गरुड़ पुराण के इस भीषण एपिसोड में, भगवान विष्णु उन महापापों का पर्दाफाश करते हैं जिनकी कल्पना भी रूह कंपा देती है! 😱 जब गुरु, शास्त्र और पवित्र धन के अपमान के बाद, गरुड़ पूछते हैं, 'प्रभु, क्या इससे भी भयानक कर्म होते हैं?' तब विष्णु मित्रद्रोह, ब्रह्महत्या, गोहत्या और परस्त्रीगमन जैसे घोर पापों के रहस्य उजागर करते हैं। जानिए विश्वासघात, हत्या और व्यभिचार की अदृश्य शक्ति कैसे आत्मा को अत्यंत क्रूर नरकों जैसे तामिस्र, असिपत्रवन और तप्तशूल में धकेलती है। क्या इन पापों का कोई प्रायश्चित है? या आत्मा जन्म-जन्म तक भोगती है इनका भीषण परिणाम? इस एपिसोड में जानिए कर्मों के सबसे भयानक चक्रव्यूह को और उससे मुक्ति का रहस्य! #गरुड़पुराण #महापाप #नरक #कर्म #विश्वासघात #ब्रह्महत्या #गोहत्या #व्यभिचार #अधर्म #आत्मा #मृत्यु #पुनर्जन्म #मोक्ष #हिंदूधर्म #पुराण
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00:00भगवान विश्णू ने वैकुंट के दिव्य विस्तार में गरुर को संबोधित करते हुए महापापों की अगली भयावः परतों का अनावरन
00:08करना आरंब किया, जहां आत्मा के मार्ग में सबसे गहरे अंधकार छिपे थे.
00:14गरुर्त भगवान विश्णों की वानी में ब्रहमांड का धैर्य था, गुरुक शास्त्र और पवित्र धन का अपमान केवल प्रथम सोपान
00:22है, परंतु कुछ पाप ऐसे हैं, जो आत्मा को चिरकाल के लिए गहन अंधकार में धकेल देते हैं.
00:30उन्होंने आकाश गंगा के रहस्यों की भाती उन कर्मों को खोलना आरंभ किया, जो मनुष्य की आत्मा में छल, हिंसा
00:38और वासना की विशैली जड़े बोते हैं, जिनकी फलिया महा विनाशकारी होती हैं.
00:45गरूर का हृदय इन अनावर्णों से विचलित हो उठा, जैसे कोई पवित्र सरोवर एकाएक अंधेरे की चाया में आ गया
00:53हो.
00:54गरूर विश्नु ने कहा, प्रथम महापाप है विश्वास घात, अपने ही मित्र, परिवार या राष्ट्र के प्रती किया गया धोखा,
01:02जो आत्मा को भीतर से खोखला कर देता है.
01:06गरूर ने अपनी तीक्ष्न ग्रिष्टी से भगवान को देखा, मानो इस भयानक पाप की गहराई को अपने अंतर्मन में अनुभव
01:14कर रही हो.
01:16एक राजा अपने विश्वस्थ सेनाप्ती के साथ गुप्त योजना बना रहा था, तभी विश्वास घाती सेनाप्ती ने शत्रु को उस
01:24गुप्त योजना का भेद बता दिया.
01:26इस विश्वास घात का परिणाम नरक के सुकरमुख में होता है, जहां आत्मा को भारी काले ग्रेनाइट स्लैबों के नीचे
01:35सुरमुखी वार्डन द्वारा कुछला जाता है.
01:39भगवान विश्वास घाता है, इस से भी भीशन, गरूर है, हत्या, किसी निर्पराथ प्राणी के जीवन का क्रूरता से अंत
01:47करना, जो प्रकृती के मौलिक संतुलन को बिगाड़ता है.
01:52गरूर का चेहरा अब और भी गंभीर हो गया, उसकी आखें इस जगन्य पाप की कल्पना मात्र से सिकुड गई.
02:00एक निर्धन किसान अपने खेत में शान्ति पूर्वक काम कर रहा था, तभी एक क्रूर डाकू ने उसे धन के
02:08लालच में निर्ममता से मार डाला.
02:11इस अमानवीय कृत्य का फलरौरव नरक में मिलता है, जहां आत्मा को जलते हुए काले अगनी कुंडों में फेंका जाता
02:19है और नुकीले लोहे के खंभों पर टांगा जाता है.
02:23और अंत में गरुर, भगवान विश्णू ने अपनी द्रिष्टी और भी गंभीर करते हुए कहा, है व्यभिचार, पवित्र रिष्टों और
02:31विवाह की मर्यादा को भंग करना, जो समाज की नीम को हिला देता है.
02:38गरुर ने गहरी सास ली, उसके पंख थोड़े सिकुड़ गए, मानो इस पाप की गर्माहट और कडवाहट को महसूस कर
02:45रहे हूँ.
02:47एक धनवान सेठ, जिसने अपनी पतनी के पवित्र प्रेम का अपमान किया, एक अन्यस्त्री के साथ चोरी चिपे वासना में
02:55लिप्ट था.
02:56इस पाप का भयावह दंड अयहपान नरक में मिलता है, जहां आत्माओं को तपते हुए पिघले हुए कांस्य के कड़ाहों
03:04में उबाला जाता है.
03:07इन महापापों के भयंकर परिणामों को दर्शाते हुए, भगवान विश्णु का दिव्यरूक शांत फिर भी परम गंभीर दिखाई दे रहा
03:15था.
03:16गरुर ने इन भयावह सत्यों को अपने हृदय में आत्मसात किया, उसके अंतर्मन में ब्रहमांडिय न्याय की गूंच सुनाई दे
03:24रही थी.
03:26ये पाप, गरुर, आत्मा के कर्मों पर ऐसे दाग छोडते हैं, जिन्हें केवल पश्चाताप और धर्म के कठोर मार्ग से
03:34ही धोया जा सकता है.
03:35अन्यथा पुनरजन्म का चक्र उन्हें नरक के अंधेरे में धकेलता रहता है.
03:42वैकुंठ का दिव्यवातावर्ण अब इन सत्यों की गहनता से और भी अधिक गरिमामय प्रतीत हो रहा था, जैसे ब्रहमांड स्वयं
03:50अपने नैतिक आयामों को पुना परिभाशित कर रहा हो.
03:54अब भगवान विश्णु ने एक नए प्रकार के पाप का अनावरण किया, जो मनुष्य की आत्मा में गुक्त रूप से
04:01प्रवेश कर उसे भीतर से खोखला कर देता है और जीवन भर अशान्ती का कारण बनता है.
04:09गरुर्त जो पहले से ही सुख्ष्म पापों की गंभीरता से अवगत थे, अब और भी अधिक ध्यान से सुनने लगे,
04:16उनके अंतर्मन में गेहन ब्रहमांडिय सत्यों को समझने की तीवर इच्छा जगमगा रही थी.
04:23भगवान विश्णु ने अपना दिव्य हाथ धीरे से उठाया, जैसे वे ब्रहमांड के अध्रिश्य धागों को अपनी उंगलियों से छुकर
04:31एक अत्यंत समवेदनशील विशय को स्पष्ट कर रहे हो.
04:36वेकुंठ का दिव्यवातावर्ण भगवान के शब्दों की गहनता से और भी अधिक गरिमामय प्रतीत हो रहा था, जैसे ब्रहमांड स्वयं
04:44अपने नैतिक आयामों को पुना परिभाशित कर रहा हो.
04:49विश्नु ने कहा, गरुर मित्रद्रोह का पाप विश्वास की पवित्रता को नश्ट कर देता है, जिसमें किसी मित्र, शुबचिंतक या
04:57आश्रित व्यक्ती के विश्वास को छल से तोरना शामिल है.
05:02गरुर का चहरा गंभीरता से और अधिक गहन हो गया, जैसे वे अपने मन में उस विश्वास घात के द्रिश्यों
05:09को अनुभव कर रहे थे, जिसके बारे में भगवान बोल रहे थे.
05:14भगवान विश्वास ने अपनी दिव्यद्रिश्टी को ब्रहमांड के विस्तार पर केंद्रित करते हुए समझाया की कैसे यह क्रिया केवल व्यक्ती
05:22को ही नहीं, बल्कि उस विश्वास की पवित्रता को भी नश्ट करती है.
05:28एक अद्रिश्य चमकीला धागा, जो कभी विश्वास का प्रतीक था, तूटकर बिखर गया, प्रतीकात्मक रूप से उस पवित्र बंधन के
05:37क्षरण को दर्शाता है.
05:42विश्वास घात का यह अद्रिश्य पाप आत्मा के कर्मित लिखा जोखा में एक गहरा, अमिट घाव छोड़ जाता है, जो
05:49पीधियों तक प्रभाव डाल सकता है.
05:53गरुर के पंक अब हलके से जुप गए थे, उनकी आत्मा में उस दुहक और निराशा की प्रतिध्वनी गूज रही
06:00थी, जो इस प्रकार के पाप से उत्पन होती है.
06:05भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि यह विश्वासघात व्यक्ति की आत्मा को कैसे काला कर देता है, उसे अपनी ही
06:12आंतरिक शुद्धता से विलग कर देता है और आध्यात्मिक विकास को बाधित करता है.
06:19विश्णू के शब्दों के साथ वैकुंट की दिव्य उर्जा में एक शनिक सुक्ष्म अंधकार का भंबर उत्पन हुआ, जो आत्मा
06:27को घेरने वाले गहन अंधकार का प्रतीक था.
06:31उन्होंने जोर दिया कि ऐसे अध्रिश कर्मिक परिणाम आत्मा को कैसे गहन अंधकार की ओर धकेलते हैं, जहां सत्य और
06:40प्रकाश की किर्णे मुश्किल से पहुँच पाती हैं.
06:44गरुर ने अपने मन में उन अभागों का चित्र देखा जो इस धिनोंने पाप के कारण गेहन अंधकार की गर्त
06:51में गिर गए थे, उनकी आखें गंभीर चिन्ता से भरी थी.
06:56विश्नु ने समझाया कि मित्रदरोह न केवल विश्वास को तोड़ता है, बलकि व्यक्ति की आध्यात्मिक पवित्रता को भी नश्ट कर
07:04देता है, उसे आंतरिक रूप से खंडित कर देता है.
07:09जैसे ही विश्नु ने अपनी बात समाप्त की, वैकुंठ की सायनब्लू ब्रहमांडिये उर्जा में एक शनिक सुक्ष्म कमपन महसूस हुआ,
07:18जैसे स्वयम ब्रहमांड ऐसे पापों से विचलित हो रहा हो.
07:22उन्होंने चेतावनी दी की ऐसे कर्मों से आत्मा को पुनरजन्म के चक्र में गेहन अंधकार की ओर धकेला जाता है,
07:30जहां उसे अपने कृत्यों का भयावह परिणाम भुगतना पड़ता है.
07:35गरूर के चहरे पर ग्रिड संकल्प की एक नई चमक उभराई, जैसे उन्होंने इन सत्यों को अपने भीतर आत्म साथ
07:43कर लिया था और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने का प्रण ले लिया हो.
07:49विश्णू ने अपनी दिव्यद्रिष्टी को गरूर पर स्थिर करते हुए एक निरनायक बयान दिया कि सच्चा पश्चाताप और कठोर धर्म
07:56पालन ही ऐसे महापापों के गहन कर्मों को धो सकता है.
08:02वैकुंट के शिम्मरिंग गोल्डन लोटस पैलसेस पर अब लंबी एथेरियल चायाय पड़ रही थी, जो दिव्यद्षेत्र में भी नैतिक जटिल्ताओं
08:11की गहराई को दर्शा रही थी.
08:14भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी को ब्रहमांड के सबसे अंधकार्मय कोने की ओर घुमाया, जहां विश्वासघात करने वाले पापियों के
08:23लिए निर्मित असिपत्रवन नामक भयावा नरक्स्थित है.
08:28गरुर ने अत्यंत गंभीर होकर प्रभु के मुख की ओर देखा, जहां सत्य की गरिमा और न्याय की कठोर्ता एक
08:35साथ दिखाई दे रही थी.
08:38इस भयानक वन में, मित्र का विश्वासघात करने वाली और विश्वास तोड़ने वाली आत्माएं नंगे पैर धारदार लोहे के पत्थरों
08:46पर चलने को विवश्च की जाती है.
08:50हवा के एक जोके से उन पेडों से गिरने वाली पत्तिया सामान्य पत्ते नहीं, बलकि वजर जैसी तीवर और नुकीली
08:58तलवारे बनकर पापी आत्माओं के अंगों को काट देती हैं.
09:03जब यमदूत इन विश्वास घातियों को इस वन के बीच से खीचते हैं, तब पूरा जंगल तलवारों के टक्राने जैसी
09:11तीखी ध्वनियों और भयानक चीतकारों से गूंच उठता है.
09:16नारायन ने गरूर को समझाया कि विश्वास घात केवल एक सामाजिक अपराध नहीं, बलकि एक ऐसा महापाप है जो आत्मा
09:24के दैविय प्रकाश को पूरी तरह नश्ट कर देता है.
09:29जैसे ही ये नुकीली पत्तिया इन विश्वास घाती आत्माओं पर गिरती हैं, उनके शरीर के टुक्रे-टुक्रे हो जाते हैं
09:37और वे चीखते हुए धर्ती पर गिर पड़ते हैं.
09:41किन्तु यम्राज के नियम के अनुसार, उनकी पीड़ा यहीं समाप्त नहीं होती, उनके कटे हुए अंगपुनह जुर जाते हैं ताकि
09:49वे इस कष्ट को बार-बार भोग सकें.
09:53असिपत्रवन के पास से ही एक अत्यंत दुरगंधयुक्त और खौलती हुई नदी बहती हैं, जिसमें गिरकर ये कटे हुए पापी
10:01तड़पते हैं.
10:03प्रभु के इस भयानक वर्णन को सुनकर गरूर के विशाल पंख भय से सिहर उठे और उनकी आखों में करुणा
10:10और आश्चर्य का भाव उमड़ आया.
10:14भयानक मुखाकरिती वाले यमदूत उन आत्माओं को निर्गयता से पकड़ते हैं और उन्हें उन तलवारनुमा वरिक्षों पर चड़ने के लिए
10:22विवश करते हैं.
10:25इस वन की हवा भी केवल पीड़ा और पश्चाताप की चीतकारों से भरी हुई है जो विश्वासधात के इस भयंकर
10:32परिणाम को दर्शाती है.
10:35दूर दूर तक फैले इस असिपतरवन में लाखों ऐसी आत्माए अपने किये गए विश्वासधातों का मूले चुका रही हैं, जहां
10:44विश्राम का एक शण भी उपलब्ध नहीं है.
10:48भगवान विश्वासधात किया कि जो व्यक्ति अपने ही मित्र के विश्वास को कुचलता है, उसे इस नरक में सबसे अधिक
10:56पीरा और यातना भुगतनी पड़ती है.
11:00इस संसार में दूसरों के विश्वास की नीन पर अपने स्वार्थ का महल बनाने वाले लोग अन्तह इसी नरक की
11:07भयानक भूमी पर गिरते हैं.
11:10कर्म का यह शाश्वत नियम कभी किसी को नहीं छोडता और विश्वास घात का हर एक शन चित्रगुप्त के बही
11:17खाते में अनकित रहता है.
11:20जब इन पापियों पर वर्षा होती है, तो पानी के स्थान पर लोहे के तीखे बान और सुया बरसती हैं,
11:28जो उनके शरीरों को पूरी तरह चलनी कर देती हैं.
11:32गरुड ने पूछा कि क्या इस घोर पाप से मुक्ती का कोई मार्ग है, तो प्रभु ने सच्चे पश्चाताप और
11:39निश्कपट सेवा को ही एक मात्र उपाय बताया.
11:43जब तक आत्मा अपने किये पर हृदय से लजजित होकर सत्य का मार्ग नहीं अपनाती, तब तक उसे इस चक्रव्यूह
11:51से मुक्ती नहीं मिलती.
11:53इस प्रकार असिपत्रवन का यह भयावध द्रिश्य संसार के हर मनुष्य को विश्वासघात और मित्रद रोह के प्रती सचेत रहने
12:02की गंभीर चेतावनी देता है.
12:05भगवान विश्णु अब गरूर को महापापों में सबसे भयंकर ब्रहम हत्या के बारे में बताते हुए कहते हैं कि ज्ञान
12:12के रक्षक की हत्या संपूर्ण स्रिष्टी के विनाश का मार्ग प्रशस्त करती है.
12:19परमेश्वर के मुख से इस घोर पाप की विभीशिका सुनकर गरूर के नेत्र करुणा और विस्मय से भर जाते हैं
12:26और वे ध्यान पूर्वक प्रभु के वचनों को सुनने लगते हैं.
12:31एक शांत वन में जब एक परम ज्यानी ब्राहमन वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए ध्यान मगन होते हैं, तब
12:38उनके चारों और दिव्य प्रकाश का एक सुरक्षा कवच निर्मित हो जाता है.
12:44तब ही उस पवित्र कुटिया की और एक क्रूर हत्यारा हाथ में चमकती हुई तलवार लिए आगे बढ़ता है, जिसका
12:51मुख कपट और असीम अंधकार से घिरा हुआ है.
12:56जैसे ही वह पापी तलवार से उस निशपाप ज्यानी पर प्रहार करता है, संपूर्ण प्रित्वी कांप उठती है और आकाश
13:04में काले बादलों के बीच खूनी बिजली चमकने लगती है.
13:09श्रीहरी समझाते हैं कि इस जगन्यकृत्य से स्रिष्टी के पाचों तत्वग्भू में जल, अगनी, वायू और आकाश, अत्यंत, क्रोधित और
13:18अशान्थो उठते हैं.
13:21उस ज्ञाने के शरीर से प्रान निकलते ही, उस स्थान पर ब्रहमहत्या नाम का एक भयानक, विशालकाय और काले धुए
13:29से बना दैत्य प्रकट होता है, जो हत्यारे के पीछे लग जाता है.
13:35गरुर भयभीत स्वर में पूचते हैं कि हे दयासागर, इस ब्रहमहत्या के पाप की छाया इतनी विनाशकारी क्यों होती है,
13:43कि यह पूरी स्रिष्टी को जग जोर देती है.
13:47भगवान विश्णु बताते हैं कि एक ब्रहमन केवल एक मनुष्य नहीं, बलकि साक्षात, वेदों, ज्यान और धर्म की जीवंत प्रतिमूर्ती
13:56होता है, जिसकी हत्या धर्म की नीम को हिला देती है.
14:01जैसे ही यह घोर पाप घटित होता है, उस हत्यारे के पूर्वच पित्रि लोक में हाहाकार मचाते हुए गहरे अंधकार
14:09के कुए में गिरने लगते हैं, क्योंकि उनके संचित पुन्य नश्ट हो जाते हैं.
14:15उस पापी की आत्मा को तुरंथ ही अद्रिश्य, भयानक काली जंजीरों से बांध दिया जाता है, जो काल की कठोर
14:23नीती की तरह उसके अस्तित्व को जकड लेती हैं.
14:27स्रिष्टी का संतुलन बिगड़ने के कारण, धर्मराज यमदेव की धर्मसभा में न्याय का विशाल कांटा भारी असंतुलन के साथ नीचे
14:36जुक जाता है.
14:38मरंशील संसार में वह हत्यारा पापी अपनी सुधबुध खो बैठता है, और उसे दिनरात उस मृत ब्राहमन की भयानक चीखें
14:46सुनाई देने लगती हैं, जो उसे पागलपन की ओर ले जाती हैं.
14:52गरुर अत्यंत दुखी होकर पूचते हैं कि प्रभुक क्या इस अभागे प्राणी के लिए यमराज के भयानक दंड से बचने
14:59का कोई भी उपाई शेश नहीं बचता.
15:03भगवान विश्णू बताते हैं कि मृत्यू के पश्चात यमराज के क्रूर दूत उस पापी की जीवात्मा को जलते हुए अंगारों
15:11और नुकीले कांटों से भरे दुरगम मार्ग से घसीटते हुए ले जाते हैं.
15:17जब ऐसे पापी का पतन होता है, तब सम्रिधी की देवी लक्षमी भी उसके ग्रेह और कुल का त्याग कर
15:24देती हैं, जिससे उसका पूरा वंश दरिद्रता और विनाश के गर्त में डूब जाता है.
15:30यहां तक की गंगा जैसी परम पावन नदिया भी ऐसे महापापी के स्पर्ष मात्र से पीछे हट जाती हैं, क्योंकि
15:38उसके कर्मों का भार गंगाजल की पवित्रता को भी चुनौती देता है.
15:44भगवान विश्नु फिर समझाते हैं कि केवल अत्यंत कठिन तपस्या, प्रायश्चित और निश्काम लोकसेवाही उस पाप की तीवरता को थोड़ा
15:52कम कर सकती है, परंतु दाग पूरी तरह नहीं मिटता.
15:57प्रभु के इस परं सत्य को जानकर गरुड अत्यंत आदर पूर्वक उनके चर्णों में शीश नवाते हैं और ज्ञान की
16:04रक्षा के महत्व को पूरी तरह स्वीकार करते हैं.
16:09इस प्रकार ब्रह महत्या के इस महा भयानक अध्याय को समाप्थ करते हुए, स्रिष्टी के पालनहार गरुड को अगले महापाप
16:17व्यभिचार और विश्वास घात के भयानक परिणामों की ओर ले जाते हैं.
16:23भगवान विश्णु गरुड को कालसूत्र नरक के उस भयावध रिश्य की ओर ले जाते हैं, जहां तामबे की जलती हुई
16:30भूमी और धहकती हुई लौचारों और फैली हुई है.
16:35इस भयानक नरक की अनन्त ज्वालाओं को देखकर गरुड के हृदय में अत्यंत करुणा और विस्मय के भाव जागरत हो
16:42उठते हैं.
16:45धर्मराज के करूर दूट उन आत्माओं को घसीटते हुए लाते हैं, जिन्होंने प्रिथवी पर पवित्र रिशियों और ज्यानी ब्राहमनों की
16:53निर्मम हत्या की थी.
16:55जल्ती हुई तामबे की धर्ती पर कदम रखते ही पापियों के पैर पिघलने लगते हैं, और उनकी चीखें इस नरक
17:03के सन्नाटे को चीर देती हैं.
17:06काल सूत्र के ठीक समीप ही तामिस्र नरक का वह भयानक अंधकार में गड़्धा दिखाई देता है, जहां खौलते हुए
17:14तेल के विशाल कड़ा धधक रहे हैं.
17:18शांत और गंभीर वानी में प्रभु समझाते हैं कि प्रकृती का न्याय अटल है और ब्रह महत्या जैसा महापाप कभी
17:26बिना दंड के नहीं छूट सकता.
17:29यम्दूत उन्हाहाकार करते हुए पापियों को दहकते हुए लोहे के खंभों से बांध देते हैं, जिनकी नुकीली कीलें उनके शरीरों
17:37को भेद देती हैं.
17:40यहां समय का चक्र अत्यंत धीमा हो जाता है, जिससे हर एक क्षन पापियों के लिए एक युग के समान
17:47पीडादायक प्रतीत होता है.
17:50तामिस्र नरक के मध्य में धधक्ती भट्टियों के उपर लटके लोहे के पिंजरों में बंद आत्माएं नीचे उबलते तेल की
17:58भाप से जुलस रही हैं.
18:01गरुर अत्यंत व्याकुल होकर पूछते हैं कि क्या इन अभागे पापियों को इस दारोन यातना से कभी मुक्ती प्राप्थ हो
18:08सकती है.
18:11यम्दूत बिना किसी दया के एक महा पापी को उठा कर खौलते हुए काले तेल के कड़ाह में फेंक देते
18:17हैं, जिससे भयानक धुआ उठता है.
18:21इस भीशन यातना के दौरान पापी के पूर्वजन्मों के बचे हुए पुन्य भी नश्ट हो जाते हैं और उसकी आत्मा
18:29केवल पीडा में लीन रहती है.
18:32काल सूत्र के दूसरे छोर पर असिपत्रवन की भाती तलवार जैसे नुकीले पत्तों वाले व्रिक्ष खड़े हैं, जो पापियों के
18:40शरीरों को छिन्न भिन्न कर देते हैं.
18:44भगवान विश्नु बताते हैं कि जो लोग धर्म का मार्ग छोड़कर अधर्म को चुनते हैं, उन्हें इस अन्थीन चक्रव्यों में
18:51भटकना ही पड़ता है.
18:54पीडा से भागने का प्रयास करते ही आकाश से तप्त लोहे की सुयों और तीरों की वर्षा होने लगती है,
19:01जो पापियों को भूमी पर गिरा देती है.
19:05यमराज का अद्रिश्य पाश हर क्षण इन आत्माओं को जक्रे रहता है, जिससे वे चाहकर भी इस नरक की सीमा
19:13से बाहर नहीं जा सकती.
19:15काल सूत्र की भयानक अगनी और तामिसर का घना अंधकार मिलकर एक ऐसी यातना स्थली का निर्मान करते हैं, जिसकी
19:23कलपना से ही थर्थरा हट होती है.
19:27ज्यान और न्याय के इस परम रहस्य को जानकर गरुड अत्यन्त विनीत भाव से प्रभु के चर्णों में अपना मस्तक
19:34जुकाते हैं.
19:36उन दहकते हुए कुंडों के बीच पापी अपने कृत्यों पर रोते हैं और अनंत काल तक अपने कर्मों का पश्चाताप
19:44करते हैं.
19:57भगवान विश्नु गरुड की ओर देखते हुए वानी और ज्यान के गूड सत्यों के पश्चात स्रिष्टी के सर्वाधिक पवित्र प्रतीक
20:05गोहत्या के घोर कर्मिक पाप का रहस्य प्रकट करते हैं.
20:10प्रभु बताते हैं कि जिस गाय को हिंदू धर्म में पूज माता माना गया है, उसके पवित्र शरीर में तैटीस
20:17कोटी देवी देवताओं का वास होता है.
20:21गाय केवल एक पशु नहीं, बलकि साक्षात धर्ती माता का रूप है, जो बिना किसी स्वार्थ के संपूर्ण मानव जाती
20:29को अपने अमरित तुल्य दूज से पोशन प्रदान करती है.
20:34इसलिए गोमाता का वध करना केवल एक जीव की हत्या नहीं, बलकि संपूर्ण स्रिष्टी के पोशन, पवित्रता और धर्म के
20:42मूल आधार का घोर अपमान है.
20:46श्री हरी गंभीर स्वर में चेतावनी देते हैं कि जो अधर्मी मनुश्य स्वार्थ, लोग या जिहवा के स्वाद के लिए
20:53गोमाता की हत्या करता है, वह सबसे भयानक नरक का भाधी बनता है.
21:00परम प्रभु की यह बात सुनकर पक्षी राज गरुड का हरिदय काम्प उठता है और वे अत्यंत दुख व्यक्त करते
21:07हुए इस महापाप के कर्मिक दंड को जानने की प्रार्थना करते हैं.
21:12भगवान विश्णू प्रकट करते हैं कि जब कोई पापी किसी निर्पराध गाय पर प्रहार करता है, तो उसके कर्मिक शरीर
21:20पर उसी क्षण अंगिनत भयानक काले पाप चिपक जाते हैं.
21:26गोहत्या होते ही संपून प्रकृती क्रुद्ध हो उठती है, और उस पापी द्वारा पूर्व में अर्जित किया गया सारा पुन्य
21:33और धर्म ततकाल भस्म हो जाता है.
21:37गोहत्यारे की मृत्यू के पश्चात यम्दूत उसे पाश में बांध कर अयहपान नामक भयानक नरक में घसीटते हुए ले जाते
21:45हैं, जहां लोहे के विशाल दहकते खंभे लगे हैं.
21:50विश्णू जी गरूर को बताते हैं कि यमलोक के उस भयभीत कर देने वाले द्वार पर गोहत्यारे की आत्मा अपनी
21:57अन्थीम पीडा से चीतकार कर उठती हैं.
22:01उस नरक कुंड में यमदूत पापी को दहकता हुआ पिघला तामबा पीने पर विवश करते हैं और तप्त लोहे के
22:08भयंकर त्रिशूलों से उसके शरीर को बींधते हैं.
22:13गरुर पुरान के अनुसार मुख गाय के शरीर पर जितने रोम होते हैं उतने ही हजारों वर्षों तक उस पापी
22:20को नरक की अगनी में जलना पड़ता है.
22:24प्रभु आगे कहते हैं कि केवल प्रत्यक्ष हत्यारा ही नहीं, बलकि गाय को कसाई को बेचने वाला, उसका मास पकाने
22:32वाला और उसमें सहायता करने वाला भी समान दंड पाता है.
22:37गरुड हाथ जोड कर पूचते हैं कि है प्रभु क्या इस भयंकर पाप का कोई प्रायश्चित है या इसका दंड
22:44अत्यंत अटल और कठोर है.
22:48श्री हरी स्पष्ट करते हैं कि अंजाने में हुए पाप का कठोर तपश्चर्या और गोसेवा से शोधन संभव है, परंतु
22:56जानबूचकर की गई हत्या का दंड हर हाल में भोगना ही पड़ता है.
23:02धर्म के तराजू पर गोहत्या का भार इतना भारी होता है कि उसके सामने पापी का कोई भी साधारन पुन्य
23:09कर्म उसे नरक से नहीं बचा सकता.
23:12इसके विपरीत नारायन उस महान मनुष्य के पुनियों का बखान करते हैं जो गायों की रक्षा करता है, उन्हें भोजन
23:20देता है और प्रेम से उनकी सेवा करता है.
23:25यह सुनकर गरूर का हरिदय प्रसन्नता से भर जाता है कि गोभक्तों को मोक्ष और वैकुंठ में विश्नुलोग की परम
23:32प्राप्ती होती है.
23:35जो व्यक्ती एक असाय गाय को जल पिलाता है या उसे कसाई के हाथों से बचाता है, उसे एक सौ
23:42अश्वमेध यग्य के समान महापुन्य प्राप्त होता है.
23:47इस प्रकार गोहत्या के घोर पाप और गोसेवा के परम पुन्य का यह शाश्वत विधान स्रिष्टी के संतुलन और धर्म
23:54को अनंतकाल तक स्थापित रखता है.
23:58परंतु हे गरुर, यदि कोई अभागा जीव इस शाश्वत विधान का उलंधन कर गोमाता का वध करता है, तो उसके
24:06लिए अनंतकाल तक भय और पीडा का मार्ग ही प्रशस्थ होता है.
24:11गरुर ने थर्थराते स्वर में पूछा, हे प्रभु, ऐसा कौन सा नरक है, जो गोहत त्यारे की आत्मा को इतनी
24:19भीशन यातना देता है, जिसका वर्णन सुनकर ही हृदय काप उठता है.
24:25भगवान विश्णों ने गंभीर मुद्रा में उत्तर दिया, हे पक्षी राज, गोहत त्यारे और गोमास भक्षन करने वाले जीव सीधे
24:33रौरव नामक भयानक नरक में गिराए जाते हैं.
24:37यहां नरक अगनी की ज्वालाओं से धधकता रहता है, जहां लोहे के शूलों से भरी विशाल खाया पापियों का इंतजार
24:45करती हैं.
24:47यहां उस पापी आत्मा को पहले लोहे के गर्म कुंडों में उबाला जाता है, जहां उसकी त्वचा शरीर से अलग
24:54होने तक असहनिय पीडा भोगती है.
24:58गरुर की आखों में भय व्याप्त हो गया, क्योंकि उन्होंने उन आत्माओं की चीखें अपने अंतर्मन में सुनी और उनके
25:06कश्टों का अनुमान लगाया.
25:09फिर्क दारोन शरीर को नुकीले शूलों से भेदा जाता है, जिससे रक्त की धाराय बहने लगती हैं और प्रत्येक छेज
25:17से आग की लप्टे निकलती हैं.
25:20आत्माएं अगने कुंडों में बार-बार उबाली जाती हैं और अंगिनत बार नुकीले शूलों से छेदी जाती हैं, उनकी पीडा
25:28का कोई अंत नहीं होता.
25:31इसके बाद आता है महा रौरव जहां यातनाय और भी भयाव हो जाती हैं, जो रौरव की तुलना में सौ
25:38गुना अधिक दारुन हैं.
25:41यहां पापियों को भूखे रौरु नामक मांस भक्षी राक्षसों के सामने डाल दिया जाता है, जो उनके जीवित शरीर से
25:48मास नोच-नोच कर खाते हैं.
25:51यह रौरु राक्षस ऐसे दिखते हैं, जैसे भेडियों और सापों का मिश्रण हो, जिनकी भयानक दाढ़े और विशैले फन-पीडित
26:00आत्माओं को लगातार कश्ट पहुँचाते हैं.
26:04जब शरीर से मास पूरी तरह समाप्थ हो जाता है, तो आत्मा को पुनह शरीर प्राप्थ होता है, और यह
26:11अंथीम चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक पाप का निवारण न हो जाएं.
26:17इस भीशन नरक की आत्नाओं को भोगने के बाद, गोहत्यारे की आत्मा निम्नतम योनियों में, जैसे कीडे, सरीस्रिप या सबसे
26:26तुछ जानवरों के रूप में पुनरजन्म लेती हैं.
26:30गरुर ने सिर जुका लिया, उनके मन में उन गोहत्यारों के प्रती करुणा से अधिक न्याय की भावना उमड रही
26:37थी, जिन्होंने ऐसी भयानक नियती को आमंत्रित किया था.
26:42भगवान विश्नु ने आगे बताया कि यह पुनरजन्म का चक्रत तब तक जारी रहता है, जब तक कि उन्हें किये
26:49गए पापों का पूर्ण फल न मिल जाएं, जो कई कलपों तक चल सकता है.
26:55आथ गोहत्या का पाप इतना गंभीर है कि यह आत्मा को स्रिष्टी के निम्नतम स्तरों पर धकेल देता है, जहां
27:03प्रकाश और आशा का कोई चिन्ह नहीं होता.
27:06इस प्रकार गोमाता की रक्षा और सेवा करना केवल एक पुनेकार्य नहीं, बल्कि समस्त जीवों के प्रती प्रेम और दया
27:15का सर्वोच प्रक्टी करण है.
27:18गरुर ने अपनी निष्ठा और श्रद्धा के साथ भगवान विश्णु के चर्णों में शीश नवाया, इस ज्ञान को अपने हृदय
27:26में सदा के लिए धारन कर लिया.
27:29यह भयानक वर्णन सुन कर भी गरुर का मन धर्म के प्रती और भी द्रिड हो गया, वे इस ज्ञान
27:35को संसार में फैलाने का संकल्प लेने लगे.
27:39इस प्रकार गोहत्यारे का दारोन अंत और रौरव के अगनी कुंडों का यह विस्त्रित वर्णन विश्णु ने गरुर को प्रदान
27:46किया, ताकि सभी जीव धर्म के मार्ग पर चले.
27:50इसके पश्चात, भगवान श्रीहरी ने अपनी परम पावन वानी में परस्त्रिग्मन अर्थात व्यभिचार के उस अग्रिश्य विश्का वर्णन आरंभ किया,
28:00जो मनुष्य की आत्मा को भीतर ही भीतर खोखला कर देता है.
28:05विश्णु जी ने गरूर को समझाया कि परस्त्रिग्मन केवल एक शारिरिक मर्यादा का उलंगन नहीं है. अपितु यह दो परिवारों
28:13के विश्वास, सम्मान और आध्यात्मिक पवितरता का क्रूर हनन है.
28:19इस घोर-पाप के कारण उत्पन होने वाला विश्वास घात जब समाज में फैलता है, तब वह पवितर वैवाहिक संबंधों
28:27की नीम को काच की तरह चूर-चूर कर देता है.
28:32वासना के क्षणेक सुख को अमूर्थ सुख मान कर जो अज्ञानी जीव इस मार्ग पर चलते हैं, वे अंता स्वयं
28:39को एक अद्रिश्य विशैले दलदल में फंसा हुआ पाते हैं.
28:45वैकुंट के उस दिव्य और भव्य प्रांगण में चारों और बहती हुई शीतल समीर भी जैसे इस गंभीर सत्य को
28:52सुनकर थमसी गई और सृष्टी के नियम गूंजने लगे.
28:56गरुर ने अत्यंत व्याकुल होकर पूछा कि है प्रभुक माया के वश में होकर मनुष्य इस आत्मधाती पाप की ओर
29:03कैसे खिंचा चला जाता है.
29:07भगवान ने बताया कि जब मनुष्य अपनी इंद्रियों का दास बन जाता है, तब उसकी विवेक बुद्धी नश्ट हो जाती
29:14है और वहक्षनिक त्रिप्ती के लिए अपने संपून पुनियों की आहुती दे देता है.
29:20यह पाप आत्मा पर एक ऐसा अद्रिश्य और अमिट काला धब्बा लगा देता है, जिसे जन्मजन्मांतर के प्रायश्चित और भयानक
29:29कष्टों के बिना मिटाया नहीं जा सकता.
29:33जैसे जैसे इस महापाप के कर्मफल का रहस्य प्रकट हो रहा था, वैकुंठ का सारा बातावर्ण धर्म की सर्वोच मर्यादा
29:41के तेज से दीप्तिमान हो उठा.
29:44नारायन ने अपने कमल नैनों से गरूड की ओर देखा और कहा कि जो व्यक्ति किसी अन्यकी धर्म पत्नी का
29:51सतीत्व भंग करता है, वह सीधे यमलोक के सबसे भयानक दंड का अधिकारी बनता है.
29:58यमिय विधान के अनुसार ऐसे पापियों को दहकते हुए तप्त लोहे की नारी आकृतियों का आलिंगन करने के लिए विवश
30:06किया जाता है, जो उनके कपट का जीवन्त प्रतिशोध होती है.
30:11वासना की वह अगनी, जिसने कभी उनकी बुद्धी को अंधा किया था, अब उन्हें यमलोक के उन भयानक कक्षों में
30:19वास्तविक तप्त लप्टों बनकर जलाती है.
30:23वैकुंट के शान्थ सरोवर में उठने वाली तरंगे भी जैसे इस परम सत्य को स्विकार करते हुए भगवान के चर्णों
30:31की वंदना कर रही थी.
30:33गरुर ने पूछा कि हे कमल्नियन क्या इस महापाप के प्रभाव से समाज और आने वाली पीढियां भी दूशित होती
30:40हैं.
30:42जगन्नाथ ने स्पष्ट किया कि जब समाज में व्यभिचार बढ़ता है तब वर्ण संकर संताने उत्पन होती हैं जिससे कुल
30:51की मर्यादा और पित्रों की शान्ती सदा के लिए नश्ट हो जाती है.
30:56पित्रों को मिलने वाला तरपन और पिंडदान भी निश्फल हो जाता है, जिससे वे स्वर्ग से गिरकर पुनह कष्टों के
31:03चक्रवियों में फंस जाते हैं.
31:07भगवान विश्णों की इस गंभीर वानी से संपूर्ण स्रिष्टी में धर्म का वास्तविक महत्व और वैवाहिक पवित्रता का मुल्य पुनह
31:15स्थापित हो रहा था.
31:17गरुर ने हाथ जोड कर कहा कि हे प्रभु, आपका यह ज्यान संसार के भटके हुए मनुष्यों को वास्ना के
31:24अंधकार से निकाल कर धर्म के प्रकाश की ओर ले जाएगा.
31:29नारायन ने अंत में कहा कि जो मनुष्य अपनी इंद्रियों को वश में रखकर केवल अपनी धर्म पत्नी में निश्था
31:36रखता है, वह इस संसार में ही वैकुंठ के सुख का भागी बनता है.
31:41इस प्रकार परस्त्रीगमन के इस भयानक पाप और उसके निवारन का ज्यान प्राप्त कर गरूर का मन धर्म और पवित्रता
31:49के प्रती पूर्णत है समर्पित हो गया.
31:53भगवान विश्णू ने गरूर को संबोधित करते हुए अब तप्तशूल नामक उस भयानक नरक्की और ध्यान केंद्रित करने को कहा
32:00जहां व्यभिचारी पुरुषों और महिलाओं को लाया जाता है.
32:05इस द्रिश को देखते हुए गरूर ने अत्यंत व्याकुल होकर पूछा की है जगनात इस भयानक नरक्की अगनी और जलते
32:14हुए त्रिशूलों के निर्मान का मूल कारण क्या है?
32:17तब नारायन ने स्पष्ट किया कि जो मनुष्य इस मृत्यो लोक में पराई स्त्रियों पर कुद्रिश्टी डालते हैं और मर्यादाओं
32:25का उलंधन करते हैं, उन्हें यमदूत बलपूर्वक इस दहकते हुए नरक में धकेल देते हैं.
32:32इस तप्तशूल नरक में पहुँचते ही पापी आत्माओं को दहकती हुई लोहे की शलाकाओं और तीखे शूलों से बांध दिया
32:40जाता है, जिससे उनकी देह से निरंतर पीड़ा की चीखें गूजती हैं.
32:46तप्तशूल के ठीक बगल में सूची मुख नामक नरक फैला हुआ है, जहां की भूमी अत्यंत नुकीली और लोहे जैसी
32:54कठोर सुईयों से आच्छा दित है.
32:57गरुर ने कापते हुए स्वर में भगवान से प्रार्थनाकी की वे इस सूची मुख नरक की यातनाओं का और अधिक
33:05विवर्ण प्रकट करें ताकि मानव जाती सचेत हो सके.
33:09श्री हरी ने बताया कि जो मनुष्य अपनी वासना की त्रिप्ती के लिए दूसरों के विश्वास और पवित्र वैवाहिक संबंधों
33:17को खंडित करते हैं, उनके शरीरों को इन तीक्षन सुईयों से बार-बार भेदा जाता है.
33:24सुईयों के प्रत्येक प्रहार के साथ उन जीवात माओं के सुक्षम शरीर से तप्तरक्त के समान अश्रु बहते हैं, जो
33:31उनके द्वारा किये गए विश्वास घात के आसुओं का कर्मात्मक न्याय है.
33:37इस भयावः क्षेत्र में चारों और विशालकाय लोहे के विरिक्ष भी खड़े हैं, जिनकी शाखाओं पर जलते हुए शूल और
33:45शलाकाय पत्तों की तरह लटकी हुई है.
33:49भगवान विश्णु ने शांट किन्तु अत्यंत गंभीर वानी में कहा कि वासनाक्षनिक होती है, परन्तु उसके कारण उत्पन होने वाली
33:57कर्मागनी कई जन्मों तक आत्मा को भस्म करती रहती है.
34:02इन नर्कों में यमदूत पापी पुरुषों को लोहे की दहकती हुई स्त्री प्रतिमाओं का आलिंगन करने के लिए विवश करते
34:10हैं, जिससे उनकी त्वचा और अस्थियां पल भर में पिघलने लगती हैं.
34:16इसी प्रकार व्यभिचारिनी स्त्रीयों को भी दहकते हुए लोपुरुषों का आलिंगन करना पड़ता है, जो इस बात का प्रतीक है
34:24कि वासना का अंत केवल विनाशकारी दाह में होता है.
34:29इसके पश्चात वे आत्माएं अर्धमूर्चित अवस्था में उस कटीली भूमी पर गिरती हैं, जहां सुक्ष्म जीवों के रूप में उनके
34:37अंगों को लगातार कुतर कर नश्ट किया जाता है.
34:42गरुर्ण ने अत्यंत व्याकुल होकर पूछा कि है प्रभु क्या इन भीशन यातनाओं को भोगने के बाद भी उन आत्माओं
34:49का पाप पूर्णत ह समाप्थ हो जाता है.
34:53पुरुशोत्तम ने उत्तर दिया कि नरक भोगने के बाद भी वे जीव इस प्रिथवी पर ऐसे निक्रिष्ट योनियों में जन्म
35:00लेते हैं, जहां वे निरंतर काम पिपासा और शारिरिक व्याधियों से पीडित रहते हैं.
35:07वे प्रिथवी पर श्वान, सूकर या कीडों के रूप में पुनर्जन्म पाते हैं और अपनी वासनाओं की अत्रिप्ती के कारण
35:15तडपते हुए अलपायू में ही नश्ट हो जाते हैं.
35:19इस पूरे तप्तशूल और सूची मुख नरक का वातावर्ण हमेशा असहनिय चीतकारों, जलती हुई तवचा की दुरगंध और करमागनी की
35:28धधक से भरा रहता है.
35:30अंत में नारायन ने गरूर को आश्वस्त किया कि जो मनुष्य इस परम ज्ञान को सुनकर अपने आचर्ण को सुधार
35:38लेते हैं, वे इन भयानक नरकों के द्वारों से सदैव के लिए मुक्थ हो जाते हैं.
35:44गरूर ने भगवान के चर्णों में सिर जुका कर इस सत्य को स्वीकार किया कि इंद्रिय सन्यम और धर्म प्रायनता
35:52ही मानव जीवन को इस घोर नरक से बचाने का एक मात्र साधन है.
35:57इस प्रकार परस्त्रीगमन और वासना के महापापों का यह गंभीर अध्याय पूर्ण हुआ, जिसने आत्मा के पतन और उसके उद्धार
36:06के शाश्वत नियमों को संसार के समक्ष प्रकट किया.
36:11नारायन के परमधाम वैकुंठ में दिव्य चेतना की रश्मिया चारों और फैल रही थी, जहां भगवान विष्णू और पक्षीराज गरूर
36:19के बीच महापापों के अंत की इस गंभीर वार्ता का अंतिम चरण आरंभ हुआ.
36:25अपने परमशांत स्वरूप में विराजमान भगवान श्रीहरी ने गरूर की और अपनी करुणामई द्रिश्टी डाली, जो उनके मुख से निकलने
36:34वाले ज्यान के प्रत्येक शब्द को अत्यंत विनीत भाव से ग्रहें कर रहे थे.
36:40भगवान विश्णु ने अपने दाहिने हस्त को अभय मुद्रा में उठाते हुए गरूर को संबोधित किया कि इन महापापों के
36:47अंतिन प्रभाव को समझना आत्मा की मुक्ती के लिए अत्यंत आवश्चक है.
36:54उन्होंने समझाया की कैसे ये घोर पाप आत्मा के चारों और अज्ञान और वासना की एक ऐसी सघन परत चड़ा
37:01देते हैं, जो उसे परमात्मा के शाश्वत प्रकाश से कोसों दूर कर देती है.
37:08वैकुंठ के उस पावन वातावर्ण में काल चक्र की एक विशाल छाया घूमती दिखाई दी, जो संसार के जीवों के
37:15कर्मों और उनके भयंकर कर्मफलों के निरंतर चलने वाले चक्र को दर्शा रही थी.
37:21भगवान की वानी सुनकर गरूर के नेत्रों में करुना और चिंता के मिश्रित भाव उभराए, क्योंकि वे संसार के अज्यानी
37:29मनुष्यों के इस कष्ट में पतन के प्रती अत्यंत द्रवित हो उठे थे.
37:34नारायन के कमल नैनों से दिव्यज्यान की किरने फूट पड़ी, मानों वे अपनी करुना से संसार के समस्त प्राणियों के
37:42अज्यान रूपी अंधकार को नश्ट कर देना चाहते हूं.
37:46प्रभु ने इस पश्ट किया कि महापापों के बोज से दबी हुई आत्माएं कैसे 84 लाख योनियों के अत्यंत कष्टदायक
37:54चक्रवियों में फंसकर बार-बार जन्म और मृत्यु की पीडा को भोगती हैं.
38:00उस परम पावन धान के स्वर्णिम स्तंभों से गूंजती प्रभु की ध्वनि स्रिष्टी के उस सनातन नियम को स्थापित कर
38:07रही थी, जहां कर्म की गती को टालना किसी भी जीव के लिए असंभव है.
38:14किन्तु तभी भगवान विश्णो के मुखमंडल पर एक अलौकिक मंध हास्य उभरा, और उन्होंने गरूर से कहा कि इस घोर
38:22अंधकार के बाद भी आत्मा के उद्धार का मार्ग पूरी तरह बंद नहीं होता.
38:28उन्होंने अपने हाथ में धारण किये हुए एक प्रकाशमान नील कमल को दिखाया, जो संसार में अंधकार के बीच भी
38:35आशा और शुद्धी के शाश्वत अस्तित्व का प्रतीक था.
38:40प्रभु के इस कथन के साथ ही वैकुंट के आकाश में छाय हलके बादलों को चीरती हुई सूर्यदेव की स्वर्णिन
38:47किरने फूट पड़ी, जो घोर अंधकार में भी आशा की एक दिव्यकिरन का संकेत थी.
38:54वैकुंट के इस पावन परिग्रिश में बहती हुई मंदाकिनी की दिव्यधारा ने उस शुद्धी और प्रायश्चित की बहती गंगा का
39:02स्मरण कराया, जो पापी से पापी आत्मा को भी पवित्र करने की सामर्थ्य रखती है.
39:09गरुर ने अपनी तीक्षन बुद्धी से भगवान की इस दयालुता को समझा और उनके चर्णों के निकट बैठकर उच्सुकतापूर्वक पूछा
39:17की है प्रभुक वे कौन से मार्ग हैं जो इन महापापों से मुक्ती दिला सकते हैं.
39:24भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य उंदली से नीचे की ओर संकेत करते हुए कहा कि मृत्यू लोग के मनुश्यों के
39:31लिए शास्त्रों में विशेश प्रायश्चित और धर्म के विधान निश्चित किये गए हैं.
39:37वैकुंट के वातावर्ण में एक सुक्ष्म यग्यवेदी की पवित्र अगनी की छवी प्रकट हुई जो इस बात का प्रतीक थी
39:45कि पश्चाताप की अगनी में तबकर ही आत्मा अपने पुराने पापों को भस्न कर सकती है.
39:52चारों और फैले दिव्य प्रकाश के बीच भगवान विश्णुने घोशना की की अगले अध्याय में वे गरुर को इन महापापों
40:00के प्रायश्चित और मुक्ती के गुप्त रहस्यों का विस्तार से ज्यान देंगे.
40:05प्रभु की यह घोशना सुनकर गरुर का हृदय असीम संतोष और श्रद्धा से भर गया और उन्होंने पुनह भगवान के
40:13परम कल्यानकारी चर्णों में अपना मस्तक जुका दिया.
40:17भगवान के श्रीचर्णों से निकलती हुई दिव्याभा ने गरुर को स्पर्श किया, जिससे उनके समस्त संशय शान्थ हो गए और
40:25वे अगले पावन संदेश को ग्रहन करने के लिए मानसिक रूप से तयार हो गए.
40:31इस प्रकार महापापों का यह गंभीर प्रसंद एक नई आशा और कल्यानकारी मार्ग की प्रतीक्षा के साथ समाप्थ हुआ, जिसने
40:40संपून स्रिष्टी को धर्म और प्रायश्चित का शाश्वत संदेश दिया.