कलयुग में धर्म की स्थापना के बाद, महाराज परीक्षित एक अनजाने अपमान के कारण एक भयंकर श्राप के घेरे में आ जाते हैं! 🐍 एक ऋषि पुत्र के क्रोध ने उन्हें मृत्यु के करीब ला खड़ा किया, लेकिन यही घटना उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। देखिए कैसे परीक्षित ने मृत्यु को स्वीकार कर, गंगा के तट पर आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग चुना। इस एपिसोड में जानिए राजा परीक्षित के अंतिम सप्ताह की तैयारी और महान ऋषियों के उनके पास आगमन की अविश्वसनीय कहानी! #BhagavataPurana #MaharajParikshit #ParikshitCurse #SrimadBhagavatam #HinduMythology
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00:00महाराज युधिष्थिर के महाप्रस्थान के बाद हस्तिनापूर के सिनहासन पर विराजमान होकर प्रतापी राजापरीक्षित ने अपने पूर्वजों की गौरवशाली न्याय
00:09परमपरा को जीवित रखा.
00:12अपने धर्म प्रायन और प्रजावत सल स्वभाव से राजा परीक्षित ने संपूर्ण आर्यावर्त में सुख, शान्ती और अटूट समरिधी की
00:21स्थापना की, जिससे चारों और हर्शोल लास्चा गया.
00:25जब कलियुग ने इस पावन धरा पर अपने पैर पसारने का कुप्रयास किया, तब पराक्रमी समराट परीक्षित ने उसे परास्त
00:33कर केवल अधर्म के स्थानों में ही सीमित रहने का कठोर आदेश दिया.
00:39हस्तिनापुर के वैभवशाली सामराज में खेतों में लहलाती फसलें और गूंजते वेडपाठ इस बात के साक्षी थे कि धर्मराज का
00:48पौत्र आज भी धर्म का सर्वोच रक्षक है.
00:52एक शुब प्रभात पर अपने विशाल राज्य की सीमाओं की सुरक्षा और हिंसक पशुओं के नियंत्रण के उद्देश से राजा
01:00परीच्षित ने सघन वन में एक भव्य शाही शिकार अभियान पर जाने का निश्चय किया.
01:07हस्तिनापुर के मुख्यद्वार पर सुसज्जित हाथी, तीवरगामी अश्व और चम्चमाते रथों के साथ शाही सेनाप्ती और शिकारी दल अपने महाराज
01:16की अगवानी के लिए पूरी तरह तयार खड़े थे.
01:20सोने के आभूशनों से सजे एक अत्यंत तेजस्वी श्वेत अश्व पर सवार होकर, स्वर्ण मुकुट धारी राजा परीक्षित ने धनुशबान
01:29थामकर वन की ओर प्रस्थान किया.
01:32जैसे ही शिकारियों का यह कोलाहल पूर्ण दल कुरुक्षेत्र के प्राचीन और अत्यंत सघन वन में प्रविश्थ हुआ, वैसे ही
01:40घने व्रिच्षों की छाव तले एक रहस्य में सन्नाट आचा गया.
01:45अचानक जाडियों के पीछे से एक अत्यंत तीवर गती वाला, अलोकिक कांती से चमकता हुआ, स्वर्ण हिरन दौरता हुआ, समराट
01:53के सामने से निकला.
01:55उस दिव्य हिरन की अद्वितिय गती को देख कर राजा परीक्षित ने अपने अश्व को तेज किया और शिकार के
02:03उत्साह मेवे अपने पूरे सैन्य दल को पीछे छोड़ते चले गए.
02:08घने जंगल के संकरे रास्तों पर हवा की गती से दौरते हुए राजा परीक्षित उस रहस्य में म्रिग का पीछा
02:15करते हुए वन के सबसे दुर्गम और अंधकार्म एक शेत्र में पहुँच गए.
02:20वह चंचल स्वर्ण म्रिग अचानक एक विशाल जाड़ी के पीछे गायब हो गया, जिससे राजा अचंभित रह गए और उन्हें
02:28एहसास हुआ कि वे वन में पूरी तरह अकेले पड़ चुके हैं.
02:33अपने मार्ग को खोजने के प्रयास में राजा ने अपने थके हुए अश्व को रोका, परंतु चारों और केवल विशाल,
02:41दराबने व्रिक्षों और सूखी लताओं का भयानक जाल दिखाई दे रहा था.
02:46दोपहर का सूर्य आसमान के ठीक मध्य में आ चुका था, और उसकी प्रचंड किर्णों ने उस घने जंगल के
02:53भीतर एक असहनिय और दमघोंटू उष्णता पैदा कर दी थी.
02:58वन के इस दुरगम मार्ग पर निरंतर भटकने के कारण राजा परीक्षित का गला पूरी तरह सूख गया और वे
03:05तीवर प्यास तथा शारिरिक ठकावट से व्याकुल होने लगे.
03:10उन्होंने पूरी शक्ती से अपने सैनिकों और जलवाहकों को पुकारा, लेकिन घने सन्नाटे को चीरती हुई केवल उनकी ही आवास
03:19गूँच कर वापस लौट आई.
03:21अत्यधिक कमजोरी महसूस होने पर व्याकुल समराथ अपने प्रिय अश्व की पीट से नीचे उत्रे और उसकी लगाम थामकर पानी
03:30की तलाश में पैदल ही आगे बढ़ने लगे.
03:34चारो और फैले कंटीले ज़ाड और घने पत्ते राजा के शाही वस्त्रों को चू रहे थे. मानो वे उन्हें इस
03:41भयानक विपदा के आगामी संकट से सचेत कर रहे हुँ.
03:45तभी सूखी पत्तियों के बीच से गुजरते हुए राजा परीच्षित को दूर घने पेडों के बीच एक छोटी सी कुटिया
03:53और वहां से उठता हुआ हलका धुआ दिखाई दिया.
03:57प्यास से लड़ते हुए और अपने अंतिन साहस को बटोरते हुए चकरवर्ती समराथ परीच्षित उस अंजान आश्रम की ओर बढ़ने
04:05लगे, जहां उनका भाग्य एक नया और भयंकर मोड लेने वाला था.
04:11ठकान और प्यास से बेहाल, महाराजा परीच्षित ने घने जंगल के बीच से निकलते हुए उस छोटी कुटिया की ओर
04:18अपने कदम बढ़ाए, जहां से जीवन की एक ख्षीन आशा और एक अद्रिश्य चुनोती उनका इंतजार कर रही थी.
04:27कुटिया के समीब पहुँचते ही, उन्होंने एक शांत और पवित्र वातावर्ण महसूस किया, जहां प्रकृती की हर ध्वने ध्यान की
04:35गहराई में समाहित होकर एक अध्भुत शांती का स्रिजन कर रही थी.
04:40आश्रम के भीतर प्रवेश करते ही, उनकी द्रिश्टी एक ऐसे तेजस्वी रिशी पर पड़ी जो गहन समाधी में लीन थे,
04:48उनके चारों और एक अलौकिक आभा व्याप्त थी.
04:53राजा परीक्षित ने शांत भाव से रिशी के समीप जाकर अपनी प्यास बुझाने हेतु पानी की याचना की, पर रिशी
05:00की तपस्या भंग न हुई.
05:03काल के प्रवाह में अटकी हर श्वास के साथ, राजा की बेचैनी बढ़ती गई, मानो हर क्षण उनके धैर्य की
05:10अंतिन सीमा को छू रहा हो.
05:13बार-बार आहवान करने पर भी जब रिशी अविचल रहे, तो राजा के मन में अपमान की अगनी धधक उठी,
05:20एक समराट के धैर्य की सीमा तूट रही थी.
05:24उनकी शाही गरिमा को चुनोती मिलती देख, अपमान और क्रोध की ज्वाला ने उनके विवेक को क्षण भर के लिए
05:32ग्रस लिया, अंधकार ने उनके मन पर अधिकार कर लिया.
05:36उन्ही क्षणों में उनकी द्रिष्टी आश्रम के प्रवेश द्वार पर पड़े एक मृत सर्प पर पड़ी, जिसने उनके क्रोध को
05:44एक विकृत दिशा दे दी.
05:46एक आवेग, एक क्षणिक विचार, जो विनाश का बीज बोने वाला था, उनके मस्तिश्क में कौंध गया, और उन्होंने उस
05:55निर्जीव सर्प की ओर हाथ बढ़ाया.
05:58जैसे ही उन्होंने उस सर्प को उठाया, उसकी शीतलता ने उनके क्रोध की अगनी मेघी का काम किया, और विवेक
06:06पूरी तरह से तिरोहित हो गया.
06:09अंधे क्रोध में भर कर, उन्होंने सर्प को रिशी के गले में धीरे से डाल दिया, एक ऐसा कृत्य जो
06:15स्वयं प्रकृती के संतुलन को भंग करने वाला था.
06:19यह दुस्साहस था एक राजा का, जिसकी प्यास ने उसके राजधर्म और मर्यादा को क्षण भर में विस्मृत कर दिया
06:27था.
06:28अपमान का यह प्रतीक अब रिशी के गले में शांत भाव से पड़ा था, जैसे वह आने वाले भयानत भाग्य
06:35का मौन उद्धोश कर रहा हो.
06:38अपने कृत्य की कृरूरता को हरिदय में लिये और भविश्य के अज्यात परिणामों से बेखबर राजा परिक्षित आश्रम से बाहर
06:46निकलाए.
06:48जैसे ही उन्होंने आश्रम की सीमा छोड़ी, एक अजीब सी खामोशी ने उन्हें घेर लिया, जो उनके मन की अशांती
06:56को और बढ़ा रही थी.
06:58वायू भी जैसे ठहर गई थी, पत्तों की सरसराहट भी मौन थी, प्रकृती मानों अपने ही भविश्य के विध्वन्स का
07:06आभास कर सहमी हुई थी.
07:09प्रत्यक कदम के साथ, पश्चाताप की एक हलकी सी छाया उनके हृदय में पढ़ने लगी, जो उसक्षनिक क्रोध की ज्वाला
07:17से कहीं अधिक स्थाई थी.
07:20शांत आश्रम अब पीछे छूट रहा था, अपने भीतर एक ऐसे अपमान को समेटे हुए, जिसकी प्रतिध्वनी आने वाले समय
07:29में एक भीशन श्राप का रूप लेने वाली थी.
07:33राजा परीक्षित ने अंजाने में ही मृत्यू के भयानक आहवान को जन दे दिया था, जिसने उनके भाग्य को एक
07:40दुखद अंत की ओर धकेल दिया.
07:43अशान्ती और भय से घिरा, राजा परीक्षित अब गंगा के तटकी ओर बढ़ने लगे, जहां उन्हें अपने जीवन का सबसे
07:51कठिन दिव्य संकल्प लेना था, मृत्यू को स्विकार करने का.
07:56गंगा के पवित्र तटकी ओर बढ़ते हुए, राजा परीक्षित का हृदय अपनी ही अविचारित क्रिया के बोच तले कराह रहा
08:04था, मानो काल्चक्र का क्रूर पहिया उनके नेती पर मुहर लगा चुका हो.
08:09उस क्षण उन्हें आभास हुआ की एक मरा हुआ सर्प मात्र एक अपमान नहीं, बलकि एक ऐसे घातक बीज का
08:17रोपन था, जिसकी फसल स्वया उनकी मृत्यू लेकर आएगी.
08:22उधर शांत तपोवन में, जब रिशी शमीक के पुत्र श्रिंगी ने अपने पिता के गले में उस मृत सर्प को
08:29देखा, तो उनका क्रोध ज्वाला बनकर फूट पड़ा.
08:33एक अलपायू रिशी होते हुए भी, श्रिंगी के भीतर की तपस्या अगनी पिता के अपमान से प्रजवलित होकर न्याय की
08:41प्रचंड मांग करने लगी.
08:44किसने मेरे पूजय पिता का ऐसा घोर अपमान करने का दुस्साहस किया है?
08:49यह विचार उनके मन में एक विश्धर सर्प की तरह फुफकारने लगा.
08:55अपने पिता की तपस्या के अनादर से आहत, श्रिंगी ने क्रोधवश एक घड़ा जल उठाया और स्वर्ग प्रित्वी को साक्षी
09:03मान कर राजा परीक्षित को शाप दिया.
09:05हे अज्यानी राजा, जिसने मेरे ध्यानावस्थित पिता का अपमान किया है, आज से सात्वे दिन तुम्हें तक्षक नाग दसेगा और
09:15तुम्हारी मृत्यू हो जाएगी.
09:18जैसे ही ये भयानक शब्द आकाश में गूंजे, प्रकृती ने भी एक क्षण के लिए अपनी श्वास रोकी, मानोकाल स्वय
09:26अपनी दिशा बदलने लगा हो.
09:29हजारों मील दूर गंगा तट पर पहुँचते ही, राजा परीक्षित को एक असहच कमकमपी महसूस हुई, जैसे किसी अद्रिश शक्ती
09:37ने उनकी नेती को जगजोर दिया हो.
09:41कुछ देर बाद, जब रिशी शमीक अपनी गहरी समाधी से उठे, तो उन्होंने अपने गले में उस मृत सर्प को
09:48पाया, और पुत्र श्रिंगी के क्रोध से लाल चहरे को देखा.
09:53शांत स्वभाव के शमीक ने अपने पुत्र से पूछा, वत्स, तुम्हारे चहरे पर यह क्रोध किस कारण है? और मेरे
10:02गले में यह मृत सर्प किस ने रखा है?
10:06श्रिंगी ने पिता को राजा परीक्षित द्वारा किये गए, अपमान का वृत्तान्त सुनाया और फिर अपने द्वारा दिये गए भयानक
10:13शाप के बारे में बताया.
10:16यह सुनकर रिशी शमीक का हरिदय तीवर वेदना से भर गया, क्योंकि वे जानते थे कि एक शनिक क्रोध का
10:23परिणाम कितना भयावह हो सकता है?
10:27एक धर्म प्रायन राजा को शाप देना, विशेशकर पांडवों के वंशच को रिशी शमीक की द्रिष्टी में एक अक्षमय पाप
10:35था.
10:36अपने पुत्र के कृत्य को सुधारने की आशा में, शमीक ने तुरंट एक शिश्य को परिख्षित को यह भयावह शाप
10:44सुनाने और उसे चेतावनी देने के लिए भेजा.
10:48गंगा तट पर जब राजा परिख्षित ने उस दूट से शाप का समाचार सुना, तो एक अजीब शांती उनके भीतर
10:55उतर आई, मानो नेती ने अपना अंतिम परदा उठा दिया हो.
11:00मृत्यू की आसनता ने उनके मन से भय को धो डाला और उन्हें जीवन के अंतिम सत्य की ओर अग्रसर
11:08किया.
11:09उन्हें ग्यात था कि अब उनके पास साथ दिन शेश हैं, और इन दिनों का उप्योग वे मोक्ष की प्राप्ती
11:16के लिए करेंगे.
11:18मृत्यू को एक अंत के रूप में नहीं, बलकि एक दिव्य यात्रा के द्वार के रूप में स्विकार करते हुए,
11:25राजा ने गंदा के तट पर अपना महान संकल्प लिया.
11:29समस्थ संसार के मोह को त्याग कर, राजा परीक्षित ने अपने अंतिम सप्ताह को भगवत भक्ती और आत्मज्यान में व्यतीत
11:38करने का निश्चय किया.
11:40आश्रम के शांत वातावर्ण में, जहां वेदों की गूंज और प्रकृती की मधुर ध्वनी एकाकार होती थी, रिशी शमीक के
11:48तरुन पुत्र श्रिंगी अपने साथियों संक्रिडा में मगन थे.
11:53तभी एक अन्य आश्रमवासी बालक, जिसकी सासे क्रोध और भै से तेज चल रही थी, भागा भागा श्रिंगी के पास
12:01आया और उसे राजा परीक्षित के अधर्मपूर्ण कृत्य की जानकारी दी.
12:07उस बालक ने थर्थराती आवाज में बताया कि कैसे राजा परीक्षित ने उनके ध्यानमगन पितारिशी शमीक के गले में एक
12:15मृत सर्प डाल कर उनका घोर अपमान किया था.
12:19इस अप्रत्याशित और अक्षमय अनादर की बात सुनकर श्रिंगी का बालसुलब चेहरा पहले तो अविश्वास से सिकुड गया, फिर धीरे
12:28धीरे क्रोध की ज्वाला से तपने लगा.
12:31उसके मन में यह विचार अगनी की भाती धधक उठा की भला कोई राजा एक तपस्वी रिशी का इतना बड़ा
12:38अपमान कैसे कर सकता है, जिसने अपना जीवन केवल धर्म और त्याग को समर्पित किया हो.
12:45अपने पूजय पिता के प्रती इस जगन्य कृत्य ने उसके भीतर सुक्त पड़ी योग शक्ती को जागरित कर दिया, मानो
12:52एक शांत जील में अचानक प्रचंड बवंडर उठ गया हो.
12:57उसके साथी बच्चे, जो अभी तक उच्सुक्ता से देख रहे थे, अब श्रिंगी के बदलते हुए रूप और उसकी आखों
13:05में दहकती क्रोध की अगनी से भयभीत हो उठे.
13:09बाल सुलब चंचलता को त्याग कर, श्रिंगी ने द्रेड़ता से संकल्प लिया कि वह अपने पिता के इस अपमान का
13:16प्रतिशोध अवश्य लेगा, चाहे इसके परिनाम कुछ भी हो.
13:21उसने अपने हाथों में एक जलपूर्ण कमंडलू उठाया, मंत्रों का उच्चारण करते हुए उस पवित्र जल को अपनी योग शक्ती
13:30से अभिमंत्रित करना प्रारंभ कर दिया.
13:33जैसे जैसे उसने मंत्रों का जाप किया, उसके चारों ओर की हवा में एक अलौकिक कमपन फैल गया और वातावर्ण
13:41में एक गूड रहस्य में उर्जा का संचार होने लगा.
13:45उसकी युवा आत्मा में भराक्रोध अब एक शक्तिशाली और नियंत्रित उर्जा में बदल चुका था, जो श्राप के रूप में
13:53प्रकट होने को आतुर था.
13:56अंतह उसने अपनी आखें खोली, जिनमें अब केवल कठोर्ता और दिव्य न्याय की ज्वाला थी, और उस अभिमंत्रित जल को
14:04अपनी पूरी शक्ती से आकाश की ओर उच्छाला.
14:08एक गरच्ती हुई आवाज में, उसने घोषणा की की जिस राजा ने उसके पिता का अपमान किया है, उसे आज
14:16से सात्वे दिन सर्पों के राजा तक्षक के दंश से मृत्यू प्राप्थ होगी.
14:21यह दिव्य श्राप एक अद्रिश तीर की भाती, राजा परीक्षित की ओर तीविर्ता से निकल पड़ा, जो उस समय अपने
14:29राज्ज में अन्भिग्य थे.
14:31श्राप की घोशना होते ही, आकाश में बिजली कड़की और धर्ती काप उठी, जैसे स्वयं प्रकृती इस भयानक निर्नय की
14:40गवाह बन रही हो.
14:42श्रिंगी अपने कर्तव्य को पूर्ण कर, शांत खड़ा था, उसके मुख पर अब भी क्रोध और न्याय का मिश्रन स्पष्ट
14:50दिख रहा था.
14:51कुछ क्षन बाद, जब रिशी शमीक अपनी समाधी से जागे, तो उन्हें अपने पुत्र के इस उग्रकृत्य और उसके परिणामों
15:00का आभास हो गया.
15:02पुत्र के क्रोध और अंजाने में किये गए इस भयानक श्राप से शमीक रिशी व्यथित हो उठे, क्योंकि उन्हें ग्यात
15:09था कि एक राजा की मृत्यू के गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
15:15उन्होंने महसूस किया कि यह केवल एक श्राप नहीं, बलकि एक दिव्य योजना का हिस्सा था, जो नेती के अटल
15:23विधान को प्रकट करने वाली थी.
15:26रिशी शमीक ने तुरंट अपने एक शिश्य को राजा परीक्षित के पास भेजा ताकि वह उन्हें इस आसन्न मृत्यू और
15:33मोक्ष के मार्ग के बारे में सूचित कर सके.
15:37रिशी शमीक ने अत्यंत दुखी मन से अपने प्रिय और मेधावी शिश्य गौर्मुख को अपने समीक बुलाया.
15:45महर्शी ने शिश्य को अपने पुत्र श्रिंगी के उताव लेपन और राजा परीक्षित को मिले सात्वे दिन तक्षक द्वारा मृत्यू
15:53के भयानक श्राप के बारे में विस्तार से बताया.
15:56गुरु की बातें सुनकर युवा शिश्य गौर्मुख स्तब्ध रह गया और धर्मराज युधिष्थिर के महान उत्तराधिकारी के इस आसन्न विनाश
16:05की बात से उसका हरिदयकाप उठा.
16:09शमीक रिशी ने गौर्मुख को तुरंथ हस्तिनापूर जाकर समराट परीक्षित को बिना किसी क्रोध या द्वेश के इस दुखद नेती
16:17की सूचना देने की आग्या दी.
16:20उन्होंने समझाया कि महाराजा परीक्षित एक परमधार्मिक और प्रजावत्सर राजा हैं, जिनका विवेक केवल भूख और थकावट के कारण क्षनिक
16:29रूप से भ्रमित हो गया था.
16:32गुरुदेव की आग्या सिर आखों पर रखकर गौर्मुक ने उनके चर्णों का स्पर्श किया और इस महत्वपूर्ण तथा समवेदनशील संदेश
16:40को ले जाने का संकल्प लिया.
16:43अपने गुरु का आशिरवाद लेकर शिश्य गौर्मुक तीवर्ता से आश्रम से बाहर निकला और हस्तिनापूर की ओर जाने वाले बीहड
16:52वन मार्क पर कदम बढ़ा दिये.
16:55राजा की आत्मा को मुक्ती का समय देने के लिए वह युवा ब्रहमचारी घने जंगलों और कल-कल बहती नदियों
17:02को पार करते हुए निरंतर आगे बढ़ता रहा.
17:06उधर हस्तिनापूर के भव्य राजप्रासाद में राजा परीक्षित गहरे पश्चाताप की अगनी में जल रहे थे और संत के गले
17:14में मृत सर्प डालने के अपने अधर्म पर गलानी व्यक्त कर रहे थे.
17:19उन्होंने भगवान श्री हरी से अपने इस अक्षमय अपराध के लिए दंड की याचना की ताकि वे इस पाप के
17:26फल से मुक्थ होकर शुद्ध हो सकें.
17:29उसी समय धूल धूसरित और हाफता हुआ युवा शिश्य गौर्मुक हस्तिनापूर के विशाल स्वर्ण द्वारों पर पहुँचा और तुरंत राजा
17:38से मिलने की गुहार लगाई.
17:41गौर्पालों ने उस तपस्वी बालक के संदेश की गंभीरता को समझते हुए उसे शीघ्र ही महाराजा परीक्षित के भव्यदर्बार में
17:49प्रवेश कराया.
17:50एक मुनी कुमार को आते देख राजा परीक्षित तुरंत अपने सिनहासन से उत्रे और नत्मस्तक होकर उनका अत्यंत आदर के
17:59साथ स्वागत किया.
18:02गौर्मुख ने कापती किन्तु सपष्ट आवाज में शमीक रिशी का संदेश सुनाया कि आज से सात्वे दिन नागराज तक्षक के
18:10डसने से राजा की मृत्यू निश्चित है.
18:13इस भयानक समाचार को सुनकर जहां पूरा राजदर्बार भय और शोक से स्तब्ध रह गया, वहीं राजा परीक्षित का चेहरा
18:21एक अलौकिक शांती से चमक उठा.
18:25परीक्षित ने इस श्राब को तक्षक की मृत्यू नहीं, बलकि भगवान श्री कृष्न की परमकृपा माना जो उन्हें सांसारिक मुहमाया
18:33से मुक्त करने आई थी.
18:36राजा ने रिशिपुत्र को धन्यवाद दिया और उनका विधिवत पूजन कर उन्हें उफारों के साथ विदा किया और स्वयन सन्यास
18:44लेने का निर्णय किया.
18:46उन्होंने तुरंट अपने मंत्रियों और गुरूओं को बुलाकर अपने वीर पुत्र जनमेजय को हस्तिनापूर का नया समराट घोशित कर उनका
18:55राज्तिलक करवाया.
18:57इसके बाद महाराजा परीक्षित ने अपने सभी बहुमूल्य आभूशन, मुकुट और शाही वस्त्र उतार कर व्रिक्ष की चाल से बने
19:06सादे मुनिवस्त्र धारण कर लिए.
19:08अपने विशाल सामराज्य और परिवार का त्याग कर परीक्षित नंगे पैर पवित्र गंगा तटकी ओर निकल पड़े ताकी अपने अंतिम
19:17साथ दिन केवल प्रभु भक्ती में लीन कर सकें.
19:21परीक्षित के कदम अब किसी सामराज्य के भार से नहीं बलकी एक गहरे पश्चाताप और मुक्ती की प्यास से संचालित
19:29थे, जो उन्हें पवित्र गंगा की ओर खींच रहे थे.
19:34उन्होंने अन्तह एक शांत पीपल व्रिक्ष के नीचे आश्रे लिया, जहां गंगा की शीतल वायू उनके अशांत मन को कुछ
19:41पल का सुकून दे रही थी.
19:44मन के एकांत में, अपने त्याग के क्षणों के बीच, उनके विचारों ने स्वयंको रिशी शमीक के आश्रम में की
19:51गई अपनी अक्षमे भूल की ओर मोड लिया.
19:55उस क्षण की अहंकार भरी मूर्ख था, जब उन्होंने एक मृत सर्प को शांत रिशी के गले में डाल दिया
20:02था, एक कड़वी याद के रूप में उनके हृदय में चुब रही थी.
20:07अपनी आत्मा की गहराई से उन्होंने अपनी अविवेक पूर्ण क्रिया के लिए एक गहन पश्चाताप महसूस किया, जो एक शनिक
20:16क्रोध का परिणाम था.
20:18तभी आकाश में एक अप्रत्याशित काली घटाचा गई और एक अशुब गड़गडाहट दूर से सुनाई दी, मानो प्रकृती भी आने
20:27वाली विपत्ती की चेतावनी दे रही हो.
20:30इसी बीच व्रिट्षों के जुर्मुट से एक युवा, तेजस्वी तपस्वी तेजी से उनकी ओर चला आ रहा था, जिसके चहरे
20:38पर एक गंभीर संदेश का बोज पश्ट था.
20:42परीच्षित ने अपनी अंतरग्रिष्टी से भांप लिया कि यहां आगंतुक कोई साधारन पथिक नहीं, बलकि नेती का दूद था जो
20:50उनके लिए एक महत्वपूर्ण खबर लेकर आ रहा था.
20:54युवा तपस्वी ने समराट के सम्मुखाकर सिर जुकाकर श्रद्धा पूर्वक प्रणाम किया, किन्तु उसके चहरे पर व्याकुलता की एक असपश्च
21:04हाया थी.
21:05उसने कापते हुए स्वर में अपनी यात्रा का उद्देश्य और रिशिपुत्र श्रिंगी के क्रोध और उनके भयानक शाप की पूरी
21:13कहानी सुनानी शुरू कर दी.
21:16युवा तपस्वी ने बताया कि कैसे बालहट में आकर श्रिंगी रिशी ने राजा की अपमानजनक क्रिया से आहत होकर उन्हें
21:25मृत्यु का भयानक श्राप दे दिया था.
21:28शाप के वचन सुनकर परीक्षित के चहरे पर एक क्षण के लिए गहरा आघात और अविश्वास छा गया, मानो समय
21:36स्वयर रुख गया हो.
21:38तपस्वी ने बताया कि शाप के अनुसार ठीक साथ दिनों के भीतर तक्षक नाग के डसने से उनका अंत सुनिश्चित
21:45है.
21:47अपनी क्षणिक भूल और उसके भयानक परिणाम को पहचानते हुए, राजा ने अपने भाग्य को स्वीकार करने और अपनी आत्मा
21:55को शुद्ध करने का मन बना लिया.
21:58अपने कर्मों के चक्र को स्वीकार करते हुए, उन्होंने मृत्यु को अपने मुक्तिदाता के रूप में देखा, जो उन्हें संसार
22:06के बंधनों से मुक्त करेगी.
22:09उसके हृदय में भय के स्थान पर एक अनूठी शांती उतर आई, एक ऐसी शांती जो इस नश्वर संसार की
22:16मुहमाया से परे थी.
22:19उन्होंने युवा तपस्वी की ओर देखकर, अपने मस्तक पर हाथ जोड़कर, रिशिपुत्र श्रिंगी को धन्यवाद दिया, जिन्होंने अंजाने में उन्हें
22:28मोक्ष का मार्ग दिखाया था.
22:31अपना संदेश पूरा कर, युवा तपस्वी ने विनमर्ता पूर्वक विदाली परीक्षित को उनके अंतिन संकल्प के साथ अकेला छोड़ते हुए.
22:41गंदा की पवित्रधारा को देखते हुए, परीक्षित ने अपने मन में एक अटल संकल्प लिया कि वे शेश साथ दिन
22:48केवल प्रभु के नामस्मरण में ही व्यतीत करेंगे.
22:52फिर उन्होंने अपनी आखें बंद कर ली और गहरे ध्यान में लीन हो गए, अपनी अंतिन यात्रा के लिए स्वयन
23:00को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया.
23:03ध्यान से जागकर राजा परीच्षित की आखों में आसन्नम्रित्यू का कोई भाय नहीं था, बलकी केवल परमशांती और इश्वर के
23:11प्रती अगाद समर्पन दिखाई दे रहा था.
23:15उन्होंने तुरंट अपने भव्य राजदर्बार में हस्तिनापूर के सबसे बुद्धिमान मंत्रियों और पूजनिय पुरोहितों को एक अंतिन सभा के लिए
23:24आमंत्रित किया.
23:26महाराज के कक्ष में प्रवेश करते ही मंत्रियों के चहरे श्राप की भयानक सूचना सुनकर अत्यंत, चिंतित और व्याकुल दिखाई
23:34दे रहे थे.
23:35सभी को विस्मित करते हुए, परीक्षित अपने विशाल और सुसजित स्वर्ण सिनहासन से नीचे उतर आये, जो उनके पूर्ण वैराग्य
23:44का पहला संकेत था.
23:47उन्होंने अत्यंत, शान्त और गंभीर स्वर में सभा को संबोधित करते हुए कहा कि वे इस श्राप को तक्षक सर्प
23:54का प्रकोप नहीं, अपितु भगवान की परंकृपा मानते हैं.
23:59महाराज ने समझाया कि यह साथ दिनों की अलपावधी उनके लिए संसार के सभी बंधनों को तोड़कर मोक्ष प्राप्त करने
24:07का एक दुरलब और दिव्य अफसर है.
24:11उन्होंने अपने निश्थावान मंत्रियों को राज्य की सुरक्षा और प्रजा के कल्यान का दायत्व सौंपते हुए उन्हें सदैव धर्म के
24:19मार्ग पर चलने का निर्देश दिया.
24:22मंत्रियों ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से महाराज से श्राप को टालने के लिए यग्य करने की प्रार्थना की, परंतु राजा ने
24:30मुस्कुराते हुए इस नश्वर शरीर के प्रती मोह त्यागने की बात कही.
24:35परीक्षित ने अपने सिर्से बहुमूल्य रत्नों से जडित स्वर्ण मुकुट उतारा और उसे खाली सिनहासन पर अत्यंत आदर के साथ
24:43रख दिया.
24:44फिर उन्होंने अपने राजसी आभूशन और वेश्मी वस्त्र उतार कर एक साधारन सन्यासी की तरह भगवारं के सूती वस्त्र धारन
24:54कर लिए.
24:55महल के बाहर एकत्र हस्तिनापूर के नागरिक अपने प्रिय समराठ के इस अभूतपूर्व वैराग्य को देखकर दुहक और श्रधा से
25:04रो पड़े.
25:05अपने समस्त राजसी वैभव को सदा के लिए पीछे छोड़ते हुए राजा परिक्षित नंगे पैर हस्तिनापूर के मुख्य द्वारों से
25:14बाहर निकल पड़े.
25:16वे पवित्र गंगा नदी की दिशा में बढ़ने लगे और उनके पीछे केवल मौन और अत्यंत विनीक भाव से श्रधा
25:23रखने वाले लोगों का समुह चल रहा था.
25:27दूबते हुए सूर्य की स्वर्णिन किर्ने गंगा के पावन जल को चमका रही थी, जो महाराज के भीतर जलने वाली
25:34वैराग्य की दिव्य अगनी का प्रतिबिम लग रही थी.
25:39जैसे ही यह समाचार फैला, भारतवर्ष के कोने-कोने से महान तेजस्वी रिशिमुनी और तपस्वी गंगा तट पर एकत्रित होने
25:47लगे.
25:49महाराज परीक्षित ने गंगा के किनारे कुष घास के एक साधारन आसन पर पूर्व की ओर मुख करके अपना स्थान
25:56ग्रहेन किया.
25:58उन्होंने पवित्र गंगा जल को साक्षी मान कर बिना अन्न और जल ग्रहेन किये, केवल हरिस्मरन करते हुए प्राण त्यागने
26:06का द्रिड संकल्प लिया.
26:08पूरा वातावर्ण वेद मंत्रों के पवित्र उच्चारण और दिव्य शंकनाज से गूँज उठा, मानो प्रकृती भी इस महान समराट के
26:16त्याग का वंदन कर रही हो.
26:19परीक्षित ने अपनी आखें बंद कर ली और अपने हृदय को पूरी तरह से भगवान श्री कृष्न के दिव्य और
26:26मंगलकारी चर्णों में समर्पित कर दिया.
26:30परम सत्य की खोज में बैठे इस महान राजा के चारों और रिशियों का एक ऐसा मंडल बन गया था,
26:37जो अब केवल परम ज्यान के अवतरण की प्रतीक्षा कर रहा था.
26:41गेहन चिंतन के उपरांत राजा परीक्षित ने अपनी आखें खोली और उनकी द्रिश्टी में एक अध्भुत शांती और अविचल द्रिडता
26:50झलक रही थी, मानों उन्होंने अपने जीवन का परम लक्षय निश्चित कर लिया हो.
26:56अपने आसन से उठकर उन्होंने अपने चारों और बैठे पूजय रिशियों को विनमरता पूर्वक प्रणाम किया, उनके मौन आशिर्वाद को
27:05अपने हृदय में धारन करते हुए.
27:08राजसी वेशभूशा का त्याग कर, उन्होंने एक साधारन वस्त्रधारन किया और अपने मन में केवल इश्वर का नाम जबते हुए,
27:17राजमहल की चकाचौंध को पीछे छोड़ दिया.
27:21उनके कदम अटल संकल्प के साथ पवित्र गंगा के तटकी ओर बढ़ रहे थे, जहां उनकी आत्मा को अंतिन विश्राम
27:29और सर्वोच्छ सत्य की प्राप्ती की आशा थी.
27:33सामने बहती हुई गंगा मया की शांत और अनंत धारा, मानो युगों लुगों से चली आ रही भारतिय सभ्यता की
27:40साक्षी बनकर उनकी प्रतीक्षा कर रही थी.
27:44उन्होंने तट पर एक शांत और निर्जन स्थान चुना, जहां पवन की शीतल बयार और जल की कलकल ध्वनी उनके
27:52एकांत ध्यान के लिए उप्युक्ट थी.
27:55अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता के साथ, उन्होंने दर्भ घास की एक चटाई को पूर्व दिशा की और मुख करके बिछाया,
28:03जो त्याग और तपस्या का प्रतीक थी.
28:06उस पवित्र आसन पर बैठ कर, उन्होंने अपनी रीड सीधी की और अपनी आखे बंद कर ली, मानोवे बाहरी संसार
28:15से स्वयं को पूरी तरह विच्छेद कर रहे हूं.
28:19उन्होंने अपने मन में मृत्यु परियंत उपवास करने का अदमय संकल्प लिया, अपने शेश जीवन को केवल सर्वोच प्रभु के
28:27ध्यान में समर्पित करने का द्रिढ निश्चय किया.
28:31उनकी इस दिव्य प्रतिग्या से वायु मंडल में एक अलौकिक कमपन फैल गया, मानोव स्वयं प्रकृती भी उनके इस महान
28:38त्याग की साक्षी बन रही हो.
28:41शीघर ही गंगा तटपर राजा परीक्षित के इस अकल्पनिय वैराग्य और मृत्यु परियंत उपवास के संकल्प की खबर दूर-दूर
28:49तक फैल गई.
28:51इस असाधारन घटना को अपनी आखों से देखने और इस महान राजा के अंतिम क्षणों के आध्यात्मिक तेज को महसूस
28:59करने के लिए जनसमों उमड़ पड़ा.
29:03कुरुक्षेत्र से लेकर हिमालय की कंदराओं तक समस्त भारतवर्ष से बड़ेबडे रिशिमुनी और ज्ञानी जन अपने शिश्यों सहित इस पुन्य
29:11भूमी पर एकत्रित होने लगे.
29:14गंदा की पवित्रधारा मानो स्वयं एक दिव्य देवी के रूप में राजा के इस अतुल्निय त्याग और वैराग्य की मूख
29:22साक्षी बन अपने प्रवाह में और भी अधिक गंभीरता ले आई.
29:27उनकी बंद आखों के भीतर परम सत्य की खोज में लीन परीक्षित को भगवान श्री कृष्ण का दिव्य और मोहक
29:34स्वरूप स्पष्ट दिखाई दे रहा था.
29:37जैसे जैसे उनका ध्यान गहराता गया, उनके चारों और एक अग्रिश्य परन्तु अनुभवग में आध्यात्मिक उर्जा का घेरा बनता गया,
29:46जो सभी उपस्थित लोगों को प्रभावित कर रहा था.
29:51आकाश में देवगण और गंधर्व भी इस असाधारन तपस्या को देखने के लिए एकत्रित हो गए, उनके दिव्यरतों और विमालों
29:59से निकलने वाला प्रकाश शितिच को प्रकाशित कर रहा था.
30:04कलियुक की काली छाया मंदरा रही थी, परंतु परीच्षित का यह वैराग्य और तपस्या, धर्म के पुरुध्थान और सत्य की
30:12शाश्वत शक्ती का प्रतीक बन गया था.
30:15उनके शांत मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज था, जो भय से परे मृत्यु के आवाहन को एक परम आध्यात्मिक यात्रा
30:23के रूप में स्विकार करने की उनकी तयारी को दर्शाता था.
30:28इस प्रकार गंगा के पवित्रतट पर राजा परीक्षित ने अपनी अंतिम यात्रा का शुभारंभ किया, एक ऐसे पत्थ पर अग्रसर
30:37हुए जहां केवल आत्मा और परमात्मा का मिलन था.
30:41परीक्षित के इस अटल संकल्प और वैराग्य की उर्जा ब्रहमांड के कणकण में फैलने लगी, जो अद्रिश्य शक्तियों और दिव्य
30:49आत्माओं को अपनी ओर खींच रही थी.
30:53जैसे ही उशा की किरने गंगाजल को छूने लगी, सुदूर नभमंडल से दिव्य विमानों की जगमगाहट और स्वर्गिय संगीत की
31:01अनुगूंच सुनाई देने लगी.
31:04देवलोक से रिशिमुनी, सिद्धगन, चारण और गंधर्व सभी अपने अपने लोकों से इस अलोकित ग्रिश के साक्षी बनने के लिए
31:12प्रिथवी की ओर अग्रसर हो रहे थे.
31:16आकाश में सहसरों प्रकाश पुंजों का अध्भुत संगम दिखाई दे रहा था, जैसे सारे ब्रहमान्ड की आध्यात्मिक चेतना एक ही
31:24बिंदु पर केंद्रित हो रही हो.
31:27अपने ध्यान से विचलित हुए बिना, राजा परीक्षित ने धीरे-धीरे अपनी आखें खोली और अपने समक्ष रिशियों, मुनियों और
31:35देवताओं की भव्य सभा को देखा.
31:39गंगा के तटपर अब एक अध्भुत शान्ती और आध्यात्मिक्ता का वातावर्ण चा गया था, जहां हर आत्मा एक ही उद्देश
31:47से प्रेरित थी, मोक्ष की खोज और धर्म की रक्षा.
31:52देवर्शी नारद तीनों लोकों में अपनी वीना के तार छेड़ते हुए, अपने दिव्य गान के साथ सभामे पधारे, उनके मुख
32:00पर शाश्वत ज्यान का तेज जलक रहा था.
32:03तपोवन से महर्शी वेदव्यास, जिनका शरीर सहसरों वर्षों की तपस्या से उतप्रोथ था, अपने शिशों के साथ इस महान संगम
32:12में उपस्थित हुए.
32:14फिर एक दिव्य बालक के रूप में, युवा महायोगी श्री शुकदेव गोस्वामी, जो वासना और माया से सर्वता परे थे,
32:23सहच्ता से इस सभामे पधारे.
32:26उनके आगमन से वातावर्ण में एक अद्भुत उर्जा का संचार हुआ, सभी रिशी, मुनी और देवता उन्हें प्रणाम करने के
32:34लिए स्वतही उठ खड़े हुए.
32:37राजा परीक्षित ने भी अत्यंत विनमरता पूर्वक और भक्तिभाव से उठकर अपने गुरु के रूप में शुकदेव गोस्वामी का स्वागत
32:46किया, अपने शीश को उनके चर्णों में जुकाते हुए.
32:50गंदा का विशाल तट अब अनेकानेक रिशियों, मुनियों और देवताओं से खचाखच भर चुका था, जहां हर दिशा से आये
32:58ज्यानी आत्माओं का अद्भुत संगम था.
33:01दूर क्षितिच पर दिव्य विमानों और पुश्पक रथों की पंक्ती अभी भी आकाश में टिम्टिमा रही थी, जो इस अलौकिक
33:09सभा की विशालता का प्रतीक थी.
33:12प्रत्यक रिशी और मुनी की आखों में एक गहन जिग्यासा और एक ही लक्षे का प्रकाश था, जीवन के अंतिन
33:20सत्य को समझना और मृत की उपर विजय पाने का मार्ग खोजना.
33:25उनकी उपस्थिती मात्र से ही वातावर्ण ग्यान और वैराग्य से भर गया था, जैसे सहसरों दीप एक साथ जलकर अंधकार
33:33को दूर कर रहे हूं.
33:35अब सारी सभा में एक गेहन, पवित्र मौन छा गया, जहां केवल गंदा की पवित्र ध्वनी और आत्माओं की धड़कन
33:43ही सुनाई दे रही थी.
33:46राजा परीक्षित ने हाथ जोड़कर नमरता से सभा को संबोधित किया, अपने मन की शंकाओं और मोक्ष प्राप्ती के मार्ग
33:54पर मार्ग दर्शन के लिए याचना की.
33:57रिशियों ने परीक्षित की पवित्र जिग्यासा और मृत्यू के सम्मुख भी सत्य की खोज की उनकी अदमय इच्छाशक्ती की सराहना
34:06की जो दुरलभ थी.
34:08तब श्री शुकदेव गोस्वामी अपने मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान लिए मौन भं करने और परम ज्यान का प्रवाह करने
34:17के लिए तयार हुए.
34:19इस प्रकार गंदा के पावन तट पर काल की सीमा से परे भागवत पुरान की अम्रित कथा का उद्धोश करने
34:26का मंच तयार हो चुका था.
34:29परम शांत गंदा के पावन तट पर शुकदेव गोस्वामी ने अपनी करुणामई द्रिष्टी राजा परीक्षित पर डाली और सभा में
34:37एक अलौकिक मौन व्याप्थ हो गया.
34:40राजा परीक्षित ने अपने दोनों हाथ जोड कर सिर जुकाया, मानोवे मृत्यू के भैसे सर्वता मुक्त होकर केवल मोक्ष रूपी
34:49परम ज्यान को ग्रहन करने के लिए तयार थे.
34:52तब शुकदेव गोस्वामी के मुखारविंद से दिव्यवानी प्रस्फुटित हुई, जो किसी अलौकिक शंकनाद की भांती गंगा की लहरों पर तैरती
35:01हुई ब्रहमांड में गूंजुठी.
35:04शुकदेव जी ने राजा के प्रश्न की सराहना करते हुए कहा कि मृत्यू के निकट खड़े मनुष्य के लिए भगवान
35:11नारायन का स्मरण ही एक मात्र परम श्रेयसकर मार्ग है.
35:16गंगा तट पर उपस्थित सभी तपस्वी और रिशिमुनी अत्यंत मंत्र मुग्ध होकर इस परम सत्य के श्रवण में डूब गए,
35:24मानों वे सब समाधी की अवस्था में चले गए हुँ.
35:28शुकदेव जी ने सांसारिक मनुष्यों की अध्यानता पर प्रकाश डालते हुए समझाया कि लोग कैसे ग्रिहस्थी के क्षणभंगुर सुखों में
35:37उलचकर अपने मूल्यवान समय को नश्ट कर देते हैं.
35:42उन्होंने घोशना की की जो मनुष्य अंत समय में समस्ट आसक्तियों को त्याग कर भगवान विश्णु के नाम का संकीर्तन
35:49करता है, वह जन्मुमृत्यू के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाता है.
35:55शुकदेव जी के इन अमरित वचनों को सुनकर राजा परीक्षित का हरिदय निर्मल हो गया और उनके चहरे पर एक
36:02अभूत्पूर्व शांती की चमक फैल गई.
36:06रिशी ने तब विराट पुरुष के उस अध्भूत स्वरूप का वर्णन करना आरंभ किया, जिसमें संपूर्ण ब्रहमांड और उसके सभी
36:14तत्व समाहित हैं.
36:16इस अलोकिक द्रिश्य की कलपना मात्र से ही संपूर्ण सभास्थल में उपस्थित रिशियों को इश्वर की सर्वव्यापक्ता का प्रत्यक्ष अनुभव
36:25होने लगा.
36:27शुकदेव गोस्वामी ने कहा कि जीवन की अवधी चाहे लंबी हो या छोटी, यदि उसका एक क्षण भी भगवान के
36:34ध्यान में बीते, तो वह जीवन धन्य है.
36:38उन्होंने अपने पिता कृष्ण द्वैपायन व्यासदेव का स्मरण किया, जिन्होंने उन्हें इस परम गोपनिय भागवत पुराण का ज्यान प्रदान किया
36:47था.
36:49गंदा की कलकल करती लहरें भी जैसे शान्थ हो गई, ताकि वे इस दिव्य समवाद के एक-एक शब्द को
36:56अपने भीतर समेट सकें.
36:58शुकदेव जी ने परीक्षित को आश्वस्त किया कि भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलों का आश्रय लेने वाले भक्त को
37:06संसार रूपी सागर कभी भयभीट नहीं कर सकता.
37:10जैसे जैसे सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था, गंगा तट पर बिखरी लालिमा इस आध्यात्मिक सभा की दिव्यता को
37:18और अधिक सघन बना रही थी.
37:21राजा परीक्षित ने महसूस किया कि तक्षक सर्प के विश्का भय उनके मन से पूरी तरह लुप्थ हो चुका है
37:28और बेकेवल आत्मिक आनंद में लीन है.
37:32सभा के एक कोने में बैठे सूत गोस्वामी इस अध्भुत कथा को अपने हृदय में अंकित कर रहे थे, ताकि
37:40वे इसे भविश्य में नैमिशारने के रिशियों को सुना सकें.
37:44शुकदेव गोस्वामी ने भक्तियों की सर्वोच महिमा का प्रतिपादन किया, जिसे सभी वेदों और उपनिश्दों का अंतिम निशकर्ष माना जाता
37:53है.
37:55स्वर्ग से देवता और गंधर्व भी बादलों के पीछे छिपकर इस अभूत पूर्व द्रिश्य को देखने लगे और उन्होंने इस
38:03पावन अफसर पर अद्रिश्य रूप से पुश्पवर्शा की.
38:07इस प्रकार काल और मृत्यू की सीमाओं को लांध कर श्रीमत भागवत महापुरान की वह अमर कथा अपने पूर्ण प्रवाह
38:15के साथ आरंभ होने के लिए प्रस्तुत हुई.