Skip to playerSkip to main content
पद्म पुराण (पाताल खण्ड / सृष्टि खण्ड) के इस रोमांचक 29वें अध्याय में देखिए कुंभकर्ण का रणभूमि में प्रचंड तांडव! जब पर्वताकार राक्षस ने वानर सेना को कुचलना शुरू किया, तो कैसे सुग्रीव, लक्ष्मण और अंत में स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने काल रूपी कुंभकर्ण का सामना किया? जानिए पद्म पुराण में वर्णित वो गुप्त दिव्य अस्त्र जिससे कुंभकर्ण का अंत हुआ और लंका में हाहाकार मच गया। #PadmaPurana #KumbhakarnaVadh #RamayanSecrets #HinduMythology
Transcript
00:00लंका के द्वारों से कुम्भकर्ण के बाहर निकलते ही प्रित्वी कांप उठी और उसके विशाल चर्णों के प्रहार से पहाड
00:07धूल में परिवर्तित होने लगे.
00:10स्वर्गलोग से देवराज इंद्रचिंतित होकर नीचे देख रहे हैं मानो कुम्भकर्ण के इस तांडव से स्रिष्टी का विनाश निकट हो.
00:19कुम्भकर्ण ने अपनी गर्जना से आकाश को भेद दिया और वानर सेना में भगदर मच गई.
00:26उस दानव की चाया लंका के मैदानों पर एक भयानक ग्रहेन की भानती चा गई, जिससे चारों और अंधकार व्याप्थ
00:34हो गया.
00:36वानरों की रक्षा पंक्ती उसके एक ही प्रहार से पत्तों की तरह बिखर गई.
00:42देवर्शी नारद अपनी वीना था में इस विनाशकारी द्रिश्य को देखकर अत्यंत व्याकुल हो उठे.
00:49कुम्भकर्ण ने अपनी मुठ्धियों में दर्जनों वानरों को जकड लिया और उन्हें अपने क्रूर मुख की ओर ले गया.
00:57रन्भूमी में मची इस चीख पुकार ने लंका के आकाश को रक्त के समान लाल कर दिया.
01:04धर्ती कुम्भकर्ण के हर कदम पर कराह रही थी, मानो स्वय प्रित्वी माता का हृदय फट रहा हो.
01:12भगवान विश्णु बैकुंठ में अपनी योग निद्रा से सचेत होकर उस दुष्ट के सहार की योजना बनाने लगे.
01:20कुम्भकर्ण के पंजों में दबे वानर योध्धा अपनी जान बचाने के लिए संधर्ष कर रहे हैं.
01:27युद्ध का यह द्रिश इतना भयावह था कि पक्षी भी लंका के उपर से उड़ना भूल गए.
01:34कुम्भकर्ण ने दहारते हुए अपने सामने आने वाले हर वानर को कुचल दिया.
01:40देवताओं के दूद पवन देव वायू के रूप में इस तबाही को देख अपनी मर्यादा में विचलित हो रहे थे.
01:48कुम्भकर्ण की भूख लंका के पूरे राशन को चट करने के बाद अब वानर सेना पर केंद्रित थी.
01:55आकाश से गिर्ती हुई दिव्य अगने की चिंगारियां युद्ध के मैदान की भयावता को और बढ़ा रही थी.
02:03वानर सेना में अफरात फरी मच गई और कई वीर योद्धा रनभूमी छोड़कर पीछे हटने लगे.
02:11शून्य में स्थित भगवान शिव इस विनाश को देखकर शान्त भाव से अपनी तीसरी आख की ओर ध्यान केंद्रित कर
02:18रहे हैं.
02:20कुम्भकर्ण के भारी कदमों की धमक से समुद्र की लहरें भी किनारे से वापस मुर रही थी.
02:27युद्धक शेत्र में एक विशाल शमशान जैसा सन्नाट आचा गया, जब कुम्भकर्ण ने अपनी विजय के प्रतीक के रूप में
02:35अपना अट्थास किया.
02:37लंका के विशाल द्वार के सामने खडी वानर सेना कुम्भकर्ण के राक्षसी स्वरूप को देखकर क्षन भर के लिए स्तब्ध
02:45रह गई.
02:46शून्य में स्थित भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख से इस भीशन संग्राम को देखते हुए अपनी दिव्यमौन मुद्रा को
02:54बनाये रखा.
02:56युवराज अंगद ने अपनी भुजाओं को फहराते हुए वानर वीरों में जोश भरा और कुम्भकर्ण की ओर ललकारते हुए आगे
03:04बढ़े.
03:05आकाश के घने अंधकार में अंगद ने एक विशाल पर्वत शिला को उठा कर कुम्भकर्ण की विशाल छाती पर दे
03:12मारा.
03:14पर्वत की शिला कुम्भकर्ण के शरीर से टकरा कर धूल में मिल गई पर वह राक्षस पर्वत की तरह अडिक
03:21खड़ा रहा.
03:22विश्नु भगवान ने अपने दिव्य स्वरूप में गरूड के कंधे पर विराज मान होकर इस युद्ध की भीशनता को गंभीरता
03:30से देखा.
03:31वीर द्विविद और मैंध ने अपनी पूरी शक्ती बटोर कर कुम्भकर्ण के मस्तक पर भीशन प्रहार करने की योजना बनाई.
03:40युद्ध भूमी के ऊपर काली गड़-गड़ा हटने वातावर्ण को और अधिक भयावह बना दिया, जैसे प्रकृती स्वयें इस विनाश
03:48की साक्षी हो.
03:50कुम्भकर्ण ने अपनी लोहे की गड़ा घुमाते हुए चारों और एक बरफीली ठंडी हवा जैसी दहशत पैदा कर दी.
03:59भगवान शिव के मुख पर इस प्रल्यंकारी द्रिश्य को देख एक तनिकसी मुस्कान आई, जो आने वाले समय का संकेत
04:06थी.
04:08मैंद और द्विविद के कुम्भकर्ण के पास पहुँचते ही, उसने एक ही जटके से अपनी गड़ा का प्रहार उनकी ओर
04:15किया.
04:16हवा में उरते हुए वानर वीर अपनी फुर्ती से बचने की चेश्टा कर रहे थे, लेकिन गड़ा का वेग अत्यंत
04:23तीवर था.
04:25अंगद ने देखा कि कुम्भकर्ण किसी साधारण राक्षस नहीं, बलकि स्वयंकाल का एक विक्राल रूप धारण किये हुए है.
04:34विश्नु भगवान ने गरूर को संकेत दिया और युद्ध के अंत की नियती को अपनी दिव्यद रिष्टी से निहारा.
04:43कुम्भकर्ण की गदा के वार से दिविद और मैंद दूर जाकर पत्थरों के धेर में गिर पड़े, जिससे धर्ती कांप
04:49उठी.
04:51युद्धक्षेत्र की धूल और धुए में कुम्भकर्ण की अटहास की ध्वनी किसी भुकंप की भांती गुंजने लगी.
04:59अंगद ने साहस नहीं छोड़ा और फिर से एक विशाल पेड को उखाड कर अपनी ढाल के रूप में उप्योग
05:06करने लगा.
05:07भगवान शिव ने अपनी आखें बंद की और ब्रह्मान की उर्जा को पुना व्यवस्थित करना शुरू किया.
05:15कुम्भकर्ण के हर प्रहार के साथ लंका के महल की दीवारें जैसे अपनी अंतिन घडी का आहवान कर रही थी.
05:24आस्मान में एक अजीब सन्नाट आचा गया, मानो नेती कुम्भकर्ण के महाप्रलय के अंत को स्विकार करने वाली हो.
05:32रणभूमी में सुग्रीव ने अपनी पूर्ण शक्ती बटोर कर कुम्भकर्ण की और एक विशाल परवत शिखर उचाला, जिससे उस दानव
05:41का स्वर्ण कवचक्षन भर में चकनाचूर हो गया.
05:45देवलोक से देखते हुए भगवान विश्णू ने अपने शेशनाग पर विराज मान होकर मुस्कुराते हुए कहा कि यह द्वंद्व धर्म
05:53और अधर्म के अंतिम संधर्ष का संकेत है.
05:57कवच के तूटने से कुम्भकर्ण का क्रोध सात्वें आसमान पर पहुँच गया और उसने फुर्ती दिखाते हुए अपने विशाल हाथों
06:05से सुग्रीव को हवा में ही दबोच लिया.
06:09नेती की इस भीशन वेला में आकाश के रंग बदल गए और लंका के उपर की वायू में कुम्भकर्ण की
06:15विजय की घातक आहट सुनाई देने लगी.
06:19कुम्भकर्ण अटहास करते हुए सुग्रीव को बंदी बना कर लंका के दुर्गम द्वारों की ओर ले जाने लगा, जिससे वानर
06:27सेना में हाहाकार मच गया.
06:30भगवान शिव अपनी समाधी में स्थिर होकर इस द्रिश को निहार रहे थे, मानों वे देख रहे हों की कैसे
06:37एक वानर का साहस दानव की विशालता को चुनौती दे रहा है.
06:42सुग्रीव ने अपनी जान बचाने के लिए अंतिन दाव चलते हुए कुम्भकर्ण के नाक और कान पर अपने तीखे नाखुनों
06:50से प्रहार किया.
06:52कुम्भकर्ण की चीक से लंका की धर्ती कांप उठी और उसने दर्द के मारे सुग्रीव को अपनी पकड़ से मुक्त
06:59कर दिया.
07:01बंधन मुक्त होते ही सुग्रीव बिजली की गती से आस्मान में उचले और सीधे सुरक्षित वानर सेना के बीच जागिरे.
07:09आकाश से नारद मुनी ने इस घटना को देखकर वीना के तारों पर एक तीवर ध्वनी छेड़ दी जो युद्ध
07:17के बदलने का संकेत थी.
07:20कुम्भकर्ण अब खून से लथपत होकर उन्माद की अवस्था में आ गया था और उसका क्रोध एक ज्वाला मुखी की
07:27भांती फट पड़ा.
07:29उसका विशाल शरीर अब और भी विक्राल लगने लगा था, मानो उसने स्वयम्रित्यु को युद्ध के मैदान में आमंत्रित कर
07:37लिया हो.
07:38वानर सेना कुम्भकर्ण के इस नए रूप को देखकर विचलित हुई, लेकिन सुग्रीव ने उन्हें पुनह संगठित करने का साहस
07:46दिखाया.
07:48शिव के गणों ने इस महा संग्राम को देखते हुए अपनी दिव्यद्रिष्टी से श्रीराम को यह संकेत दिया की अब
07:55समया गया है.
07:58कुम्भकर्ण ने अपनी भारी गदा को हवा में घुमाते हुए पूरी वानर सेना को एक ही प्रहार में समाप्त करने
08:04की घोशना की.
08:17कुम्भकर्ण के अहंकार को चोट पहुचाई थी, जिसने अब उस राक्षस को पूरी तरह से अंधा कर दिया था.
08:24ब्रहमाजी के मानस पुत्र भी इस द्वंद्व को देखकर चिंतित हुए की कहीं कुम्भकर्ण का क्रोध पूरी स्रिष्टी की मर्यादा
08:32को न लांग जाए.
08:34धूल और लहू से भरी उस भूमी पर कुम्भकर्ण का प्रत्येक कदम एक भूकम्प के समान था, जो लंका के
08:41अस्तित्व को हिला रहा था.
08:44युद्ध का यह तीसरा चरण अपने चर्मोत कर्श पर था, जहां कुम्भकर्ण की अंतिम सांसे श्रीराम के दिव्यबानों को पुकार
08:52रही थी.
08:54रनभूमी की धूल में लिप्ता कुम्भकर्ण जब क्रूर अठास करता हुआ आगे बढ़ा, तो उसकी हर एक चाल से लंका
09:01की धर्ती कांप उठी.
09:04आकाश में विराजमान देवगन और स्वयं ब्रहमाजी के मानस पुत्र इस महा संहार को देखकर हतप्रभ रह गए कि यह
09:12दानव अब मर्यादा लांग रहा है.
09:15सैनिकों के शवों को रौंदता हुआ वह महाबली अपनी गदा लहरा कर वानर सेना की ओर जप्टा, मानों कोई प्रलेकारी
09:23चक्रवात उठ खड़ा हुआ हो.
09:26उस विक्राल संकट को अपनी सेना पर मंदराते देख सूर्य पुत्र सुग्रीव और अंगद ने अपने प्राणों की बाजी लगाने
09:34का निश्चय किया.
09:36किन्तु उस रक्त रंजित मार्ग में अचानक एक स्वर्ण किरन के समान सौमय किन्तु प्रचंड प्रतापी लक्षमन जी ने अपनी
09:43गदा थाम कर कदम रखा.
09:46मर्यादा पुरुशोत्तम के अनुज लक्षमन ने अपने दिव्यध हनुष को थामा और उसकी प्रत्यंचा पर ऐसा बाण चड़ाया जिसकी चमक
09:54से दसों दिशाएं जगमगा उठी.
09:58उन्होंने तड़ित गती से बाणों की एक ऐसी इंपेनेटरिबल दीवार खड़ी कर दी, जिसके पार कुम्भकर्ण का एक भी पक
10:05आगे बढ़ना असंभव हो गया.
10:08अगनी के गोले बरसाती वे तीर हवा में सर्प की भांती फुफकारते हुए राक्षस राज के मार्ग को रोक कर
10:15एक सुद्रिड प्राचीर बन गए.
10:18सहसरो बानों की उस भीशन वर्षा को देखकर कुम्भकर्ण ठिठक गया और उसका विशाल शरीर उस स्वन वर्षा के आगे
10:26क्षणभर के लिए थम गया.
10:29उसकी लाल-लाल आखों में क्रोध के स्थान पर पहली बार एक ऐसे वीर बालक के प्रती अगाध आदर और
10:36विस्मय के भाव तैरने लगे.
10:39उसने अपनी गदा को नीचे जुकाया और गरच्ती हुई गंभीर वाणी में कहा ये वीर बालक तेरी इस वीरता को
10:46मेरा शत्षक नमन है.
10:50कुम्भकर्ण की गुंजती हुई आवाज ने रणक्षेत्र के हुंकारों को शांत कर दिया और वायु मंदल में एक रहस्यमय सन्नाटा
10:57पसर गया.
10:59राक्षस राज ने प्रशंसा के स्वर में कहा कि इक्षवाकु कुल के इस छोटे राजकुमार ने अपने बानों के पराक्रम
11:07से उसे भी विवश कर दिया है.
11:10लक्षमन ने अपने स्वर्ण धनुष को द्रिड़ता से थामे रखा और चेतावनी दी की जब तक राम का अनुज जीवित
11:17है, एक भी राक्षस आगे नहीं बढ़ सकता.
11:21किन्तु कुम्भकर्ण ने मुस्कुराते हुए अपने विशाल वक्ष स्थल पर हाथ रखा और कहा कि उसका गंतव्य और उसकी मुक्ती
11:29किसी साधारन योध्धा के हाथों नहीं है.
11:33उसने स्पष्ट शब्दों में घोशना की कि इस छै मास की निद्रा के तूटने का अर्थ केवल एक ही है,
11:40सर्वोच योध्धा श्रीराम का सामना करना.
11:44कुम्भकर्ण जानता था कि उसका यह शरीर और उसकी यह महिमा केवल उस दिव्य अवतार के हाथों मुक्ती पाने के
11:52लिए ही रची गई है.
11:54उसने लक्षमन से मार्व छोड़ने का आगरह किया और अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त की कि उसका सामना केवल रगुकुल नंदन
12:02श्रीराम से हो.
12:05लक्षमन ने उसके उस भाग्य सत्य को भाम्पते हुए अपने बानों को समेट लिया और श्रीराम की ओर देखने लगे
12:12जहां अंतिम प्रलय की बेला आ चुकी थी.
12:16युद्ध भूमी के इस चरम मोर पर अब दोनों महाबलियों के बीच वह अंतिम और एतिहासिक भेंट होने जा रही
12:23थी, जो इतिहास रचने वाली थी.
12:25लंका के रक्तरंजित रणक्षेत्र में सन्नाटा चीरते हुए मर्यादा पुरुशोत्तम श्रीराम ने अपने दिव्यकोदंड धनुष को धारन कर लिया.
12:36प्रभु श्रीराम के इस अलौकिक तेज से सम्पून लंका की तामसी शक्तिया और अंधकार का सामराज्यकांप उठा.
12:45उन्होंने अपनी करुणा से भरे स्वरों में महाबली कुम्भकर्ण को जीवन का अंतिम और परम आध्यात्मिक उपदेश दिया.
12:54श्रीराम की वानी सुनकर कुम्भकर्ण की आखों में अपने भाई रावन के प्रती अटूट निष्ठा और समर्पन के अश्रुच छलक
13:01आए.
13:03विशालकाई कुम्भकर्ण ने हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थ ना की की उसके इस भारी शरीर को मुक्ती का मार्ग दिखाया
13:10जाए.
13:12देवराज इंद्र और अन्य देवतागन आकाश मार्ग से इस एतिहासिक और पवित्रक्षन को देख कर विस्मित हो रहे थे.
13:21कुम्भकर्ण ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि वह अपने भाई के अधर्म का भागी नहीं बनना चाहता था, किन्तु
13:29उसकी बंधी हुई निष्ठा अटूट थी.
13:32युद्ध के इस महामंच पर कर्तव्य और निती का एक अनूठा और परम सत्य स्थापित हो रहा था.
13:39श्री राम ने अपने परम धनुष पर ब्रहमांडिय उर्जा से युक्त उस अंतिम बाण का संधान किया.
13:47रिशी मुनी और आकाश्वासी दिव्यद्रिष्टा इस महाप्रलय के दर्शन कर हाथ जोड कर मंत्रो चार करने लगे.
13:55उस बान के स्पर्श मात्र से कुम्भकर्ण के समस्थ पाप और भौतिक बंधन पलभर में भस्म होने लगे.
14:03संपूर्ण लंका की भूमी उस महाबली के भार और इस दिव्यप्रहार से कांप उठी, मानो प्रित्वी स्वयं ठर्रा गई हो.
14:12कुम्भकर्ण के मुख से भगवान श्री राम के जैकारे गूँझ उठे और उसने स्वेच्छा से अपनी देह त्याग दी.
14:20नारद मुनी ने वीना की तान के साथ इस परम मुक्ती के क्षण का गान किया और प्रभू की महिमागाई.
14:27वह महान आत्मा अपने भौतिक शरीर को छोड़ कर दिव्य जोती में विलीन होकर परमधाम की और प्रस्थान कर गई.
14:36युद्ध भूमी पर छाया भारी अंधकार छटने लगा और श्रीराम के चारों और एक अलौकिक प्रकाश फैल गया.
14:45वानर सेना ने जय श्रीराम के उद्धोश से आकाश को गुझाइमान कर दिया और विजय का उत्सव मनाया.
14:53महाबली हनुमान और लक्षमन ने अत्यंत आदर के साथ अपने आराध्य श्रीराम के चर्णों में प्रणाम किया.
15:01कुम्भकर्ण के महाप्रलय और उसके उद्धार की इस गाथा ने ब्रहमांड में धर्म की विजय का शंकनाद कर दिया.
15:09इस प्रकार लंका के सिनहासन पर बैठे रावन के सबसे बड़े अहंकार का भी अन्थ हो गया और अधर्म का
15:16सामराट जहिल गया.
15:18क्रोध से उबलते हुए कुम्भकर्ण ने अपने विशाल हाथों से प्रल्यंकारी त्रिशूल उठाया और श्री राम की ओर भयंकर गती
15:26से फैंक दिया.
15:29देवलोक में बैठे देवताओं की सांसे थम गई जब उन्होंने उस आकाश को चीरते हुए आते हुए अगनि त्रिशूल को
15:37देखा.
15:37श्री राम ने अपनी असीम शान्ती और स्थिर्ता के साथ अपने धनुष की प्रत्यंचा पर एक अत्यंत तेजस्वी अर्धचंदरबान संधान
15:47किया.
15:48वह दिव्यबान बिजली की गती से आगे बढ़ा और हवा में ही कुम्भकर्ण के उस प्रल्यकारी त्रिशूल से जाटकराया.
15:57भयंकर धमाके के साथ वह त्रिशूल हवा में ही हजारों छोटे-छोटे टुकडों में तूटकर धर्ती पर बिखर गया.
16:05अपनी प्रहार को विफल होते देख कुम्भकर्ण का रोश सात्वें आसमान पर पहुँच गया और उसने एक विशाल लोहे की
16:13गदा उठाई.
16:15क्रोधित राक्षसराज ने उस भारी भरकम गदा को एक चक्रवाती गती से घुमाते हुए श्री राम की सेना की तरफवी
16:23प्रहार के लिए वी वेग से फैंका.
16:26गदा के वेग से उत्पन्न हुई प्रचंड वायू ने समुद्र की लहरों को हिला दिया और पानी मीलों तक उपर
16:33उठने लगा.
16:35महाबली हनुमान ने उस गिर्ती हुई गदा के मार्ग को देख कर अपनी स्वर्ण कांती से दमकते हुए शरीर को
16:42और विशाल कर लिया.
16:44लक्ष्मन ने अपने भ्याता श्रीराम के संकेतों को समझते हुए अपनी धनुर विद्या का एक और अध्भुत पराक्रम दिखाने के
16:52लिए बान निकाला.
16:54श्रीराम ने तनिक भी विलंब न करते हुए एक बार फिर अपने दिव्यबानों का संधान किया, जो सूर्य के समान
17:02चमक रहे थे.
17:04वे दिव्यबान हवा में छूटते ही विभाजित हो गए और एक स्वर्ण रेखा के रूप में उस लोहे की गदा
17:11की ओर लपके.
17:13आकाश में हुए उस अद्वितिय टक्राव से उत्पन हुई उर्जा तरंगों से संपून ब्रहमांड कांप उठा.
17:21आकाशिय विद्युत के समान तीखे बानों ने उस अजेय लोहे की गदा के मध्यभाग को छिन्न भिन्न कर दिया.
17:28गदा के टुकडे इस प्रकार गिरे मानों आकाश से कोई उलकापिंड तूटकर धर्ती पर आगिरा हो.
17:36कुम्भकर्ण अविश्वास से अपनी बड़ीब्री लाल आखों को फाड़ कर देखता रह गया कि उसके सभी अस्त्रपलक जपकते ही नश्ट
17:44हो गये.
17:45श्री राम की इस अमोग शस्त्रकला को देखकर वानर सेना में विजय का उत्साह और अधिक बढ़ गया.
17:53समुद्र का शांत होना तो दूर अब इन दिव्यास्त्रों के टक्राने से उठी लहरें परवतों से जा टक्राने लगी.
18:02अधर्म के हर एक प्रहार को धर्म के प्रकाश से भेदते हुए, श्री राम ने युद्ध की दिशाही बदल दी.
18:09इस महा युद्ध के इस पड़ाव पर आकर यह स्पष्ट हो गया कि कुम्भकर्ण का वह घमंड अब चुकने वाला
18:16है.
18:18रणभूमी के उस भीशन प्रसंग में भगवान श्री राम ने अपने दिव्य धनुषपर वायुवेक अस्त्र का संधान किया.
18:27देवलोक से आकाश मार्ग में खड़े महर्शी नारद और गंधर्व इस अद्भुत और विनाशकारी क्षण को थमी हुई सासों से
18:34देख रहे थे.
18:36श्री राम के उस प्रचंड बान की गती इतनी तीवर थी कि उसने पलक जपकते ही कुम्भकर्ण की विशाल दाई
18:44भुजा को उसके कंधे से अलग कर दिया.
18:46वह वजर के समान भारी मूसल पकड़े हुए कटी हुई दानवी भुजा सीधे धर्ती पर आगिरी और सैकडों राक्षसों को
18:55अपने नीचे कुचल गई.
18:57अपनी एक भुजाकट जाने के बावजूद उस महाबली राक्षस का अहंकार और पराक्रम क्षण भर के लिए भी कम नहीं
19:05हुआ.
19:07देवताओं की सभा में इस अदमय साहस को देखकर स्वयं इंद्र देव भी आश्चर यचकित होकर अपनी स्वर्ण मुद्रा में
19:14खड़े हो गए.
19:16कुम्भकर्ण ने अपनी शेश बची हुई बाएं भुजा से एक विशालकाय साल के व्रिक्ष को उखाड़कर अत्यंत क्रोध के साथ
19:24घुमाया.
19:25हवा को चीरता हुआ वह भारी व्रिक्ष जैसे ही आगे बढ़ा, युद्ध भूमी की हर एक दिशा उस आंधी से
19:33थर्रा उठी.
19:34उस दानविय प्रहार को अपनी और आते देख मर्यादा पुरुशोत्तम श्रीराम के मुख पर एक निश्चिंट और ग्रिढ मुस्कान तैर
19:43गई.
19:44ब्रहमांड के रक्षक भगवान विश्णू के उस अवतार ने एक पल की भी देरी किये बिना अपने तरकश से एक
19:51और दैदी प्यमान बांड निकाला.
19:54वह जोती पुँच जैसा अस्त्रसूर्य के समान तेज बिखेरता हुआ अंतरिक्ष में तेजी से आगे बढ़ा.
20:01उस प्रकाशमान बांडने पलक जपकते ही हवा में लहराते हुए उस विशाल साल के व्रिक्ष को बीच में से दो
20:09टुक्डों में चीर दिया.
20:11व्रिक्ष के टुक्डे दोनों तरफ बिखर कर प्रित्वी पर इस प्रकार गिरे मानों आकाश से कोई उलकापिंड तूटकर गिरा हो.
20:20आकाश में उपस्थित सभी देवता इस सटीक और अध्भुत निशाने बाजी को देखकर अचम्भित रह गए.
20:28कुम्भकर्ण का विशाल शरीर अब पूरी तरह नेहसहाय हो चुका था, परन्तु उसकी आखों का वह पिशाच्वत क्रोध और अधिक
20:36भड़क उठा.
20:38युद्धस्थल की उस धधक्ती हुई भूमी पर अधर्म का हर एक स्तंभ अब कामपने लगा था.
20:45श्रीराम के दिव्यास्त्रों की वह प्रचंड उर्जा चारों और स्वर्ण प्रकाश फैला रही थी.
20:51लंका के उस महायुध में ऐसा प्रतीत होता था कि अब रावन के इस सबसे बड़े अभिमान का अंत निकट
20:59आ चुका है.
21:01कुम्भकर्ण की हर एक आहट से वह पूरी धरा डग्मगा रही थी, मानो स्वयन धर्ती भी इस महाप्रलय का भार
21:08सहन करने में असमर्थ हो.
21:11उस महाबली के अंतिम प्रहार के असफल होने के बाद अब युद्ध का वह निर्नायक शन आ चुका था जहां
21:18इतिहास बदला जाना तय था.
21:21अपने दोनों चरन खो चुका वह धड़ रहित महाकाय राक्षस अपनी क्रोधित और खुली हुई महाकाय गुफा जैसी मुख को
21:28फैला कर सीधे भगवान श्रीराम की ओर उनमत्त होकर जपट पड़ा.
21:34उस दानव की भीशन गती से उठी धूल और कमपन से पूरी लंका की धर्ती इस प्रकार कांप उठी मानो
21:41कोई जागरित ज्वाला मुखी फूट पड़ा हो.
21:44धर्ती के कापते सीने पर बढ़ते उस महाप्रलय को देखकर आकाश में खड़े देवताभी एक पल के लिए अपनी सांसे
21:52रोक बैठे.
21:54उस अनियंत्रित और प्रचंड विनाश को रोकने के लिए अब वह परम वेला आपहुची थी जिसका इंतजार संपून ब्रहमांड कर
22:02रहा था.
22:04भगवान श्री राम ने अपनी गंभीर और शांत मुद्रा को त्यागते हुए ब्रहमांड के सबसे भयंकर और सर्वोच अस्त्र का
22:12स्मरण किया.
22:14उनके आहवान करते ही देवराज इंद्र का वह परम तेजस्वी एंदरास्त्र प्रकट हो गया, जिसकी चमक से दसों दिशाएं एक
22:22साथ प्रदीप्थो उठी.
22:25स्वर्ण और अगनी की लप्टों से लिप्टा, वह दिव्यबान भगवान श्री राम के महान धनुष की प्रत्यंचा पर चड़ते ही
22:32गर्जना करने लगा.
22:34उस अस्त्र की उर्जा से संपूर्ण रनक्षेत्र में ऐसा प्रकाश फैल गया मानों दोपहर का सूर्य अचानक रात के बीच
22:42उतर आया हो.
22:44श्री राम की अंगुलियों के स्पर्ष से उर्जावान होकर वह महास्त्र अपनी संपूर्ण शक्ती के साथ ब्रहमांडिये गती से आगे
22:52बढ़ा.
22:54आकाश में चीर्ती हुई वह अगनी रेखा एक प्रलेकारी उलकापिंड की भाती सीधे उस मत्त दानव के विशाल शरीर की
23:02ओर बढ़ी.
23:04बिना भुजाओं के भी अपने मुह को फाड़े आगे बढ़ते कुम्भकर्ण के ठीक सामने वह बलेजिंग एरो बिजली बनकर चमक
23:11उठा.
23:13उस एंदरास्त्र के स्पर्ष मात्र से उस राक्षस के शरीर की सारी राक्षसी माया एक ही क्षण में छिन्न भिन
23:20हो गई.
23:22अगले ही पल उस महाबाण ने कुम्भकर्ण के उस विशालकाय मुकुटधारी मस्तक को उसके धड़ से हमेशा के लिए अलग
23:29कर दिया.
23:31वह कटा हुआ भयानक मस्तक आस्मान में एक उलका की भाती घूमता हुआ भीशन गर्जना के साथ हवा में उपर
23:39उठ गया.
23:40स्वर्ण मुकुट से सुसजित वह भारी भरकम मस्तक हवा को चीर्ता हुआ लंका की ओर पूरी गती से प्रस्थान कर
23:48गया.
23:49हवा में उर्ता हुआ वह परवत समान मस्तक सीधे लंका की शक्तिशाली और अभेद्य रक्षात्मक दीवारों पर जागिरा.
23:58लंका की वे मजबूत दीवारें उस राक्षस के मस्तक के भारी आधात से द्यूत की भाती थर्थरा कर मल्बे में
24:05बदल गई.
24:07रावन के अभिमान का सबसे बड़ा स्तंभ आज इस प्रकार धूल में मिल चुका था, जिससे पूरी लंका में हाहाकार
24:14मच गया.
24:16धर्ती पर गिरे उस दानव के विशाल शरीर और दूर जा गिरे मस्तक से युद्धक्षेत्र में एक गहरी और दरावनी
24:23शान्ती छा गई.
24:26कुम्भकर्ण के महाप्रलै का यह अंत इस बात का साक्षी बन गया कि धर्म की रक्षा के आगे अधर्म का
24:32कितना भी बड़ा परवट्टिक नहीं सकता.
24:36समुद्र की लहरेन जैसे कुम्भकर्ण के विशाल शरीर के स्पर्ष से थर्रा उठीन और लंका के तटों पर सुनामी का
24:43प्रल्यकारी तांडव होने लगा.
24:46देवलोग के स्वामी इंद्र अपनी स्वर्णमे दिव्यनगरी से इस द्रिश को देख कर अभिभूत हो गए और श्री राम के
24:53जैगोश से आकाश गूझ उठा.
24:57आकाश से गिरते हुए पुश्पों की वर्षा कुम्भकर्ण के निर्जीव शरीर को ढखने लगी, जैसे स्वयन प्रकृती उसके विनाश पर
25:04धर्म की विजय का उत्सव मना रही हो.
25:08मंदार परवत के शिखरों पर विराजमान देवगन, श्रीराम के पराक्रम की गाथाएं गाते हुए दैविय प्रकाश में विलीन हो रहे
25:16थे.
25:17लंका की स्वर्ण में प्राचीरों के पीछे छिपे राक्षस सैनिक अपने सबसे शक्तिशाली महाबली के पतन को देख कर भैसे
25:26काम उठे.
25:27नारद मुनी ने अपनी वीना के जहंकार से यह संदेश संपूर्ण ब्रहमांड में फैला दिया कि अहंकार का विनाश निश्चित
25:35है.
25:37राक्षसी सेना के भीतर एक तीवर हाहाकार मच गया और वे अपनी जीवन रक्षा के लिए स्वर्ण द्वारों के भीतर
25:45भागने लगे.
25:47समुद्र तट पर बिखरा हुआ वह विशाल शरीर लंका के गौरव के तूटने का प्रतीक बन चुका था.
25:54मायावी राक्षसों की पूरी टुकडी, जो कल तक अजे समझी जाती थी, आज अपनी आखों के सामने प्रलय देख कर
26:02स्तब्ध थी.
26:04भगवान विश्नु का अंश, श्रीराम अपने धनुष को शांत करते हुए धर्म की स्थापना के मार्ग पर अडिक खड़े थे.
26:12कुम्भकर्ण के गिरे हुए विशाल मस्तत के पास का वातावर्ण एक अजीब सी भारी चुप्पी से भर गया था, जैसे
26:20काल स्वयर रुप गया हो.
26:22आकाश से बरस्ते हुए पारिजात के फूल श्रीराम के चर्णों को स्पर्श कर रहे थे, जैसे देवलोक स्वयं उनकी वंदना
26:30कर रहा हो.
26:32लंका की स्वर्णमे दीवारों पर राक्षसों की चायाय भाय और निराशा की जीवन्त प्रतिमूर्ती बनी हुई थी.
26:40ब्रह्मा जी ने सत्यलोक से इस महासंगराम के अंत का अवलोकन किया और धर्म की जय का आशिरवाद दिया.
26:49राक्षसों का रोधन लंका की गूंज में विलीन हो रहा था और उनके दोहसाहस का अंत सामने दिखाई दे रहा
26:55था.
26:57समय के चकर ने आज अधर्म के एक बड़े स्तंभ को धूल में मिला दिया था, जिसकी गूंच पूरे त्रिलोक
27:04में सुनाई दी.
27:06सुदूर समुदर में उठी विशाल लहरेंग शान्त होने लगी, मानो स्वयं वरुन देव श्री राम की इस विजय को स्विकार
27:13कर रहे हूँ.
27:15गेहन ध्यान में डूबे हुए महादेव ने अपनी तीसरी आख को शान्त रखा, क्योंकि धर्म की विजय सुनिश्चित हो चुकी
27:23थी.
27:25कुम्भकर्ण की विनाशकारी भूख का अंत लंका की भूख और लालच के अंत के रूप में दिखाई दिया.
27:32लंका का स्वर्ण अभी भी चमक रहा था, पर उसकी चमक के पीछे अब आने वाले अंतिन विनाश का अंधकार
27:39साफ जलकता था.
27:41लंका के प्रांगण में खड़ा कुम्भकर्ण का शव धूल और रक्ट से सना हुआ था, जिससे राजमहल की भव्यता एक
27:49दरावने सननाटे में बदल गई.
27:52रणक्षेत्र के समाचारों को सुनते ही रावन की दहाड लंका की दीवारों को कमपा गई और वह अपने विशाल सिनहासन
28:00पर हताशा में गिर पड़ा.
28:02उसके दसों मुखों से निकला शोक का स्वर ऐसा था मानो स्वयंकाल भी लंका की तबाही पर विलाप कर रहा
28:09हो.
28:11पूरे महल की सुनहरी आभा अब एक भयानक राख के अंधकार में खो रही थी, जो लंका के पतन का
28:18स्पष्ट संकेत दे रही थी.
28:20पिता की इस दैनिय स्थिती को देख कर, उनका पुत्र मेगनाद अपनी मायावी शक्तियों के साथ सभा कक्ष में प्रवेश
28:28करता है.
28:30मेगनाद की आँखों में जल्ती प्रतिग्या ने रावन के बुझते साहस को पुनह क्रोध की अगनी में बदल दिया.
28:38उसने अपने अस्त्रों को उठा कर उस गुप्त माया जाल का स्मरण किया, जिसे देवताभी भेदने में असमर्थ थे.
28:47लंका की हवाओं में मौत का एक नया और गहरा कमपन दोड़ गया, जो मेगनाद के आने वाले मायावी प्रहार
28:54की आहट थी.
28:56रावन के सामने जुपकर, मेगनाद ने अपनी अटूट निश्था और श्री राम के अंत की भयावः प्रतिग्या ली.
29:04उसका स्वर पूरी सभा में गूज उठा कि वह आज अद्रिश्य बनकर वानर सेना के साथ साथ रगुनात का भी
29:11सर्वनाश करेगा.
29:13उसके हाथों में मौजूद मायावी बानों से निकलने वाली कालिमा ने सभा कक्ष की दीवारों पर डरावनी आकृतिया बना दी.
29:23अंधकार और माया के स्वामी के रूप में मेघनाद ने अपनी शक्तियों का आहवान करना प्रारंभ किया.
29:31लंका के हर कोने में राक्षसों का यह अंतिम योध्धा अपनी विजय का स्वपन देख रहा था.
29:38रावन की भुजाएं फड़क उठीन मानो उसे अपने पुत्र की शक्ती पर अटूट विश्वास हो गया हो.
29:45मेघनाद ने अपने कानों में अपनी विजय की गूंच सुनी और वह रनक्षेत्र की ओर बढ़ने के लिए तयार हुआ.
29:53लंका का वातावन अब पूर्णत रावन के क्रोध और मेघनाद के विशैले संकल्प में समाहित हो गया था.
30:01मायावी मेघनाद ने आकाश की ओर एक द्रिष्टी डाली जहां उसे अपने अगले शिकार राम और लक्षमन की मृत्यु का
30:10चित्र दिखाई दे रहा था.
30:12रावन का शोक अब पूरी तरहे से प्रतिशोध की ज्वाला मुखी में बदल चुका था, जो लंका के पतन को
30:19और निकट ले आया.
30:21युद्ध का अंतिम चरण आरंभ होने वाला था, जहां तर्क और माया के बीच नहीं, बलकि धर्म और अधर्म के
30:29बीच महायुद्ध होना था.
30:31लंका की वह गुंजती हुई शांती अब केवल एक तूफान से पहले की खामोशी थी, जिसे मेघनात का माया भी
30:39रथी भंग करेगा.

Recommended