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इस एपिसोड में शत्रुघ्न का मधुपुरी के दानव लवणासुर के साथ अंतिम युद्ध और वाल्मीकि आश्रम के समीप अनजाने में हुई मुलाकात का रोमांचक चित्रण है। क्या पिता-पुत्र का यह मिलन युद्ध में बदलेगा? जानिए पद्म पुराण के इस रहस्यमयी अध्याय में। #PadmaPurana #LuvKush #Ramayana #Shatrughna #HinduMythology #SanatanDharma #MythologySeries
Transcript
00:00मधुपुरी की डरावनी सीमाओं पर शत्रुघन ने प्रवेश किया, जहां चारों और विशालकाई ओपसीडियन ग्रेनाइट की शिलाएं लवनासुर के क्रूर
00:08शासन की गवाही दे रही थी.
00:12आकाश के उचे लोक में भगवान विश्नु अपने दिव्य शेशनाग पर विराज मान होकर शत्रुघन के इस धर्म युद्ध को
00:19देख रहे थे, उनकी मंद मुस्कान में विजय का आशिरवाद छिपा था.
00:25शत्रुघन ने अपनी दिव्य तलवार से लवनासुर के सैने को द्वारा बिछाए गए मायावी जाल को काटते हुए आगे बढ़ने
00:32का मार प्रशस्त किया.
00:35काली चट्टानों के बीच एक विशाल अगनिवेदी जल उठी, जो शत्रुघन और लवनासुर के बीच होने वाले उस भीशन द्वंदव
00:43की पूर्व सूचना दे रही थी.
00:46लवनासुर गर्जना करते हुए अपने गुफा सद्रिश दुर्ग से बाहर निकला, उसकी आखों में भगवान शिव के त्रिशूल का अहंकार
00:54स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था.
00:58भगवान शिव अपने त्रिशूल की महिमा को याद करते हुए कैलाश के शिखर से इस युद्ध के परिणाम को अपनी
01:05तीसरी आख से देख रहे थे.
01:08शत्रुगन ने देखा कि लवनासुर जब भी त्रिशूल को हाथ में लेता, उसकी शक्ती कई गुना बढ़ जाती थी, जो
01:15उनकी चिंता का मुख्यकारण बन गया.
01:18युद्ध का वातावर्ण और अधिक भीशन हो गया, जब लवनासुर ने अपने त्रिशूल से प्रिथवी को कम्पित करना आरंभ कर
01:26दिया.
01:28दूर खड़े होकर वालमी की रिशी ने इस युद्ध को देखा और समझ गए कि अब कालचकर अपनी पूरी गती
01:35से घूमने लगा है.
01:38ब्रहमाजी ने सत्यलोक से शत्रुगन को संकेत दिया कि त्रिशूल का रहस्य केवल इसकी ध्वनी और उसके कम्पन में छिपा
01:46है.
01:47शत्रुगन ने अपने धनुष से एक दिव्यतीर छोड़ा, जो सीधे लवनासुर के त्रिशूल की प्रतिध्वनी को लक्षय बना कर हवा
01:55में गूंज उठा.
01:57त्रिशूल की चमक एक आएक धीमी होने लगी और उसकी दैविय उर्जा का तेज शत्रुगन के दिव्य अस्त्र के सामने
02:05मंद पड़ गया.
02:07शत्रुगन ने अवसर का लाब उठाते हुए लवनासुर पर ऐसा प्रहार किया कि उसकी माया भी शक्ती का कवचपूरी तरहे
02:15तूट गया.
02:17भगवान विश्णू ने स्वर्ग से पुष्प वर्शा की जिससे मधुपूरी की काली धर्ती पर पहली बार दैविय शांती का आभास
02:25हुआ.
02:26लवनासुर के घुटने टेकते ही उसके शरीर से काला धुआ निकल कर वायू में विलीन हो गया और उसके अहंकार
02:33का अंथुआ.
02:35मधुपूरी के वातावर्ण से अब सारा अंधकार धीरे-धीरे छटने लगा था, जैसे प्रकृती स्वयं इस राक्षसी बोच से मुक्त
02:43हो रही हो.
02:45शत्रुघन ने अपनी विजय के प्रतीक के रूप में अपना धनुष नीचे रखा, उनकी दृष्टी दूर क्षितिच पर टिकी थी
02:53जहां भविश्य की एक और गाथा पनप्रही थी.
02:57देवी पारवती ने कैलाश से इस शांती को महसूस किया, उनके चहरे पर एक कोमल मुस्कान आई जो आने वाले
03:05नए संबंधों का संकेट थी.
03:08मधुपुरी अब मुक्त हो चुकी थी, किन्तु शत्रुगन को यहाँ आभास नहीं था कि उनकी नेती अब उसी आश्रम की
03:15ओर बढ़ रही है, जहां उनके पुत्र पल रहे हैं.
03:20अयोध्या की परमपरा और रघुवन्ष का मान रखने के लिए शत्रुगन अपनी विजय के साथ एक नई दिशा की ओर
03:27चल पड़े.
03:29शत्रुगन का स्वर्ण रथ विजय के गर्व के साथ तपोवन की सीमा में प्रवेश करता है, जहां हवाओं में एक
03:36अध्भुत दिव्यता का वास है.
03:39वैकुंट के उचे शिकरों से भगवान विश्णू ने अपनी योग माया से देखा कि नेती ने अयोध्या के राजकुमार के
03:47पत को रिशी मुनियों की पवित्र भूमी की ओर मोर दिया है.
03:52रत की गड़गडाहट के बीच, शत्रुगन को अचानक वन के भीतर से आती किसी अध्रिश शांती का अनुभव होता है,
04:00जो उन्हें अपना रत रोकने के लिए विवश कर देती है.
04:04वन की हरियाली और फूलों की मंद सुगंध एक ऐसा दिव्यवातावर्ण बना रही है, जैसे प्रकृती स्वया रगुवंश के वीर
04:13का स्वागत करने के लिए आतुर हो.
04:16विस्तरत वन छेत्र में पक्षियों का कलरव रुक जाता है, मानो वे आने वाले समय के किसी महत्वपूर्ण मिलन की
04:23आहट को भांप गए हो.
04:26भगवान शिव कैलाश की चोटी से अपनी ध्यान मुद्रा में स्थित हैं. उनकी शांत आखें इस रहस्य को जानती हैं
04:33कि एक पिता का मिलन उसके भविश्य के वीरों से होने वाला है.
04:39शत्रुग्न रख से नीचे उतरते हैं और धर्ती को स्पर्श कर उसे प्रणाम करते हैं. उन्हें यहां अयोध्या की मिट्टी
04:47जैसा ही एक अप्रिचित सा लगाव महसूस हो रहा है.
04:52वातावर्ण में विद्यमान दैविय उर्जा के कारण शत्रुग्न का हृदय अचानक भावनाओं के जवार से भर जाता है, जो उन्हें
05:00बार-बार भीतर की ओर खींच रहा है.
05:03तपोवन के भीतर रिशी वालमीकी की कुटिया के पास लव और कुष अपने धनुशबानों का अभ्यास कर रहे हैं, उनकी
05:11उर्जावन के शांत वातावर्ण को भी चकित कर रही है.
05:16गरुर देव आकाश मार्ग से इस तपोवन की रक्षा में सतर्क हैं, उनका विशाल पंखों का फैलाव इस पूरे क्षेतर
05:24को एक दैविय सुरक्षा चक्र में ढखे हुए है.
05:28लव का निशाना अचूक है, और कुश की गती बिजली के समान है, वे दोनों वन के वन्य जीवों के
05:35साथ एक अध्भुत सामन जस्य में अपनी विद्या को निखार रहे हैं.
05:41एक दैविय जंकार वन की शान्त हवाओं में गूंजती है, जो आने वाले समय के इतिहास के बदलने का संकेत
05:48मात्र है.
05:51शत्रुग्न धीरे धीरे घने व्रिक्षों को पार करते हुए आश्रम की मुख्य कुटिया की ओर बढ़ रहे हैं, उनके कदमों
05:58की आहट भी वन के अनुशासन का पालन कर रही है.
06:03भगवान विश्नु का सूक्ष मंच, जो इन बच्चों में निहित है, शत्रुग्न की उपस्थिती को भांप कर एक विशेश चमक
06:10के साथ सक्रिय हो उठता है.
06:13कुष अपनी अभ्यास प्रक्रिया रोक कर अचानक पीछे मुरते हैं, उनकी तीक्षन द्रिष्टी वन के सघन अन्धेरों में किसी शक्तिशाली
06:22योध्धा की आहट को पहचान लेती है.
06:26एक दिव्य प्रकाश पुन्च के समान शत्रुग्न का तेजस्वी मुख अब वन की जाडियों के पार से लव और कुष
06:33को दिखाई देने लगता है.
06:36शत्रुग्न के मन में उपजी यह जिग्यासा की कौन है ये तेजस्वी बालक उनकी नेती के द्वार खोलने वाली है.
06:45आश्रम की पवित्रता और शत्रुग्न का राजसी तेज एक दूसरे के सम्मुख हैं, जो रगुवन्ष के सबसे भावुक मिलन का
06:53आधार बनेगा.
07:05शत्रुग्न के कदम आगे बढ़ते हैं और लवकुष बिनाडरे अपनी रक्षा मुद्रा में सावधान हो जाते हैं, एक एतिहासिक युद्ध
07:13और समवाद का आगाज होने वाला है.
07:17महर्शी वालमीकी के आश्रम का प्रांगन आज किसी अज्यात दैवी उर्जा से स्पंदित हो उठा है, जहां पक्षियों का कलरभी
07:25सहसा शान्थ हो गया है.
07:29शत्रुगन के तेजस्वी मुख मंदल पर एक धर्म संकट की लकीरें खिंच आई हैं, क्योंकि सामने खड़े दो बालक उन्हें
07:36अपने ही रक्ष का अंश प्रतीत हो रहे हैं.
07:40लव और कुष अपनी तपोनिष्ट आँखो से शत्रुगन के दिव्यतेज को परक रहे हैं, जैसे वे उनके भीतर छिपी अयोध्या
07:48की गौरवगाथा को पढ़ रहे हूं.
07:52आश्रम की धरापर पड़ी ओस की बून्दे भी शत्रुगन के भारी चर्णों के स्पर्ष से मानो कम्पित हो उठी हैं,
07:59जैसे नेती स्वय इस मिलन का साक्षी बनने को आतुर हो.
08:04शत्रुगन ने अपनी धनुष की प्रत्यंचा को धीला छोड़ते हुए, अत्यंत सौमयता से उन दोनों बालकों के परिचय और उनके
08:12निवास का कारण पूछा.
08:14भगवान विश्नु का अंश होने के कारण, शत्रुगन के हृदय में वादसल्य की एक लेहर उठ रही है, जिसका वे
08:22स्वय भी कोई स्पष्ट उत्तर नहीं खोज पा रहे.
08:25कुष ने अपनी धनुष को हाथ में थामे हुए, निडर स्वर में कहा कि वे रिशी वालमीकी के शिश्य हैं
08:32और उनकी रक्षा करना ही उनका एक मात्र धर्म है.
08:38वायुमंडल में तैरती हुई सुगंधित फूलों की महेक ने वातावर्ण को एक दैविय यग्य के समान पावन और गंभीर बना
08:45दिया है.
08:47लव की तीक्षन द्रिश्टी शत्रुगन के राजसी कवच पर टिक गई है, वह किसी पुराने परिचित की तरह उसे निहार
08:54रहा है, मानो उसे कुछ याद आ रहा हो.
08:59शत्रुगन के मन में एक अनपेक्षित वेदना का संचार हुआ, जैसे किसी खोई हुई वस्तु की याद उन्हें जखचोर रही
09:06हो.
09:08तीनों के बीच का मौन अब किसी महाकाव्य की प्रस्तावना जैसा लग रहा है, जिसे प्रकृती ने स्वय अपने कैनवास
09:15पर उके रहा है.
09:18ब्रहमांड के रहस्यवादी संकेत भी आज इस तपोभूमी पर उतर आये हैं, जहां मर्यादा पुरुशोत्तम का वन्ष फिर से एक
09:26साथ खड़ा है.
09:28शत्रुघन ने अपनी द्रिष्टी नीचे जुकाते हुए बालकों के अनुशासन और उनके आत्म विश्वास की प्रशंसा की, जो किसी राजकुमार
09:37के योग्य है.
09:39लव ने बड़े ही सन्यत भाव से उत्तर दिया कि शस्त्र केवल धर्म की रक्षा के लिए उठाए जाते हैं,
09:46न की प्रदर्शन के लिए.
09:49कुष ने शत्रुघन के रत की ओर संकेत किया, जहां से उठती हुई धूल का गुबार अब शान्त हो चुका
09:55था.
09:57यह वह क्षन था जहां अयोध्या के राजसी एश्वर्य और वन के तपोमय वैराग्य का मिलन हो रहा था.
10:05शत्रुघन ने अनुभव किया कि इन बालकों में रगुवंश की वह अध्भुत शक्ती विद्यमान है, जिसे उन्होंने केवल शास्त्रों में
10:13पढ़ा था.
10:15वन की हवा में एक मधुर धुन गूजने लगी, जैसे आश्रम के चारों और अद्रिश्य देवता इस समवाद को सुन
10:22रहे हूं.
10:24लव और कुश के मुख पर अब कोई भय नहीं, बलकि एक अगाध जिग्यासा है, जो उस आगंतुक के प्रती
10:31सम्मान व्यक्त कर रही है.
10:45वालमी की आश्रम के चारों और फैले घने वन में सूर्य की किरने पत्तों को भेगती हुई सुनहरी लकीरे बना
10:52रही हैं, जैसे प्रकृती स्वयें इस अध्भुत मिलन का स्वागत कर रही हो.
10:58स्वर्गलोग से भगवान विश्नु अपनी दिव्यद्रिष्टी से इस द्रिश्य को देख रहे हैं, उनके मुख पर एक मंद मुस्कान है
11:05जो आने वाले काल के चक्र को स्वीकार कर रही है.
11:10शत्रुगन के हाथ में रखा हुआ फूल एकाएक काम्प उठता है, जैसे उसकी सुगंध उन्हें किसी पुरानी भूली हुई स्मितियों
11:18की दुनिया में ले जा रही हो.
11:21यह वहक्षन है जब वायू का वेग भी थम गया है, मानो समय की धारा भी इस पितापुत्र के मिलन
11:28के प्रथन संकेत पर ठिठक गई है.
11:31लव अपनी धनुष की प्रत्यंचा को धीला छोर देते हैं और उनके नेत्रों में शत्रुभन की वीर्ता के प्रती एक
11:39गहरा आदर उभराता है.
11:42कुष्ने धीरे से आगे बढ़कर आश्रम की शांती को भंग न करने का संकेत दिया, जैसे वे जानते हों कि
11:49यह कोई सामान्य योध्धा नहीं बलकि कोई दिव्यसत्ता है.
11:55आकाश में गरुड की परचाएं मंदराने लगती है, मानो वैकुंट से कोई गुप्ट संदेशवाहक इस मिलन की गवाही देने नीचे
12:03उतर आया हो.
12:05शत्रुगन के मुख पर पिता के सहच प्रेम का भाव उभराता है, जिसे देखकर वे भी स्वयन को भीतर से
12:12आंदोलित महसूस करने लगते हैं.
12:16लव और कुष के पीछे खड़ा एक तपस्वी मुनी इस द्रिशिकी दिव्यता को पहचान कर मौन में ही मंत्रों का
12:23उच्चारण करने लगते हैं.
12:25वन की हरियाली में एक अजीब सी चमक आ जाती है, जो उस स्थान को सामान्य आश्रम की परिधी से
12:33बाहर एक दिव्यलोग का आभास कराती है.
12:37शत्रुग्न ने अपनी कमर से बंधी तलवार को और धीला कर दिया, जैसे वे अब किसी भी प्रकार के भय
12:44या युद्ध को अपने और इन बालकों के बीच नहीं आने देना चाहते.
12:49ब्रह्मा जी की मानस स्रिष्टी में यह वह अध्याय है, जिसे वेदों में भी विशेश स्थान दिया गया है, जहां
12:57नेती के धागे स्वयां आपस में उलज रहे हैं.
13:01लव ने अंजाने में ही अपना एक पग आगे बढ़ाया, मानों उनके पैर स्वय ही उस व्यक्ती की ओर खीचे
13:08चले जा रहे हों, जिसे वे अभी तक नहीं जानते.
13:13भगवान शिव अपनी समाधी से एक पल के लिए आखें खोलते हैं और हिमालय की चोटियों पर एक दिव्य मुस्कान
13:20उनकी अध्रों पर तैर जाती है.
13:23कुष्की तीक्षन बुद्धी में यह संदेह गहराने लगा है कि यह योध्धा कोई साधारन राहगीर नहीं, बलकि अयोध्या की वीर्ता
13:32का कोई खोया हुआ अंश है.
13:36आश्रम की कुटिया के पास से गुजरते हुए शत्रुगन के पैरों में एक अजीब सी उर्जा का अनुभव होता है,
13:43जैसे धर्ती स्वयं उनका सम्मान कर रही हो.
13:47अद्रिश्य देवगन पुष्प वर्षा कर रहे हैं, जो इस एतिहासिक मिलन की पुष्टी कर रही है, भले ही पात्र अभी
13:54तक सत्य से अन्भिज्य हैं.
13:58शत्रुगन अब उन बालकों के इतने समीप हैं, कि उनकी सांसों की हलचल को वे महसूस कर सकते हैं, पर
14:05उनके मन में एक अज्यात भय आज भी शेश है.
14:09लव और कुष के चहरे पर एक ऐसी तेज चमक है, जो केवल सूर्यवन्ष के वन्षडों में ही देखी जा
14:16सकती है.
14:18समय का चक्र रुख गया है और अयोध्या का इतिहास अब एक नए मोर पर खड़ा है, जहां शत्रुता नहीं,
14:26बलकी पित्रिप्रेम की विजय होने वाली है.
14:30महर्शी वालमी की अपनी कुटिया के द्वार पर खड़े होकर उस दिव्य संतुलन को देख रहे हैं, जहां समय की
14:37धारा दो दिशाओं में बंटने को व्याकुल है.
14:41आकाश मार्ग से भगवान विश्नु शेशनाग पर विराजमान होकर इस अद्भुत मिलन की वेला को अपनी मायावी द्रिश्टी से निहार
14:49रहे हैं.
14:52शत्रुघन के हाथों में कसा हुआ धनुष अचानक थर्थराने लगा है, जैसे वह अपने ही वंश्जों को पहचान कर युद्ध
14:59के लिए जुकने से इनकार कर रहा हो.
15:03अद्रिश शक्तियों का प्रभाव कुटिया के चारों और एक सुरक्षा कवच की तरह फैल गया है, जो शत्रुघन की रणभेरी
15:10को भी मौन कर देता है.
15:13महर्शी वालमीकी के ओश्टों पर एक मुख मुस्कान तेरती है, मानो वे जानते हों की नियती अब अपना सबसे सुन्दर
15:21अध्याय लिखने जा रही है.
15:24गरुर देव उपर आकाश में पंक फैलाकर खड़े हैं, उनकी तीक्षन द्रिष्टी अयोध्या के राजकुमार और उनके पुत्रों के बीच
15:33के बढ़ते प्रेमपर्टी की है.
15:36लव और कुष कुटिया के आंगन में अभ्यास कर रहे हैं, उनके प्रहारों में वैसी ही फुर्ती है, जैसी कभी
15:43रगुकुल के वीरों में हुआ करती थी.
15:46हवा में एक अनोखी सुगंध घुल गई है, जैसे प्रकृती ने स्वया रगुकुल के इन तीन योध्धाओं के मिलन का
15:53स्वागत किया हो.
15:56शत्रुघन के कदम कुटिया की ओर बढ़ते हैं, लेकिन उनके हृदय में उठ रही हल्चल उन्हें बार-बार रुकने का
16:03संकेत दे रही है.
16:05देवराज इंद्र भी अपने सिनहासन से जुकर देख रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि आज का दिन धर्म के
16:12इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड है.
16:16कुष का ध्यान भटकता है और वह कुटिया के बाहर उन पच्चेहनों को देखता है, जो शत्रुघन की उपस्थिती का
16:24गवाह बन रहे हैं.
16:27वातावर्ण में एक दिव्य संगीत गूंजता है, जो यह संदेश देता है कि रक्त का संबंध सदैव शस्त्रों की ध्वनी
16:35से अधिक गहरा होता है.
16:38शत्रुघन एक व्रिक्ष की ओट में रुख जाते हैं, जहां से उन्हें बालकों के चहरे पर वही राजसी ओज दिखाई
16:45देता है, जो उनके भाई राम में था.
16:48भगवान शिव कैलाश की उचाईयों से अपनी तीसरी आख खोल कर इस मिलन के साक्षी बनते हैं, उनके चहरे पर
16:56असीम करुणा का भाव है.
16:59लव का हाथ अंजाने में ही अपनी तरकश की ओर जाता है, जैसे वह किसी अज्यात खत्रे को भांप चुका
17:06हो.
17:07नेती का चक्र अपनी गती पकड़ रहा है, और अयोध्या की परमपरा का यह नया अध्याय अब शुरू होने को
17:14है.
17:16शत्रुगन के मन का भाय अब कौतुहल में बदल रहा है, क्योंकि वे इन बालकों के प्रती अपना अंजाना लगाव
17:23महसूस कर रही हैं.
17:26ब्रहमाजी अपनी कमंडल से जल छिड़कते हैं, जिससे कुटिया के आसपास की उर्जा और अधिक पवित्र हो जाती है.
17:35लव और कुष कुटिया के बाहर आते हैं, और उनकी नजरे सीधे उस व्रिक्ष की ओर जाती हैं, जहां शत्रुगन
17:42छिपकर खड़े हैं.
17:45समय थम गया है, अब केवल शब्दों और संस्कारों का आदान प्रदान ही शेश है, जो अयोध्या के भविष्य को
17:53नया मोर देगा.
17:55शत्रुगन के सैनिक आश्रम की शांत सीमाओ पर भारी खंभे गाड़ कर एक विशाल शिविर का निर्मान आरंभ करते हैं.
18:04भगवान विश्णु का दिव्य अंश इस सम्पूर्ण तपोवन में व्याप्त उर्जा को एक सुक्ष्म सुरक्षा घेरे में समाहित करता है.
18:13सैनिकों के पच्चाप से आश्रम की शांती भंग होती है और व्रिक्षों के पत्ते भय से कामपने लगते हैं.
18:22शिविर के मध्य में शत्रुगन का भव्यध्वज फहराया जाता है जो अयोध्या की सत्ता का प्रतीक बनकर खड़ा हो जाता
18:29है.
18:31आश्रम की ओर देखते हुए शत्रुगन के मन में एक अज्यात संकोच का उदे होता है जिसे वे शब्दों में
18:38नहीं ढाल पाते.
18:40नारद मुनी दूर आकाश से इस घटनाकरम को देखते हुए एक मन्द मुस्कान के साथ वीना के तार छेड़ते हैं.
18:49लव और कुश आश्रम की सीमा पर जाकर देखते हैं कि उनके शांत तपोवन को एक सैने चावनी में बदला
18:57जा रहा है.
18:59शिविर के प्रवेश द्वार पर एक विशाल अगनिकुंड प्रजवलित किया जाता है, जिससे उठती लप्टें आसमान को छूने लगती हैं.
19:09शत्रुगन के मुख्य सेनाप्ती अपने सैनिकों को निर्देश देते हैं कि आश्रम के किसी भी नियम का उलंधन न हो.
19:18ब्रहमांड के निर्माता ब्रहमाजी अपनी दिव्यद रिष्टी से इस मिलन के आने वाले परिणामों को देख रहे हैं.
19:26लव के हाथ में एक छोटा धनुश है, जिसे वह अंजाने में ही मजबूती से जकड लेता है.
19:34शिविर के चारों और पहरेदारों ने स्वर्ण कवच धारण कर लिये हैं, जो धलती धूप में चमक रहे हैं.
19:42कुष अपनी कुषागर बुद्धी से यह भांप लेता है कि ये आगन्तु कोई साधारण पथिक नहीं है.
19:50गरुर देव उपर बादलों के बीच से इस द्रिश्य को निहार रहे हैं, मानो सब कुछ पूर्वनिर्धारित हो.
19:58शत्रुग्न अपने अश्व को थप्थ पाते हैं, जो आश्रम की घास पर खड़े होकर किसी अन्होनी का संकेत दे रहा
20:06है.
20:07आश्रम की वायू में एकाएक चंदन की महक और शंखनाद की ध्वनी गूँझ उठती है.
20:15सैनिकों के कोलाहल के बीच भी लव और कुछ ने अपनी एकागरता भंग नहीं होने दी है.
20:22शत्रुगन के मन में अपनी जन्नी अयोध्या का स्मरण होता है, जो उन्हें इस धर्म संकट में आगे बढ़ने को
20:29प्रेरित करता है.
20:32रात्री के आगमन के साथ शिविर के मशाले जल उठती हैं, जो एक रहस्य में आभा का निर्मान करती हैं.
20:41अब बस एक कदम की दूरी है, और निती का चक्र अपनी पूरी गती से चलने को तयार है.
20:48रात के घने अंधेरे में शत्रुगन का शिविर एक चमकते हुए दीप की भांती वन के एकांत में अपनी भव्यता
20:56का परिचय दे रहा है.
20:59शिविर के भीतर शस्त्रों का तेज देखकर देवर्शी नारग मुस्कुराते हुए अग्रिश्य रूप में इस नियती के मिलन की प्रतीक्षा
21:06कर रहे हैं.
21:09लव और कुष अपनी कुटिया से बाहर निकलते हैं, उनके मासूम चहरों पर उन दिव्य हथियारों के प्रती एक अनोखी
21:17जिग्यासा उमड रही है.
21:19वन की शान्थ हवाओं में शत्रुघन के धनुष से निकलने वाली एक अलोकिक गूंजबालत लव के कानों तक पहुँचती है.
21:28कुष जो प्रकृती के कनकन से परिचित है, इस दिव्यस पंदन को भाम्प लेता है और अपने भाई का हाथ
21:36पकड़ कर सतर्खो जाता है.
21:51बालक धीरे धीरे शत्रुघन के शिविर की ओर बढ़ते हैं, उनके पैरों की आहट वन के सन्नाटे में खो जाती
21:58है.
21:59मशालों की लप्टें हवा में निरित्य कर रही हैं, जैसे वे किसी आने वाले बड़े परिवर्तन का स्वागत कर रही
22:06हों.
22:08शत्रुघन अपनी चिन्ता में मगन है, उन्हें आभास नहीं कि उनकी अपनी ही रख्त का अंश उनके इतने समीप है.
22:17भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा में मंदमंद मुस्कुराते हैं, क्योंकि नेती ने इन योध्धाओं को एक ही धरातल पर लाखडा
22:25किया है.
22:27लव एक ठूंट के पीछे चिपकर शत्रुघन के दिव्यध हनुष को देखता है, उसकी चमक बालक की आखों में एक
22:34अजीब सी ललक भर देती है.
22:37हवा का एक जोंका शत्रुघन के शिविर के परदों को हिलाता है, जिससे भीतर का दिरिश बालक कुष के लिए
22:44स्पष्ट हो जाता है.
22:47अंदर शत्रुघन अपनी तलवार को म्यान से बाहर निकाल कर उसे साफ कर रहे हैं, उनका व्यक्तित्व किसी शांत समुद्र
22:55सा गंभीर है.
22:57लव की मुस्कान में वही अयोध्या की राजसी चमक है, जो उसके पिता और पूर्वजों के इतिहास को जीवन्त करती
23:05है.
23:07कुष्का ध्यान शत्रुघन के कवच पर लिखे उन प्रतीकों की ओर है, जिन्हें देख कर उसका मन किसी पुरानी गाथा
23:15को याद करने का प्रयत्न करता है.
23:18नेती का चक्र अपनी पूरी गती से घूम रहा है, और अयोध्या के ये उत्तराधिकारी अंजाने में अपने पिता के
23:26समीप खड़े हैं.
23:28शत्रुघन अचानक ठहर जाते हैं, जैसे उन्हें किसी की उपस्थिती का दिव्य आभास हुआ हो.
23:35बालत लवकुष बिना कोई शब्द कहे, एक दूसरे की ओर देखकर अपनी आने वाली चुनौती के लिए संकेत साजा करते
23:43हैं.
23:45वन की जाडिया हिलती हैं, जिससे शत्रुघन का ध्यान भटकता है और वह पूरी सतर्कता के साथ अपनी धाल उठा
23:53लेते हैं.
23:55अयोध्या के इतिहास का एक नया अध्याय आज इस वन की गोध में लिखा जाने के लिए पूरी तरह तैयार
24:02है.
24:04वन के घने वरिक्षों के बीच अचानक सन्नाटा पसर गया, जैसे स्वयंकाल भी लवकुष और शत्रुघन के इस मिलन को
24:12देखने के लिए थम गया हो.
24:15भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा के सुक्ष्म लोग से इस द्रिश्य पर द्रिश्टी रखते हुए मंद मुस्कुराते हैं, मानो नेती
24:22के धागे स्वयं ही सही दिशा में बुने जा रहे हूं.
24:27शत्रुघन ने अपनी धाल को पूरी मजबूती से जकड लिया, उनकी तीक्ष्न ग्रिश्टी जाडियों के पीछे छिपी उस रहस्य में
24:34हल्चल को भेदने का प्रयत्न कर रही थी.
24:38धनुष की प्रत्यंचा पर उंगलियों का दबाव बढ़ रहा था, जैसे वन की हवा में ही युद्ध का आहवान घुल
24:45गया हो.
24:47जाडियों के पीछे से दो बालक बाहर निकलते हैं, जिनके मुख पर एक अध्भुत तेज था जो वन के अंधकार
24:54को भी प्रकाशित कर रहा था.
24:57नारद मुनी उपर आकाश मार्ग से देखते हुए वीना के तार छेड़ते हैं, जिससे निकलने वाला स्वर इस एतिहासिक शन
25:05की गूंज बन जाता है.
25:08शत्रुघन ने सैनिकों को रुकने का संकेत दिया, क्योंकि बालकों की निडर आखों में उन्होंने एक ऐसी शक्ती देखी जो
25:16किसी साधारन वनवासी में नहीं होती.
25:20बालक कुष ने आगे बढ़कर अपनी शांत वानी में पूछा कि अयोध्या का वीर सैनिक मर्यादा पुरुशोत्तम के इस पवित्रवन
25:28में शस्त्र लेकर क्यों आया है?
25:31वन की पवित्रता का वातावर्ण उसक्षन स्थेर हो गया जब दोनों तरफ से तरकों की पहली लहर टकराई.
25:39भगवान शिव कैलाश के शिखर से इस परीक्षन की गंभीरता को देख रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि यह
25:46केवल युद्ध नहीं, बलकि पित्रधर्म का एक जटिल प्रश्न है.
25:52शत्रुघन के मुख से निकलने वाला प्रत्येक शब्ध वन के सन्नाटे को काट रहा था, उन्होंने अपनी मर्यादा की रक्षा
25:59के लिए तरकों का जाल बुन दिया.
26:02लव ने हनस्ते हुए शत्रुघन के तरक को चुनोती दी, और उसकी वानी में वालमीकी के आश्रम की वह विद्वत्ता
26:09साफ जलक रही थी.
26:12शत्रुघन और बालकों के बीच की यह बहस अब साधारन नहीं रही, यह साहस और ज्ञान का एक ऐसा युद्ध
26:19बन गई है, जिसका निर्नय विधी को करना है.
26:24देवतागन अपने विमानों में उपर से देख रहे हैं कि क्या अयोध्या का वह स्वर्ण इतिहास फिर से किसी अगनिप्रीक्षा
26:32से होकर गुजरेगा.
26:34शत्रोगन ने अपनी ढाल को नीचे किया, क्योंकि बालकों के तरकों में उन्होंने एक ऐसी सच्चाई देखी जिसे जुठला पाना
26:42उनके बस में न था.
26:44कुष ने आगे बढ़कर कहा कि शस्त्र की शक्ती तो क्षणिक होती है, परंतु सत्य की शक्ती काल के अंत
26:51तक जीवित रहती है.
26:54वन की वादियों में अब शस्त्रों की जंकार के स्थान पर तरकों की गूंच सुनाई देने लगी, जो किसी महान
27:01संग्राम से भी अधिक भारी थी.
27:04देवी सरस्वती की सूक्ष्म उपस्थिती से बालकों का स्वर और अधिक ओजस्वी हो गया, जिससे शत्रुगन विस्मित रह गए.
27:14शत्रुगन की आखों में अब संदेह के स्थान पर एक अजीव सी आत्मेता उमडने लगी, जैसे वह उन बालकों में
27:21किसी अपने का अंश देख रहे हूं.
27:24इस अप्रत्याशित तर्क के अंत में एक ऐसी अनकही खामोशी छा गई, जिसने आने वाले युद्ध की दिशा को पूरी
27:32तरह बदल कर रख दिया.
27:35शत्रुघन के हाथों से धनुष धीरे-धीरे नीचे की ओर जुकने लगा, मानो उनका हृदय इन बालकों के ओज को
27:42स्विकार करने के लिए विवश हो रहा हो.
27:45लव की आखों में जलती हुई निर्भीकता और कुश के मुख पर श्री राम के समान धीर गंभीर मुद्रा देखकर
27:52शत्रुघन के भीतर का योध्धा स्थब्ध रह गया.
27:56वायू का वेग रुकसा गया था, जैसे प्रकृती स्वयें इस कालजई मिलन के साक्षे के रूप में अपनी सांसे थामे
28:04खड़ी हो.
28:06आकाश के सुदूर कोने से देवर्शी नारत के वीना की जंकार मानो इस धरा को एक अलोकिक संगीत से सराबोर
28:13करने लगी थी.
28:15शत्रोगन ने अपनी बाहें फैलाते हुए एक अत्यंत कोमल और स्नेहपूर्ण स्वर में बालकों से उनका परिचय जानना चाहा.
28:24नारत मुनी ने अद्रिश्य लोक से मुस्कुराते हुए देखा, क्योंकि नेती का चक्र अब अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर हो
28:32रहा था.
28:34लव ने एक कदम आगे बढ़ाया और अपनी वानी में वही ओज भरते हुए पूछा की क्या अयोध्या के राजकुमार
28:41को एक बालक की चुनौती से भय लग रहा है.
28:46हवाओं में एक तीवर गर्जनासी गुंजी जैसे साक्षात धर्म इस समवाद के बीच किसी अन्होनी की चेतावनी दे रहा हो.
28:55शत्रुघन का मस्तक जुक गया, क्योंकि उन्हें उन बालकों की बात में अपने भाई राम का त्याग और उनकी मर्यादा
29:02की जलत मिल रही थी.
29:05कुष ने अपने भाई के स्वर में स्वर मिलाते हुए अपनी धनूर विद्या की परीक्षा के लिए शत्रुघन को ललकारा.
29:13शत्रुघन के मन में उपजी आत्मीता अब पिघलते स्वर्ण की भानती उनकी आखों से आसुओं के रूप में छलकने लगी
29:21थी.
29:22वालमी की रिशी की कुटिया से आती हुरी वेदों की ध्वनिया इस वातावर्ण में एक दैविय सुरक्षा कवच का निर्मान
29:30कर रही थी.
29:32शत्रुघन ने अनुभव किया कि उनका त्रिशूल जो मधुपूरी के युद्ध के लिए था, आज इन बालकों के समक्ष निस्तेज
29:39हो रहा है.
29:42भगवान विश्नु का सूक्षम स्वरूप जो वैकुंट से इस द्रिश्य को देख रहा था, एक गहरी मुस्कान के साथ इस
29:49लीला को पूर्ण कर रहा था.
29:52बालकों के हाथ में थामे धनुष मानो साक्षात, शिव के धनुष का प्रतिरूप बन कर चमकने लगे थे.
29:59समय मानो थम गया और शत्रुघन के हृदय में दबी हुई स्मितिया सर्यू के वेग की तरह उमडने लगी.
30:08शत्रुघन ने अपनी ढाल नीचे रखी और निहत्थे होकर बालकों की ओर अपनासने प्रदर्शित करते हुए आगे बढ़े.
30:16लव और कुष ने अपनी सावधान मुद्रा को थोड़ा शिथिल किया, उनके हृदय में भी एक अप्रिचित सा प्रेम अंकुरित
30:24हो रहा था.
30:26शत्रुघन के चर्णों की आहट से धर्ती मानों पवित्र हो रही थी और आश्रम के पक्षी भी मौन होकर इस
30:33मिलन का गान कर रहे थे.
30:35इतिहास के पन्ने एक नई करवट लेने को तयार थे, जहां योध्धा और बालक के बीच की रेखा अब धुन्धली
30:43पड़ती जा रही थी.
30:45वायू के जोकों ने पेडों की टहनियों को ऐसे नचाया जैसे वे अंजाने में ही किसी शाही स्वागत की तयारी
30:52कर रहे हूं.
31:04वागन ने जैसे ही लव और कुश के निकट कदम रखा, उनके हृदय में बसी वादसले की सोई हुई धारा
31:11अचानक फूट पड़ी.
31:13वातावर्ण में एक दैवियस पंदन गूँज उठा, मानू स्रिष्टी स्वयं इस पितापुत्र के मौन समवाद को साक्षी मान रही हो.
31:22लव ने अपनी धनुष की प्रत्यंचा को धीला छोड़ दिया, क्योंकि सामने खड़े योध्धा की दृष्टी में उसे क्रोध नहीं,
31:30बलकि एक अजीव सा अपनापन दिखा.
31:34गरुर पर सवार विश्णुजी वैकुंट से इस लीला को देखते हुए प्रसन्ता से भर गए, क्योंकि युगों का चक्र अब
31:41धर्म की ओर मुर रहा था.
31:44कुष्णे धीरे से अपना सिर उठाया और शत्रुगन की आँखों में जहाका, जहां उसे अपनी ही छबी का प्रतिविम नजर
31:52आया.
31:53समय मानो इसी क्षण के लिए थमा हुआ था, जहां अयोध्या का भविश्य अपने अतीत के साए में खड़ा था.
32:02शत्रुगन के मुख से कोई शब्द न निकल पाया, बस उनकी नम आखों ने बिना कहे ही सारा वृत्तांत कह
32:08सुनाया.
32:10स्वय वालमी की मुनी अपनी कुटिया के द्वार पर खड़े होकर इस अलौकिक मिलन के महात्मे को मुस्कुरा कर देख
32:17रहे थे.
32:18लव और कुश के हाथों की पकड़ अपने धनुषपर और अधिक शिथिल हो गई और उन्होंने जिग्यासा से शत्रुगन की
32:26ओर एक कदम बढ़ाया.
32:29आकाश में देवताओं ने इस क्षण के सम्मान में पुश्प वर्षा की, जिससे पूरा वनप्रांतर सुगंधित हो उठा.
32:37अयोध्या के सेनापती के मन का द्वंध्व अब धीरे धीरे वातसले की कोमलता में परिवर्तित होने लगा था.
32:45नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा, जिससे गूंजने वाला स्वर इस महान मिलन का मंगलगान बन गया.
32:54शत्रोगन ने अपनी धाल नीचे की, जो इस बात का प्रतीक था कि अयोध्या का योध्धा अब युद्ध की नहीं,
33:01बलकि अपने रक्ट से मिलने आया है.
33:05प्रक्रिती भी इस मिलन में सम्मिलित थी, क्योंकि हवा का हर जोंका एक मधुर संगीत की तरह महसूस हो रहा
33:12था.
33:13क्या अयोध्या के इतिहास की वह पुरानी कड़वाहट आज इन मासूम चेहरों के सामने धुल जाएगी?
33:21भगवान शिव के आशिर्वाद से बना यहक्षन, नेती के उस सबसे कठिन द्वार को खोलने की कुंजी बन गया.
33:29लव और कुषने अब शत्रुगन को एक योध्धा के रूप में नहीं, बलकि एक पिता के तुल्य सम्माने अतिथी के
33:37रूप में देखा.
33:39मिलन की यह दहलीज अब पार हो चुकी थी, और सत्य का वह सूर्य उदे होने को था जिसे कोई
33:45भी अंधकार नहीं रोक सकता था.

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