.
04:27पीछा करते हुए राजा दुश्यंत महर्शी कन्म के अत्यंत शांत और पवित्र आश्रम की बाहरी सीमा पर पहुँचे, जहां शेर
04:35और हिरन भी एक साथ शांती से बैठे थे.
04:39इस तपो भूमी की मर्यादा का आदर करते हुए, राजा ने अपनी सेना, तीक्षन धनुश्बान और राजकी अरत को आश्रम
04:47के द्वार पर ही छोड़ देने का निश्चय किया.
04:50अत्यंत साधारन किन्तु तेजस्वी रेश्मी वस्त्रों में राजा दुश्यंत ने अत्यंत विनमर्ता के साथ उस शांत तपोवन में प्रवेश किया.
05:00आश्रम के एक सुन्दर और पुश्पों से लदे उपवन में महर्शी कन्व की परम सुन्दरी मानस पुत्री शकुंतला लताओं को
05:08जल अर्पित कर रही थी.
05:10जब राजा दुश्यंत की दृष्टी उस अनुपम सुन्दरी पर पड़ी तो वे उसके साथगी पूर्ण सौन्दर्य और अलौकिक तेज को
05:18देखकर वही ठिठक गए.
05:21किसी अजन्बी के आगमन की आहट पाकर शकुंतला ने घूम कर देखा और उसकी आखें उस तेजस्वी और मर्यादित राजा
05:29से मिल गई.
05:31एक अप्रिचित पुरुष की उपस्थिती और उसके दिव्य आकर्शन को देखकर शकुंतला के मन में लज्जा का भाव जागा और
05:39उसने संकोच से अपनी आखें जुका ली.
05:43राजा दुश्यंत ने अत्यंत शिष्ट तापूर्वक आगे बढ़कर प्रणाम किया और अपना परिचय हस्तिनापूर के समराट के रूप में देते
05:52हुए उनका परिचय पूछा.
05:55शकुंतला ने एक उत्तम अतिथी की भाती राजा का स्वागत किया और उन्हें बैठने के लिए कुशासन देकर वन के
06:02मीठे फल और शीतल जल अर्पित किया.
06:06मधुरवानी में उसने बताया कि वह विश्वामित्र और अपसरा मेनका की संतान है, जिसका पालन पोशन महर्शी कंव ने अत्यंत
06:14स्नेह से अपनी पुत्री की तरह किया है.
06:18उसके वचनों की पवित्रता और अध्भुत गरिमा को देखकर दुश्यंत के मन में यह पूर्ण विश्वास हो गया कि यही
06:26देवी उनके जीवन की अर्धांगिनी बनने के योग्य है.
06:31राजा दुश्यंत ने अपने हृदय के अनुराग को प्रकट करते हुए शकुंतला के समक्ष गंधर्व विवाह का प्रस्ताब रखा, जो
06:39दोनों की आपसी सहमती से धर्म सम्मत था.
06:43राजा के धर्म प्रायन चरित्र और उनके प्रती अपने मन में उमरते प्रेम को स्वीकार करते हुए, शकुंतला ने लजजापूर्वक
06:51अपनी मौन स्वीकृती दे दी.
06:54पवित्र व्रिक्षों, बहती हुई मालिनी नदी और वन के मूग पशुपक्षियों को साक्षी मान कर दोनों ने गंधर्व विवाह के
07:02पवित्र सूत्र में बंधने का संकल्प लिया.
07:06उस्तपोवन के एकांत और अत्यंत मनोहर वातावर्ण में दोनों नवदमपती प्रेम और आनंद के सुन्दर क्षन व्यतीत करने लगे.
07:15किन्तु शीघ्र ही हस्तिनापूर के राजकाज और प्रजा के प्रती अपने कर्तवियों के कारण राजा दुश्यंत को पुन्ह अपनी राजधानी
07:24लोटने की आवश्यक्ता हुई.
07:26विदा लेते समय, राजा दुश्यंत ने अत्यंत प्रेम से अपने नाम से अनकित राज किये स्वर्ण मुद्रिका शकुंतला की उंगली
07:34में पहनाई और शीघ्र ही उसे सम्मान पूर्वक महल ले जाने का वचन दिया
07:40भारी मन से राजा दुश्यंत अपने रत पर सवार होकर प्रस्थान कर गए और शकुंतला अपलक आखों से उन्हें तब
07:48तक देखती रही जब तक की धूल का गुबार भी ओजल नहीं हो गया
07:53राजा दुश्यंत के प्रस्थान के पश्चात, शकुंतला अत्यंत भारी मन से कुटिया की ओर लोटी और उसका संपून अस्तित्व केवल
08:02अपने प्रिये की स्मृतियों में लीन हो गया
08:05कुटिया के द्वार पर बैठ कर शकुंतला ने अपनी ठुट्डी को अपने कोमल हाथ पर टिकाया और उसकी आखें केवल
08:13उंगली में चमकती राजा की स्वर्ण मुद्रिका पर टिक गई
08:17कुछ ही दूरी पर खड़ी उसकी प्रिय सखिया, अनसुया और प्रियमवदा उसकी इस गहरी व्याकुलता को देखकर आपस में चिंतापूर्वक
08:27फुस्फुसाने लगी
08:29जैसे जैसे दिन धलने लगा, शकुंतला बाहरी संसार से इतनी विमुख हो गई कि उसे बन के पशुपक्षियों की चहचहाहट
08:37भी सुनाई देना बंध हो गई
08:40इसी बीच अपनी भयानक क्रोधागनी के लिए विख्यात महर्शी दुर्वासा ने अत्यंत उग्र रूप में कणव रिशी के आश्रम की
08:48सीमा में प्रवेश किया
08:50आश्रम के द्वार पर खड़े होकर महर्शी दुर्वासा ने अत्यंत उचे और गंभीर स्वर में अतिथी सत्कार के लिए पुकारा
08:59किन्तु अपने प्रेन के सागर में डूबी शकुन्तला को क्रोधी रिशी की वह तीवर गर्जना भी सुनाई नहीं दी और
09:06वह मौन बैठी रही
09:09महर्शी दुर्वासा ने दूसरी बार और भी अधिक प्रचंड स्वर में अपनी उपस्थिती की घोशना की परंतु शकुन्तला अपनी ही
09:17समाधी में लीन रही
09:19उस समय शकुन्तला की दोनों सक्खिया अन्सुया और प्रियमवदा कुटिया से बहुत दूर घने जंगल में पुश्पचयन कर रही थी
09:27जिससे वे इस विकट परिस्थिती से अन्भिज्य रही
09:32स्वयं को एक साधारन कन्याद्वारा उपेक्षित पाकर महर्शी दुर्वासा का स्वाभिमान आहत हुआ और उनके मस्तक पर क्रोध की रेखाएं
09:41उभराई
09:43क्रोध के वशी भूत होकर रिशी दुर्वासा ने अपने कमंडलू से जल निकाला और श्राप देने के लिए अपना दाहिना
09:50हाथ उठा लिया
09:53महर्शी ने गर्जना करते हुए कहा जिसके ध्यान में खोकर तुने मुझ जैसे तपस्वी अतिथी का अनादर किया है
10:00वह तुझे उसी प्रकार भूल जाएगा जैसे कोई मदिरा पीने वाला अपनी पूर्व बातों को भूल जाता है
10:08उस भयानक श्राप के प्रभाव से वातावर्ण में एक काली तरंग उठी जो सीधे शकुंतला के उपर से होकर गुजरी
10:16परंतु वह अपनी सुधबुध खोए बैठी रही
10:20रिशी की उस वजर के समान भीशन वाने को सुनकर अनसुया और प्रियमवदा के हाथों से फूलों की टोक्रिया छूट
10:27कर धर्ती पर बिखर गई
10:30दोनों सक्खिया घबराकर पागलों की भांती कुटिया की ओर दोड़ी और क्रोध से लाल पीले हो रहे महर्शी दुर्वासा के
10:38चर्णों में गिर पड़ी
10:40अक्यंत व्याकुल होकर अनसुया ने महर्शी से प्रार्थनाकी की शकुंतला भोली और नासमझ है और उसने यह अपराध जानबूच कर
10:49नहीं बलकी प्रेम की विकलता में किया है
10:53सक्खियों की सच्ची निष्ठा और शकुंतला के निष्चल प्रेम की बात सुनकर महर्शी दुर्वासा का प्रचंड क्रोध थोड़ा शान्थ हुआ
11:02महर्शी ने कहा मेरा श्राप पूरी तरह मिथ्या नहीं हो सकता परंतु जब वह राजा को उनकी दी हुई कोई
11:09पहचान दिखाएगी तो उन्हें उसका पुनह स्मरण हो जाएगा
11:14अपना श्राप संशोधित करने के उपरांट महर्शी दुर्वासा एक भयानक आंधी की तरह आश्रम से प्रस्थान कर गए और पीछे
11:23केवल सन्नाटा छोड़ गए
11:25सक्षियों ने राहत की सांस ली और शकुन्तला के कोमल हरिदय की रक्षा के लिए इस श्राप की बात गुप्त
11:32रखने तथा राजा की मुद्रिका पर पूर्ण भरोसा रखने का निश्चय किया
11:38शकुंतला अपने प्रिय आश्रम और सक्खियों से विदा लेकर माता गौत्मी और महर्शी कंव के शिशों के साथ हस्तिनापूर की
11:46ओर प्रस्थान करने की तैयारी करती है
11:50महर्शी कंव नम आखों से अपनी प्रिय पुत्री शकुंतला को आशिर्वाद देते हैं जबकि तपोवन के मूख्हिरन और पक्षी भी
11:58अपनी प्रिय सक्खी की विदाई पर अत्यंत उदास दिखाई देते हैं
12:04आश्रम की शांत सीमाओ को पार कर शकुंतला अपनी टोली के साथ पत्रीले रास्तों पर हस्तिनापूर की ओर आगे बढ़ती
12:12है जहां उसका हृदय अपने स्वामी से मिलने की आतुरता से धड़क रहा है
12:18मार्ग की ठकान और गर्ग के भार के बावजूद शकुंतला के मुख पर महाराज दुश्यंत के साथ सुखद पुनरमिलन की
12:26कलपना से एक मंद मुस्कान तैर रही है
12:30दोकहर की चिल्चिलाती धूप से राहत पाने के लिए यह यात्रियों का समूव गंगा नदी के पावन तट पर बने
12:37शचीतीर्थ नामक एक सुंदर घाट पर विश्राम करने के लिए रुपता है
12:43जब शकुंतला सूर्य देव को अर्ध्य देने के लिए अंजली में जल भरती है तब महाराज दुश्यंत की दी हुई
12:51वह चमकीली मुद्रिका धीली होकर चुपके से उसकी उंगली से नदी की लहरों में सरक जाती है
12:58नदी की गहरायों में तैरती हुई एक बड़ी सुनहरी मचली उस चमकती हुई दिव्य मुद्रिका को कोई खाद्य पदार्थ समझ
13:06कर तुरंत निगल लेती है
13:09अपनी इस अमूल्यक्षती से सर्वथा अंजान शकुंतला अपनी यात्रा पुनह प्रारंभ करती है और आशावान आखों से दूरक्षितिच पर दिखाई
13:18देने वाले हस्तिनापूर के वैभव को देखती है
13:23हस्तिनापूर के गगंचुंबी स्वर्ण द्वारों को देख कर वन में पलीब्धी शकुंतला विस्मय से भर जाती है जहां प्रहरी उनकी
13:31आगवानी कर उन्हें भीतर ले जाते है
13:35राजसभा के विशाल और अलंकृत सिनहद्वार से प्रवेश करते हुए शकुंतला का हृदय एक अज्यात भय और भारी कमपन से
13:44व्याकुल होने लगता है
13:47सिनहासन पर विराजमान महाराज दुश्यंत का रूप देखकर शकुंतला की आखें चमक उठती हैं
13:53किन्तु दुर्वासा के श्राप के कारण राजा के चहरे पर केवल एक शून्य और अजन्बी भाव दिखाई देता है
14:01शकुंतला अत्यंत संकोच के साथ महाराज के सम्मुख खड़ी होती है
14:06परन्तु उनकी ओर से किसी स्वागत या प्रेन भरे शब्दों के नमिलने पर उसका उत्सा ठिठुर कर रह जाता है
14:15माता गौत मी आगे बढ़कर महाराज को स्मरन दिलाती हैं कि यह कन्व रिशी की पुत्री शकुंतला है
14:21जो गांधर्व विवाह के उपरांट अब उनके कुल के उत्तराधिकारी को जन्म देने वाली है
14:29श्राप के प्रभाव में बंधे दुश्यंत अत्यंत कठोर्ता से इस दावे को नकार देते हैं और कहते हैं कि वह
14:36इस स्त्री को नहीं जानते तथा यह किसी शड्यंत्र का भाग हो सकता है
14:42रिशी कन्म के क्रोधित शिश्य शारदवत राजा को उनके धर्म और मर्यादा की याद दिलाते हुए कहते हैं कि एक
14:49समराट को अपनी गर्भिनी पत्नी का इस प्रकार अनादर करना शोभा नहीं देता
14:56अत्यधिक व्यथित होकर शकुंतला राजा को विश्वास दिलाने के लिए कहती है कि वह उन्हें उनके प्रेम के प्रतीक स्वरूप
15:04दी गई वह राज की ये मुद्रिका दिखाएगी
15:07परंतु जैसे ही वह अपनी दाहिनी उंगली की ओर देखती है उसकी आखे भय से फटी की फटी रह जाती
15:14है उसकी उंगली सर्वता सूनी है और वह चमकीली अंगूठी गायब है
15:21राजसभा में उपस्थित दर्बारी और मंत्री उफास करने लगते हैं और राजा दुश्यंत इसे अपनी जूठी कहानी को छिपाने का
15:30एक कपटपूर्ण नाटक घोशित करते हैं
15:34महाराज दुश्यंत अत्यंत कठोर शब्दों में शकुन्तला को कुल्टा और छली कहकर अपने राज्य की सीमा से बाहर चले जाने
15:42का कठोर आदेश सुनाते हैं
15:45आखों में आसूलिये गर्भिनी शकुन्तला इस घोर अपमान से तूटकर रोती हुई राजसभा से बाहर निकलती हैं
15:53जबकि आसमान में काले बादल घिराते हैं और प्रकृती भी उसके दुख में रोने लगती हैं
16:01हस्तिनापुर की सीमाओं से घोर अपमानित होकर रोती हुई गर्भवती शकुन्तला अकेले ही उस भयानक और सघन वन की ओर
16:09बढ़ चली
16:11अत्यधिक मानसिक वेदना और शारिरिक ठकान के कारण शकुन्तला भूमी पर गिर पड़ी और अपनी माता अपसरा मेंका को पुकारने
16:19लगी
16:21तभी अचानक बादलों को चीरती हुई एक दिव्य अलोकिक स्वर्णिन रोशनी आकाश से घने जंगल के अंधकार को दूर करने
16:29लगी
16:30उस स्वर्णिन प्रकाश पुन्च के बीच से अपसरा मेंका अत्यंत ममतामई रूप में अपनी असहाय पुत्री की रक्षा के लिए
16:38आकाश से उतरी
16:40माता मेनका ने अत्यंत स्नेह से अपनी मूर्चित पुतरी शकुंतला को अपनी बाहों में उठाया और उन्हें बादलों के पारले
16:49उड़ी
16:50मेनका ने शकुंतला को पवित्र हेमकूट परवतपर स्थित महर्शी कश्यप के अत्यंत शांत और सुरक्षित आश्रम में पहुँचाया
16:59महर्शी कश्यप ने अपने दिव्य ज्यान से शकुंतला के पवित्र चरित्र को जानकर उसे अपने आश्रम में आश्रे प्रदान किया
17:08आश्रम के शांत और दिव्यवातावर्ण में रहकर शकुंतला अपनी दुहखद स्मृतियों को भूल कर संतान के जन्म की प्रतीक्षा करने
17:17लगी
17:18एक परमशुभ नक्षत्र और मंगलकारी घडी में शकुंतला ने एक अत्यंत तेजस्वी और कांतिमान बालक को जन्म दिया
17:27महर्शी कश्यप ने नवजात बालक के हाथ पैरों में चक्र और वजर जैसे समराथ पद के शुभ लक्षणों को देखा
17:36बालक के निर्भीक स्वभाव और अध्भुत बल को देखकर उसका नाम सरवद्मन रखा गया जिसका अर्थ है सब को वश
17:44में करने वाला
17:46जैसे जैसे वर्ष बीटते गए बालक सरवद्मन वन के हिंसक पशुओं के बीच अत्यंत सासी और बल्वान बनकर बड़ा होने
17:54लगा
17:55वह निर्भीक बालक वन के खुंखार शेरों को अपनी ओर बुलाता और उनके साथ ऐसे खेलता जैसे वे कोई पालतु
18:03जीव हो
18:05सरवद्मन खेल-खेल में बलपूर्वक शेर का मुह खोल देता और उसके पैने दातों को अपनी ननही उंगलियों से गिनने
18:13लगता था
18:15पुत्र के इस असीन साहस और पराकरम को देख कर शकुंतला का हृदय गर्व और मातरित्व के सुख से भर
18:22उठता था
18:23वन के विशालकाय हाथी भी इस ननहे बालक के सामने मस्तक जुका देते थे और वह उनकी पीठ पर चड़कर
18:31सवारी करता था
18:33महर्शी कश्यप के आश्रम का हर जीव उस बालक के दिव्यतेज से प्रभावित होकर उसका आग्याकारी बन गया था
18:41एक दिन महर्शी कश्यप ने सरवद्मन को देख कर भविश्यवाणी की की यह बालक आगे चलकर संपूर्ण प्रिथवी का चक्रवर्ती
18:50समराट बनेगा
18:52शकुंतला ने अपने वीर पुत्र को प्रेम पूर्वक गोद में लेकर उसे स्नान कराया और उसके मस्तक पर विजय का
18:59तिलक लगाया
19:01यही सरवद्मन आगे चलकर महा प्रतापी समराट भरत कहलाया जिनके नाम पर हमारे इस महान देश का नाम भारत पड़ा
19:10एक दिन कालिंदी नदी के पवित्रतट पर एक निर्धन मच्वारे के जाल में एक अत्यंत विशाल और चमकदार मचली फंसी
19:19जिसने नेती के बंदद्वार को खोलने की शुरुआत की
19:23जब उस मच्वारे ने मचली का पेट काटा तो उसके भीतर से महाराज दुश्यंत की वह दिव्य और बहुमुल्य राज
19:31की अंगूठी निकली जो शकुंतला से नदी में स्नान के दौरान गिर गई थी
19:37राजमुद्रा को देखते ही वह इमानदार मच्वारा तुरंथ हस्तिनापूर के भव्य और विशाल राजदर्बार में पहुँचा और उसने वह चमचमाती
19:46अंगूठी महाराज दुश्यंत को सौंप दी
19:50जैसे ही राजा दुश्यंत ने उस अंगूठी को अपने हाथ में लिया, महर्शी दुर्वासा के शाप का प्रभाव तुरंथ समाप्थ
19:58हो गया और उन्हें अपनी प्रिय पत्नी शकुंतला की संपूर्ण स्मृती वापस आ गई
20:04अपनी भूल और शकुंतला के प्रती किये गए अन्याय को याद करके महाराज दुश्यंत का हृदय गहरे पश्चाताप की अगनी
20:12में जलने लगा और उनकी आखों से अश्रु बहने लगे
20:17व्याकुल होकर महाराज दुश्यंत ने तुरंत अपने मंत्रियों को राज्य का कार्यभार सौपा और अपनी प्रिय पत्नी शकुंतला को खोजने
20:25के लिए घने जंगलों की ओर निकल पड़े
20:29दूसरी और महर्शी कश्यप के शांत और पवित्र आश्रम में शकुंतला का वीर पुत्र सरवद्मन निडर होकर भयंकर जंगली शेरों
20:37के बच्चों के साथ खेल रहा था
20:40आश्रम के निकट पहुँचकर महराज दुश्यंत ने जब एक ननहे बालक को सिह का मूँ खोलकर उसके दात गिनते देखा
20:48तो वे आश्चर्यचकित रह गए
20:51उस अलोकिक बालक की ओर आकर्शित होकर महराज दुश्यंत उसके समीप गए और उनके हिदय में पिता के अनुठे प्रेम
20:59और ममता की एक तीवर लहर दौड गई
21:03शेर के साथ खेलते समय बालक सरवद्मन की कलाई पर बंधा हुआ दिव्यरक्षा सूत्र भूमी पर गिर गया जिसे उठाने
21:11के लिए राजा दुश्यंत नीचे जुके
21:14यह देखकर आश्रम की तपस्विनिया भैभीत होकर चिल्ला उठीन की इस दिव्यरक्षा सूत्र को माता पिता के अतिरिक्त यदी कोई
21:23अन्य चुएगा तो यह सर्प बनकर डस लेगा
21:27किन्तु जैसे ही राजा दुश्यंत ने उस रक्षा सूत्र को अपने हाथ में उठाया वह सर्प नहीं बना जिससे यह
21:34सिद्ध हो गया कि वे ही इस बालक के वास्तविक पिता है
21:39इसी कोलाहल को सुनकर कुटिया से बाहर निकलती हुई शकुंतला वहां आई जो अत्यंत साधारन वस्त्रों में एक तपस्विनी की
21:48भांती प्रतीत हो रही थी
21:51वर्षों बाद अपनी प्रिय शकुंतला को देखकर राजा दुश्यंत की आखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली और वेस्तब्ध होकर उन्हें
21:59निहारने लगे
22:01महाराज दुश्यंत तुरंत शकुंतला के चर्णों में गिर पड़े और उन्होंने रोते हुए अपनी उस भूल के लिए क्षमा मांगी
22:09जो दुर्वासा के शाप के कारण हुई थी
22:13शकुंतला का कोमल हृदय पिघल गया और उन्होंने अपने प्रियपती को क्षमा कर दिया यह समझते हुए कि यह सब
22:21केवल नेती का एक क्रूर खेल था
22:24राजा दुश्यंत ने अपने पराक्रमी पुत्र सर्वद्मन को अपनी गोद में उठा लिया और उसे हृदय से लगा कर आनंद
22:32के आसु बहाए
22:34तभी वहां महर्शी कश्यप और माता अधिती प्रकट हुए जिन्होंने इस धर्मनिष्ट परिवार को अपना आशिर्वाद दे कर उनके मिलन
22:42को पूर्ण किया
22:44महाराज दुश्यंत ने अपने महाप्रतापी और पराक्रमी पुत्र का नाम भरत रखा और घोशनाकी की यह बालक आगे चलकर संपून
22:53प्रिथ्वी का चक्रवर्ती समराट बनेगा
22:56इसके पश्चात राजा दुश्यंत अपनी पत्नी शकुंतला और भावी समराट भरत को लेकर हस्तिनापूर लोटे जहाँ प्रजाने दीप जलाकर उनका
23:06भव्य स्वागत किया
23:09महाराजा दुश्यंत ने अपने व्रिद्ध होने पर परम प्रतापी पुत्र भरत का राज्या भिशेक किया और उन्हें हस्तिनापूर का नया
23:17समराट घोशित कर दिया
23:20सिनहासन पर बैठते ही चक्रवर्ती समराट भरत के मुखमंडल से एक दिव्य तेज उचसरजित होने लगा जिसने सम्पूर राज्यस्भा को
23:28आलोकित कर दिया
23:30अपनी प्रजा की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए समराट भरत ने एक विशाल और अपराजय सेना का गठन
23:38किया
23:38जिसमें हजारों पराक्रमी योध्धा और गजराज शामिल थे
23:43चक्रवर्ती समराट भरत ने सम्पूर्ण प्रिथवी को एक सूत्र में पिरोने के लिए अपनी दिग्विजय यात्रा का शंकनाद किया
23:51और चारों दिशाओं की ओर प्रस्थान किया
23:54अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान समराट भरत ने अपनी अध्भुत धनुर्विद्या और शौर्य से उन सभी उद्धंड राजाओं को परास्त
24:03कर दिया जिन्होंने धर्म का मार्ग छोड़ दिया था
24:07पराजित राजाओं ने समराट भरत की अधीनता स्वीकार करते हुए उनके चर्णों में बहुमूल्य रत्न, स्वर्ण आभूशन और दिव्य उफार
24:16अर्पित किये
24:18समराट भरत ने अपने सामराज्य में एक ऐसी न्याय व्यवस्था स्थापित की जहां अमीर और गरीब सभी के लिए न्याय
24:25के द्वार समान रूप से खुले थे
24:28अपने अखंड सामराज्य की संप्रभुता को प्रमानित करने के लिए समराट भरत ने गंगा के तट पर एक अत्यंत भव्य
24:36अश्वमेध यग्य का संकल्प लिया
24:39सोने के आभूशनों से सुसजित वह पवित्र श्वेट अश्व समराट भरत की विजय पता का लेकर निर्बाध रूप से संपूर्ण
24:47आर्यावर्त में विचर्ण करने लगा
24:50यग्यमंडप में बैठे महर्शी दीरघत्मा और अन्यत अपस्वी रिशियों ने वेदमंत्रों के सस्वर पाठ से पूरे वातावर्ण को अत्यंत पवित्र
24:59और इश्वरिय उर्जा से भर दिया
25:02समराट भरत ने पूर्ण श्रधा भाव से धधकते हुए यग्यकुंड में शुद्ध घृत और सोमरस की आहुतिया अर्पित की जिससे
25:11देवगण प्रसन्न हो उठे
25:13यग्यकी पवित्र आहुतियों से संतुष्ठ होकर देवराज, इंद्र और अन्यवैदिक देवता आकाश मार्ग से स्वर्ण रथों पर सवार होकर वहां
25:22प्रकट हुए
25:24एक के बाद एक समराट भरत ने गंगा और यमुना के पावन संगम पर सौ से भी अधिक महायग्यों का
25:31आयोजन करके प्रित्वी पर धर्म का स्वर्णिन युग स्थापित किया
25:36इन विशाल यग्यों के अवसर पर समराट भरत ने देश के कोने कोने से आये ब्राहमनों, दरिद्रों और संतों को
25:43करोडों दुधारुगाये, भूमी और अगाध स्वर्ण मुद्राय दान की
25:48यग्यों की पूर्णाहुती के पश्चाथ समराट भरत ने अपनी महारानी सुननदा के साथ गंगा के पवित्र जल में अवभृत स्नान
25:56कर दैविय शुद्धी प्राप्त की
25:59समराट भरत के कुशल शासनकाल में सामराट जी की सीमाए उत्तर में हिमवान परवत से लेकर दक्षिन के विशाल महासागर
26:07तक विस्तरित हो गई
26:10उनके सामराज्य में न तो कोई भुखमरी थी, न कोई अकाल और नहीं किसी को अकाल मृत्यु का भै था,
26:17क्योंकि धर्म स्वया वहां निवास करता था
26:21समराट भरत के इस अभूत पूर्व और धर्मनिष्ट चक्रवर्ती शासन के कारण ही देवों और रिशियों ने मिलकर इस पवित्र
26:28धरा का नाम स्थाई रूप से भारतवर्श रख दिया
26:33यह वह महान भूमी बन गई जहां देवताओं ने भी बार-बार जन्म लेने की लालसा व्यक्त की क्योंकि यह
26:39केवल एक सामराज्य नहीं बलकि साक्षात धर्म का स्वरूप थी
26:45अपने राजप्रासाद की अटारी पर खड़े होकर समराट भरत ने श्रद्धा और कृतग्यता से हाथ जोड़कर इश्वर को धन्यवाद दिया
26:54जिन्होंने उन्हें इस पावन राष्ट की सेवा का अवसर दिया
26:59कालचक्र अपनी गती से घूमता रहा और महाराज भरत के उसी महान वंश में कई पीधियों के बाद एक परम
27:06तेजस्वी बालक का प्राकट्य हुआ
27:09इस नवजात शिशु का नाम रंतिदेव रखा गया जिनके जन्म लेते ही राजमहल में चारों और दिव्य सुगंध फैल गई
27:17और पुरोहितों ने उनके परम भक्त होने की भविश्यवानी की
27:22बाल्यकाल से ही रंतिदेव का हृदय सांसारिक भोगों में नहीं बलकी चराचर जगत के स्वामी भगवान नारायन के चर्णों में
27:30लीन रहता था
27:32जब रंतिदेव का राज्या भिशेक हुआ तो उन्होंने मुकुट धारन करते समय भी स्वयं को केवल प्रजाका सेवक और भगवान
27:40का दास ही माना
27:42सिन्हासन पर बैठते ही राजा रंतिदेव ने घोशना की कि इस राज्य का अन्न और धन उनका नहीं बलकी साक्षात
27:50नारायन स्वरूप दरिद्र नारायन का है
27:54वे प्रत्येक प्राणी में चाहे वह विद्वान ब्राह्मन हो, चांडाल हो या वन का मुक पशु हो, साक्षात भगवान विश्नु
28:02का ही रूप देखते थे
28:04राजा ने अपने राजकोश के द्वार खोल दिये और प्रतिदिन दीन दुखियों, अनाथों और ब्राहमनों को स्वर्ण, वस्त्र तथा अन्न
28:12का मुक तहस्त से दान करने लगे
28:16महाराज रंतिदेव के इस अभूत पूर्वदान की कीर्टी सुनकर दूर दूर से याचक राजदवार पर आने लगे और कोई भी
28:23कभी खाली हाथ नहीं लोटा
28:26जब मंत्रियों ने चिंतित होकर खाली होते राजकोश के बारे में सचेत किया, तो रंतिदेव ने मुस्कुराते हुए कहा कि
28:34जिस लक्ष्मी के स्वामी स्वयहरी हैं, उसकी चिंता कैसी
28:39एक दिन जब दान के लिए कुछ न बचा, तो राजा ने अपने शरीर पर धारन किये हुए बहुमूल्य सुवर्ण,
28:46आभूशन और कुंडल भी एक निर्धन परिवार को सौंप दिये
28:51उनकी महारानी ने भी अपने पती के इस परमधर्म का आदर करते हुए मुस्कुराते हुए अपने सारे सुवर्ण, कंगन और
28:59हार याचकों को समर्पित कर दिये
29:03वैभवशाली राजप्रासाद अब पूरी तरह से खाली हो चुका था, परन्तु वहां की दीवारों में वैभव के स्थान पर केवल
29:10हरिनाम का दिव्य कीर्टन गूझ रहा था
29:13राजा रंतिदेव ने स्वेच्छा से अपने भव्य राज महल का त्याग कर दिया और अपनी पतनी तथा बच्चों के साथ
29:21वन में एक साधारन परनकुटी बना कर रहने लगे
29:25अब उनके पास न तो कोई सेना थी और नहीं कोई संपत्ती वे केवल प्रारब्ध से जो कुछ मिल जाता
29:32उसी से अपनी क्षुधा शांत करते थे
29:36कई कई दिनों तक पूरा परिवार बिना अन्न और जल के उपवास करता परन्तु रंतिदेव के मुख मंडल का तेज
29:43और दिव्य मुस्कान कभी फीकी नहीं पड़ी
29:47भूख और प्यास से अत्यंत दुर्बल होने के बाद भी राजा रंतिदेव रात दिन केवल अश्टाक्षर मंत्र का जाप करते
29:55हुए इश्वर के ध्यान में मगन रहते थे
29:58यदि कभी वन से कुछ कंदमूल मिल भी जाते तो वे उसे स्वयंग रहन करने से पूर्व भूखे पक्षियों और
30:05जीवों को बड़े प्रेम से खिला देते थे
30:09एक दिन जब 48 दिनों के कठोर उपवास के बाद उन्हें थोड़ा सा जल और हल्वा प्राप्थ हुआ तभी द्वार
30:16पर एक भूखा ब्राहमन अतिथी आकर खड़ा हो गया
30:21राजारंतिदेव ने उस अतिथी में भी साक्षात भगवान विश्णू के दर्शन किये और बिना किसी संकोच के अपना वह एक
30:29मात्र भोजन सादर उनके चर्णों में अर्पित कर दिया
30:33इस प्रकार अतियंत अभाव में भी दूसरों के दुख को अपना मानने वाले राजारंतिदेव की इस पराकाश्ठा की परीक्षा लेने
30:41के लिए स्वयंत्र देव और देवराज इंद्र अद्रिश्य रूप से देखने लगे
30:47ब्राहमन अतिथी के जाने के बाद राजारंतिदेव अपने अत्यंत दुर्बल और भूखे परिवार के साथ बैठ कर बचे हुए भोजन
30:55को आपस में बांटने की तयारी करने लगे
30:59जैसे ही रंतिदेव ने भोजन का वह छोटा सा टुकड़ा अपने सूखे होठों की ओर बढ़ाया तभी कुटिया के द्वार
31:06पर एक अत्यंत ठका हुआ और भूखा शूद्र अतिथी आखडा हुआ
31:11उस निर्धन अतिथी की दीन अवस्था को देखकर राजा रंतिदेव के मन में तनिक भी संकोच नहीं हुआ और उन्होंने
31:19अत्यंत आदर पूर्वक उसे अपनी कुटिया के भीतर आमंत्रित किया
31:25रंतिदेव ने उस भूखे अतिथी में साक्षात परमात्मा का अंश देखा और अपने हिस्से के बचे हुए भोजन का एक
31:33बड़ा भाग सहर्ष उनके चर्णों में समर्पित कर दिया
31:37वह अतिथी भरपेट भोजन ग्रहन करने के बाद राजा को कल्यान का आशिरवाद दे कर चला गया जिससे अब कुटिया
31:45में केवल एक ग्रास भोजन और थोड़ा सा जल ही शेश बचा
31:50जब राजा रंतिदेव उस अंतिन ग्रास को अपने परिवार में बाटने ही वाले थे तभी वहाँ अपनी भूखी टोलियों के
31:58साथ कई शिकारी कुट्टे और उनका स्वामी आकर खड़े हो गए
32:03उस व्याध ने अत्यंत करून स्वर में कहा कि वह और उसके वफादार कुट्टे कई दिनों से वन में भूखे
32:10प्यासे भटक रहे हैं इसलिए उन्हें कुछ भोजन प्रदान किया जाएं
32:15रंतिदेव ने उन बेजुबान पशुओं और भूखे शिकारी की पीडा को अपनी स्वयं की पीडा से भी बढ़कर माना और
32:23उनके प्रती अगाध करूना से भर उठे
32:27राजा ने बिना किसी संकोच के वह अंतिम ग्रास भी उस व्याध और उसके भूखे कुट्टों को सौंप दिया जिससे
32:34उनकी भूख शान्त हो सके
32:37वह व्याध और उसके सभी कुट्टे त्रिप्थ होकर वहाँ से चले गए जिससे अब राजा के पास स्वयं और अपने
32:44परिवार के लिए केवल एक पात्र जल ही शेश बचा था
32:49भूख और प्यास से अत्यंत व्याकुल रंतिदेव ने जैसे ही अपने प्राणों की रक्षा के लिए उस जलपात्र को अपने
32:56होठों से लगाना चाहा वैसे ही एक और घटना घटित हुई
33:01तभी कुटियों के बाहर से एक अत्यंत प्यासे और मरनासन्य चांडाल के कराहने की आवाज आई जो पानी की एक
33:09एक गुंद के लिए तड़प रहा था
33:12उस मरनासन्य व्यक्ती की अत्यंत गैनिय पुकार सुनकर राजा रंतिदेव का हृदय पिखल गया और वे अपनी भीशन प्यास को
33:20पूरी तरह से भूल गए
33:23रंतिदेव ने इश्वर से प्रार्थना की कीवे मोक्ष या सिध्धिया नहीं चाहते बलकि केवल सभी जीवों के दुखों को स्वयन
33:31सह कर उन्हें सुखी देखना चाहते हैं
33:35अपनी इस पवित्र प्रार्थना के साथ महान राजा ने उस अंतिम जलपात्र का सारा जल अत्यंत को मलता से उस
33:43प्यासे चांडाल के मुख में डाल दिया
33:46जैसे ही जल की अंतिम बून्द उस व्यक्ति के कंठ में गई वैसे ही वह पूरी कुटिया और उसके आसपास
33:53का वातावर्ण एक अलोकिक दिव्य प्रकाश से जग्मगा उठा
33:58अचानक वे सभी अतिथी, ब्राहमन, शूद्र, व्याध और चांडाल वहां से अग्रिश्य हो गए और उनके स्थान पर ब्रहमांड के
34:06स्वामी त्रिदेव और देवराज इंद्र प्रकट हो गए
34:11साक्षात भगवान विश्नु, महादेव, शिव, ब्रहमाजी और इंद्र देव अपने परम भव्य और तेजस्वी रूपों में राजारंतिदेव के सम्मुख आकाश
34:20में सुशोभित हो रहे थे
34:23राजारंतिदेव ने उन परम देवताओं को देखकर किसी भौतिक वर्दान की कामना नहीं की, बलकी केवल भगवान श्रीहरी के चर्णों
34:31में अनन्य भक्ती की आचना की
34:34राजा की निशकाम भक्ती और पराकाश्था की करुणा से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें आशिरवाद दिया, जिससे उनका सम्पून राज्य
34:43पुन्ह धंधान्य और खुशहाली से सम्रिध हो गया
34:48परमेश्वर की भक्ती और प्राणि मात्र के प्रती निस्वार्थ करुणा का दिव्य उपदेश देकर राजा रंतिदेव ने अपने समस्त नागरिकों
34:56का कल्यान किया
34:58राजा रंतिदेव अपनी निश्काम भक्ती के प्रभाव से भौतिक बंधनों से मुक्ठ होकर अपने समस्थ सेव को सहित साक्षात वैकुंठ
35:06धाम को प्रस्थान कर गए
35:09रंतिदेव के उपरांथ चंदरवंश की पवित्र परंपरा में अनेक प्रतापी राजाओं का जन्म हुआ जिन्होंने धर्म की रक्षा करते हुए
35:18प्रित्वी पर शासन किया
35:20इसी महान राजवंश में परम पराक्रमी और न्यायत्रिय राजा दुश्यंत का उदे हुआ, जिनकी कीर्ती और शौर्य की गाथा चारों
35:29दिशाओं में गूँज रही थी
35:31एक दिन राजा दुश्यंत अपने विशाल सैनियबल और रथों के साथ घने और रहस्यमे वनों में आखेट के लिए निकले
35:40वन में विचरते हुए राजा दुश्यंत महर्शी कण्व के परमशांत और तपोमय आश्रम के निकट पहुँचे, जहां हिंसक पशुभी वैर
35:49भूल कर प्रेन से रहते थे
35:51वहां राजा ने अनुपम सौंदर्य की साक्षात प्रतिमा और महर्शी कण्व की दत्तक पुतरी शकुंतला को अपनी सक्खियों के साथ
36:00पौधों को सीच्चते हुए देखा
36:03जैसे ही शकुंतला और दुश्यंत की द्रिष्टी एक दूसरे से मिली तपोवन का वह शांत वातावर्ण एक अपूर्व और दिव्य
36:11प्रेम के मौन राग से जंक्रित हो उठा
36:14राजा दुश्यंत ने अत्यंत आदर पूर्वक अपना परिचय दिया और शकुंतला के मुख से उनके रिशी विश्वामित्र और अपसरा मेनका
36:23की संतान होने की दिव्य कथा सुनी
36:27शकुंतला के सौंदर्य और शील पर मोहित होकर राजा दुश्यंत ने शास्त्रसम्मत गांधर्व विवाह का प्रस्ताव उनके सम्मुख रखा
36:36प्रकृती और तपोवन के समस्त देवों को साक्षी मान कर दोनों ने एक दूसरे के गले में पुश्पमालाई डाल कर
36:43गांधर्व विवाह संपन्न किया
36:46राजधानी लोटने से पूर्व राजा दुश्यंत ने प्रेम के प्रतीक स्वरूप अपने नाम से अनकित राजकीय स्वर्ण मुद्रिका शकुंतला की
36:55उंगली में पहना दी
36:57पती के विरह में लीन शकुंतला जब गहरे विचारों में खोई हुई थी तब परमक्रोधी महर्शी दुर्वासा ने आश्रम के
37:05द्वार पर दस्तक दी
37:07अपने अपमान से क्रोधित होकर दुर्वासा रिशी ने अत्यंत भयानक शाप दिया कि जिसके ध्यान में तुख होई है वह
37:15तुझे पूरी तरह भूल जाएगा
37:18शकुन्तला की सक्खियों की विनमर प्रार्थना पर पिघल कर रिशी ने कहा कि राजा को कोई पहचान दिखाने पर ही
37:25उन्हें पुनह स्मृती प्राप्थ होगी
37:28समय बीतने पर शकुन्तला ने एक अत्यंत तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया जो निर्भीक्ता से वन के भयंकर शेरों के
37:36साथ खेला करता था
37:39महर्षी कन्म के आशिरवाद और विदाई के आसूों के साथ शकुन्तला अपने पुत्र को लेकर राजा दुश्यंत की सभा की
37:47ओर प्रस्थान कर गई
37:49मार्ग में पवित्र शचीतीर्थ नदी को पार करते समय, शकुंतला के हाथ से राजा दुश्यंत की वह अमुल्य स्वर्ण मुद्रिका
37:57अचानक जल में गिर गई
38:00शाप के प्रभाव से राजा दुश्यंत ने अपनी धर्म पत्नी शकुंतला को पहचानने से इनकार कर दिया, जिससे सम्पूर्ण राजसभास
38:08तब धरह गई
38:10अपनी इस अत्यंत करोन दशा पर रोती हुई शकुंतला को साक्षात एक दिव्य जोती के रूप में उनकी मातामेन का
38:18आकाश मार्ग से ले गई
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