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इस अद्भुत एपिसोड में, हनुमान अपनी अदम्य शक्ति का प्रदर्शन करते हुए, विशाल समुद्र को पार करने के लिए एक असंभव छलांग लगाते हैं। उनकी यात्रा चुनौतियों से भरी है: मैनाक पर्वत का आतिथ्य, राक्षसी सुरसा का छल, और छायाग्राही सिंहिका का मायाजाल। इन सभी बाधाओं को पार करते हुए, हनुमान अंततः लंका की मायावी नगरी में प्रवेश करते हैं, जहाँ उन्हें लंकिनी का सामना करना पड़ता है। लंका के चप्पे-चप्पे की खोज के बाद, हनुमान को अशोक वाटिका में देवी सीता के दर्शन होते हैं। राम की अंगूठी देकर और सीता का चूडामणि लेकर, हनुमान एक नए युग की शुरुआत करते हैं, और लंका में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए अशोक वाटिका का विध्वंस करते हैं। क्या हनुमान सफल होंगे? रामायण के इस अविश्वसनीय अध्याय को जानने के लिए देखें यह विशेष एपिसोड!
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00:00जामबवान के प्रेणादायक वचनों से नवजीवन पाकर हनुमान ने अपनी अदमय शक्तियों को अनुभव करते हुए स्वयन को एक नए
00:08और विराट उद्देश के लिए तैयार किया.
00:12अचानक उनकी देह में अपार उर्जा का संचार हुआ और वे अपने वास्तविक विशालकाय रूप में प्रकट होने लगे, जैसे
00:20कोई परवत स्वयन जीवित हो उठा हो.
00:24जैसे जैसे उनका आकार बढ़ता गया, वानर सेना के हृदैश रधा और उत्साह से भर उठे और जैकारों तथा प्रार्थनाओं
00:33की गूंज से रिश्यमुक परवत गूंज उठा.
00:36उनकी विराठ काया ने परवत शिखर को भी छोटा कर दिया, जैसे कोई दिव्य देवता स्वयं प्रित्वी पर अवत्रित हुए
00:43हो.
00:45एक क्षण के लिए ब्रह्मान्द भी उनके अविश्वस्निय संकल्प को महसूस कर रहा था, जब उन्होंने अपनी शक्तियों को लंका
00:53विजय के लिए केंद्रित किया.
00:56जामबवान और अंगद सहित सभी प्रमुख वानर नायक अपनी सेना के साथ भय और गर्व के मिश्रन से भरे हुए
01:03हनुमान की इस महागाथा के साक्षी बने.
01:07अपने हाथों की मुठी बांध कर और पैरों को धर्ती पर जमा कर उन्होंने एक गहरी सास ली, मानो पूरी
01:15प्रित्वी से शक्ति ग्रहन कर रहे हुँ.
01:18एक गर्जना के साथ जो आकाश और पाताल को भेद गई, हनुमान में रिश्यमुक परवत से एक अविश्वस्निय चलांग लगाई.
01:28उनकी भुजाओं की शक्ति से हवा चीरती हुई निकली, जैसे कोई अजेय योध्धा अपने लक्षे की ओर तीवर गती से
01:35बढ़ रहा हो.
01:37उनके उडान की गती इतनी तीवर थी, कि नीचे विशाल महासागर की लहरें भी उनके वेग से उद्वेलित हो उठी.
01:47दूरक्षितिच पर लंका का धुन्धला चित्र धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा, जो उनके अटूट संकल्प को और बल दे रहा
01:54था.
01:55उनके पैरों के नीचे विशालकाय बादल उमड घुमड रहे थे, जैसे वे स्वयन बादलों के राजा हों, जो अपने राज्य
02:03को पार कर रहे हों.
02:05सूर्य की किरने उनके दिव्य शरीर पर पड़ती, तो वह सोने की तरहे चमक उठता, मानो स्वयन सूर्य देव उन्हें
02:13आशिरवाद दे रहे हों.
02:16नीचे अनन्त महासागर अपनी गहराईयों को समेटे हुए, हनुमान की इस अध्भुत यात्रा का साक्षी बन रहा था, उसके रहस्य
02:24में जल में हलचल होने लगी थी.
02:27उनकी गती इतनी तीवर थी कि उन्हें केवल एक नारंगी सुनहरी रेखा के रूप में देखा जा सकता था, जो
02:35आकाश को चीरते हुए आगे बढ़ रही थी.
02:39दूर वानर सेना अभी भी रिश्यमूग परवत से उन्हें देख रही थी, उनके हृदय गर्व और विजय की आशा से
02:46उत्प्रोत थे.
02:48यह केवल एक छलान नहीं थी, बलकि असंभव को संभव बनाने की मानव वानर जाती की अनंत इच्छा शक्ती का
02:56प्रतीक थी.
02:58उनकी प्रत्येक मानस्पेशी, प्रत्येक रोम, श्रीराम के प्रती उनकी अटूट भक्ती और सीता को खोजने के उनके पवित्र उद्देश से
03:07उर्जावान था.
03:09वह लंका की ओर अपने खतरनाक समुदरी मार्ग पर अकेले ही निकल पड़े थे, एक ऐसी यात्रा पर जहां हर
03:16पल एक नई चुनौती प्रतीक्षा कर रही थी.
03:20उनकी विराट छाया नीचे जल पर पड़ती, जैसे कोई विशाल बादल समुदर के उपर मंडरा रहा हो, एक नए युग
03:28की शुरुवात का संकेट देती हुई.
03:31अभी भी हनुमान आकाश में तीवर वेग से उड़ रहे थे, उनके नीचे अथा सागर अपनी लहरों के साथ अनंत
03:39काल की गाथागा रहा था.
03:41वैकुंठ धाम में भगवान विश्नु अपनी दिव्य मुस्कान के साथ इस अध्वितिय पराक्रम को निहार रहे थे, जानते हुए की
03:50यह यात्रा कितनी महत्वपूर्ण थी.
03:53अचानक उन्हें अपने नीचे समुदर में एक असाधारन हल्चल महसूस हुई, जैसे कोई विशालकाई जीव गहराई से उपर की ओर
04:02आ रहा हो.
04:03शन भर में समुदर की शान्त सतह पर एक स्वर्णिम आभा फैलने लगी, जो एक अध्भुत घटना का पूर्वाभास करा
04:12रही थी.
04:13धीरे धीरे लहरों के बीच से एक विशालकाई स्वर्णिम परवत शिखर सूर्य की पहली किरणसा तेजस्वी उपर उठने लगा.
04:23कैलाश परवत पर भगवान शिव ध्यानमग्न अवस्था में भी इस दिव्यद्रिश को अपनी तीसरी आख से देख रहे थे, हनुमान
04:31की निष्ठा पर मुस्कुराते हुए.
04:34हनुमान ने अपनी आखे सिकोड कर उस उभरते हुए परवत को देखा, जिसका स्वर्णिम तेज उनकी तीवर उडान को क्षणभर
04:43के लिए रोक सा गया था.
04:45मैनाख परवत अब अपनी पूरी भव्यता के साथ समुद्र से उपर उठ चुका था, उसके शिखर सूर्य के प्रकाश में
04:53सोने की तरह चमक रहे थे.
04:56हनुमान उसके निकट आये, जहां मैनाख का प्रत्येक कत्रा स्वयय एक कथा कह रहा था, जो समुद्र देव की कृतग्यता
05:04का प्रतीक था.
05:06ब्रहम लोक में चतुर मुखी ब्रहमा अपनी कमलासन पर विराज मान होकर इस दैविय आतिथ्य और वानर के संकल्प को
05:14शांत भाव से देख रहे थे.
05:17पर्वत ने एक प्राचीन और सनेही स्वर में हनुमान को संबोधित किया, उन्हें अपनी चोटियों पर विश्राम करने का निमंतरन
05:25देते हुए.
05:27मैनाक का स्वर्णिम शिखर अब और भी चमकीला हो उठा था, जैसे वह अपनी आतिथ्य की उर्जा से हनुमान को
05:34अपनी और खीच रहा हो.
05:37हनुमान ने अपनी यात्रा के पवित्र उद्देश को याद करते हुए, शन भर के लिए उस विशालकाय परवत के निमंतरन
05:45पर विचार किया.
05:47देवर्शी नारद अपनी वीना के मधूर तारों को छेड़ते हुए, आकाश मार्ग से इस द्रिश को देख रहे थे, हनुमान
05:55की अटूट निष्ठा पर मोहित होते हुए.
05:58अपने लक्षय के प्रती अटल, हनुमान ने परवत के शिखर को सम्मान पूर्वक स्पर्ष किया, उसकी आतिथ्य के प्रती अपनी
06:06कृतग्यता व्यक्त की.
06:08उस स्पर्ष से एक सुक्ष्म उर्जा तरंग पूरे परवत में फैल गई, जैसे प्रकृती ने स्वया वानर के संकल्प को
06:16स्वीकार कर लिया हो.
06:18एक शन रुके बिना, हनुमान ने अपनी उडान फिर से शुरू की, उनका वेक पहले से भी अधिक प्रचंड था.
06:26गंधर्वों और अपसराओं ने आकाश में मधुर संगीत बजाकर हनुमान के इस द्रिड संकल्प को सराहा उनके पवित्र कार्य की
06:35प्रशंसा करते हुए.
06:37उनके मुख पर एक नई उर्जा और अदमय संकल्प की चमक थी, जैसे मैनाक के आशिरवाद ने उनकी शक्ती को
06:45और बढ़ा दिया हो.
06:47मैनाक परवत धीरे धीरे क्षितिज में लुप्थ होता गया, जबकी हनुमान एक चमकते हुए बिंदु की तरह लंका की दिशा
06:55में अग्रेशित होते रहे.
06:58मैनाक परवत के लुप्थ होते ही, हनुमान ने अपने पथ पर आगे बढ़ते हुए एक अध्भुत निर्मल आकाश और अनंत
07:06सागर के विशाल विस्तार को अपने नेत्रों से आत्म साथ किया, जहां हर लेहर उनकी द्रिड़ता का गीत गा रही
07:13थी.
07:14देवलोक में भगवान विश्नु ने अपने गंभीर मुख पर मुस्कान लिये, गरुर से कहा कि हनुमान की यह यात्रा केवल
07:22शारिरिक पराक्रम की नहीं, बलकि बुद्धी और भक्ती की भी अगनिप्रीक्षा होगी.
07:28तभी आकाश में एक भयानक विशाल चाया तेजी से फैलने लगी, जो हनुमान के मार्ग को पूर्णत्या ढख रही थी,
07:37जैसे कोई अलौकिक अंधकार उनकी ओर बढ़ रहा हो.
07:41शन भर में उस चाया से नागों की माता सुर्सा, एक परवताकार राक्षसी के रूप में प्रकट हुई, जिसका मुख
07:49इतना विशाल था कि वह पूरे आकाश को निगलने की ख्षमता रखता था.
07:55सुर्सा ने एक भयंकर गर्जना की, जो पूरे वायुमंडल में गूंज उठी और हनुमान को चुनौती दी की कोई भी
08:02जीव उसके मुख में प्रवेश किये बिना उसके मार्ग से नहीं जा सकता.
08:08कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख खोल कर इस अध्वितिय द्वंदव को देखा और मंदमंद मुस्कुराते हुए
08:16पारवती से कहा कि यह संकट हनुमान की अदमे बुद्धी को उजागर करेगा.
08:22हनुमान ने विनमरता पूर्वक सुर्सा से प्रार्थना की कि वह उन्हें लंका जाने दे क्योंकि उनका उद्देश अत्यंत पवित्र है
08:30और वे सीता माता की खोज में जा रहे हैं.
08:34परंतु सुर्सा अपनी राक्षसी प्रतिग्या पर अडिग रही, उसने अपने मुख को और भी विशाल कर लिया, यह दर्शाते हुए
08:42कि हनुमान को उसके नियमों का पालन करना ही होगा.
08:47हनुमान ने देखा कि तर्क व्यर्थ है और उन्होंने अपनी दैविय शक्ती का आवाहन करते हुए स्वयन को एक विशाल
08:54पर्वत के समान बढ़ाना आरंभ कर दिया.
08:58सुर्सा ने भी अपनी मायावी शक्ती से अपने मुख को और भी चौड़ा किया, मानो वह ब्रह्मान के हर आकार
09:05को अपने अंदर समाहित कर सकती हो.
09:09प्रत्येक पल के साथ हनुमान और सुर्सा दोनों एक दूसरे से बढ़कर अपनी काया को विशाल करते गए, जिससे आकाश
09:17में एक अध्भुत शक्ति प्रदर्शन का नजारा बन गया.
09:21जब सुर्सा ने अपना मुख सौ योजन तक फैला लिया, तो हनुमान ने अपनी बुद्धी का प्रयोग करते हुए अचानक
09:29स्वयं को एक अत्यंत सुक्ष्म रूप में बदल लिया.
09:33एक खण में वह वायू के समान अध्रिश होते हुए, सुर्सा के विशाल मुख में प्रवेश कर गए और फिर
09:40पलक जपकते ही बाहर निकलाए, अपनी चपलता और चतुराई का प्रमान देते हुए.
09:47सुर्सा हनुमान की इस असाधारन युक्ती से चकित रह गई, उसकी राक्षसी प्रतिग्या पूर्ण हो चुकी थी, क्योंकि हनुमान उसके
09:55मुख में प्रवेश कर चुके थे.
09:58अपनी हार स्विकार करते हुए, सुर्सा ने अपनी राक्षसी काया को त्याग कर अपने दिव्य तेजस्वी रूप को प्रकट किया,
10:06जिससे पूरा आकाश अलौकिक आभा से भर गया.
10:10दिव्य सुर्सा ने हनुमान को आशिरवाद दिया कि उनकी लंका यात्रा सफल हो और सीता माता की खोज में उन्हें
10:18अवश्य सफलता मिलेगी.
10:20हनुमान ने कृतज्यता पूर्वक देवी सुर्सा को प्रणाम किया, उनकी बुद्धी और विनमर्ता ने एक और कठिन बाधा को पार
10:28कर लिया था.
10:30सुर्सा देवी ने अपना दिव्य रूप समेटा और आकाश में अद्रिश्य हो गई, जबकी हनुमान एक नई उर्जा और आत्म
10:39विश्वास के साथ आगे बढ़ते रहे.
10:42उनके ह्रिदय में श्रीराम के प्रती असीन भक्ती और सीता माता को खोजने का अटूट संकल्प और भी प्रखर हो
10:49चुका था, हर बाधा उनके संकल्प को और ग्रिड कर रही थी.
10:54इस प्रकार देवताओं की यह परीच्षा पास कर, पवनपुत्र हनुमान ने अपनी अविश्वस्निय यात्रा का एक और महत्वपूर्ण चरण सफलता
11:03पूर्वक पूर्ण किया, लंका की ओर उनके पंक अब और भी वेग से उड़ रहे थे.
11:10सुर्सा को पीछे छोड़ पवनपुत्र हनुमान विशाल समुद्र के उपर अत्यंत तीवर वेग से आगे बढ़ते चले जा रहे थे.
11:18नील वर्ण के अनंत जलराशी के उपर उरते हुए हनुमान जी का ध्यान केवल अपने प्रभु श्री राम के कार्य
11:25और लंका मार्पर केंद्रित था.
11:28इसी बीच समुद्र की गहन गहराईयों में निवास करने वाली चायाग्राही राक्षसी सिन्हिका को उपर आकाश में जाते किसी महाबलशाली
11:38जीव का आभास हुआ.
11:40वह कोई साधारन राक्षसी नहीं थी, बलकि अपनी मायावी शक्तियों से किसी भी प्राणी की चाया को पकड़ कर उसे
11:48पंगु बना देने की अध्भुत क्षमता रखती थी.
11:52जैसे ही हनुमान जी उस चेत्र के उपर से गुजरे, अचानक उनके दिव्यवेग में एक रहस्य में रुकावट आने लगी.
12:00अपने संपूर्ण बल के प्रयोग के बाद भी अपनी गती को थमते देख महावीर हनुमान थोड़े चकित हुए और कारण
12:08समझने का प्रयास करने लगे.
12:11नीचे जल के भीतर छुपी सिन्हिका ने हनुमान जी की समुद्र तल पर पड़ती विशाल चाया को अपनी तांतरिक शक्तियों
12:19से जकड लिया था.
12:21हनुमान जी की वह चाया जैसे अथाह समुद्र के तल से बांथ दी गई हो, जिसके कारण उनका उर्ना पूरी
12:28तरह से ठप हो गया था.
12:31हनुमान जी को अनुभव हुआ की एक अग्रिश्य और प्रचंड खिंचाव उन्हें जबर्दस्ती नीचे समुद्र के पानी की ओर खींच
12:38रहा है.
12:40अपनी दूरद्रिश्टी से हनुमान जी ने नीचे समुद्र की उथल-पुथल तरंगों की ओर देखा ताकि उस अद्रिश्य शत्रु की
12:48पहचान कर सकें.
12:50तभी समुद्र की उफन्ती लहरों को चीरते हुए भयंकर और विशालकाय राक्षसी सिन्हिका अपने विक्राल रूप में प्रकट हुई.
12:59सिन्हिका ने एक ही ग्रास में हनुमान जी को निगलने के विचार से अपना पातालसम विशालकाय मुख खोल दिया.
13:08हनुमान जी तुरंत समझ गए कि यह वही प्रसिद्ध छायाग्राही राक्षसी सिन्हिका है, जिसके विशय में जामबवंत जी ने उन्हें
13:16चेतावनी दी थी.
13:18किसी भी भय से मुक्त, श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान ने इस विकट बाधा का सामना करने के लिए पल
13:25भर में एक अचूक रणनीती बनाई.
13:28वे वायु के समान सुक्ष्म रूप धारण करके सिन्हिका के उस गुफासद्रिश विशाल मुख के भीतर अत्यंत तेजी से प्रवेश
13:36कर गए.
13:37सिन्हिका ने समझा कि उसने इस महाबली वानर का सरलता पूर्वक शिकार कर लिया है और प्रसन्न होकर अपना मुख
13:45बंद कर लिया.
13:46किन्तु मुख के भीतर पहुचते ही हनुमान जी ने तुरंट अपना शरीर परवत जैसा विशाल बना कर उसके आंतरिक अंगों
13:55को अपने तीक्षन नखों से चीरना प्रारंभ कर दिया.
13:59असहिय पीडा से चीखती हुई वह विशालकाय राक्षसी सिन्हिका चटपटाने लगी और देखते ही देखते उसके प्रान पखेरू उडगए.
14:09सिन्हिका के वक्षस्थल को चीर कर महाबली हनुमान विज्यहुकार के साथ पुना आकाश मार्ग में प्रकट हो गए.
14:17इस भयंकर बाधा का अंतकर पवनपुत्र हनुमान और भी अधिक उत्साह और गती के साथ लंका की दिशा में उर्चले.
14:27महासागर की विशाल तरंगों को पार करते हुए पवनपुत्र हनुमान अंत्त सुवेल और त्रिकूट परवत की सुरमय चोटियों से घिरे
14:35लंकापती रावन के सामराजिके तट पर पहुँचे.
14:39शिखर पर खड़े होकर जब हनुमान ने सामने देखा, तो सुवर्ण पुरी लंका की अकलपनिय भव्यता और मायावी किलेबंदी को
14:47देखकर वेक्षणभर के लिए विस्मित रह गए.
14:51विश्वकर्मा द्वारा निर्मित वह दिव्य नगरी सुवर्ण की विशाल प्राचीरों, मनियों से जड़े भवनों और अभेद्य द्वारों से सुशोभित होकर
15:00एक जलते हुए सुवर्ण परवत की भांती प्रतीत हो रही थी.
15:05धलते हुए सूर्य की अंतिम लालिमा लंका के उंचे-उंचे कंगूरों और धोजों पर पड़ रही थी, जिससे संपूर्ण नगरी
15:12में एक अध्भुत और रहस्यमई कांती बिखर रही थी.
15:17हनुमान ने ध्यानपूर्वक निरीक्षन करते हुए देखा कि लंका के चारों और गहरी परिखाय और विशाल समुद्र की जलधाराय इसे
15:25प्राकृतिक रूप से अभेध्य बना रही थी.
15:29प्राचीरों पर पहरा देते हुए विशालकाय और भयंकर स्वरूप वाले राक्षस योध्धा अपने हाथों में विचित्र अस्त्रशस्त्र लिए निरंतर गश्ट
15:38लगा रहे थे.
15:40मुख्य द्वारों पर विशाल लोहे की अर्गलाय लगी हुई थी और रावन की मायावी शक्तियों के कारण पूरा किला एक
15:47अभेध्य चक्रव्यूः की भांती द्रिश्यमान हो रहा था.
15:51इस अपार सैनेबल और भौतिक सुरक्षा को देख कर हनुमान समच गए की केवल बाहुबल से इस मायावी किले में
15:59प्रवेश करना असंभव है.
16:03समुद्र का भीशन गर्जन और चट्टानों पर टक्राती हुई विशाल लहरेन लंका की दुरगेता को और भी भयावह रूप प्रदान
16:10कर रही थी.
16:12पवन्पुत्र ने परवत की ओट में बैठ कर विचार किया कि दिन के उजाले में विशाल रूप धारन करके प्रवेश
16:19करने पर शत्रु तुरंत सतर्क हो जाएंगे.
16:23उन्होंने रणनीती बनाई कि माता सीता का पता लगाने हेतु उन्हें अपनी पहचान छिपाकर अत्यंत गुप्ट तरीके से लंका में
16:31प्रवेश करना होगा.
16:34रावन के अहंकार और मायाजाल को छिन्न भिन्न करने के लिए हनुमान ने अपनी अश्ट सिध्धियों में से अनिमा सिध्धी
16:41का स्मरण किया.
16:43जैसे ही रातरी का अंधकार गहराया और संपूर्ण लंका नगरी दीट को तथा मनियों के प्रकाश में जग्मगाने लगी, हनुमान
16:51ने अपना कार्य प्रारंब किया.
16:55पवनपुत्र ने अपने विशालकाय और वजर समान शरीर को संकुचित करना प्रारंब किया और पलक जपकाते ही एक छोटे बिलाव
17:03या सुक्ष्म वानर का रूप धारण कर लिया.
17:06इस सुक्ष्म रूप में भी उनके भीतर अप्रिमित बल और श्रीराम की भक्ती का वही अलोकिक प्रभाव निरंतर प्रज्वलित हो
17:14रहा था.
17:16रातरी की स्तब्धता में सुक्ष्म रूप धारी हनुमान अत्यंत चपलता और मौन गती से राक्षसी पहरेदारों की द्रिष्टी से बचते
17:24हुए आगे बढ़े.
17:26लंका की बाह्य सुरक्षा दिवार के पास पहुँचकर उन्होंने देखा की राक्षस पहरेदार मदिरा और आनंद में मगन होकर विश्राम
17:35कर रहे थे.
17:37हनुमान ने अत्यंत सावधानी पूर्वक कदम बढ़ाते हुए किले के मुख्यद्वार लंकद्वार की ओर अपनी यात्रा जारी रखी.
17:46हर एक मोर पर रावण के सुरक्षा तंत्र और मायावी तंत्रों को पार करते हुए पवनपुत्र का संकल्प और अधिक
17:53द्रेड होता गया.
17:55प्रभु श्री राम के पावन नाम का स्मरण करते हुए महाबली हनुमान ने रात्री के अंधकार में लंका के भीतर
18:03अपना पहला गुप्त कदम रखने की तयारी की.
18:07महाबली हनुमान ने समस्त बाधाओं को भेदने का संकल्प लेकर लंका के विशाल और दुर्गम द्वार की ओर अपना अगला
18:15कदम बढ़ाने के लिए स्वयन को तयार किया.
18:19शीरसागर में भगवान विश्नु ने अपने शेशनाग शया पर विराजे हुए, हनुमान के इस अभूत पूर्व साहस और भक्ती को
18:27शांत भाव से निहारा.
18:30प्रभु श्री राम के नाम का हृदय में धारन किये हुए, पवनपुत्र ने लंका के भव्य स्वर्णजरित द्वार की ओर
18:37अपना पहला ग्रिड कदम बढ़ाया.
18:40जैसे ही उन्होंने द्वार पर अपना हाथ रखा, एक अद्रिश्य शक्ती ने उन्हें भीतर प्रवेश करने से रोक दिया, मानो
18:48लंका स्वय अपनी रक्षा कर रही हो.
18:51तभी अचानक द्वार के भीतर से एक भयानक गर्जना के साथ लंका की प्रचन रक्षक देवी, लंकिनी, विक्राल रूप में
18:59प्रकट हुई.
19:02श्रिश्टिकर्ता ब्रह्मा ने अपने दिव्य आसन पर बैठ कर, हनुमान और लंकिनी के बीच होने वाले उस नेतिनिर्धारित संधर्ष को
19:10देख कर अपनी पुरानी भविश्यवानी का स्मरण किया.
19:14लंकिनी ने हनुमान के सामने आकर एक भयानक गर्जना करते हुए पूछा कि वे किसकी आग्यासे लंका में प्रवेश करने
19:22का दुस्साहस कर रही हैं.
19:25दो विपरीद शक्तियों का यह टकराव, जैसे दिन और रात का मिलन हो, लंका के द्वार पर एक तीवर उर्जा
19:32का भंवर उत्पन कर रहा था.
19:35लंकिनी ने हनुमान को लंका में घुसने से रोकने के लिए अपनी पूरी शक्ती के साथ उन पर आकरमन करने
19:42का निश्चय किया.
19:44कैलाश परवत पर भगवान शिव और देवी पारवती ने इस महत्वपूर्ण पल को अपनी दिव्यद रिष्टी से देखते हुए, हनुमान
19:53की सफलता के लिए शांत भाव से आशिरवाद दिया.
19:57हनुमान ने लंकिनी की विशाल देह को चीरते हुए, बिजली की गती से लंका के भीतर घुसने का पहला प्रयास
20:04किया.
20:05क्रोध से भरकर लंकिनी ने एक भयावह गर्जना की, जिससे लंका की दिवारे तक कांप उठीन और हनुमान को चुनौती
20:14दी.
20:16लंकिनी और हनुमान के बीच अब एक भयंकर युद्ध छिड़ गया, जिसमें दोनों अपनी पूरी शक्ती से एक दूसरे पर
20:23प्रहार कर रहे थे
20:26भगवान विश्णूनेक शीरसागर से हनुमान के द्रिड संकल्प और लंकिनी के प्रतिरोध को देख कर एक रहसिमय और आश्वस्त मुस्कान
20:35बिखेरी
20:37हनुमान ने अपने अतुलनिय बल का प्रदर्शन करते हुए एक प्रचंड मुक्का लंकिनी के हृदय पर जड़ दिया, जिससे वह
20:44हिल उठी
20:46उस एक प्रहार से मानो लंका की रक्षापंक्ती में एक दरार आ गई और लंकिनी का अभिमान चकनाचूर हो गया
20:54प्रचंड प्रहार से अचेथ होकर लंकिनी धर्ती पर गिरी उसकी विक्राल देह से तीवर उर्जा का स्पंदन शांत हो गया
21:03ब्रहमांड के स्वामी ब्रहमा ने अपने दिव्यदर्शन से लंकिनी के पराजय और अपनी भविश्यवानी की पूर्ती को देखकर एक गहन
21:12संतोष की सांस ली
21:15चेतना लोटते ही, लंकिनी को ब्रहमा की भविश्यवानी याद आई, जब एक वानर के प्रहार से तु गिरेगी, तब लंका
21:23का विनाश निकट होगा
21:25अपनी नेती को स्वीकार करते हुए, लंकिनी ने हनुमान को प्रवेश की अनुमती दी, और लंका का विशाल द्वार एक
21:33नए युग के लिए खुला
21:35लंका नगरी में प्रवेश करते ही हनुमान ने अपने विशाल रूप को त्याग कर एक सुक्ष्म और अगोचर वानर का
21:43रूप धारण कर लिया ताकि वे शत्रुदुर्ग में अद्रिश रहकर अपना कार्य संपन्न कर सकें
21:50सुदूर वैकुंठ लोक में भगवान विश्णु ने अपने कमल पुष्पी नेत्रों से हनुमान के प्रवेश को देखा उनके मुख पर
21:58एक शांत और गंभीर मुस्कान तैर रही थी जो आने वाली घटनाओं की ओर इशारा कर रही थी
22:05एक अद्रिश चाया की भानती ननहें हनुमान ने लंका के भव्य मारगों, विशाल उद्ध्यानों और विशालकाय भवनों के भीतर निर्बाध
22:14गती से विचर्ण करना आरंभ किया, हर कोने में सीता की उपस्थिती का संकेत टटोलते हुए
22:22लंका की अदमय शक्ती का प्रतीक, उसके विशालकाय प्रासादों की काली चाया ननहें हनुमान पर पड़ती थी, जो उनके अकेलेपन
22:30और आसन्य चुनौती को गहरा कर रही थी
22:35सर्वप्रथम हनुमान ने लंका के शाही महलों के विशाल प्रांगणों और भव्य कक्षों में अपनी खोज प्रारंभ की, जहां की
22:42हर दीवार, हर खंभार आक्षसी वैभव की कहानी कह रहा था
22:48कैलाश परवतपर भगवान शिव अपने गहन ध्यान से उठकर, अपनी तीसरी दिव्य द्रिश्टी से हनुमान की लंका में गहन खोज
22:56को देख रहे थे, उनके मुख पर एक शांत परंतु द्रिध भाव था
23:01प्रत्येक शाही कक्ष के परदे, प्रत्येक संदूक और पलंग के नीचे, यहां तक की अलंकरित गहनों के बक्सों में भी
23:09हनुमान ने अत्यंत सावधानी और आशा के साथ सीता की तलाश की, पर कोई निशान नहीं मिला
23:17दर्जनों खाली, रेश्मी बिस्तरों और मौन भव्यक अक्षों ने हनुमान के हृदय में निराशा की भावना को और गहरा कर
23:24दिया, जैसे उनकी हर खोज एक व्यर्थ प्रयास साबित हो रही थी
23:30महलों के आंतरिक सुखदायक उध्यानों और उपवनों में भी जहां मंध हवा में सुगंधित फूल जूम रहे थे, हनुमान ने
23:38हर लता, हर पत्ती और हर ज़रने के पीछे सीता का पता लगाने का प्रयास किया
23:44अपने चार दिव्य मुखों से भगवान ब्रह्मा ने अपने कमल सिनहासन पर बैठ कर हनुमान की अथक परंतु निश्वल खोज
23:53को देखा, उनके चहरे पर चिन्ता की एक गहरी चाया मंदरा रही थी
23:58गहन खोजबीन के बावजूद जब सीता का कोई संकेट नहीं मिला, तो हनुमान के हृदय में निराशा की काली चाया
24:06गहराने लगी, उनके शक्तिशाली मन में पहली बार संदेह की लहर उठी
24:12महल के एक कोने में एक मुर्जाया हुआ, परंतु कभी सुन्दर रहा कमल का फूल पड़ा था, जो मानो सीता
24:19के वियोग और हनुमान की बढ़ती निराशा का प्रतीक बन गया था
24:24निराशा के क्षणों में भी हनुमान ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से पूरे लंका के विशाल भूभाग को फिर से स्कैन किया,
24:32एक उच्छ शिखर से नीचे देखते हुए, जहां कहीं भी सीता हो सकती थी
24:38कैलाश परवत पर देवी पारवती ने भगवान शिव के साथ बैठ कर हनुमान की पीड़ा को महसूस किया, उनकी आखें
24:46करुणा और सहानुभूती से नम थी, जबकि शिव शांत भाव से देखते रहे
24:52अचानक उनके मन में एक विचार कौन धा, रावन सीता को इतने भव्य महल में नहीं रखेगा, बलकि किसी एकांत
25:00दुरक भरे स्थान पर छिपाएगा, जिससे हनुमान की खोज की दिशा बदल गई
25:06एक घनी भूत अंधकार को चीरती हुई, चंद्रमा की एक किरण नीचे उतरी, जिसने हनुमान को अपने लक्षे की ओर
25:15एक नया मार्ग दिखाया, निराशा के बीच आशा की एक चमक जगाते हुए
25:21हनुमान की दिश्टी अब लंका के सबसे एकांट और घने हरेभरे क्षेत्र की ओर मुडी वह अशोक वाटिका थी, जहां
25:29उन्हें सीता के मिलने की अंतिम आशा जगी
25:33वैकुंट में भगवान विश्णू और उनके वाहन गरुड ने एक दूसरे को देखा, उनके नेत्रों में एक मौन समझ थी,
25:41जैसे वे जानते थे कि हनुमान अब सही मार्ग पर है
25:46अब नई आशा और अदमे द्रिड संकल्प से भर कर, हनुमान ने अशोक वाटिका की ओर तीवर गती से प्रस्थान
25:53किया, उनके प्रत्येक पच्चाप में श्रीराम के प्रती उनकी निष्ठा जहलक रही थी
25:59जैसे ही हनुमान अशोक वाटिका की ओर बढ़े, उनके सामने एक नया द्वार खुलता दिखा, जो उनके महान अभियान में
26:08एक महत्वपूर्ण अध्याय का सूत्रपात कर रहा था
26:12हनुमान के समक्ष अशोक वाटिका का प्रवेश द्वार प्रकट हुआ, जो पत्थरों में उकेरे गए राक्षसी चेहरों से सुसजित था
26:20और चारों और जहरीली लताय लिप्टी हुई थी, मानो लंका की काली शक्ती उसके हर पहलू में समाई हो
26:28वैकुंट में भगवान विश्णू ने अपने वाहन गरुड के साथ एक अद्रिश्य उर्जा तरंग महसूस की, उनके दिव्यनेत्रों में एक
26:37शनिक चमक थी जो हनुमान की बढ़ती हुई प्रक्ती का संकेट दे रही थी
26:43हनुमान ने धीरे से उस द्वार से प्रवेश किया, उनकी वानर आकरिती घने पत्तों और व्रिक्षों की चाया में छिप
26:50गई, हर दिशा में उनकी पैनी द्रिश्टी सीता की खोज में थी
26:55वातिका के भीतर हवा में एक अजीब उदासी और निराशा की सुगंध थी, जो हर खिले हुए फूल और जूलती
27:03हुई लता में महसूस की जा सकती थी, मानो वह स्थान स्वया दुहक से भरा हो
27:09घनी हरियाली के बीच, हनुमान ने एक विशाल अशोक व्रिक्ष के नीचे बैठी हुई एक आकरती को देखा, जो सादे
27:17वस्त्रों में लिप्टी थी, और जिसके चारों और भयावा राक्षसी परिचारिकाय घूम रही थी
27:24उसी क्षन्क वैकुंठ में भगवान विश्णू ने मंद मुस्कान के साथ अपने हाथों को जोड लिया, क्योंकि गरुर ने भी
27:32उनकी ओर देखा, उनकी आखों में हनुमान के प्रयासों के प्रती सम्मान जलक रहा था
27:39हनुमान का हृदय सीता की दैनिय स्थिती देखकर दर्द से भर गया, लेकिन साथ ही उन्हें अपने प्रभु राम के
27:46प्रती उनकी अटल भक्ती की पवित्रता का आभास भी हुआ
27:51देवी सीता का चहरा उदासी से ढखा था, फिर भी उनकी आखों में राम के प्रती अटूट प्रेम और विश्वास
27:59की एक दिव्य चमक थी, जो अंधकार में दीपक के समान प्रजवलित थी
28:04हनुमान ने राक्षसी परिचारिकाओं को देखा, जो क्रूर, घिनोने और भयानक रूप से शक्तिशाली थी, अपनी भयाव उपस्थिती से सीता
28:14को निरंतर भयभीत कर रही थी
28:17वैकुंट में भगवान विश्णु ने अपने नीले हाथों में शंक को थामा, मानोवे ब्रहमांडिये उर्जा को केंद्रित कर रहे हो,
28:25जबकी गरूर ने अपने पंखों को धीरे से फड़फडाया, उनकी सतर्कता चरम पर थी
28:32हनुमान ने एक उचे व्रिक्ष पर चड़कर खुद को पूरी तरह से छिपा लिया, अपनी वानर प्रकृती का उप्योग करके
28:39अद्रिश्य रूप से सीता और उनके दुखत परिवेश का अवलोकन किया
28:45वातिका के हर कोने में रावन के अहंकार और कुरूर्ता की चाप थी, लेकिन सीता की उपस्थिती ने उस अंधकार
28:52में भी एक अविश्वस्निय पवित्रता और आशा की किरन प्रजवलित कर रखी थी
28:58सीता पूरी तरह से अकेली थी, अपने प्रभु की याद में लीन, उनके वस्त्रधूल भरे और बाल अस्तव्यस्थ थे, फिर
29:07भी उनकी गरिमा और देवित्व अक्षुन था
29:11वैकुंट में भगवान विश्णों की आखें अनन्त ज्यान के साथ चमक उठीन मानों उन्होंने भविश्य की घटनाओं को देख लिया
29:19हो, जबकि गरुर ने एक गहरी, शांत सास ली
29:23सीता की असहनिय पीडा को देख कर हनुमान का द्रिड संकल्प और भी मजबूत हो गया, उन्होंने शपतली की वे
29:31किसी भी कीमत पर राम का संदेश उन तक पहुँचाएंगे
29:36वातिका के मौन में सीता के अकेलेपन और भक्ती की गूंच थी, एक ऐसी शक्ती जो लंका के हर राक्षस
29:43की क्रूरता को चुनौती दे रही थी
29:46अब हनुमान को सीता के निकट जाने की रणनीती बनानी थी, ताकि वे अपनी पहचान उजागर किये बिना उनसे संबाद
29:54कर सके
29:56वैकुंठ में भगवान विश्णू ने अपने होठोन पर उंगली रखी, एक मौन संकेट देते हुए, जबकी गरोड ने अपनी आखें
30:05बंद कर ली, उनकी दिव्य अंतरग्रिष्टी गहरी एक आगरता में लीन थी
30:11हनुमान ने अपनी वानर चंचलता का उपियोग करते हुए, एक छोटे से व्रिक्ष पर कूट गए, अपने प्रभु के नाम
30:18का स्मरण करते हुए, एक नई उर्जा से भर गए, उनके शरीर में दिव्य शक्ती का संचार हो रहा था
30:26अशोक वाटिका की उदास हवा में एक सुख्षम परिवर्तन महसूस हुआ, जैसे एक शांट अंदेखा तूफान आने वाला हो, जो
30:34लंका के भाग्य को हमेशा के लिए बदल देगा
30:38अशोक वाटिका के एक विशाल वरिक्ष पर हनुमान ने अपने छोटे रूप में पत्तियों के घने आवर्ण में छिपकर, रावन
30:46के राक्षसी पहरेदारों से घिरी हुई माता सीता को देखा, जिनके चहरे पर गहरी उदासी और पीडा साफ जलक रही
30:54थी
30:55वैकुंट में भगवान विश्णू ने अपने होटोन पर एक और मौन संकेत दिया, उनकी निल्मनिसी चमकती आखों में एक सुक्ष्म
31:04मुस्कान खेल रही थी, क्योंकि उन्हें हनुमान के सफल आगमन का आभास हो गया था
31:10अपनी आखों में गहरी वेदना लिये, हनुमान ने सीता की दशा को महसूस किया, उनके हृदय में राम के प्रती
31:18अटूत प्रेम और विश्वास की अगनी और भी तीवरहो उठी
31:23अशोक वाटिका की उदास हवा में एक पवित्र संकल्प की गूंच उठी, जैसे एक अद्रिश्य तरंग ने समस्त वातावर्ण को
31:31आशा की नई उर्जा से भर दिया हो
31:35हनुमान ने धीरे से व्रिक्ष से नीचे उतरना शुरू किया, उनका मन राम के संदेश को सीता तक पहुचाने के
31:42लिए एक आग्र था, हर पत्ती की सरसराहट पर सावधानी बरत्ते हुए
31:48ब्रह्मा लोक में चतुर मुखी ब्रह्मा ने अपनी कमल की गद्धी पर बैठ कर एक शांत मुस्कान के साथ अपने
31:55चार मुखों से ध्यान पूर्वक इस दिव्य लीला का अवलोकन किया
32:00एक पत्ता भी न सरकाते हुए, हनुमान माता सीता के पास और भी करीब पहुँच गए, उनकी उपस्थिती इतनी सुक्ष्म
32:08थी की हवा में भी कोई हलचल न हुई
32:12रात की खामोशी में एक अद्रिश्य आशा की किरण ने सीता के हरदय को छू लिया, भले ही उन्हें इसका
32:19स्रोत ज्यात नहीं था, लेकिन उन्हें एक आंतरिक शांती का अनुभव हुआ
32:25हनुमान ने एक मीठे और शांत स्वर में राम का नाम पुकारा, जो हवा में गूंजता हुआ सीता के कानों
32:32तक पहुँचा, जिससे उन्हें एक खशन के लिए अपने आसपास की भयानक वास्तविक्ता से मुक्ती मिली
32:39देवलोक में इंद्रदेव ने अपनी आखों में विस्मय और अनुमोदन लिये, हनुमान के साहस और भक्ती को निहारते हुए, अपने
32:48वजर को हलके से थामे रखा
32:51सीता ने चौंक कर चारों ओर देखा, उनकी आखों में भय और उम्मीद की अजीब मिश्रण थी, उन्हें लगा कि
32:59यह सब उनके दुख का एक और भम है
33:03हवा में एक रहस्य में फुस्फुसाहट गूंज उठी, जैसे स्वयन ब्रहमांड ने सीता को आश्वस्ट करने के लिए एक संकेत
33:11दिया हो, उन्हें एक अजीब सी उर्जा का अनुभव हुआ
33:15अपनी वानी को और अधिक स्पष्ट करते हुए, हनुमान ने राम के गुणों और उनकी खोज के दृड संकल्प का
33:22वर्णन करना शुरू किया, जिससे सीता के हृदय में विश्वास की पहली किरन जगी
33:29भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को थामे हुए, शांत भाव से अपनी तीसरी आख से कैलाश परवत की
33:36बरफीली उंचाईयों से इस महत्वपूर्ण क्षन को देखा
33:41अपनी कमर से राम की अंगूठी निकाल कर हनुमान ने उसे सावधानी पूर्वक सीता की ओर बढ़ाया, उस पर राम
33:48का नाम सूर्य के समान चमक रहा था
33:52अंगूठी की चमक ने अशोक वाटिका में एक पल के लिए आशा की स्वर्णिन लहर पैदा कर दी, जैसे एक
33:59लंबा अंधेरा खत्म हो रहा हो
34:02सीता ने अपनी कमपकमपाती उंगलियों से अंगूठी ली, उसकी ठंडी धातु को महसूस किया और उस पर राम के नाम
34:10को देखकर उनके आसु खुशी और राहत के साथ बहने लगे
34:15स्वर्ग के अपसराओं ने दूर से इस हृद्यसपर्शी मिलन को देखा, उनकी आखों में अश्रु और श्रधा भरी थी, वे
34:23दिव्य पुश्पों की वर्शा कर रही थी
34:26राम के प्रती अपनी श्रधा और प्रेन के प्रतीक के रूप में सीता ने अपने सिर से अपना बहुमुल्य चूडामनी
34:34उतारा और उसे हनुमान को सौंक दिया
34:38हनुमान ने चूडामने को अत्यंत आदर के साथ ग्रहन किया, उनके मुख पर गर्व और संकल्प की गहरी भावना थी,
34:46उन्होंने सीता को राम के शीघर आगमन का आश्वासन दिया
34:51सीता को दिये आश्वासन के पश्चात हनुमान के मन में एक नया संकल्प जागा की लंका की शक्ती का आकलन
34:58कर रावन को चुनौती देना अनिवार्य है
35:02दूर कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख में हनुमान के आगामी पराक्रम को देखा, उनके मुख पर
35:10एक शांत मुस्कान थी
35:13अपने विराट रूप में आते हुए उन्होंने अशोक वाटिका के सबसे विशाल व्रिक्षों में से एक को जड़ से उखारना
35:20शुरू किया, जैसे कोई बालक खिलोना तोड रहा हो
35:25पहली चिंगारी के साथ वाटिका में एक भयावह सन्नाटा चा गया, मानो प्रकृती भी आने वाले महाविनाश की आहट से
35:33सहन गई हो
35:35फिर एक के बाद एक हनुमान ने विशाल व्रिक्षों को उखाड़ना, सुन्दर लताओं को तोरना और जल कुंडों को तहसन
35:43हस करना शुरू कर दिया, उनकी शक्ती का कोई सानी नहीं था
35:48वैकुंठ में भगवान विश्णु ने अपने शेशनाग पर विराजमान होकर हनुमान के इस अग्धुत साहस और युक्ती को निहारा, उनके
35:57मुख पर शांत स्वीकृती का भाव था
36:00एक विशाल पेड को हतियार बना कर उन्होंने वाटिका में स्थापित स्वर्ण मंडपों और मूर्तियों को ध्वस्त करना शुरू किया,
36:08हर प्रहार से धर्ती काप उठी
36:11वाटिका का हर कोना अब एक युद्धक्षेत्र में बदल रहा था, जहां शांती की जगह विध्वन्स का तांडव हो रहा
36:19था, और हवा में धूल वभय की गंध घुल गई थी
36:23हनुमान के इस अभूत पूर्व उत्पात से लंका के राक्षसी पहरेदारों में खलबली मच गई, उनकी चीखें वाटिका के शांत
36:32वातावर्ण को चीरती हुई गुंजने लगी
36:35देवर्शी नारद अपने वीना पर मधूर धुन छेड़ते हुए इस अद्भूत द्रिश्य को देख रहे थे, उनकी आखों में उत्सुकता
36:43और प्रशंसा का भाव था
36:46राक्षसी सेना के मुखिया, अकमपन ने अपने सैनेकों को हनुमान पर आक्रमन करने का आदेश दिया, लेकिन पवनपुत्र अजे चट्टान
36:55की तरहे खड़े थे
36:58हनुमान की गर्जना ने राक्षसों के दिल दहला दिये, और उनके हर प्रहार से लंका की धर्ती डोलने लगी, जैसे
37:05प्रलै का अग्रदूत आ गया हो
37:08अब सैकडो राक्षस हनुमान को चारों ओर से घेर चुके थे, उनकी तलवारें और त्रिशूल हवा में चमक रहे थे,
37:16पर हनुमान के सामने वे बौने लग रहे थे
37:20ब्रहम लोक में चतुर मुखी ब्रहमा ने अपने चार मुखों से हनुमान के अदमे साहस और युद्ध कौशल का बखान
37:27किया, उनके नेत्रों में दिव्य तेज था
37:31हनुमान ने एक साथ कई राक्षसों को अपने घुसे और लातों से दूर फेंक दिया, उनकी शक्ती वजरपात की तरह
37:39थी, जिससे शत्रु दल तितर बितर हो गया
37:43लंका की धर्ती पर पहली बार ऐसा प्रचंड को लाहल और विध्वन्स देखा गया था, जो रावन के सामराज्य को
37:50एक गंभीर चेतावनी दे रहा था
37:54अशोक वाटिका अब मात्र एक नाम बनकर रह गई थी, हनुमान ने उसे युद्ध के मैदान में बदल दिया था,
38:01जो उनकी प्रचंड शक्ती का प्रमाण था
38:05इंद्रदेव वजरधारन किये हुए, अपने एरावत पर सवार होकर, इस अद्भुत पराक्रम को देखकर आश्चर्यच कित्थे, उनके मुख पर विस्मय
38:14का भाव था
38:16लंका के रक्षकों में अब आतंक फैल चुका था, उन्हें हनुमान की प्रचंड शक्ती और उनके पीछे छिपे बड़े खत्रे
38:24का एसास हो गया था
38:27इस विध्वन्स के साथ हनुमान ने रावन के अहंकार पर एक अचुक प्रहार किया था और लंका के भाग्य में
38:34अब युद्ध की काली चाया मंदराने लगी थी