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इस अद्भुत एपिसोड में, भगवान विष्णु गरुड़ को परम ज्ञान की पराकाष्ठा - जीवन्मुक्त की स्थिति में 'कर्म' के गहरे रहस्य समझाते हैं। जानिए कैसे एक मुक्त आत्मा, संसार को ब्रह्म की अविभाज्य लीला मानते हुए भी, बिना किसी आसक्ति या अहंकार के कर्म करती है। विष्णु 'अकर्ता भाव', त्रिगुणों के परे होकर क्रिया करने, और लोक-कल्याण के लिए सहज कर्म के सिद्धांतों को विस्तार से बताते हैं। यह प्रवचन दर्शाता है कि कैसे एक जीवन्मुक्त जीवन-मृत्यु के चक्र से पूर्णतः मुक्त होकर भी संसार में रहते हुए परम शांति और आनंद का अनुभव करता है। क्या आप भी जान सकते हैं इस गुप्त कर्मयोग का रहस्य? #गरुड़पुराण #GarudaPurana #जीवन्मुक्त #कर्मयोग #अद्वैतज्ञान #मोक्ष #विष्णुज्ञान #आध्यात्मिकरहस्य #ब्रह्मलीला #आत्मज्ञान #हिन्दूधर्म #भारतीयसंस्कृति
Transcript
00:00परम्पिता भगवान विश्णू ने गरूर के विस्मय को शांत करते हुए उन्हें उस गेहन प्रश्न का उत्तर देना प्रारंभ किया
00:07जो एक जीवनमुक्त आत्मा के लिए कर्म के महत्व पर केंद्रित था।
00:12गरूर ने विनमर्ता से अपने विचार प्रस्तुत करते हुए पूछा, हे प्रभु, जब एक आत्मा संसार को ब्रह्मा का ही
00:20विराट रूप मान लेती है, तब उसके लिए कर्म का क्या अर्थ शेश रहता है, क्या वह कर्मों से विरत
00:26नहीं हो जाती?
00:28भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए समझाया कि परम ज्यान की प्राप्ती कर्मों का त्यात नहीं, बलकि कर्मों के प्रती द्रिश्टिकोन
00:36का गहरा परिवर्तन है, एक ऐसी स्थिती जहां कर्तापन का अहंकार विलीन हो जाता है.
00:43उन्होंने समझाया कि जीवनमुक्त आत्मा ऐसे कर्म करती है, जैसे कोई कुशल नर्तक मंच पर अभिनय करता है, स्वयन को
00:52उस भूमिका से अलग जानते हुए भी उसमें पूर्ण रूप से लीन रहता है.
00:58विश्नु ने आगे बताया कि यह ज्यानी पुरुष अपने सभी कर्मों को प्रकृती के गुनों का ही खेल समझता है,
01:05और स्वयन को उस खेल का मात्र साक्षी मानता है.
01:10गरुर ने ध्यान पूर्वक सुना, जैसे जैसे भगवान विश्नु कर्म के बंधन से मुक्त होने के इस रहस्य को उजागर
01:17कर रहे थे, उनके चहरे पर एक नई समझ की चमक दिखाई दे रही थी.
01:23विश्नु ने कहा कि ऐसे ज्यानी जन कर्म करते तो हैं, पर उनका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ या फल की इच्छा
01:30नहीं होती, उनके कर्म केवल लोग कल्यान के लिए समर्पित होते हैं.
01:36उन्होंने कर्म को एक ऐसी नदी के समान बताया जो बहती तो रहती है, पर अपने उदगम से विमुख हुए
01:43बिना अंता सागर में विलीन हो जाती है.
01:47भगवान विश्णु ने लोक संग्रह के सिध्धान्त को स्पष्ट किया, जिसके अनुसार ज्यानी पुरुष संसार को व्यवस्थित और संतुलित रखने
01:55के लिए अपने कर्तवियों का पालन करते हैं.
01:59गरुड ने श्रद्धा पूर्वक सिर जुकाया, उनके मन में उठने वाले सभी संदे भगवान के अमरित्वानी से शांत होते जा
02:07रहे थे.
02:09विश्णु ने कहा कि ज्यानी कर्म करता है ताकि अज्यानी भी सही मार्ग पर चलें, क्योंकि ज्यानी का आचर्ण ही
02:16समाज के लिए प्रेणासरोत बनता है.
02:20उनके कर्मों में कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं होती, वे केवल एक यज्य की भाती होते हैं, जिसका फल ब्रहमांड को
02:28समर्पित होता है
02:30भगवान विश्णु ने यह भी बताया कि जीवन मुक्त के लिए संसार की हर घटना ब्रहमा की एक अग्भुत लीला
02:37है, एक दिव्यनाटक जिसमें वह स्वयन एक पात्र है, पर उसके परिनामों से अप्रभावित रहता है
02:45गरुर के नेत्रों में अब केवल ज्यान की निर्मल जियोती थी, जो भगवान के प्रत्येक शब्द को आत्म साथ कर
02:52रही थी, उनका हृदय पूर्णत है शान्त और संतुष्ट था
02:57कर्मयोग जिसे पहले एक बोज समझा जाता था, अब जीवन मुक्त के लिए ब्रहमा की लीला में सक्रिय भागिदारी का
03:05एक आनंदमय माध्यम बन चुका था
03:08यह कर्म अब किसी फल की आशा से नहीं, बलकि ब्रहमांडिय संतुलन और प्रेम के स्वतह स्फूत प्रवाह के रूप
03:16में प्रकट हो रहा था
03:18भगवान विश्णु ने अपने अंतिम शब्दों में कहा कि जीवन मुक्त का कर्मयोग संसार के लिए एक दिव्य उदाहरण है,
03:26जो दर्शाता है कि ज्ञान और क्रिया एक साथ कैसे रह सकते हैं
03:32गरुर ने कृतग्यता से भगवान के चर्णों में अपना मस्तक जुकाया, उनका मन अब अध्वैक ज्ञान और कर्मयोग के समनवय
03:40से प्रकाशित था
03:42जीवन्मुक्त आत्मा अब कर्मों में रहते हुए भी कर्मों से परे थी, जैसे जल में कमल का पत्ता जल से
03:49अप्रभावित रहता है
03:52संसार अब केवल एक विस्तरित ब्रह्मा की लीला बन गया था, जिसमें हर क्रिया एक पवित्र उत्सव और आनंद की
03:59अभिव्यक्ती थी
04:02भगवान विश्नु ने अपनी दिव्यमुस्कान बिखेरते हुए समझाया कि जीवन्मुक्त के लिए कर्म केवल प्रकृती के स्वभाव का एक प्रवाह
04:10है, जिसमें स्वयंकर्ता का कोई अहंकार नहीं होता
04:15गरुर ने श्रद्धा पूर्वक्ष रवन किया, उनके नेत्रों में गहन जिग्यासा और बोध की चमक थी, जैसे वे ब्रहमांड के
04:23गूर्तम रहसियों को आत्म साथ कर रहे हुँ
04:26विश्नु ने उदाहरन देते हुए कहा, जैसे पवन व्रिक्षों को हिलाती है, पर पवन स्वयं व्रिक्षों को हिलाने का दावा
04:34नहीं करती, वैसे ही डेहधारी आत्मा कर्मों की साक्षी मात्र होती है
04:40यहां अकर्ता भाव ही जीव को कर्मों के फलों से मुक्त रखता है, उसे माया के बंधनों से उपर उठा
04:47कर परम शांती प्रदान करता है
04:51उन्होंने आगे कहा कि त्रिगुन, सत्व, रज, तम भी समस्थ स्रिष्टी के कारियों के पीछे की प्रेरक शक्ती हैं, न
04:58की व्यक्तिगत्मे का संकल्प
05:01गरुड ने गहंता से सिरहिलाया, उनके हृदय में परम ज्ञान की एक और परत खुल रही थी, जिससे उनका बोध
05:08और भी गहरा हो रहा था
05:11जैसे नर्तक केवल अपने शरीर से अभिनय करता है, किन्तु स्वयां को अभिनय का स्वामी नहीं मानता, वैसे ही ज्ञानी
05:19शरीर के कारियों को प्रकृती का खेल समझता है
05:23यह समझना की प्रत्यक क्रिया ब्रहमांडिय उर्जा का एक सहज स्पंदन है, अहंकार के दुर्प को ध्वस्त कर देता है
05:33भगवान ने अपनी मधुरवानी में बताया कि जीवन मुक्त, आत्मा, सुख्रुख, लाभानी, जय पराजय जैसे द्वंद्वों से परे होकर समता
05:41भाव में स्थित रहती है
05:44गरुर ने भगवान के दिव्यमुख मंडल की ओर देखा, जहां असीम शान्ती और ज्ञान का सागर लहरा रहा था, और
05:52उनके मन में कोई संदेह शेश न था
05:56वेदों में वर्नित है कि ज्ञानी पुरुष अपने इंद्रियों को विश्यों में विचर्ण करते देखते हैं, पर स्वयं को उनसे
06:03अलिप्ट जानते हैं, जैसे आकाश मेगों से
06:07यह अलिप्टता ही उसे कर्मों के बंधन से मुक्ती दिलाती है, जहां कोई फल उसे बांध नहीं पाता
06:15विश्णु ने समझाया कि संसार में रहते हुए भी जीवन मुक्त आत्मा संसार से अप्रभावित रहती है, जैसे सूर्य की
06:23किरने जल को छुकर भी गीली नहीं होती
06:26गरुर ने अपने पंख धीरे से फैलाए, मानो वे इस ज्ञान को ब्रहमांड के हर कोने तक पहुचाने के लिए
06:33तैयार हो रहे हो
06:35वह हर कार्य को एक यज्य समझता है, जिसमें मैं करता नहीं, बलकि ब्रहमा ही यज्यभोगता और यज्यस्वरूप है
06:45यहां आत्मज्यान ही उसे ब्रहमा के साथ एकाकार कर देता है, जहां द्वैत का कोई स्थान नहीं रहता
06:53अंतहक भगवान ने निशकर्ष निकाला की जीवन मुक्त कर्म करता है, परन्तु फल की आसकती से मुक्त रहता है, क्योंकि
07:01वह जानता है कि समस्त्क्रियाएं ब्रहमा की ही अभिव्यक्ती है
07:06गरुर ने गहन शान्ती और क्रितग्यता के साथ भगवान की ओर देखा, उनका हृदय अब पूर्ण बोध से आलोकित हो
07:14चुका था
07:16वे समझ गए थे कि सच्चा कर्मयोग वही है, जहां मैं के भाव का विसर्जन हो और केवल शाश्वत ब्रहमा
07:23का नरीत्य ही शेश रहे
07:36भगवान विश्णू समझाते हैं कि जिस प्रकार कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे अचूता रहता है, उसी प्रकार
07:43जीवनमुक्त पुरुष संसार में कर्म करते हुए भी कर्म बंधनों से सर्वता अचूता रहता है
07:51परमिश्वर की ओर देखते हुए गरुर ने उनके मुखमंडल पर असीन करुणा का भाव देखा, जो इस ब्रहमांडिय सत्य को
07:58प्रकट कर रहा था कि निश्काम भाव ही आत्मा का वास्तविक स्वरूप है
08:05संसार की गतिविधियों के मध्य, एक शांत और अनासक्त जीवनमुक्त आत्मा अपने दैनिक कर्तवियों को केवल शरीर्यात्रा और लोग कल्यान
08:14के लिए निश्पादित करती है
08:17जब व्यक्तिगत इच्छाओं और कर्मफिलों की आसक्ती का सर्वथा त्याग हो जाता है
08:22तब कर्म स्वयम ही ब्रमार्पन होकर परम शांती में लीन हो जाते हैं
08:29वैकुंट का यह दिव्यवातावर्ण उस अचल मन की प्रतिकृती है
08:33जो सुख और दुहक, लाब और हानी के द्वंद्वों से उपर उठकर केवल शाश्वत आनंद में स्थित रहता है
08:42भगवान के वचनों को सुनकर गरुर का हृदय असीम संतोष से भर गया
08:46और उन्होंने अपने विशाल स्वर्ण पंखों को समेट कर प्रभु के चर्णों में अपना मस्तक जुका दिया
08:53एक जीवन मुक्त पुरुष कर्मों को करते हुए भी उनके करतापन के अहंकार से मुक्त रहता है
09:00खीक वैसे ही जैसे एक सूखा पत्ता हवा के वेग से बिना किसी प्रयास के उड़ता है
09:07जैसे प्रजवलित अगनी इन्धन को भस्न कर देती है
09:10वैसे ही निशकाम कर्मयोग की यह अगनी संचित कर्मों के भारी बंधनों को क्षण भर में विलीन कर देती है
09:19वैकुंट की भव्यस्वर्ण सभा में बैठे भगवान विश्नु ने अपने दाहिने हाथ से अभय मुद्रा बनाकर गरूर को कर्मयोग के
09:26इस परम रहस्य की ओर पुनह अग्रसर किया
09:30प्रभु ने कहा कि जो मनुष्य अपनी इंद्रियों को वश में करके आसकती रहित होकर केवल कर्तव्य समझ कर कर्म
09:38करता है वह संसार में कभी लिप्ट नहीं होता
09:42एक योगी अपनी समस्त ज्यानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों को परमात्मा के कारियों में लगा कर स्वयन को केवल एक निमित मात्र
09:50स्विकार करता है
09:52इस अवस्था में पहुँचकर आत्मा यह भली भांती जान लेती है कि सभी कर्म प्रकृती के गुनों द्वारा ही किये
10:00जा रहे हैं और आत्मा स्वया अकरता है
10:04इस परम सत्य को जानकर गरुड के नेत्रों से ज्ञान के अश्रु बहने लगे और उन्होंने स्रिष्टी के इस अध्भुत
10:11खेल को एक नए द्रिष्टी कोन से देखा
10:15परमेश्वर की दिव्यवानी वैकुंठ के कनकन में गूंश उठी जिससे वहां उपस्थित समस्त देवगन और सिध्ध पुरुष भी उस ज्ञान
10:23गंगा में सराबोर हो गए
10:26जब कर्मों के फल की कामना समाप्त हो जाती है तब कर्म का भारी बोज एक हलके पंख के समान
10:33हवा में उड़कर गायब हो जाता है
10:36यह निशकाम कर्मयोग ही वह गुप्त कुन्जी है जो जीव को जन्ममर्ण के अनंत चक्र से सदास्दा के लिए मुक्त
10:44कर देती है
10:46विश्नु ने समझाया कि जो जीव संसार को केवल मेरी एक क्रीडा समझ कर उसमें भाग लेता है वह कभी
10:53भी सुख दुख के भवर में नहीं फंस्ता
10:57प्रभु के इन अमूल्य उपदेशों को सुनकर गरुर का संशय पूर्णतह मिठ चुका था और उनके अंतहकरण में केवल ब्रह्मा
11:05का ही प्रकाश व्याप्थ था
11:07वे अब जान चुके थे कि शरीर केवल एक वस्त्र है और कर्म केवल एक अभिनय जबकि आक्मा सदा अजन्मा,
11:16अविनाशी और आनन्द स्वरूप है
11:19इस प्रकार निशकान कर्म की इस सर्वोच अवस्था को पाकर जीवन मुक्त आत्मा सदा के लिए सच्चिदानन्द ब्रह्मा के विराट
11:27स्वरूप में लीन हो जाती है
11:31वैकुंठ के परम पावन प्रांगण में भगवान विश्णु ने गरूर को संबोधित करते हुए त्रिगुनों के उस रहस्य में खेल
11:38को प्रकट करना आरंभ किया जो संपूर्ण चराचर जगत को संचालित करता है
11:45गरूर ने अत्यंत श्रधा पूर्वक अपने शीश को जुका कर प्रभु के वचनों को सुनना स्विकार किया जबकि नारायन के
11:52मुखमंडल पर स्रिष्टी की सर्वोच माया को प्रकट करने वाली मंद मुस्कान तैर रही थी
11:59प्रभु विश्णु ने अपने दिव्य हाथों की ओर संकेत करते हुए आकाश में तीन अत्यंत चमकीली रश्मियों को प्रकट किया
12:07जो सत्व, रजस और तमस के रूप में संपून ब्रहमांड को नियंत्रित करती है
12:13ये तीनों गुन मानव के मन और इंद्रियों को अद्रिश्य डोरियों की तरह बांध कर संसार के रंगमंच पर नाना
12:21प्रकार के कर्म करवाने के लिए विवश करते रहते हैं
12:25वैकुंट के दिव्य नीलमनी जैसे तालाबों में तैरते स्वर्नत्मलों की ओर देखते हुए भगवान विश्नु ने समझाया की कैसे एक
12:34साधारन मनुष्य इन गुनों के प्रवाह में बह जाता है
12:39नारायन ने अपने परम्प्रिय वाहन गरूर को समझाया की यद्यपी एक मुक्त पुरुष का शरीर इस संसार में विचर्ण करता
12:46है किन्तु उसकी चेतना इन तीनों गुनों के प्रभाव से सदा अचूती रहती है
12:53सत्व गुन के श्वेत और शान्त प्रकाश को प्रदर्शित करते हुए प्रभू ने बताया कि यह गुन मनुष्य को ज्यान,
13:00पवित्रता और मानसिक शान्ती की ओर ले जाता है किन्तु यह भी एक सुक्ष्म बंधन ही है
13:08ततपश्चात रजस गुन के धधकते हुए रक्तवर्ण प्रकाश की ओर संकेत किया गया, जो जीव के भीतर त्रिश्ना, अतिमहत्वा कांक्षा
13:17और निरंतर कर्म करने की बेचैनी को जन्म देता है
13:22वैकुंट के अनंत स्वर्णे महलों के ऊपर छाय हुए अलौकिक बादलों के बीच तमस गुन का अंधकार में और भारी
13:29स्वरूप प्रकट हुआ जो अज्यान, आलस्य और भ्रम का प्रतीक है
13:34गरुर ने अत्यंत विस्मय से देखा कि कैसे संसार के समस्थ प्राणी इन तीनों रंगों की उर्जाओं के बीच जूलते
13:42हुए अपने जीवन का अंत कर देते हैं
13:46परंतु भगवान विश्नु ने स्पष्ट किया कि एक जीवन मुक्त योगी इन तीनों शक्तियों के परस पर टकराव को केवल
13:53एक मुक गवाह बनकर दूर से देखता रहता है
13:58जैसे एक द्रिड परवत प्रचंड आंधी और चक्रवातों से विचलित नहीं होता वैसे ही उस ज्ञानी पुरुष का अंतहकरन त्रिगुनों
14:07की उथल पुथल में भी पूर्णत है प्रशान्त रहता है
14:11वैकुंट के भव्य प्रांगण में दिव्य उर्जा की तरंगे फैलती गई और प्रभु ने बताया कि प्रकृती के ये गुण
14:18केवल भौतिक शरीर और मन का धर्म है आत्मा का नहीं
14:23नारायन ने स्नेह पूर्वक गरुड की ओर देखते हुए कहा कि जब तक यह शरीर जीवित है तब तक इसके
14:30अंग अपने स्वभाव के अनुसार ही रच तम या सत्व में प्रवरित्थ होंगे
14:36जैसे हवा के जोके से जल पर तैरता हुआ सूखा पत्ता बिना किसी प्रयास के बहता रहता है वैसे ही
14:43जीवनमुक्त का शरीर प्रारब्ध के अधीन कर्म करता जाता है
14:48भीतर गहरे समुद्र की भांती मौन और बाहर से संसार के थपेडों को सहता हुआ वह महात्मा सदा जानता है
14:56कि वह स्वयन न तो करता है और नहीं भोगता
15:00वैकुंठ के आकाश में अनन्त दिव्य प्रकाश पुंजों के विलीन होने के साथ ही गरुर को यह परम सत्य पूरी
15:07तरह स्पष्ट हो गया कि बंधन केवल अहंकार की कलपना है
15:13गरुर ने परम आनन्द से भर कर भगवान विश्नु के चरण कमलों को स्पर्ष किया क्योंकि उनका अन्तहकरण अब प्रकृती
15:20के तीनों गुनों से मुक्त होकर शुद्ध ब्रह्मा में स्थित हो चुका था
15:25अन्तह उस योगी की आत्मा से निकलने वाला अलौकिक प्रकाश उन तीनों रश्मियों को अपने भीतर समाहित करके एक परम
15:34जोती में परिवर्तित हो गया
15:36इस प्रकार समस्थ द्वंधवों और गुनों के खेल से परे होकर वह जीवनमुक्त पुरुष सदा के लिए सच्चिदानन्द ब्रह्मा के
15:44अनंत सागर में लीन होकर शाश्वत सत्य बन गया
15:49भगवान विश्णू ने वैकुंट के दिव्य लोक में गरूर को समझाते हुए कहा कि जीवनमुक्त आत्मा की असली पहचान उसका
15:56वह समत्व भाव है जो उसे संसार के हर द्वंधव से परे रखता है
16:02हे खगेश्वर जैसे बहती हुई नदी में सोने का टुकड़ा और साधारन पत्थर दोनों ही पानी के प्रवाह से प्रभावित
16:10नहीं होते वैसे ही ज्यानी पुरुष के लिए दोनों समान हैं विश्णू ने मंद मुस्कान के साथ कहा
16:18उस जीवनमुक्त महापुरुष के चर्णों के एक ओर धधकती हुई अगनी की ज्वालाएं थी और दूसरी ओर शीतल जल की
16:25धारा किन्तु उसका मन दोनों ही अवस्थाओं में पूर्णत शान्त था
16:31जैसे एक तराजू के दोनों पल्डों पर कंचन और पाशान रखने के बाद भी उसकी सुई मध्य में स्थिर रहती
16:38है वैसे ही उसका मन मान और अपमान के बीच अचर रहता है
16:44वैकुंट के भव्यस्वर्ण प्रांगण में दिव्यरश्मिया बिखर रही थी जहां श्रीहरी ने समझाया कि संसार के सुख और दुहक मन
16:52के भ्रम मात्र हैं जो आत्मा को छूब ही नहीं सकते
16:56गरुर ने अगाद श्रद्धा से अपने दोनों हाथ जोड लिये और उनकी आखों में उस परम सत्य को जानने की
17:04तीवरज ग्यासा और शांती एक साथ जलक उठी
17:08जब एक व्यक्ती ने उस संथ पर पुष्पों की वर्षा की और दूसरे ने कटू वचनों के बान छोड़े तब
17:15भी उस योगी के चहरे पर वही सौमय और अविचल मुस्कान बनी रही
17:20जिस प्रकार कीचड के मध्य उगने वाला कमल जल की अशुधियों से सदा अचुता और पवित्र रहता है उसी प्रकार
17:28वह पुरुष संसार के विकारों से अप्रभावित रहता है
17:33वैकुंट की अनंद सीमाओं से परे ब्रहमांडिय चक्र घूम रहा था जहां रितुए बदल रही थी पर भूमी अपनी धुरी
17:41पर अडिग रहकर समता का संदेश दे रही थी
17:45विष्णु ने अपने दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में उठाते हुए कहा कि यह भौतिक शरीर केवल वस्त्र के समान
17:52है और इसके कष्ट कभी भी मुक्त आत्मा के आनंद को कम नहीं कर सकते
17:58जब कडाके की ठंड और जुलसाने वाली गर्मी ने उसके शरीर को घेरा तब भी वह योगी अपनी आंतरिक चेतना
18:06में लीन होकर हिमालय की बर्फ पर शान्त बैठा रहा
18:10तीवर आंधी तूफान के बीच भी एक अकेला दीपक बिना हिलेडुले शान्त भाव से जलता रहा क्योंकि उसे किसी बाहरी
18:18हवा का भय नहीं था
18:21वैकुंट के विशाल द्वारों से होकर एक परम शान्ती की लहर प्रवाहित हुई जो इस बात का प्रतीक थी कि
18:28समताही मोक्ष का सबसे सुन्दर मार्ग है
18:32गरुर ने कौतुहलवश पूछा की है प्रभु माया के इस घने जाल में फंसा साधारन मनुष्य इस परम समत भाव
18:40को कैसे प्राप्त कर सकता है
18:43एक उचे और खतरनाक परवत की चोटी पर बैठ कर वह योगी नीचे गर्जना करते महासागर के थपेडों को देख
18:51रहा था
18:51मानो वह केवल एक नाटक का द्रिश हो
18:55जैसे एक स्वच दरपन अपने सामने आने वाले काले बादलों और चमकते सूरज दोनों को बिना किसी दाग के दर्शाता
19:03है
19:03वैसे ही उसका चित्त भी निर्मल रहता है
19:08वैकुंट के दिव्यक शितिच पर अलौकिक प्रकाश फैल गया
19:11जब श्रीहरी ने आत्मा और मन के बीच के उस सुक्ष्म भेद को स्पष्ट रूप से उजागर किया
19:18जब मनुष्य स्वयं को शरीर नहीं बलकि अविनाशी आत्मा मानता है
19:23तब संसार की कोई भी परिस्थिती उसके आनंद को भंग नहीं कर सकती
19:28नारायन ने गंभीर वानी में कहा
19:31वह मुक्त पुरुष बीमार और दीन दुखियों की सेवा पूरी लगन से करता था
19:36किन्तु उसके मन में किसी फल्या यश्की तनिक भी लालसा नहीं थी
19:41इस प्रकार सुख और दुखक के इस घूमते हुए विशाल कालचकर के केंद्र में वह जीवनमुक्त योगी सदा के लिए
19:49स्थिर, शांत और आनंदित होकर स्थित हो गया
19:53नारायन ने आगे समझाना जारी रखा कि जीवनमुक्त आत्मा के लिए जीवन एक पूर्वनिर्धारित नाटक के समान है, जहां उसे
20:02अपने प्रारब्ध कर्मों का निर्वाह एक अभिनेता की भाती करना होता है
20:08विश्नु बोले, जैसे एक कुशल कलाकार अपनी भूमिका जानता है, वैसे ही मुक्त पुरुष भी अपने जीवन पत को ब्रह्मा
20:16की विराट लीला का एक अविभाज अंश मानता है, बिना किसी आसकती के
20:22वह जीवन के हर द्रिश में अपनी भूमिका पूर्ण समर्पन से निभाता है, यह जानते हुए कि यह सब केवल
20:30एक शनिक प्रदर्शन है, जिसका अंत पहले से निश्चित है
20:35ठीक वैसे ही, जैसे एक कठपुतली अपने नचाने वाले के इशारे पर नाचती है, पर वह स्वयन को उस निश्चय
20:43का करता नहीं मानती, मुक्त पूरुष भी स्वयन को कर्मों का करता नहीं मानता
20:49प्रत्येक कार्यत प्रत्येक घटना उसके लिए पहले से तय स्क्रिप्ट का हिस्सा होती है, जिसे वह बिना किसी निजी इच्छा
20:57या अनिच्छा के सहज्टा से स्विकार करता है
21:01गरुड इस बोध से ही वह पुरुष सांसारिक उलजनों से उपर उठ जाता है, जैसे कमल जल में रहकर भी
21:08उससे निरलिप्त रहता है, विश्णु ने शांत स्वर में कहा
21:13चाहे वह राजा हो या रंक, विद्वान हो या मूर्ख, वह अपने प्रारब्ध के अनुसार प्राप्थ हुई हर भूमिका को
21:20सहज्टा और पूनता से जीता है
21:24जैसे एक नदी अपने निर्धारित मार्ग पर बहती है, पहाड को भी चीर कर, वैसे ही जीवन्मुक्त का जीवन भी
21:31अपने प्रवाह में चलता रहता है, बिना किसी अवरोध या प्रतिरोध के
21:37उसके मन में किसी भी प्रकार की इच्छा या कामना का उदे नहीं होता, नहीं किसी स्थिती से उसे कोई
21:44अनिच्छा होती है, वह केवल वर्तमान में स्थित रहता है
21:49गरुर यह वही अवस्था है जहां द्वंद्व समाप्थ हो जाते हैं और केवल एक शाश्वत अविचल शान्ती बनी रहती है
21:57विश्णों ने अपनी आखे मूंद कर कहा
22:01चाहे उसे प्रशंसा मिले या अपमान, लाभ हो या हानी वह इन सभी को नाटक के अलग-अलग ग्रिश्यों के
22:08रूप में देखता है जो उसे भीतर से छू नहीं पाते
22:12उसका मन एक अटल परवत के समान होता है, जो आधी तूफान या वर्शा से विचलित नहीं होता, अपनी अचल
22:20स्थिती में स्थिर रहता है
22:23उसके लिए यह संपूर्ण संसार और उसमें घटित होने वाली हर घटना साक्षात ब्रहमा की एक अध्भुत और अनन्त लीला
22:31बन जाती है
22:34हर कण में उसे ब्रहमा का ही विराट और अविभाजय रूप दिखाई देता है, हर जीव में वही परम चेतना
22:41स्पंदित होती हुई प्रतीत होती है
22:44वह इस ब्रहमांडिय नाटक का केवल एक साक्षी है जो प्रत्येक द्रिश्य का आनन्द लेता है पर स्वयन को उससे
22:52बंधा हुआ नहीं पाता
22:54इस प्रकार वह अपने प्रारब्ध करमों का निर्वाह करते हुए भी उन करमों के फल से पूरी तरह मुक्थ होकर
23:02जीवन जीता है
23:04यह उसकी निश्क्रेता नहीं, बलकि अहंकार रहित कर्मयोग की परम अवस्था है, जहां कार्य होते हैं, परंतु कर्ता का अहंकार
23:13विलीन हो चुका होता है
23:16गरुर ने ध्यानपूर्वक सुना, उसकी आखों में गहरी समझ और श्रद्धा का भाव स्पष्ट जलक रहा था, जैसे उसे परम
23:24सत्य का एक नया आयाम मिल रहा हो
23:27वह दूसरों की सेवा करता है, दुखियों के आसु पोँचता है, समाज में सकारात्मक बदलाव लाता है, पर यह सब
23:36एक नहस्वार्थ प्रेमपूर्ण समर्पन से करता है
23:40जैसे एक शांत सरोवर आकाश के तारे, चंद्रमा और सूर्य को अपनी सतह पर बिना किसी विकृती के प्रतिबिम्बित करता
23:49है, वैसे ही जीवनमुक्त का चित्त संसार को यथावत देखता है
23:55जीवनमुक्त का अस्तित्व स्वय एक दिव्य संगीत बन जाता है, जिसकी धुन पर संपूर्ण स्रिष्टी प्रेम और समर्स्ता से नृत्य
24:03करती है, जो ब्रह्मा के विराट आनंद का ही प्रतिरूप है
24:08भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ गरुड की ओर देखा, जैसे उसके हर प्रश्न का उत्तर उनकी आखों
24:16में ही नहित हो, जहां अनंत ज्ञान की धारा बह रही थी
24:20उसके स्पर्श मात्र से मुर्जाय पुष्प पुनह खिल उठते हैं और दुखियों के हृदय में आशा की नई किरन जग्मगा
24:28उठती है, जैसे ब्रह्मा का अम्रित हर कण में प्रवाहित हो रहा हो
24:33यह कोई सचेत प्रयास नहीं, अपितु ब्रह्मग्यान से उत्पन्य एक सहज अवस्था है, जहां कर्म स्वय ही धर्म बन जाते
24:41हैं, बिना किसी इच्छा या अपेक्षा के
24:45जैसे सूर्य अपनी किरने बिना किसी भेद्भाव के हर प्राणी पर बिखेरता है, वैसे ही जीवनमुक्त का प्रेन सभी दिशाओं
24:53में फैलता है, हर आत्मा को प्रकाशित करता हुआ
24:58विश्नु के नेत्रों में ब्रह्मांड की समस्त करुना जहलक रही थी, जब उन्होंने गरूर को इस परम अवस्था का मर्म
25:05समझाया, जो केवल अनुभवग में थी
25:09वह किसी भी भेदभाव के बिना हर जरूरक मंद को सहारा देता है, चाहे वह राजा हो या रंक, साधु
25:16हो या पापी, क्योंकि वह सभी में ब्रह्मा का ही अंश देखता है
25:21उसके लिए कर्म एक बंधन नहीं, बलकि स्वयन ब्रह्मा की लीला में सहभागी होने का एक आनंदमय माध्यम बन जाता
25:29है, जहां हर क्रिया एक उत्सव है
25:33शांत और स्थिर होकर भी, जीवन मुक्त का जीवन संसार में एक अद्रिश्य उर्जा के प्रवाह को जन्म देता है,
25:41जो सकारात मुक्ता से परिपूर्ण होता है और सब को प्रभावित करता है
25:47गरुर्ण ने अपनी पलके जुकाई, उसके भीतर ज्यान का एक नया द्वार खुल रहा था, जिसे वह अब तक केवल
25:54अस्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा था, पर अब स्पष्ट हो रहा था
26:00जिस भूमी पर वह चलता है, वहां की मिट्टी पवित्र हो जाती है, और जिस वायू में वह श्वास लेता
26:06है, वह शुद्धता से भर जाती है, हर कण में दिव्यता का संचार होता है
26:13उसके आसपास की सभी आत्माए एक अनुठी शान्ती और सद्भाव का अनुभव करती हैं, जैसे वे स्वयं ब्रह्मा की गोद
26:21में हो, परम सुरक्षा और आनंद में ली
26:25जीवन मुक्त का जीवन एक दरपण है, जो हर आत्मा को उसकी अपनी दिव्यता और ब्रह्मा के साथ उसके अटूट
26:33संबंध को दर्शाता है, एक शाश्वत सत्य के रूप में
26:38भगवान विश्णु ने अपनी उंगली उठाई, जैसे ब्रह्मान्ड के सबसे गहन सत्य को शब्दों में पिरो रहे हो, यह ही
26:45लोकसंग्रह का वास्तविक अर्थ है, गरुर्प परम ज्यान का मार्ग
26:50वह सीधे हस्तक शेप नहीं करता, बल्कि उसकी मौन उपस्थिती ही दूसरों को धर्म के मार्ग पर चलने के लिए
26:58प्रेरित करती है, जैसे एक शांत दीपक दूसरों को प्रकाश देता है
27:04जैसे नदी बिना किसी प्रयास के अपने मार्ग पर बहती है और जीवन को पोश्ट करती है, वैसे ही जीवनमुक्ट
27:11से धर्म का सहच प्रवाह होता है, जो सभी को सुख देता है
27:17वह संसार में रहते हुए भी संसार से परे हैं, उसके कर्म केवल इश्वर की इच्छा के उपकरण मात्र होते
27:24हैं, बिना किसी व्यक्तिगत आसकती के, परम्त्याग का प्रतीक
27:29गरुर की आखों में अब विस्मय और श्रद्धा का संगम था, उसने अनुभव किया कि वह केवल सुन नहीं रहा,
27:37बलकि स्वय इस दिव्य अवस्था को जी रहा है, साक्षात दर्शन पा रहा है
27:43वह भटके हुए को मार्ग दिखाता है, परोपकार में सनलग्न होता है, और बिना किसी फल की कामना के अपने
27:50सभी कर्तव्य निभाता है, एक निस्वार्थ सेवक के रूप में
27:55और इस प्रकार जीवनमुक्त के प्रत्येक कर्म से संसार ब्रह्मा की एक अविरल आनंदमय और दिव्य लीला में परिवर्तित हो
28:04जाता है, जहां सब कुछ एक है
28:08विष्णु ने आगे बताया कि जीवनमुक्त के लिए यह संसार केवल एक मायावी नाटक नहीं, बलकि ब्रह्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ती
28:16है, जहां हर कण में उसकी अनंध चेतना का स्पंदन होता है
28:22गरूर की आखों में अब एक गहन शान्ती और समझ झलक रही थी, जैसे उसने स्वय इस सत्य का अनुभव
28:29कर लिया हो और विष्णु के मुख पर मंद करुनामय मुस्कान थी
28:35विष्णु ने समझाया की जीवनमुक्त माया के अंतिम सुक्ष्म आवर्ण को भी भेद देता है, जिसे वह अब केवल एक
28:42पारदर्शी सुन्दर नाटक के रूप में देखता है
28:47उसकी दृष्टी में समस्थ सृष्टी एक अदृष्य सूत्र में बंधी हुई, अविभाज्य और अन्वरत ब्रह्मा की लीला बन जाती है
28:56जीवन मुक्त संसार के कोलाहल और घटनाओं को एक साक्षी की भांती देखता है, बिना उनमें लिप्थ हुए, जैसे कोई
29:04तटस्थ दर्शक किसी भव्य नाटक को निहार रहा हो
29:09विष्णू ने अपनी दिव्यवानी में समझाया कि यही साक्षी भाव है, जहां आत्मा स्वयं को करता नहीं, बलकी द्रश्टा जानती
29:17है, संसार के हर पल का मूप गवा
29:21वह संसार के सुख दुख, लाभानी, मान अपमान को देखता है, पर स्वयं इनसे अप्रभावित कमल पत्र पर जल बूंद
29:29की भांती अलिप्त रहता है
29:32यह साक्षी भाव उसे परम स्वतंत्रता प्रदान करता है, जहां वह किसी भी बंधन या अपेक्षा से परेहो कर जीता
29:40है
29:42उसके लिए समय की धारा और स्थान की सीमाएं अर्थहीन हो जाती हैं, क्योंकि वह स्वयं को अनंट और सर्वव्यापी
29:50ब्रहमा का अंश जानता है
29:53गरुर ने विन्यपूर्वक पूछा की क्या इस अवस्था में भी किसी प्रकार की चुनोती या माया का कोई सुक्ष्म प्रभाव
30:00शेश रहता है
30:03विष्णू ने उत्तर दिया कि जीवन मुक्त के लिए माया अब कोई शक्ती नहीं, बलकि एक पारगर्शी परदा है, जिसके
30:11आरपार वह स्पष्ट रूप से देखता है
30:14उसकी चेतना इतनी निर्मल और स्थिर हो जाती है कि माया के सबसे सुक्ष्म छल भी उसे ध्रमित नहीं कर
30:22पाते
30:23संसार उसके लिए एक विशाल मंच बन जाता है, जहां वह अपने कर्मों को एक निशकाम अभिनेता की तरह निभाता
30:31है, बिना किसी भूमिका में बंधे
30:35विश्नु ने कहा, यह स्वतंत्रता तभी प्राप्थ होती है, जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप ब्रह्मा के साथ एकाकार हो जाती
30:43है
30:45उसके कर्म सहेज, स्वतह स्पूर्ट और निश्वार्थ होते हैं, जैसे एक नदी बिना किसी अपेक्षा के बहती है, जीवन देती
30:53हुई
30:55व्यक्तिगत अहंकार का विसर्जन हो जाता है, और वह केवल ब्रह्मा की इच्छा का एक उपकरन बन जाता है
31:03जीवन मुक्त सदैव एक आंतरिक आनंद और शांती में स्थित रहता है, जो किसी बाहरी परिस्थिती पर निर्भर नहीं करता
31:12गरुर ने गहरे सम्मान और कृतग्यता के साथ सिर जुकाया, इस दिव्य ज्यान को अपनी आत्मा में समाहित करते हुए
31:21उसके सानिध्य में अन्य प्राणी भी उस परमशांती और प्रेन का अनुभव करते हैं, जो जीवन मुक्त से अनायास ही
31:29प्रवाहित होता है
31:31और इस प्रकार जीवन मुक्त के प्रत्यक्षण में संपूर्ण ब्रहमांड ब्रहमा की ही अविभाज, अनंत और आनंदमय लीला के रूप
31:40में प्रकट होता रहता है
31:43भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए कहा, जैसे एक नर्तकी मंच पर अपने अंतिम अभिनय के बाद परदा गिरने पर सहच्ता
31:51से अपने पात्र से विदा लेती है, वैसे ही जीवन मुक्त आक्मा इस नश्वर देह को त्याकती है
31:58गरुर ने अपने स्वामी के इन गूड शब्दों को सुनकर गेहन चिंतन में डूपते हुए अपनी सोने जैसी आखों में
32:06एक नई चमक महसूस की
32:09भगवान विश्णू ने अपनी उंगली उठाकर आकाश की ओर संकेत किया, जहां अद्रिश्य ब्रहमांडिय धाराओं का नृत्य हो रहा था,
32:18जैसे जीवन की क्षण भंगुर्ता को दर्शाते हुए
32:22मृत्यू उसके लिए कोई अंत नहीं, बलकी चेतना का एक आयाम से दूसरे आयाम में सहज संक्रमन है, जैसे एक
32:30तितली अपने कोकून से मुक्थ होती है
32:34जीवन मुक्थ आत्मा शरीर का परित्याग वैसे ही करती है, जैसे एक पका हुआ फल्स्वयं ही व्रिक्ष से गिर जाता
32:42है, बिना किसी प्रयास या पीडा के
32:45गरुर ने उच्सुक्ता से पूछा, हे प्रभु, क्या वह आत्मा किसी बंधन में नहीं रहती, यहां तक की देह के
32:53त्याग के क्षण में भी
32:55एक जीवनमुक्त रिशी का शरीर, शांत और स्थेर, एक निरलिप्ट दर्शक की भाती अपनी अंतिम सास छोड़ता है, जैसे जल
33:04पर तैरता हुआ कमल पत्र
33:06प्रांक, सुक्ष्म, उर्जा और मन, देह से ऐसे अलग होते हैं, जैसे धूल भरी हवा से स्वच्छ सुगंध अलग हो
33:14जाती है, बिना किसी अवरोध के
33:17यह विदेह मुक्ती की सहस्ता है, जहां आत्मा अपने भौतिक आवर्ण को त्याग कर अनंत ब्रह्मा में विलीन होने के
33:25लिए यात्रा करती है
33:27गरुर ने देखा की कैसे वह चेतन उर्जा, समस्त लोकों को पार करती हुई बिना किसी रुकावट के परम सक्त्य
33:35की ओर बढ़ रही थी
33:37जैसे एक नदी अंतह सागर में मिल जाती है, वैसे ही जीवन्मुक्त आत्मा अपनी व्यक्तिगत पहचान खोकर ब्रह्मा के असीम
33:46विस्तार में घुल जाती है
33:49वह न जन्म का स्मरण है, नम्रित्यु का भय केवल एकत्व का, शाश्वत आनंद का और पूर्ण शान्ती का अनुभव
33:57है
33:59वह चेतना जो कभी एक देह में सीमित थी, अब समस्त ब्रह्मान को अपनी ही अभिव्यक्ति के रूप में अनुभव
34:07करती है
34:09भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान बिखेरते हुए कहा, यही वह विदेह मुक्ती है, जो सभी बंधनों से परे है
34:17और परम शान्ती प्रदान करती है
34:20यह वह अंतिम अवस्था है, जहां ज्याता, ज्यान और ये का भेद मिट जाता है, और केवल एक ही अद्वैत
34:28सत्ता शेश रहती है
34:31जीवन मुक्त का देह त्याग उसके लिए भय नहीं, बलकि घर वापसी है, अपने ही वास्तविक अनंत स्वरूप में
34:39उस परम अवस्था को प्राप्त करने के बाद, वह आत्मा फिर कभी जन्मम्रित्यू के चक्र में नहीं आती, सदा के
34:47लिए मुक्त हो जाती है
34:49गरूर ने श्रद्धा पूर्वक प्रणाम किया, इस गेहन सत्य को अपनी चेतना में पूर्णता समाहित करते हुए, जो सभी भय
34:58को दूर कर देता है
35:01भगवान विश्णू ने सनेह पूर्ण द्रिष्टी से गरूर को देखा, उनके मुख पर परम संतोष और अनंत ज्यान की आभाथी
35:09और इस प्रकार गरूर पुरान के गहनतम रहस्यों में से एक जीवन मुक्त की विदेह मुक्ती का वर्णन समाप्थ हुआ,
35:17ब्रहमांड में शाश्वत शांती की गूंच छोड़ते हुए
35:21विश्नु के मुख से निकले ये शब्द ब्रहमांड के अनंत विस्तार में गूंज रहे थे, जहां प्रत्येक कन परम सत्य
35:28की महिमा का साक्षी था
35:31भगवान ने अपनी दिव्यवानी में आगे कहा कि विदेह मुक्ती कोई अंत नहीं, बलकि चेतना का वह परम विस्तार है,
35:39जहां द्वैत का भ्रम पूर्णत ह मिख जाता है
35:43उस अवस्था में, जीवन मुक्त आत्मा स्वय को ब्रहमा से भिन्न नहीं पाती, जैसे एक लेहर सागर से अलग नहीं
35:50होती
35:52यह मैं और मेरा के सभी बंधनों से परे, अस्तित्व का वह शुद्ध अनुभव है, जहां केवल एक ही शाश्वत
35:59सत्य के रूप में प्रकाशित होता है
36:03जीवन मुक्त की चेतना ब्रहमांड की चेतना में घुल जाती है, जहां न कोई सीमा है, न कोई शुरुवात और
36:10न कोई अंत
36:12गरुर ने आखे बंध की, अपने भीतर उस असीमित विलय का अनुभव करने का प्रयास करते हुए, जिससे उनका हृदै
36:20श्रद्धा से भर गया
36:22विष्णु ने समझाया की यह कोई भौतिक विलय नहीं, बलकि पहचान का आध्यात्मिक विसर्जन है, जहां व्यक्तिगत अह ब्रहमा की
36:31विराट्ता में विलीन हो जाता है
36:34इस अवस्था में जन्ममर्ण का चक्र तूट जाता है और आत्मा शाश्वत शांती के महासागर में गोता लगाती है
36:43तब जीवन मुक्त देखता है कि यह संपूर्ण स्रिष्टी अपने सभी रूपों और नामों के साथ केवल ब्रहमा की ही
36:51एक शाश्वत अभिव्यक्ति है
36:55भगवान विश्णु का मुखमंडल परम आनन्द से दीप्थ था जैसे वे स्वया उस एकात्मता का अनुभव कर रहे हों जिसकी
37:03वे व्याख्या कर रहे थे
37:05यह वह स्थिती है जहां ज्यान और ये ध्याता और ध्ये का भेद मिट जाता है और केवल शुद्ध चेतना
37:12ही शेश रहती है
37:15समस्थ दुहक भय और अज्यान का अंधकार इस परम ज्यान के प्रकाश में पूरी तरह से लुप्थ हो जाता है
37:24जीवन मुक्ट आत्मा को संसार की कोई भी घटना विचलित नहीं कर पाती क्योंकि वह सबको ब्रह्मा की ही लीला
37:31के रूप में देखती है
37:34गरुर ने गहन्ता से सिरहिलाया इस परम सत्य को अपनी आत्मा की गहराईयों में आत्म साथ करते हुए जो सभी
37:41भेदों को शांत कर देता था
37:44विश्णू ने कहा यह वह परम ज्यान है जो तुम्हें भवसागर के पार ले जाएगा और तुम्हें ब्रह्मा से एकाकार
37:52कर देगा
37:53समस्त कामनाए शांत हो जाती हैं और केवल आत्मस्वरूप में स्थित रहने का अखंड आनंधी शेश रहता है
38:02यह विदेह मुक्ती का चरम है जहां जीवन मुक्त अपनी स्वयं की शाश्वत अविभाज्य प्रकृती का अनुभव करता है
38:11भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य आभा से गरूर को घेरे रखा जैसे यह ज्यान स्वयं प्रकाश बनकर उन्हें समाहित कर
38:19रहा हो
38:21यह परम शान्ती का उच्चतम शिखर है जहां आनंध ही एक मात्र अस्तित्व का स्वरूप बन जाता है
38:29और इस प्रकार गरूर पुरान के अंतिम और सर्वोच सत्यक जीव और ब्रह्मा के परम विलै का दिव्य प्रवचन संपन
38:37हुआ

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