- 2 days ago
- #garudapurana
- #करमफल
- #करमचकर
- #पनरजनम
गरुड़ पुराण के इस नए एपिसोड में, भगवान विष्णु गरुड़ को उन सूक्ष्म और भयानक पापों का रहस्य उजागर करते हैं जो अक्सर अनदेखे रह जाते हैं – ज्ञान, गुरु और पवित्र धन का अपमान। जानिए कैसे गुरु की निंदा, शास्त्रों का अनादर, और मंदिर के धन का दुरुपयोग आत्मा को सीधे सबसे अंधकारमय नरकों में धकेल देता है। इन गंभीर अपराधों के लिए यमराज कौन सी भयानक यातनाएं देते हैं और आत्मा को किन विकृत योनियों में जन्म लेना पड़ता है? इस एपिसोड में सूक्ष्म कर्मों के जटिल चक्र और उनसे मुक्ति के महत्वपूर्ण उपायों पर गहराई से चर्चा की जाएगी। अपनी अंतरात्मा को जगाएं और जीवन में सम्मान, कृतज्ञता और पवित्रता के वास्तविक महत्व को समझें! #गरुड़पुराण #GarudaPurana #कर्मफल #गुरुअपमान #शास्त्रज्ञान #नरकयातना #पापऔरपुण्य #सनातनधर्म #हिंदूधर्म #मोक्ष #आध्यात्मिकज्ञान #ज्ञानकामहत्व #मंदिरधन #धार्मिकपाप #कर्मचक्र #यूट्यूबभारत #रहस्यमयज्ञान #पुनर्जन्म
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00भगवान विश्णु ने गंभीर स्वर में कहा कि वानी और मन के सुक्ष्म पापों से परे कुछ ऐसे महापाप हैं
00:07जो पवित्र विश्वासों के अनादर और दुरुपयोग की गहरी जड़े रखते हैं और आत्मा को सबसे गहन अंधकार की ओर
00:15धकेलते हैं
00:17उन्होंने समझाया कि इन महापापों में सबसे उपर आता है गुरु का अपमान जिसने ग्यान की जोती प्रजवलित की और
00:25जीवन के अंधकार को दूर किया क्योंकि गुरु का तिरसकार साक्षात ब्रहमा के तिरसकार के समान है
00:33विष्णू ने कहा कि जो शिश्य ग्यान के सागर से पीकर भी अपने गुरु को तुछ समझता है या उनकी
00:40आग्या का उलंधन करता है उसका पतन निश्चित है और वह अपने ही कर्मों के नरक में गिरता है
00:48ऐसे अनादर से ज्ञान की पवित्रधारा दूशित हो जाती है और आत्मा के भीतर एक ऐसा शून्य उत्पन होता है
00:56जिसे कोई भी तपस्या या यग्या नहीं भर सकता
01:00भगवान विश्णू ने आगे कहा गुरु के प्रतीकृत घंता और उनकी शिक्षाओं का उपहास करना केवल एक पाप नहीं बलकी
01:08आध्यात्मिक आत्महत्या है जो प्राणी को अनंत काल के लिए अंधकार में डुबो देती है
01:16गरुर ने गहरी सास ली भगवान के शब्दों की गंभीरता को समझते हुए क्योंकि गुरु का स्थान देवताओं से भी
01:23उपर माना गया है
01:26तब विष्णों ने एक और महापाप की ओर इशारा किया पवित्र शास्त्रों का अपमान जो सीधे धर्म की नीमव पर
01:34प्रहार करता है और सत्य के मार्ग को विकृत करता है
01:39उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति शास्त्रों को विकृत करता है उनका उपहास करता है या उनकी पवित्रता का दुरुप्योग करता
01:47है वह ज्यान के स्रोत को ही नश्ट कर देता है और अज्यानता के गहरे गर्त में गिरता है
01:54विश्णु ने समझाया कि शास्त्र केवल ग्रंथ नहीं, बलकि दिव्यवानी है जो मानव जाती को मोक्ष का मार्ग दिखाती है
02:02और उनका अपमान इश्वर के ही वचन का अपमान है
02:08गरुर ने अपने सिर को सम्मान से जुकाया, यह समझते हुए कि सत्य की अभेलना स्वय अस्तित्व को नकारने के
02:15समान है
02:17विष्णु ने स्पष्ट किया कि जो ग्यान को अपनी सुविधा के अनुसार मोरते हैं या उसे स्वार्थ सिद्धी के लिए
02:25प्रयोग करते हैं, वे न केवल दूसरों को भ्रमित करते हैं, बलकि अपनी आत्मा को भी अंधकार्मय कर देते हैं
02:33ऐसे कार्य से सत्य की किर्णे बिखर जाती हैं और जो मार्ग मोक्ष की ओर ले जाता था वह अब
02:40भटकन और भ्रम से भर जाता है
02:44इसके बाद भगवान विश्णु ने पवित्र धन के दुरुपयोग को तीसरे महापाप के रूप में वर्णित किया जिसमें मंदिरों को
02:52दान किया गया गरीबों के लिए निर्धारित या धार्मिक कारियों के लिए अर्पित धन का अनुचित उपयोग शामिल है
03:00उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति पवित्रधन का लोग करता है उसे चुराता है या उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए
03:08प्रयोग करता है वह साक्षात धर्म का अपमान करता है और अनंत दरिद्रता वपाप का भागी बनता है
03:17विश्नु ने कहा कि मंदिरों के कोशागार या गरीबों के लिए दिये गए दान का दुरुपियोग सबसे घ्रेनित पापों में
03:24से एक है क्योंकि यह ईश्वर और मनुष्य दोनों के विश्वास को तोड़ता है
03:30ऐसे कृतियों से न केवल धन का पवित्र उद्देश्य भरष्ट होता है बलकि उन लोगों की आशाएं और भक्ती भी
03:37कुचल दी जाती है जिन्होंने श्रधा से दान किया था
03:42विश्वु ने समझाया कि पवित्र धन का दुरुपियोग करने वाला केवल संपत्ती नहीं चुराता बलकि उस आध्यात्मिक शक्ती और पुन्य
03:51को भी हर लेता है जो उसके साथ जुडा हुआ है
03:55गरुर ने ध्यान से सुना उनके मन में उन भयानक परिणामों की कलपना करते हुए जो ऐसे महापापों से उत्पन
04:03होते हैं
04:05विष्णू ने अपने प्रवचन को समाप्त करते हुए कहा कि गुरु, शास्त्र और पवित्रधन का अनादर करने वाला प्राणी जीवन
04:13के सभी स्तरों पर अपमान और पीडा भोगता है और अंत्तह सबसे भयानक नरक को प्राप्त होता है
04:21इस प्रकार महापापों का अनावरण करते हुए, भगवान विष्णू ने गरूर को धर्म के मूल सिध्धानतों की रक्षा और पवित्रता
04:30के सम्मान की आवश्शक्ता पर जोर दिया
04:33उन्होंने समझाया कि इन तीनों पवित्रस्तंभों का सम्मान ही आध्यात्मिक उन्नती की कुंजी है और उनका अनादर सीधे आत्म विनाश
04:42की ओर ले जाता है
04:45विश्णू ने अपने शब्दों में अंतिम चेतावनी दी की इन महापापों से बचने वाला ही वास्तव में परमशान्ती और मोक्ष
04:53को प्राप्थ कर सकता है अन्यथा उसका मार्ग गेहन दुख से भरा रहेगा
04:58भगवान विश्णू ने गरूर की ओर देखते हुए गंभीर स्वर में कहा कि गुरू केवल एक साधारन मनुष्य नहीं बल्कि
05:06स्वयंत्र देवों का साक्षात स्वरूप होता है और उसकी उपेक्षा ही जीवन का सबसे बड़ा पतन है
05:14श्री हरी ने बताया कि जो शिश्य अपने गुरू का उपहास उड़ाता है या उनका अपमान करता है वह वास्तव
05:22में उस परम ज्ञान का तिरसकार करता है जो आत्मा को मोक्ष प्रदान करता है
05:28गुरू निंदा करने वाले पापी जीवात्मा को यमदूत सीधे रौरव और महा रौरव नरक की जलती हुई ज्वालाओं में फैंक
05:35देते हैं जहां उसे युगों तक भीशन संताप भोगना पड़ता है
05:41गुरू के प्रती कृतगंता का भाव जागते ही आत्मा का आध्यात्मिक प्रकाश ततकाल बुच जाता है और चारों और केवल
05:49घोर अज्ञान का अंधकार चाजाता है
05:53महारौरव नरक में गुरू के द्रोहियों के लिए नुकीले लोहे के खंभे गाड़े गए हैं जहां अत्यंत भयानक ताड़ना से
06:01उनकी आत्मा निरंतर चीतकार करती है
06:05पक्षी राज गरोड ने भयभीत होकर पूछा कि है प्रभु यदि कोई शिश्य गुरु द्वारा दी गई विद्या का उप्योग
06:12किसी के विनाश या स्वार्थ के लिए करे तो उसका क्या परिनाम होता है
06:18नारायन ने उत्तर दिया कि गुरु की विद्या का दुरुप्योग करने वाले को अयहपान नामक नरक में खौलते हुए तामबे
06:25और लोहे का रस जबरन पिलाया जाता है
06:30गुरुद्रोह रूपी अगनी उस पवित्र ज्यान व्रिक्ष को पूरी तरहे जला कर भस्म कर देती है जिसे जीव ने अनेक
06:37जन्मों की साधना से अरजित किया होता है
06:41जो अपने गुरु से कपट करता है और जूट बोलकर ज्यान चुराता है उसे क्रिमिभोजन नाम के अत्यंत घिनों ने
06:49नरक कुंड में फैंक दिया जाता है
06:52भगवान विश्नु ने स्पष्ट किया कि गुरु का अनादर करना सीधे ब्रह्मा विश्नु और शिव तीनों शक्तियों के विरुद्ध विद्रोह
07:00करने के समान दंडनी अपराध है
07:04यम के भयानक दूत उस पापी की जीब को लोहे के सुओं से गोधते हैं जिसने कभी अपने पूज्य गुरु
07:11के विरुद्ध कुवचन या अपशब्ध कहे हूँ
07:14गुरु के शांत और करुणामई स्वरूप को त्याग कर काल चक्र उस पापी के लिए भयंकर न्यायाधीश का रूप धारण
07:22कर लेता है
07:24सुकर्मुख नाम के नरक में वे नीच आत्माय पीसी जाती हैं जिन्होंने कभी अपने गुरु पर शारिरिक प्रहार करने या
07:32उन्हें कष्ट पहुचाने का दुएसा हस किया था
07:36गरुर ने विनीत भाव से पूछा कि क्या अज्यानता में हुए इस भयंकर पाप से मुक्ती पाने का कोई मारग्या
07:43प्रायश्चित शास्त्रों में वर्नित है
07:46श्री हरी ने बताया कि यदी पश्चाताप सच्चा हो और जीव निश्कपट भाव से गुरु के चर्णों में समर्पित हो
07:53जाए तो उसके महापाप भी कटने लगते हैं
07:58गुरु की प्रसन्नता ही वह अमोग शक्ती है जो न केवल नरक के द्वारों को बंद कर देती है बलकी
08:05जीव को सीधे वैकुंट का मार्ग दिखाती है
08:09परंतु जो मन में गुरु के प्रती बैर रख कर मरता है वह पुल्योद नरक की मवाद और दुरगंधित राख
08:16की नदी में युगों तक तैरने को विवश होता है
08:21विश्नु जी ने अंत में कहा कि संपूर्ण ब्रहमांड में गुरु भक्ती ही वह इकलोती ढाल है जो मनुष्य को
08:27अग्यान, पाप और नरक की यातनाओं से सुरक्षित रखती है
08:32इस प्रकार गुरु की महिमा का वर्णन सुनकर पक्षिराज गरूर का हृदय भक्ती और श्रधा से भर गया तथा उनका
08:40संशय पूरी तरह मिट गया
08:43इसके पश्चात भगवान विश्णु ने शास्त्रों और पवित्र धन के अपमान से मिलने वाले भयानक दंड का वर्णन प्रारंभ करने
08:51का संकेत दिया
08:53भगवान विश्णु ने गंभीर स्वर में कहा कि जिस प्रकार गुरु का अपमान महापाप है, उसी प्रकार पवित्र शास्त्रों का
09:01अनादर उनका गलत अर्थ निकालना या उन्हें निजी स्वार्थ के लिए विकृत करना भी आत्मा को गहरे अंधकार में धकेल
09:09देता है
09:23भगवान ने बताया कि जो मनुष्य जानबूच कर शास्त्रों के गूड अर्थों को विकृत कर अज्ञान फैलाते हैं या उन्हें
09:30उपहास का पात्र बनाते हैं, वे भयंकर रौरव नरक में धकेल दिये जाते हैं
09:37वहाँ उनके शरीर को तीखे नुकीले भाले से बार-बार भेदा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने पवित्र ज्यान
09:45को खंडित किया था
09:47विश्णू ने आगे बताया कि जो लोग पवित्र ग्रंथों को केवल तर्क वितर्क का साधन समझते हैं और उन्हें मनमाने
09:55धंग से बदल कर दूसरों को भ्रमित करते हैं, उन्हें सुकर्मुख नरक की यातना सहनी पड़ती है
10:02गरूर के चहरे पर भय और जिग्यासा का मिश्रन स्पष्ट दिखाई दे रहा था, क्योंकि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं
10:10की थी कि ज्यान का अनादर इतना भयानक हो सकता है
10:14वहां सुर्मुख वाले क्रूर वार्डन विशालकाई ओबसीडियन ग्रेनाइट की क्रशिन्स लाब्स से उन पर लगातार प्रहार करते हैं, जो उनके
10:23जूठे तरकों और विकृत ज्यान के बोज को दर्शाते हैं
10:28प्रत्येक प्रहार उनके अहंकार को कुचलता है, जिससे उन्हें उस सत्य को स्विकार करने के लिए मजबूर किया जाता है,
10:37जिसे उन्होंने जीवन भर जुठलाया था
10:40भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से एक और ग्रिश उत्पन करते हुए कहा कि जो धन केवल धर्म और सत्य
10:48के प्रचार के लिए निर्धारित था, उसका दुरुपयोग करने वाले पायोद नरक में जाते हैं
10:55गरुर ने आश्चर्य से पलकें जपकाई, क्योंकि यह पाप गुरु या शास्त्र के अपमान से भिन्न था, परन्तु इसका प्रभाव
11:03भी आत्मा को उतना ही दूशित करने वाला था
11:07इस नरक में उन्हें मवाद और अन्य धेनित तरल पदार्थों की नदियों में डुबोया जाता है, जिसका स्वाद उन्हें जीवन
11:15भर किये गए अनैतिक कृत्यों की याद दिलाता है
11:19वहाँ उनकी आत्मा को उस पवित्रधन के हर कण का हिसाब देना पड़ता है, जिसे उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए
11:27अपवित्र किया था
11:29विश्नु ने कहा कि जो लोग पवित्रधन का उपियोग जुए, विश्यावरित्ती या अन्य अधार्मिक गतिविधियों के लिए करते हैं, उन्हें
11:38अयहपान नरक की एक्सक्रूशियेटिंग पीड़ा सहनी पड़ती है
11:43गरुर के नेत्रों में करुणा के साथ साथ एक द्रिड संकल्प भी जागरित हो गया था, क्योंकि उन्होंने समझा की
11:50केवल ज्यान ही नहीं, पवित्र संसाधनों का उचित उपियोग भी धर्म का अभिन्न अंग है
11:57इस नरक में उन्हें धधकते पिघले हुए कांसे के खौलते कड़ाहों में डाला जाता है, जहां लालगर्म लोहे की चिम्टों
12:05से उन्हें पल्टा जाता है, जैसे धातु को आकार दिया जाता है
12:10उनके शरीर को बार-बार पिघलाया और फिर कठोर किया जाता है
12:15जैसे उन पापों को शुद्ध करने का प्रयास किया जा रहा हो जो उन्होंने पवित्र धन का दुरुप्योग करके कमाय
12:21थे
12:23विश्णू ने समझाया कि जो लोग ज्यान को बेचते हैं या पवित्र पुस्तकों का व्यावसायक शोशन करते हैं
12:30वे क्रिमिभोजन नरक में जाते हैं जहां उनकी आत्मा का भीत्री पतन होता है
12:37गरुर ने गहरी सांस ली ज्यान और धन के दुरुप्योग के इन विभिन रूपों को सुनकर उनका हृदय दुख और
12:44चेताबनी से भर गया
12:46वहां उन्हें एक विशाल बायोल्यूमिन सेंट नियोनहरे रंग के दलदल में धकेल दिया जाता है
12:52जहां अंगिनत चमकते कीडे और जहरीले जीव उनके शरीर को भीतर से खाते हैं
12:59यह अंथीन यातना उनके ज्जान के भरष्ट व्यापार और पवित्र ग्रंथों के अपमान के पापों को प्रतिबिंबित करती हैं
13:12ततपश्चात उस आत्मा को जिसने कभी पवित्र ज्ञान का अपमान किया था
13:17बायोल्यूमिनसेंट नियोहरे दलदल से भयानक अयापाना के दहकते नरक की ओर घसीटा गया, जहाँ धातु के धाचे और अगनिभी आकाश
13:26गंगाय अनंत पीडा का तांडव रच रही थी।
13:30भगवान विश्णों ने गरूर की ओर देखा, जिनके चहरे पर गहरे आश्चर्य के भाव थे और उन्होंने पवित्रधन के दुरुपियोग
13:39से उत्पन्न होने वाले पापों की भयाभता का वर्णन करना शुरू किया।
13:44वे आत्माएं जिन्होंने मंदिरों के पवित्रधन को चुराया या उसका दुरुपियोग किया, अब स्वयन को भीशन अयाहपाना नरक में पाती
13:53हैं, जहां उन्हें पिघले हुए कांसे का दाहक पे पीने के लिए विवश किया जाता है।
13:59यह अन्थीन यातना उनके लालच और विश्वास घात के पापों को दर्शाती है, जहां पवित्रता को भंकर अर्जित किया गया
14:07धन अब उनकी आत्मा को भीतर ही भीतर जलाकर भस्म कर रहा है।
14:13द्रिश्टी पटल पर अयापाना का एक विस्तरत विस्तार था, जहां अंगिनत आत्माय धातु के पिघले हुए समुद्र में संधर्श कर
14:22रही थी, प्रत्येक अपने अपने पापों के अनुसार विशिष्ट यंत्रना जहेल रही थी।
14:28भगवान विश्णू ने आगे समझाया कि कैसे मंदिर की भूमी या संपत्ती पर अवैध कबजा करने वाले भी इसी प्रकार
14:36के भयानक नरक भोगते हैं।
14:39एक आत्मा जिसने कभी मंदिर की भूमी पर अतिक्रमन किया था, को विशाल गर्म धातु के स्लैबों के बीच कुछला
14:47जा रहा था। उसका शरीर धीरे-धीरे पिघल कर कांसे के टुकडों में बदल रहा था।
14:53यह यातना उस पाप की भयावता को दर्शाती है, जहां भौतिक्ता के लालच में पवित्र भूमी को भी नहीं बक्षा
15:01गया, और अब वह धर्ती स्वयं उसे निगल कर धातू में रुपांतरित कर रही थी।
15:07अयापाना के एक विशाल कक्ष में, जहां असंख्य दहकते कलश पंक्ति बद्ध थे, आत्माए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही
15:15थी, उनके चहरे पर भय और पश्चाताप का मिश्रण था।
15:20गरुर ने भगवान विश्णू से प्रश्न किया, हे प्रभुक उन दुष्टों का क्या होता है जो दानपेटिका से सीधे पवित्र
15:27धन चुराते हैं।
15:30भगवान विश्णू ने उत्तर दिया कि ऐसे पापियों को पिघले हुए सोने के कल्शों में डुबोया जाता है, जहां उनका
15:38शरीर धातू में परिवर्तित होकर अनंतकाल तक विलीन होता रहता है।
15:43सोने की पिघली हुई जनजीरें उनकी आत्माओं को कसकर बांधती हैं, जो उनके लालच और पवित्रता के प्रती अनादर का
15:52प्रतीक है, जिससे उन्हें कभी मुक्ती नहीं मिलती।
15:56पयापाना के एक और भी भयानक खंड में, अगनी की लप्ते हर वस्तु को भस्म करने पर आमादा थी, जहां
16:03केवल सबसे घ्रेनित पापियों को ही भेजा जाता था।
16:08विशेश रूप से भगवान विश्णू ने उन पुजारियों और सनरक्षकों के बारे में बताया जो पवित्र पद पर रहकर भी
16:15मंदिर के धन का गबन करते हैं, उनके लिए इस नरक में सबसे भीशन गंड सुरक्षित है।
16:22एक पूर्व पुजारी जिसने पवित्र धन को अपने स्वार्थ के लिए उप्योग किया था, हो अग्निदान वो द्वारा यंत्रणा दी
16:30जा रही थी, उसकी त्वचा पिघल कर कांसे की धाराओं में बदल रही थी।
16:36उनके पूर्व जीवन के पवित्र प्रतीक जैसे घंटे और त्रिशूल अब उनके लिए यंत्रणा के उपकरन बन गए थे, जो
16:44उनके विश्वासधात का प्रमान दे रहे थे।
16:48अयापाना का भयावः विस्तार गरुड के सामने स्पष्ट था, एक अनंत अगनिकुंड जहां आत्माय अनवरत कष्ट जेल रही थी, और
16:56मुक्ती की कोई आशा नहीं थी।
16:59भगवान विश्णु ने अपना वर्णन समाप्त किया, पवित्रधन की रक्षा के महत्व पर जोर देते हुए और समझाया कि ऐसे
17:07घ्रिनित पापों का परिनाम आत्मा के लिए अनंत पीडा है।
17:12एक आत्मा जिसने मंदिर के पवित्रधन को लूटा था, अब अनंत काल के लिए पिघले हुए धातु में डूबी हुई
17:20थी, उसकी चीखें नरक की अथा गहराई में विलीन हो रही थी।
17:24पूरा नरक शेत्र एक भयावह धधक्ती चमक के साथ धड़क रहा था, जो पवित्र संस्थानों के प्रती किये गए अपमान
17:33और विश्वास घात की अंतिम कीमत की एक क्रूर और अदमय चेतावनी थी।
17:39भगवान विश्णू उस भयंकर नरक के अथा विस्तार में स्थित होकर, अब विश्वास के भंग और पवित्र प्रतिग्याओं के उलंधन
17:47से उत्पन होने वाले पापों की गहन प्रकृती को प्रकट करने लगे।
17:53उन्होंने गरूर की ओर मुर्ते हुए समझाया की कैसे पवित्र वचन तोड़ना, गुरू की निष्ठा भंग करना या आश्रितों को
18:00धोखा देना ब्रहमांडिय संतुलन को हिला देता है और आत्मा को असीम पीडा में डुबो देता है।
18:08एक आत्मा जिसने विवाह के पवित्र बंधन को तोड़ा था, अब अगनिज्वालाओं में जक्डी हुई थी, उसके भीतर का विश्वास
18:16घात उसे अनंतकाल तक जला रहा था।
18:20तूटे हुए भरोसे की अद्रिश्य तलवारें आत्मा के सबसे गहरे कक्षों को भेद रही थी, हर घाव विश्वास घात की
18:28कहानी कह रहा था जो कभी पूरा नहीं हो सकता था।
18:32विश्व ने आगे बताया की कैसे ज्ञान के सुरोतों, गुरु, शास्त्र और पवित्र ग्रंथों का अनादर करना या उन्हें विकृत
18:40करना आत्मा को गहन अज्ञानता के अंधकूप में धकेल देता है।
18:45गरुर, भय और विस्मय से भरे हुए, भगवान विश्णों के दिव्य प्रवचनों को आत्म साथ करते हुए सुनते रहे, उनके
18:53मुख पर गहन एक आगरता थी।
18:56एक दुष्ट आत्मा, जिसने अपने गुरु के ज्ञान का दुरुपियोग किया था, अब राक्षसी आकृतियों द्वारा लोहे के गर्म खंभों
19:04से बांधी जा रही थी, जो उसे बार-बार अपमानित कर रहे थे।
19:10पवित्र ग्रंथों के जले हुए प्रिष्ट हवा में उड़ रहे थे, जो उस ज्ञान के अनादर का प्रतीक थे, जिसे
19:16इस आत्मा ने कभी अपने स्वार्थ के लिए विक्रिप किया था।
19:21भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि जो लोग आश्रितों या कमजोरों के विश्वास को तोड़ते हैं, उन्हें गहंतम पाप का
19:29भागी बनना पड़ता है, क्योंकि वे सुरक्षा के मौलिक सिध्धान्त को ध्वस्ट करते हैं।
19:35उनकी आखों में करुणा और द्रिड संकल्प का मिश्रण था, जैसा कि उन्होंने ऐसे कृत्यों के अप्रिहार्य और भयानक परिनामों
19:44पर जोर दिया।
19:46एक आत्मा जिसने अपने परिवार के कमजोर सदस्यों को धोखा दिया था, अब पूरी तरह से अकेला एक विशाल जलते
19:54हुए मैदान में भटक रही थी, जहां हर कदम पर विश्वासघात की चाया उसका पीछा कर रही थी।
20:02आत्मा की चीखें निर्जनता में खो रही थी, जो उसके विश्वासघात के पाप की असीन प्रतिध्वनी थी, जिसने उसे हर
20:10उस रिष्टे से काट दिया था, जिसकी उसे कभी परवाह थी।
20:15भगवान विश्वासघात की कैसे विश्वासघात के ऐसे कार्य आत्मा पर एक गहन कर्मिक रिन उत्पन करते हैं, जिससे वह विश्वासघात
20:24और अलगाव के अंथीन चक्रों में फंस जाती है।
20:29गरुर ने उत्सुक्ता से पूछा की क्या ऐसे चक्रों से कभी मुक्ती संभव है, उनका चहरा गहन जिग्यासा से भरा
20:36था।
20:38उस नरक के भीतर आत्माए भूतिय आकरितियों द्वारा बार-बार धोखा खाने का अनुभव कर रही थी, हर पुन्रावरित्ती उनके
20:46मूल विश्वासघात को फिर से जीवित कर रही थी।
20:50आत्मा के चारों और अतीत के विश्वासघात की अद्रिश्य जंजीरे कस रही थी, जो उसे निरंतर पीडा और निराशा के
20:58भंवर में फसा रही थी।
21:01भगवान विश्णु ने अपने प्रवचन का समापन करते हुए चेतावनी दी की विश्वासघात की यह छाया आत्मा के अस्तित्व के
21:09हर पहलू पर पड़ती है, जिससे वह मोक्ष से दूर हो जाती है।
21:14उनके दिव्यशब्द बिजली की कड़कडाहट की तरह गूंचते हुए विश्वासघात के परिणामों की अप्रिवर्तनीता और नैतिक व्यवस्था के महत्व पर
21:24अंतिम जोर दे रहे थे।
21:26एक आत्मा विश्वासघात के अनवरत चक्रों में फंसी हुई, अब निरर्थक रूप से एक गहरे कुए से बाहर निकलने की
21:35कोशिश कर रही थी, हर चड़ाई पर उसे और गहरे खाई में धकेल दिया जाता था।
21:41महारोरव की अथाह गहराया अंगिनत आत्माओं को निगल रही थी, उनकी चीखें विश्वासघात के अंतिम मूल्य की एक दुखद गवाही
21:50बनकर अनंत में विलीन हो रही थी।
21:54विश्वासघात के कठोर अंत के पश्चात, भगवान विश्णु का ध्यान दीन दुखियों और असहायों पर अत्याचार करने वालों के भयंकर
22:02दंड की ओर केंद्रित हुआ।
22:05श्रीहरी ने गरूर से स्पष्ट कहा कि जो मनुष्य अपनी शक्ती का दुरुपियोग करके किसी असहाय, निर्धन या शरण में
22:12आये व्यक्ती का शोशन करता है, वह धर्म का सबसे बड़ा द्रोही है।
22:18मर्त्य लोक में निर्धनों का धन और संपत्ती छीनने वाले अत्याचारियों को यमदूत सुकर्मुख नरक्की विशाल ग्रैनाइट की शिलाओं की
22:26ओर घसीटते हुए ले जाते हैं।
22:30उनके समस्थ स्वर्ण और वैभव अब दहकते हुए लोहे के भार में बदल जाते हैं, जो उनके वक्षस्थल पर बजर
22:37की भानती प्रहार करते हैं।
22:41सुकर्मुख नाम के इस भयानक स्थान में विशालकाय काले पत्थरों के यांतरिक स्तंब अन्वरत गती से नीचे गिरकर दोशियों की
22:49देह को पीस्ते रहते हैं।
22:52गरुर ने अत्यंत दुहक और उत्सुकता से पूछा की प्रभु, अनाथों, विध्वाओं और निरीह सेवकों को सताने वालों को किस
23:00प्रकार का दंड भोगना पड़ता है।
23:03भगवान विष्णु ने बताया कि असहायों की जीविका छीनने वाले पापी भारी दहकती शिलाओं को उठाने पर विवश किये जाते
23:11हैं, जबकि यमदूत उन पर कटीले चड़ों से प्रहार करते हैं।
23:17दीन दुखियों के क्रंदन से उत्पन्न धर्म का प्रकोप एक प्रचंड अगनी चक्र बनकर इन अत्याचारियों की आत्मा को भस्म
23:25करता रहता है।
23:27अंकार में चूर होकर प्रजा का शोशन करने वाले नरिशन्स अधिकारियों की शक्ती इस नरक की कठोर भूधरा में पूरी
23:35तरह मिक जाती है।
23:37श्रीहरी के अनुसार जिस पद और अधिकार का उप्योग धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए था, उसी का दुरुप्योग
23:45आत्मा का सबसे बड़ा विनाशक बन जाता है।
23:49मर्त्य लोक में दूसरों को भूखा रखने और उनका अधिकार मारने वाले अन्याई अब सुकर्मुख के पत्थरों के बीच घोर
23:57यातना सहन करते हैं।
24:00पाप से अर्जित सत्ता का मुकुट काली कीचड में डूब जाता है, जबकि धर्म का सत्य ही अंत तक अमर
24:07रहता है।
24:09सुकर्मुख के सुविस्त्रित गलियारों में बहती हुई पिघली धातू की नदिया शोशितों के आसूँ का उगर प्रतिशोध बन कर बहती
24:17हैं।
24:19गरुर ने ध्यानपूर्वक सुनते हुए विचार किया कि संसार में शक्ती प्राप्त करना एक परीक्षा है, न कि दूसरों को
24:27कुचलने का अधिकार।
24:29जो लोग असहायों की भूमी और धन हडपकर अपना महल बनाते हैं, वे यहां लोहे के विशाल स्तंभों के नीचे
24:37कुचले जाते हैं।
24:39एक निर्बल व्यक्ती के नेत्रों से गिरा हुआ एक अकेला आसूभी ब्रहमांडिय न्याय की उग्रजवाला बनकर पपी का सर्वनाश कर
24:48देता है।
24:50सुकर्मुख की विशाल घाटी में यातना की यह गूंज हर उस मनुष्य के लिए चेतावनी है, जो अपनी शक्ती के
24:57मद में अंधा हो चुका है।
25:00भगवान विश्णु ने बल दिया कि वास्तविक सामर्थ्य दुर्बलों की रक्षा करने में हैं, उनका दमन करने में नहीं।
25:08जिन हाथों ने कभी किसी निर्धन का आहार चीना था, वे अब सुकर्मुख की भारी शिलाओं के नीचे उसी लाचारी
25:16का अनुभव करते हैं।
25:19इस प्रकार वैकुंट की दिव्यज्योती के समक्ष धर्म का परम विधान स्थापित हुआ, जो अन्याय करने वालों के पतन और
25:27पीडितों के न्याय का अटल प्रतीक है।
25:30किन्तु यह तो केवल स्थूल पापों का आदिम विधान था, अब समय आ गया था सुक्षम, फिर भी कहीं अधिक
25:38भयावह महापापों की गहन पीडा को समझने का, विशेशकर वे जो गुरु, शास्त्र और पवित्रधन के अपमान से जन्म लेते
25:46हैं।
25:48भगवान विश्नु का शांत, किन्तु गंभीर स्वर वातावर्ण में गून उठा, गरुर जो ग्यान के मार्गर्शक होते हैं, शास्त्रों की
25:56पवित्रता भंग करते हैं, या पवित्रधन का दुरुप्योग करते हैं, उनके लिए नरक की एक विशेश और अकल्पनिय गह
26:06गरुर ने देखा, वैतनी नदी की सडी हुई, रक्त और मवाद से भरी धाराय उन आक्माओं को निर्दैता से बहा
26:13रही थी, जिन्होंने अपने गुरुओं के ग्यान और विश्वास का अपमान किया था, या उन्हें धोखा दिया था, उनकी चीखे
26:22नरक की उदास हवा मे
26:23गूंज रही थी, जो एक गुरु के प्रती कृत गहनता और विश्वास घात के पाप की अकलपनिय गहराई को दर्शा
26:31रही थी, विस्तारित वैतनी नदी, जिसमें सिर्फ रक्त और मवाद ही नहीं, बलकी कटू शब्दों और जूठी प्रशंसा के जहरीले
26:40कीडे भी रें
26:41रहे थे, उन लोगों के लिए थी, जिन्होंने ज्ञान और शास्त्रों को विकृत किया था, गरुर ने देखा की कैसे
26:49उन आत्माओं को, जिन्होंने पवित्र ग्रंथों की गलत व्याख्या कर दूसरों को गुमराह किया था, अब वैतर्नी के जहरीले कीडे
26:57नोच रहे थे
27:26एक असीम पीडा भोगते हुए।
27:28बढ़ते हुए वे तप्त कुंड के समीब पहुँचे, जहां पवित्र धन के अपमान का पाप भयानक अगनी के रूप में
27:35प्रकट हो रहा था।
27:37भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि देवताओं और मंदिरों को अर्पित किये गए धन को निजी स्वार्थ के लिए उप्योग
27:44करना एक ऐसा पाप है जिसकी अगनी कभी शांत नहीं होती।
27:49गरुर ने देखा कि जिन लालची आत्माओं ने मंदिरों के कोश को लूटा था या पवित्र चड़ावों का दुरुपियोग किया
27:57था।
27:57उन्हें अब इन्हीं विशालकाएं उबलते कांसे कुंडों में धकेला जा रहा था।
28:03उनका शरीर पिघलती हुई धातु में तडप रहा था।
28:07हर सास एक अंथीन पीडा थी क्योंकि उन्हें बार-बार खीच कर बाहर निकाला जाता और फिर से उसी नरक
28:14में धकेला जाता।
28:15यह उन सभी के लिए एक भयावः चेतावनी थी, जो देवत्व और भक्ती के नाम पर केवल अपने स्वार्थ की
28:23पूर्ती करते हैं, पवित्र धन को एक निजी संपत्ती मानते हैं।
28:29गरुर ने देखा की कैसे उन आत्माओं को, जिन्होंने देवताओं के प्रसाद का अपमान किया था, या मंदिरों की भूमी
28:37को हडपा था, उन्हें गर्म लोहे के दंडों से दाग कर उनकी पहचान छीन ली जा रही थी।
28:44प्रत्येक दाग उनकी आत्मा पर एक अमिट निशान छोड़ रहा था, जो उनके अपराध की गंभीरता और नरक की अथा
28:52कुरूरता का प्रतीक था।
28:55पवित्रता का अपमान करने वालों के लिए यह अगनी उनके घमंड और लालच को शुद्ध करने का एक शाश्वत प्रयास
29:02था।
29:03फिर वे अंधकूप की ओर बढ़े एक अंधकार मैगर्थ जहां वे आत्माए निवास करती थी जिन्होंने अज्यानियों को गुमराह किया
29:12और पवित्र ज्यान को व्यक्तिगत लाब के लिए भष्ट किया।
29:17भगवान विश्णू ने समझाया जो लोग दूसरों को अज्यानता के गहरे कुए में धकेलते हैं वे स्वयं उसी अंधकार में
29:25अनंतकाल तक भटकते हैं जहां सत्य की कोई किरण नहीं पहुँचती।
29:31अंधेरे में लिप्टी आत्माएं जिनकी आखों पर अज्यानता और धोखे की पटियां बंधी थी। वे एक दूसरे से टकराती हुई
29:39अंधीन गर्तों में गिरती जा रही थी। राक्षसी आकृतिया उन्हें और गहरे धकेलती जा रही थी।
29:47ज्यान के इस महापाप का दंड था एक अंधीन विहीन अंधकार जहां आत्माएं प्रकाश की एक भी किरण के लिए
29:55तरसती थी। अपने ही कर्मों के गहरे जाल में फंसी हुई।
30:00तब भगवान विश्णु ने गरूर को समझाया कि इन समस्त भयानत पापों की प्रथम जड मन के भीतर अंकुरित होने
30:07वाले सुक्ष्म विचार ही होते हैं।
30:11वैकुंट के दिव्य आलोक में विराजमान श्रीहरी ने कहा कि जब व्यक्ति गुरू या शास्तर के प्रती अपने मन में
30:18अनादर का एक सुक्ष्म भाव भी पालता है तो वही पाप कालांतर में महाविनाश का रूप ले लेता है।
30:26कर्म का अद्रिश्य जाल अत्यंत सुक्ष्म है जहां मनुष्य की केवल बाह्य क्रियाए ही नहीं बलकि उसके मन के गुप्त
30:34भाव भी स्पष्ट रूप से अनकित हो जाते हैं।
30:38जैसे सूखी घास में उठी एक छोटी सी चिंगारी विक्राल दावानल बन जाती है, वैसे ही मन में छिपा हलका
30:46सा अहंकार संपूर्ण ज्यान को नश्ट कर देता है।
30:50संपूर्ण ब्रहमांड में फैला यह कर्मचकर प्रत्येक आत्मा के सुक्षम से सुक्षम संकल्प और विचार का पलपल का हिसाब रखता
30:58है।
31:00नारायन ने स्पष्ट किया कि अज्यानता का बहाना बना कर कोई भी प्राणी कर्म के इस अखंड नियम से बच
31:07नहीं सकता।
31:09जब कोई साधक या विद्वान अपने मन के भीतर गुरु की शिक्षाओं के प्रती गुप्त इश्या या उपेक्षा का भाव
31:16रखता है, तब उसका सारा ज्यान निश्फल हो जाता है।
31:21उस सुक्ष्म अनादर से उत्पन हुई सुक्ष्म कालिमा आत्मा के चारों और एक ऐसा अग्रिश्य आवर्ण बना देती है, जो
31:29धीरे-धीरे उसे गहरे अंधकार की ओर खींचता है।
31:34इसलिए मोक्ष मार्ग के यात्रियों के लिए यह अती आवश्यक है कि वे बाह्य आचर्ण के साथ साथ अपने भीतर
31:42के सुक्ष्म विचारों पर भी निरंतर ग्रिश्टी रखें।
31:46पक्षी राज गरोड ने अत्यंत विनमर्ता से प्रश्ण किया कि है प्रभूक माया के इस घने जाल में फंसा मनुष्य
31:53अपने सुक्ष्म पापों को कैसे पहचान कर उनसे मुक्थ हो सकता है।
31:58जगतपती विश्णों ने उत्तर दिया कि निरंतर नामस्मरण और अंतर मुखी होकर आत्म निरीक्षन करने से ही मन के भीतर
32:07उपजे पाप रूपी बीज नश्ट होते हैं।
32:10कर्म का वह दिव्यत अराजू मनुष्य के केवल कर्मों को ही नहीं, अपितु उन कर्मों के पीछे छिपी उसकी वास्तविक
32:18मन्शा और भावना को भी तोलता है।
32:22जो प्राणी गुरू, शास्त्र और पवित्र धन के प्रती मन, वचन और कर्म से निश्कलंक भक्ती बनाये रखता है, उसे
32:29कोई भी नरक छू भी नहीं सकता।
32:32श्रीहरी ने अपने निर्भय अभय हस्त से आशिश देते हुए कहा कि विचारशुद्धी ही वह परम कवच है जो आत्मा
32:40को अधोगती से बचाती है।
32:43जब कोई शिश्य अपने गुरु के चर्णों में सर्वस्व अर्पण कर शास्त्रों की मर्यादा का निश्ठा पूर्वक पालन करता है,
32:51तब उसका संपूर्ण जीवन जोतिर्मय हो जाता है।
32:56ज्ञान और भक्ती की यह पावन अगनी मन के भीतर छिपे सुक्षम से सुक्षम पापों और ग्वेश की कालिमा को
33:03ततक्षन भस्न कर देती है।
33:06समस्त ब्रह्मांड की चेतना उस निश्पाप मन में आकर निवास करती है, जो सदैव सत्य, पवित्रता और ज्ञान का आदर
33:14करना जानता है।
33:17भगवान विश्नों के इन गूड वचनों को सुनकर पक्षी राज गरुड का संशय पूरी तरह दूर हो गया और उनका
33:24हृदय परम भक्ती से भर उठा।
33:27सुक्ष्म कर्मों की इस परम सत्य अवधार्ना को समझ कर आत्मा बंधनों से मुक्थ होकर वैकुंट के परम पावन प्रकाश
33:35में लीन होने की ओर अग्रसर होती है।
33:39ज्यान, गुरु और पवित्रधन के इस महापाप और उसके निवारन की गाथा यहीं सम्पून होती है, जो प्रत्येक जीवात्मा को
33:47सद्मार्ग पर चलने की असीम प्रेणा देती है।
33:51तब भगवान विश्णू ने गरुड को संबोधित करते हुए कहा कि केवल पापों से बचना ही परियाप्त नहीं, अपितु कृतग्यता,
34:00विनमर्ता और श्रधा के दिव्य गुनों को धारन करना ही मोक्ष का परम मार्ध है।
34:06गरुड जो पहले ही परम ज्ञान की अनुभूती कर चुके थे, अब और भी एकागर चित्त से भगवान के इन
34:13अमर्त वचनों को अपनी आत्मा में उतारने लगे, उनके दिव्य नेत्रों में श्रधा का प्रकाश पष्ट जलक रहा था।
34:21भगवान ने समझाया कि गुरु के प्रती सच्ची कृतग्यता और अगाद श्रधा ज्यान के उस स्रोत का सम्मान है जो
34:29अज्यान के अंधकार को मिटाकर जीवन में प्रकाश भरता है।
34:34यह गुरुशिष्य परमपरा ही आत्मा को अज्यानता के बंधनों से मुक्त कर परम सत्य की ओर अग्रसर करती है, जहां
34:42मोक्ष का द्वार स्वय ही खुल जाता है।
34:46उन्होंने आगे कहा कि शास्त्रों का सम्मान केवल उनके पन्नों को पूजना नहीं, अपितु उनके गुड ज्यान को हृदय में
34:53धारण कर जीवन में उतारना है, जिससे अंतरात्मा शुद्ध हो सके।
34:59गरुर ने ध्यान पूर्वक सुना, उनके मन में शास्त्रों के प्रती अगाद श्रद्धा और उनके गहन अर्थों को समझने की
35:06तीवर इच्छा जागरित हुई, मानो प्रत्येक शब्द उनके हृदय को आलोकित कर रहा हो।
35:12पवित्र स्थानों के प्रती आदर केवल उनके भौतिक स्वरूप के लिए नहीं, अपितु उनमें नहित दिव्य उर्जा और करोडो भक्तों
35:21की आस्था के लिए होना चाहिए, जो आत्मा को पावन करती है।
35:26यही श्रद्धा और समर्पन अंत्ता आत्मा को उसके मूल स्वरूप ब्रह्मा से जुड़ने में सहायता करता है, जिससे वह परमशांती
35:35और आनंद का अनुभव कर पाती है।
35:39भगवान विश्णू ने जोर देते हुए कहा कि प्रत्येक जीव के प्रती विनमर्ता और प्रेम इश्वर के ही अंश के
35:46रूप में देखना है, क्योंकि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा का ही वास है।
35:52गरुर के विशाल हृदय में करुना और समदर्शिता का भाव और भी गहरा हो गया, वे सभी प्राणियों में एक
35:59ही दिव्य जोती का अनुभव करने लगे।
36:03निशकाम सेवा और परोपकार का मार्ग आत्मा को शुद्ध करता है, क्योंकि यह अहंकार को मिटाकर दूसरों की भलाई में
36:11ही अपना सुख खोजने की प्रेणा देता है।
36:15यह कर्मयोग ही वह अगनी है, जो कर्मबंधनों को जलाकर आत्मा को परम मुक्ती की ओर अग्रसर करती है, जहां
36:23कोई इच्छा या द्वेश नहीं रहता।
36:26इन सद्गुनों का अभ्यास आत्मा को पापों के मल से मुक्त कर, उसे निर्मल और उजज्वल बनाता है, जैसे वर्षा
36:34की बूंदे धूल को धोकर प्रित्वी को स्वच करती हैं।
36:39गरुड के चहरे पर एक गहन संतोष और विस्मय का भाव उभ्या, जैसे उन्हें अपने अस्तित्व का नया अर्थ मिल
36:46गया हो और उनके हृदय में असीम शान्ती भर गई।
36:50उन्होंने आगे कहा कि ये गुन आध्यात्मिक शुद्धी के शक्तिशाली उपकरण हैं, जो आत्मा को उसके सर्वोच लक्ष मोक्ष की
36:59ओर तेजी से अग्रसर करते हैं।
37:03मोक्ष वह अवस्था है जहां आत्मा सभी भ्रमों से मुक्थ होकर शाश्वत सत्य, आनंद और शान्ती में विलीन हो जाती
37:11है, अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप को प्राप्ट करती है।
37:16आथक, कृतग्यता, विनमर्ता और श्रधा का निरंतर अभ्यास ही जीवन को सार्थक बनाता है और आत्मा को उच्चतम आध्यात्मिक स्थिती
37:25तक ले जाता है।
37:28गरूर ने भगवान के चर्णों में अपना मस्तक जुकाया, उनके हृदय में गुरू के प्रती असीम कृतग्यता और इस ज्ञान
37:35के प्रती द्रिड संकल्प का भाव समाहित हो गया।
37:39यह परमग्यान जिसे भगवान विश्णु ने पक्षी राज गरोर को प्रदान किया, प्रत्येक जीवात्मा को अंधकार से प्रकाश की ओर,
37:48बंधन से मुक्ती की ओर ले जाने वाला अंतिम सत्य है।
37:52और इस प्रकार कृतग्यता और श्रद्धा की शक्ती मोक्ष के परम्मार्ग की गाथा वैकुंठ के दिव्य प्रकाश में सदैव के
38:00लिए अमर हो गई।
38:03भगवान विश्णु ने अपने दिव्य सिनहासन पर विराजमान रहते हुए, ब्रहमान के गूड सत्यों को उजागर करते हुए अपनी अंतिम
38:11वानी का उच्चारण किया।
38:14पक्षिराज गरुड जिनके पंखों में आकाश की शक्ती और नेत्रों में ज्ञान की तृष्णा थी भगवान के प्रत्येक शब्द को
38:22अपने अंतर्मन में समाहित कर रहे थे।
38:25सत्य ही परम धर्म है, गरुड भगवान ने कहा, यह वह नीम्भ है जिस पर समस्थ स्रिष्टी टिकी है और
38:33इसी से आत्मा की वास्तविक शुद्धी होती है।
38:37उनके शब्दों के साथ वैकुंठ के दिव्यवातावर्ण में एक स्वर्णिन प्रकाशपुंच उभरा, जो सत्य, पवित्रता और धर्म के त्रिवेनी संगम
38:46का प्रतीक था।
38:48पवित्रता केवल कर्मों में नहीं, बलकी मन की गहराईयों में हर विचार और भावना में समाहित होनी चाहिए, उन्होंने बलपूर्वक
38:57समझाया।
38:58गरूर ने अपने हरिदय में जहाका, अपने पिछले कर्मों और विचारों का मन्थन करते हुए पवित्रता के इस गेहन अर्थ
39:06को आत्म साथ किया
39:08धर्म का मार्ग अडिग है, गरूर वह समय और परिस्थितियों से परे प्रत्येक जीवाक्मा का शाश्वत कर्तव्य है, भगवान ने
39:17अपनी भव्यता में कहा
39:19उनके वचनों के प्रभाव से वैकुंट के दिव्यपत पर एक अद्रिश्य परंतु सपष्ट रूप से उजज्वल मार्ग प्रकाशित हुआ, जो
39:28धर्म की अटल दिशा को दर्शाता था
39:31भगवान विश्णू ने अपनी दृष्टी गरूर पर केंद्रित की, उन्हें इन दिव्य शिक्षाओं को अपने अस्तित्व के कणकण में समाहित
39:39करने का आहवान किया
39:41गरुर ने अपनी आखों में द्रिड संकल्प के साथ भगवान की आध्या को अपने जीवन का सर्वोच लक्ष बनाने का
39:49मौन संकल्प लिया
39:51इन पवित्र सिध्धान्तों का पालन करके ही तुम कर्म के जटिल जाल को पार कर सकोगे और मोक्ष की ओर
39:58अग्रसर होगे भगवान ने कहा
40:01उनके वचनों के साथ वैकुंट के आकाश में क्षण भर के लिए एक जटिल अद्रिश्य धागों का जाल बुना गया
40:09जो कर्म के गूड बंधन का प्रतीक था
40:11यह अंतिम स्वतंत्रता यह परम मुक्ती तुम्हारे सतत प्रयासों और इन सिध्धानतों के प्रती तुम्हारी अटूट निष्ठा का परिणाम होगी
40:22गरूर ने अपने हृदय में मुक्ती की उस अन्मोल भावना को महसूस किया जैसे अनंत आकाश उनके पंखों के नीचे
40:30फैल गया हो
40:32भगवान विश्णों ने एक क्षण के लिए मौन साथ कर अपनी दिव्यद्रिष्टी से गरूर को एक अंतिम शक्तिशाली आशिरवाद प्रदान
40:40किया
40:42इस आशिरवाद के साथ वैकुंट के सबसे उचे शिखर पर एक प्रकाशमान द्वार प्रकट हुआ जो अनंत मुक्ती के मार्ग
40:50की ओर इंगित कर रहा था
40:53भगवान विश्णू ने अपने व्याख्यान का समापन किया यह संकेत देते हुए कि अभी और भी गहन रहस्य उजागर होने
41:01बाकी हैं जो गरूर के लिए नए मार्गों को खोलेंगे
41:05गरूर के मन में ज्ञान की अथा पिपासा जागरित हुई वे उच्सुकता से भविश्य के रहस्यों और भगवान के अगले
41:13उपदेशों की प्रतीक्षा कर रहे थे
41:16भगवान विश्णु ने एक शांत रहस्य में मुस्कान बिखेरी जो आगामी अध्यायों की प्रतिग्या और स्रिष्टी के अंसुलजे सत्यों का
41:25संकेत थी
41:27और वैकुंठ का दिव्य प्रकाश उसक्षन एक नई उर्जा के साथ स्पंदित हुआ जो इस शाश्वत गाथा के कभी नखत्म
41:35होने वाले प्रवाह का प्रतीक था