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Ep #56: अहं ब्रह्मास्मि के गूढ़ रहस्य के बाद, भगवान विष्णु गरुड़ को परम मुक्ति का एक और अद्भुत मार्ग दिखाते हैं: 'परम भक्ति'। क्या आप जानते हैं कि कैसे निस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण से अहंकार का अंत होता है, और भक्त को साक्षात ब्रह्म का अनुभव होता है? इस एपिसोड में, हम जानेंगे कि कैसे ज्ञान और भक्ति अंततः एक ही सत्य पर आकर मिलते हैं, और कैसे एक साधारण मनुष्य भी परम आनंद को प्राप्त कर सकता है। विष्णु बताते हैं एक सच्चे भक्त के लक्षण, निष्काम कर्म का रहस्य और आंतरिक आनंद की पराकाष्ठा। यह एपिसोड आपकी आध्यात्मिक यात्रा को एक नई दिशा देगा! #गरुड़पुराण #GarudaPurana #BhaktiYoga #मोक्ष #आत्मज्ञान #परमभक्ति #Vishnu #सनातनधर्म #ज्ञानयोग #अहंब्रह्मास्मि #मुक्ति #आध्यात्मिकयात्रा #हिंदुत्व #Mythology #पुराण #एकात्मता #ब्रह्मज्ञान #जीवनमुक्त #कर्मयोग
Transcript
00:00भगवान विश्नु के अहां ब्रहमास्मी और अहंकार के विलय पर दिये गए गहन प्रवचन से गरुर का मन अभी भी
00:06उसी दिव्य ज्ञान में डूबा हुआ था।
00:09परम ज्ञान की इस वर्षा से अभीभूत गरुड ने बड़े ही विनीत भाव से अपने स्वामी भगवान विश्नु की ओर
00:17द्रिष्टी उठाई।
00:18उनके हृदय में मानवता के प्रती गहरी करुणा जागरित हुई और उन्होंने अपनी जिग्यासा को विन्यपूर्वक शब्दों में ढालना शुरू
00:27किया।
00:29ब्रहमांडिय निरवता में एक क्षण के लिए प्रित्वी पर साधारन मनुष्यों के सांसारिक बंधनों और कर्तवियों का एक सुक्ष्म आभास
00:38तैर गया, जो वैकुंठ की दिवे शांती के विप्रीत था।
00:42गरूर ने अपनी मुख मुद्रा में विन्मर्ता और नेत्रों में जिग्यासा लिये हुए प्रश्न किया कि कैसे साधारन मनुष्य इस
00:50परमस्थिती को प्राप्त कर सकते हैं।
00:54भगवान विश्णु ने गरूर की ओर करुणापूर्ण नेत्रों से देखा, उनके हुठोन पर एक शांत और रहस्य में मुस्कान तैर
01:02रही थी, मानो वे पहले से ही इस प्रश्न की प्रतीक्षा कर रहे थे।
01:07उन्होंने धीमे से अपना सिर जुकाया, मानो अनंत काल से एकत्रित ज्यान की नई धारा को प्रवाहित करने की तैयारी
01:15कर रहे हो।
01:16जैसे ही उन्होंने सिर जुकाया, उनके दिव्यस्वरूप से एक कोमल सुनहरी आभा का प्रस्पुटन हुआ, जो वैकुंट के वातावर्ण में
01:25एक नई उर्जा का संचार कर रहा था।
01:29फिर भगवान विश्णू ने अपनी मधुरवाणी में, जो ब्रहमांड के हर कण में प्रतिध्वनित होने लगी, मुक्ती के एक वैकल्पिक
01:37मार्ग का अनावरण करना आरंभ किया।
01:40उन्होंने समझाया कि हर कोई अह ब्रहमास्मी की चरम अवस्था को सीधे प्राप्ट नहीं कर सकता, क्योंकि सांसारिक आसक्तियां आत्मा
01:49को बांधे रखती हैं।
01:52उन्होंने मनुष्यों की उस स्थिती पर प्रकाश डाला जहावे परिवार, समाज और भौतिक इच्छाओं के जाल में उलजे रहते हैं,
02:00जिनके कारण अहमकार का पूर्ण विलय कठिन होता है।
02:05वैकुंठ की दिव्य आभा के भी तरभी, एक क्षण के लिए माया के सुक्ष्म धागों का एक अद्रिश्य जाल प्रतिकात्मक
02:13रूप से उभर आया, जो मनुष्यों को कर्म और इच्छा के बंधनों में जक्रे हुए था।
02:19परंतु उन्होंने आश्वासन दिया की एक सरल अधिक सुलब मार्ग भी है, जो हर प्राणी के लिए मुक्ती का द्वार
02:27खोल सकता है।
02:29उन्होंने परंभक्ती के मार्ग का वर्णन किया, जहां आत्मा मैं के भाव को त्याग कर पूर्ण तहतु यानी परमात्मा में
02:37लीन होने की इच्छा रखती है।
02:40उन्होंने समझाया की कैसे एक साधारन भक्त भी प्रेम, विश्वास और निस्वार्थ सेवा के माध्यम से ब्रहमा से एकाकार हो
02:48सकता है।
02:50वैकुंट की अलौकिक शान्ती में एक हंबल दीपक की लौकी तरह एक भक्त के हृदय से निकलती शुद्ध भक्ती का
02:58प्रतीकात्मक रूप से दिव्य उर्जा से जुरता हुआ प्रतीत हुआ।
03:04विष्णू ने आगे बताया कि इस मार्ग पर मैं का अहंकार धीरे-धीरे मिटता जाता है और केवल परमात्मा तुकी
03:11सर्वव्या पक्ता का बोध शेश रहता है।
03:15गरुर ने गहरी संतुष्टी और नवजात आशा के साथ सुना, उनके नेत्रों में एक नई चमक थी जो इस सुलब
03:23मार्ग की स्पष्टता को दर्शा रही थी।
03:26भगवान विश्णु ने अपने प्रवचन का समापन करते हुए बताया कि कैसे मैं अंत्त तुमें विलीन हो जाता है जब
03:34भक्ती ब्रह्मा से मिलन का द्वार बनती है।
03:38वैकुंट के केंद्र में मैं और तु का दिव्य मिलन एक स्वर्णिम प्रकाश के रूप में प्रस्पुटित हुआ जिसने संपूर्ण
03:45स्रिष्टी को प्रेम और एकात्मता के संदेश से भर दिया।
03:50वैकुंट के उस दिव्य प्रकाश के बीच गरुड ने उचसुकता से पूछा की ज्यान के दुर्गम मार्ग के अतिरिक्त क्या
03:57कोई ऐसा सरल मार्ग भी है जो सीधे परमात्मा के चर्णों तक ले जाता है।
04:04भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए अपने परम भक्त की ओर देखा और गंभीर स्वर में परम भक्ती के उस परम
04:11गोपनिय रहस्य को प्रकट करना आरंभ किया।
04:15नारायन ने अपने करक्मलों से एक दिव्य कमल पुष्प को चुआ जिससे बहती हुई प्रकाश की किरने भक्ती के मार्ग
04:22की सरलता को दर्शाने लगी।
04:25उन्होंने स्पष्ट किया कि भक्ती केवल यग्य और कर्मकांडों की शुष्क प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा के प्रती एक
04:34सहज और अविरल प्रेम है।
04:37जैसे जैसे श्रीहरी बोलते गए, वैकुंठ का आकाश दिव्यरागों से गूंच उठा और वहां उपस्थित प्रत्येक तत्व भक्ती के रंग
04:45में सराबोर होने लगा।
04:47गरुर ने विस्मय और श्रधा से अपने पंखों को समेट लिया, उनके नेत्रों से भक्ती के आनंद के अश्रु बहने
04:55लगे।
04:56विश्नु ने इंगित किया कि कैसे एक सच्चा भक्त संसार के हर छोटे से छोटे जीव में भी केवल अपने
05:03प्रभु का ही स्वरूप देखता है।
05:07इस अवस्था में भक्त और भग्वान के बीच का मैका परदा पूरी तरह हट जाता है और केवल अनन्य प्रेम
05:14का सामरा जिशेश रहता है।
05:17वैकुंठ की नदिया जो दिव्य अमरित के समान थी इस पावन सत्य को सुनकर और भी तीवर गती से कलकल
05:25ध्वने करती हुई बहने लगी।
05:28भग्वान विश्णु ने अपने गंभीर और स्नहमई स्वर में समझाया कि ज्ञान जहां मन को त्रिप्ट करता है, वहीं भक्ती
05:35सीधे आत्मा को परमात्मा से एकाकार कर देती है।
05:40उन्होंने गरूर को एक ऐसे भक्त का उदाहरन दिया जो पत्थरों में भी प्रभू की मूर्ती देखकर रोपड़ता है और
05:48उसे गले से लगा लेता है।
05:51यह समर्पन इतना प्रगाड होता है कि ब्रहमांड की सभी शक्तियां उस भक्त की सेवा में स्वतही तत्पर हो जाती
05:59हैं।
06:01संपूर्ण वैकुन्थ लोक इस अनूठे समवाद के प्रभाव से एक अत्यंत शांत और ध्यानमई अवस्था में डूग गया जहां वायू
06:09भी ठहर सी गई थी।
06:12गरुर के मन में उठा हर संशय अब विलीन हो चुका था और उनके हृदय में भक्ति के उस परम
06:18मार्क के प्रती अटूट विश्वास जागरत हो गया।
06:21भगवान विश्णु ने अपने दक्षिन हस्त को उठा कर गरुर को आशिरवाद दिया, जिससे एक स्वर्णिन प्रकाश की लेहर उनके
06:30मस्तक को स्पर्श कर गई।
06:32उसक्षन भक्ती का वह गुप ज्यान वैकुंट से निकल कर संपूर्ण चराचर जगत में एक शीतल और जीवंदाई वायू के
06:41रूप में प्रवाहित होने लगा।
06:43ज्यान और भक्ती के इस सुन्दर समन्वय को देखकर देवगन भी स्वर्ग से वैकुंट की और पुष्पवर्शा करने लगे।
06:52श्रीहरी ने गरूर से कहा कि जो कोई भी इस भक्ती मार्ग का आश्रे लेता है, उसे संसार के किसी
06:59भी भय का सामना नहीं करना पड़ता।
07:02गरूर ने नत्मस्तक होकर भगवान के चर्णों की धूली को अपने माथे से लगाया, जो उनके पूर्ण समर्पन की पराकाश
07:10था थी।
07:12इस प्रकार वैकुंठ में गरूर के समक्ष परम भक्ती का वह रहस्य उजागर हुआ जिसने मैं को सदैव के लिए
07:19तू के अनंत सत्य में विलीन कर दिया।
07:22भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए गरूर को समझाया कि सच्चे भक्त का हृदय किसी जलती हुई ज्वाला के समान नहीं,
07:30बलकि एक शांत अथा सरोवर की तरह होता है, जिसमें केवल प्रेम की लहरें उठती हैं।
07:38गरूर जिनके मन में अब तक मैं और तू का द्वंद्व था, अब श्रीरी के मुख से निस्वार्थ प्रेम के
07:44इस गूड रहस्य को सुनकर विसमय और गहन श्रधा से भर उठे।
07:49विष्णु ने समझाया कि ऐसा भक्त इश्या की आग से अचूता होता है, उसका मन दूसरों की प्रक्ती देखकर प्रसन्न
07:57होता है, ठीक वैसे ही जैसे एक कमल सूर्योदय से खिल उठता है।
08:03एक सच्चे भक्त के हृदय में घ्रिणा का कोई स्थान नहीं होता, क्योंकि वह हर जीव में उसी परम सत्ता
08:10का अंश देखता है, जो उसे स्वय में अनुभग होती है।
08:15श्रीहरी ने आगे कहा कि मोह और अहंकार की बेडिया उस भक्त को कभी बांध नहीं पाती, क्योंकि वह जानता
08:23है कि सभी सांसारिक संबंध और पहचान क्षनभंगुर माया मात रहें।
08:29गरुर ने अपने स्वामी के इन वचनों को अपने हृदय में उतारा, जैसे एक प्यासी भूमी वर्षा की बुदों को
08:37सोख लेती है और उनके नेत्रों में गहन बोध की चमक तैरने लगी।
08:42विश्णू ने अपने करुणापून स्वर में कहा कि ऐसा भक्त गयालू होता है जो हर प्रानी के दुख को अपना
08:49दुख मानता है और उसे दूर करने का प्रयास करता है।
08:54वह विनम्र होता है ज्यान के शिखर पर पहुँच कर भी स्वय को सबसे छोटा सेवक मानता है क्योंकि वह
09:01जानता है कि वास्तविक शक्ती अहमकार में नहीं बलकि नमरता में नहित है
09:08विष्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ बताया कि ऐसे भक्त के लिए मित्र और शत्रु में कोई भेद नहीं
09:15होता वह सभी के प्रती समान भाव रखता है जैसे सूर्य सभी पर समान रूप से प्रकाश डालता है
09:24गरुर के चहरे पर शांती की एक नई लहर गौड़ गई उन्होंने अनुभव किया कि यह केवल उपदेश नहीं बलकि
09:32स्वयं ब्रह्मा का सार है जो उनके समक्ष प्रकट हो रहा था
09:37श्रीहरी ने आगे कहा कि सुख और दुख उस भक्त के लिए केवल मन की अवस्थाए होती हैं जिन में
09:43वह समान रूप से स्थित रहता है जैसे परवत आधी और धूप दोनों में अटल खड़ा रहता है
09:51उसकी भक्ती सहज और बिना शर्थ होती है किसी लाभ की अपेक्षा के बिना जैसे एक नदी बिना किसी स्वार्थ
09:58के समुद्र की ओर बहती है
10:02वह सांसारिक लाभ्या यहां तक की मोक्ष की इच्छा से भी रहित होता है, क्योंकि उसकी एक मात्र इच्छा अपने
10:09परम्प्रिय के साथ शाश्वत संबंध में लीन रहना है
10:14गरुर के नयन अब अश्रुपूरित थे, यह श्रद्धा के आसू थे जो मैं के अहंकार को धोकर तू की परमसत्ता
10:21में विलीन होने की स्विकृती दे रहे थे
10:25विश्नु ने कहा कि ऐसे भक्त के लिए मेरा स्मरण ही उसका जीवन होता है और उसकी प्रत्येक श्वास मेरे
10:32नाम के साथ प्रवाहित होती है
10:36उसकी भक्ती इतनी गहरी होती है कि वह मुझे हर कण में देखता है, हर ध्वनी में सुनता है और
10:43हर स्पर्ष में अनुभव करता है
10:46ऐसे भक्त का मन सदैव मुझ में स्थिर रहता है, जैसे एक कमपास की सुई हमेशा उत्तर दिशा की ओर
10:53संकेत करती है
10:56गरूर ने अन्तह स्वयन को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया, उनका अहम अब परम के विशाल सागर में एक
11:03गूंद की भाती विलीन हो चुका था
11:06विश्णु ने प्रेम से अपने भक्त गरूर के मस्तक को स्पर्श किया, जिससे अनन्त ज्यान और परम शांती का एक
11:13दिव्य प्रवाह उनमें समा गया
11:16इस प्रकार वैकुंठ में परम भक्ती का मार्ग पूर्ण हुआ, और मैं के बाद तुका शाश्वत सत्य गरूर के हिदय
11:23में सदैव के लिए अनकित हो गया
11:26गरूर की आत्मा में अब वैकुंठ के अनन्त विस्तार और परमात्मा की अनुपम शांती का प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा था,
11:34जहां सभी भेद मिट चुके थे
11:37भगवान विश्णू ने अपनी मधुरवानी में भक्ती के उस गहंतम रहस्य को उदघाटित करना आरंभ किया, जो मैं के भ्रम
11:45को मिटाता है
11:48उन्होंने समझाया की कैसे अहंकार एक परचाई मात्र है, जो आत्मा के वास्तविक प्रकाश को क्षण भर के लिए ही
11:56ढख सकती है
11:58जैसे एक विशाल सागर में मिलकर नदिया अपना नाम और रूप खो देती हैं, वैसे ही भक्ती में लीन जीव
12:05अपनी व्यक्तिगत पहचान विलीन कर देता है
12:09इस परम मिलन में करता और भोक्ता का द्वायत मिट जाता है, शेश केवल शुद्ध चेतना का अनादी अनन्त प्रवाह
12:17रहता है
12:19गरुर ने भगवान के वचनों को हरिदय से ग्रहन किया, उनकी हर बात एक नए सक्य के द्वार खोल रही
12:26थी
12:27भगवान ने बताया कि कैसे मैं और मेरा के बंधन ही जीव को जन्ममृत्यू के चक्र में फंसाये रखते हैं
12:36जब हरिदय पूर्ण रूप से परमात्मा को समर्पित हो जाता है, तब ये बंधन स्वतह ही तूट जाते हैं और
12:43आत्मा परम स्वतंत्रता का अनुभव करती है
12:48वैकुंठ के शांत वातावर्ण में यह दिव्य समवाद जारी था, जिसने गरूड के भीतर एक नई चेतना का उदे किया
12:57आत्मजग्यासा की गेहन यात्रा, जो स्वयं के क्यों और क्या का अनुवेशन करती है, अंतर इसी अवस्था तक ले जाती
13:04है
13:06मैं का भाव जब तुमें विलीन होता है, तब ही ब्रहमा से सच्चा मिलन संभव हो पाता है, जहां कोई
13:13प्रिथक्करन नहीं रहता
13:16यह परम भक्ती का ही परिणाम है, जब भक्त और भगवान के बीच की दूरी शूनि हो जाती है, और
13:23दोनों एक ही सत्ता बन जाते है
13:26भगवान ने समझाया कि यह केवल एक सैध्धान तिक समझ नहीं, बलकि एक जीवन्ट अनुभव है जो प्रत्येक आत्मा प्राप्त
13:34कर सकती है
13:37गरुर के मन में इस सत्य को जीवन में उतारने की तीवर इच्छा जागरित हुई, जो उनके भीतर प्रकाश की
13:44एक नई किरण जगा रही थी
13:47आसक्ती के सभी बंधन, चाहे वे किसी भौतिक वस्तु से हो या रिष्टों से भक्ती की अग्नी में जलकर राख
13:54हो जाते हैं
14:14गरुर के नेत्रों में अब केवल परमात्मा का ही प्रतिबिंग था, उनका रोमरोम इस परम सत्य से पुलकित हो उठा
14:21था
14:23उनका व्यक्तिगत स्वयं अब अनंत ब्रह्मा की शाश्वत धारा में पूरी तरह से घुल चुका था, एक बूंद के सागर
14:30में मिलने जैसा
14:32मैसे तू तक की यह यात्रा पूर्ण हुई, जहां भक्त स्वय भगवान का ही स्वरूप बन गया, परम आनंद में
14:39ली
14:41भगवान विश्णु ने शांत और गंभीर स्वर में गरूर से कहा कि परम भक्त के लिए यह संपूर्ण ब्रह्मांड स्वयं
14:48परमात्मा की ही एक जीवन्त अभिव्यक्ति बन जाता है
14:53गरूर का रोमरोम पुलकित हो उठा, उनका चित अब उस सुक्ष्म विश्वरूप के अनुभव को ग्रहन करने के लिए पूर्णत्य
15:00तैयार था, जो उनके आंतरिक दर्शन में प्रकट होने वाला था
15:05वे प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक घटना और प्रत्येक कार्य में परमात्मा की अविच्छिन उपस्थिती को महसूस करते हैं, जिससे उनकी वास्तविक्ता
15:15की धार्ना सांसारिक से पवित्र में बदल जाती है
15:19यह केवल एक द्रिश नहीं, अपितु एक गेहन अनुभव है, जहां भक्त का स्वयंका में अनंत ब्रह्मा के तूमें विलीन
15:28होकर एक आकार हो जाता है
15:31भगवान विश्णु ने अपनी मधुरवानी में समझाया, के गरुर जब भक्त का हृदय पूर्नता शुद्ध हो जाता है, तब वह
15:39संसार को अपनी संकीर्न द्रिश्टी से नहीं, अपितु ब्रहमा की व्यापक द्रिश्टी से देखता है
15:46गरुर ने अपनी आखें बंद कर ली, उनके भीतर एक अद्रिश्य द्वार खुल रहा था, जहां से ब्रहमांड की अनंत्ता
15:54प्रवाहित हो रही थी, उनके अंतरंग में विलीन होती जा रही थी
15:59उन्हें प्रत्येक तारे में एक इश्वरिय चमक, प्रत्येक नदी में एक पवित्रधारा, और प्रत्येक पर्वत में एक अटल संकल्प दिखाई
16:07देने लगा, सब कुछ परमात्मा का ही विस्तार
16:11यह एक ऐसा क्षन था जब द्रिश्यमान और अद्रिश्य के बीच की सभी दीवारे ढह गई, केवल एक ही अनंत
16:19अखंडित सत्यशेश रह गया, जो हर ओर व्याप्ट था
16:24विश्नु ने अपनी उंगली से आकाश की ओर संकेत किया, जहां असंख्य आकाश गंगाई धीनी गती से घुमती हुई दिखाई
16:32दे रही थी, प्रत्येक एक सुक्ष्म ब्रहमांड अपनी महिमा में
16:37गरुर ने अनुभव किया कि वह स्वय इन सभी आकाश गंगाउं का हिस्सा हैं, हर जीव के भीतर स्पंदित होने
16:44वाली उसी दिव्य उर्जा का अविनाशी अंश
16:48हर हसी, हर आसू, हर संघर्ष और हर विजय उन्हें परमात्मा की ही लीला का एक अविभाज अंग प्रतीत होने
16:56लगा, एक भव्यन रित्य का हिस्सा
16:59यह विश्वरूप का दर्शन था, जो केवल आखों से नहीं, अपितु हरिदय की परम पवित्रता और भक्ती के गहनतम भाव
17:07से अनुभव किया जा सकता था
17:10भगवान विश्वु का दिव्य मुस्कान और भी गहरी हो गई, जैसे वे गरूर के भीतर घटित हो रहे इस महान
17:17आध्यात्मिक परिवर्तन को प्रत्यक्ष देख रहे थे
17:21गरूर की आत्मा ने अब यह जान लिया था कि वह न तो शरीर है, न मन अपितु अनंत चैतन्य
17:28का एक अविनाशी अंश है, स्वयं ब्रह्मा का स्पंदन
17:33उन्हें अपने आसपास के सभी प्राणी, चाहे वे छोटे कीठों या भव्यदेव, उसी परमात्मा की अध्वितिय अभिव्यक्तिया लगने लगे, एक
17:42ही चेतना के रूप
17:44भेद और द्वैत की सभी धार्नाय विलीन हो गई, और केवल एक ही अध्वैत, अखंडित सत्ता का बोध रह गया,
17:52जो सर्वत्र व्याप्त थी
17:55विष्णु ने मधूर्ता से कहा, यह वही परमस्थिती है, हे गरुड, जहां भक्त और भगवान के बीच कोई अंतर नहीं
18:03रह जाता, जहां मैं और तु एक आकार हो जाते हैं
18:08गरुड के भीतर अब कोई संदेह, कोई भाय और कोई व्यक्तिगत इच्छा शेश नहीं थी, केवल एक परमशान्ती और आनंद
18:16का शाश्वत अनुभव था
18:19उनका प्रत्येक कर्म, प्रत्येक विचार और प्रत्येक शब्द अब स्वयन परमात्मा की दिव्य इच्छा का ही स्वाभाविक विस्तार बन गया
18:27था, बिना किसी व्यक्तिगत अहं के
18:30इस प्रकार परम भक्ती ही ब्रह्मा से मिलन का अंतिन द्वार बनी, जहां भक्त स्वया अनंत और असीन ब्रह्मा का
18:38ही साक्षात रूप हो गया, शिर आनंद में ली
18:42भगवान विश्णों ने गरोर को समझाया कि कैसे परम भक्ती की गहन स्थिती से ही निश्काम कर्म का उदे होता
18:49है, जिसमें परिणाम की अपेक्षा के बिना निहस्वार्थ सेवा होती है
18:55उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसा भक्त संसार में केवल डिवाइन की एक उपकरण के रूप में कार्य करता है, जिसकी
19:03हर क्रिया व्यक्तिगत इच्छाओं से परे होती है
19:07हर एक कर्म, हर एक प्रयास भगवान को ही समर्पित होता है, जिससे वह कर्म के बाध्यकारी प्रभावों से पूरी
19:15तरह अच्छूता रहता है
19:18जह कर्म का बंधन तोड़ता है, आत्मा को भौतिक अस्तित्व के चक्र से मुक्त करता है और उसे शाश्वत शान्ती
19:25की ओर ले जाता है
19:28गरुर ने महसूस किया कि इस अवस्था में भक्त किसी भी व्यक्तिगत इच्छा से प्रेरित नहीं होता, बलकि उसका हर
19:36कार्य विश्व कल्यान के लिए होता है
19:40विश्णू ने समझाया कि जब सभी इच्छाएं और अपेक्षाएं समाप्थ हो जाती हैं तो शुद्ध प्रेम ही एक मात्र प्रेरक
19:48शक्ती बच्चती है
19:50यह वह स्थिती है जहां व्यक्ति केवल डिवाइन की इच्छा का एक सच्चा और शुद्ध उपकरन बन जाता है, संसार
19:58में शान्ती और धर्म स्थापित करता है
20:02इस अवस्था में प्रत्येक कर्म एक यग्य के समान पवित्र हो जाता है, जिसका फल तुरंग परमात्मा को अर्पित कर
20:10दिया जाता है
20:12गरुड के अंतर्मन में ज्यान का एक नया प्रकाश जग्मगा हुठा, जिसने उनके समस्त संदेहों को पूरी तरह से मिटा
20:20दिया
20:32उन्होंने एक ऐसे साधक का वर्णन किया जो संसार में रहते हुए भी संसार से विरक्त रहता है, जिसका हर
20:39कार्य एक मौन प्रार्थना है
20:42यह पत्थ व्यक्ति को आत्म साक्षात कार की ओर ले जाता है, जहां वह अपनी दिव्यता को हर चीज में
20:49अनुभव करता है
20:51गरूर को अब यह स्पष्ट हो गया था कि निशकाम कर्म ही भक्त को स्वयन ब्रह्मा का साक्षात स्वरूप बना
20:58देता है
21:00विष्णू ने यह भी कहा कि ऐसे भक्त के लिए सुख दुख लाभानी सब समान हो जाते हैं क्योंकि वह
21:07द्वंदवों से उपर उठ चुका होता है
21:11उसका जीवन लोक कल्यान के लिए समर्पित होता है जहां प्रत्येक्ष्वास एक पवित्र संकल्प बन जाती है
21:20यह कर्मयोगी अपनी सभी क्रियाओं को इश्वर को समर्पित करके संसार में रहते हुए भी मोक्ष की अवस्था प्राप्त कर
21:28लेता है
21:30गरुड के भीतर की हर एक कोशिका अब परमात्मा के उस अनंत ज्यान से उत्प्रोत हो चुकी थी
21:37विश्णू ने अन्तह कहा हे गरुड यही जीवनमुक्त की परम अवस्था है जहां मैं का भाव पूर्णत्य विलीन होकर तुमें
21:46समा जाता है
21:48यह वहक्षन था जब भक्त और भगवान का भेद पूरी तरह मिट गया केवल एक असीम अखंड चेतना शेश रही
21:57और इस प्रकार परम भक्ती निश्कान कर्म का रूप लेकर आत्मा को ब्रह्मा से मिलन के अंतिम और शाश्वत द्वार
22:04तक ले गई
22:06भगवान विश्णों की वानी सुनकर गरुर का हृदय असीम शान्ती से भर गया और वे वैकुंठ के दिव्यक चमकते हुए
22:14स्वर्ण महलों के बीच परम सत्य को समझने के लिए उच्शुखो उठे
22:19परमिश्वर ने अपने परम भक्त की ओर देखा और गंभीर स्वर में समता के उस मार्क का उद्धाटन किया जो
22:26सुख और दुख दोनों को समान कर देता है
22:30उन्होंने समझाया कि एक सच्चा भक्त संसार के द्वंदवों के थपेडों के बीच भी उसी प्रकार स्थिर रहता है जैसे
22:38कोई भारी शिला प्रचंड आंधी में अडिग रहती है
22:43जैसे जल में रहने वाला कमल का पत्ता पानी से कभी गीला नहीं होता वैसे ही जीवनमुक्त पुरुष संसार में
22:50रहकर भी उसके मुहमाया से अचुता रहता है
22:55विष्णुजी ने वैकुंट की असीन सीमा की ओर संकेत करते हुए कहा कि एक ज्यानी का मन विशाल सागर की
23:02भांती होता है जिसमें कितनी ही नदिया आकर मिले पर वह कभी अपनी मर्यादा नहीं खोता
23:09गरुर ने अपनी विशाल सुवर्ण पंखों को समेट कर भगवान के चर्णों में सिर जुकाया उनके मन का संशय अब
23:16धीरे-धीरे ज्यान के प्रकाश में विलीन हो रहा था
23:21भगवान ने अपने वरध हस्त में एक दैविय प्रकाश पुंच धारण किया जो उस अडिक जोती का प्रतीक था जो
23:28हर परिस्थिती में समान रूप से जलती है
23:32संसार की सफलता और विफलता उसके लिए केवल दो रितूओं की तरह हैं जो आती हैं और चली जाती हैं
23:39किन्तु उसके आत्मिक सामराज्य को हिला नहीं पाती
23:44वैकुंट के स्वर्ण स्तंभों से टकरा कर आती हुई दिव्य रश्मियों के बीच नारायन ने मान और अपमान के चक्रवियों
23:51से उपर उठने का परम सत्य प्रकट किया
23:55उन्होंने कहा कि जब जीव यह समझ लेता है कि मान और अपमान केवल अहंकार की चाया मात रहें तब
24:03वह परमशान्ती को प्राप्त कर लेता है
24:06इस सत्य को दर्शाने के लिए महल के केंद्र में एक दिव्य दर्पन प्रकट हुआ जो आने वाली हर परचाई
24:13को बिना प्रभावित हुए प्रतिविंबित कर रहा था
24:17सच्चा भक्त वह है जिसके भीतर का आत्मुबल किसी भी बाहरी प्रलोभन या निंदा रूपी बानों को अपने भीतर समा
24:25कर शांत कर देता है
24:28जैसे ही ये दिव्य उपदेश पूर्ण हुए वैकुंट के वातावर्ण में एक ऐसी मौन और अगाध निरवताचा गई जो शब्दों
24:36से परे थी
24:38गरुर के भीतर एक अभूत पूर्व रुपान तरण हुआ उनके मुख पर भय और संशय का स्थान एक अलोकिक और
24:45स्थिर मुस्कान ने ले लिया
24:48विश्नु ने समझाया कि जीवन मुक्त आत्मा के लिए सारा संसार केवल ब्रह्मा का ही विस्तार है वहां न कोई
24:55पराया है और न कोई शत्रुट
24:58जैसे एक दीपक बिना हिलेडुले घोर अंधकार में भी अपनी लौ को अडिग रखता है वैसे ही समतामे स्थित योगी
25:06का चित कभी विचलित नहीं होता
25:09अब वैकुंठ का कणकन उस दिव्य ज्यान की तरंगों से स्पंदित हो रहा था जिसने भक्त और भगवान के बीच
25:16के अंतिम भेद को भी मिटा दिया था
25:20भगवान विश्णु ने अपने दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में उठाया जिससे अनंत आशिरवात की रश्मिया गरुड के हृदय की
25:28ओर प्रवाहित होने लगी
25:30ज्यान के इस अंतिम रहस्य को ग्रहन कर गरुड के हाथ श्रद्धा पूर्वक जुडग गये और उनका रोमरोम नारायन के
25:38प्रती कृतग्यता से भर गया
25:40इस प्रकार गरुड पुरान का यह पावन समवाद आत्मा को उस परम ब्रह्मा से मिला गया जहां केवल अनंत अखंड
25:48और शाश्वत चैतन्य ही शेश रहता है
25:52भगवान विश्णु ने कहा कि परमानंद वह अवस्था है जहां आत्मा सासारिक बंधनों से मुक्त होकर ब्रह्मान्डिय प्रेन के महासागर
26:01में गोता लगाती है
26:04गरूर अपनी विशाल काया को नमर्ता से जुकाए उस परम सत्य को हृध्यंगम करते हुए अत्यंत एकागरता से अपने आराध्य
26:12की वानी सुन रहे थे
26:14यह आनंद बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता बलकि आंतरिक शुद्धी और प्रभु के प्रती पूर्ण समर्पन का स्वाभाविक परिनाम
26:24है
26:25यह पर्मानंद ब्रह्मांड की परम वास्तविक्ता का एक छोटा सास्वाध है जो हर सासारिक सुख से कहीं अधिक मधुर और
26:34चिरस्थाई है
26:36एक भक्त के जीवन में यह पर्मानंद शाश्वत संतोष और गेहन आंतरिक शांती की स्थिती लाता है जो कभी भंग
26:44नहीं होती
26:46गरुड के मुख पर एक शांत और विस्मयकारी अभिव्यक्ती थी जैसे उनके भी तरभी उस आनंद की हलकी सी अनुभूती
26:54जागरित हो रही हो
26:56यह शांती आत्मा के गहरे कुए से निकलती है जहां परम्पिता परमात्मा का वास है जो सभी भय और चिंता
27:04से परे है
27:06जब भक्त का हरिदय शुद्ध हो जाता है तो वह स्वय प्रभू के आनंद का मंदिर बन जाता है जहां
27:13सदैफ प्रेम की जोती प्रजवलित रहती है
27:17परमानंद की स्थिती में इच्छाओं का चक्र समाप्थ हो जाता है क्योंकि आत्मा को अब कुछ भी बाहरी रूप से
27:24प्राप्त करने की आवश्शक्ता नहीं महसूस होती
27:28भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ समझाया कि यह आंतरिक समरिधी ही सक्ची स्वतंत्रता है जो आत्मा को
27:36स्वय में पूर्ण बनाती है
27:40सांसारिक इच्छाओं के सुक्ष्म धागे जो कभी आत्मा को जकरते थे अब सुनहरी रोश्णी में घुलते हुए उल्न मुक्ती का
27:48संकेत देते हैं
27:51आत्मा अब बाहरी वस्तूओं की तलाश में भटकती नहीं बलकि स्वय में अनंत ब्रह्माण और उसके सभी सुखों को पाती
27:59है
28:00ऐसे भक्त के लिए हर क्षण एक उत्सव है हर श्वास एक प्रार्थना है और हर ग्रिष्टी में परमात्मा का
28:08ही अनुभव होता है
28:10गरुर ने अपनी आखें बंद करके उस भक्त के जीवन की कलपना की जो निरंतर आनंद और प्रभु की उपस्थिती
28:18में लीन रहता है
28:21संपूर्ण स्रिष्टी में भक्त को केवल अपने आराध्य का ही प्रतिविम दिखाई देता है पत्तों की सरसराहट में उनकी वानी
28:29और बहते जल में उनकी करुना
28:32यह एक ऐसा अद्भुत मिलन है जहां भक्त और भग्वान के बीच की दूरी मिट जाती है और दोनों एक
28:40ही सत्ता के दो पहलू बन जाते हैं
28:43यह पर्मानंद किसी भी आत्मा के लिए सुलब है जो सच्चे हृदय और अडिग विश्वास के साथ प्रभु की शरण
28:51में आता है
28:53भग्वान विश्णू ने एक अंतिम और गहन संदेश देते हुए अपनी आखों में असीम प्रेम और करुणा के साथ गरुड
29:01की ओर देखा
29:03भक्त की सच्ची पुकार एक सुनहरी किरण की तरह सीधे परमिश्वर तक पहुँचती है और उनकी असीम क्रिपा को आकर्शित
29:11करती है
29:13इस प्रकार परमानंद की प्राप्ती ही मोक्ष का सर्वोच शिखर है जहां आक्मा अनंत अखंड और शाश्वत ब्रह्मा में विलीन
29:22हो जाती है
29:24भगवान विश्णु अपनी असीम करुणा से उत्प्रोत होकर गरुर को समझाते हैं कि ज्ञान और भक्ती दो भिन्द मार्ग नहीं
29:32बलकि एक ही गंतव्य की ओर ले जाने वाली धाराएं है
29:38परमिश्वर की वानी सुनकर गरुर के हृदय में असीम शान्ती का संचार होता है और वे ज्ञान की इस परम
29:45पराकाष्ठा को समझने के लिए उत्सुखो उठते हैं
29:49एक ज्ञानी जब अपने अहंकार को पूरी तरह मिटा देता है तब उसका वह सूखा ज्ञान पिघल कर इश्वर के
29:57प्रती अगात प्रेम और भक्ती में बदल जाता है
30:01जैसे एक ही सिक्के के दो पहलो होते हैं वैसे ही सच्चा ज्ञान परम प्रेम में विलीन हो जाता है
30:08और सच्चा प्रेम पूर्ण ज्ञान का रूप ले लेता है
30:12वैकुंठ का कंकन इस दिव्य सत्य की गवाही देता है, जहां ज्ञान और भक्ती के मिलन से उत्पन्न होने वाला
30:20आनंद चारों और गूज रहा है
30:23गरुड अपने विशाल पंखों को समेट कर प्रभु के चर्णों में और अधिक जुक जाते हैं क्योंकि उनका संशय अब
30:30पूर्णत समाप्थ हो चुका है
30:34जब जीवात्मा अध्वैत भाव में प्रवेश करती है, तब मैं और तु का सारा भेद मिट जाता है और केवल
30:41अनंत ब्रहमा का अस्तित्व ही शेश रहता है
30:45जिस प्रकार गंगा अपनी यात्रा के अंत में सागर में मिलकर अपनी अलग पहचान खो देती है, उसी प्रकार भक्त
30:53भी इश्वर में मिलकर स्वईय इश्वर हो जाता है
30:57वैकुंट के इस पावन वातावर्ण में, जहां प्रकाश का वेग भी थम जाता है, भगवान विश्नु गरूर को मुक्ती की
31:05अंतिन सीधी का दर्शन कराते हैं
31:09अपनी वरद मुद्रा में स्थित भगवान विश्नु बताते हैं कि जो भग्त सब कुछ मुझे सौंप देता है, वही वास्तव
31:16में सबसे बड़ा ज्यानी है
31:19हृदय के अंतस्तल में जब ज्यान की जोती जलती है, तो प्रेम का कमल स्वतही खिल उठता है, जिससे मुक्ती
31:27का मार्क सुगम हो जाता है
31:30ज्यान जहां सत्य का साक्षात कार कराता है, वही भग्ती उस सत्य को अपने भीतर महसूस करने की शक्ती देती
31:38है
31:40स्रिष्टी के इस परम सत्य को जानकर गरुर के मन में उठने वाले सभी द्वंद्व और शंकाएं सदा के लिए
31:46शान्त हो जाती है
31:49परमेश्वर की मंद मुसकान गरुर को यह विश्वास दिलाती है कि उनके प्रती किया गया हर छोटा प्रयास भी कभी
31:56निशवल नहीं जाता
31:59अंकार रूपी में के नश्ट होते ही आत्मा को यह बोध होता है कि संसार में केवल तू यानि वह
32:06परंभरह्मा ही व्याप्थ है
32:19व्यकुंट का सारा वैभव इस अनूठे मिलाप के सामने फीका पड़ जाता है, जहां एक जीवात्मा सदा के लिए अपने
32:27परमात्मा में समा जाती है।
32:52इस प्रकार ज्यान और भक्ती का यह एकी करण ही वह परमद्वार है, जिससे होकर आत्मा अनन्त काल के लिए
33:00ब्रहमा में लीन हो जाती है।
33:17जोड़कर महाबली गरूर अपने प्रभु के चर्णों में मस्तक जुकाते हैं और उनके नयन कृतग्यता के अश्रूओं से भर जाते
33:25हैं।
33:27गरूर के विशाल और स्वर्णिम पंक अब शान्त हो चुके हैं, जो प्रभु के तेज से आलोकित होकर उनके प्रती
33:34संपून समर्पन को दर्शाते हैं।
33:38भगवान और उनके परम भक्त के मध्य एक दिव्य उर्जा का स्वर्णिम कमल प्रस्पुटित होता है, जो उनके बीच स्थापित
33:45हुए अद्वैत संबंध का प्रतीक है।
33:49वैकुंट के स्वर्णिम महल और शांत आकाश इस बात की गवाही दे रहे हैं कि अब परम मुक्ती का मार्ग
33:56सभी सरल हिदय वाले जीवों के लिए सुलब हो चुका है।
34:01भगवान विश्णु जिनका विग्रह अलौकिक तेज से दीप्त है, अपने वरध हस्त को उठाकर गरुर को अभय प्रदान करते हैं
34:09और उनकी इस ग्रहन शीलता से अत्यंत प्रसंन होते हैं।
34:14गरुर के कंट से निकली मौन प्रार्थना एक दिव्य कमपन बनकर सीधे भगवान विश्णु के चरण कमलों को स्पर्श करती
34:22हैं।
34:45भगवान विश्णु के चार हाथ दिव्य आयुधों से सुशोगित हैं और उनके कमल नयन अब गरुर को काल और स्रिष्टी
34:53के अगले रहस्यों को समझाने के लिए तयार हो रहे हैं।
34:58गरुर अपने मस्तक को उपर उठाते हैं और उनके चहरे पर एक ऐसी शांत स्थिर्ता दिखाई देती हैं जो केवल
35:06परम सत्य को जानने के बाद ही आती है।
35:09भगवान विश्णों के पीछे एक विशाल स्वर्णिन कालचक्र प्रकट होता है जिसके घूमने से समय और स्विष्टी के गूढ नियमों
35:18का आभास होता है।
35:20वैकुंठ का क्षितिज अब एक नई आभा से चमकने लगता है जहां भविश्य की दिव्य शिक्षाओं और ब्रहमांडिय रहस्यों की
35:29रूपरेखा दिखाई दे रही है।
35:32भगवान विश्णु अपने मेग गंभीर स्वर में बोलना प्रारंभ करते हैं और उनकी मधुरवानी गरुड के अंतहकरण को नई दिव्य
35:40अनुभूतियों से भरने लगती है।
35:44भगवान विश्णु की उंगलियों से ज्ञान की सुक्षम किरने निकल कर गरुड के मस्तक पर एक प्रकाशमान तिलक की भाती
35:51अनकित हो जाती हैं।
35:54ज्ञान की इस पवित्रधारा के बीच हवा में तैरते हुए प्रकाश के दिव्य ग्रंथ के पन्ने स्वतह ही पलटने लगते
36:01हैं, जो अगले गूड अध्याय का संकेत देते हैं।
36:06वैकुंट का वातावन और भी अधिक रहस्यमेई और अलौकिक हो जाता है, जहां स्रिष्टी के आदी और अंत की कहानिया
36:14प्रकाश के रूप में तैरने लगती हैं।
36:18गरूर जिनका हृदय अब पूरी तरह से मैं के भाव से मुक्त हो चुका है, भगवान की प्रत्येक वानी को
36:25अपने भीतर आत्मसाथ करने के लिए तत्पर हैं।
36:30भगवान विश्णू अपनी दिव्य द्रिष्टी गरूर पर केंद्रित करते हैं, जिससे एक सुक्षम प्रकाश पुंज दोनों के हृदय को आपस
36:38में जोर देता है।
36:40इस दिव्य समवाद के अंत और अगले अध्याय के आरंभ के रूप में भगवान विश्णू और गरूर के चारों और
36:47ज्यान का एक अनंत स्वर्णिम चक्र स्थापित हो जाता है।

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