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गरुड़ पुराण के इस रहस्यमय एपिसोड में, भगवान विष्णु गरुड़ को 'जीवनमुक्त' की परम अवस्था का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करते हैं। क्या है त्रिगुणों से परे की अवस्था? कैसे एक ज्ञानी और भक्त संसार की माया से अप्रभावित रहता है? जानिए 'स्थितप्रज्ञ' के गूढ़ लक्षणों को, जहाँ आत्मा केवल साक्षी बनकर सृष्टि की लीला का अनुभव करती है। कर्मों का बंधन कैसे टूटता है और कैसे मिलती है परम शांति, यह सब इस दिव्य प्रवचन में उजागर होगा। ✨🌌 #गरुड़पुराण #विष्णुज्ञान #मोक्ष #त्रिगुण #स्थितप्रज्ञ #ब्रह्मज्ञान #आध्यात्मिकज्ञान #सनातनधर्म #यूट्यूबसीरीज #hindumythology #garudapurana #spirituality
Transcript
00:00भगवान विश्णू ने गरूर को समझाते हुए कहा कि अज्ञानता के मिटते ही ज्ञान और भक्ती का भेद समाप्थ हो
00:07जाता है और दोनों ही मार्ग अंत्य ब्रह्मा की असीम चेतना में विलीन हो जाते हैं।
00:14परमेश्वर के मुखमंडल पर बिखरी मंद मुस्कान इस परम सत्य की पुष्टी कर रही थी कि आत्मा जब अहंकार का
00:21त्याग करती है तब वह साक्षात परमात्मा का रूप ले लेती है।
00:27गरुड अपने विशाल पंखों को जुका कर अत्यम्त विनीत भाव से अपने स्वामी की प्रत्येक वानी को अपने हृदय की
00:34गहराईयों में अंकित कर रहे थे।
00:58भगवान नारायन ने अपने चार हाथों में धारन किये प्रतीकों की ओर संकेत करते हुए कहा कि ये सभी केवल
01:05जीवात्मा को संसार चक्र से मुक्त कराने के साधन है।
01:27सर्वत्र केवल सक्चिदानंद का प्रसार होने लगा।
01:31वैकुंठ का संपूर्ण वातावर्ण इस दिव्य रहस्य के प्रक्तिकरण से गुंजायमान हो उठा, मानो संपूर्ण ब्रहमान इस ज्ञान गंगा में
01:40स्नान कर रहा हो।
01:42विश्नु ने समझाया कि ज्ञानी पुरुष अपनी बुद्धी से उस परम तत्व को खोजता है, जबकि प्रेमी भक्त अपने हृदय
01:50की धड़कन में ही उसे पा लेता है।
01:53गरुर ने अपने मस्तक को प्रभु के श्रीचर्णों में स्पर्ष कराया, जिससे उनकी आत्मा में भक्ती और ज्ञान के इस
02:01सुन्दर समनवय का अभिशेक हुआ।
02:04इस मिलन से एक दिव्य जोती उत्पन हुई, जिसने सिद्ध किया कि ज्ञान के बिना भक्ती अंधी है और भक्ती
02:12के बिना ज्ञान नीरस और निश्प्राण है।
02:16वैकुंठ के विशाल और भव्य सिंहद्वार स्वतह ही खुल गए, जैसे वे इस परम सत्य का स्वागत करने के लिए
02:23आतुर हो।
02:25परमेश्वर विश्णु ने मुस्कुराते हुए कहा कि जब साधक मैं और मेरा के बंधनों से मुक्त हो जाता है, तब
02:32वह संसार में रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।
02:36इस गूर उकदेश को सुनते ही, गरूर के हृदय कमल में साक्षात श्रीहरी की छवी अत्यधिक दैदी प्यमान होकर चमकने
02:44लगी।
02:45जैसे ही आत्मा और परमात्मा का यह एकत्व स्थापित हुआ, संपूर्ण ब्रह्मांड में मधुर वीना के स्वर और देवों की
02:53दुन्दुभी बजने लगी।
02:56दूर क्षितिच पर अनन्त सूर्य के समान प्रकाशमान एक नया सवेरा उदे हुआ, जो अज्यानता के अंधकार का पूर्ण विनाश
03:04कर रहा था।
03:06गरुड के नेत्रों से बहते अश्रु अब दुख के नहीं, बलकि उस परम आनन्द के थे जो जीव को अपने
03:13इश्वर से मिलकर प्राप्थ होता है।
03:16विश्णू ने अपने वर्दहस्ट से गरुड को स्पर्श किया, जिससे उन्हें ब्रह्मान के कणकण में केवल परमात्मा की ही लीला
03:24दिखाई देने लगी।
03:26इस प्रकार ज्ञान और भक्ती का यह पावन मिलन संपन्न हुआ और संसार केवल एक क्रीड आस्थल बन गया जहां
03:34आत्मा निरलिप्त भाव से विहार करती है।
03:57फिर भी संसार के जटिल माया जाल में रहते हुए ऐसे जीव का आचर्ण कैसा होता है। यह प्रश्न उनके
04:05मन में कौन्ध गया।
04:07ज्यान के प्रकाश और भक्ती की उश्मा से आलोकित होने के बावजूद व्यभारिक जीवन की चुनोती उनके समक्ष एक नए
04:15रूप में खड़ी थी।
04:17गरुड ने धीरे से अपने नेत्र खोले और उस परमपिता भगवान विश्नो की ओर देखा जिनके मुखमंडल पर अनंत ज्यान
04:25की आभा थी।
04:27हे प्रभु, आपने मुझे ज्यान और भक्ती के परम रहस्य से अवगत कराया, अब मेरी एक जिग्यासा और है, गरुड
04:36ने विनमरता पूर्वक पूछा।
04:39वह जीव जो इस शरीर में रहते हुए भी जीवन मुक्त अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह इस संसार
04:45में कैसे व्यवहार करता है।
04:49उनकी आवाज में जिग्यासा की गहराई थी, जैसे कोई पथिक अंतिम पड़ाव के मार्ग को समझना चाह रहा हो।
04:56क्या वह सामान्य मनुश्यों से भिन दिखाई देता है, क्या उसकी चालधाल या मुखमंडल से उसकी परम अवस्था का बोध
05:05होता है, गरुर ने उच्सुक्ता से पूछा।
05:08भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ गरुर की ओर देखा, उनके नेत्रों में अनंत करुना जहलक रही थी, जो
05:16सभी प्रशनों का सार जानती थी।
05:18क्या उसके दैनिक अनुभव में संसार की माया का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, क्या वह सुख्रुक लाभानी से पूर्णता अचूता
05:28रहता है।
05:30गरुर के शब्दों में संसार की जटिलताओं से परे एक परम सत्य को समझने की तीवर उतकंठा स्पष्ट थी।
05:38भगवान विश्णू ने गरुर की ओर अपनी द्रिश्टि स्थिर की, जैसे किसी गूड ग्रंथ के अंतिम प्रिष्ट को धीरे धीरे
05:45पल्टा जा रहा हो।
05:47उनकी मुस्कान गहरी हुई, जो केवल उत्तर का आरंभ नहीं, बलकि स्वय उत्तर की अनन्त गहराई का संकेट दे रही
05:56थी।
05:57ब्रहमांड की हर ध्वनी शान्त हो गई, जैसे अनन्त शूने में केवल गुरु और शिश्य के समवाद की प्रतीक्षा हो
06:04रही थी।
06:06भगवान विश्णू ने अपने दाहिने वर्दहस्त को धीरे से उपर उठाया, जैसे की अब वे समस्त संश्यों के कपाट खोलने
06:14वाले हो।
06:15हे गरूर, जीवनमुक्त वह नहीं जो संसार को त्याग देता है, बल्कि वह जो संसार में रहते हुए भी उससे
06:24अनासक्त रहता है।
06:26वह सभी कर्मों को करता बनकर नहीं, बल्कि केवल एक साक्षी बनकर देखता है, जैसे नाटक का दर्शत।
06:35उसके लिए संसार एक परम लीला है, जिसमें वह अपनी भूमी का निभाता है, पर परिणाम से विचलित नहीं होता।
06:44इस अनासक्ती के गूड रहस्य को सुनकर, गरूर के हृदय में एक और गहन सत्य का बीज अंकुरित होने लगा।
06:52तब पक्षी राज गरूर ने अत्यंत विनम्र होकर प्रभू के चर्णों में प्रणाम किया और स्थितप्रग्य पुरुष के लक्षणों को
07:00और अधिक स्पष्ट करने की विंती की।
07:03भगवान श्री हरी विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ गरूर की ओर देखा और स्थितप्रग्य की स्थिर बुद्धी का मर्म
07:10समझाना आरंब किया।
07:13श्री हरी ने बताया कि जब मनुष्य अपनी आत्मा में ही संतोष पाकर मन की समस्थ सांसारिक कामनाओं का पूरी
07:20तरह त्याग कर देता है, तब वह स्थितप्रग्य कहलाता है।
07:25जैसे अपार और सदा परिपूर्ण समुद्र में अनेक नदिया समाकर भी उसे विचलित नहीं कर सकती, वैसे ही सभी भोग
07:34स्थितप्रग्य के भीतर शांत हो जाते हैं।
07:38दुखाने पर जिसके मन में कोई उद्वेग नहीं होता और सुख में जिसकी आसकती और लालसा समाक्त हो चुकी है,
07:46वही वास्तव में स्थिर बुद्धी वाला साधक है।
07:50जो राग, भय और क्रोध से पूर्णतह मुक्त हो चुका है, ऐसा मुनी ही ब्रह्मा में निरंतर स्थित रहकर परमशांती
07:58का अनुभव करता है।
08:00जैसे कच्छवा भाय या संकट के समय अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, वैसे ही स्थित प्रग्य अपनी इंद्रियों
08:08को संसार के विश्यों से पूर्णतह समेट लेता है।
08:12ज्यान के इस दिव्य प्रकाश को ग्रहन करते हुए पक्षी राज गरुड का संपून अस्तित्व भक्ती और विस्मय के अध्भुत
08:20भाव से भरूठा।
08:22नारायन ने आगे सचेप किया कि विश्य भोगों का निरंतर चिंतन करने से आसकती पैदा होती है। आसकती से काम
08:30और काम में बाधा पढ़ने पर भयंकर क्रोध का जन्म होता है।
08:35परंतु जो सन्यमी साधक अपनी इंद्रियों को अपने वश्मे करके विश्यों में विचर्ण करता है, वह चित्त की परम निर्मलता
08:43और प्रसाद को प्राप्त करता है।
08:47इस आंतरिक निर्मलता के प्राप्त होते ही मनुष्य के समस्त दुखों और संतापों का अंत हो जाता है और उसकी
08:54बुद्धी शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।
08:58जिसका मन अनुशासित नहीं है, उसके पास न तो बुद्धी होती है और नहीं शान्ती और जिसे शान्ती ही न
09:05मिले उसे सुख कैसे प्राप्थ हो सकता है.
09:09जल में तैरती हुई नौका को जैसे प्रचंड वायू बहा कर ले जाती है, वैसे ही इंद्रियों में से केवल
09:16एक भी अनियंत्रित इंद्रिय मन को भटका देती है.
09:21इसलिए हे गरुड जिसकी इंद्रिया चारों और से अपने विश्यों से पूर्णता विरक्थ होकर वश में हैं, उसी की बुद्धी
09:29सुप्रतिष्ठित मानी जाती है.
09:32अज्यानी जीव जिस अज्यान की रात्री में सोते रहते हैं, परम योगी उस आत्म ज्यान के दिव्य उजाले में जागता
09:39रहता है.
09:41मान और अपमान, प्रशंसा और निंदा, तथा स्वर्ण और मिट्टी के ढेले को समान देखने वाला ही सच्चा ज्यानी और
09:49साक्षी है.
09:51वह संसार के प्रत्येक प्राणी में परमात्मा के रूप का दर्शन करता है और बिना किसी स्वार्थ के केवल लोग
09:59कल्यान के लिए कर्म करता है.
10:02भगवान विश्णों के इन वचनों को सुनकर गरुर का हृदय असीम शांती, आनंद और इश्वर भक्ती की अनूठी तरंगों से
10:10भर गया.
10:11श्री हरी ने आश्वासन दिया कि जीवन के अंतिम क्षण में भी इस ब्राहमी स्थिती में स्थित होने वाला जीव
10:19जन्ममर्ण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को पाता है.
10:23गरुर ने प्रभु के परम पावन श्री चर्णों में बारंबार प्रणाम किया, क्योंकि अब उनके मन का अंतिम संशय भी
10:31दूर हो चुका था और वे साक्षी भाव में स्थित हो चुके थे.
10:35तब भगवान विश्नु ने करुणा और ज्ञान से भरे नेत्रों से गरुड की ओर देखा और स्रिष्टी के गूर्तम रहसियों
10:43में से एक त्रिगुनों का विध्यान समझाना आरंब किया.
10:47श्री हरी ने समझाया कि सत्व, रजस और तमस प्रकृती के तीन गुण हैं, जो सभी जीवों के मन और
10:54कर्मों को प्रभावित करते हैं और संसार की हर घटना में नहित हैं.
11:00विष्णू ने कहा, सत्व गुन हे गरुड, निर्मलता, प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक है, जो आत्मा को सुख और शांती
11:08से बांधता है, जैसे स्वर्ण की अद्रिश्य बेडिया.
11:12सत्व गुन से व्यक्ति में धर्म, त्याग और दूसरों के प्रती प्रेम की भावनाएं जागरित होती हैं, जो उसे श्रिष्ट
11:20कर्मों की और प्रेरित करती हैं.
11:23गरुर ने गंभीर्ता से सिरहिलाया, उनके मन में त्रिगुनों की यह नई व्याख्या गहरे तक उतर रही थी, जैसे अमरित
11:31की बूंदे शुष्प भूमी पर.
11:34आगे बढ़ते हुए, भगवान विश्णू ने रजस गुन का वर्णन किया, रजस त्रिया, जुनून और तीवर इच्छाओं का गुन है,
11:42जो जीव को कर्म के चक्र में बांधता है, जैसे लाल रेशम की डोर.
11:47उन्होंने बताया कि रजस भौतिक इच्छाओं, प्रतिस्पर्धा और बेचैनी को जन्म देता है, जिससे व्यक्ति लगातार कर्मों में लिप्त रहता
11:56है और शांती से दूर भागता है.
12:00रजस के प्रभाव में मनुष्य यश, धन और इंद्रिय सुख की कामना में भटकता रहता है, कभी त्रिप्ट न होने
12:08वाली प्यास की तरह.
12:10गरुर ने ध्यान से सुना और अनुभव किया कि कैसे संसार के अधिकांश जीव इन तीनों गुनों के जाल में
12:17बंधे हुए अपनी नेती का निर्माण करते हैं.
12:21फिर श्री हरी ने कहा, तमस गुन, अंधकार, अज्यान और जड़ता का प्रतीक है, जो आत्मा को आलस्य और मुह
12:29से बांधता है, जैसे लोहे की भारी बेडी.
12:33तमस गुन के प्रभाव में व्यक्ती अज्यान, भ्रम और निश्क्रियता में डूब जाता है, जिससे वह अपने वास्तविक स्वरूप और
12:41लक्ष से विमुक हो जाता है.
12:44यह गुन मनुष्य को प्रमाद, क्रोध और विनाशकारी प्रवृत्तियों की ओर धकेलता है, जिससे वह अंधकार के गहन गर्त में
12:52गिर जाता है.
12:54विश्नु ने समझाया कि ये तीनों गुन निरंतर एक दूसरे से जुड़कर और बददलकर संसार की सारी क्रियाए उत्पन करते
13:02हैं, जैसे प्रकृती का एक शाश्वत निर्ते.
13:07गरुर ने पूछा, तो हे प्रभु क्या इन गुनों के प्रभाव से कोई जीव कभी मुक्त नहीं हो सकता, क्या
13:13यह बंधन शाश्वत है?
13:16विश्नु मुस्टुराए और बोले नहीं, हे पक्षी राज ज्यानी पुरुष इन गुनों को जानता है, पर उनमें फंस्ता नहीं, बलकी
13:25स्वयन को उनसे परे साक्षी के रूप में देखता है.
13:29यह स्थित प्रज्य व्यक्ति कर्म करता है, परंतु उसके फल की आसक्ती नहीं रखता, वह संभाव से सुख्रुख लाभाने को
13:37देखता है, जैसे नाटक का दर्शक.
13:41विश्णु ने कहा, जो आत्मा अपने को इन गुनों से प्रिथक कर साक्षी भाव में स्थित हो जाती है, वही
13:48संसार की परम लीला को समझ पाती है.
13:52गरुड ने अनुभव किया कि यह ज्ञान केवल शब्दों में नहीं, बलकि स्वयन परमेश्वर के दिव्य स्वरूप से प्रवाहित हो
13:59रहा था, उनके रोमरों में समाता हुआ.
14:03इस प्रकार त्रिगुनों की माया से उपर उठकर जीव जन्मुमृत्यू के चक्र से मुक्त हो जाता है और परम शांती
14:11तथा मोक्ष को प्राप्त करता है.
14:14गरुर ने पुनह प्रभु के चर्णों में प्रणाम किया, उनका हृदय अब पूर्णता निर्मल, साक्षी भाव में स्थित और परम
14:22आनन से परिपूर्ण था, मानोवे स्वयं ब्रह्मा का अंश बन गए हूँ.
14:28भगवान विश्नु ने अपनी दिव्य मुस्कान बिखेरते हुए गरुर को संबोधित किया, उनके नेत्रों में स्रिष्टी का समस्त ज्ञान प्रतिबिम्बित
14:36हो रहा था, और उन्होंने ज्ञान की अगली गूर परत को उजागर करना आरंभ किया.
14:42इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है.
14:52विश्णु बोले थे पक्षी राज जो स्थित प्रग्य है, वह स्वया को कर्मों का करता नहीं मानता, चाहे संसार में
14:59वह कितने ही महान कार्य क्यों न करे, उसका भाव सदैव अकर्ता का रहता है.
15:05इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोकता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है.
15:15यह ऐसा है जैसे सूर्य संसार को प्रकाशित करता है, पर स्वयं प्रकाशमान होने का अहंकार नहीं करता, या नदी
15:24बहती है, पर स्वयं को बहाने वाली नहीं मानती.
15:28इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोकता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
15:37करमों के प्रवाह में वह ऐसे बहता है, जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी उससे अलिप्त रहता है,
15:44स्वयं को केवल एक माध्यम मात्र जानता है
15:48इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
15:58आगे बढ़ते हुए विश्णों ने अभोगता भाव का रहस्य उद्घाटित किया जहां व्यक्ति कर्मों के फल को भोगने वाला भी
16:06नहीं होता केवल साक्षी मात्र रहता है
16:10इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
16:20विश्णों ने समझाया वह फलों को देखता है उनका अनुभव करता है किन्तु स्वयन को उनका भोगता मानकर उनमें लिप्त
16:28नहीं होता
16:29जैसे दरपन प्रतिबिम्बों को धारन करता है किन्तु उनसे प्रभावित नहीं होता
16:35इस पावन प्रसंद में अकरता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
16:44चाहे सुख हो या दुखक, लाब हो या हानी वह तटस्थ भाव से सब कुछ ग्रहन करता है क्योंकि जानता
16:52है कि ये सब क्षण भंगुर हैं और आत्मा से परे हैं
16:57इस पावन प्रसंद में अकरता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
17:06यह भाव ऐसे है जैसे एक नाटककार अपने ही लिखे नाटक के पात्रों को मंच पर अभिनय करते देखता है
17:14पर स्वया उनके सुख दुख में लिप्त नहीं होता
17:18इस पावन प्रसंद में अकरता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
17:28विष्णू ने समझाया कि इस परम अवस्था में यह प्रकृती के त्रिगुन सत्व प्रजस तमस ही है जो आपस में
17:35क्रिया कर रहे हैं जीवन की लीला रच रहे हैं
17:39इस पावन प्रसंद में अकरता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
17:49यह गुन ही गुनों में बरत रहे हैं विश्णों ने अपने स्वर को और गहरा करते हुए कहा जीव नहीं
17:56बलकि उसकी प्रकृती ही कर्मों में सनलगन है और वह केवल एक निश्क्रिय साक्षी है
18:03इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
18:12यह ऐसा है जैसे हवा चलती है बादल गरचते हैं नदिया बहती हैं यह सब प्रकृती की अपनी क्रियाएं हैं
18:21जिन में आत्मा का कोई सीधा हस्तक शेप नहीं होता
18:25इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
18:35यह संसार एक भव्य लीला है जहां गुनों का खेल निरंतर चलता रहता है और आत्मा उस खेल की केवल
18:43एक शांत शाश्वत दर्शक है
18:46इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
18:55जो इस सत्य को जान लेता है वह कर्मों के बंधन से मुक्थ हो जाता है क्योंकि न वह करता
19:02है न भोगता और नहीं गुनों के प्रभाव में आने वाला
19:07इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
19:16गरूर का हृदय अब इस ज्ञान से पूरी तरह प्रकाशित हो चुका था, उनका मन स्थिर और निश्चल ब्रहमाण के
19:24सबसे गहरे रहसियों से एक हो गया था
19:27इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
19:37उन्होंने अनुभव किया कि उनकी अपनी चेतना अब उस परम साक्षी भाव में विलीन हो चुकी है, जहां केवल अवलोकन
19:45है, कोई सनलगनता नहीं, कोई अहंकार नहीं
19:49इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
19:59उसक्षन गरुड ने स्वयं को ब्रहमांड के प्रत्येक कण में महसूस किया, हर जीव में स्वयं को देखा और परम
20:06ब्रहमा के साथ एकात्मता का अनुभव किया
20:10इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
20:19विष्णू ने प्रेम से गरुड पर हाथ रखा, उनके स्पर्ष से एक शांत उर्जा पूरे वातावर्ण में फैल गई, जो
20:27मोक्ष की अन्तिम मुहर थी
20:29इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
20:39इस प्रकार अकर्ता और अभोक्ता के ज्ञान के साथ गरुड ने समझा की कैसे कर्म करते हुए भी व्यक्ति उनसे
20:46अलिप्त रह सकता है और अंतर जन्ममृत्यु के चक्र से मुक्ती पा सकता है
20:53इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
21:02यह ज्यान केवल शब्दों में नहीं, बलकि स्वया अस्तित्व की गहराई में समा गया था एक शाश्वत सत्य के रूप
21:10में जो सदैफ प्रकाश मान रहेगा
21:13इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
21:22और इस प्रकार गरुर पुराण के गहनतम रहसियों में से एक मोक्ष का मार्ग भगवान विश्णु द्वारा गरुर के लिए
21:30पूरी तरह से उद्धाटित हो चुका था
21:33इस पावन प्रसंद में अकर्ता और अभोगता भाव कर्म करते हुए भी अलिप्त की महिमा का वर्णन किया गया है
21:43भगवान विश्णु ने आगे समझाते हुए कहा कि आत्म ज्यान की पराकाश्था पर पहुँचा ज्यानी पुरुष जगत के हर प्राणी
21:51में एक ही अविनाशी ब्रह्मा का दर्शन करता है
21:55उनके लिए विद्वान ब्राह्मन और गाय में, हाथी और कुट्टे में, अथवा चांडाल में कोई भेद नहीं होता क्योंकि वे
22:03सभी देहों के भीतर एक ही चैतन्य शक्ती को पहचानते हैं
22:09यह संदर्शिता का सिध्धान थी वास्तविक ज्यान की नीम्व है, जो मन को बाहरी द्वेश और मोह से मुक्त कर
22:16परम शांती की ओर अग्रसर करता है
22:19गरुर ने भगवान की इस अध्वितिय व्याख्या को हरिदय में धारण किया, जहां प्रत्येक जीव ब्रहमा का ही अंश्प्रतीत होता
22:27था
22:29विश्णु ने बताया कि यह द्रिष्टी केवल आखों से नहीं, अपितु आत्मिक चेतना से प्राप्थ होती है, जो सतत ध्यान
22:36और निस्वार्थ कर्मों से प्रखर होती है
22:40जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सभी पर समान रूप से पढ़ता है, उसी प्रकार ब्रहमा की उर्जा सभी प्राणियों में
22:48बिना किसी भेदभाव के प्रवाहित होती है
22:52इस संभाव को प्राप्ट करने वाला ज्यानी न किसी से घ्रेना करता है और न किसी से इर्शा क्योंकि वह
22:59जानता है कि सब उसी एक परमसत्ता के विविध रूप है
23:04यह संदर्शिता ही उसे जीवन के सुख दुख, मानअपमान और जैपराजय से उपर उठाकर एक स्थिर और शांत अवस्था में
23:13स्थापित करती है
23:15भगवान ने कहा हे गरुर्थ जो इस संदर्शिता को जीवन में उतार लेता है वह इस संसार के मायाजाल से
23:23स्वय ही मुक्थ हो जाता है
23:26उसे न तो किसी का भय सताता है और नहीं कोई लालच विचलित करता है क्योंकि वह अपनी आत्मा को
23:33ब्रहमा से अभिन मानता है
23:36ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी अकरता रहता है और फल भोगता हुआ भी अभोगता रहता है क्योंकि उसकी चेतना
23:45सदा ब्रहमा में लीन रहती है
23:48यह अवस्था उसे जन्ममर्ण के चक्र से मुक्ती दिलाकर परम मोक्ष की प्राप्ती कराती है जहां केवल अनंध शान्ती और
23:56आनंद है
23:58गरुड ने पूछा हे प्रभु इस सम्दर्शिता को धारन करने में क्या कोई बाधा उत्पन होती है
24:06भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया हाँ हे गरुड अग्यान अहंकार और आसकती ही मुख्य बाधाएं हैं
24:14जो इस दिव्यद रिष्टी को धुंधला करती है
24:18जब तक प्राणी स्वयन को शरीर मानता है और बाहरी भेदों में उल्जा रहता है तब तक वह आंतरिक एकता
24:26को नहीं देख पाता
24:28इन बाधाओं को पार करने के लिए सतत अभ्यास, सत्संग और गुरु कृपा अत्यंत आवशक हैं जो आत्म ज्ञान के
24:36पत को आलोकित करते हैं
24:39इस प्रकार भगवान विश्णू ने समदर्शिता के गहन सिध्धान्त को गरुड के समक्ष स्पष्ट किया जिससे मोक्ष का मार्ग और
24:47भी सुगम प्रतीत होने लगा
24:50गरुड ने अनुभव किया कि यह ज्ञान केवल सुनना नहीं, अपितु जीवन में उतारना है, जिससे हर क्रिया एक यज्य
24:58बन जाती है
25:00यह परम लीला संसार में रहकर भी संसार से परे रहने का मार्ग है, जहां हर सास, हर पल ब्रहमा
25:07चेतना से उत्परोथ होता है
25:10और इस प्रकार गरुड पुरान के त्रिगुनों से परे अध्याय में समदर्शिता का सिध्धान्त मोक्ष की अंतिम सीधी के रूप
25:18में प्रकट हुआ
25:20भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यवानी में समझाया कि समदर्शिता का वास्तविक सार केवल बाहरी भेदभावों को मिटाना नहीं, अपितु आत्मा
25:29को राग और ग्वेश के सुक्ष्म बंधनों से पूर्णत मुक्त करना है
25:34गरुड जिनके विशाल पंखों की स्वर्णेम आभा विश्णु के तेज से प्रतिध्वनित हो रही थी, अत्यंत एका ग्रचित होकर उस
25:42परम ज्यान को ग्रहें कर रहे थे, जैसे कोई प्यासा यात्री अम्रित पान कर रहा हो
25:49विश्णु ने समझाया कि संसार की हर वस्तु और परिस्थिती मात्र एक क्षणभंगुर नाटक का हिस्सा है, एक मायावी लीला,
25:57जिसमें किसी भी चीज की स्थिर्ता की आशा करना व्यर्थ है
26:02इस क्षणभंगुर्ता को स्वीकारने से ही इच्छाओं और भय के वे अद्रिश्य बंधन तूटने लगते हैं, जो आत्मा को अनंतकाल
26:10से सांसारिक दुखों से बांधे हुए हैं
26:14विष्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ कहा कि राग वह अगनी है जो किसी वस्तु की कामना से प्रजवलित
26:22होती है और आत्मा को उसके मुहपाश में बांध लेती है
26:27गरुर के मुख पर एक गहरी समझ की चाया उत्री, क्योंकि उन्होंने स्वयन को भी कई बार इस सुक्ष्म बंधन
26:35में उलजा हुआ अनुभव किया था
26:38उन्होंने समझाया कि यह राग सुख की लालसा से जन्म लेता है जिससे व्यक्तिक शनिक आनंद के लिए निरंतर संसार
26:46के पीछे भागता रहता है
26:49और इस लालसा की पूर्ती न होने पर क्रोध, दुहक और मोह का चक्र आत्मा को और भी गहराई से
26:55जकड लेता है
26:58फिर विष्णू ने द्वेश की प्रकृती का वर्णन किया, जो अंचाही वस्तुओं या परिस्थितियों से उत्पन होने वाली घ्रेना की
27:05काली चाया है, जो आत्मा की शांती को निगल जाती है
27:11गरुर के चहरे पर गंभीरता और चिंतन के भाव उभरे, क्योंकि उन्होंने अपने कर्तवियों के निर्वेहन में कई बार विरोधियों
27:19के प्रती द्वेश की भावना का सामना किया था
27:23विष्णू ने समझाया कि यह द्वेश अप्रिय अनुभवों से बचने की प्रबल इच्छा से जन्म लेता है, जिससे व्यक्ती निरंतर
27:30नकारात्मक्ता और प्रतिरोध में जीता रहता है
27:35और यह प्रतिरोध ही आत्मा को कटुता और अशान्ती के दुष्चक्र में धकेल देता है, जहां शान्ती कभी स्थाई नहीं
27:43रह पाती
27:44तब भगवान विश्णु ने परम ज्ञान का रहस्योद घाटन किया, इन दोनों बंधनों से मुक्ती का मार्ग केवल वस्तुओं की
27:52क्षनभंगुर प्रकृती को पूर्ण रूप से आत्मसात करना है
27:57गरुर के नेत्रों में एक नई चमक उभी, जैसे किसी गहन रात्री के बाद सुर्योदय हो गया हो और उनके
28:04रोम रोम में यह ज्ञान घुलने लगा
28:08उन्होंने बताया कि जब व्यक्ती हर अनुभव को, चाहे वह सुखद हो या दुखद, एक बहती हुई नदी की तरह
28:15देखता है, जो बस गुजर जाती है, तब राग और द्वेश की पकड़ धीली पड़ने लगती है
28:22यह परम ज्ञान आत्मा को भय और इच्छाओं के बंधनों से पूर्ण आंतरिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, जिससे उसकी शांती
28:30कभी भंग नहीं हो सकती
28:33विश्णू ने अंतिम रूप से बताया कि एक स्थित प्रग्य वह है, जो इस सत्य में स्थिर होकर संसार की
28:40हर लीला में साक्षी भाव से रहता है, बिना प्रभावित हुए
28:45गरुर ने श्रद्धा पूर्वक अपना मस्तक जुकाया, उनके हृदय में अब परम शांती और स्वतंत्रता का अनुभव हो रहा था,
28:53जैसे उन्होंने जन्म जन्मांतर के भार को उतार फेंका हो
28:58भगवान विश्णु का मुख मंडल दिव्य आभासे प्रकाशित था, उनके नेत्रों में अनंत ब्रह्मांडों का शांत प्रतिबिंब था, जो उस
29:06परम सक्त्य की गहराई को दर्शाता था
29:10और इस प्रकार गरूर पुरान के त्रिगुनों से परे अध्याय में, रागदवेश से मुक्ती का यह सिध्धान्त आत्मा की परम
29:17आंतरिक स्वतंत्रता का मार्ग बन गया
29:21भगवान विश्णु ने अपनी मधुरवानी में गरूर को संबोधित किया, हे गरूर यह रागदवेश से मुक्ती ही निश्काम कर्म का
29:29आधार है, जो तुम्हें मोक्ष की ओर ले जाता है
29:34गरूर ने उच्शुकता पूर्वक पूछा, हे प्रभू, कृपा करके मुझे निश्काम कर्म का वास्तविक अर्थ और उसका अभ्यास कैसे किया
29:42जाए, यह समझाए
29:45भगवान विश्नु ने समझाया कि कर्मों के फल की इच्शा का त्याग करना ही निश्काम कर्म का मूल है, जहां
29:51कर्म केवल कर्तव्य के रूप में किया जाता है
29:56उनके शब्दों से एक दिव्य उर्जा प्रवाहित हुई, जिसने गरुड के मन में कर्म और उसके बंधन के प्रती एक
30:03नई समझ जगाई
30:05उन्होंने उदाहरन देते हुए कहा कि सूर्य बिना किसी फल की इच्शा के निरंतर प्रकाश देता है, यही निश्काम कर्म
30:13का सर्वोच्च आदर्श है
30:16गरुड ने भगवान के मुख से निकली प्रत्येक बात को अपने हृदय में उतारा, उनके मन में अब कोई संशय
30:23नहीं था
30:25भगवान विश्णु ने आगे कहा, जो व्यक्ति फल की आसक्ती के बिना कर्म करता है, वह कमल के पत्ते पर
30:32पानी की बूंद की तरह है, जो जल में रहकर भी उससे अप्रभावित रहता है
30:38यह द्रिश्टांत गरूर के लिए अत्यंत बोध गमय था, जिसने उन्हें कर्म के वास्तविक स्वरूप को गहराई से समझने में
30:46मदद की
30:48ऐसा स्थित प्रग्य पुरुष समाज और लोग कल्यान के लिए निरंतर कर्म करता है, भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य आभा
30:56के साथ कहा, बिना किसी प्रशंसा या व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा के
31:01गरुड ने अनुभव किया कि यह केवल कर्म का त्याग नहीं, बलकि कर्म करते हुए भी उसके फलों से अनासक्ति
31:09का मार्ग है
31:11भगवान विश्णु ने अपने दाहिने हाथ को उपर उठा कर एक आशिरवाद मुद्रा में कहा, यह निश्काम भावी व्यक्ति को
31:19कर्म बंधन से मुक्त कर उसके चित्त को निर्मल बनाता है
31:24उस आशिरवाद से गरूर के भीतर एक अध्भुत शान्ती और पवित्रता का संचार हुआ, जैसे उनका संपून अस्तित्व शुद्ध हो
31:33गया हो
31:35भगवान विश्णू ने समझाया कि प्रत्येक कर्म एक बीज की तरह है, जिसके फल आसकती से अंकुरित होते हैं, निश्काम
31:43भाव इस चक्र को तोर देता है
31:46गरुर ने सिर जुकाया, उनके मन में अब कर्मों के फल की चिन्ता के स्थान पर कर्म करने की शुद्ध
31:53प्रेणा थी
31:54जब मन कर्म फल के लाभानी से उपर उठ जाता है, भगवान विश्णू ने कहा, तभी वह परमशान्ती और आत्म
32:02ज्ञान को प्राप्त करता है
32:05गरुर ने अनुभव किया कि यह ज्ञान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उनके रोमरोम में समा गया था, उनके भीतर
32:13परम स्वतंत्रता का अनुभव हो रहा था
32:17भगवान विश्णू ने अपनी अन्तिम बात कहते हुए कहा, कर्म करो, पर कर्मों के करतापन का अहंकार छोड़ दो, क्योंकि
32:24तुम केवल एक माध्यम हो
32:27गरूर ने अनुभव किया, कि वह स्वय भी उसी विराट चेतना का एक छोटा सा अंश है, जो इस ब्रहमांड
32:35में प्रतेक कर्म का संचालन करती है
32:39उन्होंने गरूर को बताया कि यह ज्यान ही आत्मसाक्षातकार का परमद्वार है, जहां मैं और तुम का भेद मिख जाता
32:46है
32:48और इस प्रकार निशकान कर्म का यह दिव्यग्यान गरूर के लिए मोक्ष की सीधी बन गया, जिसने उन्हें अहमकार और
32:56कर्मबंधन के चक्र से सदैव के लिए मुक्त कर दिया
33:00इस आत्मज्यान के प्रकाश में गरुर ने अनुभव किया कि अहंकार की सभी परतें पिघल गई हैं और उनकी चेतना
33:08ब्रहमांडिय प्रेम के महासागर में विलीन हो गई है
33:13भगवान विश्णु जिनकी मुखाकरिती पर अनंत करुणा और ज्यान की आभाथी गरुर की आंतरिक शांती को देखकर मंदमंद मुस्तुराएं
33:23गरुर ने अनुभव किया कि उनकी अपनी पहचान अब एक बून्द की तरह नहीं बलकि उस महासागर की तरह है
33:31जिसमें सभी बून्दे समाहित हैं
33:35अब उनके लिए संसार केवल एक परम लीला बन गया था जहां हर घटना परमाक्मा की इच्छा का एक अध्भुत
33:43प्रक्टी करण थी
33:45भगवान विश्णू ने आगे समझाया कि स्थित प्रग्य वही है जिसकी बुद्धि संसार के द्वंद्वों से विचलित नहीं होती
33:53वह न तो सुख में हर्शित होता है और न दुहक में विचलित क्योंकि वह जानता है कि सभी अनुभव
34:01क्षण भंगुर हैं विश्णू ने अपनी दिव्यवानी में कहा
34:05गरुर ने स्मरण किया कि कैसे अतीत में छोटी-छोटी इच्छाएं और भय उन्हें बांधे रखते थे जो अब तुछ
34:13प्रतीत हो रहे थे
34:15यह वह स्थिती थी जहां मन की चंचलता शांत हो जाती है जैसे प्रचंड तूफान के बाद समुद्र शांत हो
34:22जाता है
34:24विश्णू ने स्पष्ट किया कि स्थित प्रग्य संसार में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है जैसे कमल कीचड में
34:31रहकर भी निरलिप्त रहता है
34:34उसका प्रत्येक कर्म परमात्मा को समर्पित होता है बिना किसी फल की आशा के भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी गरूर
34:43पर केंद्रित करते हुए समझाया
34:46गरूर ने महसूस किया कि अब उन्हें कर्मों के परिणामों की चिन्ता नहीं रही क्योंकि उनका उद्देश केवल सत्य और
34:54धर्म की सेवा था
34:56यही परम योग की अवस्था है जहां आत्मा स्वय को अनंत ब्रह्मा से अभिन पाती है
35:03इस आंतरिक सामराज्य में बाहरी दुनिया की हलचले केवल एक दूरस्थ प्रतिध्वनी मात्र थी जो आत्मा की गहरी शांती को
35:12भंग नहीं कर पाती थी
35:15भगवान विश्णू ने गरूर को देखा जिनकी आखों में अब संसार के प्रति कोई भय या लालच नहीं था केवल
35:23एक गहरी स्थिर आत्म प्रसंता थी
35:26उन्होंने अनुभव किया कि उनकी अपनी चेतना अब किसी व्यक्ति विशेश की नहीं बलकि संपूर्ण ब्रहमांड की चेतना का एक
35:35अभिन्न अंग थी
35:37इस अवस्था में जीवन की हर चुनौती एक अवसर बन जाती है आत्मा के असीन धैर्य और ज्ञान को प्रकट
35:45करने का
35:46स्थित प्रग्य के लिए जन्म और मृत्यु केवल एक शाश्वत यात्रा के पड़ाव मात्र हैं जहां कोई वास्तविक अंत नहीं
35:54केवल निरंतर परिवर्तन है
35:58यही वह परमशान्ती है जिसे प्राप्त कर जीव सभी बंधनों से मुक्थ हो जाता है और अनंत काल के लिए
36:05परमात्मा में स्थित हो जाता है भगवान विश्णों ने अंतिम रूप से समझाया
36:11गरूर का हृदय अब असीम आनंद और कृतग्यता से भर गया था जैसे एक शुष्क भूमी वर्षा से त्रिप्थ हो
36:18जाती है
36:20और इस प्रकार स्थित प्रग्य की अवस्था में स्थित होकर गरूर ने न केवल मोक्ष प्राप्त किया बलकी स्वयन को
36:28एक परम साक्षी के रूप में अनुभव किया जो इस विराट लीला का एक अविचल दर्शक था
36:35भगवान विश्णू ने मंद मुस्कान के साथ गरूर की ओर देखा जिनके चहरे पर अब परम ज्ञान का एक अलौकिक
36:42तेज चमक रहा था
36:44फिर उन्होंने गंभीर स्वर में कहा ये गरूर यह ज्ञान केवल सैधान्तिक नहीं बलकी जीवन की परम व्याभारिक स्थिती है
36:54जो आत्मा इस ज्ञान को आत्म साथ कर लेती है, वह संसार में रहते हुए भी संसार से विरक्त रहती
37:02है, जैसे कमल कीचड में रहकर भी अचूता रहता है
37:06इस परमस्थिती को प्राप्त करने वाला जीव देह में रहते हुए भी देह से उपर उठकर साक्षी भाव में स्थित
37:14हो जाता है
37:16ऐसे मुक्त पुरुष की जीवनशैली बाहर से देखने पर साधारन मनुश्यों के लिए अबूज या विलक्षन लग सकती है
37:25वे कभी अपनी पहचान छिपाकर तो कभी असाधारन तरीके से व्यवहार करके संसार में विचरते हैं भगवान विश्णु ने समझाया
37:35उनका व्यवहार कभी कभी एक बालक जैसा निर्दोश, कभी एक पागल जैसा मुक्त और कभी एक महान रिशी जैसा गंभीर
37:44प्रतीत होता है
37:46वे सभी सामाजिक बंधनों, रितिरिवाजों और लोकलज्जा से परे होते हैं क्योंकि उन्हें आत्मा के अतरिक्त कुछ और सत्य नहीं
37:55लगता
37:56उनकी बाह्य क्रियाय भले ही विरोधा भासी लगें, परन्तु उनका अंतरंग सदैफ परमशांती और ब्रहमग्यान में स्थित रहता है
38:06गरुर ने अपनी आखें थोड़ी जुकाई, मानो उस गूड रहस्य को अपने भीतर आत्म साथ कर रहे हों, जिसकी व्याख्या
38:14स्वय भगवान कर रहे थे
38:17वे न तो किसी से प्रेम करते हैं और न किसी से घहिना, न किसी चीज को स्विकार करते हैं
38:24और न किसी को अस्विकार, वे बस साक्षी रहते हैं
38:28उनकी स्थिती उस निर्मल दर्पन के समान है जो सब कुछ दर्शाता है, परंतु स्वयं किसी भी प्रतिविम से प्रभावित
38:36नहीं होता
38:38ऐसे मुक्त पुरुष संसार में अद्रिश्य होकर भी अपनी उपस्थिती से पूरे ब्रहमांड को प्रकाशित करते हैं
38:47भगवान विश्णों की आखों में एक गहरा, रहस्य में प्रकाश चमक रहा था, जैसे वे अनंट काल के रहस्यों को
38:54देख रहे हो
38:56अपनी पहचान को छुपाना उनकी लीला का एक अंश है, ताकि वे बिना किसी अपेक्षा या पहचान के कर्म कर
39:04सकें
39:05कभी वे एक साधारन व्यप्ति के रूप में दिखते हैं, तो कभी एक राजसी वेशभूशा में, परंतु उनका अंतरात्मा सदैव
39:14ब्रहमा में लीन रहता है
39:17यही वह अवधूत स्थिती है, जहां जीव अहमकार के सभी आवरणों को त्याग कर अपनी शुद्ध चेतना में स्थित हो
39:25जाता है
39:27गरूर का हृदय अब इस नए ज्यान से प्रफुलित हो उठा, जैसे एक विशाल परवत पर सूर्योदय की पहली किरने
39:34पड़ती है
39:36अगले क्षण तुम ऐसे ही एक अवधूत के अवतार की कथा सुनोगे, जिसके जीवन की विलक्षनता तुम्हें परम सत्य का
39:44एक नया आयाम दिखाएगी
39:47इस प्रकार परम ज्यान की इस व्याभारिक व्याख्या ने अगले एपिसोड के लिए अवधूत अवतार की प्रिश्ठ भूमी तैयार कर
39:55दी

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