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पद्म पुराण के इस महा-एपिसोड में देखिए राम-रावण महायुद्ध का वो अंतिम और निर्णायक क्षण जब रावण के कटते हुए मस्तक पुनः उगने के रहस्य से पर्दा उठता है! विभीषण द्वारा नाभि में स्थित गुप्त अमृत कुंड का भेद उजागर होने पर श्रीराम ने कैसे संधान किया ब्रह्मास्त्र का? लंकापति रावण का पतन और उसकी दिव्य मुक्ति की अद्वितीय कथा।

Watch the ultimate climax of the Rama-Ravana war in Padma Purana. Discover the secret of Ravana's immortality, the deployment of the invincible Brahmastra by Lord Rama, and the spiritual liberation of the King of Lanka.

#PadmaPurana #Ramayan #RavanVadh #Brahmastra #LordRama #HinduMythology #Vibhishan #SpiritualStory
Transcript
00:00रन्भूमी में लंकापती रावन का अहंकार उस समय चरम पर पहुँच गया, जब श्री राम के बानों से कट्ते ही
00:07उसके मस्तक पुनह प्रकट होने लगे.
00:10कैलाश परवत पर भगवान शिव अपनी समाधी से आखें खोलते हैं, उनकी मस्तक पर तीसरी आख के साथ श्वेत नील
00:18कांती और जटाओं में चंद्रमा विराजमान है.
00:22श्री राम ने अपनी धनुष की प्रत्यंचा को खीच कर रावन के एक और शीश का सहार किया, लेकिन वहक्षन
00:30भर में ही रक्त और माया से पुनह स्रिजित हो गया.
00:34आकाश में देवगण भयभीत होकर देख रहे हैं, जहां रावन की मायावी शक्ती का प्रभाव दिन के उजाले को भी
00:41मलिन कर रहा है.
00:44युद्ध का विस्तार लंका के चारों और एक ऐसे भयंकर चक्र में परिवर्तित हो गया, जहां पाशान की दीवारे भी
00:51थर्थराने लगी.
00:54वैकुंठ लोक में भगवान विश्नु शेशनात पर विराज मान होकर इस संधर्ष को देख रहे हैं, उनकी चारों भुजाओं में
01:01सुदर्शन चक्र और शंख चमक रहे हैं.
01:06मातली सार्थी ने रथ की गती को तीवर करते हुए प्रभु श्री राम को चेतावनी दी की संध्या का समय
01:12रावन की दानविय माया को असीमित बल प्रदान कर रहा है.
01:17रावन के दशानन रूप से निकलने वाला अट्थास पूरे ब्रहमांड में गूँज रहा है, उसके हर मस्तक के नेत्रों से
01:25अंगारे बरस रहे हैं.
01:28श्री राम की धनुर्विद्या का कौशल भी रावन की अमर्ता के रहस्य के आगे मंद पड़ता दिखाई दे रहा है.
01:36कैलाश पर माता पार्वती का ध्यान भी उस अनिष्ट की आहट से विचलित हो उठा है, जो रावन की माया
01:43फैला रही है.
01:46रणभूमी की धूल में रावन की तलवार का प्रहार धर्ती को चीर रहा है, और चारों और सुक्रामुक के पाशान
01:53खंड बिखर रहे हैं.
01:56वायुमंदल में भारीपन चा गया है, मानो स्रिष्टी का नियम स्वय रावन की अधर्म शक्ती के आगे जुकने को विवश
02:03हो गया हो.
02:05मातली के रत के अश्व अपनी खुरों से अगनी उत्पन कर रहे हैं, जिससे रावन की मायावी चाया को कुछ
02:12समय के लिए पीछे धकेला जा सके.
02:15ब्रहमा जी की सभा में देवगन इस विवश्टा को देख कर चिंतित हैं कि रावन ने अपने वर्दान का दुरुप्योग
02:23करके मर्यादा को भंग कर दिया है.
02:26श्रीराम ने अपने संधान को बदलते हुए ब्रहमास्त्र के आहवान की तैयारी शुरू की है, जिससे रावन का संपून अहंकार
02:34भस्म हो सके.
02:36रावन के दसों मस्तक एक साथ गर्जना कर रहे हैं और उसकी काया से काला धुआ निकर रहा है, जो
02:44आकाश को घेर रहा है.
02:47लंका के मैदान में पाशान स्तंभों के बीच से उठती हुई चिंगारिया उस भीशन युद्ध की गवाह बनी हुई है.
02:56नारद मुनी वीना का वादन रोक कर मंत्रमुग्ध और चिंतित द्रिष्टी से श्री राम के अंतिम प्रहार की प्रतीक्षा कर
03:03रहे हैं.
03:05श्री राम की आखों में अब एक ऐसी दिव्यजवाला जल रही है, जो रावन की माया के अंधेरे को चीरने
03:12के लिए परियाप्थ है.
03:15संध्या की अंतिम किरने समाप्थ होते ही रावन की माया का विस्तार संपूर्न रनक्षेत्र में फैल गया और युद्ध अपने
03:23अंतिम निर्नायक क्षण में प्रवेश कर गया.
03:26रनभूमी के इस गहन संकट काल में महर्शी अगस्त्य ने भगवान श्री राम को सभी चिंताओं से मुक्त करने के
03:33लिए दिव्य आदित्य हरिदय स्तोत्र का आहवान किया.
03:38देवर्शी नारद और आकाश में उपस्थित समस्थ देवता इस महान सूर्य मंत्र के दिव्य प्रभाव को देखने के लिए सांस
03:46रोके हुए हैं.
03:48महर्शी अगस्त्य के मुक्से निकले प्रत्येक वेद मंत्र के साथ सूर्य देव की असीम उर्जा सीधे श्री राम के अस्त्रशस्त्रों
03:56में समाहित होने लगी.
03:59आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ की अलौकिक शक्ती ने रणक्षेत्र के उपर छाई हुई रावन की समस्थ आसुरी माया को
04:06धीरे-धीरे भस्म करना शुरू कर दिया.
04:10भगवान श्री राम ने अपनी आखें बंद करके सूर्य भगवान के उस तेजों में स्वरूप को अपने हृदय में पूरी
04:17तरह से धारण कर लिया.
04:19दिव्य सूर्य उपासना के पूर्ण होते ही श्री राम के भीतर एक ऐसी प्रचंड उजा जागी जिसने ब्रहमांड के समस्थ
04:27सत्यों को आलोकित कर दिया.
04:30सूर्य की सहस्त्र किर्णों का यह तेज अब श्री राम के प्रत्येक श्वास और अंगप्रत्यंग में एक अजे चक्रव्यूह की
04:37भाती प्रजवलित हो रहा था.
04:40यह वह क्षन था जब भौतिक युद्ध अध्यात्म की उस सर्वोच पर्मानन स्थिती में पहुँच गया, जहां विजय और पराजय
04:48का भेद समाप्थ हो गया था.
04:51ठकान और टलेश का पूर्ण रूप से नाश हो जाने के बाद, श्री राम का वह नया रूप देखकर रावन
04:58की सेना में भयंकर खलबली मच गई.
05:01स्वयम ब्रह्मा जी ने आकाश मार्ग से पुष्प वर्षा करते हुए श्री राम के इस अचूक और पवित्र संकल्प की
05:08सराहना की.
05:10श्री राम ने अपनी धनुष की प्रत्यंचा को इस प्रकार खीचा कि उसकी भयंकर टंकार से संपून लंका की धर्ती
05:18हिल उठी.
05:20आदित्य हरिदय स्टोत्र के प्रताप से प्राप्त इस सौर उर्जा ने श्री राम के धनुष पर एक परम दिव्य और
05:26एहसास कराने वाला प्रकाश पुंज उत्पन्न कर दिया.
05:31वानर सेना जो कुछ क्षन पूर्व तक निराशा में डूबी थी, इस अध्भूत सौर प्रकाश को देखकर एक बार फिर
05:38उत्साह से गरज उठी.
05:41जामबवान और हनुमान जी ने दोनों हाथ जोड़ कर इस महान दिव्य अनुष्ठान की सफलता पर भगवान सूर्य और श्री
05:49राम को नमन किया.
05:51श्री राम की अंगुलियों में अब वह कालजई स्थिर्ता आ चुकी थी, जो केवल ब्रहमांड के सर्वोच रक्षकों के पास
05:58ही होती है.
06:01संध्या की वह अंतिम वेला अब रावन के अधर्म के अंत और न्याय के पुनरस्थापना का महान साक्षी बनने जा
06:08रही थी.
06:09समस्त दिशाओं में एक गहरी और पवित्र शान्ती छा गई, मानो प्रकृती भी इस अंतिम एतिहासिक प्रहार की प्रतीक्षा कर
06:18रही हो.
06:19आकाश में तैरते हुए गंधर्व और अपसराय भी अपने दिव्ययंत्रों को थामे इस पावन क्षण के दर्शन हेतु मौन हो
06:27गए.
06:28श्रीराम ने अपने अस्त्र को रावन के विनाश के लिए पूरी तरह से साध लिया, जिससे संपून ब्रहमांड का संतुलन
06:36उसकी ओर केंद्रित हो गया.
06:37इस प्रकार आदित्य हरिदय स्तोत्र से उर्जावान होकर श्रीराम ने कालजई ब्रहमास्त्र को अपने महान धनुष पर संधानित कर लिया
06:48रणभूमी के केंद्र में विभीशन ने त्वरित गती से श्रीराम के निकट पहुँचकर अत्यंत विनमर्ता और व्याकुलता के साथ हाथ
06:56जोड़कर प्रार्थना की
06:59मौन मुद्रा में ध्यानमग्न भगवान विश्नु अपने दिव्य वैकुंठ धाम में जहां अनंत काल का चक्र चल रहा है इस
07:07महासंद्राम के अंतिन ख्षणों को अपनी योग निद्रा से निहार रहे हैं
07:13विभीशन ने कापते हुए स्वर में श्री राम को बताया कि रावन की नाभी में स्थित अमर्त का घड़ा ही
07:19उसकी अमर्ता का एक मात्र आधार है
07:24आकाश मंडल में देवताओं का समूह जो इस द्रिश्य को देख रहा है एक गहरी खामोशी में डूग गया है
07:30क्योंकि रहस्य अब प्रकट होने को है
07:34श्री राम ने गरूर की भांती अपनी द्रिश्टी को तीवर करते हुए रावन के नाभी स्थल पर केंद्रित किया जहां
07:41वहद्दिव्य उर्जा का केंद्र विद्यमान था
07:45कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपनी त्रिनेत्र को खोलते हुए ब्रहमान के उस अमोग सत्य को स्विकार किया जिसे
07:53आज ब्रहमास्त्र के माध्यम से सिद्ध होना था
07:57विभीशन की वानी से निकले इन शब्दों ने रावन के अभेद्य कवच के पीछे छिपे उस रहस्य को उजागर कर
08:04दिया जो स्रिष्टी के निर्मान काल से गुप्ट था
08:08वातावर्ण में एक रहस्य में कमपन उत्पन हुआ, मानो स्वयंकाल भी इस महान रहस्य के अनावरण पर स्थब्ध रह गया
08:16हो
08:17रणभूमी की राख में दबे हुए अवशेशों के उपर से एक ठंडी और भयावा हवा चलने लगी, जो युद्ध के
08:24समाप्त होने का संकेट दे रही थी
08:28गरूर के पंकों की फड़फडाहट जैसी ध्वनी के साथ, श्री राम ने अपने धनुष की प्रत्यंचा को और अधिक खिंचाव
08:35के साथ पीछे खीचा
08:38अमरित को वाशपीकृत करने के लिए अगनि स्वरूप ब्रहमास्त्र की उश्मा अब श्री राम के कर कमलों से निकलने लगी
08:45थी
08:47दसों दिशाओं में यह संदेश फैल गया कि अब रावन के अंत का समय निश्चित है क्योंकि रहस्य का द्वार
08:54खुल चुका है
08:56लंका की पूरी रणभूमी में व्याक्त दुर्गंध और विनाश के बीच सत्य का प्रकाश एक अलोकिक जोत के समान चमक
09:04उठा
09:05ब्रहमा जी के द्वारा प्रदत्त उस वर्दान का अंत अब उनहीं की रचना के विनाश के रूप में होने जा
09:11रहा था
09:13श्री राम ने एक शन के लिए अपनी आखे बंद की और उस दिव्य अमरित की शक्ती को वाश्पित करने
09:20का संकल्प धारण कर लिया
09:22समय का चक्र अब रावन की धड़कनों के साथ तालमेल बिठाते हुए उसे काल के गाल में खीचने के लिए
09:30ततपर था
09:32रन्भूमी के सभी प्राणी, वानर और राक्षस उस अद्रिश्य उर्जा के प्रभाव से एक पल के लिए जमसे गए थे
09:40नारद मुनी ने वीना के तार को छेड़ते हुए एक ऐसी करून और ओजस्वी ध्वनी निकाली जो इस अंतिम युद्ध
09:47के अंत को अंकित कर रही थी
09:50श्री राम का ध्यान अब केवल उस नाभी पर था, जहां ब्रहमांड का सबसे बड़ा जूट अब जलकर भस्म होने
09:58वाला था
09:59तभी ब्रहमांड की समस्थ शक्तिया एक बिंदु पर केंद्रित हो गई और श्री राम ने ब्रहमास्त्र को छोड़ने का अंतिम
10:07संकेत दे दिया
10:09युद्ध क्षेत्र के उपर आकाश में रौरव नरक की ज्वालाओं के समान लाल और काले बादलों का एक भयावः चक्रवात
10:16बन गया है, जो ब्रहमांडिय प्रलय की घोशना कर रहा है
10:22कैलाश परवतपर भगवान शिव ने अपनी त्रिनेत्र द्रिष्टी से इस द्रिष्य को देखते हुए शांत भाव से गंगा की धाराओं
10:29को अपने जटाओं में थाम रखा है
10:33श्री राम ने अपने तरकश से उस दिव्य ब्रहमास्त्र को बाहर निकाला, जिसके स्पर्ष मात्र से संपून रनभूमी एक स्वर्णिम
10:41प्रकाश के आभा मंडल में डूग गई
10:45ब्रहमास्त्र के निकलते ही वायुमंडल में एक गूँच उठी, मानो साक्षात काल ने अपनी अंतिम सांस लेकर इस ब्रहमांड के
10:53नेती की धुरी को स्थिर कर दिया हो
10:56विभीशन अपनी आखों में करुणा और साहस का मिश्रण लिए उस दिव्य अस्त्र की ओर देख रहे हैं क्योंकि वे
11:03जानते हैं कि यह विनाश ही धर्म की पुनरस्थापना है
11:08वैकुंठ लोक में शेश्षाई भगवान विश्णु ने अपनी कमलन्यनी आखों को खोला जैसे वे इस महाविनाश के साक्षी बन रहे
11:16हो
11:18ब्रहमास्त्र की टंकार से रावन का मुकुट काम्प उठा और उसके हृदय में पहली बार उस मृत्यु का भय समा
11:25गया जिसे उसने युगों से पराजित कर रखा था
11:29अंधेरी रौरव नरक की गहराईयों से उठती हुई अगनी शिखाएं श्री राम के उस पावन अस्त्र के साथ एकाकार होकर
11:37एक महातेज का निर्मान कर रही है
11:41श्री राम ने मंत्रों का उच्चारण करते हुए ब्रहमास्त्र पर जल का छिड़काव किया जिससे उस अस्त्र की ज्वाला और
11:48भी अधिक भीशन एवन तेजस्वी हो उठी
11:52गरुर देव अपनी विशाल पंखों के साथ रनभूमी के उपर मडराते हुए इस महायुद्ध के अंतिम क्षणों की गवाही देने
12:00के लिए तयार है
12:03ब्रहमास्त्र की नोक पर अब ब्रहमांड के सारे देवता अपनी उर्जा केंद्रित कर रहे हैं जिससे वह अस्त्र अब एक
12:11साधारन अस्त्र न रहकर काल का ही रूप बन गया है
12:16आकाश का रंग अब गहरा नीला और अगनी के समान नारंगी हो गया है, जो इस बात का प्रतीक है
12:22कि प्रकृती भी इस अंतिम प्रहार की तीवरता सहने को तयार नहीं है
12:28श्रीराम की भुजाओं की नसें इस महान शक्ती के धारन करने से उभराई हैं, मानोवे संपून स्रिष्टी का भार अपने
12:36एक धनुष पर उठा रहे हो
12:39नारग मुनी ने अपनी वीना को एक जोर से जंकृत किया, जिससे उस अस्त्र के चारों और एक सुरक्षा कवच
12:46का निर्मान हो गया ताकि विनाश केवल अधर्म का हो
12:51रनभूमी की धूल अब शान्थ हो गई है, केवल ब्रहमास्त्र की गर्जना ही है, जो दशानन के कानों में मृत्यू
12:58की पच्चाप बनकर गूंज रही है
13:02ब्रहमान्ड की समस्थ शक्तिया एक बिंदु पर एकाग्र हो गई है, और रावन के भीतर का अहमकार अब उस नाभी
13:09के अमरित के सूखने के साथ ही तूटने लगा है
13:13श्रीराम का ध्यान अब केवल उस नाभी पर है, जहां ब्रहमान्ड का सबसे बड़ा जूट अब जलकर भस्म होने वाला
13:21है
13:23ब्रहमास्त्र के चारों और की वायू भारी हो गई है, और धर्ती के भीतर से पत्थरों के तूटने की आवाजें
13:30आने लगी है
13:30मानो रौरव नरक की नीम हिल गई हो
13:34तभी ब्रहमान्ड की समस्थ शक्तिया एक बिंदु पर केंद्रित हो गई और श्रीराम ने ब्रहमास्त्र को छोड़ने का अंतिन संकेत
13:42दे दिया
13:43अब केवल काल का निर्नैशेश है और वह अस्त्र रावन की ओर बढ़ने के लिए पूरी तरह तयार है जिसकी
13:51गुंच से तीनों लोग कांप रहे हैं
13:55श्रीराम ने अपनी धनुष की डोरी पर पहले पावक बान को संधान किया जिसकी अगनी से दिशाएं तपने लगी और
14:03रावन की नाभी के भीतर सुरक्षित अमरित का अस्तित्व संकट में पढ़ गया
14:08वैकुंठ लोक में विराजमान भगवान विश्नु अपनी अनन्त योग निद्रा से नेत्र खोलते हैं और स्रिष्टी के संतुलन के लिए
14:16इस निरनायक ख्षण को अपनी दिव्यद्रिष्टी से निहारते हैं
14:21पावक बार ने एक प्रचंड ज्वाला का रूप धारन किया और रावन के अभेद्य कवच को भेदते हुए सीधे उसकी
14:29नाभी के उस रहस्य में केंद्र पर जा लगा
14:33जैसे ही अगनी ने रावन के अमरित को वाश्पित किया, तीनों लोकों में एक भयानक कमपन उत्पन हुआ, मानों ब्रहमांड
14:41की आधारशिला ही विचलित हो गई हो
14:44रावन के शरीर से निकलने वाली अमरित की वाश्प काले बादलों के रूप में आकाश में विलीन हो गई, जिससे
14:51उसकी अमर्ता का वह अभिशाप सदा के लिए समाप्त हो गया
14:56देवराज इंद्र ने अपने दिव्यरत से इस द्रिश को देख हर्शित होते हुए कहा कि अब काल ने अपना अंतिन
15:03निर्णय ले लिया है
15:06श्रीराम ने अब अपने महाधनुष पर उस स्वर्णिम ब्रहमास्त्र को चड़ाया, जिसके तेज से संपूर्न रणभूमी स्वर्ण के समान दमकने
15:14लगी
15:16ब्रहमास्त्र के चारों और की वायू अब एक चक्रवात का रूप ले चुकी थी, जिसमें जलते हुए नक्षत्रों के कन
15:23घूम रहे थे
15:25पृत्वी के भीतर से रौरव नरक की उन दहक्ती ज्वालाओं की आवाजें आने लगी, जो इस महास्त्र के आगमन का
15:33संकेट दे रही थी
15:35स्वय भगवान शिव ने कैलाश परवत से अपनी तीसरी आख खोल कर इस विनाशकारी क्षण को साक्षे के रूप में
15:43स्विकार किया
15:45श्री राम ने अपनी एक आगरता को ब्रहमांड के उस बिंदु पर केंद्रित किया, जहां समस्थ सक्य और न्याय एक
15:52साथ एकत्रित हो गए थे
15:55वह स्वर्णन ब्रहमास्त्र अब एक अटल प्रतिग्या के समान श्री राम के धनुष से छूटने के लिए तडप रहा था
16:03तीनों लोकों की समस्थ शक्तिया एक बिंदु पर सिमट आईं, जैसे की काल स्वयं एक धनुष की डोरी पर सवार
16:10हो गया हो
16:12नारद मुनी ने अपनी वीना का स्वर्शांत कर दिया और इस एतिहासिक क्षण के लिए मौन होकर सिर जुका लिया
16:21ब्रहमास्त्र के छोडे जाने का अंतिन संकेत मिलते ही श्री राम के चहरे पर एक अभूत पूर्व शांती चा गई
16:29ब्रहमास्त्र ने धनुष को छोड़ते ही एक भयानक गूंज के साथ अंतरिक्ष को चीरना आरंभ कर दिया
16:36रनभूमी की वायू इस अस्त्र की गती से जलने लगी और पत्थरों के तूटने की आवाजे रौरव नरक की गहराईयों
16:44तक गूंजने लगी
16:46अब केवल काल का निर्नय शेश था जो रावन की और एक प्रल्यंकारी अगनिशिखा के रूप में बढ़ रहा था
16:55ब्रहमांड के समस्त देवता उस स्वर्णिम्बान को अपनी ही आँखो के सामने रावन के अंतिम क्षण के साक्षी के रूप
17:02में देख रहे थे
17:04यह वह निर्नायक पल्था जहा न्याय और अधर्म का संधर्ष सदा के लिए समाप्त होने की अंतिम सीही पर आखडा
17:11हुआ
17:13ब्रहमास्त्र की प्रचंड ज्वाला ने लंका के आकाश को चीरते हुए रावन के अभेद्य कवच पर प्रहार किया जिससे लंका
17:20की धर्ती हिल उठी
17:23वैकुंट के स्वर्ण महलों में विराजमान भगवान विश्णु ने अपनी कमलन्यन नेत्रों से इस क्षण को देखा और मंद मुस्कान
17:31के साथ मस्तक जुकाया
17:34देत्यराज रावन की छाती में समाते ही वह दिव्य अस्त्र उसके भीतर के समस्त अधर्म और अहंकार को भस्न करने
17:41लगा
17:42लंका का आकाश भी मानो थम गया जहां हर और केवल विनाश के अंतिम पच्चिहन शेश रह गए थे
17:51ब्रहमांड के रक्षक भगवान विश्नु ने आकाश मार्ग से इस विनाश को अपनी दिव्य द्रिश्टी से पूर्ण किया
17:58स्वय भगवान शिव ने कैलाश की उँचाईयों से अपनी तीसरी आख की ज्वाला को शांत करते हुए इस महासंद्राम के
18:06अंत का आहवान किया
18:09रावन का विशालकाय शरीर एक धराशाई परवत की भांती लंका की धूली में जागिरा और उसके दसो मुखों का दर्प
18:17सदा के लिए शांत हो गया
18:20रनभूमी में व्याप्त वह भयावः शोर एक सन्नाटे में बदल गया जैसे कालने स्वया अपने श्वास रोक लिये हो
18:28देव लोग के निवासी जो अब तक भयभीत थे इस अभूत पूर्व द्रिश को देख विस्मित होकर नमन करने लगे
18:37नारद मुनी ने अपनी वीना को थामते हुए उस अंतिन क्षण का गान करने के लिए अपनी दिव्य द्रिश्टी को
18:43स्थिर किया
18:45आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी जो उस महा विनाश के बाद एक शांतिपूर्ण आभा का प्रतीक थी
18:53यह वहक्षन था जब लंका के कणकण ने एक युग के समापन की गवाही दी
19:00ब्रहमास्त्र की दिव्य उर्जा ने उस स्थान को शुद्ध कर दिया जहां अधर्म का प्रतीक अब केवल राख का धेर
19:07बन चुका था
19:09त्रिदेवों की सभा में एक मौन सहमती थी की न्याय की विजय अनिवार्य थी
19:15रावन के शरीर के पास की धूली भी मानो उस भीशन अगनी की गर्माहट को संजोय हुए थी
19:22यह न केवल एक राक्षस का अंत था बलकि एक ऐसी शक्ती का विसर्जन था जिसने तीनों लोकों को हिला
19:30कर रख दिया था
19:32स्वर्ग के देवता अपनी दिव्यरतों पर सवार होकर इस महानक्षन को अपनी स्मृतियों में अंकित कर रहे थे
19:41इंद्र देव के चहरे पर एक राहत भरी मुस्कान थी जैसे वर्षों का बोज आज समाप्थ हो गया हो
19:49युद्ध क्षेत्र के शांत वातावर्ण में केवल काल का पहिया धीरे धीरे घूम रहा था जो एक नई सुभह की
19:56और संकेत दे रहा था
19:59इस प्रकार लंका का दसमुखी राक्षस जिसने ब्रहमांड को चुनौती दी थी काल के महासागर में सदा के लिए विलीन
20:07हो गया
20:09रनभूमी की धूल जैसे ही शांत हुई रावन के निश्प्रान देह से एक प्रकर और दैविय तेस पुंच सूर्य की
20:16भांती प्रकट होकर आकाश की ओर उठने लगा
20:20वैकुंठ लोक में शेश्या पर विराजमान भगवान विश्णू ने अपने नेत्र खोले और उस विलीन होती आत्मा को अपनी करुणा
20:28भरी द्रिश्टी से निहारा
20:31वह दिव्य जोती ब्रहमांड के समस्ट अवरोधों को पार करती हुई श्री राम के चरण कमलों की ओर तीवर गती
20:38से अग्रसर हो रही थी
20:41प्रकृती का कनकन स्थब्ध था क्योंकी सदियों का द्वेश जो जय और विजय के शाप से उपजा था आज अंत्त
20:48समाप्त होने जा रहा था
20:51श्री राम ने अपनी आखे मूंद कर उस असीम शान्ती का अनुभव किया जिसे वे युगों से पूर्ण करने के
20:58लिए धर्ती पर अवत्रित हुए थे
21:01स्वर्ख से देवराज, इंद्र और अन्य देवता इस अद्वितिय द्रिश को देखकर हाथ जोड़कर अपनी श्रधा अर्पित कर रहे थे
21:10जैसे ही वह प्रकाश पुन श्री राम के चर्णों को स्पर्ष किया, रावन के हृदय में दबी समस्थ असुर्ता प्रेम
21:17और शान्ती में परिवर्तित हो गई
21:21ब्रहमांड के रचिता ब्रहमाजी ने इस द्रिश पर अपनी स्वीकृती की मुहर लगाते हुए काल के पहिये को एक नई
21:28गती प्रदान की
21:30वह जोती रावन की उस आत्मा थी, जिसे अंतह जय के रूप में अपना शापित अस्तित्व त्याग कर मोक्ष प्राप्थ
21:38हुआ था
21:40विभीशन अपनी आखों में अश्रुलिये, अपने भाई के इस अंतिम आध्यात्मिक मिलन को देख रहे थे
21:47श्री राम के श्री चर्णों में समाते ही, रावन के उस दैत्य शरीर से निकली नकारात्मक पूर्जा का नामो निशान
21:55मिट गया
21:56यह वहक्षन था जब धर्म की विजय केवल रावन के वद से नहीं, अपितु उसके उध्धार से पूर्ण हुई
22:04श्री राम के मुख पर एक सौमय मुस्कान थी, जो इस बात का प्रतीक थी कि उन्होंने अपने शत्रु को
22:11भी वही स्थान दिया जो उनके भक्त को प्राप्थ है
22:16देवलोक में गूंजते हुए शंकनाद ने इस ब्रहमांडिय घटना को नमन किया और कालचक्र अपनी शान्ती की ओर लोट गया
22:25आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, जिससे युद्ध क्षेत्र की बंजर भूमी पर एक नई सुगंध और जीवन का
22:32संचार हुआ
22:34शिवाश स्वरूक श्री राम ने अपनी दैविय शक्तियों के साथ रावन के अहंकार को भस्म कर उसे प्रभुचर्णों में शरण
22:42दी
22:44लंका का वहस्थान जो कभी अंधकार और भय का केंद्र था, आज मोक्ष की पावन भूमी में परिवर्तित हो गया
22:52काल के इस प्रवाह ने आज सिद्ध कर दिया कि अंतह सत्य की राही परमशांती की ओर ले जाती है
23:01रावन अब न तो राक्षस था और नहीं कोई विजेता, वह केवल एक आत्मा थी जो अपने मूल स्रोत में
23:08विलीन हो चुकी थी
23:10इस प्रकार रावन का अंतिम अध्याय एक नई और शाश्वत कथा का शुभारंभ बन गया, जो युगो लुगो तक धर्म
23:18की विजय का संदेश देती रहेगी
23:22रणभूमी की राख के बीच लंका की महारानी मंदोदरी अपने अंथीन शोक और व्याकुलता के साथ वीरगती को प्राप्थ हुए
23:30रावन के पार्थिव शरीर के समीग पहुँचती है
23:35महारानी मंदोदरी के नेत्रों से बहते अश्रु उस धरा को भिगो रहे हैं, जहां कभी तीनों लोकों को जीतने वाला
23:42समराट निस्तेज होकर पड़ा है
23:45मंदोदरी का क्रंदन गूंजता है कि कैसे अहमकार की अगनी ने उस ज्यानी को भस्म कर दिया जिसने वेदों का
23:53ज्याता होकर भी अधर्म को चुना
23:56आकाश भी मानो इस महाविनाश के दुख में मूख हो गया है और प्रकृती का प्रत्येक तत्व इस दुखद अंत
24:03के सम्मुक स्थिर खड़ा है
24:06मंदोधरी की दृष्टी रावन के उस मस्तक पर्टी की है जो कभी शिव की स्तुती में लीन था पर आज
24:13अज्यानता की धूल से ढखा हुआ है
24:17देवराज इंद्र के सार्थी मातली आकाश से नीचे उतर कर उस अद्रिश्य शोक को साक्षी बनते हैं जो लंका के
24:24पतन के बाद शेश रह गया है
24:28मंदोधरी के मुख से निकले शब्द एक ऐसे वेदनापूर्ण गीत के समान है जो धर्म के मार्क से भटकने के
24:35घातक परिणामों का वर्णन कर रहे हैं
24:39आमकार का वह स्वर्ण मुकुट जो कभी तीनों लोकों में तेज फैलाता था आज धूल में मिल चुका है और
24:47उसके रत्न भी चमक हो चुके हैं
24:50समग्र लंका की रानिया अपने समराठ की इस दुर्दशा को देख कर विलाप करती हुई रणभूमी के पथ्रीले मैदान की
24:58ओर धीरे धीरे बढ़ती है
25:01भगवान विश्णु के अवतार श्री राम दूर खड़े रहकर इस विलाप को सुनते हैं और करुणा वं मर्यादा के साथ
25:09मंदोधरी के दुखों को अनुभव करते हैं
25:13मंदोधरी की उंगलिया रावन के मस्तक को छूकर उस अतीत को याद करती हैं जब वह संसार का सबसे शक्तिशाली
25:21और ज्यानी समराथ हुआ करता था
25:24चारों और व्याप्त सन्नाटा इस बात की गवाही दे रहा है कि शक्ति का मद अंत में मनुष्य को केवल
25:30शूने में ही खड़ा करता है
25:34लंकानगरी के उंचे द्वार अब शांत हैं और उनकी भव्यता पर भी आज रावन के निधन का एक गहरा काला
25:41आवर्ण छा गया है
25:44मन्दोदरी की आखों में पश्चाताप के आसू हैं जो बताती हैं कि सत्ता का नशा अपनों को भी पराया और
25:51विनाश का मार्ग प्रशस्त करता है
25:55प्रित्वी का कंकन रावन के शरीर से निकलती अंतिम उर्जा का साक्षी बन रहा है जो धीरे धीरे ब्रहमांड के
26:02मूलतत्व में विलीन हो रही है
26:05इस दुखद घड़ी में केवल वेदों के शलोख ही मंदोदरी के कानों में गूंज रहे हैं जो जीवन की नशवर्ता
26:13का सत्य बार-बार दोहरा रही है
26:17रनभूमी की सीमा पर खड़ी मंदोदरी के साथ अन्यरानिया भी अपने सौभाग्य के अंत का शोक मनाते हुए प्रित्वी पर
26:25बैठ जाती है
26:27विभीशन अपने आखों में विविश्टा लिये दूर खड़े हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह विनाश अनिवार्य था किन्तु फिर
26:35भी हृदय में एक रिक्टता है
26:39मंदोधरी की एक लंबी आह के साथ उस युग का अंत पूर्ण हो जाता है जिसने धर्म और अधर्म के
26:45द्वंद्व को अपनी आखों से देखा था
26:49अंधकार में डूबी हुई रणभूमी पर अब केवल सितारों की एक मध्धम रोश्नी है जो आने वाले एक शांत कल
26:56की प्रतीक्षा कर रही है
27:00रणभूमी के शांत सन्नाटे में प्रभू श्रीराम ने विभीशन के कंधे पर हाथ रखा जो अभी भी अपने भाई के
27:07पार्थिव शरीर को देख कर स्तब्ध थे
27:11भगवान विश्नु का दिव्य स्वरूप अद्रिश्य रूप से उसक्षन को देख रहा था जैसे धर्म का पहिया पुन्ह अपनी धुरी
27:18पर लोट रहा हो
27:20श्रीराम ने मंद स्वर में कहा कि शत्रूओं का बैर केवल उनके प्राणों तक ही सीमित होता है
27:26मृत्यू के पश्चात कोई भी शत्रू नहीं रहता
27:31आकाश में तैरते तारे जैसे उस अंतिन संस्कार की पवित्रता के साक्षी बन रहे थे
27:36जो अब लंका के नए युग की नीम्व थी
27:40विभीशन ने कापते हाथों से जलते हुए चिता को नमन किया
27:44क्योंकि धर्म का पालन ही उनके जीवन का एक मात्र सत्य था
27:50स्वयन देवराज इंद्र के सार्थी मातली जो अब तक मौन थे
27:54श्री राम की आज्या की प्रतीक्षा में सम्मान पूर्वक खड़े रहे
27:59श्री राम ने अपनी आज्यादी की लंका का राज्याभिशेक अब पूरी वैदिक विधिविधान के साथ
28:05समुद्र के पवित्र जल से किया जाएं
28:09अंधेरी लंका के उस शांट आंगन में मानो प्रकृती स्वयन एक महान परिवर्तन की प्रतीक्षा में थम गई हो
28:18विभीशन के मुख पर धर्म और कुल के प्रतीकर्तव्यका वह मिश्रन था जिसे केवल एक सच्चा राजा ही समझ सकता
28:25था
28:26समुद्र के शीतल जल से भरे स्वर्णिन कलश को जब उठाया गया तो उसकी चमक ने अंधकार को कुछ क्षणों
28:34के लिए चीर दिया
28:36श्री राम के साक्षात निर्देश पर लंका के समस्त वानर और विभीशन के सहयोगी मस्तक जुकाये खड़े हो गए
28:44यह वह क्षण था जब लंका का इतिहास एक रक्त रंजित पन्ने से बदल कर एक शांति पूर्ण अध्याय में
28:51प्रवेश कर रहा था
28:54विभीशन के मस्तक पर तिलक की वह रेखा धर्म की विजय का वह संकेत थी जिसकी प्रतीक्षा लंका के देवता
29:01सदियों से कर रहे थे
29:04लंका की पवित्र वास्तुकला जो अब तक अधर्म के बोज से दबी थी आज एक नए राजा के स्वागत के
29:11लिए पुनह जागरित हो उठी
29:14देवराज इंद्र ने स्वर्ग से इस राज्याभिशेक का अवलोकन किया और उनका हृदय एक नई आशा से भर गया
29:23राज्याभिशेक के उस पवित्र जल की बूंदे जब लंका की धरापर गिरी तो वहां की नकारात्मक उर्जाक्षन भर में उज़ल
29:30होने लगी
29:32श्रीराम ने मंद मुसकान के साथ विभीशन का हाथ ठाम कर उन्हें सिनहासन की ओर अग्रसर किया जैसे कोई गुरू
29:40अपने शिश्य को मार्ग दिखा रहा हो
29:43आकाश के नक्षत्रों ने भी मानो उस नए सूर्य की उदे की प्रतीक्षा में अपनी चमक को और अधिक प्रखर
29:50कर लिया था
29:52अधर्मी रावन की छाया से मुक्त लंका का गौरव आज फिर से एक धर्म प्रायन राजा के हाथों में सुरक्षित
29:59था
30:01विभीशन का राज्याभिशेक केवल एक सत्ता का परिवर्तन नहीं था, बलकि वह उस धर्मयुध का अंतिम और सबसे पावन पड़ाव
30:09था
30:11धर्म के इस दिव्य अधिष्ठान के पश्चात, प्रभु श्री राम ने शांत ग्रिष्टी से विस्तीन स्वर्ण लंका के प्रासादों और
30:19दूर स्थित अशोक वाटिका की ओर देखा
30:22श्री राम ने अपने प्रिय भक्त पवन पुत्र हनुमान को अपने समीप बुलाया, जिनके नेत्रों में सेवा और भक्ती का
30:30पावन समुद्र उमड रहा था
30:32प्रभु ने हनुमान के कंधों पर अपना वर्देहस्त रखते हुए कहा कि वे ततकाल अशोक वाटिका जाकर जनकनन्दिनी सीता को
30:41इस महाविजय की शुब सूच ना दें
30:44श्रीराम के मुख से निकले ये वचन वायुपुत्र के लिए संसार के समस्त सुखों और एश्वरियों से भी कहीं अधिक
30:51मुलिवान सिध्ध हुए
30:54प्रभु की आग्या को शिरोधार्यकर महाबली हनुमान ने एक शन का भी विलंब न करते हुए आकाश मार्ग की और
31:02एक दिव्य छलांग लगाई
31:04वायु के समान तीवर गती से उरते हुए कपिश्रिष्ट के मन में केवल मा जानकी के दर्शन और उनके कश्टों
31:12के अंत की मधुर कलपनाएं तैर रही थी
31:15शन भर में ही वे अशोक वाटिका के उस पावन परिसर में जा पहुँचे जहां सघन व्रिक्षों के बीच मा
31:22सीता का पवित्र साननिध्य विद्यमान था
31:26वह विहंगम अशोक वाटिका जो कभी भय और रुदन की साक्षी थी आज स्वतंत्रता और नवजीवन की सुगंध से महक
31:34उठी थी
31:36दूर एक विशाल शिंशपा व्रिक्ष के नीचे तपस्विनी के वेश में बैठी देवी सीता एकाग्रचित्थ होकर केवल श्री राम के
31:44पावन स्वरूप का ध्यान कर रही थी
31:48हनुमान ने अत्यंत विनमर्ता और कोमल कद्मों से आगे बढ़कर जगत जन्नी जानकी के चर्णों में नत्मस्तक होकर वंदन किया
31:57देवी सीता ने अपने सम्मुक रामदूत को देखकर विस्मित और कृतग्य भाव से पूछा कि क्या उनके प्राणनात सकुषल है
32:07हनुमान ने हाथ जोड़कर गदगद कंट से घोशना की की प्रभू श्री राम ने दुराचारी रावन का वधकर धर्म की
32:14विजय पता का फहरा दी है
32:17यह सुनते ही जानकी के नेत्रों से अविरल आनंदाश्रुबह निकले और युगों का संताप क्षण भर में बिलीन हो गया
32:26वे कुछ क्षणों तक अवाक रह गई क्योंकि इस असीम आनंद के बदले हनुमान को देने के लिए उनके पास
32:33कोई योग्य वस्तु न थी
32:36सीता ने सजल ननों से कहा कि तीनों लोकों का समस्त स्वर्ण और रत्न भी इस सुखद समवाद के मूल्य
32:43के सम्मुख तुछ है
32:46अशोक वाटिका की वे राक्षसिया जिन्होंने कभी सीता को प्रताडित किया था भयभीत होकर एक कोने में सिमट गई
32:55परंतु दयामेई जानकी ने उन्हें अभयदान देते हुए कहा कि जो केवल आग्या के अधीन थे वे अब किसी भी
33:03दंड के पात्र नहीं है
33:06हनुमान ने माता की अगाद करुना को देखकर पुनह नमन किया और प्रभु श्रीराम के पास लोटने की आग्या मांगी
33:15माता सीता ने अपने प्रिय पुत्र हनुमान को चिरंजीवी होने का आशिरवाद देकर श्रीराम से शीघर मिलन की अभिलाशा व्यक्त
33:23की
33:24हृदय में नव आशा का दीप जलाए पवन पुत्र उस पावन मिलन की अंतिन बेला तैयार करने के लिए पुनह
33:31श्रीराम की और प्रस्थान कर गए

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