कुंभकर्ण के वध के बाद रावण का क्रोध चरम पर है। रावण अब अपने पुत्र मेघनाद को युद्ध के लिए भेजता है। मेघनाद की मायावी शक्ति और अदृश्य होकर किए गए प्रहारों से वानर सेना पूरी तरह थरथरा गई है। क्या श्रीराम इस अदृश्य शत्रु का संहार कर पाएंगे? देखिए पद्म पुराण के इस रोमांचक और रहस्यमयी अध्याय को। #PadmaPurana #Ramayan #Meghnad #HinduMythology #MythologicalSeries #SanatanDharma #LordRama #Hanuman #LankaWar
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00:00कुम्भकर्ण के महाप्रयान के बाद लंका के राजमहल में गहरी उदासी चा गई और शोक की लेहर दौड उठी.
00:08रावन अपने भाई के शव के पास अवाक खड़ा था और उसके भीतर प्रतिशोध की अन्बुझी ज्वाला भड़क उठी थी.
00:16क्रोध से कापते हुए रावन ने अपनी असफल सेना को दुद्कारा और अपने अजे पुत्र को याद किया.
00:25लंका की विशाल प्राचीरे रावन के इस भयंकर गर्जन से हिल उठीन और वातावर्ण में प्रलै का संकेत गूंज उठा.
00:33अमित पराक्रमी मेघनाद अपने पिता के दर्बार में स्वन सुसजित कक्ष में प्रकट हुआ.
00:40इंद्रजीत मेघनाद ने अपनी माता और पिता के चर्णों में मस्तक जुका कर अपनी अटूट निष्ठा प्रकट की.
00:48मेघनाद ने प्रतिग्याली कि वह राम और लक्षमन को अपने मायावी पाश में बांध कर लंका विजय सुनिश्चित करेगा
00:57युद्ध भूमी के आकाश पर काले बादलों का पहराचा गया और मायावी अंधकार ने संपूर्ण दिशाओं को ढख लिया
01:05रावन ने अपने पुत्र को महा माया के गुप्ट अस्त्रशस्त्र और मायावी शक्तियों से सुसज्जित होने का आशिरवाद दिया
01:14मंदोधरी की आखें अपने पुत्र के इस आसन महा संग्राम में जाने पर चिंता और अश्रु से भराई
01:22मेघनाद ने अपनी माता को आश्वासन दिया कि उसकी माया के आगे कोई भी देवता या मनुष्य नहीं टिक पाएगा
01:31अद्रिश्य शक्तियों के स्वामी मेघनाद के कदमों की आहट से लंका के द्वार स्वतह ही खुलने लगे
01:38मेघनाद अपने रत पर सवार होकर भयंकर गर्जना करते हुए रणभूमी की ओर प्रस्थान कर चुका था
01:47देवलोक में बैठे देवता भी इस आसन माया युद्ध के परिनाम को लेकर गहरी चिंता में डूग गए
01:54रणभूमी में उतरते ही मेघनाद ने अपनी अद्रिश्य शक्ती से स्वय को बादलों के बीच शुपा लिया
02:02आकाश से छाय इस घंगोर अंधकार ने वानर सेना के मन में एक अज्यात भय उत्पन्न कर दिया
02:10सुगरीव और अंगद ने अपनी सेना को सतर्क रहने का आदेश दिया क्योंकि कोई बड़ी विपत्ती आने वाली थी
02:18भगवान श्री राम ने इस अस्वाभाविक माया के प्रकट होने पर सतर्क होकर अपने धनुष की प्रत्यंचा खीची
02:26मेघनाद के मायावी अस्त्रों ने पलक जपकते ही वानर सेना को अपने घेरे में लेना शुरू कर दिया
02:34इस प्रकार रावन के आदेश पर मेघनाद ने युध का सबसे खतरनाक और मायावी अध्याई प्रारंभ कर दिया
02:42युद्ध के कोलाहल के बीच मेघनाद ने अपनी अटूट तपस्या से प्राप्त दिव्य सामगरियों को एक अगनी कुंड के चारों
02:50और स्थापित करना शुरू किया
02:53स्वर्ग के द्वार पर स्थित भगवान विश्नु जो शेशनात पर विश्राम कर रहे थे ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से मेघनाद
03:01की इस कुटिल तयारी को देख लिया
03:04इंद्रजीत ने अपने शरीर पर असुर शक्तियों से अभिमंत्रित एक विशेश अभेद्य कवच धारन किया जिससे उसकी आभादिव्य और भयावह
03:13हो उठी
03:15आकाश में गूंजती काली घटाओं के बीच एक भयानक प्रतीक उभराया जो इंद्रजीत के अद्रिष्य होने की शक्ती के संचार
03:23का संकेत था
03:26मेघनाद ने अपने हाथों में मायावी विद्या के मंत्रों को प्रवाहित किया जिससे उसके चारों और एक धुंधली सी चमक
03:33उत्पन हो गई
03:35तभी देवर्शी नारद ने अपनी वीना का तार छेड़ते हुए इस आसन्न संकट की चेताबनी के स्वर बिखेरे जो ब्रहमांड
03:44के कोनों तक पहुँचे
03:46इंद्रजीत ने अपनी आखे मूद ली और पूर्ण एकागरता के साथ उस गुप्ट विद्या का आहवान किया जो उसे किसी
03:54भी देवता की आखों से उजल कर सके
03:58अचानक वातावर्ण में एक भयानक सन्नाटा चा गया जैसे स्वयंकाल भी उस मायावी अद्रिश्यता के प्रकट होने का साक्षी बन
04:06रहा हो
04:08मेघनाद का शरीर धीरे-धीरे हवा के जोकों में विलीन होने लगा मानो वह स्वयं उस मायावी युद्ध का हिस्सा
04:15बन गया हो
04:17भगवान शिव ने कैलाश की उचाईयों से अपनी तीसरी आख खोल कर इस माया के खेल को सुक्षमता से निहारा
04:26इंद्रजीत ने अपनी कमर में बंधे उस मायावी तरकश को छुआ जिससे निकलने वाले बान अद्रिश्य होकर भी घातक प्रहार
04:34करने में सक्षम थे
04:36अंधकार और ज्वाला का एक अध्भुत संगम हुआ जब मेघनाद पूर्ण रूप से अद्रिश्य होकर युद्धक्षेत्र में अपनी चाल चलने
04:44को तैयार हुआ
04:46उसका अभेद्य कवच अब पूर्ण रूप से सक्रिय हो चुका था जो आने वाले किसी भी प्रहार को विफल करने
04:54की शक्ती रखता था
04:56गरुर देव जो आकाश में मंडरा रहे थे ने अपने पंखों को फड़फडाते हुए इंद्रजीत की इस कुटिल चाल की
05:04सूचना श्री राम को देने का प्रयास किया
05:07इंद्रजीत ने एक अट्टहास किया जो पूरी रणभूमी को देहला गया हाला की उसे कोई देख नहीं पा रहा था
05:15इस माया के जाल ने वानर सेना के चारों और एक ऐसा घेरा बना दिया था जिससे बाहर निकलना असंभव
05:23था
05:24मेघनाद अपनी अद्रिश स्थिती का लाब उठाते हुए वानर सेना के बीच से होकर निर्भय होकर आगे बढ़ने लगा
05:33ब्रहमाजी ने स्रिष्टी के संतुलन को बिगरता देख एक क्षन के लिए अपनी आखे बंद कर ली जैसे वे मेघनाद
05:40की इस माया के विरुध कोई मार्ग धूड रहे हो
05:45इंद्रजीत का अभेद्य कवच एक धाल की भाती चमकने लगा जो उसके हर कदम पर वानर सेना में और अधिक
05:52भय पैदा कर रहा था
05:54युद्ध का सबसे भयानक अध्याय खुल चुका था जहां दुश्मन सामने होते हुए भी अध्रिश्य था
06:02रनभूमी के उपर काला आकाश अचानक एक भयंकर चक्रवात में बदल गया
06:08जहां मेघनाद के मायावी कवच की चमक से सारा वातावर्ण रक्तवर्ण आभा में लिपट गया
06:14कैलाश के शिखर पर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख के एक सुक्षमस पंदन के साथ ब्रहमांडी उर्जा को केंद्रित
06:22करते हुए इस माया जाल का अवलोकन किया
06:26अद्रिश मेघनाद ने आकाश से विशैले बानों की वर्षा शुरू की जो जमीन पर गिरते ही जलते हुए अंगारों में
06:34परिवर्तित होकर वानरों के खेमों को भस्न करने लगे
06:38धुए और राख के गुबार में छिपी यह अद्रिशत रास्दी एक ऐसे भयंकर चक्र का संकेत थी जो धर्म और
06:46अधर्म के संतुलन को चुनौती दे रहा था
06:49वानर सेना का धैर्य अब तूटने लगा था क्योंकि वे एक ऐसे शत्रु के प्रहार सह रहे थे जिसकी स्थिती
06:56का अनुमान लगाना भी असंभव हो चला था
07:01देवराज इंद्र के आसन पर बैठा उनका दूट एक दिव्य तेजोमय पुरुष इस मायावी प्रहार को देखकर चिंतित मुद्रा में
07:08अपनी द्रिष्टी नीचे की ओर टिकाए हुए था
07:12अद्रिष मेघनाद का अटहास दसों दिशाओं में गूंज रहा था जिसने रनभूमी को एक भयावः भूल भुलिया में बदल दिया
07:20था
07:22सन्नाटे और चीखों के बीच एक काला अंधकार चारों और फैल गया जैसे समयने स्वयय इस विनाशकारी माया को स्विकार
07:30कर लिया हो
07:32मैदान के एक कोने में वानर वीर अपने चारों और गिर्ते वजरों को रोकने के लिए अपनी गदाए घुमा रहे
07:39थे लेकिन सब व्यर्थ जा रहा था
07:43वैकुंठ में स्थित भगवान विश्नु के शंक की ध्वने की एक गूंजने क्षण भर के लिए मायावी अंधकार को कमजोर
07:50कर दिया
07:52मेघनाद ने अपने कवच की अद्रिश्य उर्जा को और बढ़ाया जिससे आकाश में बने काले बादल अब रक्तवर्ण की बिजली
08:00में परिवर्तित हो गए
08:02यह मायावी जाल इतना सघन था कि स्वयं पवन्देव के अंश हनुमान जीभी केवल वायू के प्रवाह को महसूस कर
08:10पा रहे थे
08:11देख नहीं पा रहे थे
08:14पूरे रणक्षेत्र में फैली हुई राख और लोहे की गंध मेघनाद के राक्षसी अहंकार की परिचायक बन गई थी
08:22देवता गण उपर से इस युद्ध की विभीशिका को देख रहे थे उनकी आखों में भविश्य के प्रती एक मौन
08:29प्रश्न था
08:31अद्रिश मेघनाद ने एक और भयंकर बान छोड़ा जो सीधे सेना के मध्यभाग में गिरा और एक विशाल गड़ा निर्मित
08:39कर दिया
08:41अंधेरे और विनाश के बीच सत्य के संरक्षन के लिए एक सुप्ष्म दिव्य प्रकाश का संचार हुआ जो अद्रिश को
08:48भी भेदने की क्षमता रखता था
08:52समस्त वानर सेना उस एक स्थान पर एकत्रित हो गई जहां माया का प्रभाव कुछ कम था पर खत्रा अभी
08:59टला नहीं था
09:01नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा जिससे रणभूमी के वातावर्ण में एक दिव्य कमपन उत्पन हुआ
09:09मेघनाद का वह मायावी कवच अब और भी अधिक तीवर्ता से चमकने लगा जो उसके क्रूर इरादों को और अधिक
09:17पुष्ट कर रहा था
09:19रणभूमी के इस तीसरे अंक में भगवान की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता था और अंतिम
09:26संधर्ष की तयारी शुरू हो चुकी थी
09:30सुग्रीव और अंगद ने उस अश्यद्रिश शत्रू को तलाशने के लिए अपनी वानर सेना को सघन जंगलों और पहाडियों में
09:37फैला दिया
09:39वानर राज सुग्रीव ने अपनी लाल और क्रोधित आखों से चारों और देखकर उस अध्रिश चलावे को ललकारा
09:47अंगद ने अपनी शक्तिशाली गदा को पूरी ताकत से शूने में घुमाया ताकि माया का यह आवर्ण तूट सके
09:56अद्रिश मेघनाद ने आसमान में अटहास करते हुए वानर सेना के उपर काले बादलों और मायावी अस्त्रों की वर्षा कर
10:04दी
10:05महाबली सुग्रीव ने अपनी तीक्ष्न ग्रिष्टी से उस दिशा को पहचाना जहां से मायावी तीर लगातार आ रहे थे
10:13वानर सेनाप्तियों ने एक स्वर में गर्जना करते हुए उस माया के केंदर बिंदु पर आक्रमन करने की योजना बनाई
10:22अंगद ने चलांग लगा कर उस उँचे शिलाखंड पर प्रहार किया जिसके पीछे अग्रिष्य शत्रु की हलचल महसूस हुई थी
10:31किन्तु वहां केवल एक मायावी परचाई थी जो प्रहार करते ही हवा में गायब हो गई
10:38मेघनाद की इस निरंतर माया से वानर सेना के भीतर भ्रम और अस्मंजस की स्थिती उत्पन होने लगी
10:46सुग्रीव ने अपनी विशाल भुजाओं को फैला कर अपनी सेना को शांत रहने और शत्रुओं के भ्रम में ना आने
10:53का संकेत दिया
10:55अंगद ने अपनी तीखी निगाहों से आस्मान के उसकोने को देखा जहां अद्रिश्य राक्षस की उपस्थिती का आभास हो रहा
11:03था
11:04चल से परिपूण वह रनक्षेत्र अब पूरी तरह से धुन्ध और माया के पर्दों में लिपट चुका था
11:12वानर वीरों ने अपनी पूछों को जमीन पर पटकते हुए अपनी शक्ती का परिचय दिया और अद्रिश्य शत्रु को खुली
11:20चुनौती दी
11:22मेघनाद अद्रिश्य रहकर अपनी मायावी हसी के साथ वानर सेना के मनोबल को तोड़ने का कुछ सित प्रयास कर रहा
11:29था
11:30सुग्रीव ने अपनी गदा को कड़े हाथों से पकड़ कर उस अद्रिश्य उर्जा तरंग पर एक भयंकर प्रहार किया
11:38उस उर्जा तरंग के टकराने से उत्पन हुई चिंगारियों ने रनभूमी के अंधकार को क्षन भर के लिए जग्मगा दिया
11:47अंगद ने अपने पराकरम का परिचय देते हुए सेना के चारों और एक सुरक्षा कवच बनाने के लिए शिलाओं को
11:54व्यवस्थित किया
11:56वानर सेना के इन वीर नायकों का यह प्रयास मेघनाद की हर माया को चुनोती दे रहा था
12:04रणभूमी के इस धुन्धले क्षितिच पर अद्रिश्य और द्रिश्य के बीच का संधर्ष अब अपने चरम पर पहुँच रहा था
12:12मेघनाद के इस मायावी जाल को भेदने के लिए अब किसी दिव्य और सर्वव्यापी प्रकाश की आवश्यक्ता थी
12:20रणभूमी के ख्षितिच पर फैली मायावी धुन्ध के बीच लक्षमन ने अपनी धनुष की प्रत्यंचा खीची जिससे वायुमंडल में एक
12:29दिव्यकंपन उत्पन्न हो गया
12:31आकाश के सुदूर कोनों से गरुर्देव ने अपनी पैनी द्रिष्टी से मेघनाद के अद्रिष्य शड्यंत्रों को भामपते हुए लक्षमन को
12:40संकेत दिया
12:42लक्षमन ने एक ज्वलंत अगनिबान संधान किया जिसकी चमक से मेघनाद की माया का काला आवरन क्षन भर के लिए
12:49कांप उठा
12:51रनभूमी के उपर तैरती उसकाली माया के चक्रवियों में लक्षमन का संकल्प एक चमकते हुए नक्षत्र की भानती अडिक खड़ा
12:59था
13:01मेघनाद की अठास करती हुई आवाज चारों दिशाओं से गूझ रही थी परन्तु लक्षमन के कान अब केवल अपने कर्तव्य
13:09के स्वर को सुन रहे थे
13:12स्रिष्टी के रक्षक विश्णु स्वरूप लक्षमन का ध्यान अब मेघनाद के उन अद्रिश बिंदूओं पर था जहां से माया का
13:19संचार हो रहा था
13:21लक्षमन ने अपने तरकश से एक दिव्य अस्त्र निकाला जिसके छूते ही वातावर्ण में विद्युप की लहरें दौड गई
13:30मायावी मेघनाद की अद्रिश शक्ती के विरुद्ध लक्षमन का क्रोध एक गरचते हुए बादल की गरजना के समान शक्तिशाली हो
13:38उठा
13:40सैक्डों वानरों की कराह सुनकर लक्षमन के नेत्रों से अंगार बरसने लगे और उनका सन्यम एक ज्वाला मुखी की भानती
13:48फूट पड़ा
13:50आकाश में देवगण भी इस अद्भुत युक्ती को देख स्तब्ध थे की कैसे लक्षमन माया को परास्त करने हे तू
13:57एकाग्र हो रहे थे
13:59लक्षमन के धनुष से निकला वह बान अब एक स्वर्ण रेखा की भानती माया भी अंधेरे को चीरता हुआ आगे
14:06बढ़ा
14:08उस बान के प्रभाव से माया के वेजाल जो वानरों को भ्रमित कर रहे थे धीरे धीरे जलकर भस्म होने
14:15लगे
14:17मेघनाद को अब अपनी माया के चिन्नभिन होते जाल का आभास हुआ जिससे उसके मुख पर भय की प्रथम रेखा
14:24अंकित हो गई
14:26देवराज इंद्र ने भी अपने नंदन कानन से इस युद्ध के परिनाम की उत्सुकता में अपनी द्रिष्टी लक्षमन पर जमाय
14:33रखी
14:35लक्षमन का प्रतेक कदम अब आत्म विश्वास से भरा था वे अपनी रणनीती से मेघनाद की माया का अंत करने
14:42हेतु आगे बढ़ रहे थे
14:45मायावी अंधकार के भीतर से मेघनाद ने लक्षमन पर मायावी अस्त्रों की वर्षा की जिसे लक्षमन ने अपने शौर्य से
14:53विफल कर दिया
14:55वानर सेना ने जब लक्षमन को अडिक देखा तो उनके हताश हृद्यों में पुनह साहस का संचार होने लगा
15:03स्वयं पवनपुत्र हनुमान ने लक्षमन की इस युद्धनीती का अभिवादन किया और मेघनाद के प्रहारों को रोकने में सहायता करने
15:12लगे
15:13लक्षमन के बान अब मेघनाद के मायावी रक्षकों को खोज-खोज कर समाप्त कर रहे थे और रन्भूमी का द्रिश्य
15:21बदलने लगा था
15:23माया का अंतिम जाल तूटने को था और लक्षमन के सम्मुख अब एक निर्नायक संधर्ष की नई सुभ़ प्रतीक्षा कर
15:31रही थी
15:32लक्षमन ने आकाश की ओर प्रहार करते हुए अपने दिव्यास्त्र का संधान किया जिससे अंतरिक्ष के कोने-कोने में स्वर्णमी
15:40उर्जा का प्रवाह होने लगा
15:43गगन मंदल में छिपे मेघनाद की उपस्थिती का आभास पाते ही देवलोग के देवताओं ने पुश्प वर्षा आरंभ कर दी
15:52मेघनाद ने कृद्ध होकर अपनी मायावी शक्तियों का आहवान किया और आकाश में काले मेघों का एक भयंकर चक्रवात रच
16:00दिया
16:02अंधकार और प्रकाश के इस महासंगराम में दोनों और से छोड़े गए बाणों की तंकार से दसों दिशाएं गूज उठी
16:10लक्षमन ने अपनी अटूट एक आगरता से मेघनाद के हर एक मायावी प्रहार को विफल करना जारी रखा
16:18आकाश मार्ग से देख रहे गंधरवों और अपसराओं ने इस अध्भुत युद्ध कौशल को देखकर साधुवाद दिया
16:27मेघनाद ने अद्रिश्य होकर अगनिबानों की एक भयंकर वर्षा कर दी जो सीधे वानर सेना की ओर बढ़ रही थी
16:35यह अगनी वर्षा मानों संपूर्ण युद्ध भूमी को भस्म करने के लिए आतुर थी जिससे चारों और लालिमा छा गई
16:44लक्ष्मन ने तुरंट अपने वरोन अस्त्र का संधान किया जिससे प्रकट हुई जलधारा ने उस अगनी वर्षा को पल भर
16:52में शांत कर दिया
16:54जल और अगनी के इस अग्भुत तक्राव से उत्पन हुई भाप और कोहरे ने पूरे रणक्षेत्र को अपनी आगोश में
17:01ले लिया
17:03उस धुन्ध के बीच से मेघनाद ने एक और भयंकर मायावी राक्षस को प्रकट किया जो गरस्ते हुए आगे बढ़ा
17:11कोहरे की चादर और राक्षसी माया का यह घनभोर आवन देखकर ऐसा लगा मानोरात्री समय से पूर्व ही उतर आई
17:20हो
17:21लक्षमन ने अपनी तीवर बुद्धी और अचूक निशाने से उस मायावी राक्षस के अस्त्र को बीच हवा में ही काट
17:28गिराया
17:29दिव्य अस्त्रों के इस भीशन तकराव से उत्पन्न कमपन से ब्रहमांड के लोग तक हिल उठे
17:37मेघनाद अपने अस्त्रों के विफल होने पर अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने अपनी सर्वोच शक्ती का संधान किया
17:44वह शक्तिशाली अस्त्र एक प्रल्यकारी उलकापिंड की भांती धर्ती और आकाश को चीर्ता हुआ आगे बढ़ा
17:54लक्षमन ने पूरी द्रिडता के साथ उस प्रल्यकारी प्रहार का सामना करने के लिए अपने महादिव्य बान का संधान किया
18:03दोनों महादिव्य अस्त्र जब आमने सामने टकराए तो संपूर्ण रणभूमी में एक सूर्य के समान ब्लाइंडिंग प्रकाश फैल गया
18:11उस प्रचंड उर्जा के विस्पोट से मेगनाद का मायावी आवर्ण पूरी तरह छिन्न भिन हो गया
18:19दिव्य अस्त्रों के इस महायुद्ध के शान्त होते ही रणभूमी पर सत्य की विजय का एक नया सूर्योदय हुआ
18:27धुए के उस घने गुबार के बीच से श्री राम ने अपने अनुज लक्षमन की ओर मुड कर एक गंभीर
18:34द्रिष्टी डाली
18:35श्री राम ने अपनी ओजस्वी वानी में लक्षमन को सचेट करते हुए कहा कि यह मायावी राक्षस साधारन शक्तियों का
18:43स्वामी नहीं है
18:46उन्होंने लक्षमन के कंधे पर अपना हाथ रखते हुए उन्हें आदेश दिया कि वे अपनी रक्षा के लिए सन्यम और
18:53सतर्क्ता का कवच धारन करें
18:56युद्ध भूमी के उपर एक गहरा रहस्य में सन्नाटा चागया मानो प्रकृती स्वयें किसी आगामी अनिष्ट की प्रतीक्षा कर रही
19:05हो
19:06श्री राम ने संकेत दिया कि मेगनाद का राक्षस तंत्र केवल बल से नहीं बल की अद्रिश मायावी जाल से
19:13बुना गया है
19:16लक्षमन ने अपने जेश्ट भ्राता की बातों को हृध्यंगम किया और अपनी धनुष की प्रत्यंचा को और अधिक ग्रिड़ता से
19:23थाम लिया
19:25श्री राम की आखों में दैविय ज्यान का तेज था जो माया के उस छद्म आवर्ण को भेदने में सक्षम
19:32था
19:33आकाश में मेघों का रंग धीरे-धीरे गहरा होकर उस राक्षसी तंत्र की उपस्थिती का संकेट देने लगा
19:41श्री राम बोले कि यह संग्राम केवल योध्धाओं के बीच नहीं बलकि सत्य और अधर्म की पराकाश्था का एक महायुद्ध
19:49है
19:51लक्षमन ने अपनी निष्ठा का परिचय देते हुए श्री राम को आश्वस्त किया कि वे किसी भी भ्रम्मे नहीं पड़ेंगे
20:00अचानक रनभूमी की भूमी से एक काली उर्जा उठने लगी जो मेघनाद के मायावी जाल का पुरुद्धार कर रही थी
20:08श्री राम ने अपनी दृष्टी को स्थिर किया मानोवे स्वयंकाल की गती को थामने की शकती रखते हूँ
20:16लक्षमन ने देखा कि कैसे शत्रु का मायावी जाल एक अदृष्य जाल की तरह पूरे क्षेतर को ढख रहा था
20:23श्री राम ने कहा कि शत्रु का सबसे बड़ा अस्त्र उसका विश्वास है कि हम उसकी माया को समच नहीं
20:31पाएंगे
20:33लक्ष्मन ने अपनी एकागरता को चरम पर पहुँचाया और अपनी दिव्यद्रिष्टी का आहवान किया
20:40रणभूमी के कोनों में दबे हुए राक्षस तंत्र के अवशेश अब पुनह जागरित हो उठे थे
20:47श्री राम जानते थे कि मेघनाद का मायावी जाल अंतह उसके पतन का मार्ग भी बनेगा
20:54लक्षमन की धनुष की डोरी से एक सुक्ष्म जंकार उठी मानो शस्त्रस्वयं युद्ध के लिए उतावले हो रहे हो
21:03दोनों भाईयों की उपस्थिती ने युद्ध भूमी की नकारात्मक उर्जा को चुनोती देना आरंभ कर दिया था
21:11श्रीराम ने एक अंतिम चेतावनी भरी द्रिश्टी फेंग की और माया के उस जाल को जड़ से उखाडने का संकल्प
21:19लिया
21:20मेघनाद ने अपने अस्त्र से आकाश की और निशाना साधा और एक ही पल में समूचे अंतरिक्ष को गेहन अंधकार
21:28ने अपने आगोश में ले लिया
21:31लक्षमन और श्रीराम के चारों और फैली दिव्य आभा इस क्रित्रिम अंधकार को भेदने का असफल प्रयास कर रही थी
21:38क्योंकि माया का जाल अत्यधिक शक्तिशाली हो चुका था
21:43मेघनाद अदरिश्य रहकर आकाश मार्ग से अपनी क्रूर अठास गुंजा रहा था जिससे संपूर्ण वानर सेना का धैर्य डग्मगाने लगा
21:53आकाश पर मंदराता हुआ वह काला साया मानो पूरी स्रिष्टी को अपनी भयंकर पकड में जकडने का कुछ से प्रयास
22:00कर रहा था
22:02वानर योध्धाओं के नेत्रों के आगे अंधकार छा गया और उनके हाथों से उनके अस्त्रशस्त्र अचानक काम पने लगे
22:11अंगद ने अपनी गदा को कसकर पकड़ा और उस अद्रिष्य शत्रु की गर्जना का उत्तर देने के लिए हुंकार भरी
22:19मेघनाद की मायावी गूंज ने चारों दिशाओं से ऐसा चक्रव्यू रचा की किसी को भी आगे का मार्ग नहीं सूज
22:26रहा था
22:28लंका के आकाश पर मंदराते काले बादलों से मानो कुरूरता की वर्षा होने लगी थी जो सैनिकों के मनोबल को
22:36कुचल रही थी
22:38सुग्रीव ने अपनी विशाल भुजाओं को फैला कर अपने सैनिकों को एक जुड होने का संकेट दिया ताकि इस भ्रम
22:45को तोड़ा जा सके
22:47लक्षमन ने अपने भालू और वानर सेनाप्तियों को शान्त रहने का निर्देश देते हुए अपने दिव्य धनुष पर संधान किया
22:56अद्रिश मेघनाद ने आसमान में एक और मायावी बान छोड़ा जो बिजली की तरह कड़कते हुए नीचे गिरा
23:04उस अंधकार्मई आंधी ने रणभूमी की हर वस्तु को धुंधला कर दिया जिससे मित्र और शत्रु का भेड मिटने लगा
23:13श्रीराम ने अपनी गहरी और शान्त द्रिश्टी से उस माया के मूल स्रोत को खोजने का प्रयास किया
23:21मेघनाद की गर्जना अब इतनी तीवर हो चुकी थी कि सेना के वीरों के कान के परदे फटने को हो
23:27रहे थे
23:29हनुमान जी ने अपनी विशाल स्वर्ण कांती से उस अंधकार को चुनोती देते हुए अपनी उचाई बढ़ाना आरंभ किया
23:38लंका का वह आकाश जहां कभी देवताओं का आशिरवात बरस्ता था अब पूरी तरह असुरों के काले जादू के अधीन
23:46था
23:47सेना में भगदर मट्ती देख लक्षमन ने अपने बान की टंकार से संपूर्ण वातावर्ण में एक नई उर्जा का संचार
23:55किया
23:57मेघनाद बादलों के बीच से छिपकर हंस रहा था और उसकी हर हंसी एक प्रल्यंकारी संकेट दे रही थी
24:05वानर सेना के नायक अब एक जुट होकर उस अद्रिश्य खत्रे का मुकाबला करने के लिए अपनी पंक्तिया मजबूत कर
24:12चुके थे
24:14श्री राम ने अपने दिव्यास्त्र का आहवान करते हुए उस अंधकार के सामराज्य को एक ही जटके में नेस्तनाबूत करने
24:22का संकल्त लिया
24:24रनभूमी के इस गंभीर संकट के समय विभीशन अपने अग्रज रावन के पुत्र मेघनाद की माया का भेद खोलने के
24:32लिए श्री राम के सम्मुक उपस्थित हुए
24:35विभीशन ने हाथ जोड़कर श्री राम को प्रणाम किया और मेघनाद के उस गुप्ट युद्ध कौशल का रहस्य बताना आरंभ
24:43किया
24:44उन्होंने समझाया कि मेघनाद ने किस प्रकार निकुमला देवी की आराधना करके अद्रिश्य होकर युद्ध करने की अजे शक्ती प्राप्त
24:53की है
24:55मेघनाद बादलों की ओट में छिपकर न केवल अपनी पहचान छुपाता है बलकि अद्रिश्य रहकर घातक अस्त्रों की वर्शा भी
25:03करता है
25:05विभीशन की वानी से यह स्पष्ट हो गया कि साधारन शस्त्रों से उस मायावी योध्धा का वत करना असंभव है
25:14भगवान श्री राम ने पूरी गंभीरता के साथ विभीशन की बातों को सुना और उस अद्रिश्य शत्रों की रणनीती का
25:22गहराई से विशलेशन किया
25:25लक्षमन भी अपने तरकस से एक नया तीर निकालते हुए विभीशन के बताये गए गुप्त रहसियों पर विचार करने लगे
25:34अद्रिश्य शक्तियों से लड़ने के लिए रणनीती का यह फेर युद्ध की दिशा को पूरी तरह बदलने वाला था
25:41विभीशन ने आगे यह भी बताया कि जब तक मेघनाद यग्य कर रहा है तब तक उसे पराजित करना किसी
25:48के लिए भी संभव नहीं है
25:52लंकराज के छोटे भाई का यह सटीक मार्ग गर्शन वानर सेना के लिए एक संजीवनी बूटी के समान सिध्ध हो
25:59रहा था
26:01युद्ध भूमी की इस जटिल परिस्थिती में विभीशन का अनुभव और उनकी निष्ठा दोनों ही अमूल्य साबित हो रहे थे
26:10अंधकार और बादलों के साए में छिपे उस महा मायावी का अंत करने के लिए अब एक अचूक योजना तयार
26:16की जा रही थी
26:19श्रीराम ने विभीशन के इन वचनों को ध्यान में रखते हुए अपनी अगली रणनीती का तानाबाना बुन्ना शुरू कर दिया
26:27मेघनाद की मायावी शक्तियों को मात देने के लिए अब केवल बल नहीं बलकि कुशागर बुद्धी की भी आवश्यक्ता थी
26:36विभीशन ने वानर वीरों को भी सचेत किया कि वे उस अद्रिश शत्रू के प्रहारों से बचने के लिए अपनी
26:43पंक्तियां मजबूत रखें
26:46रणभूमी के उपर मंदराते वे काले बादल अब इस बात की गवाही दे रहे थे कि अगला प्रहार अत्यंत भीशन
26:54होने वाला है
26:56विभीशन के मार्ग दर्शन ने श्री राम और लक्षमन को मेघनाद के छद्म युद्ध का परदाफाश करने का सपष्ट मार्ग
27:03दिखा दिया था
27:05अब यह निश्चित हो चुका था कि उस मायावी योधा को उसकी ही अद्रिश्य दुनिया से बाहर खींचना ही एक
27:12मात्र उपाय है
27:15विभीशन के अंतिम वचनों ने पूरी सेना में एक नया विश्वास और अजे संकल भर दिया था
27:21इस प्रकार विभीशन के सटीक मार्ग दर्शन से सुसजित होकर राम सेना ने उस मायावी युध के लिए अपनी अंतिम
27:30हुंकार भरी
27:31रनभूमी के अंधकार को चीरते हुए मेघनाद ने अपनी आसुरी शक्तियों का आहवान किया और आकाश में भयंकर काले बादलों
27:41का सामराज जिस्थापित कर दिया
27:44दैत्यराज रावन का पुत्र मेघनाद अपनी अद्रिश्य शक्तियों के बल पर रण के बीचों बीच खड़ा होकर महाविनाश की खतरनाक
27:52योजना बुन रहा था
27:53उसके हाथों में चमकता हुआ वह काला नागपाश अस्त्रसाधारन शस्त्र नहीं था बलकि साक्षात मृत्यू का दूसरा रूप था
28:04संपूर्ण वातावर्ण में एक अजीब सी खामोशी छा गई जो आने वाले किसी भीशन और अप्रत्याशित संकट की ओर संकेत
28:12कर रही थी
28:14वानर सेना के खेमे में अचानक बढ़ते हुए इस भीशन तनाव को भामपकर हनुमान जी और अंगत सतर्क हो गए
28:23विभीशन ने अपनी गहरी द्रिष्टी से आकाश की ओर देखा और रामलक्षमन को इस अजे अस्त्र के खत्रे से आगाह
28:31करने का निर्णै लिया
28:33विभीशन ने भगवान श्री राम के चर्णों में नमन करते हुए चेतावनी दी की यह नागपाश समस्त संसार में अप्रतिरोध्य
28:41है
28:43वह भयानक रात्री मानों आने वाले महायुद्ध के विध्वन्स का पूर्वाभास करा रही थी जहां हर एक सास भारी पड़
28:51रही थी
28:52श्री राम ने शांत चित्त से विभीशन की बात सुनी और अपने अनुज लक्षमन की ओर देखकर रणकी नीती पर
29:00विचार किया
29:02भगवान विष्णु के अवतार श्री राम के चहरे पर तनिक भी भय नहीं था बलकि आने वाले धर्मयुद्ध के लिए
29:09अटूट ग्रिड संकल्प था
29:12लक्षमन ने अपनी स्वर्ण सज्जित धनुष की प्रत्यंचा को कस्ते हुए प्रतिग्याकी की वे इस मायाजाल को नेस्तनाबूद कर देंगे
29:21रात्री के गहरे सननाटे में लंका की प्राचीरों से मेघनाद की अटहास गूंड उठी जिसने समस्थ आकाश को थर्थरा दिया
29:29लंका के गुप्ट कक्षों में मेघनाद ने अपनी कुलदेवी निकुमला के समक्ष बैठकर उस महागातक नागपाश को अभिमंत्रित करना आरंब
29:39किया
29:41हवन कुंड से उठती हुई नीली और काली लप्टों के बीच वह नागपाश अस्त्र सर्प की भांती फुफकार रहा था
29:49अस्त्र की प्रचंड उर्जा से मेघनाद का पूरा शरीर और उसके चारों ओर का कक्ष दैविय और आसुरी उर्जा से
29:57कांप उठा
29:59उस रात ब्रहमांड की शक्तियां भी इस आसुरी अनुष्ठान के प्रभाव से आशंकित हो उठीन और समय की गती थमसी
30:07गई
30:08सुभा की पहली किरण के साथ ही युद्ध भूमी एक बार फिर रनभेरी की गडगडाहट से गूझ उठी
30:16मेघनाद अपनी अरिश्य माया का प्रयोग करते हुए आकाश मार्ग से वानर सेना पर कहर बनकर तूट पड़ा
30:23कोई नहीं जानता था कि आने वाले कुछ ही पलों में यह नागपाश किस प्रकार राम सेना की नीम हिलाने
30:31वाला है
30:33अध्याय के अंत में मेघनाद ने उस अत्यंत घातक नागपाश अस्त्र का उप्योग करने की घोशना की जो अगले दिन
30:41के युद्ध में श्री राम और लक्षमन के लिए सबसे बड़ी चुनोती साबित होने वाला है