In Episode 19 of our Brahmavaivarta Purana series, Sage Narada stands at the very threshold of Goloka. Witness the breathtaking transition from Vaikuntha's opulence to the supreme, eternal realm of Sri Krishna. As the vibrations of 'Mahati' resonate with the Raaslila, Narada finally witnesses the 'Mula-Prakriti' and the true essence of the Radha-Krishna Tattva. Join us on this spiritual journey to the source of all existence. #BrahmavaivartaPurana #Narada #Goloka #RadhaKrishna #SanatanDharma #HinduMythology #Spirituality #VedicWisdom #Puranas
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00:00गोलोग की दिव्य सीमा उपर खड़े होकर देवर्शी नारद ने जैसे ही अपनी वीना महती के तारों को जंकृत किया,
00:07संपून आकाश एक अलोकिक कमपन से गूँज उठा.
00:12नारद की आखों में वह अगाद श्रद्धा थी, और उनके मुख से मंत्रमुग्ध होकर नारायन नारायन का स्वर उस दिव्य
00:19ध्वनी में विलीन हो गया.
00:21वीना की ध्वनी से उत्पन्न तरंगों ने गोलोक के सात्वे परदे को छिन्न भिन करना प्रारंभ कर दिया, जिससे वहां
00:29की दिव्य उर्जा का प्रवाह तीवर हो उठा.
00:33आकाश का वह नीला रंग धीरे धीरे पारभासी होने लगा, मानो प्रकृती स्वय उस परम सत्य को प्रकट करने की
00:41तैयारी कर रही हो.
00:43कमपन इतना शक्तिशाली था कि गोलोक के कनकन से प्रकाश की फुहारे फूटने लगी, जो हजारों सूरियों की दीप्ती को
00:51भी फीका कर रही थी.
00:53भगवान विश्णु का दिव्य स्वरूप अपने वक्षस्थल पर वैजन्ती माला और कौस्तुभ मनी धारन किये उस अलोकिक जोती के केंद्र
01:02में प्रकट होने लगा.
01:04नारद ने देखा कि वीना के सुरों की ताल पर स्वयंकाल भी थम गया है, क्योंकि अब गोलोक का अंतिम
01:11रहस्य परदा हटाने को आतुर था.
01:15ब्रहमांड की समस्ट अनुभूतियां उस एक क्षण में सिमट गई थी, जहां नारद को स्वयंका अस्तित्व भी उस परम ब्रहमा
01:22में विलीन होता हुआ प्रतीत हुआ.
01:26चारो और व्याप्ट दिव्य सुगंधी और संगीत की मधुर ध्वनिया उस महाशक्ती के आगमन का संदेश दे रही थी, जो
01:33समस्ट स्रिजन का मूल है.
01:37भगवान विश्णु ने मंध मुस्कान के साथ नारद की ओर देखा, मानो वे इस आध्यात्मिक यात्रा की पूर्णता पर उन्हें
01:44आशिरवाद दे रहे हुँ.
01:47नारद की वीना से निकली अंतिन स्वरलहरी ने उस स्वर्णिन द्वार को पूरी तरह खोल दिया, जिसके पीछे परब्रहम का
01:55असली स्वरूप विराजमान था.
01:57परम सत्ता का प्रकाश इतना तीवर था कि नारद की आखें बंध हो गई, किन्तु उनके हिदय के नेत्र उस
02:05दिव्यदर्शन को आत्मसाथ करने के लिए खुल गए.
02:09गोलोक का वैभव उस द्रिश्य के सामने सामान्य प्रतीत होने लगा, क्योंकि अब वहां साक्षात निराकार ब्रहमा की उपस्थिती का
02:17आभास हो रहा था.
02:20स्वया भगवान विश्णु ने भी अपना मस्तक उस परम जोती के सम्मुख जुका दिया, जो गोलोक के सर्वोच शिखर से
02:27निकल रही थी.
02:29नारद के हाथों से वीना का वेग कम हो गया, और वे उस परमानंद की अवस्था में स्थिर हो गये
02:35जहां समय का कोई अस्तित्व नहीं बचता.
02:39द्रिश की भव्यता ऐसी थी कि स्वयन देवगण भी उस क्षण को देखने के लिए गोलोक की दिशा में नमन
02:46कर रहे थे.
02:48गोलोक की वह पावन भूमी अब पूरी तरह से जोतिर्मय हो चुकी थी, जहां केवल प्रेम और भक्ती के अनंत
02:55स्पंदन शेश थे.
02:57नारद ने अनुभव किया कि परब्रहम न तो कोई व्यक्ती है और नहीं कोई देवता, अपितु वह समस्थ चराचर में
03:05व्याप्त एक अनंत चेतना है.
03:08वीना की मौन होती हुई ध्वनिया इस बात का साक्षी बनी की नारद ने वह देखिया है, जिसे देखने के
03:15लिए रिशिमुनी युगो-युगो तक तपस्या करते हैं.
03:19गोलोग के अन्तिम रहस्य के उद्धाटन के साथ, नारद की यात्रा एक नए और उच्चतर आयाम में प्रवेश कर गई
03:27जहां अब केवल इश्वर और भक्त का अदवैच शेश था.
03:32नारद के सम्मुख अब वह अनन्त वीर्यमेई विर्जा नदी प्रवाहित हो रही थी, जिसका जल भौतिक जगत के समस्त बंधनों
03:39को पल भर में भस्म करने में सक्षम था.
03:43भगवान विश्णु का चतुर भुज रूप मंद मुस्कान के साथ उस दिव्य तट पर प्रकट हुआ, मानो वे नारद के
03:50भीतर की उस अंतिम जिजग को निमंतरन दे रहे हूं.
03:54नारद ने अनुभव किया कि उनके अहं का भारी बोज उस नदी के तट पर गिरते ही ओस की बूंदों
04:01की भानती विलीन होने लगा है.
04:04विर्जा नदी के तट पर बिखरी हुई दिव्यकांती मानो यह संदेश दे रही थी कि सत्य की प्राप्ती केवल आत्मस्मर्पन
04:12के मार्ग से ही संभव है.
04:15नारद की वीना से निकलने वाली स्वरलहरी अब ब्रह्मांडी मौन में समा गई, जिससे यह सिद्ध हुआ की वे गोलोक
04:22के देहली तक पहुँच चुके हैं.
04:26विश्णु ने अपनी करुणामई द्रिष्टी नारद पर डाली, मानो वे एक पिता की भांती अपने पुत्र को उस परम सत्य
04:33की ओर अग्रसर होने का आदेश दे रहे हूं.
04:37नदी का जल अब नारद के चर्णों का स्पर्श कर रहा था, और उस जल की शितलता उनके भीतर के
04:43समस्त संसकारों को धो रही थी.
04:47ब्रहमांड के समस्त रहसियों का सार एक दिव्यस्तंभ के रूप में नदी के उस पार चमक रहा था, जिसे केवल
04:54विशुद्धरदय ही देख सकता था.
04:57नारद ने अपनी आखे खोली, तो उन्हें अपने चारों और केवल वही अनंत चेतना दिखाई दी, जो स्रिष्टी के कणकण
05:05में विद्यमान है.
05:08गरुर के पंखों की फड़फडाहट से उत्पन हुई वायू, नारद को उस पार ले जाने के लिए मानो एक आध्यात्मिक
05:15सेतु का निर्मान कर रही थी.
05:18नारद ने धीरे-धीरे विर्जा नदी में अपना पहला चरण रखा, और उन्हें अनुभव हुआ कि वे अब भौतिक देह
05:25की सीमाओं से परे जा रही हैं.
05:29नदी की गहराईयों में डूबे हुए सितारे, उस अनंत ब्रह्मांड की गवाही दे रहे थे, जिसे देखने का सौभाग्य केवल
05:36नारद जैसे भक्त को ही प्राप्त है.
05:40उस दिव्य सीमा पर समय का चक्र रुप गया था, और अब केवल शाश्वत प्रेम और भक्ती का संगीत ही
05:47वातावर्ण में गुंजायमान था.
05:49भगवान विश्णू ने नारद की ओर अपना हस्तक्मल बढ़ाया, जिससे निकलने वाली प्रकाश की किर्णों ने नारद के शरीर को
05:57दिव्य दीप्ती से भर दिया.
06:00नारद का मानस अब एक ऐसे दरपण की भानती निर्मल हो चुका था, जिसमें गोलोक का प्रतिविंब स्पष्ट दिखाई देने
06:08लगा था.
06:09यह विर्जा नदी पार करना मात्र यात्रा नहीं, बलकि स्वयं की पहचान को इश्वर में विसर्जित करने का एक अंतिम
06:17प्रयास था.
06:19नारद अब नदी के मध्य तक पहुँच चुके थे, जहां से संसार की माया का शोर पूरी तरह समाप्थ हो
06:26गया था.
06:27तभी आकाश में दिव्यवाध्य यंत्रों की ध्वनी सुनाई दी, जो इस बात का संकेत थी की गोलोक का द्वार नारद
06:35के लिए खुल चुका है.
06:38नारद ने पीछे मुर कर देखा, तो उन्हें अपना भूतकाल एक धुन्धली पर चाएं की भांती विलीन होता हुआ दिखाई
06:45दिया.
06:47परब्रहम का वास्तविक स्वरूप अब मात्र कुछ पलों की दूरी पर था, और नारद की आत्मा उस अनंत मिलन के
06:54लिए पूरी तरह तयार थी.
06:57गोलोक के प्रवेश द्वार पर नारद ने देखा कि वहां की भूमी स्वर्ण से भी अधिक उज्डवल रतनों से बनी
07:04है, जहां पकपक पर कल्पवरिक्षों की छाया अमरित की वर्शा कर रही है.
07:10देवर्शी नारद के समक्ष स्वया भगवान विश्णू चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए, जिनका मुखमंडल पूर्ण चंद्रमा की शांती और अनंत
07:19तेज से दैदी प्यमान था.
07:22नारद ने देखा कि इन दिव्यवनों में समय का कोई चक्र नहीं है, यहां पल और युग का भेद मिट
07:28चुका है, और सब कुछ केवल अनंत वर्टमान में स्थिर है.
07:34गोलोग की वास्तुकला में अनकित हर एक सुक्षम कलाकृती में प्रेम के सुक्षम स्पंदन दिखाई दे रहे थे, जो भक्त
07:41के हृदय को शुद्ध कर रहे थे.
07:44नारद ने अनुभव किया कि गोलोग के कणकन में रासलीला का गूंजता हुआ मधूर स्वर समाहित है, जो शुने को
07:52भी आनंद से भर देने में सक्षम है.
07:56नारद के सम्मुख देवराज इंद्र की उपस्थिती थी, जो यहां एक साधारन सेवक की भांती परम भक्ती में लीन होकर
08:04चर्णों की सेवा कर रहे थे.
08:06नारद ने अपनी वीना को स्पर्ष किया, तो उससे निकली ध्वनिया भी गोलोक के वातावर्ण में मिलकर एक नया सामनजस्य
08:14उत्पन करने लगी.
08:17आकाश से गिरते हुए दिव्य पुष्पों की वर्षा नारद के चारों और एक सुगंधित चादर की तरह फैल गई, जिससे
08:24उनका शरीर एक नई दैविय उर्जा से भर गया.
08:28विस्त्रत उध्यानों के बीच एक दिव्य सरोवर था, जिसका जल नीले रतनों के समान चमक रहा था और उसमें खिले
08:36कमल स्वय भक्ती के प्रमान थे.
08:39नारद ने भगवान के उस सुख्ष्म रूप का आभास किया, जो गोलोग की हर एक लता और पुष्प में अपनी
08:46चेतना के रूप में व्याप्त था.
08:49नारद की द्रिष्टी जैसे ही एक प्रकाश पुँच पर पड़ी, उन्होंने देखा कि वहा प्रेम और सात्विक शक्ती एक दूसरे
08:57में विलीन होकर अनंत का निर्मान कर रहे हैं.
09:01अद्रिष्य शक्तियों का समोह नारद के चारों और परिक्रमा कर रहा था, जो गोलोग की दिव्य सीमाओं को रक्षित करने
09:08वाले रक्षक थे.
09:10नारद ने अब देखा कि गोलोग की सीमाओं ब्रहमांड के परे जाकर उस निराकार परब्रहम के चर्णों में जाकर मिलती
09:18हैं.
09:20एक दिव्य संदेशवाहक के रूप में भगवान ने नारद के हिरिदय में वह ज्ञान स्थापित किया, जिसे शब्दों में पिरोना
09:27असंभव है.
09:29नारद ने अपनी आखें खोली तो उन्हें गोलोग के वनों में अब पहले से भी अधिक जीवन्पता और दिव्य चेतना
09:37का बोध होने लगा.
09:39चारों और व्याप्ट दिव्यवाध्य यंत्रों की ध्वनी अब नारद की आत्मा की धड़कन बन चुकी थी, जिससे गोलोग और उनकी
09:47आत्मा का मिलन पूर्ण हुआ.
09:50नारद ने देखा कि कल्पव रिक्षों की तहनिया जुक कर भगवान के चरण कमलों को स्पर्ष करने की चेश्टा कर
09:56रही थी, जैसे प्रकृती स्वयंप्रभो को नमन कर रही हो.
10:01देवता और गंधर्व भी इस द्रिश्य को देख अपनी सुक्षम काया में स्तब्ध थे, क्योंकि आज साक्षात भक्ती का स्वरूप
10:09प्रकट हो रहा था.
10:11नारद ने धीरे-धीरे उस अनन्त की ओर कदम बढ़ाए, जहां गोलोक का अंतिम रहस्य उनकी प्रतीक्षा में था.
10:20जैसे ही नारद ने उस दिव्य केंद्र को चुआ, पूरा गोलोक एक तीवर प्रकाश में विलीन हो गया और नारद
10:27परब्रहम के वास्तविक स्वरूप के दर्शन के निकट पहुँच गए.
10:32नारद ने अपनी द्रिष्टी उठाई, तो गोलोक का अनंत आकाश मानो प्रेम के तरल स्वर्ण में पिघल कर उनकी चेतना
10:39को आहलादित करने लगा.
10:42तभी वहां साक्षात भगवान विश्णु का सूक्ष्म रूप प्रकट हुआ, जो अपनी सौमय मुस्कान से नारद को भक्ती के उस
10:50गूढ रहस्य की और प्रेरित कर रहे थे.
10:53नारद ने देखा कि दिव्य सक्खिया किसी सांसारिक स्त्री के समान नहीं, अपितु स्वय लादिनी शक्ती के कंड बन कर
11:01चारों और नृत्य कर रही थी.
11:03उनकी प्रतेक पच्चाप से गोलोग की भूमी पर रत्नों के पुष्प खिल रहे थे, जो उनके भीतर स्थित परमानंद की
11:11तरंगों का प्रतिबिंब थे.
11:14नारद उस द्रिश के प्रती इतने मंत्रमुग्ध थे, कि उनकी वीना के स्वर्भी उन सक्खियों के गायन की धुन में
11:21स्वतह ही विलीन हो गए.
11:23भगवान विश्णु ने नारद की ओर देखते हुए मंद स्वर में कहा कि ये सक्खियां परब्रह्म के हृदय का वहरस
11:30हैं, जो स्रिश्टी को जीवित रखता है.
11:34नारद ने अनुभव किया कि उन गोपी रूपों के भीतर से ब्रह्मांडों के जन्म और लैकी स्पंदन सुनाई दे रही
11:41थी.
11:43वह दिव्य आभा नारद के रोमरों में समा गई, जिससे उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि भक्त और भगवान का
11:50भेद मात्र एक कोमर परदा है.
11:53गोलोक का वह प्रांगन अब एक विशाल मंदिर की भानती चमक रहा था, जहां प्रतेक पत्थर पर भक्ती का संगीत
12:01अनकित था.
12:03नारद ने हाथ जोड कर उन सक्षियों को नमन किया, क्योंकि अब वे उन्हें केवल सेवा करने वाली नहीं, अपितु
12:10भक्ती की जन्नी के रूप में देख रहे थे.
12:14सक्षियों के समोह से एक दिव्य प्रकाश पुंज उभरा जो सीधे नारद के हृदय में समाहित होने लगा, जिससे उनकी
12:22आध्यात्मिक द्रिष्टी और भी सुक्ष्म हो गई.
12:25इस अलौकिक अनुभव ने नारद के अहंकार के उस अंतिन सुक्ष्म अंश को भी भस्म कर दिया, जो उन्हें अभी
12:32तक परब्रहम से अलग किये हुए था.
12:36नारद ने देखा कि गोलोक के हरकन में रासलीला का वह नित्यभाव उपस्थित है, जिसे केवल प्रेम की आँखों से
12:43ही देखा जा सकता है.
12:46भगवान विश्नु के साथ साथ शिव का ध्यान भी इस द्रिश पर था, जो कैलाश के शिखर से इस अमरित
12:53वर्षा को साक्षात देख रहे थे.
12:56नारद ने उसक्षन यह समझा कि परब्रहम के वास्तविक स्वरूप का दर्शन केवल वैराग्य में नहीं, बलकि पूर्ण समर्पण में
13:04छिपा है.
13:06पूरा गोलोक एक तीवर, किंतु शीतलता प्रदान करने वाले प्रकाश में डूब गया, जिससे नारद को लगा कि वेस्वयन उस
13:14दिव्य सागर में विलीन हो रहे हैं.
13:18नारद की चेतना उस सीमा को पार कर गई जहां से गोलोक का अंतिम रहस्य उनके समक्ष परब्रम की जोती
13:25के रूप में उभरने वाला था.
13:28वहां सक्खियों का नरित्य एक ऐसे बिंदु पर आकर स्थेर हो गया, जहां समय भी अपनी गतिक होकर थम गया.
13:37नारद ने उस केंद्र में एक ऐसी अनन्त शून्यता देखी, जो वास्तव में अनन्त प्रेम और प्रकाश से परिपूर्ण थी.
13:45उस परम जोती के भीतर, नारद ने उस स्वरूप का दर्शन किया जिसके लिए समस्त वेद और उपनिशद युगों-युगों
13:53से प्रतीक्षा कर रहे थे.
13:55गोलोग की दिव्य आभा के केंद्र में एक विशाल नील्मनी के समान चमकता हुआ कमल खिला, जिसके प्रत्येक गल से
14:03स्रिष्टी का निर्मान हो रहा था.
14:06नारद ने देखा कि उस जोती के बीच माता राधिका का दिव्य स्वरूप प्रकट हो रहा है, जिनकी प्रभा से
14:13सहसरों सूर्य भी मंद प्रतीत हो रहे हैं.
14:17देवी राधिका के अंग्प्रत्यन से करोडो ब्रहमान्डों की स्रिष्टी का निरंतर प्रवाह निकल कर अनंत आकाश में विलीन हो रहा
14:25था.
14:26वह क्षणिक द्रिष इतना भव्य था कि नारत की वीना के तार स्वतह ही बजने लगे, जिससे समस्त गोलोक में
14:34एक दिव्य संगीत गूँझ उठा.
14:37संपूर्ण ब्रहमान्ड की मूल प्रकृती देवी राधिका ने मंद मुस्कान के साथ नारत की ओर देखा, जिससे नारत का हृदय
14:45पर्मानंद से भर गया.
14:47नारत ने साष्टान प्रणाम करते हुए स्तुती की मानोवे साक्षात परब्रहम के हृदय की धड़कन को अपनी वानी में उतार
14:55रहे हूँ.
14:57देवी की द्रिष्टी मात्र से ही नारत के भीतर के समस्थ द्वैत और संशय राख बनकर गोलोग की पवित्र वायू
15:04में उड़ गए.
15:06उस परमशांती के बीच देवी राधिका ने अपने हाथ उठा कर एक दिव्य संकेत किया, जिससे स्रिष्टी की माया का
15:14परदा हट गया.
15:16नारत ने देखा कि उस मूल ज्योती से ही प्रकृती, पुरुष, काल और कर्म का जन्म हो रहा है, जो
15:22संसार की आधारशिला है.
15:26नारत के मुख से स्वतह ही वेदों के गूढ मंत्र निकलने लगे, जो उस महाशक्ती की महिमा का गुनगान कर
15:33रहे थे.
15:35देवी के हर एक श्वास से अंगिनत नक्षत्रों की उत्पत्ती और लए एक अनंत कालचक्र का निर्मान कर रही थी.
15:44गोलोक की वह पावन भूमी स्वयं को आनंद में रूपांतरित कर रही थी, जैसे की स्वयं प्रेम अपनी पूर्णता को
15:51प्राप्त कर रहा हो.
15:53नारद ने अनुभव किया कि वे स्वयं भी उसी दिव्य सत्ता का एक अंश है, जो इस विराट लीला का
16:00केंद्र बिंदु है.
16:03देवी राधिका की क्रिपा से नारद की दिव्य द्रिष्टी इतनी सक्षम हो गई कि वे शूने में भी उस परब्रहम
16:09को देख पा रहे थे.
16:23नारद के चारों ओर की दिव्य सक्षियां पुनह प्रकट हुई और उन्होंने फूलों की वर्षा से उस वातावर्ण को और
16:31अधिक सुगंधित कर दिया.
16:33हर फूल की सुगंध में उन्हें स्रिष्टी के समस्त वेदों का ज्यान और उपनिश्दों का सार अनुभव होने लगा.
16:41नारद ने जाना की प्रेम ही वह अंतिन सत्य है, जिससे परब्रहम को प्राप्त किया जा सकता है.
16:49गोलोग का वह रहस्य जो युगों से छिपा था, आज नारद के हृदय में एक स्थाई जोती के रूप में
16:56स्थापित हो गया.
16:58दिव्य अनुभव पूर्ण होने पर, नारद ने उस मूल केंद्र को अंतिम बार नमन किया और गोलोग की उस यात्रा
17:05से एक नई चेतना लेकर लोटे.
17:08गोलोग की दिव्य सीमाओं से परे, नारद ने उस निराकार चेतना का अनुभव किया जो समस्त स्रिष्टी के मूल में
17:16स्पंदित हो रही है.
17:18भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा के आभास में लीन होकर उस शाश्वत मिलन की साक्षी बन रहे थे, जिसका वर्णन
17:26वेद भी मौन होकर करते हैं.
17:29नारद ने देखा कि राधा और कृष्ण के सुक्ष्म शरीर एक दूसरे में विलीन होकर एक प्रकाश पुंच बन गए
17:37हैं, जिसे परम युगल कहा जाता है.
17:40उस दिव्य मिलन की छटा ने पूरे गोलोक को एक ऐसे प्रेमरंग में डुबो दिया जो कालों के चक्र से
17:47भी परे हैं.
17:49नारद के सुक्ष्म शरीर से अहंकार के अंतिम कन भी उस दिव्य प्रकाश में भस्म होकर लुप्थ हो गए.
17:57देवर्शी नारद ने अनुभव किया कि ब्रहमांड के समस्त भेद, राधा और कृष्ण के एकत्व में विलीन हो रहे हैं.
18:06परब्रहम का यह रूप न तो नर है और न नारी बलकि वह शुद्ध प्रेम की एक अनंतधारा है.
18:14उस अध्भुत द्रिश को देखकर आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, जैसे स्वयन प्रकृती इस मिलन पर मुग्ध हो
18:21गई हो.
18:23गोलोक के प्रतेक कण में राधा और कृष्ण की संयुक्त आभा एक नए ब्रहमांड के स्रिजन का संकेत दे रही
18:30थी.
18:32भगवान श्रीहरी ने नारत की ओर देखकर मंद मुस्कान के साथ उस सत्य का मर्म समझाया जो केवल अनुभव की
18:39वस्तु है.
18:41नारत ने अब समझ लिया था कि भक्ती और मुक्ती के बीच का अंतर प्रेम के सागर में डूगते ही
18:48समाथ हो जाता है.
18:50उस आध्यात्मिक शांती में गोलोग का पूरा आकाश एक सुनहरे कवच की तरहे चमक उठा.
18:58नारत ने जुपकर उस शूने को नमन किया जहां से स्रिष्टी का प्राकट्य और विसर्जन दोनों समभव होता है.
19:06परब्रहम की वह दिव्य एक्ता अब नारत की चेतना का स्थाई हिस्सा बन गई थी.
19:12इस दुरलभ दर्शन के पश्चात नारत की वीना से निकलने वाली ध्वनी अब गोलोग के संगीत के समान मधुर हो
19:20गई थी.
19:22ब्रहमांड के सभी देवता भी उस मिलन की आभा के सामने नत्मस्तक होकर अपनी कृतग्यता व्यक्त कर रहे थे.
19:30नारत ने अनुभव किया कि परब्रहम के असली रूप में कोई सीमा नहीं बलकि प्रेन की अपार स्वतंत्रता है.
19:39भगवान विश्णु ने संकेत दिया कि समया गया है कि नारत इस दिव्य स्मृती को प्रिथवी के भक्तों तक पहुचाएं.
19:47एक अंतिम बार राधा और कृष्ण के दिव्य तेज को हरिदय में संजो कर नारत गोलोक के द्वार की ओर
19:54मुडे.
19:56नारत की यह यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बलकि एक अगवैक चेटना का संपूर्ण रुपांतरन थी.
20:04गोलोक की स्वर्ण आभासे परे, नारत ने अनुभव किया कि जिस मैं और तुम के भेड ने उन्हें बांध रखा
20:11था, वह अब शूनी की भांती विलीन हो रहा है.
20:16नारत के सम्मुख विश्नु स्वयं एक जोति पुन्च के समान प्रकट हुए, जिनकी मुस्कान में ब्रहमांड के समस्त ग्वैक भावों
20:24का विलय समाहित था.
20:26नारत ने अपनी वीना को मौन कर दिया क्योंकि अब ब्रहमांड का संगीत उनके भीतर ही प्रतिध्वनित होने लगा था,
20:34जहां सुनने वाला और सुनाई देने वाला एक ही था.
20:38चहु और व्याप्ट स्वर्ण में कमल पंखुडिया इस बात का प्रमान थी, कि गोलोक के कणकण में केवल एक ही
20:45चेतना का स्पंदन है.
20:48विष्णू की दृष्टी में वह सम्पूण सत्य था, जिसे नारद ने जीवन भर अलग-अलग रूपों में खोजा था, किन्तु
20:55वह तो सदा से उनके भीतर ही विद्यमान था.
20:59नारद ने देखा कि उनके अपने अस्तित्व की परचाई भी उसी दिव्य प्रकाश में विलीन हो रही है, जिससे स्रिष्टी
21:07का निर्मान हुआ था.
21:09यह वह सीमा थी जहां भक्त का अहंकार और इश्वर का वैभव एक दूसरे में इस प्रकार घुल मिल गए
21:16थे, कि अलगाव का कोई स्थान शेश न रहा.
21:20ब्रहमान्ड के समस्त रहसियों का सार एक दिव्य निस्तब्धता में बदल गया, जहां नारत को स्वयंके परब्रह्म होने का बोध
21:27हो रहा था.
21:29भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ नारत के मस्तक पर अपना हस्तकमर रखा और उनके मन की अंतिम शंका
21:37भी भस्म हो गई.
21:39उस स्पर्ष ने नारत की चेतना को उस बिंदु पर पहुँचा दिया, जहां मैं और वह के बीच की दिवार
21:45हमेशा के लिए ढह गई.
21:48अब गोलोक के द्वार केवल एक स्थान नहीं, बलकि नारत के हृदय के भीतर का एक अनंत विस्तार बन चुके
21:55थे.
21:57नारत ने अब अनुभव किया कि वे स्वय ही उस दिव्य लीला के सूत्रधार हैं, जिसे वे सदियों से बाहर
22:04ढूंड रहे थे.
22:06विश्नु का विराट स्वरूप अब उनके भीतर के शान्त आत्मा के साथ एक आकार हो चुका था.
22:12इस दिव्य मिलन में कोई शब्द नहीं था, केवल एक अखंड शान्ती थी जो समस्त ब्रह्मांडों के शोर को मौन
22:20कर रही थी.
22:22गोलोक के रहस्य अब उजागर नहीं किये जा रहे थे, बलकि वे नारत की आत्मा का अभिन्न अंग बन रहे
22:29थे.
22:30द्वैत का आवर्ण हटने के साथ ही नारत ने देखा कि संसार का प्रत्येक अनु उसी परब्रह्म का प्रतिबिम्भ है.
22:39भगवान विश्णु ने अपनी नीली आभासे नारत को घेर लिया, जो इस बात का संकेत था कि वह अब अकेले
22:46नहीं, बलकि ब्रहमा का अंश है.
22:59नारत का यह अनुभव नारत की यात्रा का अंतिम और सबसे कीमती उपहार था, जो उन्होंने समस्त लोग पर लोग
23:06में पाया था.
23:08नारत ने एक अन्तिम बार गोलोग की ओर जुक कर प्रणाम किया, वे अब वह नारत नहीं थे, जो यहां
23:14आये थे, वे स्वयं एक जीवंत वेद बन चुके थे.
23:19गोलोग की स्वर्ण में आभा में डूपते हुए नारत को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे स्वयं परब्रम की चेतना उनके भीतर
23:27एक प्रजवलित दीप की भांती धड़क रही हो.
23:30श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए अपने भक्त की ओर देखा, जहां उनकी मंद मुस्कान में समस्त स्रिष्टी का सर्जन और
23:38सहार एक साथ विलीन हो रहा था.
23:41नारद के कापते हाथों ने भक्ती के उस अद्रिष्य रसको छुआ, जो साक्षात परब्रम के हृदय से प्रवाहित होकर प्रेम
23:49की अनन्त धारा बन चुका था.
23:52आकाश से गिर्ती हुई दिव्य पुष्पों की वर्षा और शंकों की ध्वनी ने उस क्षन को काल के चक्र से
23:59मुक्त कर एक शाश्वत सत्य में बदल दिया.
24:03गोलोग के विशाल प्रांगण में नारत को यह बोध हुआ की वे कोई आगंटुक नहीं, अपितु श्रीकृष्ण की उस आंतरिक
24:10उर्जा का अभिन्न अंश है.
24:14श्रीकृष्ण ने अपना वरध हस्त नारत के मस्तक पर रखा, जिससे नारत को प्रेमानंद का वह रहस्य ज्यात हुआ जो
24:21वेदों और उपनिश्दों की सीमाओं से परे हैं.
24:25नारत की अंतरात्मा में वह गुप्ट ज्यान प्रतिध्वनित होने लगा, जिसे जानकर ही जीव आवागंद के समस्त बंधनों से मुक्ती
24:33पाकर अमर्त्व को प्राप्ट करता है.
24:37उस दिव्यक्षन में नारत के चारों और की वायू भी भक्ती के संगीत में परिवर्तित हो गई, जहां हरकन केवल
24:44कृष्ण नाम का गान कर रहा था.
24:47नारत ने अनुभव किया कि वे स्वयन श्री कृष्ण की इच्छा शक्ती का एक प्रतिबिंब मात्र हैं, जो इस ब्रहमांड
24:55में प्रेम का संचार करने के लिए अवतरित हुए थे.
24:59परब्रहम ने मंद स्वर में नारत से कहा कि प्रेम ही एक मात्र वह सूत्र है, जो भक्त को भगवान
25:06के और भगवान को भक्त के अधीन कर देता है.
25:10नारत के हृदय के भीतर का अहंकार पूरी तरह भस्म हो चुका था, और वहां केवल एक निर्दोश बालक की
25:17भानती निश्चल भक्ती का निवास था.
25:20वह आध्यात्मिक अनुभव किसी स्वपन की भानती नहीं, अपितु जीवन के सत्य की उस पराकाष्ठा की भानती था, जिसे नारत
25:29ने पहली बार आत्मसात किया था.
25:32गोलोग के उस शांत वातावर्ण में नारत को समस्त लोग पर लोग की गतिशीलता का रहस्य एक शांत जल के
25:39प्रतिबिंद की भानती स्पष्ट दिखने लगा.
25:43श्री कृष्ण ने एक दिव्य प्रकाष पुंज के रूप में अपना स्वरूप नारत के सम्मुख प्रकट किया, जिसे देख नारत
25:50की द्रिष्टी भी चकाचौंध से भर गई.
25:53उस जोती के भीतर नारत को एक साथ करोरो ब्रहमांडों का उदे और विलय होता हुआ दिखाई दे रहा था,
26:01जो की परब्रहम की माया का विस्तार था.
26:04वह रहस्य जिसे जानने के लिए नारत ने युगों की तपस्या की थी, आज उनके अंतर्मन में एक शांत सरोवर
26:12की भांती स्थित हो गया था.
26:15नारत ने अब समच लिया था कि प्रेमानंद का मार्ग तर्क से नहीं, बलकि पूर्ण समर्पन की उस अवस्था से
26:22होकर जाता है, जहां में पूरी तरह लुप्थ हो जाता है.
26:27श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए नारत को आशिरवाद दिया, जिससे नारत के रोम्रोम में एक दिव्यानंद की लहर दोड़ गई
26:35जो कभी समाप्थ होने वाली नहीं थी.
26:38नारत ने अपनी आखे बंद की और उस दिव्य अनुभव को अपने भीतर सदैव के लिए संजो लिया, वे अब
26:45एक ऐसा पात्र बन चुके थे, जो प्रेम के अमरित से परिपूर्ण था.
26:51गोलोग की वह अंतिम यात्रा नारत के लिए केवल एक गंतव्य नहीं, अपितु उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व का वह काया कल्प
26:59था जो उन्हें त्रिलोग में सबसे महान भक्त बनाता है.
27:04ब्रहमांड के समस्त ज्यान का महासागर अब नारत के सुक्ष्म शरीर में एकाकार हो रहा था. मानोगोलोग की प्रत्येक तरंग
27:12उनकी आत्मा की धड़कन बन गई हो.
27:16महर्शी नारत ने अनुभव किया कि वे स्वय ही अब ब्रहम वैवर्थ पुराण के उन रहसियों का जीता जाकता आधार
27:23बन चुके हैं जिन्हें शब्द कभी व्यक्त नहीं कर सकते.
27:28नारत की अंतरचेतना में वह दिव्य ज्यान एक बीज की भानती अंकुरित हुआ, जिससे उनके रोमरोम से दिव्य प्रकाश की
27:36आभा विकीन होने लगी.
27:38यह वहक्षन था जब नारत के मानस पटल पर स्रिष्टी के निर्मान और विनाश का चक्र एक सुव्यवस्थित संगीत की
27:46तरह गूंजने लगा.
27:49गोलोक की दिव्य आभा ने नारत की चेतना को पूरी तरह से ढख लिया, जिससे वे अब काल और सीमा
27:55के बंधनों से पूर्णता मुक्थ हो गए.
27:58उनके ह्रिदय में अब केवल वही परब्रहम वास कर रहे थे, जिनका दर्शन करने के लिए समस्थ देवता युगों से
28:06तपस्या कर रहे हैं.
28:09जैसे जैसे नारत ने ज्ञान को आत्मसाथ किया, उनका आध्यात्मिक व्यक्तित्व एक ऐसे स्तर पर पहुँच गया जहात्रि लोग के
28:17सभी भेद मिट गए.
28:19वातावर्ण में एक अनुपम शान्ती छा गई, मानो स्वय गोलोग भी नारत की इस आत्मिक पूर्णता का स्वागत कर रहा
28:27हो.
28:28नारत का वह काया कल्प इतना तीवर था कि उनके चारों और व्याप्त गोलोग का प्रकाश और अधिक तेजस्वी हो
28:36उठा.
28:38देवर्शी नारत के मुखमंडल पर अब वह अलौकिक तेज था, जो केवल उन भक्तों के पास होता है, जिन्होंने परमात्मा
28:45को अपने भीतर अनुभव कर लिया है.
28:49उनके हाथों में स्थित वीना के तारों से अब केवल भक्ती के स्वर नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रहमांड की लए निकलने
28:57लगी थी.
28:58यह वह अंतिम सीमा थी जहां से आगे जाने का हर्थ है, स्वय के अस्थित्व का इश्वर में पूर्ण विलय
29:05हो जाना.
29:07नारद अब उस रहस्य को समझ शुके थे कि परब्रहम का असली रूप केवल प्रेम, करुणा और असीम आनंद का
29:14संगम है.
29:16वे भक्त जो गोलोक तक पहुँचते हैं, उनके लिए अब कोई भी द्वैत शेश नहीं रहता, नारद ने उस सत्य
29:24को स्विकार कर लिया.
29:26नारद के भीतर का ज्यान अब एक शांत सरोवर की तरह स्थेर हो गया था, जिसमें सम्पून स्रिष्टी का प्रतिविंब
29:34स्पष्ट दिखाई दे रहा था.
29:36ब्रह्म वैवर्थ पुरान का वह अंतिम पाठ नारद के हृदय में अनकित हो गया, जो अब उनके जीवन का एक
29:43मात्र ध्ये बन चुका था.
29:46गोलोक के कंकन से आ रही वह दिव्यध्वनी नारद के कानों में पढ़कर उनके मानस को और अधिक शुद्ध करने
29:53लगी.
29:54नारद ने अनुभव किया कि जो प्रेम उन्होंने कृष्ण के चर्णों में देखा था, वही प्रेम ब्रह्मांड के हर पर्मानों
30:02में व्याप्त है.
30:04इस दिव्य एकी करन के साथ, नारद अब त्रिलोक के लिए एक ऐसे मार्ग दर्शक बन चुके थे जो इश्वर
30:11के असली स्वरूप को जानता है.
30:15गोलोक का वह अंतिम रहस्य अब नारद की आत्मा का हिस्सा था, और वे अनन्त काल के लिए उस प्रेम
30:21के साक्षी बन गए.
30:24नारद ने गोलोक के उस दिव्य प्रकाश को अपने भीतर समाहित कर लिया, जो अब एक शांत और शीतल जोती
30:31के रूप में उनके रोम्रोम से प्रस्पुटित हो रहा था.
30:35गोलोक के द्वार पर खड़े होकर भगवान विश्णु ने नारद की ओर मंद मुस्कान के साथ देखा, जैसे वे उनके
30:43भीतर आय परिवर्तन को भली भानती देख रहे हूं.
30:47नारद ने अपने वीना को प्रेम के उन्नै स्वरों से सुसज्जित किया, जिसे केवल गोलोक की पवितरता के माध्यम से
30:55ही सीखा जा सकता था.
30:57ब्रहमांड के शूने में तैरते हुए, नारद की आत्मा का प्रकाश किसी जलते हुए दीपक की तरहे पूरे अंतरिक्ष को
31:05अलौकिक आभा से भर रहा था.
31:08नारद की द्रिष्टी अब भौतिक जगत के दुखों के पार उस सत्य को देख पा रही थी, जो अनंत काल
31:15से प्रेम की डोर में बंधा हुआ था.
31:18गरुर देव ने नारद को अपने विशाल पंखों की छाया में लेते हुए, नीचे की ओर गमन करने की आज्यादी
31:25ताकि वे संसार को भक्ती का संदेश दे सकें.
31:30नारद ने एक अंतिमबार गोलोग की ओर नमन किया और अपने मन में उस अखंड रस को धारन कर लिया,
31:37जिसे वे प्रित्वी पर प्रसारित करने जा रहे थे.
31:41अनन्त की गोज से निकलते हुए, नारद के स्वर में अब वह शक्ती थी जो पत्थर जैसे हृदय में भी
31:47प्रेम का स्रोत बहा सकती थी.
31:50नारद के नीचे के लोकों में प्रवेश करते ही, वे लोक भी उस दिव्य प्रेम की गूंच से जागरित होने
31:57लगे जो अब तक वहा सुप्ट अवस्था में था.
32:01भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए अपने पार्षत को वह शक्ती प्रदान की, जिससे वे अब मोह और माया के जाल
32:08को भेदने में समर्थ थे.
32:11नारद के पक जैसे जैसे त्रिलोक की ओर बढ़े, ब्रहमांड के हर पर्मानों ने उस प्रेन को अनुभव किया जो
32:18उन्होंने गोलोक के भीतर साक्षात देखा था.
32:22एक गुंजती हुई शंक ध्वनी के साथ, नारद का आगमन ब्रहमांडिय सत्ता में एक नए युग के उदे का संकेत
32:30बन गया.
32:31ब्रहमांड की सीमाओ पर खड़े होकर, नारद ने उस माया को देखा जो मनुष्य को इश्वर से दूर रखती थी,
32:39परन्तु अब वे उसे मिटाने के लिए तयार थे.
32:43गरुर देव के स्वर्ण पंखों की गड़गडाहट ने पूरे अंतरिक्ष को एक पवित्रलय प्रदान की, जो नारद की भक्ती का
32:50संगीत बन गई.
32:52नारद ने अपनी आखें बंद की और उस पूरे प्रेम के सागर को अपनी चेतना में धारन कर लिया, जिसे
32:59वे प्रित्वी पर वित्रित करने वाले थे.
33:03आकाश के रंग बदलते हुए नारद के मार्ग को प्रकाशित कर रहे थे, जैसे की पूरा ब्रह्मान उनके इस पावन
33:10कार्य के लिए नत्मस्तक था.
33:13त्रिलोक के द्वार पर नारद का आगमन एक ऐसे अगनी के रूप में हुआ, जो केवल अज्ञान के अंधकार को
33:20जलाने वाली थी.
33:22भगवान विश्णु का अंश नारद के माध्यम से अब इस धरातल पर उतरने के लिए तत्पर था, ताकि वे मानवता
33:29को प्रेम का मार्ग दिखा सकें.
33:32वीना की एक तान छिरते ही नारद ने उस प्रेम की भाषा का उच्चारण किया, जो समस्त वेदों का सार
33:40और गोलोक का वास्तविक रहस्य था.
33:43नारद ने अपनी दिव्ययात्रा पूरी कर ली थी और अब वे इस संसार को वह उफार देने के लिए तयार
33:50थे जो उन्हें गोलोक से प्राप्थ हुआ था.