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एपिसोड 52 में, भगवान विष्णु गरुड़ को निर्गुण ब्रह्म के रहस्य से आगे ले जाते हुए, माया के वास्तविक स्वरूप और जीवन्मुक्त के अद्भुत दर्शन का अनावरण करते हैं। जानें कैसे यह संसार एक भव्य भ्रम है, और कैसे एक आत्मज्ञानी जीवित रहते हुए भी जन्म-मृत्यु के चक्र से परे हो जाता है। त्रिगुणों से मुक्ति, कर्मों के बंधन से आजादी, और परमानंद की प्राप्ति का मार्ग - क्या है वह अंतिम सत्य जो 'मैं' और 'ब्रह्म' के भेद को मिटा देता है? इस गहन दार्शनिक यात्रा में, खोजें वैराग्य और अभ्यास का महत्व, और समझें महाप्रलय में भी आत्मा का अविनाशी स्वरूप। #गरुड़पुराण #GarudPurana #निर्गुणब्रह्म #Advaita #माया #Moksha #Jivanmukta #आत्मज्ञान #Vedanta #हिन्दूधर्म #SpiritualJourney
Transcript
00:00भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यवानी को पुना मुखरित करते हुए, परम सत्य के उस सुक्ष्म आधार को दोहराया जो समस्त
00:07गुनों और रूपों से परे हैं।
00:11गरुर अपने विशालकाय पंखों को शिथिल किये, एका ग्रचित होकर उस गेहन ज्यान को आत्म साथ करने का प्रयास कर
00:18रहे थे, जो उनके स्वामी ने उन्हें प्रदान किया था।
00:23भगवान विश्नु ने अपने हाथ की एक सौमय मुद्रा से निर्गुन ब्रह्मा के उस अनादी और अनंत स्वरूप की ओर
00:31इंगित किया जो समस्त स्रिष्टी का मूल आधार है।
00:35उस क्षण वातावर्ण में एक दिव्य उर्जा तरंगित हुई, जो उस निराकार और अनंत सत्ता का प्रतीक थी जिसका वर्णन
00:43भगवान कर रहे थे।
00:46उन्होंने समझाया कि यह सर्वोच वास्तविक्ता सभी गुनों, रूपरंगों और मायावी भेदों से परे हैं, जो केवल शुद्ध चेतना के
00:54रूप में विद्यमान है।
01:17इस निराकार सत्य को दर्शाने के लिए सुक्ष्म उर्जा बिंदु पूरे ब्रहमांड में फैल गए, जो अस्तित्व की प्रत्येक इकाई
01:25में उसकी उपस्थिती का संकेत दे रहे थे।
01:46जो उनकी आध्यात्मिक यात्रा को एक नई दिशा प्रदान कर रहे थे।
01:52भगवान विश्नु ने अपनी उंगली उठा कर अस्तित्व के उस गैरत वैत्वादी स्वरूप की ओर संकेत किया जहाँ जीव और
02:00ब्रहमा एक हैं।
02:02स्वर्ण और नीली ब्रहमांडिय उर्जाएं धीरे-धीरे एक दूसरे में विलीन होने लगी, जो एकता और अभेद की उस परमस्थिती
02:11को दर्शा रही थी।
02:13उन्होंने गरूर को याद दिलाया कि यह ब्रहमा ही समस्थ स्रिष्टी का अविनाशी आधार है, जो न कभी जन्म लेता
02:21है और न कभी मरता है।
02:24गरूर की आखों में एक शनिक चमक आई, जैसे उन्होंने इस गेहन सत्य की एक जलक देखी हो, जो उनके
02:32भीतर प्रकाश की किरन जगा रही थी।
02:35भगवान विश्णु ने अपनी शांत और स्थिर द्रिष्टी से गरूर की ओर देखा, मानों उन्हें इस ज्ञान को हृदय में
02:42धारन करने का आहवान कर रहे हूं।
02:45अविनाशी ब्रह्मा का प्रतीक, एक प्राचीन और मौलिक ब्रहमांडिय संरचना, नीली आभा के साथ प्रिष्ठ भूमी में चमक उठी।
02:54उन्होंने द्रिर्ता से कहा कि यह अप्रिवर्तनिय सत्य ही सभी परिवर्तनों के बीच एक मात्रस्थिर वास्तविक्ता है।
03:15विष्णू ने अपनी दोनों हथेलिया जोड कर इस परम ज्यान की प्राप्ती और अंतरात्मा में उसके एकाकार होने के लिए
03:22आहवान किया।
03:24संपूल्ण वैकुंठ लोक एक गहरी स्थिर प्रकाश से नहा गया, जो हर कण में व्याप्त उस सर्वव्यापी ब्रह्मा का मौन
03:32साक्षी बन गया।
03:34भगवान विश्णू ने अपनी मुद्रा को और भी अधिक गंभीर बनाते हुए उस परम ज्यान के अगले सोपान का अनावरण
03:42किया, जो माया के वास्तविक स्वरूप को उजागर करने वाला था।
03:47विश्णू ने कहा, हे गरुड, यह माया कोई ब्रह्मा से भिन शक्ती नहीं है, बलकि यह तो स्वयन ब्रह्मा की
03:55ही अद्वितिय, अद्भुत और रचनात्मक सामर्थ्य है, जिसकी लीला से यह समस्त ब्रह्मांड प्रकट होता है।
04:03उनके शब्दों के साथ ही, वैकुंट के वातावर्ण में एक सुक्ष्म उर्जा का कमपन हुआ, जैसे स्वयन अद्रिश्य माया का
04:11प्रथम स्पंदन ब्रह्मांड के गर्भ में फूट रहा हो।
04:15यह माया ही है, जो निर्गुन ब्रह्मा को सगुन रूप में प्रकट करती है, जो एकत्व को द्वैत और अनेक्ता
04:22के अनंत रूपों में विस्तार देती है, जिससे यह स्रिष्टी अपनी विविधता में जिल मिलाती है।
04:29गरुर ने ध्यान से सुना, उनकी आखों में अब स्रिष्टी के रहस्य को समझने की एक नई चमक उभर आई
04:36थी, जैसे कोई अंधकार में गुफा में प्रकाश की पहली किरन देख रहा हो।
04:42विष्णू ने समझाया, यह माया ही है, जो हमें जीव और ब्रह्मा के बीच भेद का अनुभव कराती है, जो
04:49हमें लगता है कि हम एक दूसरे से अलग हैं, जबकि वास्तविक्ता में हम एक ही विराट सत्ता के अंश
04:56हैं।
04:58उनके हाथों से एक अद्रिश्य उर्जा निकली, जिसने क्षण भर के लिए गरुड के चारों और एक पारदर्शी आवर्ण निर्मित
05:06किया, जो द्वैत की अनुभूती का प्रतिकात्मक चितरन था।
05:10यह आवर्ण ही समस्त भमों और भिनताव का मूल है, जो हमें बाहरी संसार की चमकदमक में उलजाकर अंतरनिहित एकता
05:19से विमुख करता है।
05:22परंतु यह विभाजन केवल एक द्रिष्टिगत खेल है, क्योंकि माया ब्रहमा से अलग नहीं है, वह ब्रहमा की ही वह
05:30शक्ती है, जो स्वयन को अनेक रूपों में प्रकाशित करती है।
05:35विष्णु ने अपनी द्रिष्टी अनन्त वैकुंठ पर घुमाई, जहां हर कमल, हर जलधारा, हर चमकताकन उसी एक ब्रहमा की लीला
05:44का विस्तार प्रतीत हो रहा था।
05:46यह माया ही है, जो हमें जन्म, मृत्यु, सुख और दुख के चक्र में बांधे रखती है, जब तक कि
05:53हम इसकी वास्तविक प्रकृती को पहचान न लें।
05:57परंतु जो इसकी वास्तविक्ता को भेद लेता है, वह जीव स्वयं को इस अनंत लीला का अभिन्न अंग पाता है,
06:05न की इसका गुलांग।
06:07गरुर ने सिर जुकाया, उनके हृदय में ज्ञान का एक नया द्वार खुल रहा था, जिससे वे अब माया के
06:14भ्रम को पार करके अंतरनिहित सत्य को देख पा रहे थे।
06:19विश्नु ने कहा, यह माया हमारी चेतना को सीमित करती है, जैसे एक छोटा सा परदा पूरे विशाल आकाश को
06:27ढख लेता है, जबकि आकाश अपने स्थान पर अटर रहता है।
06:32उनके शब्दों के प्रभाव से, वैकुंट के उपर आकाश में एक क्षण के लिए एक सुक्ष्म पारदर्शी परदा उभरा और
06:40फिर विलीन हो गया, जो अज्ञानता के आवर्ण का प्रतीक था।
06:46वास्तविक ज्यान तभी होता है, जब यह परदा उठ जाता है, और जीव अपनी वास्तविक अनंत पहचान को ब्रह्मा के
06:54साथ एक रूप देखता है।
06:57यही वह सर्वोच अवस्था है, जहां मैं का भाव मिट जाता है, और केवल हम जीव और ब्रह्मा का शाश्वत
07:04एकत्व अनुभव शेश रहता है।
07:08गरुर ने अपनी आखें खोली, उनके भीतर अब कोई संदेह नहीं था, केवल एक गहरी शांती और सर्वव्यापी एकता का
07:16बोध व्याप्त था।
07:18भगवान विश्णू ने एक दिव्य मुस्कान बिखेरी, जैसे उन्होंने अपने परम भक्त को स्रिष्टी के सबसे गूढ रहस्य से अवगत
07:27कराकर उसे मुक्ती के अंतिम चरण तक पहुँचा दिया हो।
07:32संपूर्ण वैकुंठ लोक अब एक ऐसे प्रकाश से प्रकाशित था जो ग्यान और अद्वैप की परमशान्ती को दर्शाता था, जहां
07:40जीव और ब्रहमा का भेद मिटकर एक अध्भुत लीला का अंत हो चुका था।
07:45भगवान विश्णु ने गरूर की शांत आखों में देखा और गहनता से समझाया कि यह संपूर्ण दृष्यमान जगत जिसकी विविधताएं
07:54हमें मोहित करती हैं, वास्तव में एक दीर्ग स्वपन के सदरिश है, जो जागरित अवस्था में विलीन हो जाता है।
08:02वे बोले, जैसे एक स्वपन अपने में सत्य प्रतीत होता है, परंतु जागने पर उसकी मिध्याता स्पष्ठ हो जाती है,
08:10वैसे ही यह संसार ब्रह्मा से प्रिथक अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं रखता, मात्र उसी पर एक आभास है।
08:19गरुर ने सुना कि यह ब्रह्मा ही एक मात्र सत्य है, और जो कुछ भी इससे अलग प्रतीत होता है,
08:26वह सब माया का खेल है, जिसकी शक्ती से असंख्य रूप और नाम स्विजित होते हैं, परंतु वे सब ख्षन
08:33भंगुर और परिवर्तन शील हैं।
08:37जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिंब अनेक तरंगों में विचलित होता है, वैसे ही एक ब्रह्मा ही माया के कारण
08:44विविध जीव और जगत के रूपों में प्रकट होता है, परंतु उसकी मूल सत्ता अविचल रहती है।
08:50यह संसार की मिध्याता का अर्थ उसका पूल्न अभाव नहीं, अपितु उसका ब्रह्मा से स्वतंत्र अस्तित्व न होना है, यह
08:59केवल ब्रह्मा पर एक अध्यास मात्र है, जैसे रस्सी में सर्प का भ्हम होता है।
09:06भगवान मुस्कुराए और बोले, जैसे स्वपन से जागने पर स्वपन द्रिश्य लोप हो जाते हैं, वैसे ही आत्म ज्यान होने
09:14पर यह संपूर्ण जगत ब्रह्मा में ही विलीन प्रतीत होता है।
09:19गरुर ने देखा कि उनके चारों और का वैकुंठ लोक भी अब केवल ब्रह्मा की ही एक शाश्वत अभिव्यक्ति लग
09:26रहा था, जिसमें हरकन में उसी परमसत्ता का वास था।
09:30यह बोध एक ऐसी लहर के समान था जिसने सभी द्वैत के तकबंधों को तोर दिया, जहां देखने वाला और
09:38देखा जाने वाला एक ही परमसत्य का अंश बन गए।
09:42इस अद्वैत ज्यान की तीवर जोती में गरूर को प्रतीत हुआ कि उनके अपने स्वरूप और भगवान विश्नु के स्वरूप
09:50के बीच का भेद मात्र एक माया भी परदा था, जो अब हट चुका था।
09:56विश्नु ने समझाया, जैसे म्रिगत्रिश्ना में दूर से पानी दिखता है, परंतु समीब जाने पर वह केवल रेथी प्रतीत होती
10:05है, वैसे ही यह संसार ब्रहमा से भिन्न होकर भी केवल ब्रहमा का ही एक मिथ्या प्रतिरूप है।
10:12उन्होंने आगे कहा कि ज्यानी पुरुष इस संसार को असत्य इसलिए नहीं कहते कि इसका अस्तित्व ही नहीं है, बलकि
10:20इसलिए कि इसका ब्रहमा से स्वतंत्र कोई वास्तविक अप्रिवर्तनिय अस्तित्व नहीं है।
10:27यह ज्यान ऐसा था, मानो एक महान नाटक का अंतिम परदा गिर गया हो और सभी पात्रों की वास्तविक्ता, जो
10:35अभिनेता मात्र थे, स्पष्ठ हो गई हो
10:38अब गरुर ने समझा की जीव का दुहक और संसार का बंधन केवल अज्यान के कारण था, जो ब्रह्मा के
10:45स्वरूप को माया द्वारा ढख देता है
10:49इस बोध के साथ सभी पूर्वधानाय, सभी भेद, सभी इच्छाय शान्थ हो गई, जैसे तूफान के बाद सागर शान्थ हो
10:58जाता है
11:00उन्होंने अपनी चेतना में अनुभव किया कि वे स्वय ही वह अनादी, अनन्थ और अप्रिवर्तनिय ब्रह्मा हैं, जो सभी रूपों
11:08और नामों से परे हैं
11:11यह वहक्षन था जब माया का अंतिन परदा गिर गया, और जीव ने अपनी वास्तविक पहचान, ब्रह्मा के साथ अपनी
11:19एक्ता को पूरी तरह से पहचान लिया
11:22वैकुंठ का प्रत्येक कन इस परंबोध से स्पंदित हो उठा, जहां अब कोई जीव नहीं था, कोई इश्वर नहीं था,
11:31बस एक अध्वितिय अध्वैत सत्ता थी
11:34भगवान विश्णु का मुखमंडल दिव्यशान्त मुस्कान से प्रकाशित था, जैसे उन्होंने स्रिष्टी का परम रहस्य उजागर कर दिया हो, जिसे
11:43जानने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रहता
11:48जीवब्रह्म की यह एक ताही परमानंद और परम शान्ती का सार थी, जहां सभी भेद मिट गए और केवल एक
11:55ही निर्गुन निराकार सत्ता शेश रही
11:58और इस प्रकार माया का अंतिम पर्दा अनंत काल के लिए हट गया, और परम सत्य का नगन स्वरुक जो
12:06स्वयंप्रेम, ज्ञान और आनंद था, सर्वत्र प्रकाशित हो उठा
12:11जिस आत्मा ने इस परम सत्य का साक्षात कार कर लिया है, वह इस संसार में रहते हुए भी सभी
12:18बंधनों से मुक्त होकर जीवन-मुक्त कहलाती है, एक ऐसी सत्ता जो जन्म और मृत्यु के चक्र से परे हो
12:24जाती है
12:27भगवान विश्णु ने अपनी असीम करुणा से गरुड की ओर देखा, उनके नेत्रों में अनादी ज्ञान की प्रभा चमक रही
12:34थी, जैसे वे ब्रहमांड के हर रहस्य को जानते हुँ
12:39जीवन मुक्त के लिए संसार का प्रत्येक कन, प्रत्येक जीव, स्वयम ब्रहमा का ही दिव्य विस्तार होता है, जहां द्वैत
12:46का कोई स्थान नहीं रहता
12:49उनकी द्रिष्टी में स्वर्ण सिनहासन और पत्थरों का धेर एक समान था, क्योंकि वे दोनों में एक ही शाश्वत चेतना
12:57का स्पंदन देखते थे
12:59सुख और दुहक, मान और अपमान उनके मन को तनिक भी विचलित नहीं कर सकते, जैसे विशाल सागर पर उठती
13:07लहरें उसे प्रभावित नहीं करती
13:11विश्णु ने समझाया की जीवन मुक्त कर्म करता है, परंतु फल की आसकती से पूर्णत्य विरक्त रहता है, उसके लिए
13:18प्रत्येक कर्म एक यग्य है
13:22ननिंदा उसे पीडा देती है, नस्तुती उसे अहमकार से भरती है, वह इंद्वंद्वों से उपर उठकर सहज भाव में स्थित
13:30रहता है
13:32उसकी चेतना में मैं और मेरा का भाव सदा के लिए विलीन हो चुका होता है, केवल शुद्ध अस्तित्व ही
13:39शेश रहता है
13:42संसार की हलचल, उसके उठ्थान पतन, उसे वैसे ही अप्रभावित छोड़ते हैं, जैसे आकाश में बादल आते जाते रहते हैं
13:52गरुर्त भगवान विश्णु के इन वचनों को अत्यंत एकागरता से सुन रहे थे, उनके दिव्यहरिदय में ज्ञान का नया सूर्य
14:00उदित हो रहा था
14:02बाहरी परिस्थितियों से परे, जीवन मुक्त अपनी आंतरिक शान्ती के अथा सागर में सदास्थिर रहता है, जो किसी भी तूफान
14:10से अचुता है
14:13उनकी मुस्कान में ब्रहमांड का धैर्य और उनकी आखों में अनादी काल का बोध जलगता है, जो कभी भंग नहीं
14:20होता
14:22जीवन मुक्त का प्रत्येक कार्य लोग कल्यान के लिए स्वतह स्फूर्थ होता है, बिना किसी व्यक्तिगत इच्छा या परिनाम की
14:30अपेक्षा के
14:32विष्णु ने कहा, जीवन मुक्त स्वयन प्रकृती के साथ एकाकार होकर उसकी दिव्य इच्छा के अनुरूप ही गती करता है
14:41वह ब्रह्मांड के व्रिहद नृत्य का एक सहज अंग बन जाता है, जहां उसकी व्यक्तिगत इच्छा और ब्रह्मांडिय इच्छा में
14:49कोई भिनता नहीं रहती
14:52जैसे एक नदी बिना किसी प्रयास के सागर की ओर बहती है, वैसे ही जीवन मुक्त का जीवन परम सत्य
14:59की ओर सहज़ता से प्रवाहित होता है
15:03यह जीवन मुक्त की परम स्वतंत्रता है, जहां वह जन्मुम्रित्यु के चक्र से परे जीवित रहते हुए ही मोक्ष का
15:10अनुभव करता है
15:13गरुर ने महसूस किया कि उन्होंने न केवल ज्यान प्राप्त किया था, बलकि स्वयां उस परम सत्य की एक जलत
15:21पाली थी, जो उनके भीतर ही वास करता था
15:25वह अवस्था जहां जीव ब्रहम का भेद सदा के लिए मिट जाता है, और केवल एक ही अद्वैत सत्ता का
15:32अनुभव शेश रहता है
15:35और इस प्रकार जीवन मुक्त की द्रिष्टी से संसार केवल एक दिव्य लीला बन जाता है, जहां सब कुछ ब्रहमा
15:42ही है, और ब्रहमा ही सब कुछ
15:45जीवन मुक्त की द्रिष्टी में संसार मात्र एक विशाल रंगमंच है, जहां प्रतेक कर्म केवल एक दिव्य नाटक की प्रस्तुती
15:54है, फल की लालसा से परे
15:57भगवान विश्णु ने गरूर को समझाया की कैसे ऐसे जीव केवल साक्षी भाव से कर्म करते हैं, स्वयन को करता
16:04न मानते हुए, बलकी केवल एक साधन समझते हुए
16:09उनकी हर क्रिया, चाहे वह कितनी भी साधारन क्यों न हो, एक गेहन समर्पन का प्रतीक होती है, जैसे कोई
16:16कलाकार पूरी तनमयता से अपनी कला प्रस्तुत करता है, बिना पुरस्कार की चिंता किये
16:23इस आत्महीन क्रिया से उत्पन उर्जा शुद्ध और निर्मल होती है, जो किसी भी कर्म बंधन को जन्म नहीं देती,
16:31बलकी चेतना को और भी उन्नत करती है
16:35यह परम ज्यान प्राप्थ होने पर, जीवन मुक्त स्वयय को उस इश्वरिय इच्छा का केवल एक प्रवाहक मानता है, जिसके
16:43माध्यम से ब्रहमांड अपनी लीला रचता है
16:47विश्णू ने कहा, हे गरूर, जब करता का भाव विलीन हो जाता है, तब समस्थ कर्म केवल इश्वर की महत्ता
16:54का विस्तार बन जाते हैं, जो उनसे होकर प्रकट होता है
17:00उनकी हर सांस, हर विचार और हर कार्य उस अनंत, अव्यक्त सत्ता की अभिव्यक्ती बन जाता है, जैसे एक नदी
17:08बिना अपनी पहचान खोए समुद्र में समा जाती है
17:12इस अवस्था में व्यक्तिगत इच्छाय शान्थ हो जाती हैं, और दिव्य इच्छा का एक अखंड प्रवाह उनके अस्तित्व को दिशा
17:20देता है, एक अग्रिश्य सूत्र से बंधे हुए
17:25यद्यपी वे संसार में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, उनकी आंतरिक स्थिती अकर्म की होती है, जहां वे स्वयन
17:32को किसी भी कर्म का करता नहीं मानते
17:36विश्णू ने आगे बताया, बाह्य रूप से वे सभी कारियों में संलगन दिखते हैं, परन्तु भीतर से वे उस अनंत्शान्ती
17:43में स्थित होते हैं, जहां मैं और मेरा का अस्तित्व नहीं होता
17:48उनके हाथों से किये गए कर्म, जैसे जल कमल के पत्ते पर नहीं टिकता, उसी प्रकार कर्मों के फल उन्हें
17:56स्पर्श नहीं करते क्योंकि उनका मन अनासक्त रहता है
18:01यहां अकर्म की अवस्था, जहां कर्मों की जड़े काट दी जाती हैं, अहंकार के पर्दों को फाड़ कर जीव को
18:08परम स्वतंत्रता प्रदान करती है
18:12इसलिए ऐसे व्यक्तियों के लिए नए कर्म बंधन उत्पन्न नहीं होते क्योंकि उनकी क्रियाय फल की इच्छा से रहित होती
18:20हैं, शुद्ध प्रेम और कर्तव्य से प्रेरित
18:23विश्णू ने स्पष्ट किया, कर्म बंधन तभी बनते हैं, जब करता स्वय को फल का भोकता मानता है, जीवन मुक्त
18:31के लिए यह चक्र सदा के लिए तूट जाता है
18:35उनके जीवन की यात्रा एक ऐसी निर्मलधारा की तरह होती है, जो बिना किसी अवरोध के बहती है, अपने मार्ग
18:43में आने वाली हर चीज को शुद्ध करती जाती है, पर स्वय निर्लिप्त रहती है
18:50प्रत्यक कार्य एक यज्य बन जाता है, जिसमें अहंकार की आहुती दी जाती है, और बदले में केवल अनन्त मुक्ती
18:57की अगनी प्रजवलित होती है
19:00यह वह अंतिम अवस्था है, जहां जीव पूर्ण रूप से बन्धनों से मुक्त हो जाता है, और उसका अस्तित्व स्वयम
19:08ब्रह्मा के साथ एकाकार हो जाता है
19:12भगवान विश्णु ने अपने शांत अनन्त स्वरूप में गरूर को यह परम ज्यान प्रदान किया, जिससे उनके हृदय में अग्वैत
19:20का सूर्य उदे हुआ
19:22गरूर ने महसूस किया कि उनके भीतर भी वही दिव्य स्पंदन प्रवाहित हो रहा था, वही असीम शांती और वही
19:30ब्रह्मा की अनन्त चेतना
19:32और इस प्रकार समस्थ ब्रह्मांड एक दिव्य गीत गा उठा, जहां जीव और ब्रह्मा के बीच का मायावी परदा सदा
19:40के लिए हट गया, केवल अनन्त अैक्य का अनुभव शेश रहा
19:45भगवान विश्णु ने गरुड की शांत होती चेतना को देखा और आगे ज्यान की धारा प्रवाहित की, ते गरुड यह
19:52एक्य ही उस जीवनमुक्त की अवस्था है, जो संसार में रहकर भी गुनों से परे हैं
19:59सत्व रजस और तमस ये तीनों गुन माया के ही घटक हैं, जो हर जीव को अपनी ओर खीचते हैं,
20:07किन्तु जीवनमुक्त इनसे अचूता रहता है
20:11जैसे निर्मल जल में कमल खिलता है और जल से अप्रभावित रहता है, वैसे ही जीवनमुक्त संसार में रहते हुए
20:19भी गुनों के कीचड से उपर उठ जाता है
20:23सत्व गुन जो ग्यान और आनंद का प्रतीक है, वह भी बंधन है, यदि वह मैं ग्याता हूँ के अहंकार
20:30से जुर जाएं
20:32और रजस जो कर्म और गती का गुन है, निरंतर कर्मों के फल की इच्छा में जीव को उलजाय रखता
20:38है
20:40तमस अज्यान और जर्ता का गुन जीव को अंधकार और निश्क्रियता में धकेल देता है, सबसे बड़ा बंधन यही है
20:50जीवन मुक्त इन तीनों गुनों से उत्पन होने वाले सुख दुख, लाभानी, मानअप मान से समान भाव से देखता है
20:59वह स्वयन को करता नहीं मानता, बलकी प्रकृती के गुनों को ही क्रियाशील देखता है और साक्षी भाव से स्थित
21:06रहता है
21:08राग और द्वेश, जो गुनों के ही परिणाम हैं, उसे स्पर्ष नहीं कर पाते, उसका चित्त सदाशांत और सम रहता
21:16है
21:18वह प्रशंसा और निंदा, सुख और दुहक में अविचलित रहता है, जैसे विशाल महासागर पर छोटी लहरों का कोई प्रभाव
21:26नहीं पड़ता
21:28उसकी बुद्धी शुद्ध, एकाग्र और ब्रहमा में स्थिर रहती है, चाहे वह कोई भी कारिय कर रहा हो
21:35वह गुणों के कारियों को देखता है, उनसे प्रभावित नहीं होता, और जानता है कि मैं गुणों का खेल नहीं
21:43हूँ
21:44यह अवस्था प्राप्त करने के लिए निरंतर अभ्यास, वैराग्य और आत्मचिंतन आवश्चत है
21:52जैसे एक कुशल नर्तक मंच पर अभिनय करता है, कि तु जानता है कि वह केवल एक पात्र है, वैसे
21:59ही जीवनमुक्त संसार में रहता है
22:03उसकी सारी क्रियाय निशकाम भाव से होती है, बिना किसी फल की आकांक्षा के केवल धर्म और लोग कल्यान हे
22:11तु
22:12वह कर्मों में रहते हुए भी कर्मों से परे होता है, उसकी चेतना सदा आत्मन में प्रतिष्थित रहती है, स्वयं
22:20प्रकाश्मान
22:21यह त्रिगुनों से परे की स्थिती ही वास्तविक मुक्ती है, जहां जीव अपने शुद्ध असीम स्वरूप में स्थित हो जाता
22:29है
22:30जब यह बोध पूर्ण होता है तब माया का अंतिम परदा हट जाता है और जीवब्रहम का एक्य स्पष्ठ हो
22:38जाता है
22:39इस प्रकार समस्थ ब्रहमांड फिर से एक दिव्यगीत गाने लगता है जहां हर स्पंदन में केवल अनंत एक्य का अनुभव
22:48शेश रहता है
22:50गरूर ने स्वयं को अब केवल गरूर नहीं बलकि उस अनंत ब्रहमा का एक अविभाज अंश महसूस किया जो हर
22:58कण में व्याप्त है
23:00वैकुंट के स्वर्ण महलों के बीच जब जीव और ब्रहमा की सीमाएं समाप्थ हुई तब गरूर को संपून स्रिष्टी केवल
23:08एक अनंत चैतने के रूप में दिखाई देने लगी
23:12परम प्रभु के सम्मुख खड़े होकर गरूर ने अपनी आखें बंद कर ली और अनुभव किया कि उनके भीतर का
23:20आत्म तत्व ही उस विराट परमात्मा का ही एक अखंड रूप है
23:25भगवान विश्णू ने मंद मुस्कान के साथ अपने वरध हस्त को उठाया जिससे निकलती हुई सुनहरी रश्मियों ने ब्रहमांड के
23:33अन्तिम संशों को भी सदा के लिए शांत कर दिया
23:36इस परमक्षण में संपूर्ण चराचर जगत एक ऐसे दिव्य महाकमल की भानती खिल उठा जिसका हर एक दल आत्म ज्यान
23:46की शाश्वत आभा से दीप्तिमान था
23:49स्रिष्टी का प्रत्येक कोना अब किसी प्रिथक अस्तित्व से रहित होकर केवल ब्रहमा की एक ही परमध्वनी से गुंजायमान हो
23:57रहा था
23:59भगवान विश्णु ने गरूर को समझाया कि जैसे सागर की लहरेंग अंत्त सागर ही हैं वैसे ही समस्त आत्माएं कभी
24:07भी इस परमात्मा से भिन्न नहीं थी
24:10गरूर के विशाल पंखों की प्रत्येक स्वर्णिन पंखुडी से अब भाय और अज्ञान का अंतिन कन भी जड़कर शूने में
24:18बिलीन हो गया
24:19ज्यान की इस चरम सीमा पर जीवात्मा और परमात्मा की प्रिथक सत्ताएं मिलकर एक अखंड महाप्रकाश में बिलीन हो गई
24:29वैकुंट का सारा वातावर्ण इस अद्वैत अनुभूती से स्पंदित था जहां देखने वाला, देखने की क्रिया और द्रिश सब एक
24:37हो चुके थे
24:39प्रभू के मुखमंडल की असीम शान्ती को देख कर गरुर को बोध हुआ की संसार का आना जाना केवल मन
24:46का एक भ्रम मात्र था
24:48गरुर के मस्तक पर एक अद्रिश प्रकाश पुन्ज जागरत हुआ, जिसने उनकी बुद्धी को सदास्दा के लिए परम सत्य के
24:56आसन पर प्रतिष्थित कर दिया
24:59अब समय का कोई आदिया अंत नहीं बचा था, केवल वर्तमान का एक शाश्वत प्रवाह था जो बिना किसी बाधा
25:07के बह रहा था
25:09देवताओं और रिशियों के सुक्षम स्वरूप भी इस महामिलन को देख कर शांत भाव से अपनी अपनी चेतना में लीन
25:16हो गए
25:18भगवान विश्णु ने घोशना की की जो जीव इस नित्य ज्यान को प्राप्त कर लेता है, वह संसार में रहते
25:25हुए भी जीवनमुक्त कहलाता है
25:28गरूर के संपूर्ण शरीर से निकलती हुई दिव्यकिर ने वैकुंट के कणकण को एक नए आध्यात्मिक तेज से आलोकित करने
25:36लगी
25:37यह वह परम रहस्य है जिसके आगे न कोई प्रश्न बचता है, न कोई जिग्यासा और नहीं कोई दूसरा विचार
25:45शिश रहता है
25:48वैकुंट के स्वर्ण महल और दिव्य उपवन अब केवल भौतिक स्थान नहीं, बलकि स्वयन सच्चिदानन्द के साकार रूप बन चुके
25:56थे
25:57गरूर के मुख से केवल ओम की वह महाध्वनी निकली जो सृष्टी के उदगम और अंत की एक मात्र साक्षी
26:04है
26:06भगवान विश्णु ने प्रेम पूर्वक अपने प्रिय वाहन के मस्तक पर अपना वर्देहस्त रखा, जिससे अधवैत का यह अनुभव सदा
26:14के लिए स्थिर हो गया
26:16इस प्रकार गरूर पुरान की यह दिव्य यात्रा पूर्ण हुई, जहां जीव और ब्रह्मा का अंतिम परदा हट गया और
26:24केवल अनंत सत्ता ही शेश रही
26:27इस परम प्रशांत वैकुंठ धाम में, जहां स्वर्ण महलों की आभा दिव्य नीली रश्मियों से मिल रही थी, वहां पर्मानंद
26:35की एक ऐसी मौन तरंग उठी जिसने संपूर्ण चराचर को अपनी गोध में ले लिया
26:41भगवान विश्णु ने अपने परम भक्त गरूर की ओर करुनापूर्ण नेत्रों से देखा और मंद मुसकान के साथ उस सर्वोच
26:49आनंद का रहस्य प्रकट किया जो केवल आत्मा के भीतर ही निवास करता है
26:55नारायन के वर्देहस्ट से प्रवाहित होती हुई वह परम चैतन्य की उर्जा सीधे गरोड के हृदय कमल में समाने लगी
27:03जिससे बाहिस अंसार के सभी बंधनों का अस्तित्व सदा के लिए मिट गया
27:08जब जीव अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेता है तब वह बाहरी सुख दुख की सीमाओं को लांध कर उस
27:16स्वयंभू आनंद सागर में गोता लगाता है जो कभी समाप्त नहीं होता
27:22वैकुंट के उस दिव्यक्शीर सागर की शांत लहरें भी इस परम सत्य की साक्षी बन रही थी कि संसार का
27:29हर सुख उस निर्गुन ब्रह्मा के आनंद के एक अत्यंत छोटे अंश मात्र के समान है
27:35हे खगेश्वर प्रभू ने अपनी अत्यंत मधुरवानी में कहा यह परमानन्द किसी वस्तुया परिस्थिती का मोहताज नहीं है बलकि यह
27:45स्वयन तुम्हारी अपनी आत्मा का ही मूल स्वभाव है
27:49गरूर के नैनों से बहते हुए प्रेमाश्रू उनके गालों को भिगो रहे थे और उन्हें अनुभव हो रहा था कि
27:56अब उनके और उनके आराध्य के बीच का वह अंतिम सुक्ष्म अंतर भी समाप्थ हो चुका है
28:04जैसे एक छोटी सी जल की बून्द विशाल महासागर में मिलकर स्वय महासागर बन जाती है वैसे ही गरूर की
28:11व्यक्तिगत चेतना उस अनंत ब्रहमा में विलीन हो गई
28:16समस्त ब्रहमांड में अब केवल एक ही सत्य गूज रहा था जहां न कोई याचक था और न कोई दाता
28:23केवल विशुद्ध पर्मानंद का एक असीम और अविनाशी सामराज्य फैला हुआ था
28:29भगवान विश्णू ने समझाया कि जब मनुष्य संसार के सारे जूठे सुखों की कामना त्याग देता है तब उसके भीतर
28:37वही अग्वैत आनंद जागरत होता है जो काल और परिस्थितियों से परे है
28:44नारायन के नेत्रों की अगाध गहराई में गरूर ने देखा कि सृष्टी के सभी प्राणी अंतह इसी विशुद्धानंद की खोज
28:51में अनंत योनियों से यात्रा करते हुए यहीं विश्राम पाते हैं
28:57यह पर्मानंध ही वह परम सत्य है जो जीवन के सभी दुखों और भयों को भस्म कर देता है और
29:04जीवात्मा को जन्ममृत्यू के चक्र से मुक्त कर सनातन शांती प्रदान करता है
29:10इस महान सत्य के प्रक्तिकरण के साथ ही वैकुंठ धाम के दिव्यकल्पवरिक्षों से पारिजात के पुष्पों की वर्षा होने लगी
29:18जिससे सम्पूर्ण वातावर्ण एक अनुपम सुगंध और शांती से भर गया
29:24श्रीहरी ने अपने दिव्यवर्देहस्ट से गरूर को आशिरवाद देते हुए कहा कि जो भी मनुष्य इस गरूर पुराण के ज्यान
29:32को सुनेगा वह भी इसी परमगती और आनंद को प्राप्त करेगा
29:37गरूर के जुड़े हुए हाथों में अब वह परमग्यान एक तेजो में स्वर्ण चक्र की भांती चमक रहा था जो
29:44संसार के अज्यान के अंधकार को नश्ट करने के लिए पूर्णत है तयार था
29:50इस प्रकार गरूर पुरान का यह महाग्यान जो केवल एक समवाद नहीं बलकी मोक्ष का सीधा मार्ग है ब्रह्मांड के
29:58इतिहास में सदा के लिए स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया
30:03स्रिष्टी के आरंभ से लेकर अंतक की इस अग्धुत गाथा ने सिध कर दिया कि अंतह सब कुछ उस एक
30:10ही दिव्य ब्रह्मा की सुन्दर और जादूई लीला का हिस्सा है
30:15परमेश्वर के शान्त और गंभीर मुखमंडल पर एक ऐसा दिव्य संतोष था जो यह दर्शाता था कि जीवों के कल्यान
30:22के लिए प्रकट किया गया यह ज्यान अब पूनता को प्राप्थ हो चुका है
30:28उनके श्रीचर्णों से निकलती हुई वह पावन उर्जा संपूर्ण चराचर जगत में शान्ती और कल्यान की लहरें फैला रही थी
30:36जो सभी संश्यों का अंत करने वाली थी
30:40केवल वही एक सक्चिदानंद स्वरूप पर्मात्मा शेश रहा और इस पर्मानंद की प्राप्ती के साथ ही गरुड पुरान की यह
30:48परम पावन कथा यह पूनता को प्राप्थ हुई
30:52इस परम ज्यान को सुनने के बाद विनीत भाव से गरुड ने पूछा कि है प्रभु संसार के बंधनों में
30:59फंसा यह जीव इस परम और निर्गुन ब्रह्मा की अवस्था को कैसे प्राप्थ कर सकता है
31:06भगवान विश्णु ने गरुड के संशय को दूर करते हुए कहा कि इस परम पद की प्राप्थी के लिए केवल
31:12दो ही अचूप मार्ग हैं
31:14संसार से पूर्ण वैराग्य और आत्मतत्व पर निरंतर अभ्यास
31:19उन्होंने समझाया कि वैराग्य का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बलकि सांसारिक वासनाओं और भौतिक सुखों के प्रती मन में
31:28उठने वाली आसकती का सदा के लिए अंत होना है
31:32जैसे जल में रहने वाला कमल का पत्ता जल से कभी लिप्त नहीं होता, वैसे ही वैराग्य से युक्त साधक
31:39संसार में रहते हुए भी उसके दुखों से अचूता रहता है
31:44विश्नु जी ने पुनह कहा कि इस वैराग्य को सुद्रिड करने के लिए दूसरा महत्वपून स्तंभ अभ्यास है जो चंचल
31:52मन को वश्मे करने की परम आउशधी है
31:56अभ्यास का अर्थ है अपने मन को सांसारिक विकारों से खीच कर बार-बार उस परमेश्वर के चिंतन और ध्यान
32:04में लगाना जो सर्वत्र व्याप्त है
32:07जैसे निरंतर बहने वाली जल की धारा कठोर से कठोर चटान को भी काट देती है वैसे ही निरंतर किया
32:15गया ध्यान मन के विकारों को नश्ट कर देता है
32:19प्रभू ने स्पष्ट किया कि बिना अभ्यास के वैराग्य अस्थाई हो जाता है और बिना वैराग्य के अभ्यास दिशाहीन होकर
32:27भटक जाता है
32:30इसलिए साधक को चाहिए कि वह प्रति दिन अपने एकांत समय में बैठ कर प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से
32:37अपने मन की चंचलता को शांत करे
32:40जब मन विश्यों की ओर भागे तो साधक को धैर्य पूर्वक उसे वहां से हटा कर पुना हृदय में स्थित
32:47परमात्मा के दिव्यरूप पर केंद्रित करना चाहिए
32:51इस निरंतर अभ्यास से साधक के अंतहकरण में एक ऐसी परमशान्ती का उदे होता है जिसे संसार की कोई भी
32:59परिस्थिती विचलित नहीं कर सकती
33:02भगवान नारायन ने गरूर को बताया कि यही वह अवस्था है जहां जीवात्मा अपने प्रिथक अस्तित्व को खोकर परमात्मा के
33:11साथ एकाकार होने लगती है
33:14यह सुनकर गरूर का हृदय भक्ती से भर गया और उन्होंने समझ लिया कि बाह्य अनुष्थानों से अधिक महत्व आंतरिक
33:22शुद्धी और साधना का है
33:25विश्णुजी ने आशिरवाद देते हुए कहा कि जो मनुष्य जीवन भर इस वैराग्य और अभ्यास का पालन करता है वह
33:33मृत्यू के समय भय से मुक्थ होकर परमपद को प्राप्थ करता है
33:38उस साधक के लिए यमराज का मार्ग कष्टकारी नहीं बलकि एक सुन्दर और शांति पूर्ण यात्रा बन जाता है जहां
33:46देवदूत उसका स्वागत करते हैं
33:50वह जीव समस्त भौतिक शरीरों और चक्रों को भेद कर सूर्य मंदल को पार करता हुआ सीधे बैकुंठ धाम में
33:57प्रवेश पालेता है
34:00गरूर पुरान का यह परम रहस्यमय भाग जीव को संसार के दुखों से मुक्त कर परमात्मा के साथ उसके नित्य
34:07संबंध की याद दिलाता है
34:11भगवान विश्णु का यह उपदेश सुनकर गरूर के सभी संशय सदैव के लिए शान्त हो गए और उनका हृदय परमानंद
34:19के सागर में डूग गया
34:20तब केवल वही एक सचिदानंद स्वरूप परमात्मा शेश रहा और इस प्रकार गरूर पुरान की यह दिव्य और पावन कथा
34:29यहाँ पूर्णता को प्राप्थ हुई
34:32माया का अंतिम परदा गिर गया और जीव ब्रहम के इस मिलन के साथ ही संपूर्ण चराचर जगत में अनंत
34:39शान्ती और कल्यान की लहरें व्याप्थ हो गई
34:43व्यकुंट के उस परम पावन और प्रकाश्मान धाम में जहां दिव्य उर्जा तरंगों के रूप में बह रही थी
34:50भगवान विश्णु ने महाप्रलय के उस परम सत्य का उद्गाटन किया जो स्रिष्टी के अंत में घटित होता है
34:58चतुर्भुज धारी भगवान विश्णु ने अपनी शांत और करुनापून द्रिष्टी गरूर पर डालते हुए कहा कि जब महाप्रलय का समयाता
35:06है
35:07तब समस्त भौतिक जगत का अस्तित्व इसी परम ब्रह्मा में लीन हो जाता है
35:13नारायन के इशारे पर आकाश में काल के भयानक रूप का आभास हुआ
35:18जहां महाप्रलय की दिव्य अगनी ने ब्रहमांड के अंतिन कणों को अपने भीतर समेटना प्रारंभ कर दिया
35:24इस महाविनाश के मध्य भी जो आक्मा अपने वास्तविक स्वरूप अर्थात ब्रहमा को जान लेती है
35:32वह इस भयानक परिवर्तन से सर्वता अप्रभावित और सुरक्षित रहती है
35:39जैसे नदिया अपने नाम और रूप को त्याग कर महासागर में मिलकर एक हो जाती है
35:44वैसे ही आत्मग्यानी पुरुष ब्रहमा के अनंत सागर में विलीन हो जाता है
35:50अत्यंत विनमर्ता और असीम श्रद्धा से भरे गरूर ने भगवान विश्नु के चर्णों में शीष जुकाते हुए पूछा की है
35:58प्रभु क्या इस परम विलीन अवस्था में जीव को अपनी भिन्न सत्ता का कोई भान रहता है
36:05भगवान विश्नु ने मुस्कुराते हुए अपने वरध हस्त को उठाया जिससे एक परम पावन जोती पुन्च प्रकट हुआ और गरूर
36:13के हृदय प्रदेश को आलोकित करने लगा
36:17विश्नु ने समझाया कि जैसे जल में मिला हुआ जल केवल जल ही रह जाता है वैसे ही ब्रह्मा में
36:23लीन हुआ जीव केवल सच्चिदानंद का ही शाश्वत रूप बन जाता है
36:29स्रिष्टी का यह विराट नाटक जो उत्पत्ती, स्थिती और लएके चक्रों में घूमता रहता है उस आत्मध्यानी के लिए केवल
36:37एक शनिक स्वपन के समान प्रतीत होता है
36:41गरुर के नैनों से पर्मानंद के अश्रु बहने लगे क्योंकि उनका चित अब उस परम सत्य में स्थिर हो चुका
36:48था जहां द्वैत का लेशमात्र भी अस्तित्व नहीं था
36:53भगवान नारायन ने गरुर को सांत्वना देते हुए कहा कि तुम्हारा यह संशे अरहित रूप अब संसार के सभी मुमुक्षूओं
37:01के लिए परम ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करेगा
37:04उस समय वैकुंठ का संपूर्ण वातावर्ण एक दिव्य अनाहत नाद ओम की ध्वनी से गूंज उठा जिसने समस्थ चराचर जगत
37:12में परम शांती का संचार किया
37:15यह ज्ञान ही गरूर पुरान का वह परम गोपनिय रहस्य है जो भयभीत जीवों को भवसागर से पार उतारने वाली
37:23परम नौका के समान है
37:27परमेश्वर विश्णू ने गरूर से कहा कि जो मनुष्य इस समवाद को श्रधा पूर्वक सुनेगा या मनन करेगा वह जन्मन
37:34के भयानक चक्र से सदा के लिए मुक्थ हो जाएगा
37:37इस दिव्य उपदेश की समाप्ती पर देवर्शी नारद और अन्य देवगणों ने वैकुंठ में कल्पवरिक्ष के सुगंधित पुष्पों की वर्षा
37:47करना प्रारंभ कर दिया
37:49गरुर के हृदय मंदिर में अब केवल एकात्म भाव शेश रह गया था जहां न कोई प्रशन था न कोई
37:56उत्तर केवल एक अखंड मौन और अनन्त प्रकाश था
38:00इस प्रकार वैकुंठ का यह परम पावन ख्षेत्र समस्त ब्रहमांड के लिए ज्यान, भक्ती और वैराग्य का शाश्वत उद्गम स्थल
38:09बनकर चमकने लगा
38:11गरुर ने भगवान विश्णु को साश्टान प्रणाम किया और उनका यह समर्पन जीव का परमात्मा के प्रती अंतिम और सबसे
38:19सुन्दर विलय बन गया
38:22भगवान विश्णु ने अपने परम भक्त को उठा कर हृदय से लगा लिया और इस आलिंगन के साथ ही भक्त
38:29और भगवान का भेद सदैव के लिए मिट गया
38:33माया का अंतिम परदा सदा के लिए उठ गया और सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा की इस दिव्य लीला की गूझ अनंतकाल
38:41तक ब्रहमांड में व्याप्त हो गई

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