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Garuda Purana Episode 58 reveals the most mysterious and radical incarnation of Lord Vishnu—the Avadhuta Avatar (Lord Dattatreya). Discover how this ultimate master of non-duality shattered societal norms, overcame cosmic tests, and demonstrated the supreme state of absolute spiritual freedom. Watch to learn the secret of the 24 gurus and the roar of the Avadhuta Gita that can liberate any soul from the fear of death and rebirth. #GarudaPurana #AvadhutaAvatar #Dattatreya #Moksha #SpiritualAwakening #HinduMythology
Transcript
00:00वैकुंठ के परमपावन और प्रकाश्मान सामराज में, जहां चारों और दिव्य नीले रंकी उर्जा और सुनहरे कमल के महल सुशोभित
00:08हैं, वहां पक्षीराज गरुर अपने प्रभु के चर्णों में मस्तक जुकाए खड़े हैं.
00:15भगवान विश्नों के विहंगम रूप को निहारते हुए गरुर ने अपनी तीक्षन बुद्धी से जिग्यासा व्यक्त की की क्या प्रित्वी
00:22पर कभी कोई ऐसा प्राणी भी हुआ है, जिसने प्रकृती और समाज के सभी नियमों को पूरी तरह से तोड़
00:29कर परम मुक्ती क
00:30साक्षात अनुभव किया हो. गरुर की इस गंभीर और अदमय जिग्यासा को सुनकर, शीरसागर की शेश्षया पर विराजमान जगतपालक श्री
00:41हरी के मुखमंडल पर एक अत्यंत अलौकिक और रहस्य में मुस्कान तैर उठी.
00:47नारायन के हृदय से निकलने वाली दिव्य तरंगों ने वैकुंट के पूरे वातावर्ण को एक अलौकिक निरवता से भर दिया.
00:54मानो संपूर्ण ब्रहमान उस महान रहस्य को सुनने के लिए अपनी सांसे रोक चुका हो.
01:01भगवान विश्णु ने अपने शंक और चक्र से सुशोगित दिव्य हाथों को उपर उठाया, जिससे वैकुंट के आकाश में एक
01:09विशाल दिव्य जोतिर्मय चक्रवात उत्पन्न हो गया, जो प्रित्वी लोग के द्रिश्यों को प्रदर्शित करने लगा.
01:16श्री हरी ने गरुड की ओर देखते हुए अत्यंत गंभीर स्वर में कहा कि हे खगेश्वर प्रकृती के बंधनों से
01:23सर्वता परे, इस स्रिष्टी में एक ऐसा भी रूप है, जिसे संसार अवधूत के नाम से जानता है.
01:32वैकुंट के उस पावन मंच पर गरुड ने उचसुक्ता वश अपने विशाल सुनहरे पंखों को थोड़ा समेटा और भगवान के
01:39मुख से निकलने वाले एक-एक शब्द को अपने हरिदय में अंकित करने लगे.
01:45उसक्षन वैकुंट का वातावन इतना सघन और उर्जावान हो गया कि वहां उपस्थित हर एक पर्मानू से ओमकी ध्वनी गूंजने
01:54लगी, जो स्रिष्टी के आदिकाल की याद दिलाती थी.
01:58नारायन की आग्या से उस दिव्य उर्जा के चक्रवात के भीतर एक नया द्रिष्य प्रकट हुआ, जहां घने जंगलों और
02:06दुर्गम पर्वतों के बीच एक अलौकिक महापुरुष का तेज चमक रहा था.
02:11भगवान विश्णू ने स्पष्ट किया कि अवधूत वह परमचेतना है, जो न तो किसी वर्ण को मानती है, न किसी
02:19आश्रम को, और नहीं समाज के बनाएं किसी भी नियमकानून के अधीन होती है.
02:25गरुर ने विस्मय से भरकर पूछा कि है प्रभु, क्या कोई मनुष्य बिना किसी सामाजिक मर्यादा और वस्त्रों के भी
02:32इस प्रित्वी पर साक्षात इश्वर का रूप हो सकता है.
02:37गरुर के इस प्रश्ण के साथ ही, वैकुंठ के आकाश में चमकने वाली स्वर्णिम किरने तीवर होकर एक अध्भुत आकार
02:45लेने लगी, जो भौतिक शरीर से परे आत्मा की नगन सत्यता को दर्शाती थी.
02:51तब नारायन ने अपने परम अवतार दत्तात्रे के दिव्यस्वरूप का स्मरण किया, जो अत्री और अन्सुया के पुत्र के रूप
02:59में अवधूत मार्ग के प्रथम और सर्वोच आचार्य बने.
03:04मुस्कराते हुए प्रभू ने कहा कि अवधूत दत्तात्रे का रूप ऐसा है, जिसके समक्ष यमराज के दूद भी अपने पास
03:12और दंड छोड़कर भै से काम्प उठते हैं, क्योंकि वहां कोई पाप या पुन्यशेश नहीं रहता.
03:19भगवान विश्णू के संकेतों का अनुसर्ण करते हुए, गरुड ने उस दिव्य मानस्प्टल पर देखा जहां प्रकृती के सारे नियम
03:27एक परम्योगी के चर्णों में विलीन हो रहे थे.
03:31उस अलोकिक द्रिश में काल चक्र और पंचभूतों की सीमाएं तूटती हुई दिखाई दी, जिससे स्पष्ट था कि अवधूत के
03:39लिए समय और स्थान का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता.
03:43वैकुंट के विशाल और अनंत प्रांगण में, जहां दिव्य नदियां बहती हैं, वहां चारों और से देवता और गंधर्व भी
03:51इस परम्रहस्यमई ज्ञान को सुनने के लिए अद्रिश्य होकर एकत्रित होने लगे.
03:58नारायन ने गरूर से कहा कि अब वे उस कथा का विस्तार करेंगे, जिसमें स्वयन महाकाल के दूतों को भी
04:05एक अवधूत के महातेज के सामने नत्मस्तक होना पड़ा था.
04:10उत्सुकता की चरम सीमा पर पहुँचे गरूर ने अपने दोनों हाथों को जोड कर प्रभू के चर्णों की धूल को
04:16माथे से लगाया और कथा श्रवन के लिए पूर्णत है समर्पित हो गए.
04:21इस प्रकार वैकुंट के उस दिव्य और शांत वातावर्ण में गरूर पुराण के सबसे रहस्यमई और शक्तिशाली अवतार अवधूत के
04:30महातेज की गाथा का दिव्य शंकनाध हुआ.
04:34वैकुंठ के उस दिव्य और शांत वातावर्ण में भगवान नारायन ने गरुड से उस रहस्य में कथा का विस्तार करना
04:42आरंभ किया, जिसमें तीनों लोकों के स्वामी भी एक सती के पावन तब के सम्मुख विवश हो गए थे
04:49प्रभु ने कहा कि यह कथा देवर्शी नारत के तीनों लोकों में भ्रमन से आरंभ होती है, जब स्वयंब्रह्मा, विश्नु
04:57और महिश अपनी अपनी शक्तियों और श्रेश्थता पर गर्व करने लगे थे
05:02नारद मुनी ने अपनी वीना बजाते हुए तीनों लोकों में अनवरत विचर्ण किया और अपने चातुर्य पूर्ण ज्यान से देवताओं
05:10के मन में असीम अहंकार का सुक्ष्म बीज बोया, विशेशकर त्रिदेवों के हिरिदय में
05:17उनकी वागपटुता और सुक्ष्म प्रेना ने त्रिमूर्थी को इस विचार में डाल दिया कि तीनों देवों में कौन सबसे श्रिष्ट
05:25है और किसकी शक्ती तीनों लोकों में सर्वोप्री है
05:29इसी समय प्रित्वी पर एक अत्यंत पवित्र तपोवन में सती अनुसुया नामक एक परम तपस्विनी अपने पती महर्शी अत्री के
05:38साथ धर्म प्रायन जीवन व्यतीत कर रही थी, जिनकी अटल पावंता तीनों लोकों में विख्यात थी
05:46नारायन ने गरूर से कहा कि सती अनुसुया का पातिवरत धर्म इतना अटल और पवित्र था कि उनकी तपस्या और
05:54निष्ठा के सामने स्वयन तीनों लोक भी नत्मस्तक हो जाते थे
05:59देवर्शी नारद ने देवताओं को उकसाने के बाद माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के पास जाकर अनुसुया के पातिवरत और
06:08श्रेष्ठता का बखान किया, जिससे उनके मन में एक सुक्ष्म इर्ष्या उत्पन्न हुई
06:14तीनों देवियों ने अपने पतियों की प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित होकर ब्रह्मा, विश्नु और महेश को अनुसुया के पातिवरत की
06:22परीच्षा लेने के लिए प्रित्वी पर भेजने का आग्रह किया
06:27देवियों के आग्रह पर तीनों देव स्वयन साधारण भिक्षूओं का वेश धारण कर सती अनुसुया की पवित्र कुटिया की ओर
06:35चल पड़े उनके मन में एक गेहन और अनूठी परीक्षा का विचार था
06:41प्रभु नारायन ने कहा कि यह केवल सती अनुसुया के पातिवरत की परीक्षा नहीं थी बलकि स्वयन्त रिदेवों के अहंकार
06:49का भी परिमार्जन होने वाला था
06:52जब महरशी अतरी आश्रम में नहीं थे, तब वे तीनों भिख्षु अनुसुया की कुटिया के द्वार पर आये
06:59और उन्होंने उनसे भोजन की याचना की, पर उनकी शर्त अत्यंत विचित्र और अप्रत्याशित थी
07:06उन्होंने अनुसुया से कहा कि वे तभी भोजन ग्रहेन करेंगे जब वह उन्हें अपनी नग्न अवस्था में बिना वस्त्रों के
07:14परोसें जिससे सती अनुसुया एक क्षण के लिए पूर्णतह स्तब्ध और विचलित रह गई
07:20अनुसुया ने अपने मन में तुरंत संकल्प किया कि ये सामान्य भिक्षु नहीं हो सकते बल्कि यह किसी दिव्य शक्ती
07:28द्वारा ली जा रही उनकी पातिवरत की अगनिप्रीक्षा है
07:33नारायन ने मुस्कुराते हुए कहा कि अनुसुया ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से तुरंत पहचान लिया कि ये तीनों भिक्षु कोई
07:41और नहीं बल्कि स्वयम ब्रह्मा, विश्नु और महेश थे
07:45उन्होंने अपने पती के चरण धोकर उस पवित्र जल को अपने उपर छिड़का और अपने पातिवरत के बल पर मंत्रोग
07:53चारण करते हुए तीनों देवों को अबोध शिशुओं में परिवर्तित कर दिया
07:57शन भर में तीनों व्रिद्ध भिक्षु तीन छोटे अबोध शिशुओं में बदल गए जिनकी आखों में दिव्यतेस स्पष्ट जलक रहा
08:07था जो उनके वास्तविक स्वरूप का प्रमाण था
08:11अनुसुया ने उन तीनों शिशुओं को अपने हृदय से लगाया और उन्हें प्यार से अपनी गोध में लेकर स्तनपान कराया
08:18मानो वे स्वया उनकी अपनी संतान हो
08:22भगवान विश्णु ने बताया कि जब तीनों देवियों को अपने पतियों के बाल रूप में परिवर्तित होने का समाचार मिला
08:30तो वे अत्यंत व्याकुल होकर अनुसुया के पास पहुँची
08:34तीनों देवियों के आगरह पर और सती अनुसुया की प्रार्थना के फल्स्वरूप तीनों शिशु एक अध्वितिय शिशु में विलीन हो
08:42गए जो तीनों देवताओं का सन्युक्त अवतार था भगवान दत्तात्रे
08:48अवधूत दत्तात्रे तुरंथी एक पूर्ण ज्यानी बालक के रूप में प्रकट हुए जिनकी आखें ब्रहमांड के समस्तर हैसियों को समेटे
08:57हुए थी और उनका दिव्यतेश सूर्य से भी अधिक प्रकर था
09:02जैसे जैसे बालक दत्तात्रे बड़े होने लगे उन्होंने सांसारिक बंधनों, वस्त्रों और कर्मकांडों का पूर्ण त्याग कर दिया और आकाश
09:11को ही अपना परिधान बना लिया
09:14वैकुंठ लोक में विराजमान भगवान श्रीहरी विश्नु ने पक्षी राज गरूर को समझाया कि दत्तात्रे की यह दिगंबर अवस्था कोई
09:23अशिष्टता नहीं, बलकि पूर्ण वैराग्य की पराकाश था थी
09:28अपनी मुक्ती की धुन में लीन दत्तात्रे गंगा नदी के पवित्र तट पर मौन होकर बैठ गए, जहां चारों वेच
09:35चार कुत्तों के रूप में उनकी परिक्रमा कर रहे थे
09:39उनके इस सर्वता भिन्न और समाज विरोधी आचर्ण को देख कर रूडिवादी पंडित और शास्त्री अत्यंत क्रोधित और भ्रमित हो
09:47उठे
09:49उस शांत तपोवन का वातावर्ण विद्वानों के तीखे तरकों और शास्त्रार्थ की अट्थासों से गूंड उठा, जिससे वहां के पशुपक्षी
09:58भी भैभीत हो गए
10:00भगवान विश्णू ने गरूर से कहा कि जो अज्ञानी केवल बाहरी आवर्ण को सत्य मानते हैं, वे दत्तात्रे के भीतर
10:08बहने वाली ज्ञान की गंगा को कभी नहीं देख सकते
10:12अभीमानी पंडितों के मुख्य प्रवक्ता ने दत्तात्रे के सामने खड़े होकर हाथ में लिए शास्त्र को लहराते हुए उनके दिगंबर
10:20स्वरूप का घोर उफास उड़ाया
10:23लेकिन उस परमयोगी के मुख्मंडल पर फैला हुआ असीम और प्रशांत तेज उन सभी के क्रोध को निगलने लगा
10:32जैसे ही पंडितों ने अवधूत पर पत्थरों की वर्शा करने का प्रयास किया वैसे ही पूरा तपोवन एक अलोकिक दिव्य
10:39उर्जा के गुबार से घिर गया
10:42गरुर ने विस्मय से पूछा की है प्रभु क्या उन संसारी मनुष्यों के प्रहारों से उस बालयोगी को कोई पीडा
10:49नहीं हुई
10:51भगवान विश्नों ने उत्तर दिया कि जिसके लिए शरीर मात्र मिट्टी है उसे पत्थरों के प्रहार भला कैसे स्पर्ष कर
10:58सकते है
11:01शन भर में ही उन सभी विद्वानों के हाथ हवा में ही जड़ हो गए और उनकी वाक्षक्ती पूरी तरह
11:07से पंगु हो गई
11:10सारा वनक्षेत्र एक ऐसे मौन में डूब गया जहां केवल बहती हुई गंगा और पत्तों की सरसराहट का ही स्वर्षेश
11:18रह गया था
11:20भगवान विश्णू ने समझाया कि जब मनुष्य की बुध्धी परास्थ होती है तभी से सच्चे आध्यात्मिक ज्यान का उदे आरंभ
11:27होता है
11:29चेतना शून्य हो चुके पंडितों ने जब अपनी आंतरिक आखों से देखा तो उन्हें बालत दक्तात्रे के भीतर साक्षात त्रिदेवों
11:38के दर्शन हुए
11:40उनके अहंकार का अभेद्य दुर्ग धै गया और उनके हाथ स्वतह ही अवधूत के चर्णों में वंदना के लिए जुड़
11:47गये
11:49संपूर्ण गंगा तट अब दिव्य सुगंध और स्वर्ग से बरस्ते हुए कर्प वरिक्ष के पुष्पों से आच्छादित हो चुका था
11:57गरुर ने अत्यंत श्रद्धा से नमन करते हुए कहा कि दत्तात्रे महाराज की यह माया सचमुच अद्वितिय और चकित कर
12:05देने वाली है
12:07जब दत्तात्रे ने अपनी आखें खोली तो उनकी करुणामई द्रिष्टी मात्र से सभी संतों और पुरोहितों का मानसिक संताप तत्क्षन
12:16शान्थ हो गया
12:18इस प्रकार अवधूत दत्तात्रे ने सिद्ध किया कि जो स्वय को संपूर्ण ब्रहमांड में विलीन कर देता है उसे समाज
12:26का कोई भी नियम बांध नहीं सकता
12:29अपनी विजय यात्रा के दौरान महाराज यदू जब उस एकांट और निर्जन वन में पहुँचे तो उन्हें वहां एक अलोकिक
12:37दिव्य उर्जा का स्पंदन महसूस हुआ
12:40तभी राजा यदू ने देखा कि घने जुर्मुटों के बीच से एक अत्यंत तीवर और अलोकिक श्वेतस्वर्ण प्रकाश पुन्च बाहर
12:48निकल रहा है जिसे देख वे आश्चर्यचकित रह गए
12:53वहां भूमी पर धूल में लिपते हुए एक परमेहंस अवधूत बैठे थे जो बिना किसी सांसारिक साधन के एक अबोध
13:01बालक की तरह निश्चिन्थ होकर हस रहे थे
13:04जैसे ही अवधूत के दिव्यचर्णों का स्पर्ष उस बंजर भूमी से हुआ, वहां की सूखी पतिया तुरंत हरी हो उठीन
13:12और सुनहरे जंगली फूल खिलने लगे
13:16अवधूत की वह निश्चल और पवित्र हंसी पूरे वन में गूँच उठी, जिसने वहां की सदियों पुरानी खामोशी और अंधकार
13:24को एक जटके में मिटा दिया
13:27महाराज यदू अपने राजसी अहंकार को भूल कर अकेले ही उस महान योगी की ओर बढ़ने लगे, क्योंकि उनका मन
13:35इस अलोकिक आनंद का रहस्य जानने को आतुर था
13:39अचानक वह अवधूत कठोर भूमी पर लेट गए और संसार से पूरी तरह बेखबर होकर एक शव की भांती अत्यंत
13:47शांत और निश्चल मुद्रा में सो गए
13:50उनके सोते ही उनके शरीर से सहस्र सूरियों के समान एक अत्यंत दिव्य और प्रकर तेज निकला, जिसने पूरे वन
13:58को एक स्वर्णिम प्रकाश से भर दिया
14:01राजा यदू उस दिव्य तेज के घेरे के सामने ठिठक कर खड़े हो गए और उनकी आखें इस अभूत पूर्व
14:09आध्यात्मिक वैभव को देखकर फटी की फटी रह गई
14:13हृदय में उमडते हुए परम आदर भाव के साथ राजा ने अपने दोनों हाथ जोड लिये और अत्यंत संकोच तथा
14:21भक्ती के साथ आगे बढ़े
14:24जैसे ही राजा उनके समीप पहुँचे अवधूत ने अपनी आखें खोली जिन में समस्त ब्रह्मांड की अनंत करुणा और गेहन
14:32ज्यान का सागर उमड रहा था
14:34उस परम सिद्ध पुरुष के महातेज के प्रभाव से वन के हिंसक जीव भी अपनी शत्रुता भूल कर उनके समीप
14:42शांती पूर्वक आकर बैठ गए
14:45उस समय वह पूरा उजाड और भयानक जंगल किसी वैकुंठ धाम की भांती परम पावन और आनंदमई प्रतीत होने लगा
14:53था
14:54स्वयं को एक महान समराट मानने वाले राजा यदू ने बिना किसी संकोच के अपना मस्तक धूल में जुका कर
15:02अवधूत को साश्टान दंडवत प्रणाम किया
15:06महाराज ने कापते हाथों से अवधूत के चर्णों की पवित्र धूल को स्पर्श किया जिससे उनके हृदय का संताप पल
15:13भर में शान्थ होने लगा
15:16उनके इस समर्पन से एक स्वर्णिन प्रकाश की तरंग राजा के चारों और घूमने लगी जिसने उनके मन से बचे
15:23खुचे राजसी अहंकार को भी भस्म कर दिया
15:27उस समय वन का विशाल मंडप उपर से खुला दिखाई देने लगा जहां से अनन्थ आकाश गंगा का असीम नीला
15:34प्रकाश सीधे उस स्थान पर उतर रहा था
15:38अत्यंत विनम्रवानी में राजा यदू ने याचना की की है महायोगिन इस अत्यंत दरिद्रता और एकांत में भी आपके इस
15:46असीम सुख का रहस्य क्या है
15:49राजा की निश्चल जिग्यासा को देखकर अवधूत दत्तात्रे धीरे से उठकर बैठे और उनके मुख पर एक ऐसी करुणामई मुस्कान
15:58आई जो पूरे ब्रहमांड को शांत कर सकती थी
16:02उस घने जंगल के मध्य में गुरू और शिश्य का यह मिलन एक परम जोती पुंज में बदल गया जिसने
16:09मुक्ती के एक नए अध्याय की शुरुवात की
16:13अवधूत ने राजा यदू की ओर देखा और गंभीर वानी में कहा कि हे राजन मेरे ज्यान का स्रोत कोई
16:20शास्त्र नहीं बलकि इस चराचर प्रकृती में बिखरे हुए 24 गुप्ट गुरु है
16:27उन्होंने प्रित्वी को अपना पहला गुरु बताते हुए कहा कि जिस प्रकार लोग धर्ती को निरंतर चोट पहुचाते हैं फिर
16:35भी वह शांत रहकर सबका भरण पोशन करती है वैसे ही मनुष्य को धैर्यवान होना चाहिए
16:42वायू से मैंने सीखा की जैसे हवाहर सुगंध और दुर्गंध को स्पर्श करती है पर स्वयन निरलिप्त रहती है वैसे
16:50ही योगी को संसार के सुखदुख के बीच अनासक्त रहना चाहिए
16:55इस अनन्त आकाश को देखकर मुझे आभास हुआ कि आत्मा भी इस नभ की भानती सर्वव्यापी है जिसे संसार की
17:03कोई भी घटना या बादल स्पर्श नहीं कर सकता
17:07बहते हुए जल ने मुझे स्वच्छता और मधूर्ता का पाठ सिखाया जो बिना किसी भेदभाव के हर प्यासे की तृष्णा
17:15मिटा कर उसे पवित्र कर देता है
17:19अगनी देव को अपना गुरु मान कर मैंने समझा कि वे जिस भी वस्तु को स्पर्श करते हैं उसे भस्न
17:26कर स्वयंग पवित्र बने रहते हैं वैसे ही आत्म ज्यानी को कर्मों के फलों से मुक्त रहना चाहिए
17:33चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने से मैंने जाना की केवल शरीर ही जन्म और मृत्यू के चक्र से
17:40गुजरता है जबकी भीतर की आत्मा सदैफ पूर्णिमा की भांती पूर्ण रहती है
17:46जैसे सूर्य एक ही है परंतु विभिन जलपात्रों में उसके अनेक प्रतिविंद दिखाई देते हैं वैसे ही परमात्मा एक होने
17:55पर भी हर जीव के हरिदय में अलग प्रतीत होता है
18:00कपोत पक्षी के परिवार के प्रती मोह ने मुझे सिखाया कि सांसारिक बंधनों और अत्यधिक आसकती में बंध कर मनुष्य
18:08अन्ता विनाश के जाल में फंस जाता है
18:12अजगर से मैंने आलस्य का नहीं बलकि संतोष का पाठ सीखा जो बिना प्रयास किये केवल उसी भोजन को स्विकार
18:20करता है जो भाग्यवश उसके पास आजाता है
18:24समुद्र की भांती मनुष्य को अपने अन्तहकरण को इतना विशाल बनाना चाहिए कि इच्छाओं की नदिया कितनी भी वेग से
18:32आएं उसका सन्यम कभी भंग न हो
18:35पतंगे से मैंने यह वेराग्य सीखा की कैसे रूप और सौंदर्य के प्रती अंधा आकर्शन अंतह विनाशकारी सिध्ध होता है
18:44इसलिए वासनाओं से सदैव दूर रहना चाहिए
18:48मधुमक्षी से मैंने यह दिव्य सूत्र पाया की कैसे विभिन शास्त्रों से केवल सार तत्व को ग्रहन करना चाहिए ठीक
18:56वैसे ही जैसे वह फूलों को बिना हानी पहुँचाए रस निकाल लेती है
19:02मदमस्थ हाथी के स्पर्ष की लालसा के कारण गड़े में गिरने से मैंने समझा की क्षणिक शारिरिक सुख की इच्छा
19:09मनुष्य की स्वतंत्रता को पूर्णतह नश्ट कर देती है
19:14संगीत के प्रती आसक्त होकर बहेलिये के जाल में फंसने वाले हिरन से मैंने सीखा की करणप्रिय और भ्रामक शब्दों
19:22के जाल में कभी अपनी सुधबुध नहीं खोनी चाहिए
19:26कांटे में लगे मास के टुकडे के लोब में फंसने वाली मचली से मैंने जाना की स्वाद और जीब का
19:32असन्यम ही मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है
19:38पिंडला नामक गणिका की निराशा से मुझे यह ज्यान मिला की जब तक मनुष्य दूसरों से जूठी आशाएं रखता है
19:45तब तक वह दुखी रहता है आशा का त्याग ही परमशान्ती का मार्ध है
19:52अपनी धुन में मगनबान बनाने वाले से मैंने सीखा की जब लक्षे के प्रती एक आगरता चरम पर होती है
19:59तो बाहर का कोई भी कोलाहल या राजा की सेना भी ध्यान भंग नहीं कर सकती
20:05मकडी से मैंने यह परम रहस्य समझा की जैसे वह स्वय ही जाल बुनती है और उसे अपने भीतर समेट
20:12लेती है वैसे ही यह संपूर्ण संसार उस ब्रह्मा की लीला मात्र है
20:18इन 24 गुरुओं के माध्यम से प्राप्त इस परम ज्यान को सुनकर राजा यदू के हृदय का अज्यान समाप्थ हो
20:25गया और वे अवधूत के श्रीचर्णों में नत्मस्तक हो गए
20:30राजा यदू के प्रस्थान के पश्चात उस परम पावन वन में एक मरनासन्नम रिग अवधूत के समीप आकर हामफने लगा
20:38जिसका जीवनकाल समाप्थ हो रहा था
20:41भगवान विश्णों ने गरूर को प्रेमपूर्वक देखते हुए कहा कि जहां जीवनमुक्त योगी निवास करते हैं वहां काल की सीमाई
20:50भी स्वतही शिथिल हो जाती है
20:53अचानक उस शांत वन का वातावर्ण अत्यंत भयावह हो गया और यम्राज के भयंकर दूत काले बादलों की भांती वहां
21:01प्रकट होने लगे
21:03यम्दूतों के आते ही उनके शरीर से निकलने वाली तमस की काली छाया वन की पावन सात्विक उर्जा से टकरा
21:11कर छट पटाने लगी
21:13जैसे ही यम्दूतों ने उस मरनासन्न म्रिग के प्राण हरने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाए वे अवधूत के दिव्य
21:20आध्यात्मिक शेत्र में प्रविष्ठ हो गए
21:24व्रिक्ष के नीचे समाधिस्थ बैठे अवधूत के तेजोमय विग्रह से अचानक ब्रहमग्यान की ऐसी प्रखर रश्मिया फूट पड़ी जिन्होंने पूरे
21:33वन को आलोकित कर दिया
21:36यमदूतों के सेनाप्ती ने जैसे ही म्रिग की आत्मा को बांधने के लिए अपना कालपाश हवा में उच्छाला वह पाश
21:43हवा में ही ठिठक गया
21:44उस प्रखर प्रकाश की सीमा को स्पर्श करते ही यमदूतों को ऐसा प्रतीत हुआ मानों वे किसी धधकते हुए सूर्य
21:53के सम्मुखा खड़े हुए हो
21:55उस प्रम प्रकाश की उश्मा से यमदूतों के क्रूर और भयानक चहरे भय तथा व्याकुलता से विकृत होने लगे और
22:03वे पीछे हटने पर विवश हो गए
22:06वेकुंट में भगवान हरी ने गरुड को समझाया कि ब्रहम ज्यानी की उपस्थिती में मृत्यू का भय भी अपना अस्तित्व
22:14खो बैठता है
22:16यम के दूतों ने अपने जीवन में पहली बार ऐसी शक्ती का अनुभव किया था जो उनके भीतर के क्रोध
22:23और अहंकार को भस्म कर रही थी
22:26उनकी लोहे की भारी गदाएं और भयानक अस्त्रशस्त्र उस्तपोबल के स्पर्श मात्र से स्वर्ण धूल में परिवर्तित होकर बिखरने लगे
22:36भय से कापते हुए यमदूतों ने देखा कि उस अवधूत के चारों और न तो जन्म का कोई बंधन था
22:43और नहीं मृत्यू की कोई सत्ता
22:46दूतों के नेता ने अत्यंत त्रस्थ होकर अपने आराध्य देव यमराज का स्मरण किया क्योंकि उनका कालचक्र यहां पूरी तरह
22:55रुख चुका था
22:56तभी उस मृत्यू के शरीर से प्राण एक शांत और जोतित प्रकाशपुंच के रूप में बाहर निकले और अवधूत के
23:04चर्णों में बिलीन हो गए
23:06मृत्यू का जीवन्त प्रतीक बने यमदूतों के हृदय में इस द्रिश्य को देखकर अपूर्व शांती और भक्ती का उदे होने
23:14लगा जो उनके स्वभाव के सर्वथा विप्रीत था
23:18वे समझ गए कि जहां अदवैत ज्यान की पराकाश्था होती है वहां यमराज के नियमों का कोई प्रभाव नहीं चलता
23:27परम आनंद और शांती से सराबोर होकर उन यमदूतों ने मौन खड़े अवधूत के चर्णों में मस्तक जुकाया और धीरे
23:35-धीरे पीछे हटने लगे
23:37अवधूत ने अपनी समाधी से धीरे से आखें खोली जिन में संपूर्ण ब्रहमांड का अनंत सत्य और करुणा एक साथ
23:45जलक रही थी
23:47गरूर को यह दिव्य रहस्य समझाते हुए भगवान नारायन ने कहा कि ज्ञान की इस परम अवस्था को प्राप्त योगी
23:55साक्षाक ब्रहमा का ही स्वरूप होता है
23:59स्वर्गलोग के अधिपती देवराज इंद्र अवधूत दक्तात्रे के बढ़ते हुए तपोबल और उनके आध्यात्मिक तेज को देखकर अत्यंत भयभीत हो
24:08उठे
24:10अपने सिनहासन के छिन जाने की आशंका से व्याकुल होकर इंद्र ने अवधूत की एकागरता को भंग करने के लिए
24:18अपनी सबसे बड़ी मायावी शक्तियों को भेजने का निर्णय लिया
24:21इंद्र ने अपनी आज्यासे ब्रहमांड की अश्ट सिध्धियों और स्वर्ग की अत्यंत रूपवती अपसराओं को जागरित कर उन्हें अवधूत के
24:31तपोवन की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया
24:35स्वर्ग से विदालेकर वे आठोन सिध्धिया और रूपसी अपसराए सुनहरे बादलों के मार्ग से होती हुई प्रित्वी पर अवधूत के
24:43शांत आश्रम की ओर बढ़ने लगी
24:46गिर्नार के अत्यंत शांत और पवित्र तपोवन में जहां अवधूत दक्तात्रे समाधी में लीन थे अचानक स्वर्गिक सुगंध और अलौकिक
24:56संगीत गूंजने लगा
24:58शीर सागर से इस द्रिश्य को देखते हुए भगवान नारायन ने गरूर से कहा कि आज अवधूत की पूर्ण निश्काम
25:06अवस्था की परीक्षा का समया गया है
25:10अनिमा, महिमा और गरिमा जैसी अश्ट सिध्धियों ने अवधूत के चारों और सोने के परवतों और बहुमूल्य रत्नों की वर्षा
25:18कर माया का जाल बुन्ना प्रारंभ किया
25:21स्वर्ग की अपसराओं ने अत्यंत मधूर स्वर में गायन करते हुए और अपनी पायल की जंकार से उस निर्जन वन
25:28को गुंजायमान कर दिया
25:31अद्भूत लावन्य से युक्त अपसराएं अपनी कामुक मुद्राओं और सम्मोहक नृत्यों से अवधूत के मन को विचलित करने का अथक
25:39प्रयास करने लगी
25:41एक रूपसी अपसरा ने अत्यंत निकट जाकर अपनी मधोशकर देने वाली आखों से अवधूत के मुखमंडल को निहारा जिससे तीनों
25:50लोकों के रिशी भी विचलित हो सकते थे
25:53तभी अवधूत ने अपनी समाधी से अपनी आखे खोली, परंतु उनके नेत्रों में कोई वासना या क्रोध नहीं, बलकी केवल
26:02असीम शान्ती और मात्रिवत वादसल्य था
26:06जैसे ही अवधूत की दिव्यद्रिष्टी उन सोने के धेरों और बहुमूल्य रतनों पर पड़ी, वे सभी क्षण भर में सूखी
26:13घास और धूल के कणों में बदल गए
26:17संपूर्ण वनक्षेत्र अवधूत के महातेज से स्पंदित हो उठा, जिससे समस्त कामुक विचार और मायावी शक्तिया एक क्षण में शान्त
26:25और निश्प्रभावी हो गई
26:28अपनी सिध्धियों और सौंदर्य को धूल में मिलते देख, उन अपसराओं और सिध्धियों का मिथ्या अहंकार पूरी तरह चक्नाचूर हो
26:36गया
26:38लज्जा और भक्तिभाव से भर कर उन्होंने अपनी कामुक मुद्राओं को त्याग दिया और परम योगी अवधूत के चर्णों में
26:45साष्टांग दंडवत प्रणाम किया
26:48परम दयालू अवधूत ने अपने अभय हस्त को उठाकर उन सभी को आशिरवाद दिया जिससे उनके अंतहकरण की मलीनता सदा
26:57के लिए नश्ट हो गई
26:59स्वर्ग से इस चकित कर देने वाले द्रिश्य को देखकर देवराज इंद्र का मस्तक भी श्रद्धा और विस्मय से पूरी
27:07तरह जुक गया
27:09भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए गरूर को उपदेश दिया कि जिस ज्यानी को स्वय में ही त्रिप्ती मिल चुकी है
27:16उसके लिए त्रिलोकी का एश्वर्य भी तिनके समान है
27:21अपनी भूल का प्रायश्चित करने के लिए देवराज इंद्र स्वया अपने दिव्यवाहन एरावत से उतर कर अवधूत के चर्णों में
27:29प्रणाम करने प्रिथ्वी पर आए
27:31अश्ट सिध्धियों और इंद्र के परीच्षन से अप्रभावित अवधूत दत्तात्रे अपने आत्मस्वरूप में स्थित रहकर अनंत सूर्य की भांती चमकते
27:41रहे
27:42राजा यदू और देवराज इंद्र के समक्ष अवधूत दत्तात्रे ने अपनी देह को पंचम हाभूतों की कठोर्तम परीच्षाओं के अधीन
27:51करने का निश्चय किया ताकि वे शरीर की नश्वर्ता का परम सत्य प्रकट कर सकें
27:57शीरसागर में शेश्चया पर विराजमान भगवान विश्णु ने गरूर को समझाते हुए कहा कि ज्यानी पुरुष अपने शरीर को केवल
28:05एक वस्त्र की भांती देखता है जिसे सुख और दोहक्षू भी नहीं सकते
28:11अवधूत ने सुलकते हुए अंगारों के समीक बैठकर अपने पैरों को भीशन गर्मी में तपने दिया परन्तु उनके मुखमंडल पर
28:19स्थित दिव्य और शांत मुस्कान तनिक भी मलिन नहीं हुई
28:24जैसे तप्तस्वर्ण अपनी अशुद्धियों को त्याग कर अधिक चमकता है वैसे ही अवधूत का भौतिक शरीर अगनी के मध्य और
28:32अधिक तेजोमय होकर चमकने लगा
28:36तकपश्चात परवतों से बहने वाली बरफीली और प्रचंद हवाओं के बीच अवधूत ने निराहार रहकर अपनी तपस्या को एक नया
28:44और दुर्गम मार्ग दिया
28:47राजा यदू ने विस्मय और करुना से भरकर अवधूत के इस कठोर शरीर विसरजन के द्रिशे को देखा और उनकी
28:54आखों से ज्ञान के अश्रु बहने लगे
28:57जब एक विशैले सर्पने आकर अवधूत के शांत चर्णों में दंश मारा तब उस गरल का प्रभाव भी उनकी आत्मा
29:05की अनंत शांती को भंग न कर सका
29:09विश और अमरित दोनों ही उस परम ज्ञानी के लिए एक समान हो गए क्योंकि वे स्वयन को इस नश्वर
29:15काया से पूर्णत है प्रिथक देख रहे थे
29:19इसके बाद मुसलाधार वर्षा और गर्जना करते बादलों ने प्रिथवी को जल मगन कर दिया परन्तु अवधूत उसी शिला पर
29:27अडिक बने रहे
29:29भगवान विश्णों ने गरूर से कहा कि जैसे आकाश बादलों के आने जाने से लिप्त नहीं होता वैसे ही आत्मा
29:37इंद्रियों के कष्टों से कभी कलंकित नहीं होती
29:41अवधूत ने अपने शरीर पर रेंगने वाले अनेक कीट पतंगों और धूल को भी सहर्ष स्विकार किया
29:47मानों वे उनके लिए कोई रेश्मी वस्त्र हो
29:51यह देह मात्र पांच तत्वों का एक पिंजरा है और अवधूत ने सिद्ध कर दिया कि वे इस पिंजरे से
29:58मुक्त एक अनंत चैतन्य पक्षी है
30:02जब जंदली पशूओं के जुंड ने उस निर्जन वन में अवधूत को घेर लिया
30:07तब उनके महातेज के प्रभाव से वेहिंसक जीव भी पालतू पशूओं की भाती शान्त हो गए
30:14राजा यदू ने अवधूत के निकट आकर उनके चर्णों में साश्टान प्रणाम किया और उनके भीतर के असीम ब्रहमग्यान को
30:22आत्मसात करने की प्रार्थना की
30:25अवधूत ने अपना वर्देहस्त राजा यदू के मस्तक पर रखा जिससे राजा के भीतर का बचाखुचा देह भीमान भी कपूर
30:33की भाती जल कर भस्म हो गया
30:36उसक्षन राजा यदू को ब्रहमान की विशालता और अपनी सुक्ष्म भौतिक सत्ता का एक साथ साक्षात कार हुआ
30:44जहां केवल अह ब्रहमासमी का नाद गूज रहा था
30:48परीक्षा समाप्थ होने पर सारा आकाश दिव्य पुष्पों की वर्षा से भर गया और देवगणों ने अवधूत के इस अद्वितिय
30:56त्याग की जैजैकार की
30:59भगवान विश्णु ने गरूड की ओर देखते हुए कहा कि जो साधक देभाव से मुक्थ हो जाता है वह साक्षात
31:06मेरे ही स्वरूप को प्राप्थ करता है
31:10अवधूत दत्तात्रे ने अपने कमंडलू से पवित्र जल राजा यदू पर छिड़का जिससे उनके संपून अस्तित्व में एक शाश्वत शीतलता
31:19समा गई
31:20इस प्रकार अवधूत के महातेज ने सिद्ध कर दिया कि आत्मा अजर, अमर और सर्वव्यापी है जिसे संसार का कोई
31:29भी भौतिक कष्ट छूतक नहीं सकता
31:32अवधूत दक्तात्रे के मुख से निकले महामंत्रों की गूंच संपून वैकुंठ धाम के कनकन में एक दिव्य और अलोकिक स्पंदन
31:40उत्पन करने लगी
31:43भगवान विश्णु ने अपनी कमल जैसी आखों से गरुड की ओर देखा और गंभीर स्वर में अवधूत गीता के परम
31:50ज्ञान का उदघाटन किया
31:53अवधूत के दिव्य मुख से निकला वह अद्वैत शंकनाद संपूर्ण ब्रहमांड में सत्य के एक मात्र अविनाशी स्वरूप की घोशना
32:01करने लगा
32:03न मैं बद्ध हूँ न मैं मुक्त हूँ यह महा घोश गरुड के हरिदय में उठ रहे सभी संशों की
32:09जड़ों पर प्रहार करने लगा
32:12वैकुंट की दिव्य वायू भी थम गई और वहा स्थित सभी दिव्य कल्पवरिक्ष अद्वैत ज्यान के इस अपूर्व प्रवाह में
32:19शान्थ होकर जुप गए
32:22इस महा घ्यान को सुनते ही गरुड के दोनों पंक श्रद्धा से जुप गए और उनके नेत्रों से असीम आनंद
32:29के अश्रु बहने लगे
32:31अवधूत दक्तात्रे ने अपनी द्रिष्टी मात्र से राजा यदू के मन के सुक्ष्म विकारों और अज्यानता के अंतिम अवशेशों को
32:39भस्म कर दिया
32:41जैसे सूर्य के उदे होते ही अंधकार का अस्तित्व मिट जाता है वैसे ही आत्मा के सत्य से माया का
32:48आवर्ण छिन्नभिन हो गया
32:51संपूर्ण ब्रह्मांड में एक ऐसी शांती छा गई जहां स्रिष्टी के सभी चरचर जीव केवल अध्वैत के महासंगीत को सुनने
32:59लगे
33:01भगवान विश्णु ने मधुर मुस्कान के साथ कहा कि हे गरुड यह अवधूत अवस्थाही आत्मा का वास्तविक और नित्य स्वरूप
33:09है
33:11अध्वैत ज्यान की इस परम वर्षा से गरुड के मन में स्थित संशय का अंतिम बिंदू भी पूरी तरह वाश्पीकृत
33:18हो गया
33:19आत्मा को न कोई शस्त्र काट सकता है और नहीं मृत्यू छू सकती है यह अविनाशी सत्य एक दिव्य प्रकाश
33:27बनकर चमक उठा
33:29वैकुंट के पावन प्रांगण में चारों और केवल दिव्य अमरित रस की वर्षा होने लगी जिसने समस्त लोकों को त्रिप्ट
33:37कर दिया
33:38गरुड ने अपनी आखें खोली और उनके मुख से केवल ओम नमो नारायनाय का अनंत महामंत्र फूट पड़ा
33:47राजा यदु ने अवधूत दत्तात्रे के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया क्योंकि वे अब संसार के बंधनों से सर्वथा मुक्त
33:55हो चुके थे
33:57इस अद्वैत ज्ञान की महिमा से संपूर्ण संसार में सत्य ज्ञान और अनंत आनंद की एक नई तरंग प्रवाहित हो
34:04उठी
34:06वैकुंठ की अलौकिक वास्तुकला में इस ज्ञान के तेज से एक नई आभा उत्पन हो गई जो कोटी सूरियों से
34:13भी अधिक दीप्तिमान थी
34:16भगवान विश्णू ने गरूर को आशिरवात देते हुए कहा कि जो भी इस समवात को सुनेगा वह जन्ममर्ण के चक्र
34:24से मुक्त हो जाएगा
34:26गरूर ने भगवान नारायन के चरंटमलो का स्पर्श कर स्वयं को इस परम ज्ञान का पात्र बनाने के लिए आभार
34:33प्रकट किया
34:35इस प्रकार अवधूत गीता के इस दिव्य शंकनाग ने गरूर पुरान के सबसे रहस्य में अध्याय को सनातन ज्ञान के
34:43इतिहास में अमर कर दिया
34:46वैकुंट के दिव्य प्रांगण में चारों और परम शान्ती चा जाती है और संपून ब्रह्मान इस परम सत्य को जानने
34:53के लिए स्थब्ध रह जाता है
34:56भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए गरूर की ओर देखा और स्पष्ट किया कि अवधूत कोई अन्य नहीं बलकि स्वय नारायन
35:04का ही अनादी और अनन्त रूप है
35:08उसी क्षण भगवान श्रीहरी के हरिदय से एक दिव्य स्वर्ण जोती प्रस्पुटित होती है जिसमें अवधूत का स्वरूप समाहित होता
35:16हुआ दिखाई देता है
35:19द्वैत और अद्वैत का भ्रम सदा के लिए मिट जाता है और संपूर्ण स्रिष्टी केवल एक ही परमात्मा के महाप्रकाश
35:27से आलोकित हो उठती है
35:30वैकुंठ के स्वर्ण महल और दिव्य नदिया इस महान एकाकार की साक्षी बनती हैं जिससे चराचर जगत में एक अभूत
35:38पूर्व स्पंदन होने लगता है
35:42परमज्ञान के इस अध्भुत साक्षातकार को देखकर गरूर के नेत्रों में भक्ती और विस्मय के अश्रुच छलक आते हैं
35:50भगवान नारायन अपना अभय हस्त उठाते हैं और अवधूत की मायावी लीला को अपने भीतर समेट कर गरूर के संशों
35:58का अंत कर देते हैं
36:01एक परम पावन दिव्यकमल वैकुंट के मध्य में खिल उठता है जो जीवात्मा और परमात्मा के सनातन मिलन को दर्शाता
36:09है
36:11देवताओं और रिशियों का अदरिश्य समुदाए इस परम ज्यान की वर्शा को देखकर वैकुंट पर पुश्पवरिष्टी करने लगता है
36:21भगवान विश्णु समझाते हैं कि जब-जब संसार में अज्यान का अंधकार घनी भूत होता है तब-तब वे ही
36:28अवधूत बनकर भटके हुए जीवों का मार्ग प्रशस्त करते हैं
36:32इस असीम अनुकम्पा को पाकर गरूर भगवान नारायन के चरंकमलों में साश्टान प्रणाम करते हैं
36:41गरूर पुरान की यह दिव्य पुस्तक एक अलौकिक प्रकाश पुझ में तबदील हो जाती है जिसमें सृष्टी के सारे रहस्य
36:48अंकित हो जाते हैं
36:51वैकुंठ की दिव्य नदिया अब ज्ञान के प्रवाह से तरंगित होकर पूरे ब्रहमांड में शांती का शंकनात करने लगती हैं
37:00गरूर का हृदय अब पूर्णता शांत हो चुका है और उनके मन के समस्थ क्लेश इस महाज्यान की अगनी में
37:07भस्म हो गए हैं
37:10भगवान नारायन अपने वर्देहस्ट से गरूर के मस्तक का स्पर्श करते हैं जिससे उन्हें परम बोध की प्राप्ती होती है
37:19संपूर्ण आकाश में दिव्य ओम की ध्वनी गूंज उठती है जो इस ब्रहमांडिय समवाद की पूर्णता की घोशना करती है
37:28इस प्रकार वैकुंट का यह परम पावन द्रिश्य सनातन ज्यान के सबसे बड़े इतिहास के रूप में सदैव के लिए
37:36अंकित हो जाता है
37:39भगवान विश्णु गरूर को आग्या देते हैं कि वे इस परम रहस्य में ज्यान को मृत्यू लोग के कल्यान के
37:45लिए प्रचारित करें
37:47गरूर अपने विशाल और सुनहरे पंखों को फैला कर संपून ब्रहमांड में इस दिव्य संदेश को फैलाने के लिए उडान
37:55भरने को तैयार होते हैं
37:58अंतह अवधूत और नारायन का यह महातेज एक होकर परम ब्रहमा में लीन हो जाता है और केवल अनंत प्रकाश
38:06ही शेश रह जाता है

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