हिरण्यकशिपु के अत्याचारों के बीच, भक्त प्रह्लाद का जन्म एक नई आशा लेकर आया। इस एपिसोड में हम देखेंगे कैसे देवर्षि नारद के सानिध्य में प्रह्लाद ने बचपन से ही भगवान विष्णु के प्रति अटूट भक्ति विकसित की। जब वह अपने पिता के महल में लौटता है, तो उसका वैष्णव स्वभाव हिरण्यकशिपु के लिए चुनौती बन जाता है। शैतान शिक्षकों के प्रयासों और हिरण्यकशिपु के क्रोध के बावजूद, प्रह्लाद की भक्ति अडिग रहती है। उसकी मासूमियत और दृढ़ विश्वास किस प्रकार दैत्य राज के सिंहासन को हिला देता है? देखिए भक्त प्रह्लाद की अविश्वसनीय कथा और जानिए कैसे उसने अपने सहपाठियों को भी परम सत्य का मार्ग दिखाया। #Prahlada #BhagavataPurana #Hiranyakashipu #VishnuBhakti #Narasimha #PrahladLeela #HinduMythology #DevotionalStory #SanatanDharma #YouTubeIndia #SpiritualJourney #PauranicKathayen #श्रीमद्भागवतम् #भक्तप्रह्लाद
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00एक शांत वन में स्थित नारद मुनी के पवित्र आश्रम में हिरन्यक्षि पुसे भैभीत गर्भवती कयाधू ने शरण ली, जहां
00:08रिशियों और ब्रहमचारियों के बीच शांती का वास्था।
00:12नारद मुनी ने कयाधू को सहर्ष स्वीकार किया और अपने आश्रम में आश्रे प्रदान किया, उनके दिव्य ज्यान से उनकी
00:20आत्मा को शांती प्रदान की।
00:42उसके ननहे हृदय में दिव्य ज्यान की नीम रखी जा रही थी।
01:12समय बीटता गया और नारद आश्रम की पवित्र भूमी पर एक असाधारन शिशु का जन्म हुआ, जिसकी आखें जन्म से
01:21ही दिव्य चमक लिये हुए थी।
01:23नारद मुनी ने नवजात प्रहलाद को अपनी बाहों में उठाया और उसकी आखों में ब्रहमांड की गहराई को देखकर तुरंत
01:32उसकी असाधारन नेती को पहचान लिया।
01:35कयाधू ने अपने पुत्र की ओर देखा, उसकी आखों में एक ऐसी शान्ती और चमक देखकर आश्चर यचकित थी, जो
01:43किसी साधारन शिशु में नहीं पाई जाती।
01:47चोटे प्रहलाद ने अपनी तोतली भाशा में भी भगवान विश्नु के नामों का उच्चारन करना शुरू कर दिया। उसकी हर
01:55चेश्टा में नारायन के प्रती सहच प्रेम झलकता था।
01:59नारद मुनी ने युवा प्रहलाद की असाधारन भक्ती को देखकर संतोश व्यक्त किया। यह जानते हुए कि उनके बीज बोए
02:07गए थे और एक महान आत्मा विच्सित हो रही थी।
02:11आश्रम के अन्य बच्चे खेलते थे लेकिन प्रहलाद उनसे अलग था। उसका ध्यान सदैव भगवान नारायन के दिव्य नामों और
02:20कथाओं पर केंद्रित रहता था।
02:23जब नारद मुने ध्यान करते थे तो युवा प्रहलाद उनके बगल में बैठकर अपनी ननी आखों को बंध करके उनही
02:31की तरहे ध्यान करने का प्रयास करता था।
02:34नारद मुनी ने प्रहलाद को भगवान विश्णु के विभिन अवतारों, उनकी लीलाओं और ब्रहमांडिय भूमिकाओं की अद्भुत कहानिया सुनाई
02:44प्रहलाद ने अपने गुरु नारद मुनी से ब्रहमांड परम सत्य और भगवान के स्वभाव के बारे में गहरे और दार्शनिक
02:52प्रशन पूछे, अपनी बुद्धी से उन्हें विस्मित कर दिया
02:56कयाधू अपने पुत्र की आध्यात्मिक गहराई को देख कर गर्व और आश्चर्य से भर जाती थी, यह समझते हुए कि
03:04उसने एक साधारन शिशु को जन्म नहीं दिया था
03:09प्रहलाद ने आश्रम के अन्य बच्चों को इकठा किया, उन्हें भगवान विश्नों के भजन और कीर्टन सिखाए, जिससे पूरा आश्रम
03:17भक्ती की मधुर ध्वनी से गुंज उठा
03:20उसकी तीवर भक्ती में लीन, प्रहलाद का चहरा अकसर एक अलौकिक चमक से दीप्तिमान होता था, जो उसकी शुद्ध आत्मा
03:29को प्रतिबिम्बित करता था
03:31नारद मुनी ने प्रहलाद के अध्वितिय आध्यात्मिक विकास को देखा और भविश्यवानी की की यह बच्चा भविश्य में धर्म की
03:40स्थापना के लिए एक महान साधन बनेगा
03:43इस प्रकार नारद आश्रम में प्रहलाद की भक्ती अडिग और शुद्ध हो गई, उसे आने वाली चुनोतियों और दैत्यराज के
03:52गढ़ में विश्णुनाम का उद्गोश करने के लिए तयार किया गया
03:56देवलोग से धर्ती पर लोटते हुए, कयाधू और प्रहलाद ने दैत्यराज के भव्य और भयावह राजमहल के विशाल द्वार पर
04:05कदम रखा, जहां प्रतीक्षा में खडी नगरी और उसके संरक्षक थे
04:09उनकी वापसी की सूचना बिजली की तरह राजमहल में फैल गई और जल्द ही द्वारपालों ने दैत्यराज हिरन्यक्षिपु तक यह
04:18सुखद समाचार पहुँचाया
04:21पुत्र और पत्नी के आगमन का समाचार सुनते ही, हिरन्यक्षिपु का हृदय तीवर आनन से भर उठा और वह अपनी
04:29सभा छोड़कर उनसे मिलने के लिए आतुरता से भागा
04:34महल के प्रांगण में पहुँचकर हिरन्यक्षिपु ने अपनी पत्नी कयाधों को गर्मजोशी से गले लगा लिया
04:40वर्षों के बिछोह के बाद उनके मिलन में एक मूप भावना का आदान प्रदान हुआ
04:47ततपश्चात उसका ध्यान अपने पुत्र प्रहलाद पर पड़ा जिसे उसने अपनी मजबूत भुजाओं में उठा लिया
04:54उसके चहरे पर एक पिता का दुरलब सनेह और गर्व जलक रहा था
04:59पुत्र को अपनी गोद में लिये हिरन्यक्षिपु ने उचसुपता से उसकी आखों में देखा
05:05उसके भविष्य के दैत्य समराथ बनने के स्वपन संजोते हुए
05:10परंतु जल्द ही उसकी पैनी द्रिष्टी ने प्रहलाद के चहरे पर एक असामान्य शांती और एक अलौकिक दिव्य तेज को
05:18देखा
05:18जो दैत्यों के स्वभाव से कोसों दूर था
05:22प्रहलाद ने अपने पिता को अत्यंत आदर पूर्वक प्रणाम किया
05:26उसके मुख पर वही शांत मुस्कान और आखों में गहरा आध्यात्मिक भाव विद्यमान था
05:34फिरन्यक्षिपु की प्रारंभिक खुशी धीरे-धीरे एक असपष्ट बेचैनी में बदल गई
05:38यह बालक उसके कुल के कुरूर स्वभाव से भिन्न क्यों लग रहा था
05:56वे प्रहलाद की गहन भक्ती को कम करके आका केवल उसके सामान्य अध्ययन और अच्छी शिक्षा पर जोर दिया
06:04क्योंकि वह दैत्यराज के क्रोध से भयभीत थी
06:08लेकिन हिरन्यक्षिपु संतुष्ट नहीं हुआ
06:11उसकी पैनी अगनिसी आखें प्रहलाद पर टिकी रही जो पूरी बातचीत के दौरान प्रशान्तचित और अडिक खड़ा था
06:20अपने मन में बढ़ती बेचैनी के साथ हिरन्यक्षिपु ने अपने पुत्र की निष्ठा का परीक्षन करने का निष्चय किया
06:27उसे संदेह था कि कहीं उसे देवों ने दूशित तो नहीं कर दिया
06:33उसने कठोरता से प्रहलाद को आदेश दिया कि वह या तो दैतियों के शक्तिशाली मंत्रों का उच्चारन करे या अपने
06:40पिता हिरन्यक्षिपु की महिमा का गुनगान करे
06:44प्रहलाद अपनी भक्ती में अडिग बिना किसी जिजक के भगवान विश्णु के नाम का उद्गोश करने लगा
06:51उसके कंट से दिव्य नाम मधुर संगीत के समान प्रवाहित हुआ
06:57विश्णुनाम सुनकर हिरन्यक्षिपु का चहरा क्रोध और अविश्वास से विकृत हो गया
07:02उसकी आखों में भयंकर अगनी जल उठी
07:06उसके मन में क्रोध की ज्वाला धधक रही थी
07:09लेकिन पुत्र की मासूमियत और उसकी अटल भक्ती को देखकर वह एक पल के लिए भ्रमित हो गया कि यह
07:16सब कैसे हो सकता है
07:19क्रोध में गर्जना करते हुए उसने ततकाल अपने राजपुरोहितों शंड और अमर्क को बुलाया
07:25और उन्हें प्रहलाद को दैत्य शिक्षा देने का कठोर आदेश दिया
07:30उसने गुरूओं को चेतावनी दी की वे प्रहलाद के हरिदय से किसी भी दिव्य प्रभाव को जड़ से मिटा दे
07:37और उसे शुद्ध दैत्य स्वभाव में ढाले
07:41प्रहलाद अपनी आंतरिक भक्ती में अविचल, शांती और संकल्प के साथ गुरूओं के पीछे चला गया
07:48जबकि हिरन्यक्षिपू उसे बढ़ती हुई चिंता और क्रोध के साथ देखता रहा
07:54प्रहलाद अपनी आंतरिक दिव्यता में स्थिर उन प्राचीन दैत्य गुरूओं शंड और अमर्क के पीछे चला
08:01जो उसे एक ऐसे गुरुकुल में ले जा रहे थे जहां विश्न विरोधी परमधर्म था
08:07वह गुरुकुल दैत्यों की आगामी पीधी को शक्ती, कुरूर्ता और असीमित महत्वा कांक्षा के बीज बोने के लिए स्थापित किया
08:15गया था
08:16जहां भय और विजय ही सर्वोच पाठ थे
08:20शंड और अमर्क ने तुरंथ ही अपनी शिक्षा आरंभ की
08:24जिसमें उन्होंने दैत्य कुल की महीमा, अजय शक्ती की प्राप्ती और शत्रुता पूर्ण देवताओं पर विजय प्राप्त करने की आवश्शक्ता
08:32पर बल दिया
08:34प्रहलाद ने हर शब्द को सुना, परंतु उसका अंतर्मन, एक कमल के समान, दैत्यों की इस विशैली शिक्षा से अचूता
08:42रहा, उसकी भक्ती की आभा उसके भीतर शान्ती से जलती रही
08:47गुरू ने प्रहलाद को राजनीती, कूटनीती और शत्रुतापूर्ण राज्यों पर हावी होने के लिए छलकपट के सिध्धान्त सिखाने वाली प्राचीन
08:56दैत्य पोथिया भेंट की
08:59प्रहलाद ने जिग्यासावश प्रशन किया कि क्या इन रन्नीतियों में धर्म और न्याय का कोई स्थान है, जिससे गुरूओं के
09:07चहरे पर हलकी सी जुझलाहट उभराई
09:10शंड और अमर्क ने उसके प्रशनों को बचकाना नादानी कहकर खारिस कर दिया, यह समझाते हुए कि दैत्यों के लिए
09:18विजय ही एक मात्र धर्म है
09:22तत्पश्चात उन्होंने अपने सबसे महत्वपूण पाठ की ओरुख किया, देवताओं, विशेशकर भगवान विश्नु के प्रती गहरी घेना और ग्वेश का
09:31बीज बोना
09:33प्रत्येक कटु शब्द के साथ प्रहलाद का हृदय विश्नु के प्रती और अधिक प्रेम से भरता गया, जैसे कीचड में
09:40कमल और भी खिल उठता है
09:43अन्य दैत्य बालक गुरूओं की शिक्षा से प्रेरित होकर, एक दूसरे पर श्रेश्थता साबित करने के लिए आकरामक और अहमकारी
09:52व्यवहार प्रदर्शित करने लगे
09:54इसके विप्रीत प्रहलाद ने अपने सहपाथियों के बीच विवादों को सुलजाने और शान्ती को बढ़ावा देने का प्रयास किया, जिससे
10:03दैत्य शिक्षा का मूल उद्देश्य विफल हो रहा था
10:07शंड और अमर्क ने प्रहलाद के इस अप्रत्याशित व्यवहार को देखा, उनके चहरों पर क्रोध और चिन्ता की गहरी रेखाएं
10:15उभर आई कि उनकी शिक्षा निश्फल हो रही है
10:20उन्होंने अपनी शिक्षा को और भी अधिक तीवर कर दिया, भौतिक सुखों, भोग विलास और संसार पर पूर्ण आधिपत्य स्थापित
10:28करने के महत्व पर जोर देते हुए
10:31किन्तु प्रहलाद ने इन पाठों को सांसारिक माया और क्षन भंगुर्ता की शिक्षा के रूप में ग्रहन किया, जिससे उसकी
10:39वेराग्य भावना और भी प्रगाड हो गई
10:42गुरू ने अन्तह उसे एक कठोर कार्य सौपा, एक ऐसा निबंध लिखना जिसमें हिरन्यक्षिपू की स्थुती हो और विश्नू की
10:51निंदा की गई हो
10:53प्रहलाद ने लिखना आरंभ किया, पर उसका हाथ अनायास ही भगवान विश्नू के दिव्य गुनों और महिमा का बखान करने
11:00लगा
11:02उसने आखे मुंद कर एक अटूट विश्वास और प्रेम के साथ भगवान विश्नू की स्थुती में एक मधुर प्रार्थना का
11:10पाठ किया
11:11शंड और अमर्क ने उसकी प्रार्थना को सुना, उनके चहरे पर पहले तो अविश्वास फिर भीशन क्रोध की छाया छा
11:19गई, उनकी आखें आग उगलने लगी
11:23वे क्रोध में गर्जना करते हुए प्रहलाद के पास आये, उससे उसकी इस अवग्याकारी भक्ती का कारण पूछते हुए
11:32प्रहलाद भयमुक्त और शांत चित्त से अपनी अटल भक्ती को भोशित करते हुए गुरूओं को बताया कि भगवान विश्णु ही
11:40परम सत्य है
11:42प्रहलाद की इस निडर सत्यवानी को सुनकर शंड और अमर्क का चहरा क्रोध से तम्तमा उठा और उन्होंने इसे गुरुप्रमपरा
11:50का भीशन अपमान माना
11:53अपने हाथों में बेंट उठा कर गुरूओं ने प्रहलाद को कठोर परिनाम भुगतने की चेताबनी दी और दैत्यकुल के सिध्धान्तों
12:01को पुनह स्विकार करने का दबाव बनाया
12:05किन्तु प्रहलाद के मुख पर भय का नामों निशान तक न था उनकी शांत और सौमे मुस्कान ने गुरूओं के
12:12कठोर हृदय को और अधिक व्याकुल कर दिया
12:15गुरूओं ने अत्यंत क्रोध में प्रहलाद को अलग बैठाया और कक्षा के अन्यबालकों को छल, बल और द्वेश की नीती
12:23पढ़ाना आरंभ किया
12:24कुछ समय पश्चात जब शंड और अमर किसी कारिवश आश्रम से बाहर गए तो प्रहलाद ने अफसर पाकर अन्यदैत्यबालकों को
12:34अपने पास बुलाया
12:37प्रहलाद ने अत्यंत प्रेम और करुना से परिपूर्ण वानी में उन निर्दोश बालकों से कहा कि यह असुरी विद्या केवल
12:44अहंकार और विनाश की ओर ले जाती है
12:48उन्होंने बालकों को समझाया कि मानव शरीर अत्यंत दुरलब है और इस क्षण भंगुर जीवन में केवल भगवान श्री हरी
12:56की भक्ती ही एक मात्र नित्य सत्य है
13:00प्रहलाद के श्रीमुख से टपक्ती भक्तिरस की धारा को सुनकर उन दैत्यबालकों के मन का अज्यान और असुरी संसकार धीरे
13:08-धीरे नश्ट होने लगे
13:10प्रहलाद ने अपने दोनों हाथ उठा कर मधुर स्वर में ओम नमो नारायनाय की पावन संकीर्तन ध्वनी छेडी जिससे संपूर्ण
13:19विद्यालय गुंजायमान हो उठा
13:22उस अलोकिक हरिकीर्तन के प्रभाव से दैत्यबालकों के हृदय में छिपी सुप्त भक्ती जागरित हो गई और वे अश्रुपूर्ण नेत्रों
13:30से प्रहलाद के साथ गाने लगे
13:33बालकों ने अपने हाथों में थामे हुए कूटनीती के ग्रंथ और असुरी अस्त्रशस्त्र दूर फेंक दिये और पूर्ण था विश्नुभक्ती
13:42के रंग में रंग गए
13:44प्रहलाद ने उन्हें बताया कि किस प्रकार अपनी माता के गर्भ में रहते हुए उन्होंने महर्शी नारत से इस परम
13:51दिव्य ज्ञान को प्राप्त किया था
13:54शन भर में वह तमोगुनी दैत्य विद्यालय बैकुंठ लोग के समान पावन और भक्तिमय धाम में परिवर्तित होता प्रतीत होने
14:02लगा
14:03जब गुरु शंड और अमर्क कक्षा में लोटे तो वहां का द्रिश देखकर उनके पैरों तले से भूमी खिसक गई
14:11और वे हक्के बक्के रह गए
14:14उन्होंने देखा कि जिन बालकों को असुर सामराज्य का भावी योध्धा बनना था वे सभी प्रहलाद के साथ लीन होकर
14:22श्री हरी का जैगोश कर रहे थे
14:25क्रोध और भय के अतिरेक से कापते हुए गुरूओं के हाथों से ताड़ पत्र के ग्रंथ और दंड छूट कर
14:31प्रित्वी पर गिर पड़े
14:33शंड और अमर्क ने तुरंत गर्जना करते हुए संकीर्तन बंद करवाया और प्रहलाद पर दैत्यवंश का विनाशक होने का भीशन
14:42आरोप लगाया
14:44वे समझ गए कि प्रहलाद ने केवल स्वयंको ही नहीं बलकि संपूर्ण दैत्यकुल की नई पीधी को विश्नुभक्त बना दिया
14:52है
14:54महाराज हिरन्यक्षिपु के भीशन कोप की कलपना मात्र से ही दोनों गुरुओं की आत्मा काम उठी और उन्होंने तुरंत राजसभा
15:02की ओर बढ़ने का निर्णय लिया
15:05अत्यंत भयभीत होकर वे दोनों गुरु प्रहलाद को साथ लेकर महाराज हिरन्यक्षिपु के सम्मुख उनका न्याय कराने के लिए चल
15:13पड़े
15:14भय से कापते हुए शंड और अमर्क बालक प्रहलाद को साथ लेकर अंधकार और आतंक से भरे महाराज हिरन्यक्षिपु के
15:23भव्य राज सभा के द्वार से भीतर प्रविष्ठ हुए
15:27विशाल कक्ष के मध्य में द्यत्यराज हिरन्यक्षिपु अपने स्वर्नजडित भयावा सिनहासन पर आसीन थे जिनके शरीर से निकलते तेजने संपूर्ण
15:37वातावर्ण को एक भीशन गरिमा से भर दिया था
15:41महाराज की तीक्षन ग्रिष्टी जैसे ही राज सभा में उपस्थित गुरुओं और प्रहलाद पर पड़ी एक शन के लिए संपूर्ण
15:49सभा में गेहन चुप पीछा गई
15:52गुरुओं के चहरे पर स्पष्ट भाय और चिंता की रेखाये खिंच गई थी क्योंकि वे जानते थे कि आज का
15:59दिन उनके लिए अत्यंत निर्नायक सिध्ध होने वाला था
16:03शंड ने साहस बटोरते हुए थर्थराती आवाज में बोलना आरंभ किया जैसे कोई तूफान से पहले की खामोशी तोड रहा
16:12हो
16:13उन्होंने बताया कि प्रहलाद की गतिविधिया सामान्य दैत्यबालकों से सर्वथा भिन्न और अत्यंत चिंताजन्प थी जो उनके शिक्षा प्रयासों को
16:23विफल कर रही थी
16:25अमर्क ने भी सिर जुका कर शंड की बात का समर्थन किया उनके शब्दों में छिपी निराशा और भैस पश्ट
16:32दिखाई दे रहा था
16:35संपूर्ण राजसभा के भैभीत वातावर्ण के बावजूद बालक प्रहलाद अत्यंत शांत स्थिर और निडर भाव से खड़े थे जैसे किसी
16:44दिव्य शक्ती से उत्प्रोथ हो
16:47उन्होंने आगे बताया कि प्रहलाद केवल स्वय ही नहीं बलकि अन्य दैत्यबालको को भी भगवान विश्णू की भक्ती का पाठ
16:55पढ़ा रहे थे
16:57इस बात को सुनते ही हिरन्यक्षिपु के रौधर मुख पर क्रोध की पहली भीशन ज्वाला प्रजवलित हुई जिसने उसके स्वर्णकवच
17:05को और अधिक चमका दिया
17:08गुरू ने असहायता से बताया कि उनके सभी कठोर प्रयास, दंड और शिक्षाय प्रहलाद के द्रिड संकल्प के सामने व्यर्थ
17:16सिद्ध हुए थे
17:18उन्होंने कापते हुए शब्दों में कहा कि प्रहलाद ने दैत्यकुल की भावी पीधी के मन में भी विश्नुभक्ती का बीज
17:25बोदिया था
17:27गुरुओं के प्रतेक शब्द के साथ हिरन्यक्षिपु का भीशन क्रोध ज्वाला के समान प्रजवलित होता गया
17:33उसकी स्वर्णक्वच पर अगनी की आभा नाचने लगी और उसने अपने रत्नजडित सिनहासन से हुंकार भरते हुए उठने का प्रयास
17:42किया
17:43महाराज की उस भीशन गर्जना से सम्पून राज सभाथर्रा उठी सभी दर्बारी भय से कापते हुए अपने स्थान पर जडवत
17:52खड़े रह गए
17:54हिरन्यक्षिपु की लालिमा लिये आखें सीधे प्रहलाद पर गड़ गई जैसे वह अपने ही पुत्र में एक अंचाहे शत्रु को
18:02देख रहा हो
18:03उसके होट धीरे धीरे हिले और एक भीशन थंडी आवाज में उसने प्रहलाद को अपने समक्ष आने का आदेश दिया
18:13प्रहलाद बिना किसी भय या संकोच के शांत कदमों से अपने पिता हिरन्यक्षिपु की ओर बढ़ने लगे उनकी आखों में
18:21केवल अटूट श्रद्धा और भक्ती थी
18:25राजसभा में पिनडरॉप साइलेंस चा गई
18:27हर कोई इस असाधारन पुत्र और उसके क्रोधित दैत्यराच पिता के मिलन को देखता रह गया
18:35खिरन्यक्षिपु ने अपने पुत्र को पास आते देख अपनी भयंकर आवाज में पूछा कि यह सब कहा से सीखा है
18:42और किसने उसे ऐसी शिक्षा दी है
18:46प्रहलाद ने सिर उठा कर अपनी कोमल आखों से पिता की ओर देखा और बिना किसी जिजखके उत्तर देने के
18:53लिए तैयार हो गए
18:56छोटे प्रहलाद ने अपनी ननही वाणी में अविचल भक्ती के साथ अपने पिता के उस प्रश्न का उत्तर देना आरंब
19:03किया, जो दैत्यराज के अहंकार पर वजर की तरह गिरने वाला था
19:09इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्नन किया गया है।
19:38यह सुनकर दैत्यराज हिरन्यक्षिपु का विशालकाय शरीर एक पल के लिए शिथिल पड़ गया, उसकी आखों में पहले डिस्बिलीफ, फिर
19:46एक भयानक क्रोध की ज्वाला भड़क उठी।
19:50इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्नन किया गया है।
19:58प्रहलाद ने अपनी बात जारी रखते हुए समझाया कि वह परमेश्वर सभी लोकों में व्याप्त हैं, कणकण में, अनुअनु में
20:06और सभी प्राणियों के हृदय में निवास करते हैं।
20:11इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्नन किया गया है।
20:19हिरन्यक्षिपु का क्रोध अब अपनी सीमाय लांध रहा था, उसके मुख से गर्म श्वास निकल रही थी और उसकी आखें
20:27अंगारों सी देहक रही थी।
20:29इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्नन किया गया है।
20:38प्रहलाद ने शांत भाव से आगे कहा कि वही भगवान विश्णु हम सभी के भीतर आत्मा के रूप में स्थित
20:45हैं, वही हमारी चेतना और शक्ती का स्रोत हैं।
20:50इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्नन किया गया है।
20:58यह सुनकर हिरन्यक्षिपु ने अपने आसन से उठकर एक भयानक गर्जना की उसकी आवाज राजसभा में गूंज उठी, जैसे उसने
21:07अपने स्वयन के कानों पर विश्वास ही न किया हो।
21:11इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
21:41प्रहलाद ने सिर जुका कर सम्मान पूर्वक उत्तर दिया कि कोई भी किसी का शत्रु नहीं होता। भगवान ही सभी
21:48के स्वामी हैं और वही परम कल्यानकारी हैं।
21:52इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
22:00राजसभा में उपस्थित सभी दैत्य मंत्री और सैनिक भैवीत होकर अपनी सासे रोके हुए थे। हर कोई इस असाधारन पितापुत्र
22:10के युद्ध का भयावः परिनाम जानता था।
22:14इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
22:22हिरन्यक्षि पुने अपने पुत्र की बातों को केवल उसके शत्रूओं द्वारा उसे बहकाने का एक सुनियोजित शड्यंत्र माना, उसकी आखों
22:30में प्रतिशोध की अगनी धधक रही थी.
22:34इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
23:05दैत्यराज हिरन्यक्षिपु का चहरा क्रोध से तम्तमा उठा, उसकी त्वचा का रंग और गहरा हो गया, जैसे स्वयन ब्रहमांड उसके
23:13प्रतिशोध की अगनी को महसूस कर रहा हो।
23:36इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
23:45दैत्यराज ने अपनी मुठिया भीची, उसके हाथ में पकड़ी हुई गदा का उपरी सिरा जमीन पर खटकने लगा, मानो वह
23:53किसी भीक्षन उस पर वार करने को तैयार हो।
23:56इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
24:05प्रहलाद ने अपनी आखें बंद करके एक पल के लिए ध्यान किया और फिर आत्म विश्वास से कहा कि वही
24:12भगवान विश्णू स्वयन ब्रहमा से भी श्रिष्ठ हैं और उन्ही की इच्छा से यह सब ब्रहमांड चलता है।
24:20इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
25:03इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
25:22इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
25:30प्रहलाद ने अपने पिता की ओर शांत द्रिश्टी डाली और अपनी कोमल वानी में कहा कि हां मेरा भगवान हर
25:38जगह है और वह इस तंभ में भी अवश्य ही विद्यमान है।
25:43इस पावन प्रसंग में पितापुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है।
25:52हिरन्यक्षिपु का क्रोध अब अपने चरम पर था, उसकी दे से मानो अगनी की लप्टे निकल रही थी और राजसभा
25:59में एक भयानक सन्नाटा चा गया
26:03इस पावन प्रसंग में पिता पुत्र का वैचारिक युद्ध तेरा भगवान कौन की महिमा का वर्णन किया गया है
26:25उसने अपने करूर राक्षसों को आग्यादी की वे प्रहलाद को ऐसा तीक्षन विष्दे जो कालकूट से भी अधिक घातक हो
26:33ताकि विष्णु का नाम लेने वाला वहस्वर सदा के लिए शान्त हो जाए
26:39राजसभा से खीच कर छोटे प्रहलाद को एक घने अंधेरे कारावास में ले जाया गया जहां दीवारों पर भय और
26:47पीडा की कहानिया गुंजती थी
26:50काला नागों के विष्ण और अन्यधातक तत्वों को मिला कर राक्षसों ने एक ऐसा भयावः पे तयार किया जिसकी एक
26:58बूंद भी प्राण हरने में सक्षम थी
27:01एक विषाल दैत्य ने उस प्राणधाती विष्ण से भरा पात्र छोटे प्रहलाद की ओर बढ़ाया उसकी कुरूर आखें बच्चे के
27:09चहरे पर मृत्यु का भय खोजने का प्रयास कर रही थी
27:14परंपिता के प्रती अगाध प्रेम में लीन प्रहलाद ने उस विष्ण को अमरित समझ कर बिना किसी संकोच के अपने
27:21होठों से लगाया, मानो वह भगवान का प्रसाध हो
27:25जैसे ही विष्ण उनके कोमल कंट से उत्रा, भगवान विष्णु के नाम की शक्ती ने उसे क्षण भर में निश्क्रिय
27:32कर दिया और प्रहलाद पर उसका कोई दुश्प्रभाव नहीं हुआ
27:37राक्षस जो अपनी क्रूरता और विष्ण के प्रभाव को जानते थे, प्रहलाद को पूर्णता स्वस्थ देख अविश्वास और भैसे काम
27:46उठे, उनकी आखें फटी की फटी रह गई
27:50अपने सेवकों की विफलता का समाचार सुनकर, हिरन्यक्षिपु का क्रोध एक बार फिर भयानक गर्जना में फूट पड़ा, मानो पूरी
27:58सृष्टी उसके प्रकोप से काप उठी हो
28:02विशागनी से भी अक्षोन रहे प्रहलाद को देख कर, हिरन्यक्षिपु ने अब उसे उचे परवत से नीचे फैंकने का आदेश
28:10दिया, ताकि उसका अंत निश्चित हो जाए
28:13क्रूर राक्षसों ने छोटे प्रहलाद को पकड़ कर, उसे एक विशाल चट्टानी परवत की सबसे उची चोटी पर ले गए,
28:21जहां से नीचे गहरी खाई अंधकार में समाई थी
28:26मृत्यू के कगार पर खड़े होकर भी, प्रहलाद का मुखमंडल सूर्य के समान तेजो मै था, उनके होठोन पर भगवान
28:34विश्णू का नाम अनवरक चल रहा था
28:37राक्षसों ने बिनादया के उस छोटे बालक को परवत की चोटी से धकेल दिया, और वह असीमित गहराई में गिरना
28:44आरंभ कर गया
28:47गिरते हुए भी, प्रहलाद के होठों से ओम नमो भगवते वासुदेवाय का दिव्य मंत्र लगातार निकल रहा था, मानो हर
28:55बूंद में भगवान स्वयन विद्यमान हो
28:58जैसे ही वह बालक पाताल की ओर अग्रसर हुआ, धर्ती माता स्वयन एक दिव्य देवी के रूप में प्रकट हुई,
29:05अपने पुत्र को बचाने के लिए
29:08धर्ती माता ने अपने विशाल हाथों से प्रहलाद को ठीक उसी प्रकार गोद में उठा लिया, जैसे एक मा अपने
29:16बच्चे को संकट से बचाती है
29:19पर्वत के निचले भाग में धर्ती पर कोमलता से रखा गया प्रहलाद बिना किसी खरोंच के सुरक्षित था, उसके मुख
29:27पर वही शांत मुस्कान बरकरार थी
29:31प्रहलाद को जीवित और सुरक्षित देखकर राक्षसों के हरिद्यों में भीशन आतंक छा गया, वे समच नहीं पाए कि कौन
29:39सी अद्रिश्य शक्ती इस बालक की रक्षा कर रही है
29:43एक भैभीत राक्षस ने कापते हुए कदमों से राजमहल पहुँचकर हिरन्यक्षिपु को दोनों असफल प्रयासों का दुखद समाचार सुनाया
29:53इस असंभव विफलता से हिरन्यक्षिपु का क्रोध अब एक ज्वलंत नरक में परिवर्तित हो गया था, जिसकी ज्वालाए उसकी आत्मा
30:02को भस्म कर रही थी
30:05हिरन्यक्षिपु का क्रोध अब मात्र एक भावना नहीं, बलकि एक भयंकर दैत्य के समान था, जो उसकी आखों से अगनी
30:13और उसके प्रत्येक्ष्वास से विनाश की गर्जना छोड़ रहा था, जिसने उसकी पूरी चेतना को ग्रास कर लिया था
30:21अपने रत्नश्टित सिनहासन पर बैठे, उसने अपनी उंगलियों को क्रोध से भीचते हुए, गरचते हुए अपने सभास्दों को आदेश दिया
30:30कि उस विश्नुभक्त बालक को तुरंट उसके समक्ष लाया जाए
30:35असुरों के बीच से प्रहलाद को खीच कर एक विशाल राजसी कक्ष में लाया गया, जहां का हर कोना हिरन्यक्षिपू
30:43के भयानक क्रोध और उसके अंधकार में प्रभाव से गूंज रहा था, पर बालक का मुखमंडल शांत और निश्चल था
30:51अपने सिनहासन से उठकर हिरन्यक्षिपू प्रहलाद के सामने खड़ा हो गया, उसकी क्रोधित आखे बालक के मुख पर गड़ी थी,
31:00और उसने एक भयानक धमकी भरी आवाज में पूछा कि उसकी अद्रिश्य शक्ती का रहस्य क्या है
31:07प्रहलाद ने अपने पिता की ओर शांत ग्रिश्टी से देखा, और प्रेम वश्रद्धा से भरे स्वर में उत्तर दिया कि
31:15उसकी शक्ती का स्रोत केवल भगवान विश्णु हैं, जो कंकं में विद्यमान हैं, और वही सब के रक्षक हैं
31:23भगवान विश्णु का नाम सुनते ही, हिरन्यक्षिपु का क्रोध एक बार फिर ज्वाला मुखी की तरह फूट पड़ा, उसकी नसे
31:31तन गई और उसने अपनी अजे शक्ती से प्रहलाद को कुचलने का निर्णय लिया
31:37उसने तुरंट अपने सबसे क्रूर परवताकार युद्ध हाथियों को लाने का आदेश दिया, जिनकी सुन्डों में इतनी शक्ती थी कि
31:45वे विशाल शिलाओं को भी चूर-चूर कर दें
31:49बड़े-बड़े युद्ध हाथियों को प्रहलाद की ओर धकेला गया, जिनकी पच्चाप से धर्ती काप रही थी, परंतु दिव्य सनरक्षन
31:57के कारण वे बालक के समीप पहुँचते ही स्तब्ध रह गए, जैसे किसी अद्रिश्य दीवार ने उन्हें रोक दिया हो
32:05हाथियों ने अपनी सुंदे जुका ली, मानों वे किसी दैविय सक्ता के समक्ष नत्मस तक हो रहे हों, और प्रहलाद,
32:13अविचल और शांत उन विशालकार प्राणियों के बीच सुरक्षित खड़ा रहा, उस पर कोई आघात नहीं हुआ
32:20यह देख हिरन्यक्षिपू की क्रूरता और भी भड़क उठी, उसकी आखों में प्रतिशोध की नई अगनी जल उठी और उसने
32:29एक और भयावह यातना की योजना बनाई
32:32क्रोध में कापते हुए उसने अपने सेवकों को आदेश दिया कि प्रहलाद को एक गहरे अंधकार में सर्पकुंड में फैंक
32:41दिया जाए, जहां विशैले नागों का वास था
32:45प्रहलाद को एक ऐसे गहरे, पाताल सद्रिश गड़े में फेंक दिया गया जो भयंकर विश्धर सर्पों से भरा था, जिनकी
32:53फुमकारे मृत्यू का गीत गा रही थी और जिनकी विशैली सासे हवा में जहर घोल रही थी
33:00परंतु आश्चर्य
33:02सर्प बालक को डसने की बजाए, उसके चारों और ऐसे कुंडलित हो गए जैसे वे उसके सिनहासन का निर्मान कर
33:09रहे हों, और उसकी देह से निकलता दिव्य प्रकाश उन्हें मोहित कर रहा था
33:15प्रहलाद उन विशैले सर्पों के बीच भी शांत भाव से पदमासन में बैठ गया, उसकी आखों में कोई भय नहीं
33:22था, बलकि वह भगवान विश्नु के नाम का अन्वरत जब कर रहा था
33:28असुरों ने जब देखा कि बालक को सर्प भी हानी नहीं पहुचा सके, तो उनके हृद्यों में आतंप छा गया,
33:35और वे इस अलोकिक द्रिश्य से भय भीथ होकर पीछे हट गए
33:40हिरन्यक्षिपु का हरिदय अब क्रोध, हताशा और अपमान की ज्वाला से धधक रहा था, और उसने अपनी अंतिम और सबसे
33:48क्रूर चाल चलने का निश्चय किया, अगनी का प्रयो
33:52उसने प्रहलाद को एक विशाल चिता में डालने का आदेश दिया, जो शुष्क लकडियों और घी से तयार की गई
33:59थी, ताकि अगनी उसे क्षन भर में भस्न कर दे
34:04प्रहलाद को जलती हुई अगनी के मध्य रखा गया, जिसकी लप्टें आकाश को छू रही थी और जिसकी गर्मी से
34:11आसपास की हवा भी जुलस रही थी
34:15लेकिन भगवान विश्नों की क्रिपा से अगनी की लप्टें प्रहलाद को छू भी न सकी, बलकी वे शीतल और कोमल
34:22वायू में परिवर्तित होकर उसके चारों और एक सुरक्षा कवच की तरहें रित्य करने लगी
34:29बालक प्रहलाद उस प्रजवलित अगनी के हृदय में भी शांत और प्रसन्नचित बैठा था, उसके मुख पर एक दिव्यमुस्कान थी,
34:37मानो वह किसी ठंडी जील में सनान कर रहा हो, और अगनी उसे तनिक भीक्षती न पहुँचा सकी
34:45हिरन्यक्षिपु ने उस अविश्वसनिय द्रिश्य को देखा जहां अगनी प्रहलाद को हानी नहीं पहुचा पा रही थी, और उसके क्रोध
34:53की जवाला प्रजवलित अगनी से भी अधिक तीवर हो उठी थी, उसके मस्तिश्क में प्रतिशोध का एक नया अध्याय खुलन
35:13दे रही थी, गुरु शुक्राचार्य अपनी तपस्या की गेहन द्रिश्टी से यह समझते हुए कि यह बालक साधारन नहीं, उन्होंने
35:23शांत स्वर में हिरन्यक्षिपु को सलाह दी की इस पर मायावी प्रयोगों और छलकपट की आवश्यक्ता है, दैत्यराज हिरन्यक्�
35:35रखने वाले दैतियों को बुलाया, जिनकी कलाय ब्रहमांड में भ्रम का जाल बिछाने में सक्षम थी।
36:05रक्त की नदिया और विनाशकारी भूकम्पों के भ्रम पैदा कर उसे भ्रमित करने का प्रयास किया।
36:12परंतु प्रहलाद अपनी आखे बंद किये, एकाग्रचित होकर ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जब करता रहा, और उस पर किसी
36:21भी मायावी भ्रम का कोई असर नहीं हुआ, मानो वह एक अभेद्य कमल पर बैठा हो।
36:27प्रहलाद के जब से उत्पन्न दिव्य उर्जा, एक प्रकाश्मान आभा बन कर उन मायावी शक्तियों को सोखने लगी या उन्हें
36:35निश्प्रभावी कर देती, जिससे वे धूमिल होकर लुप्थ हो जाती थी।
36:40अपनी शक्तियों को विफल देखकर मायावी दैत्य हताश और भ्रमित हो उठे, उनके भयानक चहरे आश्चर्य और निराशा के भावों
36:50से भर गए, क्योंकि उनका हर प्रयास व्यर्थ हो रहा था।
36:55हिरन्यक्षिपु का क्रोध और बढ़ गया, उसकी लाल आखे प्रतिशोध से जल रही थी, और उसने अपने सबसे घातक अस्त्रशस्त्रों
37:03के प्रयोग का आदेश दिया, उसकी आवास पूरे कक्ष में गूंज उठी।
37:08तुरंट सबसे बलवान और क्रूर दैत्य योध्धा अपने हाथों में भयंकर त्रिशूल, गदा और तीक्षन तलवारे लिए प्रहलाद की ओर
37:17बढ़ते हुए आगे आए, उनकी आखे रक्त पिपासु क्रोध से चमक रही थी।
37:23उन्होंने बालक प्रहलाद पर त्रिशूल, गदा, तलवार और बानों की एक भयंकर वर्शा कर दी, जिसका उद्देश उसे तुरंट समाप्त
37:32कर देना था।
37:33किन्तु जैसे ही ये घातक अस्त्र प्रहलाद के पास आते, वे या तो हवा में ही रुक जाते, अपनी दिशा
37:41बदल लेते, या फिर आश्चर्यजनक रूप से रंगीन पुष्पों में परिवर्तित होकर उसके चर्णों में बिखर जाते।
37:49बालत प्रहलाद अभी भी उसी शांत भाव से ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जब कर रहा था, उसकी मुस्कान और
37:57भी गहरी हो गई थी, मानो वह इस नश्वर संसार से परे किसी दिव्य लोक में विचर रहा हो।
38:04एक अद्रिश सुनहरी आभा का सुरक्षा कवच प्रहलाद के चारों और स्पष्ट दिखाई देता था, जो उसे हर वार से
38:12बचाता हुआ, ब्रहमांडिय उर्जा से उत्प्रोत था।
38:16योध्धा भैभीत होकर अपने असफल प्रयासों पर एक दूसरे को देखते थे, उनकी तलवारें और अस्त्र निश्प्रभावी हो चुके थे,
38:25और उनके चहरे पर हार और अविश्वास का भाव स्पष्ट था।
38:30खिरन्यक्षिपु अपने सिनहासन पर बैठा हुआ, इस अकल्पनिय द्रिश को देखकर हताश और क्रोधित हो जाता है, उसके राज्ज में
38:38ऐसा कभी नहीं हुआ था कि उसका कोई भी आदेश निश्फल हो जाए।
38:44गुरु शुक्राचार्य जो वहीं खड़े थे, इस घटनाक्रम को देखकर चिंता में डूब जाते हैं, वे अब समझ चुके थे
38:52कि यह कोई साधारन घटना नहीं, बलकि साक्षात भगवान विश्णु की लीला है।
38:58प्रहलाद का मन भगवान विश्णु में पूरी तरहलीन था, उसकी भक्ती की शक्ती हर बाधा को पार कर रही थी,
39:06उसकी आत्मा से एक अविनाशी प्रकाश फूट रहा था।
39:10यह स्पष्ट था कि भगवान विश्णु की अग्रिश शक्ती ही प्रहलाद की रक्षा कर रही थी, जिससे दैत्यराज के सभी
39:18क्रूर प्रयास व्यर्थ सिद्ध हो रहे थे और उसका अहमकार चकनाचूर हो रहा था।
39:25हिरन्यक्षिपु का क्रोध अब अपनी सभी सीमाओं को लांध चुका था, क्योंकि उसके हर प्रयास प्रहलाद की अटूट भक्ती के
39:32सामने ऐसे निरर्थक सिद्ध हुए जैसे अग्नी के सामने जल की बूदे हो।
39:38अपनी शक्ती और अहमकार पर हुए इन आघातों से तिल मिलाकर दैत्यराज ने सीधे प्रहलाद की ओर देखा, उसकी आखों
39:47में एक विनाशकारी ज्वाला धधक रही थी।
39:50एक गगनभेदी गर्जना करते हुए उसने प्रहलाद से पूछा की कहा है उसका वह भगवान जो ब्रहमांड के कणकण में
39:58निवास करने का दावा करता है।
40:02बालत प्रहलाद भय और चिंता से कोसों दूर अपने पिता के प्रचंड क्रोध के सामने भी हिमालय सा अडिक खड़ा
40:09रहा।
40:11शांत और ग्रिड़ता से उसने उत्तर दिया कि भगवान विश्नु हर जगह हैं, हर कण में, हर आत्मा में और
40:18इस पूरे ब्रहमांड में व्याप्त हैं।
40:22खिरन्यक्षिपुने प्रहलाद की बातों पर एक क्रूर ठहाका लगाया, उसके भीतर का दैत्य अविश्वास और धेना से उबल रहा था।
40:31उसने बालक से चुनौती भरे लहजे में पूछा कि यदि उसका विश्नु सच्मुच सर्वव्यापी है, तो क्या वह इस विशाल
40:39स्तंभ में भी मौजूद है।
40:42प्रहलाद ने बिना किसी जिजक्के अपनी आखों में अटल विश्वास के साथ उत्तर दिया, हाँ मेरे पिता। भगवान विश्नु इस
40:51स्तंभ में भी हैं।
40:54यह सुनकर हिरन्यक्षिपु का अहंकार और क्रोध एक नई चरम सीमा पर पहुँच गया, मानो उसका अपमान किया गया हो।
41:03उसने अपनी उंगली एक विशाल, भारी और ठोस स्तंभ की ओर बढ़ाई, जो उसके भव्य महल के केंदर में खड़ा
41:11था।
41:12वह स्तंभ युगों पुराना प्रतीत होता था, उसकी सतह पर दैतियों की विज्यगाथाए और क्रूर प्रतीक उतकीर थे, जो उसकी
41:21अदमे द्रिढता को दर्शाते थे।
41:23समस्त दर्बार में एक गहरी खामोशी चा गई, हर कोई आगामी भयंकर टकराव की कलपना कर थर्रा रहा था।
41:33प्रहलाद की द्रिष्टी उस स्तंभपर्टी की थी, उसकी आखें विश्वास और प्रेम से चमक रही थी, जैसे वह पहले से
41:40ही अपने आराध्य को उसमें देख रहा हो।
41:45हिरण्यक्षिपू की आखें प्रतिशोध की अगनी से जल रही थी, उसकी हर नस में केवल अपने भाई के हत्यारे को
41:52समाप्त करने की इच्छा दोड रही थी।
41:55वातावर्ण इतना भारी हो गया था कि सास लेना भी कठिन लग रहा था, जैसे कोई अद्रिश शक्ती दरबार को
42:03कसकर जकड रही हो।
42:05गुरु शुक्राचार्य जो एक कोने में खड़े थे, अपनी चिन्ता में और भी गहरे डूब गए, जानते हुए कि यहक्षन
42:13ब्रहमांड के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड लाने वाला है।
42:18हिरन्यक्षिपुने फिर एक बार क्रोधित स्वर में ललकारा, तो अब प्रमान दिखा, बालत। कहा है तेरा वह सर्वव्यापी रक्षत।
42:28प्रहलाद ने अपनी आखें बंद कर ली, अपने मन में भगवान विश्नु का स्मरण करते हुए, उसकी आत्मा से एक
42:36दिव्य उर्जा फूट रही थी।
42:39अपने क्रोध की पराकाश्ठा पर पहुँचकर, हिरनेक्षिपु ने अपनी भयानक गदा उठाई, जिसे वह उस स्तंभ पर प्रहार करने के
42:47लिए तैयार था।
42:49पूरे ब्रहमांड ने एक पल के लिए अपनी सास रोक ली, क्योंकि यह अकेला प्रहार केवल एक स्तंभ पर नहीं,
42:57बलकि दैट्य के अहंकार और भगवान की सर्वव्यापकता के बीच अंतिम तक्राव पर होगा।
Comments