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Prepare to journey into the heart of ancient wisdom as we explore the intricate web of Vedic knowledge! 📜✨ Following Yajnavalkya's quest for the Shukla Yajurveda, this episode unravels the monumental efforts of Maharshi Vyasa and his dedicated disciples – Paila, Vaisampayana, Jaimini, and Sumantu. Discover how they meticulously divided and propagated the Rigveda, Yajurveda, Samaveda, and Atharvaveda into countless branches (Shakhas), ensuring the preservation of divine wisdom for eternity. Witness the profound tradition of guru-shishya (teacher-disciple) that safeguarded the Vedas through the ages. Don't miss this epic exploration of India's spiritual heritage! #VishnuPurana #Vedas #VedicKnowledge #MaharshiVyasa #GuruShishyaParampara #Rigveda #Yajurveda #Samaveda #Atharvaveda #AncientIndia #Hinduism #Mythology #SpiritualWisdom #VedicHistory #SanatanaDharma #IndianCulture #Knowledge #Sages #Puranas
Transcript
00:00महर्शी वैशम पायन के आश्रम का परित्याग करने के पश्चात, तेजस्वी याग्यवल्क्य ने अत्यंत कठोर तपस्या के द्वारा भगवान सूर्य
00:08देव को प्रसन्न करने का अटल संकल्प लिया.
00:12निर्मल प्रभात की प्रथम किर्णों के स्पर्ष के साथ, याग्यवल्क्य ने गंगा तट पर खड़े होकर आदित्य देव के समक्ष
00:20अपने निश्चल भक्ती भाव से परिपून प्रार्थना आरंभ की.
00:25याग्यवल्क्य की अनन्य भक्ती से द्रवी भूत होकर, जगत के चक्षु भगवान सूर्य देव अपने साथ दिव्याश्वों से जुते स्वन
00:33रथ पर आरूढ होकर आकाश मार्ग में प्रकट हुए.
00:37वैदिक ज्यान को प्रत्यक्ष रूप से प्रदान करने हेतु सूर्य देव ने वाजी अर्थात एक अलौकिक दिव्य अश्व का रूप
00:45धारण किया और ज्यान की स्वरलहरिया बिखेरना प्रारंभ किया.
00:50अंबर से उतरती हुई शुकल यजुर्वेद की प्रत्यक पावन रिचादिव्य प्रकाश पुन्च के रूप में याग्यवलक्य के निश्कलंख रिदय में
00:58सीधे समाहित होने लगी.
01:00अद्वितिय प्रामानिक्ता और शुद्धता से परिपून यह नवीन यजुर्वेद ज्यान सूर्यदेव की प्रत्यक्ष अनुकम्पा से ब्रहमांड में प्रथम बार ध्वनित
01:10हुआ.
01:11सूर्य भगवान के आशिर्वाद से परिपून होकर जब याग्यवलके तपस्या से उठे तो उनका शरीर साक्षात बालसूर्य के समान आलोकित
01:21हो रहा था.
01:23भगवान सूर्यदेव के वाजी रूप से प्रकट होने के कारण इस संपून यजुर्वेद परमपरा को वाजसनेई संहिता के पवित्र नाम
01:31से प्रसिधी प्राप्थ हुई.
01:32इस नूतन दिव्यग्यान की महत्ता को पहचान कर महर्शी कन्व याग्यवलके के प्रथम महान शिष्य बनकर उनके पावन आश्रम में
01:42पधारे.
01:44तत्पश्चात परम ज्यानी महर्शी माध्यन दिन ने भी याग्यवलक्य के चर्णों में शरण ली और इस अप्रतिन वेद शाखा का
01:51अध्ययन करने का संकल्प व्यक्त किया
01:54एक विशाल और प्राचीन वट्वरिक्ष की चाव में बैठ कर याग्यवलक्य अपने शिश्यों को शुकल यजुर्वेद के गूढ मंत्रों का
02:02शुद्ध उच्चारन सिखाने लगे
02:05महर्शी कण्व ने अपनी तीक्षन बुद्धी से शुकल यजुर्वेद को संकलित कर कण्व शाखा का निर्मान किया जिसने उत्तर भारत
02:13में वैदिक ज्यान का प्रसार किया
02:16दूसरी ओर्क महर्षी माध्यन दिन ने माध्यन दिन शाखा का व्यवस्थित संकलन किया, जो मध्यान काल के संध्याबंदन और यज्य
02:25अनुष्थानों का प्रमुख आधार बनी
02:27धीरे धीरे याग्यवलक्य के पंद्रह प्रमुक्षिशों ने पंद्रह विभिन वाजसनेई उक्षाखाओं की स्थापना करके गुरुशिष्य परंपरा की अमर धोजा फहराई
02:39कृष्ण यजुर्वेद जहां गध्य और पद्य का मिश्रित रूप था वहीं शुकल यजुर्वेद अपनी सुस्पष्टता और प्रिथक मंत्रबराहमन संरचना के
02:48कारण अत्यंत लोक्त्रिय हुआ
02:51त्रिभुवन के देवगण और स्वर्ग के अमर विशिमुनी आकाश मार्ग से इस ज्ञान की नई गंगा के अवतरण पर पुश्पवरिष्टी
02:59करने लगे
03:00महर्शी पराशर ने मैत्रे को बताया की कैसे याग्यवलक्य का स्वाभिमान और त्याग अंत्य संपूर्ण मानव जाती के लिए परम
03:09कल्यानकारी सिध्ध हुआ
03:11इसी दिव्य परमपरा के अंतरगत याग्यवलक्य ने शत्पत ब्राहमन जैसे विशाल एवं महान ग्रंथ का प्रणियन किया जो यग्यविधान का
03:20प्राण बना
03:20शुकल यजुर्वेद का सर्वोत क्रिष्ट मुकुटमनी ब्रहदारणियक उपनिशत बना जिसमें आत्मा और ब्रहमा के अद्वैत संबंध की सर्वोच दार्शनिक व्याख्या
03:31नहित है
03:33इस प्रकार सूर्य देव के अनुग्रह और याग्यवल्के के तपोबल से प्रादुर्भूत यह शुकल यजुर्वेद परंपरा आज भी सनातन धर्म
03:42की ज्यान चेतना को आलोकित कर रही है
03:46किन्तु याग्यवल्के के अनुपम प्रस्थान के उपरांत महर्शी वैशमपायन के आश्रम में जहां कभी समवेत कंठों से वेदमंत्र गूंचते थे
03:55एक गहन मौन और प्रतीक्षा का आवर्ण छा गया
03:59इस पावन प्रसंग में कृष्ण यजुर्वेत की चरक्षा खाए वैशमपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है
04:09वैशमपायन एक विशालकाय तेजस्वी पुरुष अपनी कुटिया में बैठे गहन विचार में मगन थे
04:15उनके मस्तिश्क में यग्यों की अगनी के समान ज्यान की ज्वाला प्रजवलित थी पर अब उसमें याग्यवल्क्य के विचों का
04:22धूम्र भी मिल गया था
04:24इस पावन प्रसंग में कृष्ण यजुर्वेद की चरक्षा खाए वैशमपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है
04:34उन्होंने अपने शेश शिश्यों को एकत्रिप किया और गंभीर वाणी में बोले की अब यह उनकी परम धर्म निश्था है
04:41कि वे कृष्ण यजुर्वेद की मूल परमपरा को अडिक बनाये रखें जिसे याग्यवल्क्य ने अस्वीकार कर दिया था
04:49इस पावन प्रसंग में कृष्ण यजुर्वेद की चरक्षा खाए वैशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है
04:59वैशंपायन के इन निश्थुर परंतु धर्म प्रायन शिश्यों को चरक कहा गया जो वेदों की शिक्षा को दूर-दूर तक
05:06फैलाने के लिए विख्यात हुए
05:08इस पावन प्रसंग में कृष्ण यजुर्वेद की चरक्षा खाए वैशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है
05:17महर्शी ने उन्हें आदेश दिया कि वे कृष्ण यजुर्वेद के गूड मंत्रों और ब्राह्मन ग्रंथों के जटिल विधानों का और
05:25भी गहनता से अध्ययन करें ताकि मूल ज्यान की पवित्रता अक्षुन बनी रहे
05:31इस पावन प्रसंद में कृष्ण यजुर्वेद की चरक्षा खाए वेशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है
05:40गुरु के आदेश पर इन तपस्वी शिश्यों ने स्वयन को कठोर तपस्या और अदमे अध्ययन में समर्पित कर दिया
05:48जिसका उद्देश्य वेद मंत्रों के प्रत्येक स्वर और अर्थ को हृद्यंगम करना था
05:53इस पावन प्रसंग में कृष्ण यजुर्वेद की चरक्षा खाए वैशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है
06:02उन्ही में से एक प्रमुक शिश्य आचार्यकट ने वेदों के गूढ रहसियों को जानने के लिए हिमालय की हिमशिकरों पर
06:10जाकर भीशन तपस्या की
06:12जहां प्रकृती की प्रचंडता ने उनके संकल्प को और भी द्रिड किया
06:17इस पावन प्रसंड में क्रिश्य यजुर्वेद की चरक्षा खाए वेशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है
06:26उनकी अथक साधना से प्रसंड होकर स्वयं ज्यान की देवी सरस्वती ने उन्हें दिव्य द्रिश्टी प्रदान की जिससे वे क्रिश्य
06:35यजुर्वेद की सुक्षम भेदों और अकल्पनिय गहराईयों को समझ सके
06:40इस पावन प्रसंड में क्रिश्य यजुर्वेद की चरक्षा खाए वेशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है
06:49इस दिव्य ज्यान से उत्प्रोत होकर ये तपस्वी चरक्ष कहलाए जिनका एक मात्र लक्ष उस गेहन वेद ज्यान को घर
06:57घर और जन्वरी से जन्वरी तक पहुचाना था
07:01इस पावन प्रसंद में कृष्ण यजुर्वेद की चरक्षा खाए वेशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है
07:10आचार्य कठ ने अपने अनुयाईयों के साथ मिलकर कृष्ण यजुर्वेद की एक विशिष्ट कट शाखा की स्थापना की जिसने यग्यों
07:18की जटिलताओं और ब्रहमग्यान के गूर्तम रहस्यों को एक नई दृष्टी से व्याख्यायत किया
07:25इस पावन प्रसंद में कृष्ण यजुर्वेद की चरक्षा खाए वैशंपायन के शिष्य की महिमा का वर्णन किया गया है
07:34कठोपनिशत जैसे अमूले ग्रंथों के माध्यम से आचार्य कठने मृत्यू और अमर्ता के गहन समवाद को समझाया
07:41जहां नचिकेता और यमराज का अलौकिक समवाद आत्मा की चिरंतन यात्रा का रहस्यों धाटन करता है
07:49इस पावन प्रसंद में कृष्ण यजुर्वेद की चरक शाखाए वैशंपायन के शिष्य की महिमा का वर्णन किया गया है
07:58इसी प्रकार आचार्य कपिष्ठल ने अपनी अध्वितिय अंतरग्रिष्टी से कृष्ण यजुर्वेद की कपिष्ठल शाखा का निर्मान किया, जिसने कर्मकांड और
08:08यग्यों के दार्शनिक पहलूँ पर विशेश बल दिया
08:12इस पावन प्रसंग में कृष्ण यजुर्वेद की चरक्षा खाए, वैशम पायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है।
08:42कृष्ण यजुर्वेद, जिसे तैत्तिरिय संहिता भी कहते हैं, अपनी अनूठी शैली के लिए प्रसिद्ध हुआ, जहां मंत्र, ग्राहमन और आरण्यक
08:51एक साथ गुन्थे हुए थे, जैसे गहरे जंगल में जीवन के विविधरूप।
09:11पवित्र ग्रंथों को ताड़ पत्रों पर लिखा, सुनिश्चित करते हुए कि वेदों का प्रत्येक शब्द अक्षोन रहे।
09:18इस पावन प्रसंग में कृष्ण यजुर्वेद की चरक शाखाए, वैशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है।
09:27इस प्रकार कठ और कपिष्थल शाखाओं के माध्यम से कृष्ण यजुर्वेद का ज्यान भारतवर्ष के कोने-कोने में फैल गया,
09:35जहां हर गाव और नगर में इसके स्वर गूंजने लगे।
09:39इस पावन प्रसंग में कृष्ण यजुर्वेद की चरक शाखाए, वैशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है।
10:09उनके अथक प्रयासों से कृष्ण यजुर्वेद की ये शाखाए केवल ग्रंथी नहीं रहीं, बलकि सनातन धर्म की आत्मा और अखंड
10:18परमपरा का जीवित प्रमान बन गई।
10:20इस पावन प्रसंद में कृष्ण यजुर्वेद की चरक शाखाए, वैशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है।
10:30इस प्रकार महर्शी वैशंपायन के इन अडिक शिश्यों ने ज्यान की उस अखंड धारा को सनरक्षित रखा, जिसे विख्टन के
10:38क्षणों में भी तूटने नहीं दिया गया।
10:41इस पावन प्रसंद में किरश्य यजुर्वेद की चरक शाखाए, वैशंपायन के शिश्य की महिमा का वर्णन किया गया है।
10:50और इस तरह चरक शिष्यों के अप्रतिम समर्पण ने सुनिश्चित किया कि कृष्ण यजुर्वेद की विराट शाखाए युगो-युगो तक
10:58मानव जाती को आत्म ज्यान और धर्म की राह दिखाती रहेंगी।
11:03इस पावन प्रसंद में कृष्ण यजुर्वेद की चरक शाखाए वैशंपायन के शिष्य की महिमा का वर्णन किया गया है।
11:35रिगवेद के अगाध मंत्रस्मुद्र को देखकर महरशी पैल ने विचार किया कि किस प्रकार इस दिव्य ज्यान को आगामी युगों
11:43के लिए अक्षोन रखा जाए।
12:02इंद्रप्रम्ती और बाशकल को बुलाकर इन दो शाखाओं का दायत्व सौपा।
12:08महरशी इंद्रप्रम्ती ने शाकल शाखा के गूड मंत्रों और पदपाठ का पूर्ण निष्ठा के साथ अध्ययन करके उसे अपने हृदय
12:16में धारण किया।
12:17वहीं दूसरी और मुनी बाशकल ने बाशकल शाखा की रिचाओं को कंठस्ट किया और इसके प्रचार प्रसार हेतु अपने आश्रम
12:26की स्थापना की।
12:28इंद्रप्रम्ती ने रिगवेद के इस पावन ज्यान को अपने सुलोग्य पुत्र और शिष्य मांडुके को स्थानांतरित किया, जिससे यह परंपरा
12:37वनशानुगत रूप से आगे बढ़ी।
12:39महर्शी मांडुके ने अत्यंत सावधान होकर मंत्रों के सस्वर उच्चारण और उदात्त अनुदात्त तथा स्वरित ध्वनियों की शुद्धता पर बल
12:49दिया।
12:51मांडुके के शिष्यों ने गुरुमुक से सुनकर रिगवेद के सूक्तों को इस प्रकार कंठस्ट किया कि एक मात्रा की भी
12:58त्रुटी संभव न रही।
13:00दूसरी और महर्शी बाशकल ने रिगवेद के व्यापक प्रसार हेतु अपनी बाशकल शाखा को चार उप्षाखाओं में विभक्त कर दिया।
13:09बाशकल मुनी ने अपने चार प्रमुक शिश्यों, बोध्य, अग्निमाठर, याग्यवल्क्य और पराशर को इन चार उप्षाखाओं का आधिपत्य सौपा।
13:19सघन तपोवन में ब्रहम मुहूर्थ के समय चारों शिश्यों की ओजस्वी वेदध्वनी से समस्त दिशाए गुंजायमान होने लगी।
13:28प्रत्येक शिश्य ने अपने अपने आश्रमों में सैकडों ब्रहमचारियों को एकत्रित करके रिगवेद के सुक्तों का निरंतर अभ्यास कराना आरंभ
13:38किया।
13:39इस अनवरत मौखिक परंपरा के कारण बिना किसी लिखित ग्रंथ के भी रिगवेद का एक-एक शब्द और स्वर पूर्णत
13:46सुरक्षित रहा।
13:48दूर से अपने शिश्यों और प्रशिश्यों द्वारा किये जा रहे इस महान वेदगान को देखकर महर्शी वेद व्यास का हृदय
13:56परम संतोष से भर गया।
13:58संध्याकाल में यज्यकुंडों से उठती पावन ज्वालाओं के बीच रिगवेद की रिचाओं का समवेथ स्वर आकाश को स्पर्श करने लगा।
14:07पैल द्वारा प्रारंभ की गई यह अमर शिश्य परमपरा एक विशाल वट्वरिक्ष की भानती पल्वित होकर संपून आर्यवर्त में पैल
14:16गई।
14:18महर्शी पराशर मैत्रे को समझाते हैं कि पैल और उनके शिश्यों के इसी तपने रिगवेद को कल्यक के प्रभाव से
14:25अचूता रखा है।
14:28और इस प्रकार महर्शी पैल की इस महान शिश्य परमपरा ने रिगवेद के ज्ञानदीप को युगो-युगो के लिए अमर
14:35और अमिट बना दिया।
14:37इसके पश्चात महर्शी इंद्रप्रमती ने रिगवेद के अपने विशेश भाग का गूर ज्यान अपने मेधावी पुत्र मांडुके को सहर्ष प्रदान
14:46किया।
14:46मांडुके ने उस दिव्यग्यान को आत्मसात करके मांडुके उप्शाखा की स्थापना की और अपने योग्य शिशों में उसका निरंतर विस्तार
14:56किया।
14:57दूसरी और महर्शी बाशकल ने रिगवेद के अन्यम मंत्रों का गेहन पुनरगठन करके उन्हें चार विशाल उपसंहिताओं में विभाजित कर
15:06दिया।
15:07महर्शी बाशकल ने ये चार समरिध उपसंहिताओं अपने चार निष्ठावान शिश्यों बोध्य, अगनिमाठर, पराशर और याग्यवलक्य को सौंप दी।
15:18महर्शी बोध्य ने अपने गुरु की आग्या शिरोधार्य कर अपनी शाखा के मंत्रों का अन्वरक जाप करते हुए उन्हें अमर
15:26बना दिया।
15:28अगनिमाठर ने अपनी विशिष्ट शिश्य परंपरा आरंभ की, जिससे रिग्वेट के पवित्र छंद आर्यवर्थ के कोने-कोने में गुंजायमान होने
15:36लगे।
15:38महर्शी पराशर के शिश्य पराशर ने अपनी प्रखर बुद्धी से बाशकल सहिता के गूढ रहसियों को अत्यंत सुलब और स्पष्ट
15:46रूप दिया।
15:48तेजपुंज याग्यवलक्य ने भी बाशकल शाखा के मंत्रों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त किया, जो आगे चलकर उनके महान आध्यात्मिक जीवन
15:57का आधार बना।
15:58इसके पश्चात महर्शी शाकल्य ने रिगवेद का सूक्ष्म विशलेशन कर शाकल संहिता को पाँच प्रसिद्ध उप्षाखाओं में वर्गी कृत किया।
16:08शाकल्य ने इन पाचों पावन शाकाओं का दायत्व अपने पाँच प्रिय शिश्यों मुदगल, गोलक, खली, मत्स्य और शैशिरे को सौपा।
16:18महर्शी मुदगल ने गंदा के पावन तट पर अपने शिश्यों को रिगवेद की शाकल शाखा के मंत्रों का स्वर्बध उच्चारन
16:26सिखाया।
16:27शैशिरे ने पदपाठ और क्रमपाठ की सुक्ष्म शुद्धता को सुरक्षित रखते हुए वेटसन रक्षन का एक नया स्वर्णिम अध्याय लिखा।
16:37महर्शी पराशर मैत्रे को बताते हैं कि कैसे इन असंख्य उक्षाखाओं ने रिगवेद को ज्यान के एक विशाल और अमर
16:45व्रिक्ष में परिवर्थित कर दिया।
16:47मांडू के और शाकल्य परंपराओं ने रिगवेद के उच्चारनात्मक सौंदर्य और ध्वन्यात्मक परिशुद्धता को युगो युगो के लिए अक्षुन रखा।
16:58रिगवेद की यह महान शाखा परंपरा एक अनूठे ज्यानवरिक्ष की भानती खिली, जिसकी प्रत्येक पत्ती में ब्रहमज्यान की रश्मिया विद्यमान
17:07थी।
17:08संपूर्ण आर्यवर्त के गुरुकुलों में रिगवेद के मंत्रों का गूंजता हुआ स्वर कल्यव के बढ़ते अंधकार को दूर भगाने लगा।
17:17शिश्यों के इस अन्वरत जप और कठोर तपस्या ने रिगवेद के एक-एक अक्षर को काल के क्रूर प्रभावों से
17:24पूर्णतह सुरक्षित कर दिया।
17:27इस दोरान युवा याध्यवलक्य का अलौकिक तपोबल और तीक्षन बुद्धी उन्हें एक भावी महान आध्यात्मिक क्रांती की ओर अग्रसर कर
17:36रही थी।
17:37महर्शी पराशर ने स्पष्ट किया कि यद्यपी रिगवेद की शाखाय अनेक बनी परंतु उन सब में नहित मूल सत्य सदा
17:45एक ही रहा।
17:47इस प्रकार रिगवेद की उप्षाखाओं का यह दिव्यप्रसार पूर्ण हुआ और अब यजुरवेद के विभाजन की अलौकिक गाथा का द्वार
17:56खुला।
17:57रिगवेद के उप्रांत ज्यान की परंगंगा को आगे बढ़ाते हुए महरशी व्यासने संगीत और मंत्रों के अद्भुत संगम सामवेद का
18:06दिव्यभार अपने तेजस्वी शिश्य जैमिनी को सौपा।
18:10महरशी जैमिनी ने उस दिव्य सामवेद को ग्रहन किया, जिसके स्वर ब्रहमांड की धड़कन और देवताओं के प्रिय गायन का
18:18आधार थे।
18:19जैमिनी ने सामवेद की अनंत गहराईयों में प्रवेश कर उसके मधूर स्वरों और जटिल मंत्रों का गहन मनन आरंभ किया।
18:28स्वर और राग की इस पावन धारा को सुरक्षित रखने के लिए जैमिनी ने अपने परम प्रिय पुत्र और शिश्य
18:36सुमन्तु को इस विद्या का ग्यान दिया।
18:39सुमन्तु ने अपने पिता के चर्णों में बैठ कर सामवेद के गुप्ट साथ स्वरों और उनके ब्रहमांडिय प्रभाव को भलीभानती
18:47समझा।
18:48इसके पश्चात जैमिनी ने अपने दूसरे अत्यंत मेधावी शिश्य सुकर्मन को सामवेद के गुढ रहसियों का समपादन सिखाया।
18:58सुकर्मन ने अपनी कुशागर बुद्धी से सामवेद के हजारों भजनों को कंठस्ट किया और उनके गायन की अद्भुत शैलिया विक्सित
19:06की।
19:07सामवेद की इस अलौकिक रागरागिनी से प्रभावित होकर वन के पशुपक्षी और यहां तक की विरिक्ष भी मौन होकर सुनने
19:16लगे।
19:17सुकर्मन की इस महान योग्यता को देख कर देवराज इंद्रभी स्वर्ग से उनके मधुर सामगान को सुनने के लिए लालायत
19:25हो उठे।
19:26अपनी इस विशाल विद्या को जनकल्यान के लिए सुकर्मन ने अपने दो महान शिश्यों पौशिन जी और हिरन्यनाभ को प्रदान
19:35किया।
19:36पौशिन जी ने सामवेद के मर्म को समझा और इसकी शाखाओं का विस्तार उत्तर दिशा के क्षेत्रों में करना प्रारंभ
19:44किया।
19:45उधर हिरन्यनाभ ने पूर्व और दक्षिन के राज्यों में जाकर राजाओं और प्रजा को सामवेद के दिव्य भजनों से परिचित
19:53कराया
19:53इन शिश्यों के प्रयास से सामवेद की सहसरों शाखाये बन गई जिससे संपूर्ण प्रिथवी वेदों की मधुर ध्वनी से गूंजगुठी
20:04इसके बाद कौथुम नामक रिशी ने सामवेद की कौथुमी शाखा की स्थापना की जो आज भी अपने शुद्ध स्वरुचारण के
20:12लिए विख्यात है
20:15दक्षिन के प्रांतों में जैमिनी की मूल परंपरा को जैमिनिय शाखा के रूप में संरक्षित किया गया जिसने संगीत के
20:22तत्वों को जीवित रखा
20:25स्वयं देवर्शी नारद ने भी जैमिनी की इस महान शिष्य परमपरा की प्रशनसा की और इसे संगीत का सर्वोच रूप
20:33घोशित किया
20:35महर्शी पराशर ने मैत्रे को समझाया कि सामवेद केवल शब्दों का समूह नहीं बलकि परमाक्मा से जुड़ने का मधुरनाद है
20:54शीर सागर में विश्राम कर रहे भगवान विश्नुभी सामवेद के इस मधुर गायन को सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने
21:03स्रिष्टी को आशिरवाद दिया
21:05इस प्रकार जैमिनी और उनके शिश्यों द्वारा रोपा गया सामवेद का यह व्रिक्ष आज भी अपनी अनंत शाखाओं के साथ
21:13संसार को गुंजाय मान कर रहा है
21:17सामवेद की दिव्य गूंज धीरे-धीरे ब्रहमांड के कंकं में समाहित हो रही थी जिसने रिशियों के हृदय में गेहन
21:24अध्ययन की तीवर लालसा जगा दी
21:28महर्शी जैमिनी ने महसूस किया कि सामवेद का यह अथा सागर इतना विशाल है कि उसे एक ही धारा में
21:35समेटना असंभव है आथ इसे संरक्षित करने के लिए अनेक मारगों की आवश्यक्ता थी
21:41इस महाकार्य को पूर्ण करने हेतू जैमिनी ने अपने सबसे प्रखर और श्रद्धावान शिश्यों को एकत्र किया जिनकी आखे ज्यान
21:51की पिपासा से चमक रही थी
21:54उनमें से एक सुकर्मन अपने अग्वितिय गायन और वेदों की गहरी समझ के लिए विख्यात था, जिसे जैमिनी ने सामवेद
22:03की गूड विद्या का उत्तराधिकारी चुना
22:06सुकर्मन ने सामवेद के प्रत्येक स्वर, प्रत्येक छंद और प्रत्येक मंत्र को अपनी आत्मा में उतारा, जिससे उसके गायन में
22:14एक अलोकिक शक्ती और मधुर्ता समाहित हो गई
22:19जैसे जैसे सुकर्मन ने सामवेद की गहराई को समझा, उसे यह स्पष्ट हो गया कि इस ज्ञान की विशालता को
22:26अकेले संभालना असंभव होगा और इसे कई उक्षाखाओं में बाटना ही एक मात्र उपाय है
22:34सुकर्मन ने अपने प्रियशिष्य हिरन्याब को बुलाया, जिसकी तीवर बुध्धी और सुक्ष्म श्रवन शक्ती सामवेद के रहसियों को उजागर करने
22:43के लिए अद्विती थी
22:46हिरन्याब ने सामवेद के उन विशिष्ट रागों पर ध्यान केंद्रित किया, जिनकी ध्वनी तरंगे गेहन ध्यान और आत्म ज्यान को
22:53बढ़ावा देने में अत्यंत प्रभावशाली थी
22:58तत्पश्चात सुकर्मन ने अपने दूसरे प्रतिभाशाली शिष्च पौश पंजी को आमंत्रित किया, जिसका कंट स्वयन देवराज इंद्र के गायन को
23:06भी मात देने में सक्षम था
23:08पौश पंजी ने सामवेद के उन मंत्रों पर अपनी विशेश प्रवीन्ता स्थापित की, जिनका उद्देश देवताओं को प्रसन्न करना और
23:18यग्यों में सकारात्मक उर्जा का संचार करना था
23:22हिरन्याभ की शाखा आंतरिक साधना पर केंद्रित थी, जबकि पौश पंजी ने बाह्य अनुष्ठानों और ब्रहमांडिय उर्जा के आहवान को
23:31अपनी साधना का केंद्र बनाया, जिससे दोनों में एक सुक्षम किन्तु महत्वपूर्ण अंतर स्थापित हुआ
23:38इस प्रकार सुकर्मन के मार्ग दर्शन में सामवेद की दो मुख्य धाराये हिरन्याभी और पौश पंजी विधिवत स्थापित हुई, जो
23:47ज्ञान के दो भिन्न किन्तु पूरक मार्ग थी
23:51हिरन्याभ के शिशों ने अपने गुरु के ज्ञान को और भी सुक्षमता से विभाजित किया, जिससे सामवेद की कौथुमिय शाखा
23:59का जन्म हुआ, जो अपने शुद्ध उच्चारन और विशिष्ट रागों के लिए प्रसिध हुई
24:05उधर पौशपंजी की परंपरा भी निरंतर पल्वित होती रही, जिसके परिणामस्वरू प्रानायनिय शाखा का उदे हुआ, जिसने सामवेद के गायन
24:14में विशिष्ट लय और अनुष्ठानों के महत्व को स्थापित किया
24:19स्वय महर्शी जैमिनी के प्रत्यक्ष शिशों ने भी अपनी एक स्वतंत्रधारा जैमिनी शाखा को जीवित रखा, जिसमें सामवेद के मूल
24:28स्वरूप और उसकी दार्शनिक व्याख्याओ पर विशेश बल दिया गया
24:33इस प्रकार ज्यान के विशाल व्रिक्ष से कौथुमिये, राणायनिये और जैमिनी नामक तीन प्रमुक शाखाय निकली, जिन में से प्रत्यक्ष
24:41ने सामवेद के विभिन पहलूओं को गहराई से आत्मसाथ किया
24:46प्रत्यक्ष शाखा ने अपने अद्वितिय रागों, मंत्रों और गायन शैलियों को अत्यंत सावधानी से वर्गी कृत और सनरक्षित किया, मानोवे
24:55दिव्यरक्नों के सनरक्षक हो
24:58इन विशिष्ट रागों में ब्रहमांड की गूड शक्तिया निहित थी, जो न केवल मन को शांती प्रदान करती थी, बलकि
25:06आत्मा को उच्छ लोकों तक ले जाने की ख्षमता भी रखती थी
25:11इन रागों का उप्योग भव्य वैदिक यग्यों और अनुष्ठानों में किया जाता था, जहां उनकी शुद्ध ध्वनी वातावर्ण को पवित्रकर
25:19देवताओं को आमंत्रित करती थी
25:22इस प्रकार सामवेद का दिव्य संगीत अंगिनत धाराओं में प्रवाहित होता हुआ, स्रिष्टी के प्रत्येक स्पंदन में जीवन और संतुलन
25:31का संचार करता रहा, जो आज भी अमर है
25:36सामवेद के मधूर संगीत के पश्चात, महर्शी वेद व्यास ने मानव जीवन की रक्षा और तंत्रमंत्र के गूढ रहसियों को
25:44संरक्षित करने हेतु अधर्व वेद का प्रक्टिकरन किया
25:48इस रहस्यमई और व्याभारिक ज्यान से परिपून अथर्ववेद का भार उठाने के लिए वेद व्यास ने अपने ज्यानी शिश्य महर्शी
25:56सुमन्तु को अपने पास बुलाया
25:59महर्शी व्यास ने सुमन्तु को अथर्ववेद के औशधिय प्रयोगों, शांती अनुष्ठानों और ब्रहमांडिय उर्जा को नियंतरित करने वाली गुक्त रिचाओं
26:09का उपदेश दिया
26:11गुरु व्यास के पावन हस्तक्मलों से अथर्ववेद की संहिताय ग्रहन करते हुए सुमन्तु का हृदय परमसंतोश और अपार भक्ती से
26:19भर गया
26:21अथर्ववेद केवल अध्यात मही नहीं, बलकी रोगों के निवारण, शत्रूओं से रक्षा और दैनन दिन जीवन के कल्यान का अनुपम
26:29भंडार था
26:31महर्शी सुमन्तु ने एक विशाल वटवरिक्ष की छत्रचाया में बैठकर वर्षों तक अथर्ववेद के रहसियों का गहन ध्यान और अध्ययन
26:39किया
26:40ज्यान को जन्वरी से जन्वरी तक पहुँचाने के लिए सुमन्तु ने अथर्ववेद को विभिन्न व्यावारिक विभागों और तंत्र शाखाओं में
26:49वर्गीकृत करना प्रारंभ किया
26:51वेद की इस महान ज्यान परंपरा को आगे बढ़ाने के उद्देश से सुमन्तु ने अपने सबसे योग्य और निष्ठावान शिश्यकबंध
27:00को स्मरण किया
27:02शिश्यकबंध ने गुरु सुमन्तु के चर्णों में शीश नवाकर अथर्ववेद के अथा ज्यान सागर में प्रवेश करने की अनुमती मांगी
27:12सुमंतु ने प्रसन्न होकर अपने शिश्य कबंध को अथर्ववेद का संपूर्ण गुप्ट ज्यान और उसकी संपूर्ण संहिताय प्रदान कर दी
27:21कबंध ने अथर्ववेद के मंत्रों की शक्ती, जडी बूटियों के चमतकारिक प्रयोग और सुरक्षाक्वचों की विद्या में महारत हासिल की
27:31आगे चलकर महर्शी कबंध ने इस अथर्ववेद को दो प्रमुक शाखाओं में विभाजित किया, ताकि इसका अध्ययन अत्यंत सुगम हो
27:39सके
27:41कबंध ने इन दोनों शाखाओं का विस्तार करने का दायत्व अपने दो प्रिय शिश्यों, देवदर्ष और पत्य को सौपा
27:49प्रथम शिष्य देवगर्ष ने अपने अथक परिश्रम से अपनी शाखा को चार अन्य उक्षाखाओं में विभाजित कर ज्ञान का प्रचार
27:57किया
27:59द्वितिय शिष्य पथ्य ने भी अथर्ववेद का समवर्धन करते हुए तीन मुख्य शाखाओं का निर्मान कर वैदिक संस्कृती को समरिध
28:07किया
28:08पथ्य की परंपरा में ही महान महर्शी शौनक हुए जिन्होंने शौनक सहिता की रचना कर अथर्ववेद को जनसाधारण के लिए
28:16सुलब बनाया
28:18महर्शी शौनक ने नैमिशारणिय के पवित्रवनों में एक विशाल गुरुकुल की स्थापना की जहां हजारों विद्यार्थियों को अथर्ववेद सिखाया गया
28:29राजसुय और वाजपे जैसे भव्य यग्यों में राजाओं की विजय और राष्ट्र की सुरक्षा हेतु अथर्ववेद के मंत्र अनिवार्य सिध्ध
28:37हुए
28:38महर्शी पराशर ने मैत्रे से कहा कि सुमंतु की इस पावन शिशप्रमपराने मानव जाती के स्वास्थ्य और सुरक्षा की सदैव
28:47रक्षा की है
28:49इस प्रकार अथर्ववेद की अमर शाखाय सुमन्तू और उनके शिश्यों द्वारा विस्तृत होकर स्रिष्टी के भौतिक और आध्यात्मिक अस्तित्व का
28:58आधार बनी
29:00इसके पश्चात महर्शी सुमन्तू के परम ज्यानी शिश्य कबंध ने अथर्ववेद की अपार ज्यानराशी को लोग कल्यान हेतु पुनरगठित करने
29:09का महान संकल्प लिया
29:11कबंध ने अथर्ववेद संहिता को दो प्रमुख और प्रभावशाली धाराओं में विभाजित किया जो पतन्या और पिपलाद शाखाओं के नाम
29:20से संसार में विख्यात हुई
29:23महर्शी देवदर्ष ने कबंध से पतन्या शाखा का अध्ययन कर इसे अपने योग्य शिशों में प्रचारित किया जिससे इस वेदग्यान
29:31का चारों दिशाओं में विस्तार हुआ
29:34घने तपोवन के शांत वातावर्ण में तपस्यारत महर्शी पिपलाद ने दिव्य प्रेणा से पिपलाद शाखा का स्रिजन और संरक्षन किया
29:44पिपलाद शाखा ने आयुर्वेद के सुक्ष्म सिध्धानतों को समाहित करते हुए प्राकृतिक जड़ी बूटियों और मंत्रों के अध्भुत संगम को
29:52उजागर किया
29:54वेदग्य रिशियों ने पिपलाद संहिता के आरोग्य वर्धक मंत्रों द्वारा जन्मानस को असाध्य रोगों से मुक्त कर दीरगायू का वर्दान
30:03प्रदान किया
30:04दूसरी और पतन्या शाखा ने ग्रिहस्थ जीवन की मर्यादाओं, पारिवारिक सुक्षान्ती और गार्ःपत्य कर्तवियों का विशद मार्गदर्शन प्रस्तुत किया
30:15वैदिक ग्रिहस्थों ने पतन्या शाखा के पावन मंत्रों का उच्चारण करते हुए अपने यग्य कुंडों में आहुतिया दी, जिससे घरों
30:23में समरिध्धी का वास हुआ
30:26अथर्ववेद की इन शाखाओं में समाहित शांतिकर्म के विधानों ने आधिभातिक और आधिदैविक उपद्रवों को शांत करने की दिव्य सामर्थ्य
30:34प्रदान की
30:36पवित्र कुशा और जल का छिड़काव करते हुए रिशियों ने शांतिकर्म के अनुष्ठान संपन्न किये, जिससे संपूर्ण वातावर्ण में अभय
30:45और कल्यान की लहर दोड़ गई
30:48पौश्टिक कर्म के अंतरगत ऐसे शक्तिशाली सूक्तों का प्रयोग हुआ जो राष्ट्र की कृशी, पशुधन और आर्थिक उन्नती को निरंतर
30:56गती प्रदान करते थे
30:59स्वर्णिन धूप में लहलाहाते खेतों के मध्यक्रिशकों और राजाओं ने पौश्टिक मंत्रों का गायन कर धंधान्य की अटूट वृद्धी का
31:07उच्सव मनाया
31:09पिप्पलाद शाखा के अंतरगत ही जीवन के गूड आध्यात्मिक प्रशनों का निवारन करते हुए महान प्रशनों पनिशत का प्राकट्य हुआ
31:19शैजिग्यासु रिशियों ने अत्यंत नमरता पूर्वक महर्शी पिप्पलाद के चर्णों में बैठकर स्रिष्टी, प्राण और परब्रहम से जुड़े गहन प्रशन
31:27पूछे
31:28कबंध और उनके महान शिशों ने इन सभी अनुत्रयोगों को ताड़ पत्रों पर लिपिबध कर आने वाली पीधियों के लिए
31:36इस ज्ञान को अमर बना दिया
31:38इस प्रकार अथर्ववेद की ये शाखाए शरीर के आरोग्य से लेकर आत्मा के परम मोक्ष तक का सरवांगीन मार्ग दिखाने
31:47वाला सेतु बनी
31:49महर्शी पराशर ने मैत्रे को समझाते हुए कहा कि पतन्या और पिपलाद शाखाओं का यह समन्वय ही मानव समाज के
31:57लिए अभेद्य सुरक्षा क्वच है
32:01पराशर मुनी के मुख से अथर्ववेद की महिमा सुनकर मैत्रे का हृदय अगाज श्रद्धा और असीम आनन से परिपूर्ण हो
32:09उठा
32:10प्राचीन भारतिय गुरुकुलों में बटुकों के वेदपाठ से गुंजती ये अमर शाखाएं आज भी मानव जीवन के आध्यात्मिक और भौतिक
32:19संतुलन को बनाए हुए हैं
32:22इस प्रकार सुमन्तु और कबंध की दिव्य शिश्य प्रमपरा से अथर्ववेद का यह ज्यानवरिक्ष अनंत काल तक संपून ब्रहमांड को
32:30आलोकित करता रहेगा
32:33महर्शी पराशर ने मैत्रे को बताया कि कलियुक के आगमन से पूर्व वेदों का यह संरक्षन केवल एक कार्य नहीं
32:40बलकि समस्त मानव जाती की आध्यात्मिक रक्षा का सर्वोपरी उपाय था
32:46आसन कलियुक के तमों में अंधकार को भामपकर महर्शी वेदव्यास ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से देखा कि भविश्य में मनुश्यों की
32:54आयू, बुद्धी और धर्मधार्ना की शक्ती अत्यंत क्षीन हो जाएगी
33:00इस घोर आध्यात्मिक संकट से सनातन संस्कृती को बचाने के लिए भगवान कृष्ण द्वैपायन व्यास ने एक अखंड वेद्राशी को
33:08चार मुख्य विभागों में वर्गी कृत करने का एतिहासिक निर्णय लिया
33:13उन्होंने अपने तपोबल से रिगवेद की रक्षा का भार महर्शी पैल को, यजुरवेद का वैशमपायन को, सामवेद का जैमिनी को
33:22और अथर्ववेद का गुरुतर दायत्व सुमन्तु को सौपा
33:25इन परम ज्यानी मुख्य शिशों ने अपने अपने वेद को अंगिनत उप्षाखाओं में विभाजित करके अपने निश्थावान शिशों को कंठस्ट
33:34कराने का महाभियान आरंभ किया
33:38स्वर्पद और क्रम की ऐसी अचूप मौखिक पाठविधिया विक्सित की गई ताकि सहस्राब्दियों के उपरांत भी वेदों का एक भी
33:46अक्षर दूशित या परिवर्तित न हो सके
33:50भारत्वर्ष के समरिध्वनों में स्थित पावन आश्रम रिशियों और बटुकों के सस्वर वेदध्वनी से गुंध उठे जिसने संपून आर्यावर्त को
33:59एक दिव्य सुरक्षाक्वच प्रदान किया
34:02सामान्य जन्मानस तक परम सत्य के उपदेश पहुचाने हेतु वेदव्यास ने अश्टादश पुराणों और इतिहास की रचना करके अपने प्रिय
34:11शिश्य लोमहर्षन को उसका दायत्व सौपा
34:14यह गुरुशिष्य परमपरा मात्र विद्या का हस्तान तरण नहीं थी, बलकि ज्ञान की अमर जोती को युगो-युगो तक अक्षुनल
34:22रखने का एक पावन सनातन संकल्प थी
34:26यदि महर्षी व्यास और उनके इन निष्ठावान शिश्यों ने यह भगीरत प्रयास न किया होता, तो कलियुक की अज्ञानमई तरंगों
34:35में वैदिक ज्ञान का सर्वता लोप हो गया होता
34:39वेद व्यास जी द्वारा किया गया, यह महान वर्गी करण ही वह अचल नीम बना, जिस पर सनातन धर्म की
34:46दिव्य इमारत आज भी अखंडता से खड़ी है
34:51महर्शी पराशर का यह आनंददाई उद्बोधन सुनकर मैत्रे का हृदय अगाध कृतग्यता से भर गया और उन्होंने ज्ञान के उस
34:59अमर निर्माता को अपने मन से नमन किया
35:03भगवान नारायन के ज्ञान अवतार माने जाने वाले कृष्ण द्वैपायन व्यास की इस पावन कीर्ती की स्थुती तीनों लोकों में
35:10देवताओं और महर्शियों ने एक स्वर में की
35:14शिश्यों की अटूट श्रिंखला द्वारा रक्षित इन शाखाओं ने अपने ज्ञान रूपी अमरित से मानव समाज के लौकिक और पारलौकिक
35:22जीवन को सदा सरवदा के लिए समरिध कर दिया
35:26आज भी जब गुरुकुलों में वेदपाठ गूंचते हैं तब महर्शी व्यास का वह तपस्वी रूप और उनके शिशों की साधना
35:34प्रत्येक धर्मानुरागी के हृदय में जीवन्थ हो उठती है
35:39पराशर जी ने मैत्रे को पुनस्मरण कराया कि वेदों का यह वर्गी करण केवल शब्दों का संग्रह नहीं बलकि संपूर्ण
35:47ब्रहमांड की चेटना का वैग्यानिक निरूपन है
35:52स्वर्गलोग से देवराज इंद्र, ब्रहमा और समस्थ देवगणों ने इस अभूत पूर्व वेदविभाजन यग्य की सफलता पर वेदव्यास और उनके
36:00शिशों पर पारिजात के पुष्प बरसाएं
36:04व्यास परमपरा के इन अमर रिशियों ने यह सिद्ध कर दिया कि निस्वार्थ भाव से लोग कल्यान हेतु समर्पित ज्यान
36:12ही युगों युगों तक संसरित होकर कालजई बनता है
36:16इस प्रकार वेदव्यास और उनके शिशों का यह महान योगदान सनातन धर्म के मस्तक पर एक अमिट मुकुटमनी की भांती
36:24अनंतकाल तक चमकता रहेगा
36:27मैत्रे रिशी ने अत्यंत नमरता से पराशर मुनी के पावन चर्णों में मस्तक जुका कर इस परम फल्दाई और संशविनाशक
36:35ज्यान गाथा हेतु उनका बारंबार धन्यवाद किया
36:40महर्शी पराशर ने अत्यंत स्नेह पूर्वक मैत्रे की ओर देखा और अपने वरध हस्त को उठा कर कहा कि वेदों
36:47का यह अनंत विस्तार वास्तव में स्रिश्टी के कल्यान हेतु ही किया गया है
36:53उन्होंने समझाया कि परंपिता ब्रह्मा के मुख से निकले हुए इन वेदों की ज्यानराशी इतनी विशाल और गंभीर है कि
37:01साधारन मनुष्यों के लिए संपूर्ण जीवन में भी इसे समझ पाना असंभव था
37:07स्रिश्टी के आरंभ में चारों वेद एक ही महान ज्यानपुँच के रूप में विद्यमान थे परंतु समय के चक्र के
37:14साथ इनकी जटिलता सामान्य बुद्धी से परे होने लगी
37:19जैसे जैसे द्वापर युग का अंत निकट आया और कल्यव के अंधकार की आहट सुनाई देने लगी वैसे वैसे मनुष्यों
37:27की आयुख बुद्धी और स्मरण शक्ती क्षीन होने लगी
37:31इसी परम संकट को भाम पकर परम करुणामई भगवान व्यास ने वेदों को चार भागों में विभाजित किया ताकि भावी
37:39पीढिया अपनी क्षमता अनुसार इस ज्ञान को सुरक्षित रख सकें
37:44परंतु पराशर मुनी ने आगे कहा कि केवल विभाजन ही परियाप्त नहीं था क्योंकि वेदों की भाशा इतनी गूड है
37:52कि उसे बिना मार्ग दर्शन के समझना विनाशकारी भी हो सकता था
37:57रिशी मैत्रे ने उचसुक्ता से पूछा कि है भगवन फिर साधारन स्त्री पुरुषो और संसारी लोगों के लिए धर्म की
38:05रक्षा और मुक्ती का मार्ग कैसे सुलब हुआ
38:08तब पराशर मुनी ने रहस्योध घाटन करते हुए कहा कि इसी करोना के वशीभूत होकर भगवान व्यास ने इतिहास और
38:16पुराणों की रचना की जो वेदों के गूड अर्थों को सरल कथाओं में बदल देते हैं
38:23पुराण वास्तव में वेदों के ही पूरत हैं जो स्रिष्टी के स्रिजन्ट, सहार, रिशियों के वंश्वृत और राजाओं के इतिहास
38:31के माध्यम से धर्म की व्याख्या करते हैं
38:35भगवान नारायन की असीम लीलाओं को जब पुराणों के रूप में लिपिबद्ध किया गया, तो वे सम्पूर्ण जगत के लिए
38:42कल्यानकारी अमरित के समान सिध्ध हुई
38:46रिशी व्यास ने 18 महा पुराणों की रचना की, जिन में से प्रत्येक पुराण मनुष्यों को भिन्न भिन्न भावों से
38:53इश्वर के साक्षात दर्शन कराता है
38:57मैत्रे ने अनुभव किया कि जो ग्यान वेदों के मंत्रों में छिपा हुआ था, वह पुराणों की सरल कहानियों के
39:04माध्यम से सीधे हरिदय में उतर जाता है
39:09पराशर जी ने बताया कि जिस प्रकार रस के बिना फल व्यर्थ है उसी प्रकार पुराणों के व्याभारिक ज्यान के
39:16बिना केवल वेदों का कंठस्थ पाठ भी निश्प्राण है
39:20पुराणों में वरणित राजा, हरिश्चंद्र और मरियादा पुरुशोत्तम श्री राम जैसे महान चरित्रों की कठाए कलिव के मनुश्यों को धर्म
39:28की राह पर बनाए रखने का एक मात्र सहारा है
39:33जो मनुष्य श्रद्धा पूर्वक इन पुराणों का श्रवन और मनन करता है उसे वेदों के अध्ययन के समान ही पुन्य
39:41और मोक्ष की प्राप्ती होती है
39:44मैत्रे ने विस्मित होकर पूछा की है गुरुदेव इन अठारह महा पुराणों में श्री विश्नु पुराण का क्या स्थान है
39:51और इसका प्राकट्य कैसे हुआ
39:55पराशर मुनी ने गर्व से अपने नेत्र बंद किये और बताया कि विश्नु पुराण स्वय भगवान नारायन की सांसों से
40:02प्रकट हुआ है और यह सभी पुराणों का मुकुट मनी है
40:07इसमें ब्रह्मांड की उत्पत्ती से लेकर राजाओं के वंश, युगों की गणना और अंता मोक्ष प्राप्ती के अचुक उपायों का
40:15वर्णन किया गया है
40:18व्यास जी की इस अमर शिश्य परंपरा और पुराणों के माध्यम से ही आज सनातन धर्म की यह पावन गंगा
40:25अविरल बह रही है
40:28इस प्रकार गुरुशिश्य के इस पावन समवाद के साथ वेदों के संरक्षन और पुराणों की महिमा का यह दिव्य अध्याय
40:36पूर्ण हुआ और आगे के महान ज्यान के द्वार खुल गए
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