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अयोध्या की सीमाओं पर छाया सन्नाटा, क्या भरत अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेंगे? देखिए प्रभु श्रीराम और भरत का भावुक मिलन, राज्याभिषेक की भव्य तैयारी और रामायण के इस अंतिम महत्वपूर्ण अध्याय के अनकहे रहस्य। पद्म पुराण के इस विशेष अंक में जानिए कैसे एक युग के अंत और नए धर्म-राज्य की शुरुआत हुई। #Ramayana #PadmaPurana #Ayodhya #LordRama #HinduMythology #SanatanDharma #RamRajya #MythologicalStories
Transcript
00:00नंदीगराम की कुटिया के द्वार पर भरत के तप का चौदहवा वर्ष अपने अंतिन प्रहर में प्रवेश कर चुका है
00:06और आकाश में ग्रहों की स्थिती प्रभु श्री राम के आगमन का संकेत दे रही है।
00:13भरत अपनी काया को अगनी में समर्पित करने के लिए संकल पबद्ध होकर कुटी के बाहर नगन पद खड़े हैं
00:20और उनकी आखों में प्रभू श्री राम के विरह की पराकाश्था स्पष्ट दिखाई दे रही है
00:27तभी नंदीग्राम के उपर का आकाश एक दिव्यस वर्निम जोती से भर उठता है और वायू के प्रचंड वेक के
00:35साथ पुश्पक विमान की गड़गराहट सुनाई देने लगती है
00:39प्रकृती का कंकंड पुलकित हो उठा है जैसे ही पुश्पक विमान की चाया नंदीग्राम की पावन भूमी को स्पर्श करती
00:47है हवाओं में एक अग्भुत सुगंध घुल जाती है
00:52भरत के हृदय की धड़कने मानो थमसी गई है और वह अपनी आखों को विश्वास नहीं दिला पा रहे कि
00:59क्या यह उनकी प्रतीक्षा का अंत है या केवल एक दिव्यस्वपन
01:04भगवान विश्णु का अंशलिये प्रभु श्री राम विमान से उतरते हैं और उनके अलौकिक तेज से समस्त दिशाएं प्रकाशित हो
01:12जाती हैं
01:15पुश्पक विमान से उतरते ही श्री राम के चरण कमलों को निहारते भरत की चेतना शून्य हो जाती है और
01:22वे दोड़कर धर्ती पर गिर पड़ते हैं
01:25वहक्षन संसार के लिए साक्षात धर्म की विजय का प्रतीक बन गया है जहां प्रेम और कर्तव्य एक दूसरे के
01:33सम्मुख नत्मस्तक हैं
01:36भरत लडखडाते हुए चरणों की ओर बढ़ते हैं और अपनी सम्पून भक्ती के साथ प्रभुश्री राम के चरणों को अपने
01:44अशुरूं से धो देते हैं
01:47प्रभु श्री राम ने भरत को अपने हरदय से लगा लिया है और उनकी आखों से भी सनेह के अश्रु
01:53ज़र रहे हैं जो सम्पून स्रिष्टी को आर्ग्र कर रहे हैं
01:58लक्ष्मन और सीता माता भी पीछे से धीमे स्वरों में इस महा मिलन की साक्षी बन रहे हैं और उनके
02:05मुख पर भी अपार शांती विराजित है
02:09नंदी ग्राम की वायू में मानो मंत्रों का गुन्जन स्वतह ही सुनाई देने लगा है और प्रकृती भी इस एतिहासिक
02:17शन का वंदन कर रही है
02:20भरत कापते हुए स्वरों में कहते हैं कि उनकी चौदह वर्ष की तपस्या आज सफल हो गई क्योंकि उनके आराध्य
02:27अब वापस आ गए हैं
02:30श्रीराम मुस्कुराते हुए भरत के मस्तक को सहलाते हैं और उन्हें उठने का संकेट देते हैं जो उनकी अगाध ममता
02:38का प्रमाण है
02:41यह द्रिशन केवल दो भाईयों का मिलन है बलकि यह न्याय और नैतिकता की एक ऐसी गाथा है जो युगो
02:48युगो तक स्मरण की जाएगी
02:51नंदी ग्राम की वह भूमी जो चौदह वर्षों से शोक का केंद्र थी आज एक उत्सव के वातावर्ण में बदल
02:58गई है
03:01रिशिमुनी भी अपनी कुटियों से बाहर निकल आए हैं और इस दिव्य मिलन को देखकर उनके मुख से केवल जैगोश
03:08निकल रहा है
03:10प्रभु श्री राम की उपस्थिती मात्र से ही संपूर्ण नंदी ग्राम का वातावर्ण पवित्र और सकारात्मक उर्जा से भर उठा
03:18है
03:20भरत उठकर प्रभु श्री राम को अपने हृदय से लगा कर उन्हें नंदी ग्राम की कुटिया की ओर सम्मान सहित
03:27ले जा रहे हैं
03:2914 वर्षों का लंबा अंधकार समाप्थ हुआ और अब अयोध्या के नवनिर्मान और प्रभु के राज्याभिशेक का मार्ग प्रशस्थ हो
03:37गया है
03:39पुश्पक विमान की स्वर्णेम आभासे नंदी ग्राम का आकाश प्रकाशित हो उठा है
03:45मानो स्वयन सूर्य देव ने प्रित्वी पर अपना तेज उतार दिया हो
03:50भगवान विश्णु का दिव्यरूप शेशनाग की शया पर विराज मान होकर मुस्कुराते हुए इस महामिलन की लीला का साक्षी बन
03:58रहा है
04:00भरतने अत्यंत भावुक होकर श्री राम के चर्णों को अपने अश्रूओं से धो दिया
04:06जैसे सूखी धर्ती पर वर्षों बाद अमरित की वर्षा हुई हो
04:11नंदी ग्राम की पवित्र मिट्टी पर खड़ी वनवासी वेशभूशा में प्रभु राम का तेज किसी भी स्वर्ण आभूशन से कहीं
04:18अधिक प्रकर प्रतीत हो रहा है
04:22आकाश से देवता पुष्पों की वरिष्टी कर रहे हैं और संपूर्ण वातावर्ण में गंधर्वों का मधुर संगीत गुंजायमान हो रहा
04:30है
04:32गरुर्देव अपनी विशाल पंखों को समेटे हुए आकाश में एक अद्रिश्य रक्षक की भाती प्रभु के आगमन की गरिमा को
04:39निहार रहे हैं
04:42लक्षमन ने अपनी धनुष की प्रक्तियंचा धीली कर दी है उनकी आखों में अब युद्ध का नहीं अपितु मात्रि भूमी
04:49के प्रेम का सागर उमड रहा है
04:53समय का चक्रनंदी ग्राम की इस कुटिया के द्वार पर रुक्सा गया है जहां युगों का विरह एक क्षण के
05:00आलिंगन में विलीन हो गया है
05:03सीता मया ने अपनी वात्सल्यमे द्रिष्टी से अयोध्या की प्रजा को देखा और उनकी मुस्कान में सम्पूर्ण संसार का कल्यान
05:11नहित हो गया
05:13देवराज इंद्र ने एक क्षण के लिए अपना सिन्हासन त्याग कर प्रभू के इस अद्भुत प्रेम को देखकर नत्मस्तक होने
05:21का निर्णय लिया
05:23अयोध्या की सीमाओ पर लगे वट्वरिक्षों ने मानो अपनी भुजाए फैला कर अपने आराध्य का स्वागत करने का प्रयास किया
05:31हो
05:32राम के नक्षिक के दर्शन करते ही भरत का हृदय कृतग्यता से भर गया जैसे उन्हें खोया हुआ ब्रह्मान पुना
05:39प्राप्थ हो गया हो
05:41पुश्पक विमान की सीढियों पर उतरते ही श्री राम के चरन स्पर्श करते हुए भरत के अंतर्मन का सारा बोज
05:48एक पल में धुल गया
05:51शिवजी हिमालय की चोटियों से इस दर्श को निहार कर अपनी समाधी से बाहर निकले और प्रभु के इस महामिलन
05:58को प्रणाम किया
06:00नंदिग राम के जनवरी से जनवरी के मुख से केवल जैश्री राम के उद्गोश निकल रहे हैं जो दिशाओं को
06:07कमपायमान कर रहे हैं
06:10राम ने अपने हाथों से भरत को उठाया और उन्हे स्नेह पूर्वक अपने वक्ष से लगा लिया जिसे देखकर प्रकृती
06:18भी स्तब्ध रह गई
06:21मर्यादा पुरुशोत्तम की कोमलता और क्षत्रिय धर्म का यह समन्वय संपूर्ण मानवता के लिए एक नया पत प्रशस्त कर रहा
06:29है
06:30नारद मुनी अपनी वीना पर भक्ती का स्वर छेरते हुए इस पावन घटना का वर्णन तीनों लोकों में करने हेतु
06:37प्रस्थान कर रही है
06:40विभीशन का भेंट किया हुआ पुश्पक विमान अब शांत खड़ा है
06:44मारो वह भी इस मिलन की उर्जा को अपने भीतर आत्म साथ कर रहा हो
06:50आज अयोध्या का अंधकार सदा के लिए मिट गया है
06:54और अब भव्य राज्या भिशेक का स्वर्ण युक प्रारंभ होने की वेला आ गई है
07:00पुश्पक विमान की मंद गती के साथ सर्यू के तट पर उतरते ही
07:05अयोध्या की स्वर्ण में आभा में एक नई दिव्य चेतना का संचार हुआ
07:11विमान से उतरते ही श्री राम के मुख मंदल पर अपने प्रिय अनुझ भरत के प्रती अगाद स्नेह की शीतल
07:17धारा बहने लगी
07:20दूसरी ओर भरत जिन्होंने वर्षों तक सन्यासी के वस्त्रों में प्रभु की पादुकाओं की सेवा की थी
07:26उनकी आखों से प्रेम के अश्रुधारा प्रवाहित हो रहे थे
07:31समय मानो थम गया हो जब अयोध्या की पवित्र भूमी पर इन दोनों भाईयों का मिलन होने जा रहा था
07:37और प्रकृती भी मौन होकर इस द्रिश को निहारने लगी
07:42श्री राम ने अपनी भुजाएं पसारी और एक ही पल में 14 वर्षों का समस्त विरह उस अलौकिक आलिंगन में
07:50विलीन हो गया
07:52देवराज इंद्र ने स्वर्ख से इस दिव्य मिलन को देख कर गंधर्वों को मधुर वीना वादन करने का संकेत दिया
08:00भरत ने जुपकर श्री राम के चर्णों को सपर्ष किया, मानो उन्होंने साक्षात परब्रह के चर्णों में अपनी समस्त भक्ती
08:07अर्पित कर दी हो
08:09यह द्रिशे इतना हरिद्यस परशी था कि वहां उपस्थित समस्त रिशिमुनी भी अपनी भावुक्ता को रोक न सके और उनकी
08:18आखों से हर्ष के आसु छलक पड़े
08:21पूरे राज्य में शंक और दुन्दुभी की मंगल ध्वनी गूज उठी जैसे स्वय धराभी राम के लौट आने का उच्सव
08:28मना रही हो
08:30श्री राम ने भरत को उठा कर अपने हृदय से लगाया और उनके मस्तक को प्यार से चुमकर उन्हें धांधस
08:37बंधाया
08:39तुलसी और पुष्पों की वर्षाकर अयोध्या की माताओं ने अपने पुत्रों के मिलन पर अपार्स ने व्यक्त किया
08:47अयोध्या की वे गलिया जो राम के वियोग में उदास थी आज दीपों और रंगों की चमक से सजी हुई
08:54एक दिव्यलोग का आभास दे रही थी
08:58स्वया वायुदेव ने इस मिलन की गंध को पूरे ब्रहमांड में फैलाया मानो संपून स्रिष्टी श्रीराम के पुनह अयोध्या आगमन
09:06पर आनन्दित हो उठी हो
09:09लक्षमन्त जो अब तक मौन थे अपने भाई भरत की भक्ती देखकर भाव विभोर हो गए और उनकी आखों में
09:16भी चमक आ गई
09:18मिलन के इस महापल में कोई भी शब्द परियाप्त नहीं थे केवल मौन प्रेम की भाशा ही उसक्षन की पवित्रता
09:26को बया कर रही थी
09:28सर्यू का जल भी शांत लहरों के साथ प्रभु के चर्णों का आलिंगन कर रहा था, मानो वह भी इस
09:35मिलन का साक्षी बनने को आतुर हो
09:38दिव्य सभा का वातावर्ण भक्ती और शांती से उतप्रोथ था, जहां देवता भी अद्रिश्य रूप में इस पावन मिलन का
09:46आशिरवाद ले रहे थे
09:48भरत ने श्री राम के सम्मुख नत्मस्तक होकर अपनी समस्थ शासन की चिन्ताएं और राज्य का भार पुनह प्रभु के
09:56चर्णों में सौंक दिया
09:58पूरे नगर में जैजैकार की ध्वनी गूंजने लगी और अयोध्या का महा मिलन एक शाश्वत इतिहास बन गया
10:07इस अलोकिक मिलन के साथ ही रामायन का एक और स्वर्णिम अध्याय समाप्थ हुआ और राज्याभिशेक की भव्यत यारियों का
10:15शंकनाध हुआ
10:17अयोध्या के प्रासाद में माताओं के हृदय में उथल पुथल मची है जहां वे अपने पुत्रों को सुरक्षित लोटते देख
10:24हर्ष और विस्मय के सागर में डूबी हुई है
10:29देवी कौशल्या जिनकी आखों से सनेह के अश्रु निरंतर बह रहे हैं अपने प्रिय पुत्र श्री राम को निहारते हुए
10:37स्वयं को धन्य अनुभव कर रही है
10:40राम के चर्णों में अपनी भूल का प्रायश्चित लिए कैकेई का हृदय द्रवित हो उठा है और वे लज्जा और
10:47प्रेम के मिश्रित भावों से मौन खड़ी है
10:52अंकार और पश्चाताप की अगनी में तबकर कैकेई का हृदय शुद्ध हो चुका है जो अब केवल श्री राम के
10:59चर्णों की सेवा के लिए लालायत है
11:02सुमित्रा माता ने अपने पुत्र लक्षमन को सहर्ष गोद में भर लिया मानो 14 वर्षों का विछो एक क्षण के
11:10आलिंगन में विलीन हो गया हो
11:13भग्वान विष्णु के अंश स्वरूप श्री राम माता सुमित्रा के सिर पर अपना हाथ रख कर उन्हें सांत्वना प्रदान कर
11:20रहे हैं
11:22लक्षमन का मुखमंडल अपने माता के प्रती प्रेम और सेवाभाव से उत्प्रोथ है जिसे देखकर राजभवन की प्रत्येक दासी भी
11:31भावुक हो उठी है
11:43मंदिर की घंटिया स्वयम बजने लगी हैं
12:03हर्ष की यह लहर संपून अयोध्या नगर में व्याप्थ है जहां प्रजा अपने राजा के स्वागत के लिए पुनह पुष्प
12:11वर्षा कर रही है
12:14वायुमंदल में चंदन और धूप की सुगंध फैल गई है जो इस महामिलन की दिव्यता को और अधिक जीवन्त बना
12:21रही है
12:23कौशल्य माता ने सीता को अपने निकट बिठा कर उनके कश्टों का वृत्तांत सुना जिससे उनका वातसल्य और भी अधिक
12:31गहरा हो गया
12:33सीता का मुख शान्त सरोवर के समान है जिसमें धैर्य और त्याग की अध्भुत कांती दिखाई दे रही है
12:41राजा दशरत की अनुपस्थिती में भी राम के चहरे पर उनकी स्मृतिया जीवित हैं जिससे माताओं को एक नई शक्ती
12:50मिल रही है
12:52पुश्पक विमान की आभा अब भी राजभवन के द्वार पर विलीन हो रही है जिसे देखकर सभी विस्मित हैं
13:00भाईयों के बीच का यह अटूट प्रेम ही अयोध्या की वास्तविक शक्ती है जो इसे सदैव अमर बनाए रखेगा
13:09माताओं का हृदय जो कभी शोकाकुल था अब आनन्द के अश्रूओं से सराबोर होकर उच्सव की तयारी में जुट गया
13:17है
13:18इस मिलन की साक्षी स्वयं प्रकृती भी बन रही है जहां मंदमंद सुगंधित समीर बह रहा है
13:26अयोध्या अब पुनस्वर्ण युग के द्वार पर खड़ी है जहां धर्म और प्रेम का संगम चिरस्थाई हो चुका है
13:35अयोध्या की सीमाव पर सुनहरी पताकाएं लहराने लगी है और नगर का हर कोना दिव्य सुगंध से भर गया है
13:44देवराज इंद्र ने अपने दिव्य लोक से अयोध्या की शोभा को देख कर हर्शित होते हुए पुष्प वर्षा करने का
13:51आदेश दिया
13:53नगर के मुख्य द्वार पर दासी और सेविकाय मिलकर के सर्युक्त जल से गलियारों को पवित्र कर रही है
14:01सर्यु नदी के तट पर दिव्य दीपों की एक अनवरत शिंखला सजी हुई है जो मानो धर्ती पर नक्षत्रों को
14:08उतार लाई हो
14:11अयोध्या के जन्मानस में उत्साह इतना है कि हर घर के आंगन में रंगोली और बंदनवार से श्री राम का
14:18स्वागत किया जा रहा है
14:21रिश्यमुनी अपने आश्रमों से निकल कर अयोध्या की ओर प्रस्थान कर रहे हैं उनके मुख पर प्रभु के आगमन की
14:28प्रसन्नता स्पष्ट है
14:31स्वर्ण नगरी के स्तंभों पर नकाशिदार दीपकों की लौकों सहेजने के लिए स्वयन सेवक तत्परता से कार्य कर रहे हैं
14:41वायुमंडल में वेदों की रिचाओं का गान गूज रहा है जो वातावर्ण को पूरी तरह से आध्यात्मिक और पावन बना
14:48रहा है
14:50सर्यू के तटपर वानरों और रिशियों की एक विशाल सभासी सज गई है जहां सभी श्री राम की प्रतीक्षा में
14:57मगन है
14:59भगवान विश्नु का दिव्य अंश मानकर प्रजा अपनी आखों में अश्रुलिये प्रभु के चर्णों को पकारने की तयारी में है
15:08नगर के स्वर्ण द्वारों को विशेश रूप से मल्लिका और गेंदे के फूलों से सुसज्जित किया गया है
15:16अयोध्या की प्रतेक गली से अब केवल श्री राम के जैकारों की गूँच सुनाई दे रही है
15:24नगर की राजविथियों पर केसर और चंदन का छिड़काव किया गया है जिससे मार्ग और भी सुर्भित हो उठा है
15:33अगनिदेव का आशिरवाद पाकर अयोध्या की हवाएं अब मानो अधिक शीतल और सुखध हो गई है
15:41प्रजा ने स्वयं को रतनों और आभूशनों से सजाया है जैसे आज उनके स्वयं के जीवन में कोई बड़ा उत्सव
15:48हो
15:50असंख्य दीपों की जग्मगाहट से अयोध्या की रात भी दिन के समान स्वर्ण में प्रतीत हो रही है
15:57पुश्पक विमान के आने की आहट सुनकर अयोध्या का हृदय धड़कने लगा है, मानो काल का चक्र भी थम गया
16:04हो
16:06स्वया वायुदेव श्रीराम के मार्ग को सुगंधित और अवरोध मुक्त करने के लिए ततपर है
16:13राजमहलों की छटों से पुश्पों की पंखुडिया निरंतर वर्षा की तरहे बरस रही है
16:2014 वर्षों का लंबा इंतजार अब समाप्थ होने वाला है और अयोध्या पूरी तरहे से प्रभो के चर्णों में समर्पित
16:28होने को आतुर है
16:30वशिष्ठ मुनी के आदेशानुसार राज्या भिशेक के लिए समस्त रिशियों ने एक विशाल वैदिक मंडप का निर्मान प्रारंब कर दिया
16:38है
16:39जहां सोने और चांदी की इंटों से सजी वेदिया सूर्य की किर्णों को परावर्तित कर रही है
16:47महर्शी वशिष्ठ जिनकी काया तेज से उतप्रोत है और जो श्वेत वस्त्रों तथा रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित हैं
16:55राजगुरु के आसन पर विराजमान होकर मंत्रो चारण के माध्यम से दिव्य उर्जा का आहवान कर रही है
17:03तीनों लोकों की पवित्र नदियों के जल को लाने के लिए देवदूतों ने एक भव्य कल्षों की श्रिंखला तयार की
17:10है
17:10जिसमें गंगा, यमुना, सरस्वती और अन्य दिव्य नदियों का नील्मनी के समान जल संचित है
17:18राजमहल की दिवारों पर दिव्य उश्धियों का लेट लगाया जा रहा है
17:23जिससे पूरा वातावर्ण एक सुगंधित और आध्यात्मिक आभा से भर गया है
17:28मानो प्रकृती स्वय राजा के स्वागत के लिए सज रही हो
17:33राजभवन के प्रांगण में चारों दिशाओं से दिव्य उश्धियां और जड़ी बूटियां लाई जा रही है
17:39जिनका उप्योग राजतिलक के समय पवित्र स्नान और यग्य की शुद्धी के लिए किया जाएगा
17:46ब्रहमाजी के मानस पुत्रों में से एक महर्शी वामदेव अपने दिव्य कमंडल से पवित्र जल का छिड़काव कर रहे हैं
17:53जिससे राजभविशेक स्थल की शुद्धी हो रही है और नकारात मकता दूर हो रही है
18:01शिल्पकारों ने रतनों और स्वर्ण मुद्राओं से जड़ित एक भव्य स्वर्ण सिनहासन का निर्मान किया है
18:07जो प्रभु श्रीराम के राज्याभिशेक के लिए सूर्य के रत के समान चमक रहा है
18:14वायुमंडल में वेदों की रिचाओं का स्वर गूझ रहा है
18:17और प्रत्येक ध्वनी राजभवन की दीवारों पर दिव्य जोतियों को उत्पन कर रही है
18:22जिससे एक अलोकिक द्रिश उपस्थित हो गया है
18:27अयोध्या के चारों द्वारों पर स्वर्ण कलश और आम के पत्तों की बंदनवारे लगाई गई है
18:32जो प्रभु के विजय और धर्म की पुनस्थापना के प्रतीक के रूप में दिखाई दे रही है
18:40देवराज इंद्र के संकेट पर अपसराएं अपनी वीना और मृदंग के साथ मंच पर उपस्थित है
18:46जो राज्याभिशेक के मंगल गान के लिए एक मधुर और दिव्यवातावर्ण तयार कर रही है
18:54सेवक और सेविकाएं उत्तम रेश्मी वस्त्र पहने हुए महल के गलियारों को चंदन और इत्र के छिड़काव से सुगंधित कर
19:02रही है
19:02ताकि हर कोने में केवल दिव्यता का वास हो
19:07राजसी कोश से निकाले गए बहुमूल्य रत्न और आभूशनों को सजावट के लिए उप्योग में लाया जा रहा है
19:14जिनकी चमक से महल का प्रत्येक स्तंभ दैदी प्यमान हो उठा है
19:19नगर के प्रत्येक घर में मंगल दीप प्रजवलित करने की तैयारी की जा रही है
19:24ताकि जब प्रभु का राज्याभिशेक हो तो पूरी अयोध्या नक्षत्रों के समूह के समान जिल्मिला उठे
19:32महर्शी वशिष्ठ और अन्यरिशियों के समूह ने राज्याभिशेक के विधान के लिए शास्त्रों का अवलोकन पूर्ण कर लिया है
19:39और अब वे प्रभु के आने की प्रतीक्षा में है
19:44राजमहल की छट पर एक विशाल ध्वज फहराया गया है
19:48जिस पर सूर्यवन्शी कुल का प्रतीक चिन्ह अनकित है जो अब नए युक के आगमन की घोशना कर रहा है
19:56अयोध्या की सीमाओ पर खड़े रक्षकों ने अपना कवच और आयुध त्याग कर पुश्पों की मालाएं धारण की हैं
20:04क्योंकि वे जानते हैं कि यह युद्ध का नहीं, बलकि शांती के महामिलन का काल है
20:10सर्यू नदी के तटको विशेश रूप से सुसज़ित किया गया है
20:14जहां जल की लहरे भी प्रभु के आगमन की धुन गुन गुना रही है
20:19और शीतल मंद सुगंधित पवन चल रही है
20:23देव लोग के गंधरवों ने अद्रिश रहकर आकाश में अपना स्थान ले लिया है
20:28वे राज्याभिशेक के अफसर पर दिव्यरागों को छेडने के लिए ततपर है
20:35राज्याभिशेक के आयोजन के लिए अयोध्या का मुख्य राजपत सात रंगों के पुश्पों से सजाया गया है
20:41जो एक इंद्रधनुशी मार्ग की भांती प्रतीत हो रहा है
20:47सब कुछ तयार है और अयोध्या की प्रत्येक इंट प्रभु के चर्णों की आहट सुनने के लिए पुलकित हो रही
20:54है
20:54मानो वह भी प्रान पाकर खिल उठी हो
20:58पुश्पक विमान के उतरते ही अयोध्या की स्वर्ण में आभासे समस्थ दिशाएं देदी प्यमान हो उठीन मानो सूर्य स्वयं प्रित्वी
21:06पर उतर आया हो
21:09भरत ने दौड कर श्री राम के चरण कमलों को अपने अश्रूओं से सीच दिया
21:14जैसे कोई प्यासी धर्ती वर्षों की प्रतीक्षा के बाद वर्षा की पहली बूंद पाकर धन्य हो गई हो
21:21श्री राम ने प्रेन से भरत को उठा कर अपने वक्ष से लगा लिया
21:25जिससे 14 वर्षों की विरहगनी एक क्षण में शीतल जलधारा में परिवर्तित हो गई
21:32समस्त अयोध्यावासी इस महामिलन के साक्षी बनकर जैगोश कर रहे हैं
21:37जिससे वातावर्ण में भक्ती और आनंद का एक अलौकिक संगीत गुंजायमान हो रहा है
21:44भरत ने कापते हाथों से राजसिनहासन के प्रतीक चरण पादुकाओं को प्रभु के सम्मुख रखते हुए कहा कि यह राज्यकेवल
21:52आपकी थाती थी
21:55भगवान विश्णु जो इस लीला के सूत्रधार हैं शीर सागर के दिव्य वैकुंठ लोक से इस समर्पन को देखकर मंदमंद
22:03मुस्कुरा रहे हैं
22:05भरत का मस्तक प्रभु के चर्णों में जुका हुआ है और वे विनम्रता पूर्वक घोशना करते हैं कि प्रभु के
22:12बिना अयोध्या का राजा केवल एक सेवक मात्र है
22:17आकाश से गंधर्वों ने पुश्पों की ऐसी व्रिष्टी की मानुस्वयन स्वर्ग अयोध्या के गलियारों में उतर कर प्रभु के राज्याभिशेक
22:26का नियोता दे रहा हो
22:28श्रीराम ने भरत को आलिंगन बद्ध कर उन्हें धर्म के पालन का संदेश दिया जिसे सुनकर अयोध्या की हवाई भी
22:36कृतग्यता से भर उठी
22:39ब्रह्मा जी अपने कमंडल से पवित्र जल की फुहार छोड रहे हैं जो इस एतिहासिक राज्याभिशेक के लिए संपून अयोध्या
22:47को शुद्ध और पावन बना रहा है
22:51राजमहलों की दीवारों पर जडित रत्न प्रभू की उपस्थिती पाकर और भी अधिक चमकने लगे हैं जैसे वे भी अपनी
22:58स्वामिनी प्रित्वी के पुनर्मिलन का उच्सव मना रहे हूँ
23:03एक प्रतीक के रूप में स्वर्ण सिनहासन के उपर पुष्पों का छत्र निर्मित किया गया है जो प्रभू की सर्वोच्छ
23:10सत्ता का प्रतीक बनकर चमक रहा है
23:14श्री राम के राज्याभिशेक के लिए वशिष्ठ मुनी ने मंत्रो चारण प्रारंब कर दिया है जिससे अयोध्या की प्रत्येक इंट
23:22में चैतन्य जागरित हो गया है
23:25गरुर देव अपने पंकों की चाया से अयोध्या को अभय प्रदान कर रहे हैं जो इस युक्के धर्मस्थापना का मौन
23:33समर्थन है
23:35सीता माता का मुखमंडल प्रसंता से दमक रहा है जैसे उन्होंने ही अयोध्या की खोई हुई मुस्कान को वापस लाकर
23:43संजोया हो
23:45संपूर्ण ब्रह्मांड इस क्षण को देख रहा है जहां त्याग और अधिकार का मिलन होकर एक नए रामराज्य की आधारशिला
23:53रखी जा रही है
23:56भरत के नेत्रों में सेवा का भाव है और श्री राम के हृदय में समस्त प्रजा के प्रती मंता जो
24:02एक आधर्श राजा की पहचान है
24:06नारद मुनी अपनी वीना पर भक्ती का स्वर छेड रहे हैं जिसे सुनकर पत्थर भी पिघलने को मजबूर हो गए
24:13हैं
24:15प्रभु के राज्याभिशेक की तयारियां पूनता की ओर हैं और अयोध्या का प्रत्येक प्राणी इस नए युग के उदे का
24:23स्वागत करने को व्याकुल है
24:26एक युग का अंत और न्यायपूर्ण राज्य का उदे हो चुका है, जहां श्रीराम का राज्याभिशेक केवल एक घटना नहीं,
24:34बलकि धर्म की विजय का शंखनाध है
24:38सर्यू नदी के तटपर स्वर्णिम आभा बिखेरते हुए, प्रभु श्रीराम के विजय ध्वच को फहराने का पावनक्षन उपस्थित हुआ है
24:48आकाश में विराजे देवराज इंद्र अपने दिव्यरत पर सवार होकर इस धर्म विजय के गौरव को निहार रहे हैं
24:56इंद्र के आदेश से दिव्य गंधर्वों ने अपनी विनाओ पर विजय के मंगल गान छेड़ दिये हैं, जिससे संपून वातावर्ण
25:04भक्तिमय हो गया है
25:07विजय ध्वज का सुनहरा कपड़ा मंदमंध हवा में लहराते हुए संपून अयोध्या को एक नए युग की सूचना दे रहा
25:15है
25:16सर्यू के शांत जल में प्रतिबिम्बित होता हुआ, यह विजय ध्वज मानो साक्षात धर्म की अटलता का साक्षी बन गया
25:24है
25:26स्वर्ग से पुष्पों की वर्षा करते हुए देवता अपनी कृतग्यता व्यक्त कर रहे हैं, मानो स्वयन प्रकृती इस उत्सव में
25:33सहभागी बनी है
25:36इस अलोकिक द्रिश को देखकर, गंधर्व राज अपने संगीत की स्वरलहरियों को और भी अधिक गंभीर और दिव्य बना रहे
25:44हैं
25:46ध्वज के शिखर पर लगा चक्र सूर्य की किर्णों के स्पर्ष से देदी प्यमान हो उठा है, जो अधर्म के
25:53अंधकार का अंत दर्शा रहा है
25:56सर्यू के घाट पर उपस्थित समस्थ रिशियों के मुख से निकल रहे वेदमंत्र इस विजय ध्वच को और भी शक्तिशाली
26:03बना रहे हैं
26:06ब्रहमाजी अपनी कमलासन स्थिती में इस द्रिश्य को देखकर मुस्कुरा रहे हैं, उनकी द्रिश्टी में स्रिश्टी का कल्यान नहित है
26:15हवा में तैरते दिव्य पुष्पों की सुगंध से अयोध्या की वायुमंडल में एक अलौकिक पवित्रता का संचार हो गया है
26:24ध्वच का लहराना मानो साक्षात धर्म के विजय का शंकनाध है, जिसे सुनकर पाताल से लेकर स्वर्प तक सब गूझ
26:32उठे हैं
26:35देवताओं की सभा में गूंजता संगीत धर्म के इस नए सूर्योदय का स्वागत एक महाकाव्य की भाती कर रहा है
26:44स्वर्णजडित ध्वजदंड पर अनकित पवित्र चिनह धर्म की जीत को युगो-युगो के लिए अमर बना रहे हैं
26:52सर्यू के किनारे पर विजय के उत्सव का उत्साह प्रकृती के हर कण में अनुभव किया जा सकता है
26:59शिव जी का ध्यान भी इस विजय ध्वनी से भंग हुआ और वे भी इस महामिलन के साक्षी बनने हेतु
27:06तत्पर है
27:08ध्वज की प्रत्येक लेहर मानो श्रीराम के न्यायपूर्ण राज्य की उदारता और करुणा का संचार कर रही है
27:17अद्रिश्य देव शक्तिया इस ध्वज को अपनी आशीशों से अभिमंत्रित कर रही है ताकि अयोध्या सदा धर्म के मार्ग पर
27:25चले
27:26इस विजए ध्वज के नीचे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की त्रिवेणी का साक्षात आभास हो रहा है
27:34विजए ध्वज का फहराना केवल एक अंत नहीं, बल्कि उस शाश्वत रामराज्य की शुरुवात है जो युगो युगो तक मानव
27:42जाती का मार्ग दर्शन करेगा
27:45अयोध्या की सीमाओं में प्रवेश करते ही प्रभु श्री राम के चरण स्पर्श से धर्ती की धूल भी स्वर्ण कणों
27:52के समान चमकने लगी है
27:55भगवान विश्नु का सूक्ष्मरूप चतुर्भुज धारी अपने नीलवर्ण शरीर के साथ ब्रहमांडी आभा बिखेरते हुए मंदमुस्कान के साथ इस सुखत
28:05द्रिश्य को निहार रही है
28:08अयोध्या के नागरिकों ने अपने घरों के द्वार पर पुष्पों की वर्षा कर उस विज्य जुलूस का स्वागत किया जो
28:15युगों के अधर्म को मिटा चुका है
28:18नगर के मुख्यद्वार पर मंगल कल्षों की पंक्ती मानो साक्षात लक्ष्मी के आगमन की प्रतीक्षा में स्वर्ण की आभा बिखेर
28:26रही है
28:28सर्यू नदी के तटपर प्रकृती भी अपनी मौन वानी में श्रीराम के पुनह आगमन की मंगलध्वनी गुंजा रही है
28:37देवराज इंद्र ने स्वर्ग से नंदन कानन के सुगंधित पुष्पों की वर्षा कर मानो आकाश को ही एक विशाल मंडप
28:45में परिवर्थित कर दिया है
28:48राजभवन के स्वर्ण द्वार पर मनिरत्न जड़ित प्रकाश स्वया उस धर्म की विजय का संकेट दे रहा है जो अब
28:55सदियों तक राज करेगा
28:58कालचकर की सुई अब धर्म की दिशा में घूम चुकी है जहां भय और अकाल के लिए कोई स्थान शेष
29:05नहीं रहा
29:06अयोध्या की पावन भूमी पर रिशिमुनी अपने तपोबल से आशिरवाद बरसा रहे हैं और चारों दिशाओं में वैदिक मंत्रों की
29:14गूंच सुनाई दे रही है
29:18ब्रहमाजी के मुख से निकली वेदध्वनी ने मानो श्री राम के राज्याभिशेक की पूर्वतयारी का अलौकिक संगीत रच दिया है
29:28राजसिनहासन की स्वर्ण वेदिका स्वयन को प्रभो के चर्णों के स्पर्ष के लिए उत्तुकता से सम्वार रही है
29:35स्वर्ण कल्षों से निकली सुगंधित जल की फुहार अयोध्या के कणकन को पवित्रता के सागर में डुबो रही है
29:44चारों और आनंद की ऐसी लहर दौड रही है कि पशुपक्षी भी अपनी चहचहाहट में प्रभो के नाम का गुनगान
29:51कर रहे है
29:53माता कौशल्या, कैकेई और सुमित्रा के चहरों पर हर्ष के आसु मानों उस संधर्ष की तपस्या को पूर्ण कर रहे
30:01है
30:03अयोध्या की नगर्वधो ने दीप जला कर राजपत को एक स्वर्णन्दी में परिवर्तित कर दिया है
30:11अद्रिश्य देव शक्तियां इस भव्य नगरी के उपर सुरक्षा का एक ऐसा घेरा बना रही है कि कोई भी अधर्म
30:18अब अयोध्या की सीमा नहीं लांग पाएगा
30:21श्रीराम का रत जैसे ही राजभवन के सामने रुका, समस्त अयोध्या ने एक साथ जय घोश कर ब्रहमांड को गुंजायमान
30:29कर दिया
30:31महर्शी वशिष्ठ की शांत और गंभीर मुद्रा में वह आशिरवाद छिपा है जो आने वाले युगों के इतिहास का आधार
30:39बनेगा
30:41प्रभु के पहले कदम के साथ ही अयोध्या की भूमी ने मानो अपना काया कल्प कर लिया, हर व्रिक्ष पर
30:48स्वर्ण के पुष्प खिल उठे
30:50यह केवल एक राजा का राज्या रोहन नहीं, बलकि उस धर्मराज्य का अभियुदय है, जिसका स्वप्न स्वयन देवों ने देखा
30:58था
31:00राम के अयोध्या आगमन के साथ ही पूरी प्रकृती ने एक नवीन चेतना का अनुभव किया, जहां नदिया भी अपनी
31:08मर्यादा में रहकर हर शोलास का गीत गा रही थी
31:12स्वया भगवान विश्नु शेशनाग की शया पर विराजित होकर इस रामराज्य के उदे को अपनी दिव्य द्रिश्टी से निहार रहे
31:20हैं, उनके मुख पर एक अलौकिक मुस्कान है
31:24प्रजा के प्रत्येक द्वार पर दीप प्रजवलित किये जा रहे हैं, जैसे धर्ती पर ही तारों का एक नया समो
31:31उतर आया हो
31:33स्वर्ण कल्षों से सुसजित अयोध्या की गलिया मानो स्वयंकाल को थाम लेने का निमंतरन दे रही हैं, जहां समय भी
31:41धर्म के अनुशासन में बंध गया है
31:45महर्शी वशिष्ठ ने राजसभा में प्रवेश किया और उनके पीछे धर्म का तेज ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सूर्य
31:52की किर्ने स्वयं मार्ग प्रशस्त कर रही हो
31:56गरुर देव अपनी विशाल पंखों के साथ आकाश में मंदराते हुए इस गौरवमईक्षन के साक्षी बन रहे हैं, उनके पंखों
32:04की फड़फडाहट में वेदों का गान सुनाई पड़ता है
32:09श्रीराम ने अपनी प्रजा के बीच जाकर एक साधारन सेवक का भाव प्रकट किया, जिससे राजसी अहंकार का अंतिम अस्तित्व
32:17भी समाप्थ हो गया
32:20नगर के प्रत्येक कोने में केवल शांती और परोपकार की ध्वनी गूँज रही है, जैसे स्रिष्टी ने अपने आदिधर्म को
32:27पुनह प्राप्थ कर लिया हो
32:30अयोध्या के चारों और देवों ने पुश्पों की वर्शाकर इस युग के महामिलन के प्रती अपना सम्मान व्यप्त किया है
32:39देवराज इंद्र ने एक दिव्य दूट के माध्यम से श्री राम को स्वर्ग से एक रत्नजडित मुकुट उफार स्वरूप भेजा
32:46है, जो न्याय का प्रतीक है
32:49श्री राम ने उस मुकुट को धारण नहीं किया, बलकि उसे अयोध्या की प्रजा की सेवा के लिए दान कर
32:56दिया, क्योंकि उनका असली मुकुट प्रजा का विश्वास है
33:01वातावर्ण में एक दिव्य संगीत की गूँज है, मानुस्वय गंधर्व लोग के वाध्य यंत्र अयोध्या के भाग्य पर विजय गीत
33:09गा रहे हूँ
33:11रामराज्य के इस भव्य दर्शन में प्रत्यक पशु और पक्षी भी अपनी भाशा में श्रीराम के गुनों का बखान कर
33:18रहे हैं
33:20शिवजी अपनी समाधी से उठकर इस दिव्य नगरी की वोर अपनी तीसरी आख से आशिरवात की वर्षा कर रहे हैं
33:29नगर के मुख्य द्वार पर स्थित पत्थर के नकाशिदार सिन्ह मानो श्री राम की सुरक्षा में सजीव हो उठे हैं
33:38यह वहक्षन है जहां इतिहास ने अपनी दिशा बदल ली और मानवता को जीने का एक नया स्वर्णिम मार्ग प्राप्थ
33:46हुआ
33:48अयोध्या की मिट्टी में अब केवल प्रेम और सामनजस्य की सुगंध है क्योंकि यहां का हर कन प्रभु के चर्णों
33:55से स्पर्ष पा चुका है
33:57माता सीता ने एक करुनाशील मुस्कान के साथ प्रजा को देखा और उनकी उस द्रिष्टी से पूरे राज्ज में मातरित्व
34:05का वर्दान फैल गया
34:07हर घर में वेदों की रिचाओं का पाठ हो रहा है जिससे अयोध्या का पूरा वायुमंडल दिव्य उर्जा से उतप्रोथ
34:15हो गया है
34:17श्रीराम का यह आदर्ष समाज आने वाले युगों के लिए एक शाश्वत प्रकाशस्तंभ बन चुका है जो अंधकार को सदा
34:25के लिए मिटा देगा

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