पद्म पुराण के पाताल खंड और उत्तर खंड के इस अत्यंत मार्मिक और रहस्यमयी अध्याय में देखिए कैसे मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम को राजधर्म और कुल की प्रतिष्ठा के लिए अपने जीवन का सबसे हृदयविदारक निर्णय लेना पड़ा। जब गुप्तचर भद्र की सूचना के बाद अयोध्या में लांछन की ज्वाला भड़क उठी, तब लक्ष्मण को गर्भवती माता सीता को गंगा और तमसा तट के घने वन में छोड़ने का गुप्त आदेश मिला। क्या था उस वन में महर्षि वाल्मीकि का रहस्यमयी आश्रम? कैसे एक निर्दोष महारानी को झेलना पड़ा वनवास? जानिए पद्म पुराण के इस रहस्यमयी प्रसंग में। Like, Share, and Subscribe for more unseen secrets from Hindu Puranas! #PadmaPurana #SitaNirvasan #Ramayan #HinduMythology #ValmikiAshram
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00:00अयोध्या की राजसी अटारी पर चंद्रदेव की शीतल किरने भी श्री राम के हृदय में धधक्ती चिन्ता की अगनी को
00:07शांत करने में विफल हो रही हैं।
00:10मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम अपनी स्वर्नशया पर बैठे, भदर की उस घातक सूचना के बोज तले दबे हुए हैं, जिसने
00:19उनकी व्यक्तिगत खुशी और राजधर्म के मध्य एक गहरी खाई खोद दी है।
00:25एक धौबी के कटू शब्दों ने मानो समस्थ इक्षवाकू वंश की मर्यादा को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया
00:32है, जहां से हर मार्ग केवल त्याग की ओर ही जाता है।
00:38आकाश में तारे मौन साक्ष दे रहे हैं, जैसे वे भी एक ऐसे राजा के दुख को देख रहे हैं,
00:44जो जगत के कल्यान हेतु अपने ही सुखों का गला घोंटने को विवश है।
00:50श्रीराम की दृष्टी अंतहपुर के कक्ष की ओर जाती है, जहां जान की निद्रा में लीन हैं, और यह दृष्य
00:57उनके हृदय में शूल की भाती चुभ रहा है।
01:01स्वयं को एक न्यायप्रिय शासक के रूप में देखते हुए, श्रीहरी के अवतार श्रीराम को अपने ही भीतर एक भीशन
01:09धर्मसंकट का कोलाहल सुनाई पड़ रहा है।
01:13क्या सिनहासन का मोह और कुल की मर्यादा प्रेम के उस पवितर बंधन से अधिक शक्तिशाली है, जिसे उन्होंने 14
01:21वर्ष के वनवास में सीचा था।
01:24अंधकार में लिप्टी अयोध्या नगरी में सब सो रहे हैं, केवल एक राजा का विवेक है, जो अपनी ही प्रजा
01:31के संदेह से लजजित होकर जाग रहा है।
01:35महर्शी वशिष्ठ और अन्यकुल गुरूओं के उपदेश उनके कानों में गूंज रहे हैं, जो बार-बार यही स्मरण कराते हैं
01:43कि राजा का निजी जीवन भी प्रजा की संपत्ती है।
01:48यदि वे जानकी को त्यागते हैं, तो उनकी आत्मा का एक अंश सदा के लिए अयोध्या की दीवारों में कैद
01:55हो जाएगा।
01:56किन्तु यदि वे प्रजा के मिथ्या कलंग को अंदेखा करते हैं, तो इक्षवाकू वंश का गौरव सदियों तक प्रशनों के
02:04घेरे में रहेगा।
02:06राम का हृदय एक और माता सीता की निर्दोष्टा की गवाही दे रहा है, तो दूसरी और राजा राम के
02:13मस्तक पर लगे उस अद्रिश्य दाग की पीड़ा बढ़ रही है।
02:18रात का प्रत्येक पहर उनके लिए युगों जैसा बीत रहा है, जहां हर क्षण एक निर्णय की ओर उन्हें धकेल
02:25रहा है।
02:27वे अपनी उंगलियों में अंगूठी को फिराते हैं, जो उन्हें उस अगनिप्रीक्षा की याद दिलाती है, जिससे सीता पहले ही
02:35गुजर चुकी है।
02:36क्या मर्यादा के लिए मानवता की आहुती देना ही एक राजा का एक मात्र धर्म है, यही प्रश्न उन्हें अंदर
02:45तक विचलित कर रहा है।
02:48नींद उनसे कोसों दूर है, क्योंकि नेती ने उनके सामने एक ऐसा सत्य परोस दिया है, जिसे वे चाहकर भी
02:55नकार नहीं सकते।
02:58अयोध्या की शान्थ हवाओं में उन्हें सर्यू का कलकल निनाद सुनाई दे रहा है, मानो नदी भी उनके आने वाले
03:05दुखद निर्नय को जान चुकी हो।
03:08उनके नेत्रों से बही एक अश्रू की बून्द उनके वक्ष पर गिरती है, जो उनके प्रेम की उस गहराई को
03:15परिभाशत करती है, जिसे दुनिया कभी समच नहीं पाएगी।
03:19वे अंत्ध उस निर्नय की ओर बढ़ने का साहस जुटाते हैं, जो उनके स्वयंके जीवन के अंत के समान है।
03:28मर्यादा की रक्षा के लिए अब अयोध्या का राजा अपनी सीता का त्याग करने का कठोर संकर्प ले चुका है।
03:37मध्यरात्री के सन्नाटे में अयोध्या के राजमहल का मुख्यद्वार धीरे से खुलता है, जहां चारों दिशाओं में दिव्य सुनहरी आभा
03:46बिखरी हुई है।
03:48श्रीराम अपने कक्ष में प्रवेश करते हैं, जहां उनके चहरे पर एक गंभीर और उदास दैविय तेज चमक रहा है,
03:56मानों वे युगों का भार उठाए हुए हुँ।
03:59भरत लक्षमन और शत्रुगन पहले से ही वहां उपस्थित हैं, उनके चहरे पर अपने अग्रच के प्रती अगात श्रद्धा और
04:08चिंता के भाव स्पष्ट हैं।
04:11कमरे की दीवारों पर जलती हुई मशालों की लौकांप रही है, जो मानों उस आने वाली विभीशिका की आहट का
04:18संकेत दे रही है, जिसे कोई नहीं टाल सकता।
04:22श्री राम ने अपनी वानी का सन्यम तोड़ते हुए प्रजा के उस असंतोष को व्यक्त किया, जिसने एक राजा की
04:30विवश्टा को चरम पर पहुचा दिया है।
04:34लक्षमन की मुठी क्रोध से भीच जाती है, और वे आवेश में आकर इस निर्णय को अन्याय की पराकाष्ठा बताते
04:41हैं।
04:43भरत और शत्रुगन हताशा में अपने सिर जुका लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि धर्म के इस कठिन प्रश्ण
04:51का कोई और उत्तर नहीं है।
04:54अयोध्या के इस एकांट कक्ष में शांती का सामराज्य है, जो भारी और बोजिल महसूस हो रहा है, मानो समय
05:02की गती ही रुक गई हो।
05:04श्रीराम ने द्रिर्टा के साथ लक्षमन की ओर देखा और उन्हें वह निर्देश दिया, जिसे पूरा करना एक भाई के
05:12लिए अगनी परीक्षा के समान है।
05:16लक्षमन मौन रह जाते हैं, क्योंकि राजा का आदेश उनके लिए पिता की आग्या के समान सर्वोप्री और अकाट्य है।
05:25बाहर बहती सर्यू नदी की लहरेंभी जैसे आज मौन हैं और चंद्रमा के प्रकाश में अयोध्या की सीमाएं उदास दिखाई
05:33दे रही हैं।
05:35पूरे कक्ष में एक भारी सन्नाटा है, जिसमें केवल श्री राम की शांत और गंभीर आवास गूंज रही है, जो
05:43सीता के निर्वासन की योजना का विवर्ण दे रही है।
05:47लक्ष मन को आदेश मिला है कि वे भोर होते ही माता सीता को महर्शी वालमिकी के आश्रम के बहाने
05:54गंगा तट पर छोड़ाएं।
05:57यह एक ऐसी यात्रा होगी जिसका अंत तो पता है, पर मार के कष्टों का अनुमान लगाना अभी असंभव है।
06:06शत्रुघन ने जैसे ही यह सुना, उनके नेत्र छल्चला उठे और वे एक शब्द भी नहीं कह सके, बस देखते
06:13ही रह गए।
06:15समय का चक्र अब घूम चुका है, और अयोध्या का गौरव अब एक कठोर निनय के नीचे दबने जा रहा
06:22है।
06:24श्री राम ने सभा समाप्त करते हुए एक बार अंतिम बार अपने भाईयों को आलिंगन में भर लिया, जैसे वे
06:31अपना आखिरी आशिरवाद दे रहे हुँ।
06:35सभा कक्ष की भव्यता अब उस निर्नय के बोज से दबी हुई है, और मशाले बुझने की कगार पर है।
06:43लक्षमन कक्ष से बाहर निकलते हैं, उनका शरीर काम प्रहा है, पर उनका मन उस कर्तव्य को पूरा करने के
06:50लिए तयार है, जिसे नेती ने सौपा है।
06:55अयोध्या के उपर बिखरे तारे मानो इस राजसी त्रास्दी को देख कर स्तब्ध हैं, और रात का सन्नाटा ही अब
07:02गवाह बन गया है।
07:04प्राची दिशा में सूर्य की पहली किर्ने अयोध्या के सुवर्ण कल्षों को स्पर्ष कर रही हैं, मानो प्रकृती भी इस
07:12नेती के क्रूर खेल को देख हत प्रभ खड़ी है।
07:16लक्षमन का हृदय किसी वजर के समान भारी है, फिर भी वे अपनी विवश्चता को एक सौमे मुस्कान के पीछे
07:24ढालने का अस्फल प्रयास कर रही हैं।
07:27देवी सीता ने बड़े उच्साह के साथ सुन्दर वस्त्रों और स्वर्ण आभूशनों को संदूक में सजाया है।
07:35यह सोचकर की वे वनवासिनियों को भेंट स्वरूप प्रदान करेंगी।
07:40राज महल के प्रांगण में खडा रत मानो किसी मूख साक्षे की तरहे इस अंतिम विदाई की प्रतीक्षा में अपने
07:47पहियों को थामे खडा है।
07:50सीता अपने सक्षियों की ओर देखकर मधुर मुस्कान बिखेरती हैं।
07:55अंजान की यह उनके राजसी जीवन का अंतिम सुखद प्रभात है।
08:00देवराज इंद्र के समान भव्य आभूशनों से सुसजित लक्षमन का व्यक्तित्व आज उनके अंतर्मन के द्वंद्व को छुपाने के लिए
08:09कवच बन गया है।
08:12सीता रत के समीग पहुँचकर लताओं को स्पर्ष करती हैं। जैसे वन की पवित्रता उन्हें अपनी ओर खीच रही हो।
08:20अयोध्या के आकाश में उरते हुए श्वेत पक्षियों के जुंड मानों नेती के किसी कठोर आदेश का संकेत दे रहे
08:28हैं।
08:30लक्षमन ने अपनी द्रिष्टी को नीचे जुका रखा है। वे जानते हैं कि यदि उन्होंने सीता की आँखों में देखा,
08:37तो उनका धैर्य तूट जाएगा।
08:40सीता अपने स्वामी श्रीराम के दर्शन हेतु अधीर हैं, किन्तु उन्हें क्या पता की वे स्वयन श्रीराम के आदेशानुसार ही
08:48विदा होने वाली हैं।
08:51रत की लगाम लक्षमन के हाथों में है, जो काम प्रही है, मानो वे रत को नहीं बल्कि अपने ही
08:58हृदय को रोक रहे हूँ
09:00महल के द्वारों पर लगी मशाले बुझ रही हैं और उनके धुए का गुबार उस आने वाले अंधकार को चित्रित
09:08कर रहा है
09:10सीता हंस्ते हुए रत पर सवार होती हैं, उनके मुख पर वन की शांती को अनुभव करने की अदमे जिग्यासा
09:17है
09:19लक्षमन का मुखमंडल गंभीर है, वे अपनी इंद्रियों को वश में करने का प्रयत्न कर रहे हैं ताकि सीता को
09:26उनकी व्याकुलता न दिखे
09:29रत के चक्के की आवाज अयोध्या की गलियों में गूज रही है, जैसे वह प्रित्वी सीता से विदाले रही हो
09:37आकाश से बरस्ते हुए फूलों की पंखुडिया आज भी उन राहों को सजा रही हैं, पर इन राहों का अंत
09:44अब निर्वासन की ओर है
09:47सीता अपनी सक्खियों को विदाई का संकेत देती हैं, वे अभी भी उस मिथ्या सुख में जी रही हैं, जो
09:54मर्यादा के नाम पर छिनने वाला है
09:58लक्षमन ने रत को मुख्य द्वार की ओर मोर दिया है, उनकी गती धीनी है, मानो समय को ही थाम
10:04लेना चाहते हूं
10:06रत के बढ़ते कद्मों के साथ अयोध्या की भव्यता धीरे-धीरे ओजल हो रही है, और तमसा का तट मानो
10:14प्रतीक्षा में खड़ा है
10:16सीता की प्रसंता का उल्लास एक दुखद सन्नाटे में विलीन हो रहा है, जो आने वाली पीडा का प्रथम चरण
10:24है
10:25गोम्ती नदी का तट समीप आते ही वातावर्ण में एक अजीब सी भारीपन घुलने लगी, जैसे प्रकृती स्वयन किसी अन्होनी
10:34की आहट सुन रही हो
10:36तट पर बैठे भगवान विश्नु अपने वैकुन्थ लोग से इस धरा की पीडा को देख रहे हैं, उनकी शांत आखों
10:43में ब्रहमांड की नेती का बोज जलक रहा है
10:47रत के पहियों की गड़गडाहट के बीच, आकाश में अचानक काले गिद्धों का एक बड़ा जुन्ड मंदराने लगा, जो किसी
10:55अमंगल का संकेत दे रहे थे
10:58सीता की द्रिष्टी उपर उठते ही एक अंजानी सिहरन ने उनके पूरे शरीर को जकड लिया, मानो किसी अद्रिष्य हाथ
11:06ने उनके हृदय पर प्रहार किया हो
11:09जैसे ही रत गोमती के गहरे जल को पार करने लगा, शीतल हवाएं एकाएक ठंडी और शुश्क होकर चीखती हुई
11:17गुजरने लगी
11:19भगवान शिव कैलाश परवत पर अपनी ध्यान मुद्रा से विचलित हुए, उनकी तीसरी आख हलकी सी फड़फडाई, जैसे वे इस
11:27महाविनाश की पूर्वसूचना से व्यथित हो
11:31लक्षमन ने लगाम को कसकर पकड़ा, उनका मुख मंडल चिन्ता और कर्तव्य के द्वंद्व से पीला पड़ गया था, परंतु
11:39वे मौन बने रहे
11:41आकाश की ओर देखते हुए सीता ने अपने वाम नेत्र के फड़कने का अनुभव किया, जो कुल की मर्यादा पर
11:48आने वाले संकट की प्रथम आहट थी
11:52गंगा के पवित्र तट पर पहुँचते ही, सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि वहां की हवाओं में भी एक अजीब
11:59सी उदासी तैरने लगी
12:02माता लक्ष्मी का स्वरूप लिये सीता ने हाथ जोड कर गंगा मया का आहवान किया, उनके नित्रों में अश्रू और
12:09अध्रों पर मौन प्रार्थना का स्वर्था
12:12तटकी सूखी रेट पर एक अज्यात निशाचर की पज्चाप सुनाई दी, जो इस तपोवन के वातावर्ण को पूरी तरह दूशित
12:20कर रही थी
12:22आकाश के सुदूर कोने में बिजली की एक ऐसी लकीर कौंधी, जिसने पूरे तटको क्षण भर के लिए भयभीत करने
12:30वाले श्वेत प्रकाश से ढख दिया
12:33वन के सन्नाटे को चीरते हुए दूर कहीं सियार की एक लंबी और भयावः पुकार सुनाई दी, जिसने सीता की
12:41शांती को पूरी तरह भंग कर दिया
12:44ब्रह्मा जी अपनी ध्यान स्थिती में स्रिष्टी की नेती को लिपिबध करते हुए रुक गए, मानो काल की लेखनी ने
12:51सीता के भविश्य पर एक गहरा विराम लगा दिया हो
12:55रत के समीब की घास अचानक मुर्जाने लगी, जैसे वहां से गुजरते ही धर्ती की उर्वर्ता को किसी ने छीन
13:03लिया हो
13:05सीता के गले में पहना हार, जो मंगल का प्रतीक था, बिना किसी कारण के तूटकर भूमी पर गिर गया
13:11और बिखर गया
13:14गंगा का जल प्रवाह अचानक थमसा गया, जैसे स्वय नदी भी इस महान विदा की विविश्टा को देख कर ठिठक
13:21गई हो
13:23नारग मुनी ने वीना के तारों को थाम लिया, उनके मुख से नारायन नारायन का स्वर्भी आज करोन रुदन जैसा
13:30सुनाई दे रहा था
13:32वायू का जोका सीता के मुख से आचल को हटा कर ले गया, मानो नेती अब उनके आवर्ण को ही
13:39मिटा देने पर उतारू हो
13:42अयोध्या की सीमा अब पूरी तरह ओजल हो चुकी थी और तमसा का काला तट सीता के स्वागत में किसी
13:48काल कोठरी की भानती खड़ा था
13:51नाव की काश्ट पर पड़े सीता के पच्चिनह जैसे अयोध्या के गौरव की अंतिन विदाई लिख रहे थे और तमसा
13:59का घनावन अब एक मौन गवाह बनकर उभरा
14:03लक्षमन के भीतर का अंतरदवन्द एक भीशन तूफान की भानती उनके मस्तक पर पसीने की बूंदों के रूप में जलक
14:11रहा था जिसे देख साक्षात प्रकृती भी स्तब्ध थी
14:15नाव से उतरते ही लक्षमन के पैर इस धर्ती पर जम गए मानो प्रित्वी स्वया उनके भारी मन का बोज
14:23उठाने में असमर्थ हो
14:25आकाश के धुन्धलके में एक चमक्ती दिव्यसत्ता स्वय महा विष्णु वैकुंठ के स्वन द्वार से इस करोंद्रिश्य को देख रहे
14:33थे
14:34मानो स्रिष्टी का कोई अनिवार्य चक्र पूरा हो रहा हो
14:39सीता ने चारों और फैली उस निर्जन वनस्थली को निहारा
14:42जहां पक्षियों का कलरभी आज किसी रहस्य में भय से मौन हो गया था
14:49लक्षमन का कंट सूख गया था
14:51वे सीता के सम्मुख खड़े थे
14:53किन्तु उनके नेत्र उस पावन देवी के तेज को सहने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे
15:00अचानक लक्षमन ने अपना धनुष भूमी पर रख दिया
15:03और एक योध्धा का गर्व उस वन की मिट्टी में विलीन हो गया
15:08परंपिता ब्रह्मा जो सत्य के विधानों को रचते हैं
15:12वे अपनी योग निद्रा में भी इस दुखद नेती के प्रहार को देख विचलित हो उठे
15:18सीता के कोमल चर्णों के निकट जुक कर लक्षमन ने घुटने टेक दिये
15:22मानो कोई अपराधी अपने न्यायाधीश के सम्मुख अंतिन प्रार्थना कर रहा हो
15:29उनकी आखों से निकले आसूओं की धारा ने वन की शुष्क धूल को गीला कर दिया
15:34जैसे बरसों की 85 धर्ती आज किसी दुखद अभिशेक के लिए तरस रही थी
15:40सीता की द्रिष्टी में वह शांत करुणा थी जो भविश्य के गर्भ में छिपी विभीशिका को पहले ही भांप चुकी
15:47थी
15:49महासागरों को भी लज्जित करने वाला वह सन्नाटा वहां व्याप्त था जहां केवल लक्षमन के भारी श्वासों की आहट सुनाई
15:57दे रही थी
15:59लक्षमन के मुख से शब्द निकले किन्तु वे वानों की भांती सीता के हरिदय को भेद रहे थे क्योंकि सत्य
16:06अब मर्यादा का भेश बदल कर सामने खड़ा था
16:10उन्होंने कापते हुए स्वर में स्विकार किया कि अयोध्या के सिनहासन की मर्यादा ने उन्हें निर्दोष सीता के निर्वासन का
16:18यह क्रूर आदेश दिया है
16:21अयोध्या के नागरिकों का वह संशय, जो आज एक रानी के लिए काल बनकर आया था, लक्षमन के कापते अधरों
16:29पर एक कलंप की भांती उभ्रा
16:32आकाश से गिरते हुए सूखे पत्ते मानो इस सत्य की गवाही दे रहे थे, कि अब प्रेम और कर्तवे का
16:39मिलनस्थल सदैव के लिए छिन्नभिन हो चुका है
16:43सीता का मौन उनके उत्तर से कहीं अधिक भारी था, उस मौन में रामायन की आने वाली सारी पीडा और
16:51त्याग का साराश समाहित था
16:54लक्षमन का वह महाविलाप, जो आज तमसा तट की चट्टानों से टकरा कर प्रतिध्वनित हो रहा था, मानो स्वयन वंदेविया
17:02भी उस क्रंदन में सम्मिलित हो गई हो
17:05धर्ती ने अपनी चाती पर इस पवित्र विच्छेद को धारण किया, और वन की जड़े मानो सीता के चर्णों को
17:13थाम लेने के लिए व्याकुल हो उठी
17:16तमसा का तट अब एक ऐसे इतिहास का साक्षी बन चुका था, जिसकी अनुगूंच सदियों बाद भी मर्यादा के नाम
17:23पर प्रशन बन कर खड़ी रहेगी
17:27सीता की चेतना जैसे ही शून्य में विलीन हुई, तमसा का शांत तट एक असहय मौन में डूब गया, मानो
17:34समय की धारा भी इस पवित्र विलाप को देखकर ठेहर गई हो
17:39स्वय आदिशक्ती के अंश स्वरूपा सीता जब धरातल पर अचेत गिरी, तो ब्रहमांड के अधिपती श्रीहरी ने बैकुंठ में अपनी
17:47योग निद्रा त्याग कर उस पीडा को अनुभव किया
17:51मूर्चा तूटने पर सीता की करुन पुकार से वन के हरिन और पक्षी भी स्तब्ध रह गए, जैसे प्रकृती के
17:58कणकण में एक महाविशात का ज्वार उठाया हो
18:02वन की गहन चाया में खड़ी वे देविया, जो व्रिक्षों के रूप में सदैव सीता का सनरक्षन करती थी, आज
18:10उस चीतकार को सुनकर अपनी जड़े कापती हुई महसूस कर रही थी
18:15सीता ने लज्जा और अपमान के उस सागर को देखते हुए निर्नै किया कि इस जीवन का अंथी अब एक
18:22मात्र मार्ग है और वे धीरे-धीरे तमसा के गहरे जल की ओर बढ़ी
18:28बैकुंट के परमधाम में श्रीहरी का हरिदय उस मात्र हरिदय की पीडा से द्रवित हो उठा और उन्होंने अपनी दिव्यद्रिष्टी
18:36से उस भावी वन्ष की रक्षा का संकल्क लिया
18:40जैसे ही सीता ने जल को स्पर्ष किया उनके गर्भ में पल रहे उस नन्हे स्पंदन ने उन्हें रोक लिया
18:47मानोस्वया रगुवंश का भविश्य उनसे जीवित रहने की प्रार्थना कर रहा हो
18:53तभी वन्ष के उस विशाल वट व्रिक्ष पर स्थित पक्षियों का कलरव अचानक थम गया
18:58जैसे ब्रहमांड ने सीता की उस मुख प्रतिग्या को स्विकार कर लिया हो
19:04सीता ने जल से बाहर निकलते हुए उस मिट्टी को माथे पर लगाया
19:08जो कभी उनके चर्णों के स्पर्ष से पवित्र हुई थी और आज उनके आसूओं को सोख रही थी
19:16शिवलोक में देवाधिदेव महादेव ने अपनी तीसरी आख से इस सत्य को देखा कि यह निर्वासन केवल एक दंड नहीं
19:24बलकि स्रिष्टी के चक्र का अनिवार्य अध्याय है
19:29माता प्रिथवी ने अपनी गोद में उस पीडा को महसूस किया और जंगल के हर पत्ते से एक मुख क्रंदन
19:36निकल कर आकाश तक पहुँचने लगा
19:39सीता अब उस मर्यादा की अगनी में जलकर और भी अधिक कुंदन की भांती चमकने के लिए तयार थी
19:46जिसे स्वयम मर्यादा पुरुशोत्तम ने अंजाने में रचा था
19:51तमसा के तट पर खड़े हुए वो व्रिक्ष जो सदियों से साक्षी थे
19:55आज सीता के उस द्रिड संकल्प के गवाह बन रहे थे जो आने वाले काल को बदलने वाला था
20:03वैकुंट के स्वामी ने गरुड को संकेत दिया कि वे अद्रिश्य रूप में माता की रक्षा हेतु उस वन के
20:09उपर सतत पहरा देते रहे
20:12सीता ने वन की लकडियों को एकत्रित कर एक कुटिया का आधार बनाया उनके हाथों में आज वो राजसी को
20:20मलता नहीं बलकि एक तपस्विनी का कठोर धैर्य था
20:25प्रकृती की हर आहट अब सीता के उस गर्भ की रक्षा के लिए सजग हो गई थी जिसे स्वयन कालचक्र
20:31ने भविश्य के इतिहास के रूप में चुन रखा था
20:35सीता ने जब तमसा की ओर अंतिमबार देखा तो उनकी आखों में शोक के स्थान पर एक गौर्वपूर्ण शान्ती का
20:43उदे हो चुका था
20:45कैलाश के शिखरों पर महादेव ने अपना ध्यान भंग किया और मंदमंद मुस्कुराते हुए नेती के इस क्रूर किन्तु आवश्यक
20:53मोर को स्विकार किया
20:56जंगल की घनी अंधेरी रातों में सीता के चर्णों की आहट से वन की लताएं स्वयं को मार्ग प्रशस्त करने
21:03के लिए बिछा देती थी
21:05तमसा का तट अब एक ऐसे इतिहास की जन्मस्थली बन चुका था जिसकी गौरव गाथा आने वाली पीढिया मर्यादा और
21:14त्याग के प्रतीक के रूप में गाएंगी
21:17तमसा के तट पर खड़े होकर देवी सीता ने अपनी आखों के कोनों से बहटे आसूओं को पोच्छा और अपने
21:24भीतर के अनंत धैर्य को एकत्रिप किया
21:28लक्षमन के नेत्रों में अपने बड़े भाई के प्रतीपीरा और अपनी कर्तव्यनिष्ठा के बीच छिड़े युद्ध को देख सीता ने
21:36एक ममतामई मुस्कान बिखेरी
21:39सीता ने स्थिर स्वर में कहा लक्षमन मर्यादा का यह मार्ग अत्यंत कठिन है किन्तु इसे अपना कर श्री राम
21:47ने स्वयन को एक राजा के रूप में अमर कर लिया है
21:52प्राचीन वनों की शीतल हवाएं मानो सीता के त्याग की साक्षी बनकर स्वयन को उस पवित्र तट पर थमा लेने
21:59का प्रयास कर रही थी
22:01वे बोली जाओ लक्षमन मेरे स्वामी से कहना कि उन्होंने जिसे त्याग दिया है वह सीता तो केवल देह से
22:09दूर है पर प्राणों से नहीं
22:12लक्षमन ने नत्मस्तक होकर अपनी दीदी के उस अध्भुत त्याग को नमन किया जैसे कोई शिष्य अपनी गुरु के समक्ष
22:20आत्मस्मर्पन करता हो
22:22सीता ने अपने शब्दों को एक मंत्र की तरह पिरोते हुए कहा कि उनके हृदय के मंदिर में श्री राम
22:29के चर्णों की छाप सदैव अनकित रहेगी
22:43सीता का संदेश हवाओं के माध्यम से अयोध्या के उन महल नुमा गलियारों तक पहुचाना अब लक्षमन के कंधों पर
22:51एक भारी उत्तरदायत्व था
22:54लक्षमन ने धीमे कदमों से पीछे मुर्ते हुए एक आखिरी बार सीता की उस शांत मूर्ती को देखा जो सत्य
23:01और त्याग का साक्षात प्रतिबिम्ब थी
23:05सीता ने अपने उस अंतिन संदेश को प्रभू श्री राम के चर्णों की धूल में अर्पित कर दिया जिसे केवल
23:11वही समझ सकते थे
23:14आकाश में बादलों ने अपना स्वरूप बदल लिया जैसे वे भी मर्यादा के इस कठिन निर्णय के लिए अपना मौन
23:21समर्थन दे रहे हो
23:24सीता का गौरव उनकी आखों में इस प्रकार जलक रहा था जैसे किसी समराट के मुकुट की चमक अंधकार को
23:31पराजित कर रही हो
23:33लक्षमन को यह ज्यात था कि ये शब्द केवल एक संदेश नहीं बलकि एक युग के लिए त्याग की एक
23:40अमर गाथा का आधार है
23:44सीता की वाणी में न कोई शिकायत थी और नहीं कोई पश्चाताप क्योंकि उनका प्रेम इस भौतिक अस्तित्व से कहीं
23:52उपर उठ चुका था
23:54समय मानो उसी क्षन के लिए ठहर गया था जहा त्याग और मर्यादा एक दूसरे के सम्मुक हाथ जोडे खडे
24:01थे
24:03सीता के पच्चेहन वन की मिक्टी पर इस प्रकार अनकित हो रहे थे मानो वे प्रित्वी को पवित्रता का नया
24:10अर्थ समझा रहे हूँ
24:12लक्षमन ने भारी मन से प्रस्थान किया जबकि पीछे छूपती सीता एक निडर सन्यासिनी के रूप में वन की शांती
24:20में विलीन होने लगी
24:22तमसा के तटकी वह गूम्ज जो सीता के अंतिन संदेश के रूप में निकली थी आज भी युगो युगो तक
24:29मर्यादा की रक्षा करेगी
24:32इस प्रकार नियती का वह क्रूर चक्रे एक सुन्दर अध्याय की रचना कर गया जिसने इतिहास को बलिदान की एक
24:39नई परिभाशा दी
24:42लक्षमन का रत वन के घने अंधकार से बाहर निकल कर शुष्क धूल भरी पकडंडियों पर तेजी से दौड रहा
24:49है जैसे वह स्वय अपने पश्चाताप से भाग रहे हूँ
24:54इंद्रप्रस्थ के आकाश में देवताओं के सभास्थल पर भगवान विश्णु अपने वैकुंठ के दिव्य कमल सिनहासन पर बैठे अत्यंत गंभीर
25:02और विचलित मुद्रा में देख रहे हैं
25:06रत की लगाम थामे लक्षमन की आखों से बहते अश्रु उनके स्वन आभोशनों पर गिरकर उनकी अंतर्मन की टूटन को
25:14प्रदर्शित कर रहे हैं
25:17अयोध्या की सीमाव पर खड़ा राजमहल का विशाल गोपुर आज एक नीरव शांती में लिप्टा हुआ किसी अन्होनी की आहट
25:24दे रहा है
25:27लक्षमन की रत के पहियों की ध्वनी अयोध्या के मुख्य द्वार पर पहुँचते ही रुक गई, मानो नगर की धड़कने
25:33भी उनके आने के भय से थम गई हो
25:37गरुर देव विश्णों के चर्णों के समीप रहकर इस मानवियत रास्दी को देख रहे हैं, उनके पंख भी इस भारी
25:44सन्नाटे में सिहर उठे हैं
25:48लक्ष्मन रत से उतरते ही डगमगाते कदमों से राजभवन की ओर बढ़ते हैं, उनका कवच आज उन्हें किसी भार की
25:55तरह प्रतीत हो रहा है
25:59दीवारों पर लगे दीपों की लौ आज मध्धम पड़ गई है, जैसे वे श्रीराम की पीड़ा को भामपकर बुझने की
26:06प्रतीक्षा कर रहे हूं
26:08अयोध्या का पूरा प्रांगन सन्नाटे की एक गहरी चादर में लिप्ता हुआ है, जहां पक्षी भी अपने नीड में दुबग
26:15कर मौन हो गए हैं
26:18विष्णु का विराठ स्वरूप ब्रहमांड के चक्र को विचलित होते देख, अपनी एक भुजा उठाकर नेती को स्विकार करने का
26:26संकेत देते हैं
26:28कक्ष में प्रवेश करते ही लक्षमन ने अपना शीष जुका लिया और श्री राम के समक्ष जाकर कापते स्वरों में
26:36अपना संदेश दिया
26:38मर्यादा की रक्षा के उस क्रूर सत्य को सुनकर अयोध्या के गलियारों में सन्नाटा और अधिक गहरा हो गया
26:46श्री राम अपने शयनकक्ष की एकांतता में हैं, जहां मुम्बत्तियों की परचाई उनके चहरे पर पड़ रही है, जो अब
26:55पत्थर की भाति स्थिर है
26:58देवराज इंद्र अपने सिनहासन से देख रहे हैं कि कैसे प्रिथवी का सबसे महान नायक एक ऐसे दुख से गुजर
27:05रहा है, जिसे साजह नहीं किया जा सकता
27:09श्रीराम की आखें जो हमेशा प्रजा के सुख के लिए चमकती थी, आज उनमें एक अनंत सागर सा दुख उमड़ाया
27:17है
27:19एक अकेले गिरते हुए आसु ने उस कक्ष की शुशकता को तोर दिया, जैसे कोई पवित्र नदी किसी सूखे मरुस्थल
27:26में बह निकली हो
27:29महल की छतों पर बैठे मोर भी अपनी वानी त्याग चुके हैं, जैसे वे भी इस राजसी बलिदान के साक्षी
27:36बने हो
27:37भगवान शिव कैलाश के शिखर पर अपनी समाधी में स्थिर हैं और उनका तीसरा नेतर श्रीराम के इस महान दुहक
27:45की गहराई को समझ रहा है
27:48लक्षमन कक्ष के बाहर ही एक स्तंभ के सहारे गिर पड़े हैं, मानो उनके शरीर ने अब और कष्ट सहने
27:55से मना कर दिया हो
27:58अयोध्या के आकाश में रात के सितारे भी धुंधले पड़ गए हैं, मानो पूरी स्रिष्टी श्रीराम के इस मूख क्रंदन
28:05में सम्मिलित हो गई हो
28:07तमसा नदी के तटपर घने अंधकार के बीच हिंसक पशुओं की दहाडे गुंज रही हैं और प्रकृती भी मानो इस
28:15अन्होनी पर रो रही है
28:18महर्शी वालमीकी के शिष्य जो आश्रम के लिए पवित्र कुष घास एकत्र कर रहे थे, एकांत में एक सिसक्ती हुई
28:26स्त्री की छाया देखकर ठिठक गए
28:29शिष्य उस गर्भिनी माता के निकट जाकर उनके कश्ट को भांप लेते हैं और अत्यंत विचलित होकर तुरंत महर्शी वालमीकी
28:37को बुलाने दौर पड़ते हैं
28:40वन की गहन शांती में समय का चकर जैसे ठहर गया है, मानो नियती स्वयन सीता के इस अंतिम पड़ाव
28:48का साक्षी बनने की प्रतीक्षा कर रही हो
28:51अपनी योग दृष्टी से महर्शी वालमीकी ने उसी क्षण जान लिया कि जगत जन्नी साक्षात लक्ष्मी का अंशवन में एकाकी
29:00खड़ी है
29:02महर्शी वालमीकी का तेज सूर्य के समान प्रदीप्त है, वे अपनी कुटिया से निकल कर वादसल्य और भक्ती से उतप्रोथ
29:10होकर उस ओर चल पड़े
29:12वे पच्चाप के साथ नहीं, अपितु एक दिव्यस पंदन के साथ सीता के निकट पहुँचते हैं, जैसे कोई पिता अपनी
29:20खोई हुई पुत्री को खोज ले
29:23वातावर्ण में एक अध्भुत सुगंध फैल गई है, मानो स्वयंगवन के व्रिक्ष माता सीता के चर्णों को स्पर्श करने के
29:31लिए आतुर हो उठे हो
29:34महर्शी वालमीकी ने सीता के सामने हाथ जोड़कर मस्तक जुकाया, उनके मुख से निकले शब्द वेद मंत्रों के समान पवित्र
29:42और धीर थे
29:44वे बोले है जानकी, इस जगत का पालन करने वाली, आप यहां इस अंधकार में क्यों अपने अश्रु बहा रही
29:52हैं?
29:54महर्शी की वानी में उस अपार करुणा का वास था, जिसने सीता के भीतर दबे हुए क्रंदन को सहला दिया
30:01और उन्हें धैर्य का आभास कराया
30:05स्रिष्टी की हर दिशा मानों उसक्षण महर्शी के उन पवित्र शब्दों को सुन रही थी, जो धर्म की रक्षा के
30:12लिए कहे गए थे
30:14सीता की द्रिष्टी जब महर्शी वालमीकी पर पड़ी, तो उन्हें उसमें अपने पिता जनक और श्री राम के गुरु वशिष्ठ
30:21का सम्मिलित स्वरूप दिखाई दिया
30:24महर्शी वालमीकी ने अपना दिव्यकर हाथ सीता के सिर पर अभय मुद्रा में रखा, जिससे वन का सारा भय तिरोहित
30:32होने लगा
30:34वह दिव्यस पर्ष पाकर सीता के हृदय में एक नई शक्ती का संचार हुआ, उन्होंने अपनी सजल आखों को उपर
30:41उठाया
30:43प्रकृती के उन प्राचीन व्रिक्षों ने मानो आज साक्षात धर्म की परीक्षा को अपने कंधों पर धारन कर लिया हो
30:51महर्शी वालमीकी ने सीता को आदर सहित अपने आश्रम चलने का निमंतरन दिया, जहां उन्हें पुत्री का स्थान प्राप्थ होगा
31:00यह निर्वासन नहीं, बलकि एक युग के आरंभ का प्रथम चरण था, जहां महर्शी स्वय रच्चिता बनकर इतिहास लिखने वाले
31:09थे
31:10सीता ने धीरे से अपना मस्तक जुका कर महर्शी के निमंतरन को स्विकार किया और उनके पीछे वनपत पर चल
31:18पड़ी
31:19रात के सन्नाटे में महर्शी के शांत कद्मों की आहट आने वाले युग के सबसे बड़े महाकाव्य के स्रिजन की
31:26नीन्व रख रही थी
31:29महर्शी वालमीकी के तपोवन की सीमा पर पहुँचते ही प्रकृती ने अपना स्वरूप बदलकर सीता का स्वागत एक शांत और
31:37सुरक्षित आवर्ण में किया
31:39महर्शी ने आश्रम की तपस्विनी स्त्रियों को संकेत दिया जो सीता के दिव्य सौंदर्य और उनके मस्तक पर अंकित करुणा
31:47की आभा को देख कर नत्मस्तक हो गई
31:51वन की पवित्र सुगंध और वेदों की रिचाओं के गुंजन के बीच सीता ने अपनी पहली रात आश्रम की एक
31:58परणकुटी में व्यतीत करने हेतु प्रवेश किया
32:02आश्रम की मूख शांती में महर्शी वालमीकी के मुख से निकले सांत्वना के शब्द ब्रहमांड के आने वाले कालचकर को
32:10एक नया दिशानिर देश दे रहे थे
32:13दूसरे दिन के सूर्योदय के साथ तपोवन की पवित्र नदियों के तट पर पक्षियों का कलरव सीता की वेधना को
32:20मंद करने का प्रयास करने लगा
32:24तपस्विनी माताओं ने सीता को एक महारानी की भाती नहीं, बलकि एक पूझनिय तपस्विनी के रूप में स्विकार कर उनके
32:32लिए शुद्ध वन्फल और कंदमूल अर्पित किये
32:35सीता ने धीरे से अपने हाथों से जल स्पर्श किया और मन ही मन अपने प्रभु के चर्णों का ध्यान
32:42धरकर स्वयन को इस वन्वास के लिए समर्पित कर दिया
32:47समय का पहिया आश्रम के भीतरधी में चलने लगा जहां सीता की दिन्चर्या अब मात्रध्यान जब और प्रभु श्री राम
32:55के स्मरण तक ही सीमित हो गई थी
32:58महर्शी वालमीकी ने परणकुटी के बाहर बैठ कर रामायन के श्लोकों की रचना आरंभ कर दी मानोवे सीता के भाग्य
33:06को ही शब्दों में पिरो रहे हो
33:09दिव्य तेज से उतप्रोथ सीता के चहरे पर गर्भावस्था की कोमलता और आने वाले वीरों के जन्म का संकल्प सपष्ट
33:17दिखाई देने लगा था
33:19आश्रम की पवित्र अगनी में आहुती देते हुए सीता ने उन शक्तियों का आहवान किया जो उनके गर्भ में पल
33:26रहे बालकों की रक्षा करने वाली थी
33:30चारों और व्याप्त दिव्य उर्जा ने तपोवन के पशुपक्षियों को भी शान्त कर दिया जैसे वे सब मिलकर आने वाले
33:37महायतिहास की प्रतीक्षा कर रहे हुँ
33:41इधर अयोध्या की राजसी चकाचौंध में भी वह शान्ती नहीं थी जो इस ननहीसी परणकुटी के सन्नाटे में महर्शी के
33:49सान्निध्य में प्राप्थ थी
33:51महर्शी ने सीता को निर्देश दिया कि वे अब अपने भीतर के उस युद्ध को समाप्थ कर लें क्योंकि वे
33:58केवल एक पत्नी नहीं बलकि एक नए युग की जन्नी है
34:04सीता की आखों में अब आसू नहीं थे बलकि वह द्रिडता थी जो केवल एक मा में ही हो सकती
34:11है जो अपने पुत्रों के लिए नेती से लड़ने को तयार है
34:16ब्रहमांड के देवता भी उस तपोवन की ओर निहार रहे थे जहां काल स्वयन एक नए महाकाव्य को जन्न देने
34:24की तयारी कर रहा था
34:26आश्रम में दिन धलते ही पर्णकुटी के चारों और जुबनुओं की चमकने एक ऐसा प्रकाश फैलाया जैसे स्वयन देवता वहां
34:34पहरा दे रहे हो
34:37महर्शी वालमीकी ने अपनी साधना पूर्ण की और सीता की ओर देखा जैसे वे उनके भीतर पल रहे उन दो
34:44योध्धाओं के तेज को साक्षात अनुभव कर रहे हो
34:49नेती का वह बीज जो रामायन के अगले अध्याय का आधार था सीता के मात्रित्व के ताप में धीरे-धीरे
34:56अंकुरित होने लगा था
34:58वन का हर कन, हर व्रिक्ष और हर वायू इस सत्य की साक्षी थी कि यहां से जो आरंध होगा
35:05वह युगों-युगों तक मानवता को मर्यादा का पाठ पढ़ाएगा