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गरुड़ पुराण के इस रहस्यमय एपिसोड में, भगवान विष्णु गरुड़ को उन सूक्ष्म और अक्सर अनदेखे पापों का विस्तृत वर्णन करते हैं जो आत्मा को भीषण नरकीय यातनाओं और कष्टदायी पुनर्जन्मों की ओर धकेलते हैं। पिछले एपिसोड में अन्न, वचन और रिश्तों के अपमान के बाद, अब विष्णु उन गंभीर कर्मों पर प्रकाश डालते हैं जो स्त्रियों, बच्चों, वृद्धों, असहायों, निरीह पशुओं और यहाँ तक कि प्रकृति के शोषण व अनादर से उत्पन्न होते हैं। जानिए कैसे अपनों की उपेक्षा, धरोहर का दुरुपयोग, और ज्ञान का अनादर भी यमलोक में बुलाता है भयानक दंड। यह एपिसोड हमें धर्म के व्यापक विस्तार और प्रत्येक कर्म के अटल परिणाम की याद दिलाता है। क्या प्रायश्चित से इन पापों से मुक्ति संभव है? जानने के लिए अंत तक देखें! #गरुड़पुराण #महापाप #कर्मफल #नरक #पाप #पुनर्जन्म #विष्णु #गरुड़ #मृत्यु #हिंदूधर्म #अध्यात्म
Transcript
00:00भगवान विश्णू ने गरूर को बताया कि ब्रहमांड के महापापों के परेभी ऐसे सुक्ष्म अधर्म हैं, जिनकी अंदेखी आत्मा को
00:08भीशन कर्मफल की ओर धकेलती है.
00:12उन्होंने स्पष्ट किया कि अज्ञानता या उदासीनता की आड में किया गया उपेक्षा और अनादर का हर कृत्य आत्मा पर
00:20अमिट दाग छोड़ जाता है.
00:23ये वे गुप्त पाप हैं, जो समाज की नीम्व को धीरे-धीरे खोखला करते हैं, अपनों के विश्वास को तोड़ते
00:30हैं और प्रकृती के संतुलन को बिगारते हैं.
00:35इन अद्रिश अपराधों की गणना स्वयन यम्राज के लेखों में होती है, जिनके डंड उतने ही कठोर होते हैं, जितने
00:43किसी बड़े अपराध के.
00:45पहले वेदों और धर्म ग्रंथों का अनादर है, जिसे ज्ञान के प्रती उपेक्षा का सबसे घिनोना रूप माना जाता है.
00:54गरुर ने उच्सुक्ता से पूछा, हे प्रभु, ये सुक्ष्म अधर्म कौन-कौन से हैं, जो इतने भयानक परिनाम लाते हैं?
01:04भगवान विश्णू ने उत्तर दिया कि सबसे पहला अधर्म है पवित्र ग्रंथों, जैसे वेद और पुराणों की अवमानना करना, उनका
01:13अनादर करना या उन्हें अज्ञानतावश प्रदूशित करना.
01:18जो ज्ञान के इस पावन स्रोत का तिरसकार करते हैं, वे स्वया ही आत्म ज्ञान के मार्क से भटक जाते
01:24हैं और अंधकार में गिर जाते हैं.
01:28इसके उपरांत, गुरुजनों और पूज्य व्रिधों की उपेक्षा और उनके प्रती अनादर का भाव रखना भी एक गंभीर पाप है.
01:38गुरु वे हैं जो ज्ञान का प्रकाश देते हैं और व्रिध समाज के अनुभव का स्तंभ होते हैं, भगवान विष्णों
01:45ने गंभीरता से कहा, जो उनकी सलाह को ठुकराते हैं, उनकी सहायता से मुह मोरते हैं या उनकी सेवा में
01:54उदासीनता दिखाते हैं, वे अपने ही �
01:57भविश्य की जड़े काटते हैं। ऐसे लोग न केवल सामाजिक व्यवस्था को तोड़ते हैं, बलकि स्वयभी मार्गदर्शन और आशिरवाद से
02:07वंचित रह जाते हैं।
02:10तीसरा अद्रिश्य पाप है प्रकृती के तत्वों, जैसे जल, वायू, भूमी और अगनी का अनादर करना या उन्हें प्रदूशित करना।
02:19गरुर ने अपने पंख थोड़े सिकोडे, मानो प्रकृती के इस अनादर की कलपना करके उसे पीड़ा हुई हो।
02:52भगवान विश्नों ने गरुर को समझाया कि ये सभी उपेक्षा और अनादर के कार्य, चाहे कितने भी छोटे लगें, अन्ता
03:00आत्मा को पाप की दलदल में फंसाते हैं।
03:04गरुर ने अपनी आखे बंद करके गेहन चिंतन किया, इन सुक्षम पापों की गंभीरता को आत्म सात करते हुए।
03:12हर कर्म चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष, सुक्षम हो या स्थूल, ब्रह्माण के अद्रिश्य लेखा जोखा में दर्ज होता
03:20है, जिसके परिणाम अवश्य भुगतने पड़ते हैं।
03:25अब हे पक्षिराज, मैं तुम्हें इन सुक्षम अधर्मों के भयानक नर्किय परिणामों और उनके विभिन नर्कों का विस्तृत वर्णन करूंगा।
03:35हे पक्षिराज, सबसे पहले उन पापी आत्माओं को सुनो जो असहाय स्त्री या नवजात बालक को त्याग कर अपने स्वार्थों
03:43की पूर्ती करते हैं, उनका कर्म उन्हें सुकर्मुख नरक की ओर धकेलता है।
03:49भगवान विश्नु, जिनका दिव्यनी शरीर अनंत ब्रह्मांड की उर्जा से दीप्त है और जिनके कमल जैसे नित्रों में करूना और
03:57ग्रिड़ता का मिश्रण है, गंभीर मुख मुद्रा में अपने विशाल स्वर्ण मुकुट के नीचे से गरुड की ओर देखते हुए
04:05विस्तार से बताते हैं कि कैसे ऐसे निर्दई कृत्य एक भयानक कर्मिक रेन का निर्मान करते हैं।
04:43जो लोग छलकपट से कमजोर स्त्रियों और अबोध बालकों का शोशन करते हैं, उन्हें अपने स्वार्थ के लिए यंत्रना देते
04:52हैं, उनकी आत्माओं को क्रिमिभोजन नामक नरक में फेंका जाता है।
04:58भगवान विश्नु जिनकी मुख मुद्रा अब और भी गंभीर हो गई है, अपने ज्यान के सागर से कर्मों की गेहन
05:05जटिलताओं को उजागर करते हुए गरूर को समझाते हैं कि कैसे शोशन से अरजित हर सुख क्षन भंगुर होता है,
05:12और अंत्र नरक में अनंत दुख का
05:14कारण बनता है, क्रिमिभोजन नरक में पापियों को एक विशाल ध्वेनित कीचर से भरे दलदल में धकेला जाता है, जहां
05:24लाखों, करोडों भयानक, चमकते कीडे उनके शरीर को भीतर से कुतरते हैं, उनकी त्वचा को खाते हैं, और उन्हें अथा
05:32पीडा देते हैं, यह
05:35अन्वरत पीडा उनके शोशन की भूख का प्रत्यक्ष प्रतिबिम्भ है, जहां उनकी आत्माए स्वयही कीडों के समान क्षय होती रहती
05:43हैं, कभी त्रिप्ट न होने वाले नरकिय भोगों में फंसी हुई, उनक्रूर व्यक्तियों के लिए जो असहाय स्त्रियों और अब
06:05अपने गंभीर स्वर में उन पापों की भयावता का वर्नन करते हैं, जिनसे ब्रहमांड भी काप उठता है, और गरूर
06:13को चेतावनी देते हैं कि कैसे ये कर्म आत्मा पर अमिट दाग छोड़ जाते हैं।
06:35यह असहनिय पीडा उनके द्वारा दूसरों पर धाय गए अत्याचारों की प्रतिध्वनी है, जहां हर अगनी की लपट उनके क्रोध
06:44और निर्ममता को जलाती है, उनकी आत्माओं को अंथीन दहन में जोग देती है।
07:06भगवान विश्णु जिनके मुख पर अब एक दुखत भाव उभर आया है, बताते हैं कि कैसे देखभाल से इनकार और
07:14जीवन के पोशन को रोकना स्वयं के लिए एक आत्म विनाशकारी कर्म बन जाता है, जिसकी कीमत आत्मा को चुकानी
07:21पड़ती है।
07:23पूयोद नरक में पापी आत्माओं को सदा सड़े हुए दुरगंध युक्त कीचड और मवाद से भरी नदियों में घसीटा जाता
07:31है, जहां उन्हें अनंतकाल तक भूख और प्यास की पीड़ा सहनी पड़ती है, शरीर गलते रहते हैं और आत्माए तडपती
07:39रहती है।
07:55और उन राक्षसी प्रवृत्ती के पापियों के लिए जो अपनी कुरूरता में सभी सीमाओं को लांग जाते हैं, निर्दोष्त्रियों और
08:03बच्चों के जीवन को जानबूच कर नश्ट करते हैं, उनके लिए रौवर्व और महारौवर्व जैसे नरक प्रतीक्षा करते ह
08:12भगवान विश्नु जिनकी वानी में अब ब्रह्मांडिय न्याय का वजर्सा घोश है, घोशना करते हैं कि ऐसे जगने कर्मों के
08:21लिए कोई ग्षमा नहीं है, और इन आत्माओं को तब तक अनवरत यातना भोगनी पड़ती है, जब तक कि उनके
08:28पापों का अनुपर्मान�
08:58समात न हो जाएं।
08:59पापों का हर अन्श पूरी तरह से भस्म न हो जाएं, जिसके बाद उन्हें सबसे निम्न और हीन योनियों में
09:06पुना जन्म लेना पड़ता है।
09:29मैं तुम्हें उनकरूर पापों का सार समझाऊंगा जो अपनों की उपेक्षा से जन्म लेते हैं।
09:36वे पापी जिन्होंने अपने व्रिद्ध मातापिता को, जिन्होंने उन्हें जन्म दिया और पालापोसा गुढ़ापे में अकेला और असहाय छोड़ दिया,
09:46वे अनंत यातना के भागी बनते हैं।
09:50ऐसे लोग अपने गुरुओं की शिक्षा और उनके ज्ञान का भी तिरसकार करते हैं, जिससे उनका नैतिक और आध्यात्मिक पतन
09:58सुनिश्चित हो जाता है।
10:00गरुड ऐसे पतित आत्माओं को सुकर्मुख नरक्की अगाध गहराईयों में धकेला जाता है, जहां उनका मांसल शरीर पत्थर के समान
10:09कुछला जाता है।
10:12वहां उनके अहमकार और उपेक्षा का प्रतिकार होता है, जब उन्हें स्वया उन यातनाओं का सामना करना पड़ता है, जो
10:20उन्होंने दूसरों को दी थी।
10:23सुकर्मुख में विशालकाय वराहमुख वाले विक्राल रक्षक पापी आत्माओं को उन घूमते हुए पाशान खंडों के नीचे धकेलते हैं, जहां
10:32उनकी हड्डिया और मास चूर-चूर हो जाते हैं।
10:37यह निरंतर पीडा, उस अंदेखी और उपेक्षा का दंड है, जो उन्होंने जीवन भर अपने बुजुर्गों और असहायों को दी
10:45थी।
10:46सुकर्मुख की आतना से निकलने के बाद भी, ये आत्माएं शान्ती नहीं पाती, उन्हें क्रिमिभोजन नामक नरक में फेंका जाता
10:54है, जहां उन्हें अपने ही घिनोने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है।
11:00गरुर्त वहां वे आत्माएं, जिन्हें उन्होंने जीवन में उपेक्षित और कमजोर समझा था, अब स्वयंक्रिमी और कीडों के समान क्षीन
11:09और रोगगरस्ट शरीर में पुनरजन्म लेती हैं।
11:14क्रिमिभोजन के दलदल में असंख्य कीडे और मकोडे उनके क्षयगरस्ट शरीरों को निरंतर खाते रहते हैं, जिससे उन्हें असहनिय खुजली
11:23और पीडा का अनुभव होता है।
11:26यह अवस्था उस अपमान और अनादर का प्रतिबिम्भ है जो उन्होंने दूसरों को जीवन में दिया था, अब स्वय असहाय
11:34और घेनित अवस्था में जी रहे हैं।
11:38उन आत्माओं को भी घोर गंड मिलता है जो प्रकृती का अनादर करते हैं, जल्सरोतों को प्रदूशित करते हैं या
11:46व्रिक्षों को निर्दैता से काटते हैं, जैसे वे जीवन के पोशन को ही ठुकराते हैं।
11:53गरूर जिस प्रकार उन्होंने प्रकृती के जीवन दायक तत्वों को उपेक्षित किया, उसी प्रकार उन्हें पूयोद नरक के दूशित प्रवाह
12:01में अनन्त काल तक भटकना पड़ता है।
12:04पूयोद में पापी आत्माए उन सड़ते हुए पिंजरों में बंद रहती हैं, जहां उन्हें दुरगंधित राख की धुंध में सांस
12:12लेने और दूशित नदियों का विशाक्त पानी पीने पर मजबूर किया जाता है।
12:18यह उनकी आत्माओ पर पड़ा हुआ वह अभिशाप है, जो उन्होंने अपने स्वार्थ में प्रकृती की पवित्रता और जीवन के
12:27स्रोतों का अतिक्रमन करके अरजित किया था।
12:30ऐसे पापी, जिन्होंने अपने जीवन में किसी भी असहाय, वृद्ध या गुरु को त्याग दिया या उनकी उपेक्षा की, उन्हें
12:38निरंतर यह स्मरण कराया जाता है कि कैसे उन्होंने अपने मानविय कर्तवियों का परित्याग किया।
12:45भगवान विश्नु, जिनकी वानी में अब न्याय और करुणा का गंभीर संतुलन है, बताते हैं कि यह आत्मपीडा उन्हें तब
12:53तक घेरे रहती है, जब तक उनके प्रत्येक पाप का हिसाब न चुका दिया जाए।
13:00अंतह इस भयानक भोग के बाद वे आत्माएं प्रित्वी पर सबसे निम्न और रोगगरस्त योनियों में जैसे की कीडे, क्रिमी
13:08या लंगडेलुले पशुओं के रूप में पुनरजन्म लेती हैं।
13:13यह उनके स्वयन के कर्मों का फल है, जहां उन्होंने दूसरों को जो पीडा और उपेक्षा दी, वही उन्हें इस
13:20पुनरजन्म के चक्र में वापस मिलती है, जब तक की पापों का अंत न हो जाए।
13:26भगवान विश्नु कहते हैं कि जो मनुष्य किसी की धरोहर, अमानत या मंदिर की पवित्र संपत्ती को लोग में आकर
13:34हडप लेता है, वह सबसे बड़े विश्वास घात का भागी बनता है।
13:39गरुड अत्यंत ध्यानपूर्वक और गंभीर भाव से भगवान हरी के मुख से इस भयंकर पाप की परिभाशा और उसके दुश्परिनामों
13:48को सुनते हैं।
13:50दिव्य पर्दे पर एक द्रिश उभरता है, जहां एक लाल्ची पुजारी या न्यासी मंदिर के विग्रह से स्वर्ण आभूशन चुरा
13:58कर अपने थैले में छिपा रहा है।
14:01वह चोरी का सोना पापी के हाथों में स्पर्श होते ही अग्रिश्य रूप से धधकते हुए अंगारों में बदलने लगता
14:09है, जो उसके अंतहकरण को जलाता है।
14:13श्रीहरी आगे बताते हैं कि लोग कल्यान या अनाथों के लिए दान की गई भूमी का अपने निजी स्वार्थ के
14:21लिए उप्योग करना बजरपात के समान पाप है।
14:25भगवान की बाते सुनकर गरुर का हृदय काम उठता है और वे पूछते हैं कि ऐसे कृतगन मनुष्यों को यमराच
14:33किस प्रकार का दंड देते हैं।
14:36प्रक्षेपण में एक कप्टी व्यापारी एक असहाय अनाथ बालक की भूमी के स्वामित्व के कागजात पर बलपूर्वक और धोखे से
14:44अंगूठा लगवाता दिखता है।
14:48वह जूठा समझोता पत्र अचानक काली प्रेत्वाधित ज्वालाओं में जलने लगता है, जो उस विश्वास घाती के विनाशकारी भाग्य का
14:56प्रतीक है।
14:58नारायन अपनी उंगली से अयहपान नामक नरक्की ओर संकेत करते हैं, जहां चारों ओर पिघले हुए तामबे और कांसे की
15:07खौलती हुई कडाही रखी हैं।
15:10धर्मराज के नियमों की अडिगता को सपष्ट करते हुए भगवान विश्णों के मुखमंडल पर न्याय का अत्यंत तेजस्वी और कठोर
15:18तेज चमक उठता है।
15:20भयंकर रूप वाले यमदूत उन विश्वास घातियों की आत्माओं को बलपूर्वक घसीटते हुए दहकती हुई जल्ती भट्टियों की ओर ले
15:29जाते हैं।
15:32लाल गर्म लोहे के बड़े संडसों से यमदूत पापी के हाथों को जकड लेते हैं, जिससे असहनिय पीली चिंगारिया निकलती
15:39हैं।
15:41जिन्होंने कभी मंदिर का धन और गरीबों का हक चुरा कर पिया था, उन्हें अब बलपूर्वक पिगला हुआ दहकता हुआ
15:49कांसा पिलाया जा रहा है।
15:51इस भयावह और निश्पक्ष दिव्य न्याय को देखकर गरूर श्रद्धा और भय के मिश्रित भावों से अपने पंक सिकोड कर
15:59मस्तक जुका लेते हैं।
16:02एक छटपटाती हुई पापी आत्मा को यमदूत विशाल खौलते हुए तामबे के पात्र में फेंक देते हैं, जिससे भयंकर धुआ
16:10और चीखें गूँझ उठती हैं।
16:14न्याय की स्वर्णन कराजू अन्याय और चोरी के भारी पाप के भार से तूटकर बिखर जाती है, जो अटूट कर्म
16:21सिध्धान्त को दर्शाती है।
16:24भगवान विश्णू बताते हैं कि इस भीशन नर्किय यातना को भोगने के बाद भी उन आक्माओं का पाप पूरी तरह
16:32शांत नहीं होता।
16:34श्रीहरी करुणामई किंतु गंभीर मुद्रा में गरूर को समझाते हैं कि इन पापियों का अगला जन्म अत्यंत दैनिय लोनियों में
16:42होता है।
16:44वह पापी जीव अब प्रित्वी पर एक घ्रेनित और परजीवी कीडे के रूप में जन्म लेकर गंदे नालों और कीचड
16:52में निरंतर तडपता रहता है।
16:55अत्वा वह एक दरिद्र शीनकाय भूत के रूप में मरुस्थल में भटकता है, जो भूख और प्यास की भयानक तडप
17:03में सदैक तडपता रहता है।
17:06श्रीहरी की वानी में अब एक नई गहन गंभीरता थी, जैसे वे स्रिष्टी के एक और मूलभूत नियम का परदाफाश
17:14कर रहे हों, प्रकृती के प्रती किये गए अनाचार का महापा।
17:19भगवान विश्णु, जिनकी द्रिष्टी में करुणा और चेतावनी दोनों थी, गरूर से कहते हैं, ये गरूर, केवल मनुष्यों के प्रती
17:28पाप ही नहीं, बलकि इस धर्ती, इस प्रकृती के प्रती भी किया गया अनादर घोर नरक का मार्ग प्रशस्त करता
17:35है।
17:36वे बताते हैं कि कैसे कुछ स्वार्थी मनुष्य पवित्र व्रिक्षों को बिना किसी आवश्शक्ता के काट डालते हैं, केवल अपने
17:45क्षणिक लालच की पूर्ती के लिए जीवन दायनी वनस्पती का सहार करते हैं।
17:51उनकी कुलहाडी का प्रतेक प्रहार केवल लकडी पर नहीं, बलकि स्वयन प्रित्वी के हृदय पर होता है, जिससे प्रकृती का
17:59संतुलन तूटता और जीवन का चक्र बाधित होता है।
18:04यह विध्वन्सकारी कर्म ऐसे नरकों को जन्न देता है, जहां जीवन का हर चिन मुर्जा जाता है, और हर कदम
18:11कांटों की चुभन से भरा होता है।
18:15गरुड इन बातों को सुनकर विस्मय और दुहक से भर गए, उनके मुख पर प्रकृती के प्रती अपराध की गहनता
18:22का प्रतिविंब स्पष्ट दिख रहा था।
18:25श्रीहरी ने आगे बताया कि कैसे लालच के वशीभूत होकर कुछ लोग नदियों को प्रदूशित करते हैं, पवित्र जलधाराओं में
18:33विश घोलते हैं, जिससे न केवल जलिये जीवन बलकी मानव जीवन भी संकट में पढ़ जाता है।
18:41उनका यह कर्म एक ऐसी काली छाया छोड जाता है, जो पीडियों तक पानी के हर घूंट में जहर घोलती
18:48है, जीवन के स्रोत को ही नश्ट कर देती है।
18:52ऐसे पापियों को नरक की अगनी और कांटों से भरी गहरी खाईयों में धकेल दिया जाता है, जहां उनकी आत्माएं
19:00अंथीन पीडा भोगती हैं।
19:03भगवान विश्णु का स्वर अब और भी गंभीर हो गया। ऐसे नरकों में गरुड पापी को नित्य अगनी में तपाया
19:10जाता है और कांटों से छलनी किया जाता है, जो उसकी आत्मा के घावों को दर्शाता है।
19:18पापी जीव को एक ऐसे कक्ष में फेंक दिया जाता है, जहां की दीवारें, फर्श और छट सब विशालकाई नुकीले
19:26कांटों से ढके होते हैं, और वह हर करवट बदलते हुए स्वयन को और अधिक घायल करता है।
19:33अत्वा उन्हें उनकुंडों में डुबोया जाता है, जहां आग की लप्टे निरंतर शरीर को जलाती रहती हैं, और हर सास
19:41में धुए की करवाहट भर जाती है।
19:45इन भयानक नर्किय भोगों के बाद उनका अगला जन्म ऐसी बंजर भूमी पर होता है, जहां कभी कोई जीवन नहीं
19:53पनपता, या वे स्वयन मुर्जाय हुए पौधे के रूप में जन्म लेते हैं।
19:59भगवान विश्णों ने गरूर को समझाया कि यह पुनर्जन्म प्रकृती के प्रती उनके अपराध का प्रत्यक्ष परिणाम है, जहां वे
20:07स्वयन उस बंजरता का प्रतीक बन जाते हैं, जो उन्होंने फैलाई थी।
20:13वह पापी अब एक मुर्जाय हुए, कांटों से भरे पौधे के रूप में जन्म लेता है, जिसे कोई छुना नहीं
20:20चाहता, जो कभी फल नहीं देता और जिसकी छाया में कोई जीव नहीं टिकता।
20:26यह पुनरजन्म उस आत्म प्रदूशन का प्रतीक है, जो उसने अपनी लालसाओं से प्रकृती को प्रदूशित करके फैलाया था, अब
20:34उसे स्वय ही उस बंजरता को जीना पड़ता है।
20:38श्रीहरी ने आगे कहा कि केवल लालच के लिए प्राकृतिक आवासों को नश्ट करना, वन्यजीवों और उनके घरों को उजाड़ना
20:47भी गंभीर कर्मफल लाता है।
20:49गरुर ने गहरी सांस ली, उनके मन में प्रित्वी के प्रती मनुश्यों के दायत्व और उसके दुरुपयोग के भयानत परिणामों
20:58का एक स्पष्ट चित्र उभर आया।
21:00उन्होंने देखा कि कैसे ऐसे पापी अपने ही हाथों से एक ऐसी दुनिया का निर्मान करते हैं, जहां उन्हें अंत्ह
21:09प्रकृती के क्रोध और स्वयंकी बनाई बंजर्ता का सामना करना पड़ता है।
21:15श्रीहरी के वचन गूंचते रहे, जो प्रिथवी का अनादर करता है, उसे अंत्ह प्रिथवी की बंजर्ता ही प्राप्थ होती है,
21:23क्योंकि कर्म का चक्र कभी नहीं रुपता।
21:26जैसे ही श्रीहरी के वचनों का कमपन शान्थ हुआ, गरूर को आभास हुआ कि प्रिथवी के प्रती अज्यानता से उपजा
21:33अनादर मात्र यहीं समाप्त नहीं होता, बल्कि यह जीवन के प्रत्येक पहलू में अपना विश पैलाता है.
21:42भगवान विश्नु ने अपनी शान्थ अथा द्रिष्टी गरूर पर केंद्रित की मानो ब्रहमांड के समस्त रहसियों को एक ही पल
21:49में उजागर करने की तयारी कर रहे हुँ.
21:53हे गरूर भगवान ने गंभीरता से कहा, जो प्राणी निरीः पशुधन की उपेक्षा करता है, उन्हें अकारण कष्ट देता है,
22:01या खेल के लिए जीव हिंसा करता है, वह अहिंसा के मूल सिध्धान्त का उलंगन करता है.
22:09गरूर के मन में उन असंख्य जीवों का चीतकार गूझ उठा, जिनकी मूग पीड़ा और अनसुनी आहे कर्म के आकाश
22:16में एक भयानक प्रतिध्वनी बनकर लोटती है.
22:21उस भयावह सत्य को आत्म साथ करते हुए, गरूर ने देखा कि नरक के द्वार उन आत्माओं के लिए खुलते
22:28हैं, जो दूसरों के जीवन के प्रती निर्मम रहे हैं.
22:33गरूर के चहरे पर करुणा का भाव गहरा गया, क्योंकि उन्होंने भगवान के शब्दों में उन आत्माओं का भविश्य देखा
22:40जो पशुओं को केवल मनोरंजन या सुविधा का साधन मानते हैं.
22:46श्रीहरी ने आगे बताया, जो मनुष्य वन में निर्दोश हिरनों का, पक्षियों का या किसी भी वन्य जीव का केवल
22:53क्रीडा के लिए आखेट करता है, वह भी घोर-पाप का भागी बनता है.
22:59इस क्षण गरूर को उन जीवों की बेपसी महसूस हुई, जिनके जीवन का धागा क्षणिक मानविय मनोरंजन के लिए क्रूरता
23:07से काट दिया जाता है.
23:11देवलोग से उतरती हुई इन वचनों के साथ, गरूर को एक भयावध द्रिश दिखाया गया, जहां ऐसे पापियों को उनके
23:18क्रित्यों का हिसाब चुकाना पड़ता है.
23:22गरूर के विशाल पंख क्षण भर के लिए काप उठे, जब उन्हें नरक में भोगी जाने वाली यातनाओं की भयावता
23:29का अनुमान हुआ.
23:31ऐसे पापियों को भगवान विश्णु ने बताया, नरक में भयानक हिंसक जीवों द्वारा लगातार शिकार बनाया जाता है, ठीक वैसे
23:40ही जैसे उन्होंने अपने जीवनकाल में निरीह जीवों का शिकार किया था.
23:45वे नरक के उस भयावह जंगल में भटकते रहते हैं, जहां प्रत्येक छाया एक शिकारी होती है और प्रत्येक ध्वनी
23:53उनके अंत की घोषणा.
23:56यह अंथीन पीडा तब तक जारी रहती है, जब तक उनके प्रत्येक क्रूर कृत्य का फल पूरी तरह से नहीं
24:03चुका दिया जाता.
24:05गरुर ने ध्यान से सुना, उनके मन में उन जानवरों के चित्र उभर आये जिन्हें मनुशुने कभी निर्दैता से सताया
24:13था.
24:14और अंतर श्रीहरी ने अपनी वानी को और गंभीर करते हुए कहा, उन्हें स्वय उन्ही कष्ट भोगने वाले जानवरों के
24:22रूप में पुनर्जन्म मिलता है, जिनके प्रती उन्होंने क्रूरता बरती थी.
24:27यह कर्म का चक्र था, जहां अत्याचारी स्वय पीडित बन जाता है और उस पीड़ा का अनुभव करता है जो
24:35उसने दूसरों को दी थी.
24:38गरुर ने देखा कि यह पुनर्जन्म केवल सजा नहीं, बलकि एक गहरा सबक था, जीवन के प्रत्येक रूप में नहित
24:45पवित्रता को समझने का.
24:48भगवान विश्णु ने अपनी शांत मुद्रा में ब्रह्मांड की इस अटल सत्य को रेखांकित किया, प्रत्येक जीव का सम्मान आवश्चक
24:56है.
24:58करुणा और अहिंसा का मार भी वहसेतु है, जो आत्मा को अनवरत कष्टों के चक्र से मुक्त कर परम शांती
25:05की ओर ले जाता है.
25:08कर्म का यह गुप हिसाब सभी जीवों के लिए एक अटल नियम है, जिसे कोई भी अपनी इच्छा से नहीं
25:15तोड सकता, क्योंकि प्रत्येक कृत्य का फल अवश्च मिलता है.
25:20भगवान विश्णु ने फिर से उस सूश्म संतुलन को समझाया, जहां केवल भौतिक कर्म ही नहीं, अपितु विचारों और ज्ञान
25:28के उप्योग का भी लेखा जोखा रखा जाता है.
25:32उन्होंने बताया कि जो पवित्र ज्ञान को केवल अपने स्वार्थ के लिए उप्योग करते हैं, या उसे दूशित करने का
25:39प्रयास करते हैं, वे अपनी आत्मा को अंधकार की ओर धकेल देते हैं.
25:46गुरू का अनादर करना, जिन्होंने अज्ञानता के अंधेरे से ज्ञान का प्रकाश प्रदान किया, एक ऐसा पाप है जो आत्मा
25:54को विद्याहींता के गर्त में धकेल देता है.
25:58जो सक्चे ज्ञान के प्रसार को बाधित करते हैं, उन्हें भविश्य के जन्मों में बुद्धिहींता और मानसिक ध्रम का शाप
26:06भोगना पड़ता है, उनकी चेतना अंधकार से घिरी रहती है.
26:11भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि ऐसे व्यक्ति न केवल इस जन्म में, बलकि कई जन्मों तक सत्य और असत्य
26:19के बीच भेद करने की क्षमता खो देते हैं.
26:23वे माया के जाल में फंसकर भटकते रहते हैं, सत्य का मार्ग उनके लिए अद्रिश्य हो जाता है और जीवन
26:30केवल एक अंथीन ध्रम बन जाता है.
26:34उनकी बुद्धी बंजर भूमी के समान हो जाती है, जहां कोई नया विचार, कोई सच्ची अंतरग्रिष्टी कभी अंकुरित नहीं हो
26:42पाती.
26:44ध्रम की गहरी पर्तों में लिप्टे, वे जीवन के उद्देश्य और अपनी आत्मा के पत से अन्भिज्य केवल अंधकार में
26:52भटकते रहते हैं.
26:54उन्होंने गरूर को बताया कि ऐसे पापी अंतर विशिष्ट नरकों में भयानक यातनाओं को भोगने के लिए भेजे जाते हैं,
27:02जहां उनकी आत्मा का अंधकार और भी गहरा हो जाता है.
27:07तमिसरा नामक नरक में उन्हें अन्वरत रूप से पूर्ण अंधकार में रखा जाता है, जहां प्रकाश की एक किरण भी
27:15उनके मन को भेद नहीं पाती.
27:18वहां अपनी आखों को खोलने की इच्छा होने पर भी वे कुछ नहीं देख पाते, केवल अनन्त और भयावः शूनी
27:26में खोये रहते हैं.
27:27यह उस अंधकार का प्रतिरूप है जो उन्होंने जीवित रहते हुए ज्ञान के प्रकाश को अवरुध करके अपनी आत्मा में
27:36बोया था.
27:38अंधत मिस्रा में ज्ञान के सबसे पवित्र स्रोतों का तिरसकार करने वाले अपने ही विचारों के भ्रमजाल में फंसकर तीवर
27:46पीड़ा का अनुभव करते हैं.
27:49वहां उनकी मानसिक यातना शारिरिक कष्ट से कहीं अधिक होती है, क्योंकि उन्हें अपने अतीत के ज्ञान के दुरूपयोग की
27:57स्मृतिया बार-बार सताती हैं.
28:00वे अपने ही बनाए हुए भ्रमों और मिथ्या अहंकार के प्रेतों से घिरे रहते हैं, जिनसे वे कभी मुक्ती नहीं
28:07पा सकते.
28:09यह आत्मा की वह अवस्था है, जहां उसे अपनी ही दुरबुध्धी के जाल से निकलने का कोई मार्ग नहीं मिलता.
28:18भगवान विश्णुने चेतावनी दी की ज्ञान एक दोधारी तलवार है, जिसका सदुप्योग मोक्ष देता है और दुरुप्योग अनंत अंधकार में
28:27धकेल देता है.
28:29उन्होंने गरूर को समझाया कि सच्चा ज्ञान विनमर्ता, सेवा और समस्थ जीवों के प्रती प्रेम के साथ ही फलीभूत होता
28:37है.
28:39ज्ञान का सच्चा मार्ग वही है जो आत्मा को अज्ञानता के बंधन से मुक्त कर परम प्रकाश की ओर ले
28:46जाएं.
28:47इस प्रकार विद्या और ज्ञान का सम्मान ही जीव को उस शाश्वत अंधकार से बचा सकता है, जो बुद्धी के
28:55शाप से उत्पन होता है.
28:58भगवान विश्णु अब गरुड को उस भयानक नरक की ओर ले जाते हैं, जहां सत्ता का दुरुप्योग करने वाले भरष्ट
29:05शासकों और लोकसेवकों को उनके करमों का दंड मिलता है.
29:10गरुड ने अत्यंत विस्मय और करुणा से प्रभु की ओर देखा और पूछा की जो राजा अपनी प्रजा की रक्षा
29:17के लिए नियुक्त थे, वे इस दुर्गती को कैसे प्राप्थ हुए?
29:22प्रभु ने समझाया की जो राजा या अधिकारी अपनी शक्ती के मद में चूर होकर निर्धनों का शोशन करते हैं,
29:30उन्हें यम्दूत तपते हुए लोहे के शूलों से छेदते हैं.
29:35सत्ता के अहंकार का प्रतीक उनके सोने के मुकुट पिघलते हुए कांसे की तरह उनकी आखों और कानों में बहते
29:42हैं, जिससे उनका सारा जूठा गौरव नश्ट हो जाता है.
29:47इस नरक की विशाल सीमा में चारों और जलते हुए न्याय पीठ दिखाई देते हैं, जहां कभी न्याय का ढों
29:54करने वाले आज स्वयन न्याय की भीख मांग रहे हैं.
29:59शांत मुद्रा में खड़े चक्रधारी विश्णु ने गरूर को सचेत करते हुए कहा कि अधिकार कोई भोग की वस्तु नहीं,
30:07बलकि एक परम पवित्र उत्तरदायत्व है.
30:11यहां वे मंत्री और अधिकारी चीख रहे हैं, जिन्होंने अनाथों और विध्वाओं के धन को हड़पकर अपनी हवेलियों का निर्मान
30:19किया था.
30:20उनकी चाती पर भारी लोहे के शिलाखन रखे जाते हैं, जो प्रजा पर धाये गए उनके अत्याचारों के बोज को
30:28दर्शाते हैं.
30:30दूर दूर तक यमदूतों के भयानक कोडे बरसने की आवाजे और पापियों का विलाप इस लोहमई घाटी को और अधिक
30:38दरावना बना देता है.
30:41गरुर के मुख पर दुख की चाया देखकर दयानिधान नारायन ने उन्हें धांधस बंधाया की सृष्टी का नियम सदैव निश्पक्ष
30:49और अचूख होता है.
30:52जो लोकसेवक जन्ता की सहायता के बजाय रिश्वत लेकर उनके कारियों में बाधा डालते थे, उनके हाथों को खोलते हुए
31:00तेल में दुबोया जा रहा है.
31:03उनके जूठे अभिलेक और न्याय के जूठे दस्तावेज यहां दहकते हुए अंगारों में बदलकर उनकी आत्मा को जलाते हैं.
31:13इस दंडभूमी में उचे पहाडों की तरहे धधकते हुए तामबे के दुर्ग बने हैं, जहां कभी नखक्म होने वाली यातनाए
31:20दी जाती हैं.
31:23वासुदेव ने गरूर को बताया कि कर्मों का यह गुप्त हिसाब हर पल लिखा जाता है, जिसे मृत्यू के बाद
31:30कोई भी बल्वान पुरुष टाल नहीं सकता.
31:33अपनी शक्ती के बल पर सत्य को दबाने वाले न्यायाधीशों की जीब को यमदूत तप्त लौह चिम्टों से खीच कर
31:40बाहर निकालते हैं.
31:43उनकी आखों से बहने वाले आसू भी इस तप्त भूमी पर गिरते ही भाप बनकर उर जाते हैं, जिससे दया
31:50की कोई गुंजाइश नहीं बचती.
31:53इस प्रकार संपूर्ण सत्ता के मद को चूर करने वाला यह यमलोक का क्षेत्र न्याय के सार्वभौमिक सत्य की घोशना
32:01करता है.
32:03नारायन ने गरूर से कहा कि सक्चा शासक वही है जो स्वयं को प्रजाका सेवक मानकर निशकाम भाव से अपने
32:11कर्तवियों का निर्वेहन करे.
32:13जिन क्रूर शासकों ने अपनी विलासिता के लिए वनों और जलसरोतों को नश्ट किया, उन्हें इस मरुभूमी में प्यास की
32:21प्रचंड ज्वाला तडपाती है.
32:24अंतह उनके भौतिक शरीर की शक्ती का अहंकार मिक्टी में मिल जाता है और केवल धर्म ही उनकी आत्मा की
32:32यात्रा का एक मात्र सहारा बचता है.
32:36श्रीहरी विश्णू ने गरूर की ओर देखते हुए कहा कि संसार में कृतगंता अर्थात उपकार नमानना सबसे बड़ा अद्रिश्य पाप
32:44है जो मनुष्य की आत्मा को अंधकार की ओर ले जाता है.
32:50भगवान विश्णू ने शांट किन्तु गंभीर वानी में समझाया कि जो मनुष्य संकट के समयली गई सहायता को भूल कर
32:57अपने उपकारियों से मुह मोड लेते हैं, वे वास्तव में आध्यात्मिक चोर हैं.
33:04एक व्यक्ती जो अपने व्रिद्ध मातापिता के त्याग और कश्टों को भूल कर उन्हें अकेला छोर देता है, वह अपनी
33:12आत्मा पर कृतगंता का असहनिय बोच लिख लेता है.
33:17कृतगंता का यह अद्रिश्य पाप काल के चक्र में एक ऐसे रेंकी तरहे जमा होता है, जिसे आत्मा को आने
33:24वाले कई जन्मों तक तडब कर चुकाना पड़ता है.
33:28इस पाप के साक्षी सूर्य, चंद्र, वायू और भूमी जैसे पंच महाभूत बनते हैं, जो कृतग्न मनुष्य के हर विश्वासघात
33:37को ब्रहमांड के नियाएखाते में दर्ज करते हैं.
33:41गरुर ने अत्यंत व्याकुल होकर पूछा कि है प्रभुक जो जीव दूसरों की निस्वार्थ दया का अपमान करते हैं, उनका
33:49परलोक में क्या हश्र होता है?
33:52विश्णु जी ने बताया कि मृत्यू के पश्चात, यमदूत ऐसे कृतग्न मनुष्यों को अयहपान नामक नरक की दहकती हुई भट्टियों
34:01के समीप घसीट कर लाते हैं.
34:04वहाँ उन विश्वास घातियों की जीब और हृदय पर दहकते हुए लोहे के चिंपे रखे जाते हैं, ताकि वे उस
34:11दर्द को महसूस कर सकें जो उन्होंने अपने शुभचिंतकों को दिया था.
34:17अयहपान नरक का यह भयानक द्रिश्य चारों और उबलती हुई धातूओं की नदियों और जलती हुई हवा से भरा होता
34:24है, जहां कृतखन आत्माए चीखती चिलाती हैं.
34:29नारायन ने गरूर को चेतावनी देते हुए कहा, कि जो लोग धन या संकट के समय लिये गए रिन को
34:36जानबूच कर नहीं लोटाते, वे भी इसी श्रेणी के अपराधी माने जाते हैं.
34:42एक धनी व्यापारी जिसने एक गरीब मित्र से विपत्ती में धन लिया और बाद में उसे पहचानने से भी इनकार
34:49कर दिया, वह अपनी इस चोरी का भयानक फल भोगता है.
34:54ऐसी आत्माओं के पुन्यकर्म पूरी तरहनश्ट हो जाते हैं और उनका संपूर्ण अस्तित्व केवल पाप के अंथीन रिन से ढख
35:03जाता है.
35:05यम्राज के दरबार में चित्रगुप्त के बही खाते में कृतगहनता का यह पाप सबसे गहरे काले अक्षरों में दर्स किया
35:12जाता है, जिसका कोई प्रायश्चित आसानी से नहीं मिलता.
35:17भगवान विश्णू ने आगे कहा कि कृतगहनता केवल मनुश्यों के प्रती नहीं, बलकी प्रकृती और पशुओं के प्रती भी होती
35:25है, जिन्होंने निहस्वार्थ भाव से हमारी सेवा की है.
35:30जिस गाय ने जीवन भर दूध पिला कर पोशन किया, उसे बूढ़ा होने पर भूखा मरने के लिए सडक पर
35:37छोड़ देना भी कृतगहनता का अत्यंत क्रूर रूप है.
35:41इस निश्थूर्था के कारण आत्मा के चारों और एक ऐसा अग्रिश्य जाल बुन जाता है, जो उसे बार-बार ऐसे
35:49योनी में जन्म लेने पर विवश करता है, जहां वह स्वयं उपेक्षित रहती है.
35:55ऐसे पापी आने वाले जन्मों में मरुभूमी जैसी बंजर भूमियों पर अकेले और असहाय भटकने के लिए अभिशप्थ होते हैं,
36:04जहां कोई उनका सहायक नहीं होता.
36:07गरुड ने अत्यंत विनीत भाव से पूछा की है दयासागर, क्या इस भयानत पाप से मुक्ती पाने का कोई मार्ग
36:15अथवा सरल उपार उपलब्ध है?
36:18श्रीहरी ने समझाया कि यदि मनुष्य अपनी भूल का समय रहते एहसास कर ले, शमा मांगे और अपने उपकारियों की
36:26सेवा में सर्वस्व समर्पित कर दे, तो वह इस रिन से मुक्त हो सकता है.
36:32अंतह आभार और कृतग्यता की भावना ही वह पावन जोती है, जो आत्मा के संचित पापों को जलाकर उसे मोक्ष
36:41के मार्ग पर ले जाती है.
36:44भगवान विश्णु ने अत्यंत सौमैस्वर में गरूर से कहा कि धर्म केवल कुछ कर्मों तक सीमित नहीं है, बलकि यह
36:51संपूर्ण ब्रहमांड के संतुलन का आधार है.
36:55अपने दिव्यरूप में विराजमान श्रीहरी ने समझाया कि स्रिष्टी का प्रत्येक जीव अपने कर्मों के सुक्ष्म तानेबाने से बंधा हुआ
37:04है और धर्म ही उसे सही मार्ग दिखाता है.
37:08प्रभु के संकेट करते ही उनके समक्ष एक अलौकिक द्रिष्ट प्रकट हुआ, जिसमें प्रित्वी पर कुछ मनुष्य निस्वार्थ भाव से
37:17दूसरों की सहायता कर रहे थे.
37:19इस ब्रह्मांडिय द्रिष्य में न्याय और धर्म की एक विशाल स्वर्ण तराजु को पूरी तरह संतुलित होते हुए दिखाया गया,
37:27जो कर्मों के न्याय संगत परिनाम को दर्शाती थी.
37:32विश्नु जी ने आगे कहा कि भले ही मनुष्य से अज्यानता में घोर पाप हो गए हों, परन्तु यदि वह
37:38सक्चे हृदय से पश्चाताप करे, तो उसके कर्मों का बोज कम हो सकता है.
37:45प्रभु के इन दयालू वचनों को सुनकर गरुड देव के मुख पर संतोश का भाव उभरा और उन्होंने श्रद्धा पूर्वक
37:52अपने शीश को जुका लिया.
37:55तभी एक दिव्य खिडकी में एक दुखी मनुष्य को पूर्व में किये गए, अपने पर्याबरण विरोधी कृत्यों के लिए पश्चाताप
38:02करते हुए एक नया व्रिक्ष लगाते देखा गया.
38:06मनुष्य के इस पुनीत कार्य से उसके चारों और लिप्टी हुई पापों की काली अग्रिश बेडिया धीरे-धीरे तूटकर सुनहरे
38:14कणों में बिखरने लगी.
38:17वैकुंठ का संपूर्ण वातावर्ण इस पावन सत्य के प्रक्तिकरण से प्रफुलित हो उठा और दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी.
38:26नारायन ने अपने भक्तों को सांत्वना देते हुए कहा कि प्रायश्चित ही वह पवित्र अग्नी है जो संचित कर्मों के
38:33मलिन प्रभाव को भस्म कर देती है.
38:37एक अन्यद्रिश में एक धार्मिक व्यक्ति को पवित्र जलाशय के तटपर निर्धनों को अन्नदान करते हुए और गौमाता की सेवा
38:45करते हुए दिखाया गया.
38:48मलिन जल में उगने के बाद भी जैसे कमल सदैव स्वच और सुन्दर रहता है, वैसे ही पश्चाताप करने वाला
38:55पापी भी निश्पाप हो जाता है.
38:59वैकुंठ धाम के विशाल द्वारों पर दिव्यरक्षक और देवतागन भी अत्यंत श्रद्धा पूर्वक इस ज्यानमई चर्चा को सुन रहे थे.
39:08गरुर ने अत्यंत जिग्यासा से पूछा कि है प्रभुक, कल्यव के साधारन मनुश्यों के लिए प्रायश्चित के कौन से सुगम
39:16मार्ग उपलब्ध होंगे.
39:18भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए अपना अभय हस्त उठाया, जो यह दर्शाता था कि कोई भी जीव कभी भी पूर्णत्ह
39:26आशाहीन नहीं होता.
39:29जैसे रात्री के घने अंधकार को भेद कर सूर्य की प्रथम किरण संपूर्ण धरा को आलोकित कर देती है, वैसे
39:36ही ज्यान अज्यान को मिटा देता है.
39:40वैकुंट के इस पावन वातावर्ण में एक स्वर्गिय शान्ती व्याप्थ हो गई, मानो सारा ब्रहमांड इस क्षमाशीलता के संदेश को
39:48स्विकार कर रहा हो.
39:51श्रीहरी ने इस अध्याय का समापन करते हुए संकेप दिया कि आने वाले अध्यायों में वे प्रायश्चित के विशिष्ट और
39:59सरल नियमों का सविस्तार वर्णन करेंगे.
40:02प्रभु के इन दयामे वचनों को अपने हृदय में संजोकर, गरुर देव ने अत्यंत भावुक होकर भगवान के श्रीचर्णों में
40:10पुनह प्रणाम किया.
40:12इस प्रकार गरुर पुरान का यह पावन गरंत धीरे धीरे अपने अगले चरण की ओर बढ़ने लगा, जहां मुक्ती और
40:20प्रायश्चित के गुप रहस्य छिपे थे.

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