पद्म पुराण अध्याय 16: देखिये कैसे पंचवटी में शूर्पणखा के आगमन से रामायण का सबसे दर्दनाक मोड़ आया! लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के नासिका छेदन से लेकर खर-दूषण के 14,000 राक्षसों के विनाश, मारीच के स्वर्ण मृग छल और रावण द्वारा देवी सीता के छलपूर्वक अपहरण की संपूर्ण पौराणिक गाथा। जानिए कैसे जटायु ने अपने प्राणों की बाहुति देकर धर्म की रक्षा की। #PadmaPurana #ShriRam #SitaHaran #Ravana #PuranicStories #HinduMythology
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00:00पंच्वटी के हृदय में जहां गोदावरी की निर्मल धारा बहती थी, श्री राम, देवी, सीता और लक्षमन अपनी कुटिया में
00:08शान्ती और धर्म का पालन करते हुए वनवास का जीवन बिता रहे थे।
00:13वनदेवी भी उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर नित्य नए पुश्पों से उनकी कुटिया को सजाती थी, मानो प्रकृती स्वयं उनकी
00:22सेवा में लीन हो।
00:43इतने वातावर्ण में एक सुक्ष्म कमपन पैदा कर दिया हो।
00:47सहसा उसकी द्रिष्टी उस अनुपम पुरुष पर पड़ी, जिनकी आभा तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाली थी, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम।
00:57श्रीराम के दिवे सौंदर्य को देख कर शूरपणखा का हरिदय काम के बानों से विद्ध हो गया और वह ततकाल
01:04उन पर मोहित हो उठी।
01:07अपने विक्राल रूप को त्याग कर उसने एक अती मोहिनी सुंदरी युवती का रूप धारन करने का निश्चय किया ताकि
01:15वह श्रीराम को रिजा सके।
01:18शन भर में वायुमंदल में एक जादूई प्रकाश फैला और शूरपणखा का राक्षसी देह एक दिव्य लावन्यमी स्त्री में बदल
01:26गया।
01:27अब वह एक ऐसी अध्भुत सुंदरी थी जिसके रूप सौंदर्य की तुलना में अपसराय भी फीकी पड़ जाएं और वह
01:35इतराते हुए श्रीराम के समीप आने लगी।
01:39श्रीराम ने उसे आते देखा, उनके शांत मुख मंडल पर एक हलकी सी जिग्यासा उभी, किन्तु उनकी मर्यादा कभी भंग
01:47नहीं होती।
01:49शूर्पन्खा ने अपने शब्दों और शारिरिक हावभाव से श्रीराम को मोहित करने का प्रयास किया, अपनी आखों में गहरा अनुराग
01:57भरकर वह उनके सामने खडी हुई।
02:00पंच्वटी की पवित्रता पर उसके कामांध प्रस्ताव की छाया मंडराने लगी, मानो एक अपवित्र इच्छा ने वहां के वातावर्ण को
02:09दूशित करना चाहा हो।
02:12शूरपनखा ने निर्लजटा से श्री राम को अपने पती के रूप में स्विकार करने का प्रस्ताव रखा, यह जानते हुए
02:19भी कि वे विवाहित हैं और सीता उनकी सहधर्मिनी हैं।
02:24श्री राम ने धैर्य पूर्वक उसे समझाया कि वे विवाहित हैं और उनकी पत्नी सीता उनके साथ हैं
02:32आथवे ऐसा कोई संबंध स्विकार नहीं कर सकते
02:36किन्तु कामांध शूरपनखा ने देवी सीता के अस्तित्व को पूरी तरह से नकारते हुए
02:42श्री राम को अपने प्रेम जाल में फसाने का असफल प्रयास जारी रखा
02:47उसके अनुचित और हटपूर्ण प्रस्ताव से वातावर्ण में तनाव बढ़ गया
02:52मानो प्रकृती भी इस अधर्म को देखकर स्थब्ध रह गई हो
02:57उसने श्री राम को पाने की जिद में सीता को अपने मार्ग से हटाने की धमकी तक देडाली अपने कुटिल
03:04इरादों को स्पष्ट करते हुए
03:07श्री राम ने अब भी अपनी शांत मुद्रा बनाये रखी किन्तु उनकी द्रिष्टी एक पल के लिए लक्षमन पर पड़ी
03:14जिसमें एक मूख आदेश छिपा था
03:18श्री राम का संकेट पाते ही लक्षमन जो अब तक धैर्य पूर्वक सब कुछ देख रहे थे मर्यादा की रक्षा
03:25हेतु ततकाल आगे बढ़े
03:28इस प्रकार पंच्वटी की पुन्य भूमी पर एक नए संधर्ष की प्रस्तावना लिखी जा रही थी जिसका परिणाम रावन के
03:36विनाश की ओर एक महत्वपूर्ण कदम साबित होना था
03:40लक्षमन के आगे बढ़ते ही शूर्पन्खा के विमोहित मुख पर सहसा क्रोध की रक्तरेखाएं उभराई
03:48अपने आकर्षन को निश्फल होता देख शूर्पन्खा को लगा जैसे उसके अहंकार को भीशन आघात पहुँचा हो
03:56उसकी मोहक देह में अचानक एक अमानविय शक्ती का संचार हुआ और उसकी सुन्दर्ता विक्राल रूप में बदलने लगी
04:05पंच्वटी का शांत वातावर्ण अब उसके क्रोध की अशुब पूर्जा से दूशित होने लगा था जैसे कोई भीशन आधी आने
04:13वाली हो
04:26अपने विक्राल रूप में गरचते हुए उसने राम और लक्षमन को धिक्कारा और उनकी पत्नियों को खाने की धमकी दी
04:35क्रोध से अंधी हो वह बिजली की गती से सीता की ओर जपती मानों उन्हें क्षन भर में निगल जाना
04:42चाहती हो
04:44किन्तु मर्यादा के रक्षक लक्षमन ने एक पल भी नगवाते हुए सीता की ओर बढ़ती उस राक्षसी के मार्ग में
04:51चट्टान की भाती स्वयं को खड़ा कर दिया
04:55धर्म की रक्षा हेतु लक्षमन ने अपनी तीवर तलवार म्यान से खींच ली जिसकी चमक पंचवटी के वनों में क्षन
05:03भर को कौंध उठी
05:05श्री राम ने इस द्रिश्य को शांत भाव से देखा उनकी आखों में लक्षमन के त्वरित निर्नय पर मौन स्विक्रिती
05:12थी
05:14लक्षमन ने बिना किसी हिचकी चाहट के क्रोध से भरी शूर्पणखा को अपनी द्रिढ भुजाओं में कस लिया उसकी राक्षसी
05:21शक्ती को निश्क्रिय करते हुए
05:24यह केवल एक राक्षसी का दमन नहीं था, अपितु अहंकार और दुराचार पर मर्यादा की विजाय का प्रतीक बनने वाला
05:32था
05:33एक स्विफ्ट और सटीक वार से लक्षमन ने शूर्पणखा के मान और मद की प्रतीक उसकी नासिका और कर्ण काट
05:41डाले
05:43पीडा और अपमान से विचलित होकर शूर्पणखा ने एक हृध्यविदारक चीख मारी जिससे पंचवटी के व्रिक्ष भी काप उठे
05:52उसकी नासिका और कर्ण से बहतारक्त भूमी पर गिरा जो पंचवटी की हरीभरी भूमी पर एक गहरा अशुभ निशान छोड़
06:00गया
06:01यह घटना केवल एक दंड नहीं थी अपितु एक ऐसे बीज का रोपन था जो भविश में रावन के विनाश
06:09का विशाल विशाल व्रिक्ष बनने वाला था
06:12अपने अपमान और वेदना से त्रस्ट शूरपन्खा पंचवटी के वनों में चीखती हुई भागी उसका विक्राल रूप अब और भी
06:20भयानत लग रहा था
06:23श्रीराम और लक्षमन ने उसकी चीखती हुई आकरिती को तब तक देखा जब तक वह घने व्रिक्षों में अद्रिश नहीं
06:30हो गई
06:32देवी सीता जो इस पूरी घटना की साक्षी थी ने अब एक गहरी सांस ली उनके मुख पर राहत और
06:39थोड़ी चिन्ता के भाव थे
06:42पंच्वटी में पुनः शांती चा गई थी किन्तु यह शांती एक गहरी तूफानी चेतावनी थी जो आने वाले भयंकर युद्ध
06:50की प्रस्तावना लिख रही थी
06:53पंच्वटी में पसरी शांती के कुछ क्षणों पश्चा थी घने वन से होते हुए एक चीखती हुई आकरिती भाग रही
07:01थी जो शूरपनखा थी जिसका क्षत्विक्षत चेहरा और कटा हुआ मान उसके भीतर एक भयानक प्रतिशोध की अगनी प्रजवलित कर
07:10चुका था
07:11पीडा से कराहती शूरपनखा ने अंतह जनस्थान में अपने भाई खर और दूशन के विशालकाय दर्बार में प्रवेश किया जहां
07:20रक्ट से सनी हुई वह उनके चर्णों में गिर पड़ी
07:24अपनी बहन की इस दैनिय दशा को देख खर का रक्ट खॉल उठा और वह अपनी गर्जना से पूरे राक्षसी
07:31दर्बार को हिलाते हुए इस अपमान का कारण जानने के लिए दहार उठा
07:37शत्विक्षत शूर्पन खाने कापते हाथों से पंच्वटी की ओर इशारा करते हुए अपने साथ हुए अपमान का विलाप करते हुए
07:45श्री राम और लक्षमन को अपने क्रोधित शब्दों से अभिशापित किया
07:50बहन का कष्ट और उसके कटू वचन सुनकर दूशन ने ततकाल युद्ध का बिगुल बजाने का आदेश दिया उसकी आखों
07:58में बदला लेने की क्रूर ज्वाला धधक रही थी
08:03राक्षसी सेना के एकत्रित होते ही त्रिशिरा एक अन्य पराक्रमी सेनापती खर और दूशन के साथ खड़ा होकर क्रोधित स्वर
08:11में अपनी युद्ध की घोशना करता है
08:15हजारो राक्षस योद्धा अपनी अपनी भयानक तलवारें, गदाएं और धनुशलिये युद्ध के लिए तयार हो रहे थे
08:23उनकी आखों में प्रतिशोध की आग जल रही थी
08:2714,000 राक्षसों की सेना, भयानक गर्जना और युद्ध के ड्रमों की धमक के साथ पंचवटी की ओर मार्च करने
08:35लगी, उनकी चाल में प्रित्वी भी काप उठी
08:39उनकी पच्चाप से वन काप रहा था, और जल्द ही राक्षसी सेना पंचवटी के शांत किनारों पर पहुँच गई, जहां
08:47श्रीराम, सीता और लक्षमन अपनी कुटिया में निवास कर रहे थे
08:52पंचवटी में श्रीराम और लक्षमन ने अचानक आई इस अशांती और आसन्न खत्रे को महसूस किया, उनके मुख पर गंभीरता
09:01और चिंता के भाव उभर आए
09:04संकट को भाम पकर, श्रीराम ने ततकाल लक्षमन को सीता की रक्षा करने का आदेश दिया, और स्वय अपना दिव्य
09:12धनुष और तीक्षन बान लेकर युद्ध के लिए तत्पर हो गए
09:17देवी सीता अपने प्राणनात को युद्ध के लिए तैयार होते देख, गहरी चिंता में डूब गई, उनके मुख पर भय
09:24और प्रार्थना के भाव स्पष्ट थे
09:28राक्षसी सेना का अग्रभाग एक भयंकर गर्जना के साथ पंचवटी के वनों में तूट पड़ा, और श्री राम अकेले ही
09:36इस विशालकाय दानवी शक्ती के सम्मुख खड़े हो गए
09:40अदमे क्रोध और दिव्य शक्ती से उतप्रोत श्री राम ने बिजली की गती से बानों की वर्षा कर राक्षसों की
09:47पंप्ती को चीरना आरंभ कर दिया
09:51अपनी सेना को गिर्ता देख, खर स्वयं एक विशालकाय गदालिये हुए, प्रचंड गर्जना के साथ श्री राम पर तूट पड़ा,
09:59उसके चहरे पर प्रतिशोध की कुरूरता स्पष्ट थी
10:03खर के साथ ही दूशन भी अपनी तीक्षन गदालिये, श्री राम को दूसरी ओर से घेरने का प्रयास करता हुआ,
10:10एक भयंकर द्विधरुविय आक्रमन शुरू कर देता है
10:15दिव्य शक्ती और अतुलनिय पराक्रम से युक्त श्री राम ने अकेले ही 14,000 राक्षसों की सेना को तहसन हस
10:22करना शुरू कर दिया, युद्ध भूमी लाशों से पट गई
10:27अपने भाईयों खर और दूशन को संकट में देख, त्रिशिरा ने अपने तीन शीर्षों से आग उगलते हुए, श्री राम
10:35को चुनोती दी, उसकी आखों में एक नई प्रतिशोध की ज्वाला जल रही थी
10:40तक पश्चात, श्री राम और त्रिशिरा के बीच एक भयंकर द्वंदव छिड़ गया, जिसमें बानों की वर्षा, तलवारों की जंकार
10:49और राक्षसी चीखों से पूरा वन गूंज गुठा
10:53अंतह अपने सभी पराक्रमी भाईयों को खोकर और स्वयं गंभीर रूप से घायल होकर, खर और दूशन दोनों ही युद्धभूमी
11:01में धराशाई हो गए, उनकी गर्जना शांत पड़ गई
11:05अपने सभी पराक्रमी भाईयों को खोकर और स्वयं गंभीर रूप से घायल होकर त्रिशिरा ने श्री राम के सम्मुख अंतिन
11:13सांस ली उसके नेत्रों में पराजय का भय और क्रोध स्पष्ट था
11:19इस महासनहार को देख कर स्वर्ग में बैठे देवताओं ने श्री राम की अदमे वीर्ता की प्रशंसा में पुश्पवर्शा की
11:27उनके मुखमंडल पर संतोश और जयगोश की आभाथी
11:32ततपश्चात श्री राम ने शेश बचे हुए 14,000 राक्षसों के विरुध अपने बानों की ऐसी वर्शा की की पूरी
11:39रणभूमी क्षन भर में राक्षसों के रक्त और मृत शरीरों से पट गई
11:43कुछ ही घंटों में श्री राम ने अकेले ही पूरी राक्षस सेना का सहार कर दिया और पंच्वटी का वनक्षेत्र
11:52उनके दिव्य पराक्रम का साक्षी बन गया
11:56संपूर्ण दनकारण्य वनक्षेत्र अब राक्षसों के शवों से भरा पड़ा था जहां कभी उनका आतंक था वहाँ अब श्री राम
12:04के शौर्य की गाथा गूंज रही थी
12:08देवलोक में बैठे त्रिमूर्ती ब्रह्मा, विश्नु और महेश ने श्री राम के इस अध्वितिय पराक्रम को देखकर एक दूसरे की
12:16ओर देखकर संतोश व्यक्त किया
12:19अपना दिव्यधनुष नीचे रखते हुए, श्री राम ने शान्त मन से युद्धभूमी का अवलोकन किया, उनके मुख पर विजय का
12:27कोई अहंकार नहीं, बलकि कर्तव्यपालन की संतुष्टी थी
12:32सूर्य की अंतिम किर्णे युद्धभूमी पर पड़ रही थी, और श्री राम का तेजस्वी स्वरूप उस विनाशकारी द्रिश में आशा
12:40और धर्म की किरण बनकर चमक रहा था
12:43कार्य समाप्त कर, श्री राम का हृदय अब सीता और लक्षमन की सुरक्षा की ओर मुर गया, और वे अपनी
12:50कुटिया की दिशा में लोट चले
12:53गुफा के भीतर, लक्षमन और देवी सीता ने बाहर की भयंकर गर्जनाओ का शांत पर जाना महसूस किया, उनके चहरों
13:01पर धीरे-धीरे राहत की लकीरें उभराई
13:05जैसे ही श्री राम गुफा के द्वार पर पहुँचे, उनके तेजस्वी आगमन से अंधकार में गुफा भी प्रकाश में हो
13:13उठी और उनका आभामंडल चमक उठा
13:16श्री राम ने शांत भाव से सीता और लक्षमन को देखा, उनके मौन आश्वासन से ही सब भय और चिंताए
13:24दूर हो गई, जैसे कोई तूफान शांत हो गया हो
13:28उसी क्षन शूर्पन खा, जिसने अपना अपमान भुलाया नहीं था, शत्विक्षत अवस्था में युद्ध भूमी में पहुँची और अपने भाईयों
13:37के मृत शरीरों को देखकर क्रोध से भर उठी
13:41उसका हृदय प्रतिशोध की अगनी से धधक उठा, जब उसने महसूस किया कि उसका सारा परिवार और सेना श्रीराम के
13:50हाथों नश्ट हो गई है
13:52अब उसके मन में केवल एक ही विचार था, लंकापती रावन को इस अपमान और विनाश की सूचना देना, ताकि
14:00वह अपने भाईयों का प्रतिशोध ले सके
14:04विक्राल रूप धारण कर शूरपणखा आकाश मार्ग से लंका की ओर उड़ चली, उसके मन में श्रीराम के प्रति असीन
14:12घ्रेना और प्रतिशोध की ज्वाला प्रजवलित थी
14:16शीघ्रही वह सागर पार कर वैभवशाली लंका नगरी के उपर से गुजरी जहां रावन के स्वर्ण महल सूर्य की किर्णों
14:24में चमक रहे थे
14:26शूर्पन्खा सीधे रावन के भव्य दर्बार में पहुची, जहां वह अपने मंत्रियों और दर्बारियों के बीच बैठा था
14:34उसकी अनुपस्थिती और क्षत्विक्षत रूप देखकर सब आश्चर्यचकित थे
14:40भयंकर क्रोध और अपमान से कापते हुए, शूर्पन्खा ने रावन के समक्ष अपनी दुर्गती और दंड कारण्य में हुए विनाश
14:48का पूरा वृत्तांत सुनाया
14:50उसकी बाते सुनकर रावन का क्रोध भड़क उठा, उसकी आखें लाल हो गई और उसके दस सिरों से प्रतिशोध की
14:59लप्टे निकलने लगी, जो आगामी भयानक घटनाओं का संकेत था
15:05शूर्पन्खा ने रावन की असावधानी और कामांधता पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि जो राजा अपने गुप्तचरों से विहीन
15:13और व्यस्नों में डूबा रहता है, उसका विनाश निश्चित है
15:18रावन के दस सिर अचरज और क्रोध से उसकी ओर देखने लगे, जब शूर्पन्खा ने ललकारते हुए पूछा की जनस्थान
15:26में 14,000 राक्षसों के सहार की सूचना भी उसे अब तक क्यो नहीं मिली
15:32शूर्पन्खा ने अपने क्षत्विक्षत हाथों को उठा कर श्री राम के अद्भुत धनुर विद्या का वर्णन किया, जिसने पलक जपकते
15:40ही खर और दूशन जैसे महाबली सेनाप्तियों का अंत कर दिया
15:45दर्बार में पसरे भयावह सन्नाटे के बीच रावन की दस जोडी आखों में प्रतिशोध की अगनी धधक उठी जबकी मंत्रियों
15:53के चहरे भय से पीले पड़ गए
15:56रावन के अहंकार को पूरी तरह उकसाने के लिए शूर्पन्खा ने अब अपनी रणनीती बदली और दंड कारण्य में निवास
16:04कर रही देवी सीता के अनुपम सौंदर्य की गाथा गाना आरंभ किया
16:10शूर्पन्खा ने कहा कि त्रिभुवन में देवियों, अपसराओं और नाक कन्याओं में भी ऐसा रूपलावन्य नहीं है जैसा अयोध्या के
16:18राजकुमार राम की पत्नी सीता का है
16:22उसने सीता के स्वर्णिम वर्ण, कमल जैसे नयनों और अलोकिक कान्ती का बखान करते हुए रावन से कहा कि वह
16:29सुंदरी केवल लंकापती के रनिवास की शोभा बनने योग्य है
16:35शूर्पन्खा के मुख से सीता के सौंदर्य का वर्णन सुनते ही रावन के हृदय में कामागनी और मुहांधता की प्रचन
16:42ज्वाला जल उठी
16:44कामातुर और कृध्ध होकर रावन ने अपने मंत्रियों और शूर्पन्खा को दर्बार से जाने का आदेश दिया ताकि वह एकांत
16:52में अपनी गुप्त योजना बना सके
16:55अपने स्वर्ण सिनहासन पर बैठे रावन ने भली भानती समझ लिया कि श्री राम को सीधे युद्ध में पराजित करना
17:03असंभव है इसलिए छल का मार्धी एक मात्र विकल्प है
17:08रावन को अचानक अपने मायावी मामा मारीच का स्मरणाया, जो मायावी विद्या और रूप बदलने की कला में अत्यंत प्रवीन
17:17था
17:18बिना किसी देर के, रावन अपने दिव्य पुश्पक विमान पर सवार होकर काले बादलों से ढके आकाश मार्ग से मारीच
17:26के आश्रम की ओर प्रस्थान कर गया
17:29समुद्र तट पर स्थित, शांत और एकांत आश्रम में मारीच मिट्चाला पहने एक तपस्वी के रूप में निवास कर रहा
17:36था, जहां पुश्पक विमान उत्रा
17:40अपने द्वार पर लंकाधिप्ती रावन को अचिंतित रूप से आया देख मारीच ने आशंकित होकर उसका आदरसतकार किया
17:48रावन ने कुटिलता पूर्वक जनस्थान के विनाश का वृत्तांत सुनाया और मारीच के समक्ष सीता हरण की अपनी गुप्त योजना
17:57प्रकट की
17:59रावन ने मारीच को आदेश दिया कि वह एक अलौकिक स्वर्णम्रिक का रूप धारन करके सीता को आकर्शित करे और
18:07रामलक्षमन को कुटिया से दूर ले जाए
18:10राम नाम सुनते ही मारीच काम्प उठा क्योंकि वह पूर्व में श्री राम के एक ही बान के अमोगवेक का
18:17स्वाद चक चुका था और उसने रावन को इस दुस्साहस से बाज आने की सलाह दी
18:24मारीच ने रावन को सचेट करते हुए कहा कि श्री राम साक्षात काल है और उनसे शत्रुता करने पर समस्त
18:31राक्षस कुल तथा सोने की लंका का भस्म होना निश्चित है
18:36मारीच की हिटकारी बाते सुनकर रावन अत्यंत कुरुद हो गया और उसने अपनी तीखी तलवार खीच कर मारीच को ततकाल
18:45वध करने की धमकी दी
18:47रावन के हाथों अधर्म से मरने की अपेक्षा श्री राम के बानों से परंगती पाना श्रिष्ठ मानकर मारीच ने दुखी
18:55मन से इस छली योजना में भाग लेना स्विकार कर लिया
19:00सहमती बनते ही रावन और मारीच अपने दिव्यरत पर सवार होकर दंडकारन्य की ओर उड़े जहां पंच्वटी के निकट श्री
19:08राम का पावन आश्रम स्थित था
19:11गगन मार्ग से पंच्वटी के शांत कुटीर को देखते ही रावन के मुख पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई जबकी
19:18मारीच का हृदय भावी विनाश की आशंका से कांप रहा था
19:23रत को वनाचल के बाहरीच शेत्र में उतार कर रावन व्रिक्षों की आड में छिप गया और मारीच भारी मन
19:31से अपनी मायावी शक्ती का आहवान करने लगा
19:35देखते ही देखते मारीच का विशाल असुर रूप विलीन हो गया और वह एक परम सुन्दर प्रकाश्मान स्वर्ण मृग के
19:42अलौकिक रूप में परिवर्तित हो गया
19:45उस स्वर्ण मृग की त्वचा कुंदन के समान दमक रही थी और उसके शरीर पर नीलम तथा हीरों के समान
19:53चमकते हुए दिव्य चिनह अनकित थे
19:56उसके सींग चान्दी की भानती चमक रहे थे और उसके विशाल कमलन्यन वन के शांत वातावर्ण में अलौकिक सौन्दर्य बिखेर
20:04रहे थे
20:06घने पत्तों के पीछे छिपे रावन ने जब इस अध्भुत मायावी म्रिग को देखा तो उसकी आखों में सीताहर्ण का
20:13क्रूर उल्लास चमक उठा
20:16अपनी माया का प्रदर्शन करते हुए वह स्वर्ण म्रिग चर्ते-चर्ते पंचवटी कुटीर के उस आंगन के समीक पहुँच गया
20:24जहां देवी सीता फूल चुन रही थी
20:27चमेली और कमलों का चयन करती देवी सीता की द्रिष्टी जैसे ही उस अलोकिक स्वर्ण म्रिग पर पड़ी वे उसके
20:35अध्भुत सौंदर्य को देख स्थब्ध रह गई
20:38म्रिग के सम्मोहक रूप से मंत्रमुखध होकर देवी सीता ने हर्षित स्वर में श्रीराम और लक्षमन को उस दिव्य प्राणी
20:46को देखने के लिए पुकारा
20:48सीता की पुकार सुनकर श्री राम और लक्षमन कुटीर से बाहर आये और उनकी द्रिष्टी उस प्रकाश्मान स्वन म्रिग पर
20:56टिक गई
20:58चतुर और सतर्क लक्षमन ने तुरंत ताड़ लिया कि यह कोई प्राकृतिक जीव नहीं बलकि राक्षसों की कोई विनाशकारी मायावी
21:06चाल है
21:09किंतु देवी सीता उस म्रिग के संमोहन में इतनी लीन थी कि उन्होंने श्री राम से प्रार्थना की कि वे
21:15उस म्रिग को जीवित पकड़े या उसका सुनदर चर्म ले आएं
21:20सीता के निर्मल हट और प्रेम के सामने विवश होकर श्री राम ने उस अध्भुत म्रिग का पीछा करने का
21:27निर्णय ले लिया
21:29वनांतर में प्रस्थान करने से पूर्व श्री राम ने लक्षमन को कड़ा आदेश दिया कि वे किसी भी परिस्थिती में
21:36सीता को अकेला छोड़ कर न जाएं
21:40धनुशबान संभाले श्री राम तीवर गती से घने दंड कारणिय में उस मायावी स्वर्ण म्रिग के पीछे निकल पड़े
21:48छलपूर्वक व्यवहार करता हुआ वहम्रिग श्री राम को अपनी गती से लुभाता रहा और उन्हें कुटीर से बहुत दूर घने
21:55जंगल में खीच ले गया
21:58जब श्री राम ने देखा कि वहम्रिग हाथ नहीं आ रहा और उसकी गतीयों में अनप्राकृतिक छलावा है तो उन्होंने
22:06समझ लिया कि यह कोई मायावी असुर है
22:10श्री राम ने तुरंट अपने धनुष पर समहारक बान चढ़ाया और कान तक प्रत्यंचा खीच कर उस स्वर्ण म्रिग पर
22:17अमोख प्रहार कर दिया
22:18बान लगते ही मारीच अपने असली विशाल असुर रूप में आगिरा और अंतिम सांसे लेते हुए श्री राम के स्वर
22:27में है लक्षमन
22:28हे सीते का छलपूर्ण क्रंदन करने लगा
22:33मारीच की अंतिम छलपूर्ण पुकार वन की गहरायों में गूंज उठी जैसे स्वयंकाल ने श्री राम के पराक्रम पर विलाप
22:40किया हो
22:42प्रभू श्री राम ने उस क्रंदन की कपटपूर्ण प्रकृती को क्षणभर में ही पहचान लिया और उनके मुख पर एक
22:49गहरी चिंता की रेखा उभरायी
22:52वह छलावा भरी पुकार गेहन वन की दूरियों को चीरती हुई पंचवटी आश्रम की ओर तीवर गती से पहुँची जहां
23:00सीता और लक्षमन उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे
23:04पंचवटी आश्रम में देवी सीता का हृदय अचानक एक अंजानी आशंका से काप उठा जैसे किसी अमंगल की चाया उन
23:13पर मंडरा रही हो
23:15उसी क्षन लक्षमन भी उसक्रित्रिम चीक को सुनकर चौक उठे जिसका स्वर हूभु उनके जेश्ट भ्राता श्रीराम जैसा था
23:24सीता भैभीत होकर लक्षमन की ओर मुडी उनकी आखों में अश्रु और हृदय में असहे पीडा स्पष्ट जलक रही थी
23:34लक्षमन सुन रहे हो यह तो तुम्हारे भैया की पुकार है वे संकट में हैं तुरंत जाओ और उनकी सहायता
23:45करो
23:45सीता ने व्याकुलता से कहा
23:49परंतु लक्षमन जिनका विवेक सदा जागरित रहता था
23:53यह मानने को तैयार न थे कि उनके अपराजे भ्राता को किसी सहायता की आवश्चक्ता पड़ सकती है
24:02लक्षमन तुम क्यों नहीं जाते?
24:04क्या तुम भया को संकट में देखकर भी निश्क्रिय खड़े रहोगे?
24:09क्या तुम्हारी निश्ठा समाप्थ हो गई है?
24:13सीता ने आकरोश में भर कर पूछा
24:17लक्षमन का हरिदय सीता के कटू वचनों से विदीन हो गया
24:21उनकी आखों में अश्रु भर आय पर वे सन्यम बनाए रखने का प्रयास करते रहे
24:27क्या तुम भया के प्रती अपनी निश्ठा भूल गए हो या किसी अन्य दुर्मती से यहां बैठे हो?
24:34सीता ने अपने क्रोध में चरम सीमा पर पहुँच कर कहा
24:39सीता के कटू वचनों ने लक्षमन को विवश कर दिया
24:42और उन्होंने अत्यंत भारी मन से ध्राता के आदेश की अभेलना करते हुए जाने का निश्चय किया
24:50प्रस्थान करने से पहले लक्षमन ने अपनी शक्ती से आश्रम के चारों और एक अलोकिक सुरक्षा रेखा खीची
24:57जिसे लक्षमन रेखा के नाम से जाना गया
25:01हे डेवी, इस रेखा का उलंगन न करें
25:05यह आपको हर संकट से सुरक्षित रखेगी लक्षमन ने गंभीर स्वर में सीता को चेतावनी दी
25:13भारी मन से एक अंतिन विवश्ट द्रिष्टी सीता पर डालते हुए लक्षमन अपने धनुश बान के साथ गेहन वन की
25:20ओर प्रस्थान कर गए
25:21अब पंच्वटी आश्रम में सीता अकेली रह गई एक अद्रिष्य सुरक्षा घेरे के भीतर जिसके पार भयानक विपत्ती प्रतीक्षा कर
25:31रही थी
25:33उसी क्षण दसमुख रावन मायावी भिक्षु का वेश धर कर उस पावन आश्रम की ओर अपने दुष्ट इरादों के साथ
25:41धीरे धीरे बढ़ रहा था
25:43रावन ने एक व्रिद्ध तपस्वी ब्राह्मन का रूप धारन कर लिया था जिसकी मुख पर कपटपूर्ण सौमयता और आखों में
25:51छिपा हुआ शड्यंत्र चमक रहा था
25:54कप्ती रावन धीरे धीरे लक्षमन रेखा के निकट पहुँचा उसकी धूर्थ आखे आश्रम और भीतर बैठी अकेली सीता का आकलन
26:03कर रही थी
26:05आश्रम के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर उस मायावी तपस्वी ने अपनी ध्वनी में मिठास घोल कर सीता को पुकारा
26:12मानो कोई विशैला नाग अपनी शिकार को आकर्शित कर रहा हो
26:18सीता अपनी कुटिया के भीतर से उस मधूर किन्तू अप्रिचित पुकार को सुनकर क्षणभर के लिए स्तब्ध रह गई उनके
26:26मन में एक अज्यात आशंका घर कर गई
26:29इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
26:38वैकुंठ में भगवान विश्नु अपनी गंभीर ग्रिष्टी से तीनों लोकों का अवलोकन कर रहे थे
26:44उनके मुख पर आगामी घटनाओं को लेकर एक शांत पर निनायक भाव तैर रहा था
26:50इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
26:59सीता ने अपने पती और देवर के निर्देशों को याद करते हुए
27:03अपने रक्षा के लिए खींची गई लक्षमन रेखा के सम्मान में स्वयं को आश्रम के भीतर ही रोके रखा
27:11इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
27:19दूर से लक्षमन रेखा एक अद्रिश्य उर्जा के आवर्ण की तरह प्रतीत हो रही थी
27:25जो पवित्रता और सुरक्षा की एक अभेध्य दीवार थी जिसकी चमक रावन की धूत आखों में चुब रही थी
27:33इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
27:42तपस्वी वेशधारी रावन ने अपनी मधुर वानी में सीता से अन्नभिक्षा का आगरह किया
27:47अपनी कपट्पूर्ण सौमेता से उन्हें लक्षमन रेखा पार करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया
27:54इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
28:03कैलाश पर भगवान शिव अपने त्रीतिय नेत्र को अर्धकुला कर संसार की गतिविधियों को देख रहे थे
28:10उनके शांत मुख पर एक गहन चिंतन का भाव स्पष्ट था
28:15इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
28:23सीता ने तपस्वी की दैनिय अवस्था देख कर पापी रावन के कपट को न पहचानते हुए करोनावश लक्षमन रेखा को
28:31पार करने का निर्णय लिया
28:34इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
28:42जैसे ही सीता ने उस पवित्र सीमा का अतिक्रमन किया लक्षमन रेखा की दिव्य आभाक शनिक रूप से मंद पड़
28:50गई
28:50मानो प्रकृती भी इस उलंधन पर सिसक उठी हो
28:54इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
29:03शन भर में तपस्वी का विनमर मुखमंडल एक भयानक दहार के साथ विकृत हो गया
29:09और रावन ने अपने दस शीशों और बीस भुजाओं वाला दानवी रूप प्रकट कर दिया
29:15इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
29:23आकाश में नारद मुनी अपनी वीना को एक ओर रखकर इस अप्रत्याशित घटना को देख रहे थे
29:30उनके चहरे पर गहरी चिंता और दुख स्पष्ट था
29:34इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
29:53इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
30:02भयानक राक्षस ने सीता को अपनी पकड में लिये हुए एक आकाश चारी रत की ओर बढ़ना शुरू किया
30:08जिसकी परचाई जमीन पर एक विशालकाय दानव की आकरिती बना रही थी
30:14इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
30:23सीता ने अपने उद्धार के लिए वन के प्रत्येक व्रिक्ष, प्रत्येक लता से चीख-चीख कर राम और लक्षमन को
30:30पुकारा उनकी ध्वनी वन में गुंजती रही
30:33इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
30:42वैकुंट में भगवान विश्णू अपने शांत किन्तु द्रिढ मुख मंडल के साथ इस अधर्म को अपनी आखों के सामने घटित
30:50होते देख रहे थे, उनके नेत्रों में एक अटल संकल्प चमक रहा था
30:55इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
31:04सीता के संधर्ष के दौरान उनके कुछ आभूशन, एक कंगन, एक जुमका, वनभूमी पर बिखर गये, मानो वे उनके दोहक
31:12की मुख गवाही दे रहे हो
31:15इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
31:23पुश्पक विमान ने तेजी से आकाश की ओर उडान भरी, सीता को लिये हुए, जैसे एक विशालकाय बास अपने शिकार
31:31को लेकर उर जाता है, पंच्वटी को पीछे छोडते हुए
31:36इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
31:44सीता ने नीचे की ओर देखा, उनका हृदय विलाप कर रहा था, अपने प्रिय आश्रम और रामलक्षमन की अनुपस्थिती में
31:52स्वयं को पूर्णत असहाय पा रही थी
31:55इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
32:04कैलाश पर भगवान शिव अपने गेहन ध्यान में मगन, ब्रहमांडिय संतुलन को समझ रहे थे, उनके मुख पर एक शांत
32:12पर गंभीर स्विकारोक्ती का भाव था
32:15इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
32:24पुश्पक विमान अब एक छोटे से बिंदु के समान आकाश के विशाल विस्तार में विलीन होता जा रहा था
32:31पीछे छूट गए आश्रम में एक गहरी भयानक चुप पीछा गई थी
32:36इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
32:45पंच्वटी के शांत वातावर्ण में केवल हवा की सरसराहट और एक एका की पक्षी की करोन पुकार सुनाई दे रही
32:52थी जो इस गंभीर त्रास्दी की मूख साक्षी बन गई थी
32:57इस पावन प्रसंग में रावन का छद्म वेश और देवी सीता का अफ़रण की महिमा का वर्णन किया गया है
33:06पंचवटी के उपर विस्तरित आकाश में अचानक देवी सीता की हृदय विदारक चीखे गूंज उठीन जो जंगल की शांती को
33:14चीरती हुई दूर-दूर तक फैल गई
33:17बैकुंठ लोक में शीरसागर के मध्य अनंत शेशनाग पर विराजमान भगवान विश्नु ने ध्यानमगन अवस्था में भी ब्रहमांडीय हल्चल को
33:26अनुभव किया
33:27उनके मुख पर एक शांत किंतु गंभीर भाव तैर आया
33:32उन्हीं चीखों को सुनकर एक प्राचीन और विशालकाय गिधराज जटायू ने अपनी विध्धावस्था की परवाह किये बिना आकाश की ओर
33:41देखा और दूर रावन के पुश्पक विमान को देवी सीता के साथ तीवर गती से जाते हुए देखा
33:48आकाश में तीवर गती से उड़ते उस विमान की परचाई घने जंगलों पर ऐसे पड़ी मानो कोई विशालकाय कालखंड अपने
33:56शापित साये को फैला रहा हो
33:59ततकाल व्रिध जटायू ने एक गरजना की अपनी विशालकाय पंखों को फैलाया और आकाश की ओर तीवर वेग से उड़ान
34:08भरी सीता को बचाने के दृड संकल्प के साथ
34:12दूर इंद्रलोक में देवराज, इंद्र और अन्य देवतागन इस अप्रत्याशित घटना को देखकर विस्मित और चिंतित थे
34:20उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस विशम परिस्थिती में क्या किया जाए
34:26जटायू ने रावन के पुश्पक विमान का पीछा किया और अन्तह उसे आकाश में रोक लिया
34:32अपनी तीखी चोंच और पंजों से उस पर वार करने के लिए तयार
34:37रावन का प्रत्येक मुख क्रोध से लाल हो उठा, उसकी आखों से अगनी ज्वालाय निकल रही थी
35:13जटायू के प्रचंडवार से रावन का पुश्पक विमान टुक्रे टुक्रे होकर आकाश से गिरने लगा
35:19उसके स्वन रत के अवशेश और घोडे नीचे घने जंगल की ओर बेकाबू होकर गिर रहे थे
35:26शतिग्रस्त रत के अवशेश जैसे आकाश से तूटते तारे नीचे जंगल में गिर रहे थे
35:32जिससे धर्ती पर एक भयावा और अराजक माहौल बन गया
35:38रावन अब विमान विहीन होकर देवी सीता को अपनी भुजाओं में कसकर पकड़े हुए
35:43जटायू से सीधे युद्ध करने लगा उसका क्रोध चरम पर पहुँच चुका था
35:49कैलाश परवत पर गेहन ध्यान में लीन भगवान शिव अपनी तीसरी आख खोले बिना भी इस महान धर्मयुद्ध की उर्जा
35:57को अनुभव कर रहे थे
35:59उनके चहरे पर एक गंभीर शान्ती थी
36:03रावन ने अपनी चंद्रहास तलवार निकाली और जटायू पर कई तीवर प्रहार किये जिससे व्रिद्ध पक्षी के शरीर पर गहरे
36:11घाव हो गए और उसका स्वर्णिन रक्त बहने लगा
36:15जटायू का शरीर जो कभी आकाश में गौरव से उर्ता था अब लहु लुहान था उसके पंखों से बहता रक्त
36:23संध्या के आकाश में लाल निशान छोड़ रहा था
36:26क्रूर रावन ने अपनी अदमय शक्ती का प्रदर्शन करते हुए एक अंतिम और निर्नायक वार से जटायू के विशाल पंखों
36:35को निर्ममता पूर्वक काट डाला
36:37यह देख सभी दिशाओं में दुहक और निराशा की एक भयानक गूंच फैल गई, मानो स्वयन प्रकृती भी इस महान
36:45पक्षी के पतन पर विलाप कर रही हो
36:49पंख्विहीन जटायू लहूलुहान होकर अब आकाश से धर्ती की ओर गिरने लगा, उसका गौरवशाली शरीर मृत्यू की ओर अग्रसर था
36:59अंतह वृद्ध गिधराज जटायू अपनी अंतिम सासें गिनते हुए, घने जंगल के बीच एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे धराशाई हो
37:08गया, उसकी आखों में अभी भी कर्तव्यनिष्ठा की लौ जल रही थी
37:13हिरन के रूप में आये मारीज का वधकर, जब श्रीराम और लक्ष्मन अपनी परणकुटी लोटे, तो वहां सीता को नपाकर
37:21पूरा पंच्वटी छेत्र सन्नाटे और विशाद में डूब गया
37:26देवी सीता की खाली परणकुटी और छिन्नभिन सामान को देखकर भगवान श्रीराम का हृदय अत्यंत व्यथित हो उठा और वे
37:35व्याकुल होकर उनका नाम पुकारने लगे
37:38भ्राता राम के अपार कष्ट को देखकर लक्षमन भी भीतर तक हिल गए और वे आश्रम के आसपास के घने
37:45व्रिक्षों और जाडियों में वैदेही को खोजने लगे
37:49विराय की अगनी में जलते हुए श्रीराम जंगल की वनस्पतियों, पशुपक्षियों और बहती सरिता से देवी सीता का पता पूछने
37:58लगे, मानो संपूर्ण प्रकृती मौन हो गई हो
38:02पंच्वटी के सुरमय वातावर्ण में फैली इस स्तब्धता के बीच, श्रीराम का क्रंदन संपूर्ण गंड कारणे के व्रिक्षों और दिशाओं
38:10में गूंजने लगा
38:12खोजते खोजते श्रीराम और लक्षमन की द्रिष्टी भूमी पर बने एक विक्राल युद्ध के चहनों, तूटे हुए रत के टुकडों
38:20और बहते हुए रक्त की बूंदों पर पड़ी
38:23उस विनाश के मार्ग का अनुसर्ण करते हुए वे विशाल वट व्रिक्ष की ओर बढ़े, जहां से एक अत्यंत क्षीन
38:30और वेदनापूर्ण ध्वनिया रही थी
38:33व्रिक्ष की घनी चाया के नीचे पहुँचकर दोनों भाईयों ने देखा कि महाबली पक्षी राज जटायू पंक्विहीन और लहुलुहान अवस्था
38:42में अन्तिम सासे गिन रही हैं
38:46श्री राम ने अत्यंत करुणा के साथ गिधराज जटायू के मस्तक को अपनी गोधी में रख लिया और अपनी अश्रुपूरित
38:54आखों से उनके घावों को निहारने लगे
38:57श्री राम के पवित्रस्पर्ष और शीतल आसूओं का अनुभव करते ही जटायू ने अपनी धुंधली पड़ती आखों को खोला और
39:05अपने प्रभू के दर्शन पाकर कृतार्थ हो गए
39:09जटायू ने कापती हुई वानी में श्री राम को सूचित किया कि लंकापती दुष्ट रावन ही छल से सीता का
39:16हरण करके उन्हें दक्षिन दिशा की ओर ले गया है
39:21जटायू ने यह भी बताया कि उन्होंने अपनी संपूर्ण शक्ती से रावन का मार्ग रोकने का प्रयास किया किन्तु उसने
39:28अपनी चंद्रहास खडग से उनके पंख काट डाले
39:32अपने जीवन का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण संदेश श्री राम तक पहुचाने के उपरांत गिद्धराज जटायू ने राम नाम का
39:41उच्चारन करते हुए अपने प्राण त्याग दिये
39:44परम मित्र और पिता समान जटायू के बलिदान पर श्री राम का हृदैपुन राजा दशरत के मरण के शोक की
39:51भांती अत्यंत व्यथित हो उठा
39:53श्री राम के आदेश पर लक्षमन ने शीघ्रही चंदन, काश्ट और पवित्र सामगरियों को एकत्रित करके गिद्धराज के अंतिन संसकार
40:03हेतु एक भव्यचिता निर्मित की
40:06श्री राम ने वैदिक मंत्रोच चार के साथ जटायू की देह को अगनी समर्पित की और उनका दाह संसकार कर
40:14उन्हें बैकुंठ धाम का सर्वोच अधिकार प्रदान किया
40:18चिता से उठती हुई दिव्यजवालाओं और धुए के बीच से पक्षी राज जटायू का जोतिर्मय स्वरूप प्रकट होकर सीधे परमधाम
40:26की ओर प्रस्थान कर गया
40:29जटायू के अंतिन संसकार के पश्चात श्री राम का विरहशोक एक प्रचंड धर्म क्रोध में परिवर्तित हो गया और उनकी
40:37मुद्रा अत्यंत उग्रवव संकल्प बद्ध हो गई
40:41श्री राम ने अपने विशाल को दंड धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा कर यह भीश्म प्रतिज्या की कीवे संपून ब्रहमांड को
40:48च्छान मारेंगे और रावन के कुल का समूल विनाश करेंगे
40:53ध्राता के महा संकल्प का समर्थन करते हुए लक्षमन ने भी धनुष संभाला और दोनों दिव्य बंधु दक्षिन दिशा की
41:01ओर कदम बढ़ाते हुए सीता की खोज में निकल पड़े