लंका विजय के बाद का वो अनकहा सत्य! जब श्रीराम ने माता सीता के सामने रखी एक कठिन शर्त। क्या थी वो अग्नि-परीक्षा और क्यों कांप उठे थे तीनों लोक? पद्म पुराण के इस रहस्यमय अध्याय में देखिए रावण-वध के बाद का संपूर्ण दृश्य। #PadmaPurana #Ramayan #SitaAgniPariksha #HinduMythology #SpiritualJourney #RamayanaFacts #SanatanDharma
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00:00रावन का विशालकाय शरीर प्रित्वी पर गिरते ही लंका की धर्ती हिल उठी और आकाश से गिरता हुआ रक्तपात अचानक
00:08थम गया।
00:09वैकुंठ लोक में विराजमान भगवान विश्नु का शान्त मुख मंडल इस विनाश के अंत को देख रहा था जहां उनके
00:17नैनों में एक गहरी करुणा और ब्रहमांडिय संतुलन की शान्ती जलक रही थी।
00:39एक अद्रिश्य विदाई की तरहे चारों और बिखर रही है।
00:44विभीशन अपनी आखों में बहते आसुओं के साथ अपने भाई के मृत शरीर के निकट खड़े होकर नेती के इस
00:52कुरूर चक्र को निहार रहे हैं।
00:54कैलाश परवत पर भगवान शिव की तीसरी आख बंध है।
00:59मानोवे संपूर्ण लंका के इस भीशन सन्नाटे में छिपे हुए सत्यका ध्यान कर रहे हो।
01:06वानर सेना के वीर योध्धा शस्त्रत्याक कर जमीन पर बैठ गए हैं। मानोवे जीत की खुशी से अधिक किसी अज्यात
01:14भविश्य की आशंका में डूबे हूं।
01:17लंका के खंधरों के उपर एक काला बादल स्थिर हो गया है, जो इस सन्नाटे को और अधिक रहस्यमई और
01:24भारी बना रहा है।
01:27हनुमान जी श्रीराम के पीछे एक स्तंभ की तरहे खड़े हैं, उनके चहरे की दृड़ता इस सन्नाटे को चीरने वाली
01:35एक मात्र उर्जा है।
01:37स्वर्ग से देवतागन अद्रिश्य रूप में लंका की ओर देख रहे हैं, उनकी दिव्य आभा इस अंधेरी युद्ध भूमी पर
01:45एक अनोखी चमक बिखेर रही है।
01:48श्री राम ने धीरे से अपनी आखें बंद की और अगनी की उस पवित्र साक्षी को याद किया, जो अब
01:55परीक्षा की अगनी के रूप में उनके समक्ष आने वाली है।
02:00पूरे लंका द्वीब पर एक ऐसा सन्नाटा पसर गया है, मानो प्रकृती भी किसी बड़ी घटना के घटित होने की
02:08प्रतीक्षा कर रही हो।
02:10सुगरीव और अंगड ने एक दूसरे की ओर देखा और सिर जुका लिया, क्योंकि वे जान गए थे कि अब
02:17धर्म और मर्यादा की असली परीक्षा शुरू होने वाली है।
02:22नारद मुनी वीना के तारों पर एक मध्धम स्वर छेड रही हैं, जिसकी गूंज में विजय का हर्ष कम और
02:29विरह की करुणा अधिक सुनाई दे रही है।
02:33लंका की स्वर्ण द्वारिका के अवशेशों के बीच अगनी के लप्तें अब धीमी पढ़कर केवल एक दिव्यतेज के रूप में
02:41शेश रह गई हैं।
02:43वातावर्ण में एक रहस्य में कमपन उत्पन हो रहा है, जो संकेप दे रहा है कि लंका का विनाश मात्र
02:51एक पड़ाव था, अंतिन गंतव्य नहीं।
02:54दूर कहीं सीता मया का ध्यान करते हुए श्री राम के हृदय में एक गहरा द्वंद्व चल रहा है, जो
03:01उनके शांत चहरे पर लकीरों के रूप में अंकित है।
03:06भगवान ब्रह्मा का स्वरूप भी इस सन्नाटे में एक मौन दर्शक बना हुआ है, जो स्रिष्टी की व्यवस्था में अनिवार्य
03:13बदलाव को देख रहे हैं।
03:17रनभूमी की धूल जमने लगी है, और युद्ध की गूंज अब केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गई
03:23है।
03:25सब कुछ शांत है, लेकिन यह शांती माता सीता की अगनिप्रीक्षा के आने वाले ज्वलंत क्षणों की पूर्वसूचना मात्र है।
03:34लंका की स्वर्णमे प्राचीरें अब युद्ध की ज्वाला से शांत होकर एक नई व्यवस्था की प्रतीक्षा में स्थिर खड़ी हैं।
03:44विश्णु लोक में भगवान विश्णु अपने शेशनाग के आसन पर विराज मान होकर इस परिवर्तन को अपनी दिव्यद रिष्टी से
03:52निहार रही हैं।
03:55हनुमान जी के विशालकाय और बलशाली हाथों ने लंका के तूटे हुए द्वारों को पुनः व्यवस्थित करना आरंभ कर दिया
04:02है।
04:04सुग्रीव अपनी वानर सेना के साथ नगर के हर कोने से युद्ध के अवशेशों को हटा कर शांती के वातावर्ण
04:11को स्थापित कर रहे हैं।
04:14विभीशन की आँखों में लंका के प्रती प्रेम और अपने कुल के प्रती किये गए त्याग का द्वंद्वस पष्ट दिखाई
04:21दे रहा है।
04:23भगवान श्री राम ने स्वय विभीशन को राज्या अभिशेक के लिए आमंत्रित कर उन्हें लंका के नवीन शासक के रूप
04:30में स्विकार किया है।
04:33वानर वीर लक्षमन की सहायता से पवित्र नदियों के जल से सुवर्ण कलश को अभिमंत्रित कर विभीशन के मस्तक पर
04:41अभिशेक करते हैं।
04:43लंका का आकाश दिव्य प्रकाश से जग्मगा उठा है, जैसे स्वयन प्रकृती इस नवीन राजा को अपनी स्विकृती दे रही
04:51हो।
04:53राम दूत हनुमान ने विभीशन के मस्तक पर तिलत लगा कर उन्हें न्याय और धर्म के पत पर चलने का
05:00संकल्प दिलाया है।
05:02गरुर देव उपर आकाश में अपनी विशाल पंखों से मंदरा रहे हैं, मानो इस राज्याभिशेक को इश्वरिय सुरक्षा प्रदान कर
05:11रहे हूं।
05:12लंका की प्रजा, जो अब तक भय में थी, विभीशन को अपने राजा के रूप में देखकर भयमुक्त हो रही
05:20है।
05:21यह राज्याभिशेक केवल एक सत्ता का परिवर्तन नहीं, बलकि अधर्म पर धर्म की विजय का अंतिन प्रमान है।
05:30विभीशन ने लंका के सिनहासन पर बैठकर श्रीराम के चर्णों में अपना मस्तक जुका कर कृतग्यता व्यक्त की है।
05:38शिव जी कैलाश की एकांत उंचाईयों से इस घटनाकरम को देखते हुए मुस्कुरा रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि
05:47काल का चक्र अब क्या मांगता है।
05:50महल के प्रांगण में सुग्रीव ने विजय का शंक बजाया है, जिसकी गूझ लंका के हर परवत और गुफा तक
05:57पहुँच रही है।
05:59शांत वातावर्ण में अब केवल पवन की सरसराहट है, जो किसी अन्होनी की आहट सी लग रही है।
06:07राम के चहरे की गंभीरता यह दर्शारही है कि युद्ध जीतना तो मात्र एक सोपान था, असली अगनिप्रीक्षा अभिशेश है।
06:18माता सीता का ध्यान करते हुए श्री राम की अंतरात्मा में एक तीवर व्याकुलता का संचार हो रहा है।
06:26विभीशन ने लंका की कमान संभालते ही सबसे पहले श्री राम की आग्या से माता सीता की खोज की व्यवस्था
06:34की है।
06:35लंका अब शान्त है, लेकिन यह सन्नाटा किसी प्रल्यकारी निर्णय की आहट की भानती गूज रहा है।
06:44लंका के उस विशाल स्वर्णग्वार को आज विभीशन के आदेश पर पहली बार जनसाधारन के लिए खोल दिया गया है।
06:52अशोक वाटिका में उपस्थित दिव्यरिशियों ने माता सीता को उनकी अग्निशुधता की परीक्षा हेतु आमंत्रित किया।
07:01माता सीता का मुख मंडल जो अभी तक विरह की अग्नी में तप रहा था, अब प्रभु श्री राम के
07:08दर्शन की आशा से पुनह दमक उठा है।
07:12वातावर्ण में एक अलोकिक सन्नाटा चाया हुआ है, मानो संपूर्ण स्रिष्टी अपनी सांसे रोक कर इस मिलन का साक्षी बनने
07:20को आतुर हो।
07:22वानर सेना के वीर योध्धाव ने कतार बद्ध होकर माता के मार्ग को फूलों से सुसज्जित कर दिया है।
07:30भगवान विश्णु का सूक्ष्म रूप लिये हुए पवनपुत्र हनुमान माता के चर्णों में जुपकर उन्हें सादर प्रणाम कर रहे हैं।
07:40सीता जी की प्रत्येक चाल में मर्यादा और सन्यम की पराकाश्ठा स्पष्ट दिखाई दे रही है।
07:48विभीशन अपनी लंका की स्वर्ण नगरी को आज श्रीराम के चर्णों की धूल से धन्य होता देख रहे हैं।
07:55दूर क्षितिज से आ रही मंध हवाओं में श्रीराम के धनुष की टंकार अब एक शांत संगीत की भांती सुनाई
08:03दे रही है।
08:05गरुर देव उपर आकाश में मंदरा रहे हैं, जैसे वे देवों को माता सीता के आगमन की सूचना दे रहे
08:12हूं।
08:14वानर राज सुग्रीव ने अपनी वीर्ता को भूल कर माता सीता के आगमन पर मस्तक जुका लिया है।
08:22अशोक वाटिका के व्रिक्ष आज हवा के साथ एक विशेश लय में जूम रहे हैं, मानो वे भी माता के
08:29विदाई का रागगा रहे हूं।
08:31संपूर्न रनभूमी अब युद्ध की विभीशिका से मुक्त होकर एक आध्यात्मिक सभा के समान प्रतीत हो रही है।
08:40श्री राम ने अपनी द्रिश्टी को नीचे जुका रखा है, उनके हिदय में प्रेम और मर्यादा के बीच का द्वंदवतीव
08:48रहे।
08:49माता सीता ने एक गहरी सांस ली और अपने प्रियतम की ओर एक व्याकुल द्रिश्टी डाली।
08:57वातावर्ण में उपस्थित सभी देवगण अब अपने विमानों से इस अगनि प्रीक्षा के पल को निहार रहे हैं।
09:05लंका की वह पावन मिट्टी भी आज माता के चर्नों का स्पर्ष पाकर पुनर जीवित हो उठी है।
09:13रिशी मुनियों के मंत्रों चार से लंका का वातावर्ण शुद्ध और पवित्र हो चला है।
09:19माता सीता के मुख पर विद्यमान तेज से ऐसा लग रहा है, मानों साक्षात अगनि देव भी उन्हें स्विकारने को
09:27तत्पर हैं।
09:30युद्ध का अंतिम अध्याय अब अगनि प्रीक्षा के रूप में खुलने जा रहा है, जहां सत्य और पवित्रता की विजय
09:37सुनिश्चित है।
09:39लंका के तट पर सन्नाटा ऐसा है, जैसे समय स्वय अपनी सांसे ठाम कर खड़ा हो, जहां दूर दूर तक
09:46केवल राख और जलते हुए महलों का धुआ फैला है।
09:51दिव्य सभा में विराजमान देवगन और वानर सेना स्तब्ध हैं, क्योंकि श्रीराम की आखों में प्रेम के स्थान पर एक
09:59अप्रत्याशित और भीशन कठोर्ता द्रिष्टिगोचर हो रही है।
10:04सीता की ओर बढ़ते हुए प्रभु श्रीराम के चरण लंका की भूमी पर भारी पड़ रहे हैं, मानो उनके हृदय
10:11का कोई आंतरिक द्वंध्व संपून प्रकृती को हिला रहा हो।
10:16वातावर्ण में एक रहस्यमय कमपन है, जहां अगनी के समान पवित्र सीता खड़ी हैं, और प्रभु का मस्तक एक गहरी
10:24उलजन और लोक मर्यादा के भार से जुका हुआ है।
10:29श्री राम ने अपनी वानी को कठोर करते हुए कहा, हे वैदेही, मैंने शत्रु का विनाश अपनी मर्यादा हेतु किया
10:36है, परन्तु तुम्हारा कलंकित होना मेरे कुल के लिए एक प्रश्न चिन्ह है।
10:42विभीशन का मुख भय और विस्मय से पीला पड़ गया है, वे अपने कानों पर विश्वास नहीं कर पा रहे
10:49कि यह वही श्री राम हैं जिन्होंने अभी तक केवल करुणा का मार्ग अपनाया था।
10:55वानर राज सुगरीव और हनुमान ने अपना मस्तक जुका लिया है, क्योंकि वे प्रभु के इस अलौकिक कठोर रूप के
11:03पीछे छिपे गहन सत्य को समझने में असमर्थ हैं।
11:08लंका की हवाओं में एक ऐसा भारीपन है, मानो संपूर्ण ब्रहमांड की अगनी एक साथ एकत्रित हो गई हो, जो
11:16परीक्षा की वेदी बनने को आतुर है।
11:19श्रीराम की आवाज पुनह गूंजी और उन्होंने सीता के चरित्र पर सार्वजनिक प्रशन उठाते हुए उन्हें अपनी पवित्रता सिध करने
11:28का आदेश दिया।
11:30देवराज इंद्र और अन्य देवतागन आकाश से इस द्रिश्य को देख रहे हैं, उनकी आखों में सीता की मर्यादा को
11:38लेकर एक मुख प्रार्थना है।
11:40माता सीता के मुख पर तनिक भी क्रोध नहीं है, अपितु एक अलौकिक शांती है, जो किसी भी अगनी को
11:48शीतल करने की शक्ती रखती है।
11:52चारों और फैले हुए पत्थरों और भस्न के बीच माता सीता के पद चिन्हों पर मानोस्वय धर्म अनकित हो रहा
11:59हो।
12:01श्रीराम ने अपनी द्रिष्टी फेल ली है, उनके भी तरका वह पुरुशत्व जो राजा के धर्म और पती के प्रेम
12:08के बीच जूज रहा है, स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है।
12:13वानर सेना के बीच का सन्नाटा ऐसा है कि यदि एक सुई भी गिरे तो उसकी गूंच दूर तक सुनाई
12:19दे, सब इस अगनिप्रीक्षा की प्रतीक्षा में हैं।
12:24सीता ने लखन लाल की ओर देखा और एक मूख संकेट से अगनिकुंड तैयार करने का आगरह किया, जो उनके
12:32सत्य की अंतिम कसोटी बनेगा।
12:35लंका की धर्ती पर एक विशाल अगनिकुंड का निर्मान हो रहा है, जिसकी लप्टें आकाश को चूमने के लिए आतुर
12:43प्रतीत हो रही हैं।
12:45श्री राम का कठोर व्यवहार अब एक दहकते हुए अंगारे के समान है, जो सत्य की परीक्षा लेने से पूर्व
12:53सब कुछ भस्म कर देने को उद्यत है।
12:57देवर्शी नारद वीना बजाना भूल गए हैं और केवल इस द्रिश्य को एक महाकाव्य की अगली पंक्तियों के रूप में
13:04देख रहे हैं।
13:07सीता ने उस अगनी की ओर अपना पहला कदम बढ़ाया है, जिसे वे अपनी पवित्रता की साक्षी मानती हैं।
13:15अगने प्रीक्षा की वेदी तयार है और अब लंका का यह सननाटा किसी भी क्षन उस दैविय शक्ती के उद्गोश
13:23में बदलने वाला है।
13:25लंका का विशाल प्रांगन उस दिव्य अगनी की उश्मा से तप रहा है, जहां राम की मर्यादा का कठोर सत्य
13:33संपून स्रिष्टी के लिए एक मुख प्रश्न बन चुका है।
13:37भगवान विश्नु बैकुंट के अपने दिव्य सिनहासन पर विराज मान होकर इस मार्मिक शन को देख रहे हैं। उनके मुख
13:45पर धर्म की जटिलता का गंभीर भाव अंकित है।
13:50श्रीराम ने अपनी कमपकपाती द्रिष्टी को सीता के द्रिढ कदमों पर टिका रखा है। क्योंकि उनका ह्रदय एक पती के
13:57प्रेम और एक राजा के धर्म के बीच विदीर्न हो रहा है।
14:03सन्नाटा इतना गहरा है कि केवल हवाओं का क्रंदन सुनाई दे रहा है। मानुस्वयन प्रकृती भी इस अगनी प्रीक्षा के
14:10निर्ने पर स्तब्ध हो गई हो।
14:13समुद्र के उस पार देवर्शी नारत की मौन वीना इस सत्य को गूंज रही है कि भविश्य के राजाओं को
14:20न्याय की कठोरता का पाठ इसी अगनी से मिलेगा।
14:24गहवर में विराजमान भगवान शिव का तीसरा नेत्र उस अगनी की तीवर्ता को माप रहा है, जो धर्म की प्रतिष्ठा
14:32के लिए प्रज्वलित की गई है।
14:35अगनी की लप्टें सीता के वस्त्रों को स्पर्ष कर रही हैं, जैसे वे स्वय माता की पवित्रता की गवाही देने
14:42के लिए अधीर हो उठी हों।
14:45प्रतीकात्मक रूप से यह अगनी केवल सीता की शुचिता नहीं, बलकि लंका के विनाश के बाद एक नए युग की
14:53आधार्शिला रख रही है।
14:56नारद मुनी के मन में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या प्रेम का त्याग करना ही सबसे बड़ा धर्म
15:02है जो इस कल्युक तक प्रतिध्वनित होगा।
15:05गरुर देव उपर आकाश से देख रहे हैं कि किस प्रकार एक राजा अपनी प्रजा के लिए अपने निजी जीवन
15:13के सबसे प्रिय अंश को आहुती दे रहा है।
15:17अगनी की वेदी के चारों और का वातावर्ण भारी हो गया है और लंका के काले पत्थर भी इस दैविय
15:24परीक्षा की गंभीरता से काम उठे हैं।
15:28अगनी के भीतर से उठती हुई दिव्य तरंगे एक ऐसी शान्ती का संदेश दे रही हैं जो इस विनाशकारी युद्ध
15:36की अंतिम कड़ी है।
15:38श्री राम ने अपनी बाहें खोल कर मानो अगनी को ही आदेश दिया है कि वह सत्य के उस आलोग
15:45को बाहर लाएं जिसे संसार देखना चाहता है।
15:50देवता गन स्वर्ग से पुश्प वर्शा कर रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह अगनि प्रीक्षा इस प्रित्वी के
15:57इतिहास का सबसे बड़ा आदर्श बनने वाली है।
16:02सीता के पच्चेहन राख पर अनकित हो रहे हैं जो आने वाली पीढियों के लिए मर्यादा की एक नई इबारत
16:09लिखने जा रहे हैं।
16:12सन्नाटा अब अपने चरम पर है और लंका के स्तंभ उस महानक्षन के साक्षी बन रहे हैं जहां धर्म ने
16:19मानविय समवेदनाओं पर विजय प्राप्त की है।
16:23भगवान विश्नु अपनी मुस्कान के साथ संकेट दे रहे हैं कि यह परीक्षा केवल अगनी की नहीं बलकि राम के
16:31धैर्यकी भी है।
16:33लंका की हवाओं में अब रावन के अहंकार का नामों निशान नहीं, बल्कि केवल राम की सत्यनिष्ठा की गूंच सुनाई
16:41दे रही है
16:43सीता के चारों और की ज्वालाएं अब शांत हो रही हैं, जैसे वे स्वया उनकी पवित्रता को नमन कर रही
16:50हूं
16:52इस महाकाव्य के इस अध्याय का अंत मर्यादा की उस नीम पर हुआ है, जिसने लंका की राख से धर्म
16:59का एक नया सूर्य उदे किया है
17:02लंका की युद्ध भूमी के केंद्र में अगनी के प्रचंड ताप के बीच माता सीता का मुख मंडल ब्रहम तेज
17:09से दमक रहा है और वे पूर्ण शांत है
17:14आकाश से भगवान विश्नु अपने शेशनाग शया पर विराज मान होकर इस अलौकिक द्रिश को निहार रहे हैं
17:21उनके मुख पर एक गंभीर और करुनामई मुस्कान है
17:26माता सीता ने लक्षमन की ओर अपना मस्तक जुका कर उन्हें धर्म की मर्यादा के पालन हेतु अगनी प्रजवलित करने
17:34का आदेश दिया
17:36अगनी की लप्टे धीरे धीरे उपर उठने लगी और वातावर्ण में एक अलौकिक सन्नाटा व्याप्थ हो गया जैसे स्वयन स्रिष्टी
17:44अपनी सांसे थामे खडी हो
17:47मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम के नेत्रों से बहते अश्रु अगनी की साक्षी में उस अटूट विश्वास का प्रमान दे रहे
17:54हैं जो शब्दों से परे हैं
17:58देवराज इंद्र ने अपने दिव्यरत पर आरूढ होकर स्वर्गलोक से इस पवित्र अगनि प्रीक्षा का अवलोकन करना आरंभ किया
18:07सीता माता ने मंत्रों का उच्चार करते हुए अगनी के कुंड की तीन परिक्रमा पूरी की और उनका तेज सूर्य
18:15से भी अधिक देदी प्यमान हो उठा
18:18अगनी देव स्वय अपनी साक्षात उपस्थिती में लप्टों के भीतर से एक प्रकाश पुंज के रूप में प्रगट हो रहे
18:25हैं
18:27लंका का वह तप्ट क्षेत्र अब अगनी के दिव्य प्रभाव से स्वर्ण में प्रतीत हो रहा है और वहां का
18:34वातावर्ण दिव्य उर्जा से भर गया है
18:38शिव के गण और देवतागन आकाश से पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं जो सीधे अगनी के उस पवित्र कुंड
18:45पर गिर रहे हैं
18:48माता सीता का एक पग अब अगनी की प्रथम लहरों को स्पर्ष कर रहा है और अगनी उनकी शुद्धता से
18:54शीतल हो रही है
18:57अगनी का वह कुंड अब किसी दिव्य सिन्हासन के समान शोभायमान है जिस पर माता सीता निर्भय होकर विराजमान हो
19:05गई है
19:07भगवान शिव अपने कैलाश शिखर से समाधी खोल कर इस अगनी प्रीक्षा के सत्य को ब्रहमांड के कल्यान हेतु स्विकार
19:15कर रहे हैं
19:17स्वर्ग के देवता मंत्र मुग्ध होकर देख रहे हैं कि कैसे अगनी सीता का स्पर्ष पाकर स्वयन एक शांत तालाप
19:25की भांती शीतल हो गई है
19:28सीता माता अगनी के मध्य से उठकर बाहर आ रही हैं उनका शरीर अब पहले से भी अधिक दैविय तेज
19:36से उतप्रोत है
19:38वह क्षन काल को स्थब्ध करने वाला है जब अगनी देव स्वयन सीता की पवित्रता की गवाही देते हुए राम
19:45के सम्मुख उपस्थित होते हैं
19:49ब्रह्मा जी अपनी चार भुजाओं और गौरवशाली श्वेत वस्त्रों में लंका के आकाश पर उपस्थित होकर इस महान धर्म युद्ध
19:57के अंत की पुष्टी कर रही है
20:00राम के चहरे पर अब वह कठोर मर्यादा का भाव पिघल रहा है और उनके नेत्रों में केवल अपार प्रेम
20:07और श्रधा का सागर है
20:10अगनी कुंड की शेश बची राख अब हवाओं में मिलकर ब्रहमांड में सत्य की विजय का उद्गोश कर रही है
20:19लंका की इस भूमी पर जहां कल तक अधर्न का बोलबाला था आज सत्य की अगनी ने एक नए युग
20:26का मार्ग प्रशस्त कर दिया है
20:29लंका की युद्ध भूमी पर स्थापित वेदी के चारों और का वातावर्ण स्तब्ध है
20:34जहां राख का धुआ अब आकाश में एक विशाल स्वर्ण रेखा की भांती फैल रहा है
20:41स्वर्ग लोक से भगवान विश्णु अपने शेशनाग पर विराज मान होकर इस अलौकिक द्रिश्य को शांत और गंभीर द्रिश्टी से
20:49निहार रहे है
20:51माता सीता ने एक गहरी सांस ली और अपने संकल्प की अगनी को साक्षी मान कर उस प्रजवलित वेदी की
20:59ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ाए
21:02वेदी के अगनी शिखाएं पवन के जोकों के साथ नृत्य कर रही हैं जैसे वे स्वय माता की पवित्रता का
21:09गुनगान कर रही हो
21:11वानर सेना के नायक हनुमान जी जो दूर खड़े हैं अपनी आखों में अश्रुलिये माता की अटूट निष्ठा को प्रणाम
21:19कर रहे हैं
21:22देवराज इंद्र अपने सिन्हासन पर बैठे देवताओं के साथ मिलकर इस अगनि प्रीक्षा के अंतिम चरण की प्रतीक्षा में विचलित
21:30से हो रही हैं
21:33माता सीता वेदी के बिलकुल समीग पहुँच गई हैं और उनकी सात्विक आभा के सामने लप्टे भी शीतल प्रतीत हो
21:40रही हैं
21:42हवा में घुली हुई सुगंध और वेदी से निकलती दिव्य उर्जा ब्रहमांड के हरकन को एक नई चेतना प्रदान कर
21:50रही हैं
21:52भग्वान शिव कैलाश से अपनी तीसरी आख की मंद चमक के साथ ब्रहमांड के इस सत्य संधर्ष को ध्यानावस्था में
22:00देख रहे हैं
22:02श्री राम ने अपनी भुजाएं छाती से बांध ली हैं और उनके भीतर का द्वंद्व अब परम शांती में परिवर्तित
22:09हो चुका है
22:12सीता ने अपने नेत्र मूंद लिये हैं और वे उस परम सत्य का आहवान कर रही हैं जो युगों तक
22:18मानवता का पत प्रशस्थ करेगा
22:22ब्रहमांड के सभी देवता एक स्वर में प्रार्थना कर रहे हैं कि सत्य की अगनी आज फिर से मर्यादा का
22:29मान स्थापित करे
22:31जैसे ही माता सीता ने अगनी में प्रवेश करने का पहला चरण रखा लप्टे एक रक्षा कवच की भांती उनके
22:38चारों और सिमट गई
22:41स्वर्ग से पुष्पों की वर्षा होने लगी है मानो प्रकृती स्वयं इस पवित्रता के साक्षी के रूप में अपनी भेंट
22:48अरपन कर रही हो
22:50गरुर देव अपनी विशाल पंखों को फड़फडाते हुए आकाश से नीचे उतर रहे हैं उनकी द्रिष्टी में माता के प्रति
22:58अपार आदर है
23:01अगनी की वेदी अब स्वर्ण के समान चमक रही है और वहां का हर पत्थर किसी प्राचीन मंत्र की तरह
23:07स्पंदित हो रहा है
23:10श्री राम के चहरे पर अब एक मधुर मुस्कान है जो यह स्पष्ट कर रही है कि वे सत्य की
23:17शक्ती से भली भानती परिचित है
23:20संपूर्ण वातावर्ण एक अद्भुत मौन में विलीन हो गया है जहां केवल अगनी के चटकने की मधुर ध्वनी सुनाई दे
23:28रही है
23:30अगनी परीक्षा का यह क्षण इतिहास के पन्नों पर नहीं बलकि समय की चेतना पर हमेशा के लिए अनकित हो
23:37गया है
23:39माता सीता अगनी की लप्टों के बीच से निकल कर इस प्रकार उभर रही है जैसे सूर्य बादलों को चीर
23:46कर बाहर आता है
23:49दसों दिशाओं में व्याप्त सन्नाटा अचानक एक दिव्यस पंदन के साथ थर्थराने लगा
23:55मानो स्वयन स्रिष्टी अपने प्राणों का साक्षे देने हेतु उपस्थित हो रही हो
24:01अगनी की वेदी के ठीक उपर त्रिलोक के स्वामी भगवान विश्नु का वैकुंट से सीधा प्रक्षे पन हुआ
24:07जहां वे शेशनाग की शया पर विराजमान शांत मुगरा में इस परीक्षा के साक्षी बने
24:14अगनी की प्रचंड लप्तें अब सुनहरी आभा में परिवर्तित हो चुकी हैं और धीरे धीरे एक अलोकिक आकार धारण कर
24:22रही है
24:24संपूर्न रणभूमी एक दिव्य प्रकाश से नहा उठी जैसे नक्षत्रों ने अपनी पूरी उर्जा एक केंद्र बिंदू पर केंद्रित कर
24:32दी हो
24:34धुएं के आवर्ण को चीरते हुए स्वय अगनिदेव अपने तेजस्वी स्वरूप में माता सीता को अपनी भुजाओं में धारण किये
24:42हुए प्रकट हुए
24:44स्रिष्टी के रच्चिता ब्रहमाजी जो स्वयम ब्रहम लोग से इस परीक्षा को देख रहे थे उनके चहरे पर सत्य के
24:51विजय का असीम संतोष परिलक्षित हो रहा था
24:56अगनिदेव की लप्टे माता सीता के वस्त्रों को स्पर्श कर रही है परंतु उनकी पवित्रता के तेज के आगे अगनी
25:03भी थंडी प्रतीत हो रही है
25:06यह वहक्षन था जब समय की गती थम गई और लंका की धूल भी माता की शुधता के समक्ष नत्मस्तक
25:13हो गई
25:15अगनिदेव ने अपनी दिव्यवानी में उद्धोश किया कि माता सीता की शुचिता वेदों और विचाओं की तरह अडिग है
25:24देवराज इंद्र और अन्य देवतागन स्वर्गलोग की उचाईयों से पुष्पों की वर्षा कर रहे थे
25:30वातावर्ण में एक अद्रिश्य संगीत गूंजने लगा
25:34माता सीता की आँखों में लंका के विनाश का कोई खेद नहीं
25:39बलकि अपने प्रभु के प्रती अटूट विश्वास की चमक विद्यमान थी
25:43इस रहस्यमय सन्नाटे के बीच अगनिदेव ने उन्हें श्रीराम के सम्मुख लाकर सादर समर्पित किया
25:52श्रीराम की आखों से बहे आसूओं की बूंदों ने उस उष्णता को भी करुणा से भर दिया
25:58जो अब तक केवल विनाश की साक्षी थी
26:02अगनिदेव ने स्वयं को एक दीप की भांती लप्टों में समेटा और आकाश की ओर विलीन हो गए अपना कार्य
26:09पूर्ण करके
26:11संपूर्ण वातावर्ण अब दिव्य सुगंद से भर गया है जो किसी भी प्रकार के संशय के अंत का सूचक है
26:20देवर्शी नारद वीना के तारों को छेड़ते हुए इस पावन घटना का गुनगान करने के लिए तैयार हो रहे हैं
26:29भूमी पर गिरे उन अगनी के कणोंने जहां माता सीता के चरण पड़े थे स्वर्ण के फूलों का रूप ले
26:36लिया
26:37यह अगनी प्रीक्षा मात्र एक अगनी प्रवेश नहीं था अपितु युगों युगों के लिए सत्य के मार्ग का एक प्रकाश
26:45तंभ बन गया
26:46अब केवल शान्ती बची है जहां कल तक रक्त और क्रोध का आधिपत्य था वहां अब केवल एक अलौकिक पवित्रता
26:54का वास है
26:57कहानी अब उस सत्य के अगले अध्याय की ओर बढ़ रही है जहां से लंका की राख पर धर्म का
27:03पुरुत्थान आरंभ होगा
27:06लंका की धधक्ती अगनी शान्त हुई और अगनिदेव स्वय माता सीता को सुरक्षित लेकर श्री राम के समक्ष प्रकट हुए
27:15अगनिदेव ने अपनी पवित्रता का प्रमान देते हुए माता सीता को श्री राम को सौपा और आकाश से पुष्पों की
27:22वर्षा होने लगी
27:24श्री राम की आखों में सजल प्रेम और कृतग्यता का भाव था जो युगों के संशय को एक पल में
27:31मिटा देने के लिए परियाप्थ था
27:34चारू दिशाओं में दिव्यता का संचार हुआ जैसे ब्रहमांड का हरकन इस पावन पुनर्मिलन का साक्षी बन रहा हो
27:42वानर सेना और विभीशन जो अब तक मौन थे इस अलोकिक द्रिश्य को देखकर आनंद से भर उठे
27:51ब्रहमा और अन्य देवगन अपनी दिव्य सभा में इस क्षण का अभिशेक करने के लिए उपस्थित हुए
27:58मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम ने माता सीता का हाथ थामा और उस पर्ष में संपून स्रिष्टी की शांती सिमट आई
28:07वायु देव ने शीतल मंद सुगंधित पवन चला कर वातावर्ण को और भी अधिक पवित्र बना दिया
28:14श्री राम ने अपनी पतनी को पुनह स्विकार करते हुए उन्हें आलिंगन बद्ध किया जिससे धर्म की पुनह स्थापना का
28:22मार्ग प्रशस्थ हुआ
28:24देवराज इंद्र ने आकाश से नंदन कानन के पुश्पों की वर्शा की जिसका सुगंध पूरे धरातल को महका गया
28:33वानर राज सुग्रीव और हनुमान ने अपने आराध्य के चर्मों में जुक कर अपना शीष नवाया
28:40सन्नाटा जो कल तक लंका के भाय का प्रतीक था आज वह परम आनंद और शान्ती का गीत गा रहा
28:47है
28:49अग्निदेव ने अपना कार्य पूर्ण होने पर श्रीराम को प्रणाम किया और पुनह अपने लोग को प्रस्थान किया
28:57देवर्शी नारद ने अपनी वीना पर एक अत्यंत मधुर और पवित्र राग छेड़ा जिसे सुनकर समस्त नक्षत्र भी थम गए
29:06श्रीराम ने समस्त वानर सेना के प्रती अपनी कृतग्यता व्यक्त की जिन्होंने धर्म के लिए अपना सर्वस्व नियोचावर कर दिया
29:14था
29:15धूल और राख के नीचे से अब धर्म के उदे के अंकुर फूट रहे थे जो एक नए युक का
29:22संकेत थे
29:24विभीशन ने लंका के सिन्हासन को अब धर्म के अनुकूल चलाने का संकल्प लिया श्रीराम के आशिर्वाद से
29:32ब्रहमांड के सभी देवता गंधर्वों के साथ मिलकर श्रीराम की स्तुती में मगन हो गए
29:39माता सीता और श्रीराम की जोड़ी अब उस पूर्णता को प्राप्त कर चुकी थी जो मानवता के लिए सदा प्रेणा
29:46बनी रहेगी
29:48लंका का वह रहस्यमय सन्नाटा अब केवल एक सन्नाटा नहीं बलकि धर्म की विजय का एक स्वर्णिम अध्याय बन चुका
29:56था
29:57लंका के तटपर समुद्र के उपर सूर्य की प्रथम किरने स्वर्णिम आभा बिखेर रही थी जहां विभीशन के अनुरोध पर
30:05कुबेर का दिव्य पुश्पक विमान अवत्रित हुआ
30:09देवराज इंद्र ने आकाश मार्ग से इस अलोकिक द्रिश्य को देखते हुए विनमर भाव से हाथ जोड कर श्री राम
30:16की विजय का अभिवादन किया
30:19वानर सेना के वीर योध्धाओं ने अपनी आखों में हर्ष के आसूलिये प्रभु श्री राम के जैगोश से पूरे आकाश
30:27को गुणजायमान कर दिया
30:29पुश्पक विमान की आभा ने चारों ओर के वातावर्ण को एक दैविय उर्जा से भर दिया
30:35मानो प्रकृती स्वय धर्म की इस विजय गाथा को लिपिबध कर रही हो
30:40श्री राम ने अपनी धर्म पतनी माता सीता का हाथ ठाम कर उन्हें पुश्पक विमान के रत्नजडित सोपान पर चढ़ने
30:48हेतु संकेत दिया
30:51गरुर देव स्वय आकाश में उर्ते हुए इस दिवय यात्रा की सुरक्षा के लिए विमान के चारों और चक्कर लगा
30:58रहे थे
30:59लक्षमन जी ने अत्यंत सतर्पता के साथ धनुष धारण किये हुए विमान के द्वार पर अपना स्थान ग्रहन किया
31:08विमान के चारों और खिले हुए दिव्य पुष्पों ने लंका की उस रनभूमी को एक शांत वाटिका के समान सुगंधित
31:15कर दिया
31:17आकाश से देवता, गंधर्व और सिधगन इस दुलब यात्रा को देखने के लिए पुष्पों की वर्षा कर रहे थे
31:25ब्रह्मा जी के मानस पुत्र देवर्शी नारद अपनी वीना पर विजय के गीत गाते हुए विमान के मार्ग का मार्ग
31:32गर्शन कर रहे थे
31:34माता सीता ने एक बार पीछे मुड़कर लंका की ओर देखा, जहां अभी भी उस भीशन युद्ध के अंत के
31:41बाद का मौन छाया हुआ था
31:44पुष्पक विमान ने जैसे ही उडान भरी, उसकी गती से समुद्र के जल में एक सुन्दर तरंग उत्पन हो गई
31:53हनुमान जी और सुग्रीव सहित समस्त वानर दल ने विमान के पीछे दौरते हुए अपने आराध्य को भावपूर्ण विदाई दी
32:02विमान अब लंका के उपर से निकल कर उन परवतों की ओर बढ़ रहा था, जहां से वे अयोध्या के
32:08लिए प्रस्थान करने वाले थे
32:21अद्रिश शक्तियों का एक सुरक्षा कवच विमान के चारों और निर्मित हो गया, जिससे मार्ग की सभी बाधाय स्वतह ही
32:29दूर हो गई
32:31लक्षमन जी ने विमान की खिड़की से बाहर देखते हुए श्री राम को उस मार्ग की याद दिलाई जिससे वे
32:37वनवास के समय गए थे
32:40वातावर्ण में एक दिव्य शान्ती का अनुभव हो रहा था, जो उस महान अधर्म के अंत के बाद एक नई
32:47शुचिता का संकेत था
32:50पुश्पक विमान अब बादलों की उँचाईयों को चीरते हुए अयोध्या की ओर अग्रसर था, जहां धर्म की पुनरस्थापना के लिए
32:58नए युग का सूत्रपात होने वाला था
33:01अयोध्या के आकाश में देवताओं ने पुनः शंकनात किया, जिससे यह स्पष्ठ हो गया कि प्रभु श्रीराम का पुनरागमन अब
33:09अत्यंत निकट है