Skip to playerSkip to main content
महाराजा पृथु के वंशज, प्रचेता, शिव के महामंत्र से प्रेरित होकर घोर तपस्या में लीन हो जाते हैं। १०,००० वर्षों की तपस्या के बाद जब वे समुद्र से निकलते हैं, तो पृथ्वी को घने, अनियंत्रित वृक्षों से ढका पाते हैं। अपने मार्ग में बाधा देख क्रोधित प्रचेता अग्नि और वायु से समस्त वनों को भस्म करने लगते हैं। तब ब्रह्मा स्वयं प्रकट होकर उन्हें शांत करते हैं और सृष्टि के संतुलन का महत्व समझाते हैं। ब्रह्मा के निर्देश पर, प्रचेता मारिषा से विवाह करते हैं, जो वृक्षों द्वारा पोषित एक दिव्य कन्या है। इस पवित्र मिलन से दक्ष प्रजापति का पुनर्जन्म होता है, जो सृष्टि को पुनः आबाद करने का भार संभालते हैं। यह एपिसोड सृजन, क्रोध और संतुलन की अनूठी गाथा प्रस्तुत करता है, और भागवत पुराण के एक नए अध्याय की नींव रखता है! #BhagavataPurana #Prachetas #DakshaRebirth #S3Ep16 #HinduMythology #PuranicStories #CreationStory
Transcript
00:00भगवान शिव के गहन उपदेश और विश्णु भक्ती के दिव्य ज्ञान से हृदय में प्रेणा लिये दस प्रचेता भाईयों ने
00:07कठोर तपस्या का मार्ग अपनाया, जिसका उद्देश्य परम सत्य की प्राप्ती था.
00:13उनके मानस पटल पर भगवान शिव का वह अलौकिक रूप अनकित था, जब उन्होंने रुद्रगीत के माध्यम से उन्हें विश्णु
00:21भक्ती का परम रहस्य समझाया था.
00:24अपने पिता प्राचीनाबरही की आग्या और शिव के ज्यान से प्रेरित होकर, प्रचेताओं ने संसार के मायाजाल से विरक्त होकर,
00:32मोक्ष की दिशा में प्रस्थान करने का द्रिड संकल्प किया.
00:37उन्होंने अपनी राजसी वेशभूशा त्याग कर सरल वलकल धारण किये और ग्रिहस्थ जीवन की सभी आसकतियों का त्याग कर तपस्या
00:45के लिए वन की ओर अग्रसर हुए.
00:48उनकी यात्रा उन्हें दूर विस्तरित महासागर के तट्टत ले गई, जहां जल की अगाधता स्वय अनंतकाल और रहस्य का प्रतीक
00:57थी.
00:59सागर के विशाल हरिदय को निहारते हुए, उन्हें अनुभव हुआ की यही वह स्थान है जहां वे अपनी आत्मा को
01:06परम्पिता के साथ एकाकार कर सकते हैं.
01:10प्रत्येक प्रचेता ने विश्नु भक्ती के मंत्रों का जाब करते हुए, जल्तत्व में समाहित होने का निश्चय किया, एक ऐसी
01:18प्रतिग्या जो उनकी आत्माओं को मुक्त करने वाली थी.
01:23अविचलित भाव से वे एक एक करके सागर की गहराईयों में उत्रे, जहां समय और स्थान के बंधन तूट जाते
01:30हैं, और केवल अनंत चेतना का वास होता है.
01:35सागर ने उन्हें अपनी शीतल आलिंगनकारी गहराई में समेट लिया, जैसे कोई माँ अपने बच्चों को अनंत प्रेम से गोद
01:43में लेती है.
01:45वहां समुद्र के शान्त तल पर उन्होंने दस हजार वर्षों की अविचल तपस्या का प्रारंभ किया, जहां प्रत्येक श्वास भगवान
01:53विश्नु को समर्पित थी.
01:56उनके मन में केवल भगवान विश्नु का दिविश्वरूप था, नीलकमल के समान श्याम वर्ण, चतुर्भुज, शंक, चक्र, गदा और पद्मधारन
02:05किये हुए, अनंत शेशनाग पर विराजमान.
02:09वर्षों के बाद वर्ष बीटते गए, सागर की गहराई में स्थित वे प्रचेता अपने संकल्प पर अडिग रहे, बाहरी संसार
02:17की हलचल से अन्भिग्य.
02:19सागर के गहन दबाव, ठंडे पाने की चुनोती और समुदरी जीवों की उपस्थिती भी उनके ध्यान को भंग न कर
02:27सकी.
02:28प्रित्वी पर उनके पिता, राजा प्राचीनाबर ही, विशाल यग्यों और कर्मकांडों में लीन थे, जो भौतिक समरिध्धी और लौकिक शक्ती
02:37का प्रतीक थे.
02:39एक और प्रचेता शुद्ध भक्ती के मार्ग पर थे, तो दूसरी और प्राचीनाबर ही कर्मकांड के विशाल चक्र में स्वयं
02:47को समर्पित कर रहे थे, दो भिन पथों की यात्रा.
02:51सहसरों वर्ष ऐसे ही व्यतीत हो गए, प्रचेताओं की तपस्या ने अपनी गहनता से तीनों लोकों को विस्मित कर दिया,
02:59एक अविस्मनिय आध्यात्मिक साधना.
03:03देवतागन और गंधर्व उनके अटूट संकल्प को देखकर आश्चर्यच कित थे, ऐसा तप जो युगो युगो तक स्मरण किया जाएगा.
03:13प्रचेताओं के लिए बाहरी जगत, उसकी ध्वनिया और रूप सब विलुप्थ हो चुके थे, वे केवल विश्नु के नाम और
03:20रूप में विलीन थे.
03:22स्वया महासागर अपने भीतर की हलचल को थामे हुए, उनकी अटूट तपस्या का मूख साक्षी बन गया, हर लेहर एक
03:30मौन प्रार्थना थी.
03:32दस सहस्र वर्ष का कालचक्र पूरा हुआ, किंतु प्रचेता अपने अविचलित ध्यान में लीन थे, मानो समय उनके लिए ठहर
03:41गया हो दिव्य कृपा की प्रतीक्षा में.
03:44इधर समुद्र की गहरायों में जब प्रचेता ध्यान मगन थे, तब भूलोग पर राजा प्राचिनाबरही की अंदेखी के कारण प्रकृती
03:52का संतुलन बिगड़ने लगा था.
03:55राजा प्राचिनाबरही केवल निरंतर यग्यों के अनुष्ठान और पशुबलियों में व्यस्त रहे, जिसके कारण राज्य की भूमी और वनों की
04:04देखरेख पूरी तरह ठप हो गई.
04:07सुरक्षा और संतुलन के अभाव में धर्ती के विशाल भूभागों पर अचानक अंगिनत दुरलब बीज तीवर गती से अंकुरित होने
04:15लगे.
04:17कुछ ही समय में वे ननहें पौधे विशालकाय व्रिक्षों के तनों में बदलने लगे और निर्जन भूमी से लेकर नगरों
04:24की सीमाओं तक फैल गए.
04:27बिना किसी बाधाया कांट छांट के ये व्रिक्ष आकाश की उचाईयों को छूने लगे और उनके तने परवतों से भी
04:35अधिक मोटे और सुद्रिध हो गए.
04:37इन महा व्रिक्षों की शक्तिशाली जड़ों ने प्राचीन राजमारगो, नकाशिदार पत्थर की दीवारों और वैदिक वेदियों को चीर कर अपना
04:47सामराज जिस्ठापित कर लिया.
04:49सघन लताओं और विशाल पत्तियों ने धीरे-धीरे पूरे ग्रामेन बस्तियों को ढखना शुरू कर दिया, जिससे मानव जीवन अस्तव्यस्थ
04:58हो गया.
04:59व्रिक्षों की अनियंत्रित शाखाओं ने परसपर जुड़कर आकाश में एक अभेद्य हरी छत का निर्मान कर दिया, जिसने संपूर्ण भूमंडल
05:08को ढख लिया.
05:10सूर्य की किरने धरातल तक पहुँचना बंध हो गई, जिसके परिणामस्वरूप दोपहर के समय भी धर्ती पर गहरा अंधकार और
05:18शीतल सन्नाटा चा गया.
05:21सूर्य प्रकाश के अभाव और विशाल जंगल के फैलाव के कारण हिंसक और विशालकाय वन्य जीव इस अनियंतरित वातावर्ण में
05:29निरंकुष होकर घूमने लगे.
05:32मानव आबादी अपने ही घरों में कैध होकर रह गई, क्योंकि क्रिशी योग्य भूमी पूरी तरह से घने दुरगम वनों
05:39में बदल चुकी थी.
05:41हवा में नवीनता के स्थान पर सड़ी हुई पत्तियों और भारी काई की गंध भर गई, जिसने प्रिथवी की सांसों
05:49को भारी और बोजिल बना दिया.
05:51जब तेज हवाएं इन विशाल व्रिक्षों के खोखले तनों से होकर गुजरती थी, तो संपूर्ण प्रिथवी पर एक भयावः और
06:00उदास ध्वनी गूंजने लगती थी.
06:03नदिया और जलधाराय उख्डे हुए व्रिक्षों और बेकाबू जड़ों के जमाव के कारण रुप गई, जिससे चारों और जलभराव और
06:11दलदल बन गया.
06:13यहां तक की राजा प्राचिनाबरही के विशाल यग्यमंडप भी जंगली बेलों और विशालकाय तनों के नीचे दबने लगे, मानो प्रकृती
06:22ने उनके यग्यों को नकार दिया हो.
06:25देवर्शी नारद ने आकाश मार्ग से प्रित्वी की इस घुटनभरी स्थिती को देखा और वे समझ गये की प्रकृती का
06:32यह अनियंत्रित रूप विनाश का संकेट था.
06:36आकाश का एक भी कोना खुला नहीं बचा था, जिससे सूर्य का प्रकाश पूरी तरह लुप्थ हो गया और पूरी
06:43प्रित्वी एक विशाल थंडे अंधकार में पिंजरे में तब्दील हो गई.
06:49भूमी देवी अत्यधिक व्रिक्षों और लताओं के भारी भार से व्याकुल होकर कराहने लगी, क्योंकि जीवन की हर गतिविधी ठहर
06:57चुकी थी.
06:59संपूर्ण स्रिष्टी का संतुलन पूरी तरह से छिन्नभिन हो चुका था और प्रित्वी एक नए महाविनाश के मुहाने पर खड़ी
07:07थी.
07:08अब केवल प्रचेताओं के लौटने और उनके प्रचंड क्रोध ही इस अनियंत्रित अंधकार को नश्ट कर प्रित्वी को पुनह जीवन
07:16दे सकते थे.
07:18दस हजार वर्षों की कठिन जल्मगन तपस्या पूर्ण करके दसों प्रचेता अचानक महास्मुदर की उत्ताल तरंगों को चीरते हुए बाहर
07:27प्रकट हुए.
07:28उनके तपस्वी शरीरों से सूर्य के समान प्रचंड दिव्य तेज छनकर चारों दिशाओं में फैल रहा था.
07:36जैसे ही प्रचेताओं ने तट पर अपने चरण रखे, वे अपने पिता के समरिध राज्य को देखने के लिए उत्सुखो
07:43उठे.
07:45किन्तु उनके सामने केवल एक अत्यंत घना, अभेद्य और दरावना जंगल फैला हुआ था, जिसने प्रिथवी के समस्त मार्गों को
07:53पूरी तरह अवरुध कर दिया था.
07:57विशालकाय वरिक्षों और उल्जी हुई लताओं ने पूरी प्रिथवी को ऐसा घेर रखा था कि सूर्य की एक भी किरण
08:04भूमी का स्पर्ष नहीं कर पा रही थी.
08:07चारू और छाए इस अवरोध को देखकर प्रचेताओं के मुख पर घोर निराशा और आश्चर्य के चिन्ह उभराए.
08:16वैदिक नगरों, यग्यमंडपो और मानव बस्तियों का नामों निशान मिट चुका था, जिसे देखकर उनका मन क्षोब से भर गया.
08:25स्रिष्टी के विस्तार में इस भयानक बाधा को देखकर प्रचेताओं के भीतर वर्षों से संचित तप का उग्र क्रोध भड़क
08:32उठा.
08:34जेश्ट प्रचेता ने अपने भाईयों की ओर देखा और उनकी आखों में धधक्ती हुई ज्वाला ने विनाश का संकेत दे
08:42दिया.
08:43दसों प्रचेताओं ने एक साथ मिलकर अपनी दस हजार वर्षों की तपस्या की शक्ती को क्रोध की अग्नी में परिवर्थित
08:51कर दिया.
08:52उनके शरीरों से ऐसी प्रचंड उश्मा निकलने लगी कि आसपास की तटिय हवाय भी खौलने लगी.
09:00सबसे पहले प्रचेताओं के मुख से प्रल्यंकारी वायू उत्पन हुई, जो अत्यंत वेक से वनों की ओर बहने लगी.
09:08उग्र वायू के प्रचंड थपेडों से विशालकाई पेड तिनकों की तरह उखडने लगे और भयानक गड़गडा हट होने लगी.
09:17ततपश्चात उनके मुख से तपस्वी अग्नी की भयानत लप्टें बाहर निकली, जिन्होंने वायू के साथ मिलकर महाविनाश का रूप ले
09:26लिया.
09:27अग्नी और वायू के इस सन्युक्त प्रहार ने घने जंगलों को क्षण भर में धधकते हुए अंगारों में बदलना प्रारंभ
09:34कर दिया.
09:36सैकडों वर्षों पुराने अभेद्य पेड प्रचेताओं की तपोग्नी में जलकर राख होने लगे.
09:43आकाश में धुए के काले गुबार और सुलक्ते हुए अंगारे पक्षियों की भाती उरने लगे, जिससे संपूर्ण वातावर्ण देदी प्यमान
09:51हो उठा.
09:53प्रचेताओं के इस अदमय क्रोध से पूरी प्रित्वी लाल और सुनहरी ज्वालाओं की रोशनी से नहा उठी.
10:01अगनी का ताप इतना भयंकर था कि धर्ती की छाती से वर्षों पुरानी उदासी और अंधकार सदा के लिए भस्म
10:08होने लगा.
10:10प्रचेता बिना रुके अपनी अगनी और वायु का प्रहार जारी रखे हुए थे और पूरी प्रित्वी को व्रिक्षहीन करने पर
10:17अमादा थे.
10:19जब प्रचेताओं के क्रोध की अगनी संपून ब्रहमांड को निगलने लगी, तब आकाश में एक अलोकिक स्वर्णिम प्रकाश का विस्फोट
10:28हुआ और स्वयं भगवान ब्रहमा प्रकट हुए.
10:31चतुर्मुख भगवान ब्रहमा अपने दिव्यवाहन हंस पर विराज मान होकर धुए और ज्वालाओं के बीच उदित हुए, जिनकी कांती से
10:40संपून दसों दिशाएं आलोकित हो उठी.
10:43ब्रहमा जी ने अपना अभय हस्त उठाया, जिससे शीतल नीली और स्वर्णिन तरंगे निकल कर धधक्ती हुई प्रचंड अगनी और
10:52आंधी को शांत करने लगी.
10:55शन भर में ही व्रिक्षों को भस्मकर्ती भयंकर ज्वालाएं बुझ गई और विनाशकारी पवन एक शांत सुगंधित समीर में परिवर्तित
11:03हो गई.
11:05स्रिष्टी रचेता ब्रह्मा के सौमय रूप को देखकर दसों प्रचेताओं के हाथों से प्रत्यंचा धीली पड़ गई और उनका तीवर
11:13क्रोध पल भर में शांत हो गया.
11:16सभी दस प्रचेताओं ने अपने अस्त्रशस्त्रत्याग दिये और पूर्ण भक्ती के साथ भगवान ब्रह्मा के चरण कमलों में शीष जुका
11:24कर प्रणाम किया.
11:26परम्पिता ब्रह्मा ने वात्सल्य और अपार करुणा से भरे नेत्रों से अपने प्रपोत्रों की ओर देखा और गंभीर दिव्यवानी में
11:34बोलना आरंभ किया.
11:37ब्रह्मा जी ने कहा कि हे प्रचेताओं, क्रोध तपस्या का सबसे बड़ा शत्रु है और जिस महान उद्देश के लिए
11:44तुमने तप किया है, यह क्रोध उसके विपरीत है.
11:49उन्होंने उन्हें समझाते हुए कहा कि ब्रह्मांड का संतुलन स्रिजन, पालन और सहार की समर्स्तापर टिका है, न की अकारण
11:58विनाश पर.
11:59यह व्रिक्ष और वन प्रित्वी की जीवंधारा है, जो सभी जीवों का पोशन करते हैं, इसलिए इनका विनाश करना धर्म
12:07के विरुद्ध है.
12:10ब्रह्मा जी ने उन्हें उनके पिता प्राचीनाबरही की आग्या और भगवान विश्णु के उस वर्दान का स्मरण कराया जो उन्हें
12:18प्रजाकी वृद्धी के लिए मिला था.
12:21तुम्हारा पावन करतव्य इस उजड़ी हुई प्रित्वी को पुना नवजीवन प्रदान करना और प्रजाका स्रिजन करना है, न की इसे
12:29भस्म बनाना.
12:31ब्रह्मा जी के इन ज्यानवर्धक और अमरित्मई वचनों को सुनकर प्रचेताओं के हृदय में जल रही प्रतिशोध की अगनी पूरी
12:39तरह शांत हो गई.
12:41दसों प्रचेता हाथ जोड कर रो पड़े और ब्रह्मा जी से अपने इस विनाशकारी कृत्य के लिए क्षमा याचना करने
12:49लगे.
12:50परम्पिता ब्रह्मा ने मुस्कुराते हुए उन्हें अभायदान दिया और प्रित्वी पर शांती तथा स्रिजन का नया मार्ग दिखाया.
12:59ब्रह्मा जी ने उन्हें व्रिक्षों की रक्षा करने और वन्राज सोम द्वारा पोशित सुकन्या मारिशा से विवाह कर नए युग
13:06के प्रारंभ का परामर्ष दिया.
13:09ब्रह्मा जी की उपस्थिती मात्र से जुलसी हुई भूमी पर पुनह हरीभरी कोपले फूटने लगी और प्रक्रिती खिल उठी.
13:18प्रचेताओं ने ब्रह्मा जी के आदेश को शिरोधार्य किया और सृष्टी के नवनिर्मान के इस महान संकल्प को स्विकार किया.
13:27भग्वान ब्रह्मा ने प्रचेताओं को अतुलनिय तेज, दीरघायू और प्रजाप्ती होने का आशिरवात प्रदान किया.
13:35तत पश्चात ब्रह्मा जी अपने हंस पर सवार होकर ब्रह्म लोग की ओर प्रस्थान कर गए और प्रचेता नए स्रिजन
13:43के पावन कर्तव्य में संलग्न हो गए.
13:46ब्रह्मा जी के प्रस्थान के पश्चात प्रचेताओं को स्मरणाया कि परम्पिता ने उन्हें मारिशा नामक एक दिव्यकन्या के अलोकिक जन्म
13:55की गाथा सुनाई थी
13:58सुदूर अतीत में महान महर्शी कंदु घने वन के शांट और पवित्र वातावर्ण में अत्यंत कठोर तपस्या में लीन थे
14:07देवराज इंद्र ने महर्शी कंदु के महान तपोबल से भैभीत होकर उनकी तपस्या भंग करने के लिए अतिसुंदर अपसरा प्रमलोचा
14:15को धर्ती पर भेजा
14:17अपसरा प्रमलोचा ने अपने अध्भुद संगीत, लयात्मक नरित्य और संमोहक सौंधर्य के जादु से महर्शी कंदु का ध्यान भंग कर
14:26दिया
14:27महर्शी कंदु अपसरा के सौंदर्य और प्रेमपाश में बंध कर वर्षों तक अपनी तपस्या भूल कर उसके साथ आनंदमई जीवन
14:36व्यतीत करने लगे
14:38सैकडों वर्षों के बीट जाने के पश्चात जब महर्शी कंदु की चेतना जागी तो उन्हें अपनी तपस्या के नश्ट होने
14:46पर अत्यंत पश्चाताप हुआ
14:48महर्शी के संभावित क्रोज से भैभीत होकर प्रमलोचा आश्रम से भाग निकली जिसके शरीर पर पसीने की बुंदों के रूप
14:57में दिव्य गर्भ विद्यमान था
14:59प्रमलोचा ने अपने शरीर के उस पसीने रूपी दिव्य अंश को व्रिक्षों के कोमल पत्तों और शाखाओं पर पोँच कर
15:07उन्हें सौंप दिया
15:08वन के समस्थ व्रिक्षों ने उस पावन गर्भ को वादसल्य पूर्वक सनरक्षन दिया और उसके विकास के लिए अपनी समस्थ
15:16उर्जा समर्पित कर दी
15:19तकपश्चात चंद्रदेव सोमने दयाद रहोकर अपने अंगूठे से अमरित की धारा बहाकर उस शिशु कन्या के पोशन का दायत्व संभाला
15:29वरिक्षों के मध्य उस दिव्य उर्जा और अमरित्रस से मारिषा नाम की एक अत्यांत रूपवती और तेजस्विनी कन्या का प्राकटे
15:37हुआ
15:38मारिशा का संपूर्ण लालन पालन प्रकृती के सानिध्य, शीतल पवन और व्रिक्षों की छाव में अत्यंत वात्सले के साथ हुआ
15:48समय के साथ मारिशा एक अत्यंत सुन्दर, सर्वगुन संपन्न और अलोकिक तेज से युक्त दिव्य युवती के रूप में विक्सित
15:56हो गई
15:57भगवान ब्रह्मा की आज्या का पालन करते हुए दस प्रचेता बंधु उस पावन वन की ओर बढ़े जहां मारिशा निवास
16:05करती थी
16:06चंदरदेव सोम स्वयं प्रचेताओं के समक्ष प्रकट हुए और उन्होंने मारिशा का परिचय देते हुए उसे आदर पूर्वक उनके सामने
16:15प्रस्तुत किया
16:17सोंदेव ने प्रचेताओं को समझाया कि मारिशा महर्शी के तप अपसरा के सौंदर्य और व्रिक्षों के वादसले का अध्वितिय संगम
16:25है
16:27दस प्रचेताओं ने जब मारिशा के अलौकिक सौंदर्य और पवित्र स्वभाव को देखा तो उनका हृदय उसके प्रतीश्रधा और प्रेम
16:36से भर गया
16:38ब्रहमा जी के निर्देशानुसार चंदरदेव ने प्रचेताओं से मारिशा का पाणि ग्रहन कर स्रिष्टी को आगे बढ़ाने का अग्रह किया
16:47मारिशा ने भी जगत कल्यान और नए स्रिजन के संकल्प की पूर्ती हेतु प्रचेताओं की अर्धांगिनी बनना सहेश स्विकार कर
16:55लिया
16:56इस प्रकार मारिशा और प्रचेताओं के पावन मिलन ने प्रजाप्ती दक्ष के पुनरजन्म और नए स्रिजन चक्र की नीव रखी
17:05इस दिव्य विवाह के लिए संपूर्ण वन प्रदेश को अलोकिक फूलों और स्वर्णिम लताओं से सजाया गया
17:12जहां प्रकृती स्वयं अपने स्वामी के स्वागत में थिरक रही थी
17:17तपस्या के तेज से दमकते हुए दसों प्रचेता अपने मस्तक पर दिव्य भस्म लगाएं और शांत चित धारन किये यग्यशाला
17:25की ओर अग्रसर हुए
17:28व्रिक्षों और नदियों की लाडली मारिशा पुष्पों के आभूशनों से सुसजित होकर साक्षात वंदेवी की भाती मंद कदमों से विवाह
17:36मंडप में पधारी
17:39स्रिष्टी के परमपिता भगवान ब्रहमा अपने हंस वाहन पर सवार होकर चतुर मुख से वेद मंत्रों का उच्चारन करते हुए
17:47इस पावन मिलन के साक्षी बनने लोग कल्यान हेतु पधारे
17:52देवर्शी नारद और मरीची आदी महान रिशियों ने वेदी के चारों और बैठ कर ऐसे दिव्य मंत्रों का पाथ आरंभ
17:59किया जिससे संपून ब्रहमांड में सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगा
18:05यग्यकुंड से साक्षात अग्निदेव अपनी देधी प्यमान ज्वालाओं के साथ प्रकट हुए ताकि वे इस अभूत पूर्व और पवित्र विवाह
18:14के मुख्य साक्षी बन सकें
18:17ब्रहमांड जी के निर्देशानुसार दसों प्रचेताओं ने एक साथ मारिशा का कोमल हाथ थामकर पानिग्रहन संसकार की पवित्र रस्न को
18:25पूर्ण किया
18:27गगनमंडल से चंद्रदेव ने अपनी शीतल किर्णों के माध्यम से नवदमपती पर अमरित्मई सोम रस्की वर्षा की जिससे समस्त वातावर्ण
18:36में असीम शांती व्याप्थ हो गई
18:39इस अलोकिक अफसर पर देवलोग की अफसराओं ने मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया और गंधर्वों के मधुर गायन से पूरा वन
18:47प्रांत गूंज उठा
18:50ब्रहमा जी ने अपने दिव्य कमंडलू से पवित्र जल छिड़क कर नवदमपती को आशिरवाद दिया और स्रिष्टी के एक नए
18:57स्वर्णिम यूग की घोशना की
19:00विवाह के पश्चात, मारिशा और प्रचेताओं ने आदर पूर्वक सभी पूजय रिशियों और देवताओं के चरण स्पर्षकर अखंड सौभाग्य का
19:09वर्दान प्राप्त किया
19:12दसों प्रचेताओं के तपबल और मारिशा की पावन कोख के दिव्य सन्योग से एक अध्भुत प्रजवलित उर्जा पुन्च का निर्मान
19:20होने लगा
19:20उस घूमते हुए स्वर्णिम और दैदी प्यमान प्रकाश चक्र के भीतर महान प्रजाप्ती दक्ष की आत्मा अपने नए भौतिक शरीर
19:30में अवतरत होने के लिए तैयार हुई
19:33तभी एक परम प्रतापी और अलौकिक तेज से संपन्न नवजात शिशु का जन्म हुआ जिसकी किलकारियों से संपून स्रिष्टी में
19:41स्रिजन का शंखनाद गूंच उठा
19:44यह दिव्य शिशु कोई और नहीं बलकि पुन्ह अवतरत हुए प्रजाप्ती दक्ष थे जिन्हें संसार में पुन्ह जीवों की उत्पत्ती
19:52का महान कार्य संपन्न करना था
19:56बालक दक्ष को देखकर जगतगुरु ब्रह्मा के मुख पर संतोश्मई मुस्कान तैर गई क्योंकि स्रिष्टी का रुका हुआ चक्र अब
20:04पुन्ह गती पकड़ चुका था
20:06अपनी दिव्य शक्तियों के प्रभाव से वह असाधारन बालक ख्षन भर में ही एक अत्यंत बलशाली और तेजस्वी युवा के
20:14रूप में परिवर्तित हो गया
20:17स्वर्ग से देवताओं ने प्रजाप्ती दक्ष पर कल्कवरिक्ष के सुगंधित पारिजात पुष्पों की भारी वर्षा की और उनके पुन्रागमन का
20:25हर्शोल लास के साथ स्वागत किया
20:28अपने इस महान स्रिष्टिकार्य को सफलता पूर्वक आरंभ करवा कर दसों प्रचेता अब परम मोक्ष की प्राप्ती हेतु ध्यानमगन होने
20:37के लिए हिमालय की ओर प्रस्थान कर गए
20:41नववतारित प्रजाप्ती दक्ष ने ब्रहमाजी को प्रणाम कर एक बार फिर संपून ब्रहमांड को विविध प्रकार के जीवों और वनस्पतियों
20:49से भरने के महापर्व का संकल्प लिया
20:53महाराजा प्रचेता अपनी पतिवर्ता और करुणामई पत्नी मारिशा के साथ राजसिनहासन पर विराजमान होकर संपून प्रित्वी को धर्म की छत्रचाया
21:03में लाते हैं
21:05प्रचेता भाईयों का दर्बार न्याय और सत्य का प्रतीक बन गया जहां प्रत्येक प्रजाजन की बात समान आदर और निश्पक्षता
21:13के साथ सुनी जाती थी
21:16दसों प्रचेताओं ने चारों दिशाओं में धर्म के सनातन नियमों की पुनरस्थापना की जिससे समाज में अराजक्ता और भय का
21:24पूर्ण विनाश हो गया
21:26महारानी मारिशा की असीन गया और सने से प्रभावित होकर राज्य की समस्त्ष्त्रिया उन्हे साक्षात लक्षमी का स्वरूप मानकर पूजने
21:35लगी
21:37प्रचेताओं के पुन्यमे शासन के प्रभाव से व्रिक्ष फलों के भार से जुप गए और खेट सुनहरी फसलों से लहलहाने
21:44लगे
21:46पवित्र नदिया अम्रित्तुल्य स्वच जल से प्रवाहित होने लगी जिनके तटों पर हिंसक और शांत जीव बिना किसी वैर्भाव के
21:54एक साथ विचर्ण करते थे
21:57प्रकृती के इस अभूत पूर्व परिवर्तन ने प्रित्वी को वैकुंठ के समान पावन और आनंदमई धाम में परिवर्तित कर दिया
22:05था
22:06क्रिशक और श्रम जीवी प्रसन्न चित्थ होकर अपनी भूमी में हल चलाते और भगवान श्रीहरी की महिमा के पावन गीत
22:14गाते थे
22:15नगरों और ग्रामों में भव्य मंदिरों और सुन्दर भवनों का निर्मान हुआ, जहां सर्वत्र वेदध्वनी और भक्तिसंगीत गूंचता रहता था
22:25स्थान स्थान पर विशाल यग्यों और अनुष्ठानों का आयोजन होने लगा, जिनकी पवित्र आहुतियों की सुंगद से वायुमंडल देवमय हो
22:34गया
22:35रिशियों और मुनियों ने बालकों को सदाचार, धर्म और शास्त्रों की शिक्षा देकर एक ज्यानवान समाज की नीम सुद्रिड की
22:45देवराज इंद्र समयस्मय पर परियात वर्शा करते, जिससे प्रित्वी की उर्वरा शक्ती निरंतर बढ़ती ही चली गई
22:53राजा प्रचेता स्वयन वेश बदलकर अथ्वा भव्य रथों पर आरूढ होकर अपनी प्रजा के दुहकों का निवारन करने भ्रमन करते
23:01थे
23:03मारिशा ने अनक्षेत्र और दानशालाय बनवाकर निर्धनों, वृद्धों और असहायों की सेवा में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया
23:13इस धर्म प्रायन राज्य में रोग, शोक, अकाल और अज्यानता का कोई नामों निशान शेश न रहा और चारों और
23:20केवल प्रसन्नता छा गई
23:23संध्याकाल में घरों से उठती सुगंधित धूप की धुंध और दीपों की पंक्तिया रात्री के अंधकार को भी प्रकाश्मय बना
23:31देती थी
23:33स्वर्ग लोग से गंधर्व और अपसराय प्रित्वी के इस अलौकिक द्रिश को देख कर देवताओं सहित प्रचेताओं के यश्का गान
23:41करने लगे
23:42दसों प्रचेता भाईयों ने अपने धर्म प्रायन कार्य को पूर्ण समझ कर भगवान विश्णु के चर्णों में अनन्य भक्ती अर्पित
23:50की
23:52प्रचेताओं और मारिशा के शासन में प्रजा ने सत्ययुग के समान दीरगायु, आरोग्य और परमशांती का आनन्द प्राप्त किया
24:00इस प्रकार धर्म और न्याय पर आधारित प्रचेताओं का यह युग आने वाली समस्त पीढियों के लिए एक आदर्श उदाहरन
24:09बन गया
24:10धर्म और शान्ती के इस स्वर्णिन काल में अब समया गया था कि स्रिष्टी के विस्तार के लिए एक महान
24:17प्रजाप्ती का पुनह प्रित्वी पर अवतरण हो
24:21संसार में नवीन प्रजातियों के स्रिजन के उद्देश से स्वयं परम्पिता ब्रह्मा अत्यंत प्रकाशमान और भव्य रूप में प्रचेताओं के
24:29सम्मुख प्रकट हुए
24:32ब्रह्मा जी ने दिव्यवानी में घोशना की कि उनके ही अंश से पूर्व जन्म के महान प्रजाप्ती दक्ष का इस
24:39धरा पर पुनह अवतरण होने वाला है
24:43प्रचेताओं और मारिशा ने परम्पिता ब्रह्मा के चर्णों में शीश नवाया और उस दिव्य संकल्प को सहर्ष स्विकार कर लिया
24:51मारिशा के गर्भ में उस महान आत्मा का तेज समाहित हो गया जिसने ब्रह्मांड के आगामी स्रिजन चक्र को गती
24:59देने का भार उठाना था
25:01समय आने पर मारिशा के गर्भ से दिव्यकान्ती से युक्त अत्यंत तेजस्वी बालक दक्ष प्रजाप्ती का जन्म हुआ
25:10जन्म लेते ही वह बालक एक अत्यंत ओजस्वी और पराक्रमी पुरुष के रूप में परिवर्तित हो गया, जिसके नेत्रों में
25:17ब्रहमांडिय ज्ञान चमक रहा था
25:20इस अभूत पूर्व जन्म पर स्वर्ग के देवताओं ने दिव्य पुष्पों की वर्शा की और गंधर्वों ने मंगल गीत गाकर
25:28नए युग का स्वागत किया
25:30दक्ष ने अपने पिताओं के तपोबल और माता की कोमलता को आत्म साथ कर अत्यंत तीवर गती से संपूर्ण वेदों
25:38और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया
25:41ज्यान की पराकाश्ठा पर पहुँचकर दक्ष ने स्रिजन करता ब्रहमा के समक्ष उपस्थित होकर अपने जीवन के परम लक्षे की
25:49याचना की
25:51ब्रहमा जी ने दक्ष को आदेश दिया कि वे संपूर्ण प्रित्वी पर विवित प्रकार की प्रजातियों और जीवों का विस्तार
25:58कर स्रिष्टी को जीवन्त बनाएं
26:01इस विशाल और दुर्गम कार्य को पूर्ण करने के लिए दक्ष ने भगवान नारायन की कृपा प्राप्त करने हेतु घोर
26:09तपस्या प्रारंभ कर दी
26:11दक्ष की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर जगतपालक भगवान विश्णू अत्यंत मनोहारी और अलोकिक रूप में उनके सम्मुख प्रकट हुए
26:22भगवान विश्णू ने दक्ष को स्रिष्ट शक्ती का वर्दान दिया जिससे वे मानसिक और शारिरिक संकल्प से नई प्रजातियों को
26:29जन्न दे सकें
26:31दिव्य वर्दान पाकर दक्ष ने प्रित्वी के विशाल भूभाग पर अपनी द्रिष्टी डाली और विभिन नयोनियों के निर्मान का मानचित्र
26:40तयार किया
26:41दक्ष ने पवित्र नदियों के तटपर एक भव्य और अलोकिक नगरी की स्थापना की जो स्रिजन के नए युग का
26:49मुख्य केंद्र बनी
26:51अपने मानसिक संकल्प मात्र से दक्ष ने सर्वप्रथम दस महान रिशियों को जन्म दिया जो ज्ञान और धर्म का प्रसार
26:59करने में सहायक बने
27:01इसके पश्चात उनके संकर्प से वनों में पशु, आकाश में पक्षी और नदियों में जल्चर जीव प्रचुर मात्रा में क्रीडा
27:09करने लगे
27:11अपने पुत्र दक्ष को स्रिष्टी के महानकार्य में पूरी तरह लीन देखकर, प्रचेटा भायों ने संतुष्ठ होकर परम्मोक्ष की प्राप्ती
27:19हेतु प्रस्थान किया
27:21इस प्रकार दक्ष प्रजापती के नेत्रित्व में प्रित्वी पर जीवन का एक नया और अनंत कालखंड प्रारंब हुआ जिसने भावी
27:30इतिहास की नीम रखी
27:31अब प्रजापती दक्ष ने यह अनुभव किया कि केवल मानसिक संकल्प द्वारा स्रिष्टी का विस्तार सीमित है इसलिए उन्होंने मैथुनी
27:41स्रिष्टी के माध्यम से ब्रहमांड को भरने का द्रिध निश्चय किया
27:46स्रिष्टी की इस नवीन योजना को सिध्ध करने के लिए दक्ष प्रजापती ने विंध्याचल परवतों के निकट अत्यंत कठोर तपस्या
27:54आरंभ की जिससे उनका पूरा शरीर तेज से प्रदीप्थ हो उठा
28:00दक्ष की घोर तपस्या से प्रसन होकर शंक, चक्रक, गदा और पद्मधारन किये हुए चतुर्भुज भगवान श्रीहरी विष्णु अत्यंत दिव्य
28:09और तेजोमय रूप में उनके समक्ष प्रकट हुए
28:13भगवान विष्णु ने मंद मुस्कान के साथ प्रजाप्ती दक्ष को स्रिष्टी विस्तार का आशिरवाद दिया और उन्हें पंचजनी नाम की
28:21रूपवती कन्या असिकनी को अरधांगिनी के रूप में स्विकार करने का निर्देश दिया
28:27देवों और रिशियों की उपस्थिती में प्रजाप्ती दक्ष और देवी असिकनी का पावन विवाह संपन्न हुआ
28:34जो ब्रहमांड में भौतिक स्रिजन के एक नए युग का साक्षी बना
28:38इस पावन दामपत्य से दक्ष ने सर्वप्रथम हर्यश्व नामक 10,000 पराक्रमी पुत्रों को उत्पन्न किया
28:46जिन्हें स्रिश्टी के विस्तार का महान कार्य सौपा गया
28:50अपने पिता की आग्या मान कर ये सभी हर्यश्व नारायन स्रस नामक पवित्र तीर्थ पर गए
28:57ताकि स्रिश्टी आरंभ करने से पूर्व वे अपनी इंद्रियों को शुद्ध कर सके
29:02वहां ध्यानमग्न हर्यश्व के सम्मुख वीना धारन किये हुए देवर्शी नारत प्रकट हुए
29:08जिनकी दिव्य आभा संपूर्ण वातावर्ण को आलोकित कर रही थी
29:14देवर्शी नारद ने हर्यश्वों को संसार के चक्र में फंसाने वाले स्रिजन कार्य के स्थान पर मोक्ष और अध्यात्म के
29:21मार्ग पर चलने का उपदेश दिया
29:24नारत जी के परम ज्यान से जागरित होकर वे सभी दस हजार हर्यश्व संसार को त्याग कर सदा के लिए
29:31परमात्मा की भक्ती और मोक्ष के मार्ग पर निकल पड़े
29:35जब प्रजापती दक्ष को अपने प्रिय पुत्रों के वैराग्य धारन करने का समाचार मिला तो वे अत्यंत शुकाकुल और चिन्तित
29:44हो उठे
29:45स्रिष्टी के संकल्प को अधूरा न छोड़ते हुए दक्ष ने उन्ह शबलाश्व नामक एक हजार तेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया
29:53और उन्हें भी स्रिष्टी समवर्धन की आग्यादी
29:57अपने अग्रजों की भानती शबलाश भी नारायंस्रस तीर्थ पर पहुँचे और वहां जाकर घोर तपस्या में लीन हो गए
30:06देवर्शी नारद एक बार फिर वहां प्रकट हुए और उन्होंने शबलाश्वों को भी नश्वर संसार के बंधनों से मुक्त होकर
30:14परमपद प्राप्त करने का उपदेश दिया
30:17अपने बड़े भाईयों के पच्चेहनों पर चलते हुए वे सभी शबलाश भी तपस्या और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़
30:24गए और कभी लोट कर नहीं आए
30:27अपने सभी पुत्रों को वैराग्य की और प्रेरित देखकर प्रजाप्ती दक्ष देवर्शी नारत पर अत्यंत क्रोधित हुए
30:35परंतु उन्होंने अपने भीतर की उर्जा को पुनह स्रिजन में लगाने का निर्णय लिया
30:41इसके पश्चात दक्ष ने वन्ष के निरंतर प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए साथ परम रूपवती और गुनवती पुत्रियों का
30:49स्रिजन किया
30:51उन्होंने अपनी इन साथ कन्याओं का विवाह धर्म, कश्यप, चंद्र और अन्य महान रिशियों के साथ अत्यंत हर्शोल्लास के साथ
30:59संपन्न कराया
31:01रिशी कश्यप और दक्ष की पुत्रियों के पवित्र मिलन से देवताओं, असुरों, गंधर्वों, मनुषों, यक्षों और पशुपक्षियों की उत्पत्ती हुई,
31:10जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड पुनह स्पंदित हो उठा
31:14इस प्रकार दक्ष प्रजाप्ती का यह महान स्रिजन कार्य पूर्ण हुआ, और संपूर्ण प्रित्वी तथा स्वर्गलोक विभिन प्रकार के जीवों
31:23की मधुर ध्वनियों और चेतना से आबाध हो गए
31:27अपने विशाल और अध्भुत स्रिष्ट स्रिजन को देखकर प्रजाप्ती दक्ष का हृदय अत्यंत गर्व और अहंकार से भर गया
31:35सत्यलोक से स्रिष्टिकर्ता ब्रह्मा ने अपने पुत्र दक्ष के भीतर पन्पते हुए इस सुक्ष्म अहंकार को ध्यानपूर्वक देखा
31:44दक्ष ने अपने भव्य राजदर्बार में एक महास्भा का आयोजन किया जहां समस्त देवताओं, रिशियों और राजाओं को उपस्थित होने
31:53का आदेश दिया गया
31:55सभा के केंद्र में दक्ष का स्वर्ण सिनहासन सबसे उचे स्थान पर स्थापित था, जो उनके सर्वोच वर्चस्व की लालसा
32:04को दर्शाता था
32:06जब सभी देवता दक्ष के सम्मान में जुक रहे थे, तब सभा में महादेव का रिक्ट आसन देखकर दक्ष के
32:13मन में रोश की एक चिंदारी सुलक उठी
32:16दक्ष ने सभा को सम्बोधित करते हुए कर्मकांड और कठोर नियमों की महत्ता पर बल दिया और वैरागी जीवन जीने
32:24वाले शिव की उपेक्षा की
32:27दूसरी और कैलाश परवत की बरफीली चोटियों पर महादेव बाहरी दुनिया के इस को लाहल और दक्ष के हंकार से
32:35सर्वता विरक्थ होकर गेहन समाधी में लीन थे
32:39भ्रेगु और मरीची जैसे महान रिशियों ने जब दक्ष की अध्भुत रचनाओं की प्रशनसा की तो दक्ष का बौधिक अभिमान
32:47और अधिक बढ़ गया
32:48दक्ष ने यह घोशना की की भौतिक स्रिष्टी और वैदिक यज्यही जीवन के सर्वोच मार्ध हैं जबकी वैराग्य केवल पलायनवाद
32:58है
33:00देवर्शी नारध अपनी वीना बजाते हुए आकाश मार्ग से दक्ष के इस वैभवशाली किन्तु अहंकारी वातावर्ण को देख रहे थे
33:09नारध जी ने दक्ष के महल में प्रवेश किया और अपनी मधुर संगीत लहरियों से वहां के गंभीर वातावर्ण को
33:16थोड़ा शांत किया
33:19देवर्शी ने दक्ष को स्मरण कराया कि समस्त भौतिक रचनायक शनभंगुर है और केवल परम पुरुष परमात्मा ही शाश्वत सत्य
33:27है
33:29दक्ष ने नारत की आध्यात्मिक चेतावनियों को हंसकर टाल दिया और दावा किया कि उनके द्वारा रचित स्रिष्टी के बिना
33:37मोक्ष का कोई अर्थ नहीं है
33:40इसी समय शीर सागर में शेशनात पर विराजमान भगवान विश्णु ने दक्ष के इस बढ़ते अहंकार को देखा और बे
33:48मुस्कुरा दिये
33:50भगवान विश्णु जानते थे कि अहंकार का यह बीज भविश्च में एक विनाशकारी टक्राव को जन्म देगा जो स्रिष्टी के
33:58संतुलन के लिए आवश्चक था
34:01प्रजाप्ती दक्ष ने अब पूरे ब्रहमांड में अपनी संहिताओं और नियमों को कठोर्ता से लागू करना शुरू कर दिया जिससे
34:09स्वतंत्र चेतना पर अंकुष लगने लगा
34:12देवगन और अन्य प्रजाप्ती धीरे धीरे महसूस करने लगे कि दक्ष का यह हठ धर्म और वैराग्य के बीच एक
34:20गहरी खाई खोद रहा है
34:23हिमाले की परवत श्रिंख लाओं पर अचानक घने और काले बादल मंदराने लगे जो आने वाले वैचारिक महासंग्राम का संकेत
34:32दे रहे थे
34:34दक्ष अपने विशाल प्रासाद की सबसे उची बालकनी से रात के तारों भरे आकाश को देख रहे थे
34:40पूरी तरह से आश्वस्त की उनकी सत्ता को कोई चुनोती नहीं दे सकता
34:46इस प्रकार दक्ष के असीन गर्व और महादेव की अनंत उपेक्षा ने भविश्य के उस महान संधर्ष की नीव रख
34:53दी जो संपूर्ण ब्रहमान को हिला कर रख देने वाला था
Comments

Recommended