पद्म पुराण के इस 39वें अध्याय में देखिए अग्नि-परीक्षा के उपरांत अलौकिक दृश्य, जब स्वर्ग से स्वयं राजा दशरथ प्रकट हुए और श्रीराम को गले लगाया। देवराज इंद्र ने अपनी अमृत वृष्टि से सभी मृत वानरों को पुनर्जीवित किया। इसके बाद पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर श्रीराम, सीता और लक्ष्मण की अयोध्या वापसी की अद्भुत यात्रा शुरू होती है। परंतु नंदीग्राम में भरत की 14 वर्ष की प्रतिज्ञा का अंतिम क्षण आ पहुँचा है—यदि श्रीराम एक क्षण भी चूके, तो भरत स्वयं को अग्नि के हवाले कर देंगे! क्या समय रहते हनुमान भरत तक पहुँच पाएंगे? जानिए इस रोमांचक कथा में। #PadmaPurana #PushpakaVimana #LordRama #Hanuman #Bharata #AyodhyaReturn #HinduMythology
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00:00लंका की रनभूमी में अगनी की लपटे धीरे-धीरे शान्त हो रही हैं, जैसे ब्रहमांड स्वय किसी अद्रिश्य सत्य की
00:07प्रतीच्षा कर रहा हो।
00:10अगनिदेव साक्षात प्रकट होते हैं, उनकी भुजाओं में माता सीता का दिव्य स्वरूप कमल के समान को मल और निश्कलंग
00:17प्रतीथ हो रहा है।
00:20अगनिदेव ने गूंजती हुई वानी में घोशित किया कि माता सीता की पवित्रता तीनों लोकों में अक्षोन और प्रकाशवान है।
00:30अंधेरी लंका के उपर आकाश में देवताओं ने फूलों की वर्षाकर इस पावन क्षण का अभिनंदन किया।
00:38श्रीराम ने अपनी धर्म पतनी को प्रेमपूर्ण ग्रिष्टी से स्विकार किया। मानो साक्षात महाशक्ती पुन्ह अपने स्वामी के सम्मुक उपस्थित
00:47हो गई हो।
00:49देवराज इंद्र ने स्वर्णिम रत से उतर कर मर्यादा पुरुशोत्तम के चर्णों में नमन करते हुए उनकी दिव्य लीला को
00:56प्रणाम किया।
00:58वानर सेना ने जैगोश किया, जिससे लंका की जली हुई भूमी भी श्री राम और सीता के जैकारों से गुनजायमान
01:06हो गुठी।
01:07श्री राम ने समस्त सभा को संबोधित करते हुए सपष्ट किया कि यह अगनिप्रीक्षा केवल सांसारिक संशों को समाप्थ करने
01:15के लिए थी।
01:17ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की वर्शा की, जिससे समस्त रनभूमी की दुरगंध और शोक दूर हो
01:25गया।
01:25शिव जी ने कैलाश से अपनी दिव्यद रिष्टी से इस मिलन को देखा और ब्रहमांडिय संतुलन के पुनह स्थापित होने
01:33का अनुभव किया।
01:36लंका के खंधरों में अब उदासी के स्थान पर एक अजीब सी शांती व्याप्थ हो गई थी जो भविश्य के
01:42संकेत दे रही थी।
01:45विभीशन ने श्री राम के चर्णों में शीष जुकाया, मानो अधर्म का नाश होने के पश्चात लंका में धर्म का
01:52उदे हो रहा हो।
01:54माता सीता का तेज इतना प्रबल था कि देवता भी उनके समक्ष नत्मस्तक होकर उनकी शक्ती की स्तुती कर रहे
02:01थे।
02:03महाशक्ती का यह दिव्य रूप देखकर लंका के वासी भी विस्मय में डूबे हुए थे, जैसे उन्हें अपने पापों का
02:10प्रायश्चित मिर रहा हो।
02:13पुश्पक विमान जो अब तक मौन खड़ा था, श्री राम और सीता के स्वागत के लिए पुनह दिव्य आभा से
02:20चमकने लगा।
02:22नंदीगराम की स्मृतिया श्री राम के मन में कौन्ध गई, जहां उनकी एक प्रतिग्या प्रतीक्षा कर रही थी।
02:30भरत के त्याद और नंदीगराम की उस तपस्या का स्मरण श्री राम के नेत्रों को गंभीर और सजल कर देता
02:37है।
02:39काल के पहिये अब लंका से अयोध्या की ओर घूमने को ततपर थे, जहां नेती ने एक कठिन परीक्षा चुन
02:46रखी थी।
02:47विजय का उद्धोष पूरे ब्रहमांड में गूज उठा, परंतु श्री राम के हृदय में एक गहरा मौन था जो आने
02:55वाले युगों की नीम रख रहा था।
02:57लंका का अध्याय समाप्थ हो चुका था, और अब श्री राम का रत अयोध्या की पवित्र भूमी की ओर प्रस्थान
03:05करने के लिए तैयार था।
03:07ब्रहमांड के अनंत नीले आकाश के बीच महादेव और ब्रहमा जी की दिव्य उपस्थिती से एक स्वर्णिन द्वार का प्राकट्य
03:15हुआ।
03:17भगवान शिव और ब्रहमा जी ने अपनी मायावी शक्तियों के माध्यम से स्वर्ण के द्वार खोल दिये, जहां से एक
03:24दिव्य तेजपुंच प्रित्वी की ओर बढ़ा।
03:27बादलों को चीरता हुआ महाराजा दश्रत का तेजस्वी पुश्पक विमान एक दिव्य चमक के साथ अयोध्या की ओर उतरने लगा।
03:37स्रिष्टी के कणकण ने इस दुरलभ ख्षन को नमन किया, जहां मृत पिता का पुनरागमन धर्म के विजय का साक्षात
03:44प्रमान बन गया।
03:46जैसे ही विमान धूमी पर्टी का, महाराजा दश्रत की आखो से आसूओं की अविरल धारा बहन निकली और वे अपनों
03:54की खोज करने लगे।
03:56श्रीराम और लक्षमन ने अपने पिता को देखते ही साश्टान दंडवत प्रणाम किया और दोड़ कर उनके चर्णों को स्पर्श
04:04किया।
04:05महाराजा दश्रत ने अपने दोनों पुत्रों को गले से लगा लिया, मानों साक्षात, धर्म और न्याय उनके हृदय में समा
04:13गए हूँ।
04:14यह मिलन केवल रक्त का नहीं, अपितु उस तपस्या का था जिसे इन महापुरुशों ने युगों-युगों तक सहा था।
04:22पिता की गोद में सिर रखकर श्री राम ने अपनी पीडा को साजा किया, परंतु दश्रत ने उन्हें धैर्य और
04:29सन्यम का पाठ पढ़ाया।
04:32महाराजा ने अपनी वाणी को भारी करते हुए कहा कि वे कहके ही के उन पिछले कृत्यों को भूल कर
04:39क्षमा का मार्ग अपनाएं।
04:41दश्रत के ये शब्द लंका के रणक्षेत्र के बाद उठे विवादों को शांत करने वाले शितलता प्रदान करने वाले सिध्ध
04:49हुए।
04:50धर्म की विजय ने न केवल शत्रूओं का विनाश किया, बलकि अपनों के बीच की दूरियों को भी मिटा दिया।
04:58पूरे स्वर्ग लोक में देवताओं ने पुष्प वर्षा की और प्रभु श्री राम के इस महान चरित्र की सराहना की।
05:06भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि धर्म का मार्ग कांटों से भरा है, परन्तु इसका अंत सदैव अमरित तुल्य
05:14होता है।
05:16दश्रत का हृदय अब पूरी तरह से शांत था, क्योंकि उन्होंने अपने पुत्र को मर्यादा पुरुशोत्तम के रूप में प्रतिष्थित
05:24देख लिया था।
05:25इस दिव्य मिलन के साथ ही एक नए युग के उदे की सुखद आहट स्पष्ट रूप से सुनाई देने लगी
05:32थी।
05:33श्री राम ने पिता के चर्णों में शीश जुका कर धर्म के प्रती अपनी अटूट निष्ठा को पुनह दोहराया।
05:41लक्ष्मन ने भी अपने पिता को नमन किया। उनकी भक्ती और त्याग उस स्वर्णिन क्षण में और भी डैदी प्यमान
05:48हो उठे।
05:50दिव्य विमान की आभा ने चारों ओर के वातावर्ण को दिव्य उर्जा से भर दिया। जहां अब कोई दुरहक्षेश नहीं
05:58था।
06:11इंद्र का दिव्य रथ आकाश से नीचे उतरता हुआ प्रतीत हुआ। जैसे स्वयन स्वर्ग का द्वार प्रित्वी पर खुल गया
06:18हो।
06:20देवराज इंद्र ने अपने स्वर्ण मुकुट को जुका कर श्री राम का अभिनंदन किया। उनकी आखों में विजय के गर्व
06:27और धर्म के प्रती अगाध श्रधा का अध्भुत संगम था।
06:31श्री राम ने इंद्र के सम्मुक हाथ जोड कर अपनी उदार्ता का परिचय दिया और मृत्वानर वीरों को पुनह जीवित
06:39करने का वर्दान मांगा।
06:42आकाश के मध्य में एक दिव्य चक्र बना और इंद्र के संकेत पर अमृत की वर्षा का मंत्र उच्चारित होने
06:49लगा।
06:49मानो प्रकृती स्वयं पुनर्जन्म का उच्सव मना रही हो।
06:53अमृत की बूंदे जैसे ही मृत वानरों के निश्प्रान शरीरों को स्पर्ष करती गई।
06:59वैसे ही लंका की भूमी फिर से वानरों के गर्जन से गूँझ उठी।
07:04हनुमान और सुग्रीव के नेत्रों में अपने प्रिय सैनिकों को पुनह जीवित देखकर जो अश्रुबह निकले वे कृतग्यता और विस्मय
07:12के साक्षात उदाहरन थे।
07:15मृत्यू के आगोश से बाहर आते हुए वानर अपनी आखे मलते हुए ऐसे देख रहे थे मानों उन्होंने एक लंबी
07:23और भयावह निद्रा के बाद फिर से जीवन का स्वात चखा हो।
07:28अमरित की शक्ती ने न केवल उनके प्राण लोटाए, बल की प्रत्येक सैनिक में उत्साह और बल का एक नया
07:35संचार भी कर दिया।
07:38समस्त वानर सेना ने एक साथ उठकर श्री राम के जैगोश से लंका के पूरे वातावर्ण को धर्म की विजय
07:45के उल्लास से सराबोर कर दिया।
07:48देवराज इंद्र ने प्रसन्न होकर श्री राम को आशिरवाद दिया और आकाश में लोटते हुए वे देवताओं के पुष्प वर्षा
07:56का संकेत दे गए।
07:58लंका का तटियच शेत्र अब पुष्पों की सुंगध और वानरों की प्रसन्नता से भर गया था, जहां कल तक मृत्यू
08:05का तांडव था, वहां अब नवजीवन का उच्सव था।
08:10अंगध और जामवंत ने एक दूसरे को गले लगा कर उस चमतकार को निहारा, उनकी आखों में प्रभु श्री राम
08:17के प्रती भक्ती का भाव और भी प्रगाड हो गया।
08:21इस अमरित व्रिष्टी ने न केवल वीरों को जीवनदान दिया, बलकी युद्ध की समस्त विभी शिकाओं को भी स्मितियों के
08:28पन्नों से मिटासा दिया।
08:31पुश्पक विमान अब अयोध्या की ओर प्रस्थान के लिए तयार था, जिसकी आभासे लंका के तट अब भी दैदी प्यमान
08:38हो रहे थे।
08:40श्रीराम ने मुस्कुराते हुए अपनी सेना को देखा, उनके इस मंद मुस्कान में भविश्य के अयोध्या राज्याभिशेक का संकल्प स्पष्ट
08:49दिखाई दे रहा था।
08:51वानरों के हर्शोल लास की ध्वनी समुद्र की लहरों से टकरा कर लंका के पत्थरों को भी धर्म का पाठ
08:58पढ़ा रही थी।
09:00इंद्र के इस उपकार के बाद वानर सेना का उत्साह चरम पर था और उनकी भक्ती ने लंका को एक
09:06पवित्र तीर्थ में परिवर्तित कर दिया था।
09:10प्रकृती भी मानो इस क्षण के साक्षी बनने के लिए थम गई थी, जहां वानरों का पुनर्जन्म अधर्म पर धर्म
09:17की पूर्ण विजय का प्रतीक बन चुका था।
09:20अमरित की अंतिम बून्द प्रिथवी में समा गई और वानर वीरों ने अपने स्वामी श्रीराम के जैकारे के साथ लंका
09:28से विदाई लेने की तैयारी आरंभ कर दी।
09:31अब अयोध्या की प्रतीक्षा समाप्थ होने वाली थी क्योंकि धर्म की विजय पता का फहराते हुए पुरुशोत्तम श्रीराम अपनी प्रजा
09:40और वीरों के साथ लोट रहे थे।
09:43लंका के तटपर समुद्र की उत्ताल तरंगों के मध्य विभीशन ने भक्तिभाव से उस दिव्य पुश्पक विमान को प्रकट किया
09:51जो साक्षात ब्रहमा के संकल्प से निर्मित प्रतीत होता था।
09:56भगवान विश्णु का अंशधारन किये श्रीराम की आँखों में उस विमान की दिव्यता को देखकर एक शांत किंतु प्रगाड संतोष
10:04की लहर दोड़ गई।
10:07विभीशन ने श्रधा से नत्मस्तक होकर हाथ जोरते हुए श्रीराम से प्रार्थनाकी की वे इस विमान पर आरूड होकर अपनी
10:15विजी सेना के साथ अयोध्या प्रस्थान करें।
10:19विशाल आकाश में वह स्वर्णमे विमान सूर्य की प्रथम किर्णों के साथ मिलकर एक अध्भुत आभा बिखेर रहा था जैसे
10:27साक्षात कोई नक्षत्र प्रित्वी पर उतर आया हो।
10:30श्री राम ने मंद मुस्कान के साथ माता सीता का हाथ थामा और वानर राज सुग्रीव व विभीशन को साथ
10:38लेकर उस दिव्यरत की ओर अग्रसर हुए।
10:42गरुर के समान तीवर गती से चलने वाले इस रत पर सवार होते ही वानर वीरों का हृदय गौरव से
10:49भर उठा और उन्होंने एक साथ जैभोश किया।
10:52विमान की अध्भुत शक्ती से वहक्षन भर में अनंत विस्तार लेने लगा ताकि समस्त वानर वाहिनी एक साथ उस पर
11:01सवार हो सके।
11:03वातावर्ण में एक दिव्य शान्ती चा गई और चारों ओर का आकाश देवों के पुषपवर्षा के पुषपों से आच्छादित हो
11:11गया।
11:12पवनपुत्र हनुमान ने उस विमान के द्वार पर खड़े होकर अपनी अटूट निष्ठा का परिचय दिया और स्वयं को प्रभु
11:20की सेवा में समर्पित कर दिया।
11:22देवराज इंद्र के सभासदों ने भी अपनी दिव्य द्रिष्टी से इस द्रिष्य को देखा और श्रीराम के पुरुशार्थ की सराहना
11:30की।
11:32विमान ने धीरे धीरे लंका की भूमी को छोड़ा और बादलों के बीच अपनी दिव्य आभा को समाहित करते हुए
11:39उपर की ओर उठने लगा।
11:42विमान में बैठे हुए लक्षमन ने अपनी द्रिष्टी को नीचे की ओर रखा और लंका की रणभूमी को नमन किया
11:49जहां अधर्म का समूल नाश हुआ था।
11:52नीचे से वानरों के जैकारे का स्वर इतना गूंच उठा की मानो संपूर्ण ब्रहमांड भी उस विजय की प्रतिध्वनी से
12:00जाग उठा हो।
12:02श्रीराम की गंभीर मुद्रा में अब एक नई चमक थी क्योंकि वे अपनी प्रजा से मिलने और धर्म की पुनस्थापना
12:09के लिए आतुर थे।
12:12विभीशन का हृदय कृतग्यता से भर गया था क्योंकि उन्हें यह सौभाग्य प्राप्थ हुआ था कि वे अपने प्रभो को
12:19ससम्मान विदा कर पा रहे थे।
12:22आकाश के दिव्य मार्गों से गुजरते हुए पुश्पक विमान एक नक्षत्र की भांती चमक रहा था जिसे देखकर देव भी
12:30विस्मित थे।
12:31माता सीता का मुख कमल की भांती खिल उठा था क्योंकि अब उनके और अयोध्या के मध्य की दूरी मात्र
12:39कुछ क्षणों का विशय रह गई थी।
12:42रत की गती अब विचार के वेग के समान तीवर हो गई थी और लंका की सीमाई तेजी से पीछे
12:49चूट रही थी।
12:51वानर वीरों ने अपनी आखों में विजय के स्वपन को सजोए हुए उस दिव्य सवारी का आनंद लिया जो स्वयन
12:58देवों के लिए भी दुरलब था।
13:01विजय की इस महायात्रा का आरंभ हो चुका था और नंदी ग्राम की वह प्रतिग्या अब अपने पूर्णत्व की ओर
13:08बढ़ चली थी।
13:10पुश्पक विमान के पंख बादलों को चीरते हुए जैसे आकाश गंगा के विस्तार में प्रवेश कर गए हो। नीचे विस्तृत
13:17नीलिमा और लंका का द्वीप एक बिंदु सा प्रतीत हो रहा था।
13:23श्रीराम ने अपनी द्रिष्टी नीचे लंका की ओर केंद्रित की जहां युद्ध के चिन्ह अब केवल इतिहास के पन्नों में
13:30सिमट कर रह गए थे।
13:32माता सीता ने थर्थराती पलकों के साथ उस रनभूमी को देखा, जहां उनके उध्धार के लिए वानरों के रक्ट से
13:40धरित्री का हरकन पवित्र हो गया था।
13:43आकाश से दिखाई दे रहे थे, वे विशाल शिलाखंड जो सेतु के रूप में सागर के हृदय को चीरते हुए
13:50आज भी उस अटूट संकल्प की गवाही दे रहे थे।
13:54विमान की गती कुछ क्षणों के लिए मंध हुई और वह उस स्थान के उपर स्थिर हो गया, जहां रावन
14:02का अहंकार परास्थ होकर धुल में मिल गया था।
14:05श्री राम ने मंध स्वर में माता सीता को उन वानर वीरों के बलिदान के बारे में बताया, जिनकी निस्वार्थ
14:13सेवा ने धर्म की पुनह स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
14:17नीचे बहती हुरी समुद्र की लहरें उन पत्थरों को स्पर्श कर रही थी, मानों वे आज भी राम नाम के
14:24उस महामंत्र का उच्चारण कर रही हो।
14:27आकाश में तैरते हुए उस यान के चारों और सुनहरी आभा ऐसी प्रतीत हो रही थी, जैसे स्वयन सूर्य देव
14:35इस विजय यात्रा को नमन कर रहे हो।
14:38लंका की वह स्वर्णमे नगरी जो कभी गर्व से उची थी, आज उपर से एक निस्तेज और शान्तिपूर्ण समारक के
14:46समान दिखाई दे रही थी।
14:49माता सीता की आखों में आसूओं की एक बून्द धलकी, जो उन लाखों बानरों के प्रती उनके असीम करुणा और
14:57कृतग्यता का प्रतीक थी।
14:59श्री राम ने स्वयं अपने करक्मलों से माता सीता के अश्रुपों छे और उन्हें उस भावी समय के प्रती आश्वस्त
15:07किया, जो अब और भी अधिक परीक्षा की मांग करता था।
15:11विमान के नीचे का समुद्र अब शांत था। मानो वह भी इस महागाथा के समापन पर अपनी मौन स्विकृति प्रदान
15:19कर रहा हो।
15:21वानर सेना की विशाल टुकडी जो नीचे तट पर खड़ी थी, विमान को जाते देख विजय घोश का नाद कर
15:28रही थी जिसे सुनकर दिशाएं गूझ उठी।
15:32हनुमान जी जो विमान के सबसे आगे पहरेदार की भानती विराजमान थे, उनकी द्रिश्टी नंदी ग्राम की उस प्रतिज्या पर
15:40टिकी थी जो अब पूर्ण होने के समीब थी।
15:44सेतु के पत्थरों के बीच से निकलते हुए छोटे-छोटे जरने एक मनमोहक द्रिश उत्पन कर रहे थे, जैसे सागर
15:52स्वय राम के चर्णों को धो रहा हो।
15:55आकाश गंगा का एक टुकडा मानो उस यान के पीछे चल रहा था, क्योंकि वह स्वयन नारायन की सवारी बनकर
16:02उड़ रहा था।
16:04श्री राम ने अपनी द्रिश्टी को उत्तर दिशा की ओर मोड़ा, जहां नंदी ग्राम के तपस्वी जीवन और 14 वर्षों
16:12के वनवास के अंत का सपष्ट संकेट मिल रहा था।
16:16पुष्पक विमान की गती और भी बढ़ गई, मानो वह स्वयन समय की धारा के साथ डौड रहा हो ताकि
16:23अपनी मात्री भूमी की माटी को स्पर्श कर सके।
16:27नीचे की धर्ती पर छोटे-छोटे गाव और बस्तिया एक शांत संसार की जहलक दिखा रही थी, जो अब सुरक्षित
16:35और निर्भय थी।
16:36इस विहंगम यात्रा के अंतिम चरण में, लंका और रामसेतु की मधुर स्मृतिया आकाश में एक स्वर्णमय मान्चित्र के समान
16:45अंकित हो गई।
16:46पुष्पक विमान की गूंजती हुई आवाज से किशकिंधा के परवतराज जाग उठे, जैसे कोई विशाल स्वर्नेहंस बादलों को चीरते हुए
16:56नीचे उतर रहा हो।
16:58श्रीराम की करोणा भरी द्रिष्टी विमान से नीचे वानर कुल की नारियों पर पड़ी और उन्होंने प्रभु के मन की
17:05इच्छा को भलीभानती भांप लिया।
17:09वानर राज सुग्रीव ने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि वे सीता माता के आगमन की प्रसन्नता में किश्किंधा के
17:16द्वारों को पुष्पों से सजा दें।
17:19विमान के उतरते ही तारा और रुमा ने श्रधा से जुगकर माता सीता का वंदन किया। मानो धर्ती ने स्वय
17:27आकाश के अमरित का स्वागत किया हो।
17:29तारा की आखों में आसू थे जो विजय के उल्लास और श्रीराम के साथ पुना जुड़ने के सौभाग्य के मिश्रित
17:37भावों को दर्शा रहे थे।
17:40माता सीता ने बड़े प्रेम से तारा और रुमा का हाथ ठाम कर उन्हें पुश्पक विमान पर आरूड होने का
17:47निमंतरन दिया, जिससे वे भाव विभोर हो गई।
17:51किशकिंधा के वानर योध्धाओं की पत्निया कतार बद्ध होकर विमान की ओर बढ़ी, उनके चहरों पर मर्यादा और अपार गौरव
17:59का भाव स्पष्ट जलक रहा था।
18:02आकाश अब केवल देवताओं का स्थान नहीं रहा था, अपितु वानर कुल की देवतुल्य नारियों से सुशोभित होकर एक गतिशील
18:10स्वर्ग सा प्रतीत हो रहा था।
18:13श्रीराम ने मुस्तुराते हुए वानर सेना को लंका में किये गए, उनके अध्वितिय साहस के लिए पुनह कृतग्यता पूर्वक नमन
18:21किया।
18:23विमान का स्वर्णमे परकोटा धीरे-धीरे उपर की ओर बढ़ने लगा, और नीचे किशकिंधा के लोग हर्शोल लास के साथ
18:30जैकारे लगाने लगे।
18:33तारा ने विमान की खिलकी से अपने राज्य को अंतिम विदाई दी, जहां अब शान्ती का शासन था और भय
18:40का अंत हो चुका था।
18:43विमान अब उत्तर दिशा की ओर अग्रसर था, जहां दंड कारणे के पवित्रवन श्री राम की पज्चाप की प्रतीक्षा में
18:50थे।
18:51माता सीता और अन्यनारियों के बीच समवाद ने विमान के भीतर एक आत्मिय और पारिवारिक वातावर्ण उत्पन कर दिया था।
19:01रुमा ने माता सीता से उन दिनों की चर्चा की जब श्री राम वनवास के दोरान दंड कारणे के कश्टों
19:08को सहकर भी धर्म पर अडिग रहे थे।
19:11विमान की गती के साथ साथ बादलों के आकार भी बदल रहे थे। मानो प्रकृती स्वयें इस एतिहासिक मिलन यात्रा
19:19का गानगा रही हो।
19:22वानर सेना की नारियों ने प्रभु के पराक्रम की गाथाए गाना आरंभ किया जिससे विमान में एक उत्सव जैसा बातावर्ण
19:30बन गया।
19:31आगे बढ़ते हुए दंड कारणय के व्रिक्ष अब किसी रक्षक की भानती अपने पत्रपुष्पो को निछावर कर रहे थे। श्री
19:39राम का स्वागत करने है तू।
19:42चित्तकूट की पहाडिया दूर से दिखाई देने लगी जो श्री राम के साथ बिताए गए उन शांत पलों की मुख
19:49साक्षी थी।
19:50विमान की छाया प्रिथवी पर एक पवित्र शीतल धारा के समान बह रही थी, जो मार्क की समस्त बाधाओं को
19:58दूर करती जा रही थी।
20:01श्री राम की प्रतिग्या की वे सबको अयोध्या तक सम्मान पूर्वक ले जाएंगे, अब साकार होने की ओर बढ़ रही
20:08थी, और सब उस महायात्रा के आनंद में लीन थे।
20:12पुश्पक विमान की गूंच शान्थ हुई और वह रिशी भारदवाज के तपोवन के विशाल प्रांगण में दिव्य प्रकाश के साथ
20:20उतर गया।
20:21रिशी भारदवाज ने अपनी कुटिया से बाहर आकर मुस्कुराते हुए मर्यादा पुरुशोत्तम श्रीराम का अभिनंदन किया, जो अपनी लंबी तपस्या
20:31के बाद यहां लोटे थे।
20:34वानर सेना के लिए रिशी ने अपने मंत्रबल से भोजन और आश्रे का ऐसा प्रबंध किया कि देवताओं का स्वर्ग
20:41भी फीका पड़ जाएं।
20:43समस्त वनवासी अपनी थकान भूलकर अमरित्मही भोजन और भारतवाज रिशी के आतिथ्य में खो गए जबकि विमान के चारों और
20:52पवित्र गंगा का प्रवाह मंद गती से बह रहा था।
20:57श्रीराम ने रिशी के साथ एकान्त में बैठकर जब समय की गणना की तो रिशी के मुख पर एक गंभीर
21:04चिंता की रेखा उभराई।
21:06रिशी ने चेतावनी भरे स्वर में कहा कि आज ही वनवास के 14 वर्ष पूर्ण होने का अंतिन सूर्योदय है।
21:15यह जानकर श्रीराम के हरिदय में एक हलचल मची क्योंकि इसी दिन के अंत तक अयोध्या न पहुँचने पर भरत
21:23ने प्राण त्यागने का प्रण लिया था।
21:26नंदीगराम में भरत की अगनिप्रीक्षा की वेदी धधक रही थी और समय की गती अब एक काल के समान श्रीराम
21:34की ओर बढ़ रही थी।
21:36रिशी भारदवाज ने अपनी अंतरद्रिष्टी से भरत की उस प्रतिग्या की भीशनता को भाम्प लिया था, जो अयोध्या की सीमा
21:44पर एक अनिष्ट की ओर बढ़ रही थी।
21:48श्रीराम ने बिना विलंब किये वानर सेना को सचेत किया और विमान को पुनह प्रस्थान के लिए तैयार होने का
21:55संकेत दिया।
21:57विमान के स्वर्ण पहिये धर्ती छोड़ कर पुन अंतरिक्ष में विचर्ण करने लगे, जैसे कोई दिव्यगरुड अपने लक्षय की ओर
22:05उडान भर रहा हो।
22:07हवाओं की गती श्री राम के संकल्प के साथ मिल गई और पुश्पको का वेग अब ख्षणों में मीलों की
22:14दूरी तै करने लगा।
22:16नीचे से नदिया और परवत ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे वे श्री राम की विजय यात्रा के प्रती सम्मान
22:23में जुक रहे हुँ।
22:25प्रत्येक पल श्री राम की चिंता बढ़ रही थी क्योंकि नंदिग्राम का धुआ अब उन्हें दूर क्षितिच पर आकाश को
22:33धुंधला करता हुआ प्रतीत हो रहा था।
22:36भरत के प्रती उनका प्रेन और मर्यादा का पालन इस यात्रा के अंतिम चरण को एक महा संग्राम में बदल
22:43चुका था।
22:45विमान की गती इतनी तीवर हो गई थी कि अंतरिक्ष में भी एक स्वर्णिम लकीर अंकित हो गई जो अयोध्या
22:52के मार्क का मार्क दर्शन कर रही थी।
22:56प्रकृती भी मानो थम गई थी, जैसे वह नंदी ग्राम के उस अंतिम ख्षन का साक्षी बनने को आतुर हो
23:03जहां एक भाई की प्रतिग्या की परीक्षा होनी थी।
23:07श्रीराम ने अपनी धनुष की प्रत्यंचा को एक बार स्पर्श किया, जैसे वे समय के कालचक्र को गती देकर सूर्य
23:14को थामने का प्रयास कर रहे हूं।
23:17विमान अयोध्या के समीपवर्ती आकाश में प्रविष्ठ हुआ और नंदी ग्राम का धुआ अब स्पष्ट रूप से उनकी द्रिष्टी के
23:25केंद्र में था।
23:27काल की उस रेखा पर पहुँचने से पूर्व, श्री राम का धैर्य और भरत की तपस्या के बीच एक अंतिन
23:34मिलन का क्षण शेश था।
23:36पुष्पक विमान की गती मंद पढ़ते ही, श्री राम ने पवनपुत्र हनुमान की ओर संकेत किया, जिनकी आखों में स्वामी
23:44के प्रती अटूट निष्ठा और नंदी ग्राम की चिंता स्पष्ट जलक रही थी।
23:50श्री राम की दिव्यद्रिष्टी ने हनुमान के हरदय के भावों को पढ़ लिया, और उन्होंने एक गुप्त मुद्रा में अपना
23:57निर्देश पवनपुत्र को सौपा, जो काल के वेग को मात देने के लिए तयार थे।
24:04हनुमान ने अत्यंत सुक्ष्म रूप धारण किया और एक तीवर वायुवेक की भांती नंदी ग्राम की दिशा में उर्चले, उनके
24:11जाने का मार्ग बादलों में एक स्वर्ण रेखा के समान चमक रहा था।
24:17नंदी ग्राम का वातावर्ण एक मुख बलिदान की ज्वाला में जल रहा था, जहां भरत की तपस्या के धुए ने
24:24आकाश को भी एक उदास लेटी रंग से ढख दिया था।
24:28हनुमान ने देखा कि भरत एक तपस्वी की भांती भूमी पर आसन जमाय बैठे हैं, उनके वस्त्र जीन हो चुके
24:36हैं, परन्तु उनकी आखों में एक संकल्प की अटल आग अभी भी धधक रही है।
24:43देवी सीता का ध्यान करते हुए, भरत ने सूर्य की ओर देखा, जहां सूर्यास्त की अंतिम किरने उनकी प्रतिग्या के
24:51अंतिम क्षणों की साक्षी बन रही थी।
24:54हनुमान ने अद्रिश रहकर भरत की प्रत्येक श्वास और उनके मुख की सुक्षम रेखाओं का अवलोकन किया, ताकि वे श्री
25:02राम के संदेह को पूरी तरह निर्मूल कर सकें।
25:07नंदिग राम के शांत सन्नाटे में केवल भरत के मुख से निकलने वाले श्री राम नाम का मंत्र गूंज रहा
25:13था, जो काल की गती को भी थामने की सामर्थ्य रखता था।
25:18हनुमान ने अनुभव किया कि भरत के मन में राज्य के प्रती लेश मात्र भी लालसा नहीं है, बलकि वे
25:25केवल श्री राम के चर्णों की प्रतीक्षा में अपना सर्वस्व दाफ पर लगा चुके हैं।
25:31भरत ने अपनी प्रतिग्या को स्मरण करते हुए एक मुठी पवित्र भस्म उठाई, मानोवे अगनी में प्रवेश करने की तैयारी
25:40के अंतिम सोपान पर खड़े हो।
25:43हनुमान ने उस द्रिश्य को अपनी आत्मा में अंकित कर लिया, जहां एक भाई दूसरे भाई के आने की प्रतीक्षा
25:50में मृत्यु को भी भेंट करने के लिए तत्पर था।
25:54आकाश के उस कोने में, जहां अंधकार धीरे-धीरे बढ़ रहा था, नंदी ग्राम की पवित्र अगनी की लपते भरत
26:02की निष्ठा की गवाह बनकर उची उठने लगी।
26:05पवन-पुत्र हनुमान ने एक पल भी व्यर्थ नहीं किया और श्री राम को सूचना देने के लिए पुनह गगन
26:12मंडल की ओर प्रस्थान किया, उनकी गती अब और भी तीवर थी।
26:18हनुमान के उरते ही नंदी ग्राम की वायू में एक दिव्यस पंदन हुआ, जैसे भरत की पुकार ने सीधे श्री
26:25राम के हरिदय को छू लिया हो।
26:28श्री राम ने अपनी आखे बंद कर ली और हनुमान के समाचार के आने से पूर्व ही उन्होंने भरत के
26:35हरिदय की निर्मलता को साक्षात अनुभव कर लिया।
26:38पुश्पक विमान की ध्वने अब नंदी ग्राम की सीमाओं के समीप सुनाई देने लगी थी, जिसे सुनकर प्रकृती भी एक
26:46क्षण के लिए ठहर गई।
26:49हनुमान की उपस्थिती ने श्रीराम के मन के सभी द्वन्दवों को समाप्त कर दिया और अब केवल विजय और मिलन
26:56का समयशेश था।
26:58श्रीराम का रत नंदी ग्राम के उपर मंडराने लगा और उनके आदेश की प्रतीक्षा अब समाप्त हो चुकी थी, क्योंकि
27:06स्वामी और सेवक का मिलन सन्निकट था।
27:09भरत ने उपर देखा और उनकी तपस्या की अगनी के बीच उन्हें वह दिव्य आभा दिखाई दी, जिसकी प्रतीक्षा में
27:18उन्होंने 14 वर्ष व्यतीत किये थे।
27:22विजय घोश की गूंज नंदी ग्राम में काल बनकर नहीं, बलकि प्रभु के आगमन के मंगल गान के रूप में
27:29गूंज उठी और 14 वर्ष का वनवास पूर्ण हुआ।
27:33पुश्पक विमान की गूंजती ध्वनी के साथ नंदी ग्राम की तपो भूमी पर दिव्यस्वन आभा बिखर गई और आकाश के
27:41पट खुल गए।
27:42भरत के नेत्रों में अश्रुधारा बह निकली और उन्होंने अपने कापते हाथों को जोड कर मस्तक जुका लिया, मानो साक्षात
27:51वैकुंठ का द्वार खुल गया हो।
27:54विमान से उतरते हुए श्री राम ने जब अपनी पादुकाओं को सिनहासन पर देखा, तो उनकी आखों में भी अपने
28:01अनुच के प्रती असीम मम्ता उमड आई।
28:05नंदी ग्राम की वह पावन मिट्टी, जो अब तक विरह की अगनी में तप रही थी, प्रभु के चरन स्पर्ष
28:12से शीतल हो उठी।
28:14भरत दोड कर प्रभु के चरनों में गिर पड़े, मानो कोई प्यासा जीव युगों की प्रतीक्षा के बाद अमरित के
28:21सागर को पा गया हो।
28:23श्री राम ने अपने अनुच को उठा कर अपने हृदय से लगा लिया और उस आलिंगन में 14 वर्षों का
28:30समस्त मौन एक ही क्षण में समाप्थ हो गया।
28:33लंका से लोटे हनुमान ने जब यह मिलन देखा, तो उनके नेत्र भी सजल हो गए और उन्होंने अपनी गदा
28:41को नमरता पूर्वक भूमी पर रख दिया।
28:45अगनी की वेदी, जो कुछ क्षण पूर्व भरत के बलिदान की प्रतीक्षा कर रही थी, अब प्रभु की उपस्थिती में
28:52शांत हो गई और उसकी लप्टे दिव्य सुगंध में परिवर्थित हो गई।
28:57श्री राम ने मंद मुस्कान के साथ कहा, ये भरत तुम्हारे इस्त्याग और तप ने ही इस धरा को धर्म
29:04की मर्यादाओं से जीवित रखा है।
29:08आकाश से देवता भी पुष्प वर्षा करने लगे और नंदी ग्राम की पूरी वायुमंडल शंकनाद की मधुर ध्वनी से गूंध
29:15उठा।
29:17शत्रुग्न और माताएं भी उसी समय वहाँ पहुँचे और उस मिलन का द्रिश्य देखकर सबने धैर्यक हो दिया, सबकी आखों
29:25से आनंद के अश्रु छलत पड़े।
29:28मर्यादा पुरुशोत्तम ने अपनी पादुकाओं को पुना धारन किया, जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, प्रकृती में एक अलौकिक स्पंदन डौड
29:37गया।
29:38नंदी ग्राम का वह निर्जन स्थान अब अयोध्या की राजधानी की भव्यता से भी अधिक पवित्र और प्रकाश्मान प्रतीत हो
29:46रहा था।
29:47भरत ने कृतग्यता से कहात की प्रभु अब अयोध्या की राजलक्षमी भी आपकी वापसी की प्रतीक्षा में श्रिंगार कर रही
29:56है।
30:17श्री राम की द्रिष्टी में वह समस्थ तब समाहित था, जिसने उन्हें वन में भी एक राजा के समान गरिमा
30:24प्रदान की थी।
30:26नंदी ग्राम का वहत्याग जो इतिहास के पन्नों में स्वन अक्षरों में दर्ज हो गया, आज पूनता की चरम सीमा
30:34पर था।
30:35विजय और धर्म के उस मिलन ने सिद्ध कर दिया कि सत्य और प्रेन के आगे संसार की कोई भी
30:42शक्ती बाधा नहीं बन सकती।
30:44प्रभु का अगला पड़ाव अयोध्या की ओर था, जहां संपून प्रजा अपनी आखों में प्रभु की एक जलक पाने की
30:52प्यास लेकर बैठी थी।
30:55नंदी ग्राम की शांत भूमी पर अगनी की लप्टे गगन चुम्बी हो उठी थी, जहां भरत अपने प्राणों को त्यागने
31:02के लिए अंतिम संकल्प के साथ धधकती अगनी की ओर बढ़ रहे थे।
31:08देवराज इंद्र के सभासदों की भानती एक दिव्य जोती से चमकता हुआ एक ब्राहमन का स्वरूप अचानक आकाश से अवत्रित
31:16हुआ, जिसने भरत के चर्णों में अपनी वानी का अम्रत बरसाया।
31:21हनुमान के मुख से श्रीराम के आने का मंगल समवाद सुनते ही भरत की स्तब्धता तूट गई और उनकी आखों
31:28से हर्ष के अश्रुधारा बनकर बहने लगे।
31:32उस अगनी वेदी के समीप जहां मृत्यु का सन्नाटा पसरा था, अब विजय घोश की गूंज ने प्रकृती के कनकन
31:40को भक्ती के रंग में सराबोर कर दिया।
31:43भरत ने दोड़कर उस तेजस्वी ब्राहमन को अपने हृदय से लगा लिया, मानोवे स्वयन श्री राम का आलिंगन कर रहे
31:50हूं।
31:52प्रभु श्री विश्नु का अंश जानकर भरत की आत्मा में जो शांती का संचार हुआ, वह ब्रहमांड के किसी भी
31:59सुख से कहीं अधिक विशाल था।
32:02राम के आगमन का संदेश सुनकर नंदीग राम की वह भूमे जो कल तक्ष मशान जैसी शांत थी, शन भर
32:10में आनंद के उच्सव में बदल गई।
32:13प्रतीक्षा की वह काली छाया अब लुप्थ हो चुकी थी, क्योंकि विजय का वह सूर्य उदे हो रहा था जिसकी
32:20प्रतीक्षा में युगों से दिशाएं भी निशब्द थी।
32:24भरत ने अपनी प्रजा को आदेश दिया कि संपूर्ण अयोध्या को किसी नविवाहिता की भांती सजाया जाएं, क्योंकि आज सत्य
32:32की पुनहस्थापना हो रही है।
32:36देवलोग से उतर कर स्वयन ब्रहमा जी ने इस दृष्य को देखा, जहां एक भाई के त्याग और दूसरे के
32:43प्रेम ने मानवता को धर्म की नई परिभाशा दी।
32:47अयोध्या की गलियों में, जहां वर्षों से उदासी का सामराज्य था, वहां आज दियों की एक ऐसी श्रिंखला जल उठी
32:55जिसने अंधकार को सदा के लिए मिटा दिया।
32:59हवाओं में अब केवल एक ही नाम गूँज रहा था, जैश्री राम, जिसे सुनकर प्रकृती की लताओं ने भी मानो
33:06अपनी कलिया खिला दी हो।
33:09हनुमान के उस विराट स्वरूब की कल्पना ने अयोध्या के प्रत्येक जन के हृदय में साहस का नया संचार कर
33:16दिया था।
33:18श्री राम का पुश्पक विमान अब आकाश में एक नक्षत्र की भांती चमक रहा था, जो सीधे अयोध्या की पावन
33:25भूमी की ओर बढ़ रहा था।
33:28भरत की आखें उस विमान को निहार रही थी और उनके हृदय की धड़त ने श्री राम के नाम की
33:34ताल पर एक मधुर संगीत रच रही थी।
33:38देवगण अपने अपने विमानों से पुष्प वर्षा कर रहे थे, जिससे आकाश का रंग के स्रिया और सुगंधित हो गया
33:46था।
33:46नंदी ग्राम के उस पवित्र मंच पर अब भरत ने अपना दंड और कमंडल त्याग कर प्रभु के स्वागत के
33:54लिए अपना मस्तक जुका दिया।
33:57नीले आकाश के नीचे वह संपूर्ण द्रिश किसी महान महाकाव्य के अंतिम पन्ने की भानती शांत और गरिमापूर्ण प्रतीत हो
34:05रहा था।
34:07पुरे राज्य में अब केवल वही गूंच सुनाई दे रही थी जो लंका के पतन के बाद प्रभु के विजय
34:14घोश के रूप में आरंभ हुई थी।
34:16राम का आना अब केवल एक वापसी नहीं थी बलकि धर्म के उस युग का आरंभ था जो इतिहास के
34:24अंत तक अमर रहने वाला था।