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इस एपिसोड में, वह शूद्र बालक अपनी कृष्ण की खोज में एक गहन तपस्या के चरण में प्रवेश करता है। वन की भयावह शांति और आंतरिक संघर्ष के बीच, उसे मायावी बाधाओं का सामना करना पड़ता है जो उसे डगमगाना चाहती हैं। क्या वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाएगा? जानिए ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस अलौकिक सफर में। #BrahmavaivartaPurana #LordKrishna #NaradaMuni #SpiritualJourney #Mythology #HinduPuranas #VedicWisdom
Transcript
00:00बालक के कदम जैसे ही माया के सघन वन की सीमा में पड़े, व्रिक्षों की टेढ़ी मेढी डालिया किसी जीवित
00:06प्राणी की बाहों की तरह उसे अपनी ओर खींचने लगी.
00:11आकाश मार्ग से भगवान विश्नु इस बालक की अटूट निष्ठा को देख रहे हैं, उनकी मंद मुस्कान में ब्रहमांड के
00:19समस्त रहस्यों का ठहराव समाया है.
00:22वन की वायू में गूंजती अजीब सी फुस्फुसाहटों ने बालक के कानों को भर दिया, जैसे उसके अपने पूर्व कर्म
00:30उसे अतीत के अंधकार की ओर खींच रहे हूं.
00:34वन के कनकन में व्याप्त यह मायावी अंधकार, वास्तव में एक माया का घेरा है, जो यात्री की संकल्प शक्ती
00:42की परीक्षा ले रहा है.
00:45अचानक बालक को अपने बीते हुए कल के वेक्षन याद आने लगे, जब उसे समाज द्वारा उपेक्षित और अपमानित किया
00:53गया था, पर उसने अपनी आत्मा को कृष्ण के चर्णों में समर्पित कर रथा था.
00:59गरुर देव अपनी विशाल स्वर्ण पंखों को फैलाए आकाश में उड़ रहे हैं, उनकी पैनी द्रिष्टी बालक के हर उस
01:06विचार को देख रही है, जो उसे कृष्ण के मार्ग से विचलित कर सकता है.
01:12बालक की तीवर जिजी विशा और कृष्ण के प्रती उसकी अनन्य भक्ती ने उन मायावी फुस्फुसाहटों को धीरे-धीरे शांत
01:20करना शुरू कर दिया.
01:22वन की सघंता और उसका प्राकृतिक रहस्य एक ऐसे आध्यात्मिक घेरे का निर्मान कर रहा है, जो किसी भी अधर्मी
01:31को भीतर प्रवेश नहीं करने देगा.
01:33वह माया का घना जंगल अब धीरे-धीरे अपनी तीवर्ता खो रहा है, जैसे कोई साधक कठिन तपस्या के बाद
01:41सिध्धियों को प्राप्त कर रहा हो.
01:44देवर्शी नारद अपनी वीना को थामे बालक के साहस की प्रशनसा कर रहे हैं, उनकी मधुर धुन वन के सन्नाटे
01:52में एक नई दिव्य उर्जा भर रही है.
01:56अतीत की धुन्धली स्मृतिया जो बालक को बार-बार पीछे खीच रही थी, अब एक निर्मल जलधारा की भाती उसके
02:03मन से विलीन होती जा रही है.
02:07अंधकार के उस गेहन जाल में भी बालक ने कृष्ण के नाम का दीपक जला रखा है, जिसकी जोती माया
02:14के हर प्रहार को विफल कर रही है.
02:18भगवान शिव अपने ध्यान में इस बालक की परीक्षा को महसूस कर रहे हैं, उनका तीसरा नेत्रमंद गती से स्पंदित
02:25हो रहा है.
02:27वन की प्रकृती बालक को अब एक राही की तरह नहीं, बलकि एक सिद्ध साधक के रूप में स्विकार कर
02:34रही है.
02:36बालक की हर श्वास में अब कृष्ण का नाम रमता है, जो उसके अस्तित्व को लौकिक सीमाओं से उपर उठा
02:43चुका है.
02:46ब्रहमांड की ये शक्तिया अब बालक के मार्ग से काटों को हटा रही है, क्योंकि कृष्ण का दर्शन अब बस
02:52कुछ ही क्षणों की दूरी पर है.
02:56भगवान विश्णु का दिव्यरत अब बादलों के उपर स्थिर है, वे इस बालक के धैर्य की पराकाश्था को देखकर विस्मय
03:04में है.
03:06माया का घना जंगल जिसने अब तक अंगिनत आत्माओं को उल्जाया था, इस बालक की भक्ती के सामने नत्मस्तक हो
03:13गया.
03:15बालक अब वन के उस अंतिम छोर पर खड़ा है, जहां से संसार की सीमा समाप्थ होती है और वेकुंट
03:22की पहली आहट सुनाई देती है.
03:25क्रिश्न के दुरलब गर्शन की व्याकुलता अब बालक के भीतर एक महाजवाला बनकर धधक रही है, जो उसे अब और
03:33रुकने नहीं देगी.
03:35बालक वेकुंट की दहलीज पर खड़ा कापते पैरों से देखता है कि उसके सामने फैले अनंत आकाश में तारे नहीं,
03:43अपितु क्रिश्न के चर्णों की आभा चमक रही है.
03:48स्वया भगवान विश्नु शेशनाग की शयापर विराजमान अपनी योग निद्रा में बालक के हृदय में उठते संशय को एक मंद
03:56मुस्कान के साथ निहार रहे हैं.
04:00बालक के जठर में उठती भूख की ज्वाला उसे यह सोचने पर विवश कर देती है कि क्या यह वैराज्य
04:07केवल उसके मन का भ्रम है जो उसे मृत्यू की ओर ले जा रहा है.
04:12चारों और व्याक्त दिव्य सन्नाटा बालक के कानों में गूंजता है, जैसे ब्रहमांड स्वय उससे पूछ रहा हो कि क्या
04:20वह भौतिक सुखों को त्यागने के लिए वास्तव में तयार है.
04:25वह मिट्टी उठाकर अपने मस्तक पर लगाता है. यह तर्क देते हुए कि यदि क्रिश्न सत्य हैं, तो यह धूल
04:32भी उन्ही का अंश है और वही उसकी धूख का कारण भी है.
04:38विश्नु का गरूर अपनी विशाल भुजाओं और स्वर्णिम पंखों के साथ बालक के ठीक उपर मंदराता है, जिससे उत्पन्न वायू
04:46का जूखा बालक को उसकी तपस्या की परीक्षा लेने के लिए जखजोर देता है.
04:52बालक गरूर की दिव्यशक्ती के प्रभाव से लड़खडा कर गिरता है, परंतु उसका मन अभी उस अद्रिश्य ध्वनी में कृष्न
05:00का नाम खोजने का प्रयास कर रहा है.
05:04अंधेरे और प्रकाश के इस मिलन बिंदु पर बालक के भीतर का संशय एक दानव की भांती आकार लेने लगता
05:11है, जो उसे वापस संसार की ओर मुढने के लिए प्रेरित करता है.
05:17विस्तरत आकाश में वैकुंट की आभा अब मध्धम पढ़ने लगी है, जैसे बालक का आत्म विश्वास और उसकी भक्ती डग्मगाने
05:26लगी हो.
05:27भगवान विश्वान अपनी योग निद्रा तोरते हैं और उनकी एक द्रिष्टी मात्र से बालक के चारों और का वातावर्ण पुनह
05:35दिव्यस्वर्ण किर्णों से जग्मगा उठता है.
05:39अचानक बालक के भीतर की भूख एक तीवर वैराग्य में बदल जाती है और वह प्यास से तडपते हुए भी
05:46प्रभु के चर्णों का ध्यान करने लगता है.
05:50शुन्य में तैरते हुए वे अलौकिक द्रिश्य उसे दिखाई देने लगते हैं, जिनमें कृष्ण अपनी बांसुरी से समस्थ स्रिष्टी को
05:58सम्मोहित कर रहे हैं.
06:01पूरा वातावर्ण वैकुंट के उन भव्यद्वारों के समान प्रतीत होता है, जहां की शिलाएं भी कृष्ण के नाम का गुनगान
06:08कर रही हैं.
06:11विश्णु का गरुड अब अपने पंखों को समेट कर बालक के सामने जुक जाता है, जैसे वह उसकी भक्ती की
06:18कठोर परीक्षा के पूर्ण होने का संकेट दे रहा हो.
06:22बालक अपनी दुर्बलता को भूल कर खड़ा होता है, और उसका शरीर एक अलौकिक तेज से भर जाता है, जो
06:30उसकी सात्विक साधना का प्रमान है.
06:33उसकी आत्मा का संधर्ष अब शान्त हो चुका है, क्योंकि उसने समझ लिया है कि कृष्ण को पाने का मार्ग
06:40भूख प्यास से नहीं, अपितु केवल अटूट विश्वास से तय होता है.
06:46वैकुंट का प्रवेश द्वार अब बालक के लिए खुल रहा है, और वहां से दिव्य सुगंध और संधीत की ध्वनी
06:53उसकी इंद्रियों को आनन्दित कर रही है.
06:57स्वयन शेशनाग के फनों की छाया बालक को आशिरवात के रूप में प्राप्थ होती है, जिससे उसके मन में बचा
07:04हुआ अंतिम संशर भी भस्म हो जाता है.
07:08बालक अब संसार की सीमाओं को पीछे छोड़कर उस प्रकाश में समा जाने के लिए तैयार है, जो ब्रहमांड का
07:16केंद्र और कृष्ण का स्वयंका निवास स्थान है.
07:20कृष्ण की वो दुरलब जहलक जिसे देखने के लिए देव और दानव युगों से तरस्ते हैं, अब मात्र कुछ ही
07:27कदम की दूरी पर बालक की प्रतीक्षा कर रही है.
07:32प्राचीन वट वरिक्षों की विशाल शाखाएं जैसे बालक का स्वागत करने के लिए जुकीं और उनसे निकलने वाली दिव्यत अरंगे
07:40ब्रहमांडिय संगीत सा गूंजने लगीं.
07:43गरुर देव अपनी विशाल स्वन आभा के साथ आकाश में प्रकट होते हैं, उनकी उपस्थिती से बन का प्रत्येक पत्ता
07:51भक्तिमय थर्थराहट से कांप उठता है.
07:55बालक देखता है कि विरिक्षों की चाल पर स्वतह ही कृष्ण के नाम की रिखाएं उभर रही हैं, मानो प्रकृती
08:02स्वय उस अनंत सत्य का शिलालेख बन गई हो.
08:06पवन के हर जोके में एक अलौकिक सुगंध बहती है, जो बालक के हरिदय की अंतिम सांसारिक स्मृतियों को भी
08:14पूरी तरह धो देती है.
08:17सहसा वन के बीचों बीच एक अद्रिश्यद्वार खुलता है, जहां से निकलती प्रकाश की किर्ने समुचे ब्रहमांड के अस्तित्व को
08:25चुनौती दे रही हैं.
08:28भगवान विश्णु का शंकनाद पूरे वन में प्रतिध्वनित होता है, जिससे बालक को आभास होता है कि वह अब अपने
08:36इश्ट की दहलीज के अत्यंत निकट है.
08:40वन की लताएं स्वयं को बालक के मार्ग में बिच्छा देती हैं, मानों वे उसे उस महान मिलन की ओर
08:46सादर आमंत्रित कर रही हों.
08:50वातावर्ण में एक अनुपम शान्ती चा जाती है, जहां पक्षियों का कलरभी अब कृष्ण की स्तुती का एक स्वर बन
08:57चुका है.
08:59बालक देखता है कि प्रत्येक व्रिक्ष के तने में एक दर्पन के समान प्रतिबिम्भ है, जिसमें वह स्वयं को नहीं,
09:06बलकि कृष्ण के अनन्त रूपों को देख पा रहा है.
09:11स्वयं शेशनाग की दिव्यद्रिष्टी बालक पर केंद्रित है, जो उसकी भक्ती की परीक्षा में निरंतर उसका मार्ग दर्शन कर रही
09:19है.
09:20वन की भूमी अब साधारन मिट्टी नहीं, बलकि रतनों के चूर्ण से चमक रही है, जो बालक के चर्णों को
09:28एक दिव्यस पर्ष प्रदान कर रही है.
09:31आकाश से गिरते हुए पारिजात के पुष्प बालक के मस्तक पर एक तिलक की भांती सज जाते हैं, जो उसके
09:39इश्वरिय चयन का प्रमाण है.
09:42वन की गहनता में उसे एक मधुर मुरली की ध्वनी सुनाई देती है, जो समय के चक्र को थामने की
09:49ख्षमता रखती है.
09:51स्रिष्टी के रचिता ब्रहमाजी का तेज उस स्थान पर समाया हुआ है, जो बालक की चेतना को पूरी तरहे प्रबुद्ध
09:59कर रहा है.
10:01व्रिक्षों के बीच बहने वाली छोटी सी धारा में अब जल नहीं, अपितु अमरित का प्रवाह हो रहा है, जो
10:08वन की उर्जा का केंद्र है.
10:12आध्यात्मिक उर्जा की यह तीवर्ता बालक के भीतर छुपे हुए अनंत धैर्य को दिव्य शक्ती में रूपांतरित कर देती है.
10:20दूरी पर स्थित परवत शिक्रों से निकलती दिव्य जोती बालक को उस दिशा की ओर बुला रही है, जहां सत्य
10:28का सूर्य उदे हो रहा है.
10:31समस्त देवगण अद्रिश रूप में इस दुरलभ मिलन के साक्षी बनने हेतु वहां उपस्थित हैं, उनकी प्रार्थनाएं वन के हर
10:39कण में समाहित हैं.
10:42अब बालक का व्यक्तित्व एक सामान्य देह से उपर उठकर इश्वरिय आभा से दैदी प्यमान हो चुका है, जो स्वयंप्रकाश
10:50का ही एक अंग है.
10:53ब्रहमान्ड के समस्त रहस्य उस अंतिन द्वार के पीछे छिपे हैं, जहां बालक अब अपना पहला कदम रखने जा रहा
11:00है.
11:02बालक उस दिव्यधरातल पर स्थिर होकर बैठ गया है, जहां चारों और केवल चैतन्य की सुवर्णमे तरंगे प्रवाहित हो रही
11:10हैं.
11:12विश्नु भगवान अपने शेशनाग शया से उठकर बालक की एकागरता को अत्यंत प्रेमपूर्ण द्रिष्टी से निहार रही हैं.
11:21बालक ने अपनी श्वास को नियंत्रित कर भीतर की अगनी को जगा दिया है, जिससे उसका संपूर्ण शरीर एक दिव्यधीप
11:29की भांती जलने लगा है.
11:32एकागरता का वहक्षन इतना गहरा है कि ब्रहमांड की समस्थ हल्चलें जैसे उस बालक के भीतर ही सिमट गई हो.
11:51गरुर देव अपनी विशाल पंखों को समेट कर बालक की अदमय इच्छा शक्ती के सामने नत्मस्तक होकर खड़े हैं.
12:00बालक की पाँचों इंद्रिया अब बहिर मुखी न रहकर केवल भीतर बैठे उस परम प्रकाश को ही देख पा रही
12:07हैं.
12:09शुने के उस पार बालक को कृष्ण के कमल चर्णों की मंदमंद सुगंध का आभास होने लगा है.
12:17उसकी धमनियों में बहटा हुआ रक्त अब सामान्य नहीं, बलकी प्रेम और समर्पन के अमरित में परिवर्तित हो रहा है.
12:26नारद मुने अपनी वीना के तारों पर शान्ती का स्वर छेड़े हुए बालक की इस तपस्या का गान कर रहे
12:33हैं.
12:35बालक का प्रान वायू अब उसके मस्तक के मध्य चक्र में जाकर स्थिर हो गया है, जहां से वह इश्वरिय
12:41दर्शन की प्रतीक्षा कर रहा है.
12:45ब्रहमांड के समस्त नक्षत्र उस बालक के इर्दगिर्द एक दिव्य सुरक्षा कवच की भान्ती घूमने लगे हैं.
12:53संसार की अगनी अब बालक को जलाने के स्थान पर उसे और अधिक शुद्ध स्वर्ण की भान्ती निखार रही है.
13:02भगवान विश्णु मुस्कुराते हैं और उनके ओष्ठों की वही मुस्कान उस बालक के मुख पर प्रतिबिम्बित हो जाती है.
13:11बालक ने अब समय और स्थान की सीमाओं को पूरी तरह से त्याग दिया है, वह सर्वव्यापी हो गया है.
13:19उसकी एक आगरता की अगनी से उत्पन्न प्रकाश इतना तीवर है कि वह ब्रहमांड के अंधकार को मिटा रहा है.
13:28वन से आरंध हुई यह यात्रा अब आध्यात्मिक चर्मोतकर्ष के उस बिंदु पर है जहां द्वैत का अंथ होने वाला
13:36है.
13:38ब्रहमा जी भी अपनी कमंडलू लेकर इस बालक के साहस और तपस्या को नमन करने हेतु उपस्थित हो गए हैं.
13:46अब बस एक अंतिम श्वास की प्रतीक्षा है, जिसके बाद बालक का आत्मा क्रिश्न के प्रकाश में विलीन हो जाएगा.
13:55जैसे ही बालक अपनी इंद्रियों को पूर्ण त्यागता है, ब्रहमांड का अंतिम द्वार एक गूम्ष के साथ खुल जाता है.
14:05ब्रहमांड के उस अंतिम द्वार के खुलते ही वैकुंट के शिकरों से निकलती एक अलौकिक नीली कांती संपूर्ण शूनि को
14:12प्रकाशित कर देती है.
14:15भगवान विश्नु अपनी शेश्या पर विराज मान होकर मुस्कुराते हैं और उनके नेत्रों की चमक से समस्त लोकों में एक
14:23अधुद शान्ती चाजाती है.
14:27बालक की आत्मा धीरे-धीरे अपने भौतिक शरीर को त्याग कर प्रकाश की उस अनंत धारा में एक पतंगे की
14:34भाती समाहित होने लगती है.
14:37उस दिव्य मिलन के क्षण में ब्रहमांड के कणकण में मुर्ली की वो चिरपरिचित ध्वनी पुनह गूंच उठती है जो
14:45साक्षात गोलोक का आमंतरण है.
14:48शूने के परे एक विशाल स्वर्ण द्वार प्रकट होता है, जिसके चारों और कमल के पुष्प अंतरिक्ष में तैर रहे
14:55हैं.
14:57गरुर देव अपने पंखों को फैला कर उस द्वार के सम्मुख जुक जाते हैं, जैसे वे किसी अत्यंत प्री अतिथी
15:04का स्वागत कर रहे हूं.
15:07मुरली की गूंज अब इतनी प्रकर हो गई है कि वह बालक की चेतना को पूरी तरह से कृष्ण के
15:13चर्णों में समर्पित कर देती है.
15:17समय का चक्र मानो ठहर सा गया है और चारों और केवल प्रकाश का ही अस्तित्व शेश रह गया है.
15:25दूर से ही वैकुंठ की अध्भुत भव्यता दिखाई देने लगती है, जहां का वातावर्ण प्रेम और भक्ती के रंग में
15:32डूबा हुआ है.
15:35भगवान श्री कृष्ण के पार्षदों ने दिव्य पुष्पों की वर्षा करना आरंभ कर दिया है, जिससे समस्त ब्रहमांड सुगंधित हो
15:42उठा है.
15:45बालक की चेतना अब उस दिव्य संगीत के साथ एक लए में बंध गई है, जहां न कोई पीडा है
15:51और नहीं कोई बंधन.
15:54पुरे ब्रहमांड में एक ऐसी दिव्य शांती का संचार होता है, जैसा की प्रलय के पश्चात भी नहीं देखा गया
16:01था.
16:03वैकुंठ का वह विशाल प्रांगन अब अपनी स्वर्ण आभा से बालक की प्रतीक्षा कर रहा है.
16:10नारद मुनी अपनी वीना की तान में उसी मुर्ली के स्वर को मिला कर एक अलोकिक संगीत की रचना करते
16:17हैं.
16:19बालक का तेज अब इतना बढ़ गया है कि वह स्वयं उस प्रकाश पुंच का एक हिस्सा बन चुका है.
16:27ब्रहमांड की हर एक दिशा से मानो केवल प्रेम की ही ध्वनी आ रही है जो बालक को पुकार रही
16:34है.
16:35वैकुंट का मुख्यद्वार धीरे धीरे खुल रहा है जिससे अंदर की दिवयकांती बाहर की ओर बह रही है.
16:44इस दुरलब द्रिश को देखकर स्वर्ग के समस्त देवताभी नत्मस्तक होकर इस मिलन का साक्षी बनने को लालायत है.
16:53बालक अब पूर्णतह कृष्णमय हो चुका है जहां उसकी पहचान अब केवल एक इश्वर भक्त की रह गई है.
17:02मुरली की अंतिन गूंच के साथ ब्रहमांड का वह द्वार पूरी तरह खुल जाता है और एक नए युक का
17:09सूत्रपात होता है.
17:12ब्रहमांड के द्वार खुलते ही अचानक एक भीशन बवंडर ने आकाश को काले बादलों से ढख दिया जैसे प्रकृती स्वय
17:20उस बालक के अटल संकल्प को चुनौती दे रही हो.
17:24बैकुंट के स्वर्ण शिखर से भगवान विश्नु ने अपनी कमलसी आखों से इस परीच्शा को देखा और मंद मुस्कान के
17:32साथ गरूर से कहा कि यहां आंधी नहीं, बलकि भक्त की पातरता की अगनिपरीच्शा है.
17:39तेज हवाएं उसके वस्त्रों को छिन्न भिन्न करने लगी, परंतु बालक का ध्यान अपने भीतर गुंजती उस मुर्ली की तान
17:47से एक क्षण के लिए भी विचलित नहीं हुआ.
17:50आस्मान से गिर्ती हुई वजर्पात जैसी वर्षा ने धरातल को जल्मगन कर दिया, पर बालक का निश्चल शरीर एक अभेद्य
17:58शिला के समान अडिक खड़ा रहा.
18:01प्रकृती के उन भयनकर तत्वों के बीच बालक ने अपनी चेतना को कृष्ण के चरंटमलों में लीन कर दिया, जिससे
18:09एक दिव्य सुरक्षा घेरा उसके चारों और निर्मित हो गया.
18:13कैलाश परवत पर बैठे महादेव ने अपनी तीसरी आख से इस द्रिश का अवलोकन करते हुए कहा कि यह केवल
18:21वर्षा नहीं, बल्कि सांसारिक मोह का अंतिम प्रहार है.
18:26मुसलाधार बारिश के थपेडों के बीच बालक के मुख पर एक अलौकिक शांती थी, मानो वह इन बाधाओं को केवल
18:33माया का एक तुछ खेल समझ रहा हो.
18:37अचानक वातावर्ण में एक भारी सन्नाटा चा गया और बाधलों की गर्जना किसी शंकनाद के समान ब्रहमांड के हर कोने
18:45में प्रतिध्वनित हो गई.
18:48बालक ने अपनी आखें खोली और उसे सामने के घने अंधकार में कृष्ण का वह चतुर्भुज रूप दिखाई दिया, जो
18:55स्वयन स्रिष्टी की रचना का आधार है.
18:59स्वयन नारायन अपनी संपूर्ण दिव्यता के साथ उस शूदर बालक के सम्मुख प्रकट हुए, जिससे वह समूचावन छेत्र स्वर्ण के
19:08प्रकाश से जगमगा उठा.
19:11बालक ने लज्जा और प्रेम से अभिभूत होकर अपने मस्तक को धर्ती पर टिका दिया, उसकी आखों से बहे आसूओं
19:18ने चर्णों को पवित्र कर दिया.
19:21माया की वर्षा तुरंत रुप गई और प्रकृती ने अपना रौधर रूप त्याग कर एक कोमल पुष्प वर्षा का रूप
19:28धारण कर लिया.
19:30श्री कृष्ण ने अपनी कोमल मुस्कान के साथ बालक के सिर पर हाथ रखा, जिससे उसकी आत्मा के समस्त कर्म
19:38बंधन उसी क्षन भस्म हो गए.
19:41बैकुंट की गूंजती हुई घंटियों और देवताओं के जयगोश से वह स्थान गूंज उठा, जैसे कोई महान भक्त अपनी अंतिम
19:49परीच्शा को पार कर चुका हो.
19:52भगवान ने कहा कि हे वत्स, आज तुने न केवल प्रकृती पर विजय प्राप्त की है, बलकि अपनी भक्ती से
19:59तुमने मुझे अपने अधीन कर लिया है.
20:03शूद्र बालक अब साधारण मनुष्य नहीं रहा, बलकि उसकी चेतना ब्रहमांड के उन रहसियों को धारण कर चुकी थी, जिन्हें
20:11पाने के लिए रिशी भी युगों तक तप करते हैं.
20:15अचानक वह दिव्य रूप लुप्त हो गया, परन्तु उसके जाने के बाद वह वन अब किसी सामान्य स्थान के बजाए
20:22एक जागरित तीर्थ स्थल बन गया था.
20:26बालक धीरे धीरे खड़ा हुआ, अब उसके भीतर की मुर्ली की ध्वनी शान्त हो चुकी थी, क्योंकि वह स्वया उस
20:33आनंद का केंद्र बन गया था.
20:36ब्रहमांड के सभी देवता इस विरल मिलन को देखकर अभीभूत थे, क्योंकि प्रेम की विजय के सामने किसी भी तपका
20:44महत्व गौन हो जाता है.
20:47शूद्र बालक की यह यात्रा पूर्ण हुई, और अब वह इस धरा पर क्रिश्न के प्रेम का वाहक बनकर सत्य
20:54के मार्ग पर अग्रसर हुआ.
20:56बालक अब पूर्णत वैकुंठ के उस दिव्य प्रकाश में निमग्न हो चुका था, जहां चारों और केवल अनंत स्वर्ण कमलों
21:04की आभा बिखरी थी.
21:07भगवान विश्नु ने गरूर के साथ उपस्थित होकर बालक की उस अगाध निश्ठा को देखा, जहां उसके भीतर का शूद्रहंकार
21:15पूरी तरह भस्म हो चुका था.
21:18बालक ने जुक कर अपने मस्तक को प्रभू के चर्णों में अर्पित कर दिया, और उसके आसूओं से धर्ती का
21:24वह कोना पवित्रहो उठा.
21:27ब्रहमांड के शूने में एक दिव्यध्वनी गूंजी, मानो स्वयं प्रकृती उस नश्वर जीव की अमर्ता के स्वागत में उच्सव मना
21:35रही हो.
21:37वह वन अब एक तपोभूमी में परिवर्तित हो गया था, जहां की वायू में भी कृष्ण के नाम का मधुर
21:44स्पंदन अनुभव किया जा सकता था.
21:47नारद मुनी ने वीना के तार छेड़ते हुए बालक के समर्पन के उस दुरलब ख्षन का गायन किया, जिससे देवताभी
21:54भाव विभोर हो गए.
21:57बालक की दृष्टी अब बाहे जगत से हटकर उस जोती के भीतर केंद्रित थी, जिसे पाने के लिए रिशिमुनी युगों
22:04से तपस्या कर रहे थे.
22:07चारों और एक दिव्य शान्ती छा गई, मानों समय का प्रवाह रुप गया हो और आत्मा का पर्मात्मा से मिलन
22:14का चक्र पूर्ण हो गया हो.
22:16समस्त देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की, यह स्विकार करते हुए कि प्रेम के मार्ग में वर्ण या जाती
22:24का कोई स्थान नहीं होता.
22:26भगवान विश्णु मुस्तुराएं और उन्होंने बालक के मस्तक पर अपना अभ्यहस्त रखा, जिससे उसके भीतर दिव्यध्यान की जोती प्रजवलित हो
22:36गई.
22:37बालक ने अब अनुभव किया कि वह स्वयं कृष्ण का ही अंश है, जो इतने समय से माया के पर्दों
22:44में छिपा हुआ था.
22:46उसका हरिदय अब किसी मंदिर के गर्भगरे के समान हो गया था, जहां प्रभु सदैव विराजमान रहने का वचन दे
22:53चुके थे.
22:55धर्ती और आकाश के मध्य की दूरी मिट गई थी, क्योंकि अब बालक की चेतना संपून ब्रहमान्ड में व्याप्थ हो
23:02चुकी थी.
23:04शिवजी ने कैलाश से अपनी आखें खोली और बालक के इस अध्गुत समर्पन को नमन किया, जिससे तीनों लोकों में
23:12हर्ष्छा गया.
23:14एक भी भौतिक इच्छा शेश न रहने के कारण, वह बालक अब पूरी तरह से स्वतंत्र होकर क्रिष्ण के प्रेम
23:21का वाहक बन गया था.
23:24यह वह क्षन था जब अहमकार का अंथ हुआ और सत्य के प्रकाश ने बालक के व्यक्तित्व को एक नई
23:30गरिमा प्रदान की.
23:33चारू और आनंद की ऐसी लहरेंग उठेन की स्वय जड़ पदार्थ भी प्रेम के स्पंदन में थिरकने लगे.
23:41भगवान के श्रीमुक से निकली वानी ने बालक को ब्रहम वैवर्थ की उस गेहन विद्या का अधिकारी बना दिया, जो
23:48अब तक गुप्त थी.
23:50बालक अब केवल एक शूद्र बालक नहीं रहा, बलकि वह भक्ती का एक ऐसा स्तंप बन गया था जिससे आने
23:57वाली पीधिया प्रेरित होंगी.
24:00कृष्ण के प्रेम का वह अमर्दीप अब पूरी दुनिया को सत्य के मार्ग पर ले जाने के लिए प्रजवलित हो
24:06चुका था.
24:08ब्रहमांड की सीमाएं जैसे सिमट सी गई और एक दिव्य नीले रंका तेजोमय प्रकाश पुंजवन के सन्नाटे को चीरता हुआ
24:16बालक के समक्ष प्रकट हुआ.
24:19गरुर पर आरूड होकर साक्षात विश्नु अपने चतुर्भुज रूप में बालक को दर्शन देने के लिए उस दिव्यद्वार पर पधारे.
24:28बालक की देह से निकलने वाली सात्विक रश्मिया उस महाशक्ती के तेज में विलीन होने के लिए आतुर हो उठी.
24:37आकाश से उतरती उस उर्जा की गूंच से जैसे समस्थ लोकों के आधार स्तंभ कांप उठे हो और काल की
24:44गती थम गई.
24:46समस्थ देवगन इस अलौकिक मिलन को देखने के लिए स्वर्ग के वातायन खोल कर नत्मस्तक हो गए.
24:53देवराज इंद्र ने अपने दिव्य सिनहासन से उठकर उस शूद्र बालक के चर्णों में अपनी अंजली अर्पित की.
25:01कृष्ण के उस दुरलब दर्शन ने बालक के भीतर स्थित अज्यान के सारे अंधकार को एक ही पल में भस्म
25:08कर दिया.
25:09शून्यता में विलीन होता वह बालक अब साक्षात ब्रह्मांड का प्रतिविंग बन चुका था.
25:16वातावर्ण में प्रवाहित होने वाली पवित्र ध्वनी ने उस वन के कणकण को जैसे जीवंत कर दिया.
25:23भगवान विश्नु ने मुस्कुराते हुए अपना हस्तक्मल बालक के मस्तक पर रखा, जिससे वह अनंत ज्यान का सागर बन गया.
25:32प्रत्येक स्पर्ष के साथ बालक के हरिदय से निकलती भक्ती की धाराएं संसार के समस्त पापों को धोने की क्षमता
25:40प्राप्त कर रही थी.
25:42स्रिष्टी के इस अध्भुत द्रिश्य को देख शेशनाग भी अपने सहस्त्र मुखों से उस बालक के यश्का गान करने लगे.
25:51संपूर्ण ब्रहमांड में एक ऐसी दिव्य शान्ती का संचार हुआ जो युगों-युगों से खोई हुई थी.
25:58देवर्शी नारद वीना बजाते हुए उस दिव्य मिलन की साक्षी बने और नारायन नाम का कीर्टन मुखर हो उठा.
26:06बालक के नेत्रों से बहने वाले आनंद के अश्रुमोतियों की भांती प्रिथवी पर गिरकर दिव्य उर्जा के स्रोत बन गए.
26:15वह दिव्यस्थान जो अब तक साधारण वन था, अब वैकुंट का एक जीवित द्वार बन चुका था.
26:22इतने विशाल एश्वर्य के सामने भी बालक की विनमरता और भी अधिक प्रगाड हो गई.
26:29भगवान ने संकेत दिया कि अब यह भक्ती का दीप इस शूदर बालक के हाथों ही पूरी प्रिथवी को प्रकाशित
26:36करेगा.
26:38उस अद्भुत क्षण में समय ने जैसे अपना नाम बदल दिया और वह युग क्रिश्न की भक्ती का युग कहलाया.
26:46अंतः वह शूदर बालक भगवान के श्रीचर्णों में अपना सर्वस्व समर्पित कर अनंत आनंद में डूब गया.
26:54ब्रहमांड के अनंत विस्तार में वह बालक अब स्वयं को शून्य और पूर्णता के मध्य एक सेतु के रूप में
27:01अनुभव करने लगा.
27:03विश्णु के स्वरूप में अनंत काल का स्वामी उस बालक की भक्ती से द्रवित हो अपनी दिव्य मुस्कान बिखेरते हैं.
27:11बालक की बंद आखों के भीतर एक प्रकाश पुन्ष साक्षात भगवान की सुक्ष्म उपस्थिती का स्पंदन बनकर गूँज उठता है.
27:21समय मानो थम गया है और ब्रह्मांड की समस्थ उल जाएं उस बालक के हृदय में एक बिंदु पर सिमट
27:28आई है.
27:30बाहरी जगत के कोलाहल से दूर वह अब उस परम ध्वनी को सुन रहा है जो आदी और अंत से
27:37परे है.
27:39भगवान नारायन का वह सुक्ष्म रूप उसकी आत्मा को स्पर्ष करता है जैसे ग्रिश्म रितु में ठंडी फुहार का आभास.
27:47बालक के रोम रोम में अब केवल एक ही नाम अंकित हो गया है जो स्रिजन की आधार्शिला है.
27:55ब्रहमांड के तारे उसके भीतर नृत्य कर रहे हैं क्योंकि वह अब बाहर की सीमाओं में नहीं बलकी भीतर के
28:02सत्य में स्थित है.
28:05वह देखता है कि जिसके लिए वह वनों में भटक रहा था, वह तो सदैव उसकी चेतना के केंद्र में
28:11विराजमान था.
28:13श्री कृष्ण की मधुर वन्शी की प्रतिध्वनी उसके मन के भीतर एक दिव्य अमरित का संचार कर रही है.
28:21उसके अश्रु अब दुहक के नहीं बलकी उस असीम आनंद के प्रतीक हैं जिसे शब्दों में बांधना असंभव है.
28:30वह दिव्य अनुभव किसी अगनी से कम नहीं, जो उसके भीतर के समस्थ सांसारिक अहमकार को भस्म कर देता है.
28:39दसों दिशाएं उस बालक की भक्ती के प्रभाव से एक दिव्य सुगंध और शांती का अनुभव कर रही हैं.
28:48पर्मात्मा अब उसके लिए कोई दूरस्थ नक्षत्र नहीं, बल्कि उसकी स्वयंकी धड़कनों का आधार है.
28:56उस बालक ने अपने भीतर जो प्रकाश पाया है, वह समस्थ ब्रहमांड को नया अर्थ देने के लिए परियाप्त है.
29:05ब्रहमांड के नियंता ने उस बालक को वह द्रिष्टी प्रदान की है, जिससे वह कणकण में कृष्ण को देख सकता
29:12है.
29:13अब बालक के लिए कोई मार्ग शेश नहीं, क्योंकि वह उस गंतव्य पर पहुँच चुका है, जहां से कोई आगे
29:21नहीं जाता.
29:23विश्णु मुस्तुराते हुए उस बालक के भीतर ही अंतरध्यान हो जाते हैं, एक अटूट एकात्मता स्थापित करते हुए.
29:32बालक अब केवल एक शूद्र नहीं, अपितू भक्ती का वह जीवन्त स्वरूप है, जिसने परमात्मा को अपने हृदय में बसा
29:39लिया है.
29:42ब्रहमांड की तरंगे इस अभूत पूर्व मिलन के साक्षी बनकर अनंत काल तक इस कथा का गायन करेंगी.
29:49बालक के नेत्रों में अब सांसारिक मोह का अंधकार मिटकर उस अनंत नील आकाश की चमक समा गई है, जो
29:57कृष्ण के दर्शन से उपजी है.
30:00वह अपनी सुधबुध खो चुका है, मानो उसका शरीर अब केवल एक पात्र है, जिसमें इश्वर की दिव्य सुगंध निरंतर
30:08प्रवाहित हो रही है.
30:11उसके चर्णों की पच्चाप में अब संकोच नहीं, बलकी एक सिद्ध साधक का अटूट आत्म विश्वास और ग्रिड़ता मुखरित हो
30:19रही है.
30:21प्रकृती भी उसके सम्मान में अपनी लए बदल रही है, व्रिक्षों की शाखाएं जुपकर मानो उसे मार्ग की शुभाशिश प्रदान
30:29कर रही है.
30:31वन के सन्नाटे में अब कोई भय नहीं, बलकी बालक के भीतर गूंजता उंकार का नाद संपूर्ण वातावर्ण को पवित्र
30:39कर रहा है.
30:41उसने पीछे मुर कर देखा तो पाया कि उसके पुराने शुद्र जीवन के सभी संसकार एक धुंध की तरह मिट
30:49गए हैं.
30:51अचानक उसके मार्ग में एक विशाल दिव्य प्रकाश का स्तंभ प्रकट होता है, जो उसे आगे की यात्रा का संकेत
30:58दे रहा है.
31:00वह इस प्रकाश को देख कर मुस्कुराता है, क्योंकि वह जानता है कि यह कृष्ण की कृपा का अगला चरण
31:08है.
31:09सिद्ध साधक के रूप में परिवर्थित वह बालक अब उन गुप मार्गों का अनुसर्ण करता है, जो सीधे प्रभु के
31:17धाम की ओर ले जाते हैं.
31:20उसके भीतर की एकात्मता इतनी प्रगाड है कि उसे अब भूख प्यास का भान भी नहीं, वह निरंतर भक्ती के
31:27अमरित का पान कर रहा है.
31:30वन की गेहन गुफाओं के भीतर उसे दिव्य संगीत सुनाई देता है, जो बानसुरी की मधुर और सम्मोहक ध्वनी जैसा
31:38प्रतीत होता है.
31:41वातावर्ण में एक अध्भुत सुगंध फैल गई है, जैसे की साक्षात वैकुंट का वैभव प्रित्वी पर उतर आया हो.
31:59सार की सीमाएं उसके लिए धुंधली हो चुकी हैं, और वह अब सत्य के धरातल पर विचर्ण कर रहा है.
32:07वह एक शांत जलाशय के पास रुपता है, जहां का जल कांच की भानती स्वच्छ है और उसे अपना नहीं,
32:14कृष्ण का प्रतिबिंद दिखाता है.
32:18यह प्रतिबिंद उसे सचेत करता है, कि अभी उसे और अधिक आंतरिक शुद्धता के शिखर को चुनाशेश है.
32:27वह जलाशय के शीतल जल को अपने मस्तक से लगाता है, और एक नया संकल्प उसकी आत्मा में जागरित होता
32:34है.
32:36प्रकृती के कणकण में उसे अब कृष्ण की लीलाओं का साक्षात अनुभव हो रहा है, जो उसकी चेतना का विस्तार
32:43कर रहे हैं.
32:45अब वह साधारन बालक नहीं रहा, उसकी देह अब तेज और भक्ती की अगनी में तपकर कुन्दन की भांती चमक
32:53रही है.
32:55एक महान प्रस्थान के साथ वह उस अज्यात लोग की ओर बढ़ता है, जहां कृष्ण की परम लीलाएं उसकी प्रतीक्षा
33:03कर रही है.

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