पद्म पुराण के इस मार्मिक और रहस्यमयी अध्याय में जानिए कि श्रीराम के भव्य राज्याभिषेक और राम-राज्य की स्थापना के तुरंत बाद अयोध्या पर कौन सा नया संकट मंडराने लगा। महर्षि अगस्त्य के गुप्त खुलासे और अयोध्या के गुप्तचरों द्वारा लाई गई उस अप्रत्याशित सूचना का रहस्य, जिसने रघुवंश की नींव हिला दी! #PadmaPurana #Ramayan #SitaExile #RamRajya #AgastyaMuni #HinduMythology
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00:00अयोध्या की पावंधरा पर सूर्योदय के साथ ही रामराज्य का स्वर्णिम युग प्रारंभ हुआ, जहां चारों दिशाओं में दिव्यशान्ती और
00:08सम्रिध्धी का वास है.
00:11देवराज इंद्र के सभाप्ती स्वरूप, स्वय देवों के देव महादेव, कैलाश के शिकरों से नीचे द्रिष्टी डालते हुए इस धर्म
00:19प्रायन राज्य की प्रशंसा कर रही हैं.
00:23प्रभु श्री राम के दर्बार में रिशियों की एक विशाल सभा बैठी है, जहां वेदों के मंत्रों का गुंजन वातावर्ण
00:30को पावन बना रहा है.
00:33रामराज्य की यह अनुपम आभा साक्षात वैकुंट के समान प्रतीत हो रही है, जहां प्रकृती भी प्रभु के चर्णों में
00:40नत्मस्तत है.
00:43अयोध्या की गलियों में कोई अभाव नहीं है, और नहीं कहीं किसी के मन में कोई भय या रोग का
00:49तनिक भी स्थान बचा है.
00:53देवताओं के दूद के रूप में नारग मुनी वीना बजाते हुए, इस स्वर्णिन काल का यशोगान करते हुए अयोध्या के
01:00आकाश मार्ग से गुजर रहे हैं.
01:04राजमहलों की दीवारों पर जड़ित रत्न ऐसे चमक रहे हैं, जैसे स्वयन सूर्य की किर्णे अयोध्या के स्वागत में ठहर
01:11गई हूँ.
01:13प्रभु श्री राम के मुख पर एक शांत मुस्कान है, जो संपूर्ण राज्य के कल्यान का प्रतीक बनकर चारों और
01:20सुख का संचार कर रही है.
01:23प्रजा अपने राजा के प्रती इस प्रकार श्रधा रखती है, जैसे भक्त अपने आराध्य के चर्णों में अपना सर्वस्व अर्पित
01:31कर देता है.
01:33स्वर्ग के देवता विमानों पर सवार होकर इस आदर्ष सामराज्य को देखने के लिए अयोध्या के उपर मंडरा रहे हैं.
01:43पवित्र सर्यू नदी का जल इस काल में मानों अमरित की धारा बनकर अयोध्या को सदैव के लिए अमर्ता का
01:49वर्दान दे रहा है.
01:52माता सीता जो स्वयन साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप हैं, राजमहल की शोभा बढ़ाते हुए संपून अयोध्या को वात्सल्य और प्रेम
02:01से सीच रही है.
02:04प्रकृती का हर जीव, यहां तक की पशुपक्षी भी रामराज्य की मर्यादा से बंध कर एक दूसरे के मित्र बन
02:11गए हैं.
02:13हनुमान जी, जो भक्ती का जीवन्त उदाहरण हैं, प्रभु के चर्णों के निकट मस्तक जुकाएं उनकी आज्या की प्रतीक्षा में
02:21बैठे हैं.
02:23आकाश से फूलों की वर्षा हो रही है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है, जैसे प्रकृती भी राजाराम के राज्याभिशेक का
02:31उच्सव मना रही है.
02:34धर्म के चार स्तंभ सत्यक दया, तप और दान इस युग में अपनी पूर्ण शक्ती के साथ स्थापित हो गए
02:41हैं.
02:43नगर के प्रत्येक घर के द्वार पर दीप जल रहे हैं, मानो स्वयन लक्ष्मी ने यहां सदा के लिए वास
02:50करने का संकल्प ले लिया हो.
02:52रिशी वशिष्ट प्रभु श्री राम को राजधर्म की पुनह प्रेना देते हुए, आने वाली पीधियों के लिए एक आदर्श स्थापित
03:00कर रहे हैं.
03:02यह युग केवल समय का चक्र नहीं, बलकी मानवता के लिए एक स्वर्णिन प्रकाश स्तंभ है, जो युगों-युगों तक
03:10स्मरण रहेगा.
03:12अयोध्या के इस वैभव में छुपी है वह दिव्य उर्जा, जो ब्रहमांड के संतुलन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य
03:19है.
03:21राजसभा के द्वार पर महर्शी अगस्त्य का आगमन हुआ, जिनके तपोबल से संपून अयोध्या का वातावर्ण दिव्य आभा से आलोकित
03:30होग उठा.
03:31प्रभु श्री राम ने साश्टान प्रणाम करते हुए महर्शी अगस्त्य का स्वागत किया और उनसे संसार के उस गहरे रहस्य
03:39को जानने की प्रार्थना की जिसे काल की धूल ने ढख रखा था.
03:44महर्शी अगस्त्य ने अपनी योग द्रिष्टी से अतीत के पन्नों को पल्टा और रावण के जन्म के उस अंधकार में
03:52अध्याय का वर्णन करना आरंभ किया.
03:55रावण और कुम्भकर्ण की उत्पत्ती रिशी पुलस्त्य के वंश में हुई थी, जहां पित्रिश्राप की छाया ने ही राक्षसी कुल
04:03के निर्मान का आधार तयार किया.
04:06महर्शी ने बताया कि किस प्रकार ब्रहमाजी की आग्या का उलंधन करके उन असुरों ने अपनी शक्ती का दुरुप्योग करना
04:14प्रारंभ कर दिया था.
04:16अग्नी और तामस की उस उर्जा से रावन का व्यक्तित्व निर्मित हुआ, जिसका लक्षे केवल संपूर्ण ब्रहमांड पर अपना अधिपत्य
04:25स्थापित करना था.
04:27कुम्भकर्ण की निद्रा के पीछे भी उस श्राप की एक ऐसी विडम बना थी, जिसे सुनकर सभा के सभी ज्यानी
04:34जन्स तब्ध रह गए.
04:36इतिहास की उन पर्तों से निकलती भयावह स्मृतिया अयोध्या के उस शांत वातावर्ण में एक रहस्य में कमपन पैदा कर
04:44रही थी.
04:46महर्शी अगस्त्य ने रावन की उन कठोर तपस्याओं का उल्लेख किया, जिनके द्वारा उसने देवताओं को भी अपने अधीन करने
04:54का दुस्साहस किया था.
04:57रावन की भुजाओं में वो अदमय बल्था जिसे पाकर वह स्वय को स्रिष्टी का एक मात्र अधिपती समझने का अहंकार
05:04पाल बैठा था.
05:06वह अहंकार ही रावन के विनाश का मुख्य बीज बना, जिसे उसने अपनी तपस्या की अगनी से नहीं, बल्कि अधर्म
05:14से सीचा था.
05:16सभा में सन्नाटा पसर गया, जब महर्शी ने बताया की कैसे देवताओं का भय ही रावन के लिए एक अनपेक्षित
05:24वर्दान में परिवर्तित हो गया.
05:27अयोध्या के खंभों में गूंजती महर्शी की वानी उन पौरानिक सत्यों को उजागर कर रही थी, जिन्हें अब तक केवल
05:34समय के गर्भ में ही सुरक्षित रखा गया था.
05:38भगवान श्री राम ने महर्शी के मुख से इन रहसियों को सुनकर अधर्म के विरुद्ध संधर्ष की उस जटिलता को
05:45गहराई से अनुभव किया.
05:48प्रत्येक शब्द जो महर्शी के उष्ठों से निकल रहा था, वह रावण के पाताल जैसी गहराईयों से उपजे उस दानविय
05:55कुल के इतिहास को जीवन्त कर रहा था.
05:59ब्रहमांड के संतुलन का चक्र रावण के अस्तित्व से ही किस प्रकार प्रभावित था, यह बात अब अयोध्या की राजसभा
06:07में साफ परिलक्षित हो रही थी.
06:10महर्शी अगस्त्य का व्यक्तित्व उस हिमालय के समान अडिक था, जो समय के प्रवाह में भी सत्य की जोत को
06:17बुझने नहीं देता था.
06:19श्री राम के मन में अब यह स्पष्ट था कि रावण का विनाश केवल एक युद्ध नहीं, बलकि धर्म की
06:26पुनर्स्थापना का एक अप्रिहार्य चरण था.
06:30महर्शी ने अपने उपदेश को विराम देते हुए भविष्य के उन संकेतों की ओर इशारा किया जो काल की सीमा
06:37से परे थे.
06:39राजसभा का वैभव अब उस गेहन चिंतन में डूब चुका था, जहां अयोध्या का भविष्य अब धर्म के निर्नायक युद्ध
06:47की ओर एक कदम और बढ़ गया था.
06:50महर्शी अगस्त्य ने सभा में एक भारी सन्नाटे के बीच मेघनाद की उस रहस्य में शक्ती का वर्णन आरंभ किया
06:58जिसे देवताओं ने भी कभी नहीं देखा था.
07:00वे बताने लगे की कैसे मेघनाद ने ब्रहमाजी की कठोर तपस्या करके अपनी इंद्रियों को वश्मे किया और अद्रिश होने
07:10का दुरलभ वर्दान प्राप्त कर लिया था.
07:13मेघनाद के तपस्या स्थल पर एक अद्रिश उर्जा का कवच बन गया था, जिसे भेदना स्वयंकाल के लिए भी एक
07:21असंभव चुनौती थी.
07:23आकाश के तारे भी उस भीशन तपस्या के साक्षी थे, जिसने संपून ब्रह्माण के संतुलन को एक क्षण के लिए
07:31थाम दिया था.
07:33महर्शी ने आगे कहा कि महादेव ने स्वयं उसे अस्त्रशस्त्रों का ऐसा ज्यान दिया था जो किसी भी साधारण योध्धा
07:41की पहुँच से कोसों दूर था.
07:43शिव के आशिर्वाद से मेघनाद न केवल बलशाली बना, बलकि उसका अहमकार भी उस कैलाश की उचाईयों को छूने लगा.
07:53इंद्रजीत का वह कवच उसके अहमकार और अटूट संकल्प से निर्मित था, जिसे तोडने के लिए साधारण मनुष्य का साहस
08:01भी विफल हो जाता.
08:03ब्रहमांड की शक्तियां अब उस भीशन भविश्य की प्रतीक्षा कर रही थी, जहां एक साधारण मानव की तपस्या उस मायावी
08:11कवच को चकनाचूर करने वाली थी.
08:15अगस्त्य मुनी की वानी में तब एक नई गमभीरता आ गई, जब उन्होंने लक्षमन के उस 14 वर्षों के अखंड
08:22ब्रहमचर्य का उल्लेख किया.
08:25उन्होंने समझाया की कैसे बिना सोय, बिना थके केवल कर्तव्य पालन की अगनी में जलते हुए लक्षमन ने स्वयन को
08:32एक अजे अस्त्र बना लिया था.
08:36लक्षमन की वह निदराहीन अवस्था वास्तव में एक ऐसा सूक्ष्म अनुशासन था जिसने धर्म की रक्षा के लिए स्वयन को
08:43काल के हवाले कर दिया था.
08:46अयोध्या की राजसभा में मौजूध हर एक व्यक्ति स्थब्ध था क्योंकि वे समझ रहे थे कि मेघनाद का विनाश किसी
08:54बान से नहीं बलकी एक दिव्यतप से संभव था.
08:58महर्शी ने रेखांकित किया कि मेघनाद का वह अभेद्य कवच तभी तूट सकता था जब सामने वाला योध्धा स्वयन इंद्रियों
09:07का पूर्ण स्वामी हो.
09:09लक्षमन का चौदह वर्ष का वह मौन और सन्यम ही मेघनाद की मायावी शक्तियों के विरुद्ध एक मात्र ब्रहमास्त्र सिध्ध
09:17होने वाला था.
09:19आमकार के उस अटहास को शान्त करने के लिए नेती ने एक ऐसे नायक को चुना था जिसका मन किसी
09:25स्थिर जलाशय की भाती शान्त था.
09:29कैलाश के वह शिखर आज भी उस संकल्प के गवाह हैं जिसने मानवता के अस्तित्व को उस काल के अंधकार
09:36से बचाया था.
09:38महर्शी अगस्त्य का उपदेश समाप्थ होते ही अयोध्या का वातावर्ण पुन एक अलोकिक उर्जा से भर गया, जैसे स्वयं प्रभु
09:46ने उस सत्य पर मुहर लगा दी हो.
09:50राजसभा में बैठे सभी योध्धा अब उस धर्म युद्ध की भीशनता को समझ रहे थे, जो भविश्य के गर्भ में
09:57छिपा हुआ था.
09:59मेघनाद की वह अजेता अब केवल एक मिथक लगने लगी थी, जिसके सामने धर्म और सन्यम का प्रकाश आने ही
10:07वाला था.
10:09अयोध्या की गलियों में फिर से शंकनाद हुआ, मानो सम्पूर्ण जगत उस अंतिम और निर्नायक महायुध की घोशना कर रहा
10:16हो.
10:18राज्या भिशेक के भव्य आयोजन के उपरांत अयोध्या के राजप्रासाद में एक भावुक सन्नाटा पसर गया, जहां अब विदाई की
10:26वेला निकट आ गई थी.
10:29प्रभु श्री राम ने अपने सनेही मित्र सुग्रीव का हाथ थामते हुए उनके अतुल्य सहयोग के लिए कृतग्यता व्यक्त की
10:36और उनकी आखों में कृतग्यता के अश्रु झलक उठे.
10:41सुग्रीव ने भाव विभोर होकर अपने राजा के चर्णों में मस्तक जुकाया और अपनी भक्ती का अनन्य प्रमान दिया, मानो
10:49सारा किश्किंधा उनकी सेवा में नत्मस्तक हो.
10:54राजमहल की दीवारों पर टंगी वे रत्नजडित मशाले मानो रामराज्य के उस पहले दिन के साक्षी बनकर इस विदाई का
11:01मौन क्रंदन सुन रही थी.
11:04प्रभु ने विभीशन को गले लगाते हुए उन्हें लंका के धर्म प्रायन शासन का मार्ग प्रशस्त करने का आशिरवाद दिया,
11:11जिससे विभीशन का हृदय संतोष से भर गया.
11:16विभीशन ने गदगद स्वर में कहा कि प्रभु का स्मरण ही उनके राज्य का वास्तविक सुरक्षा कवच है, जिससे लंका
11:23की रक्षा स्वतह ही हो जाएगी.
11:26वयोवरिध जामवंत जी ने जब प्रभु को प्रणाम किया, तो उनके मुख पर उस प्राचीन अनुभव की जलक थी, जिसने
11:34प्रभु के साथ कई युग देखे थे.
11:37प्रभु ने जामवंत के मस्तक को स्पर्ष कर उन्हें युगों तक जीवित रहने और ज्ञान का प्रकाश फैलाने का वर्दान
11:44दिया, जिसे सुनकर सभा निशब्ध हो गई.
11:48अयोध्या की सीमाओं पर खड़े उन वानर सेनाप्तियों की विशाल वाहिनी अब प्रभु के आदेश की प्रतीक्षा में समुद्र सी
11:55शांत दिखाई पड़ रही थी.
11:58प्रभु श्री राम ने स्वयं अपने हाथों से उन्हें बहुमूल्य रत्न और दिव्य वस्त्र भेंट किये, जो उनके अटूट प्रेम
12:06का प्रतीक थे.
12:08हनुमान जी की आखें इस विदाई के द्रिश्य को देखकर जल्मग्न हो गई, किन्तु वे प्रभु के चर्णों से दूर
12:15जाने के विचार मात्र से काम उठे.
12:19स्वयं प्रभु ने हनुमान की ओर देखते हुए मुस्कुरा कर उन्हें आलिंगन बद्ध किया, जिससे राजसभा में दिव्य आनंद की
12:27लहर दौड गई.
12:29हनुमान ने विनमरता पूर्वक निवेदन किया, कि उन्हें राज्य या धन की नहीं, केवल प्रभु के चर्णों में सदैव रहने
12:36के स्थान की आवश्चक्ता है.
12:39प्रभु ने उनकी भक्ती को स्वीकार करते हुए, उन्हें सदैव अपने हृदय में विराजने का वर्दान दिया, जिससे सुनकर देवताभी
12:48पुष्प वर्षा करने लगे.
12:50एक एक कर सभी सहियोगी अपने अपने राज्यों की ओर प्रस्थान करने लगे, जिससे अयोध्या की गलियों में विदाई का
12:58एक शांत शोर व्याप्थ हो गया.
13:01भरत और शत्रुघन ने उन सभी अतिथियों को विदा करते समय स्वयं को प्रभु की सेवाकारिनी अनुभव किया, जो एक
13:09गौर्वपूर्ण क्षन था.
13:11सूर्य की अंतिम किरने जब महल के स्वर्ण शिकरों पर पड़ी, तो वे ऐसा प्रतीत हुई मानो स्वया आकाश प्रभु
13:19के इस उदार स्वभाव को नमन कर रहा हो.
13:22प्रभु के कक्ष में अब केवल सन्नाटा और वे दिव्यरत्न शेश थे, जो आने वाले स्वर्ण युग की साक्षे देने
13:30के लिए बहार रखे हुए थे.
13:33हनुमान जी चुपचाप द्वार के बाहर पहरादे रहे थे, जैसे वे उस रामराज्य की सुरक्षा के अंतिन दुर्ग के समान
13:40अटल खड़े हुँ.
13:43विदाई का यह अध्याय अब समाप्थ हुआ, किन्तु अयोध्या के आकाश में उन योध्धाओं के बलिदान की गूंज आज भी
13:50इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में अंकित है.
13:54राम के राज्याभिशेक के उपरांत, अयोध्या के विशाल राजदर्बार में सन्नाटे को चीरते हुए एक गंभीर सभा का आयोजन किया
14:03गया है, जहां स्वया रगुकुल शिरों में श्री राम भविश्य की चुनोतियों पर विचार कर रहे हैं.
14:10श्री राम ने अपने प्रमुख गुप्तचर भद्र को सभा में आमंत्रित कर राजधर्म की एक ऐसी कसोटी पर परखने का
14:18आदेश दिया, जो केवल प्रजा के हरदय की सच्चाई को सुन सके.
14:23भद्रा ने अपने गुप्तचरों के जाल को संपूर्ण कोसल सामराज्य में फैला दिया, ताकि वे गलियों और बाजारों की उन्दबी
14:31हुई आवाजों को ढूंड सकें जो राजा तक नहीं पहुँच पाती.
14:36अयोध्या के आकाश में, जहां कल तक उत्सव की चकाचौंध थी, अब भद्रा के दूतों की रहस्य में छायाए सादेवस्त्रों
14:44में सांध्यकाल की ओट में विलीन हो रही हैं.
14:48प्रभु श्री राम ने एकांत में विचार करते हुए भद्र को निर्देश दिया कि राजा का कान केवल स्तुती नहीं,
14:56बल्कि उस अंतिन व्यक्ती की वेदना का साक्षी भी होना चाहिए.
15:01दर्बार की दीवारों के पीछे भद्रा अपने उन कुशल जासूसों को गुप्त मंत्रना दे रहा है, जिन्हें भेश बदल कर
15:09नगर के हर चौरा है और बस्ती में तैनात होना है.
15:14गुप्तचरों के कदम अब अयोध्या की उन संकरी गलियों में अनसुनी आहट के साथ बढ़ रहे हैं, जहां जनसाधारन के
15:21बीच रामराज्य के प्रती छिपी हुई जिग्यासाय पनप रही हैं.
15:26सत्य का यह अनवेशन केवल एक कर्तव्य नहीं, बलकि प्रभू श्री राम की उस राजसी निष्ठा का प्रमाण है, जिसके
15:34लिए वे स्वयं को अगने प्रीक्षा में जोकने को सदा तक पर रहते हैं.
15:40नगर के मुख्यद्वार पर एक गुप्तचर एक बूढ़े व्यापारी का स्वांध रचकर उन लोगों के निकट खड़ा हो गया है,
15:48जो दिन भर की चर्चाओं में लीन हैं.
15:52राम ने अपने कक्ष की खिड़की से उन दूर जाते हुए गुप्तचरों को देखते हुए मन ही मन प्रार्थनाकी की
15:58सत्य चाहे कितना भी कड़वा क्यों न हो वह उन तक अवश्य पहुँचे.
16:04कोसल की सीमाओं पर भी भद्रा के तंत्र ने अपने गुप्त जाल बिछा दिये हैं, जहां हर आने जाने वाले
16:11पथिक की बातों से अयोध्या के जन्मानस का आकलन किया जा रहा है.
16:16अयोध्या की शान्त हवाओं में अब धीरे धीरे उन शब्दों की प्रतिध्वनी बढ़ने लगी है, जो नगर के किसी कोने
16:23में किसी अंजाने भई या शंका को जन्म दे रहे हैं.
16:28भदरा ने लौट कर राम को सूचित किया कि अयोध्या का हरिदय अब उन छोटी-छोटी बातों को बुनने लगा
16:35है, जिन्हें अंदेखा करना राजधर्म के लिए उचित नहीं होगा.
16:40राम के चहरे पर एक शांत गंभीर्ता का भाव है, जैसे वे जानते हैं कि राज्या भिशेक के उत्सव के
16:48बाद अब आने वाला समय केवल स्वर्ण युग का ही नहीं, बलकि एक कठिन अगनिप्रीक्षा का भी है.
16:56गुप्तचरों द्वारा लाई गई उन शुरुवाती सूचनाओं का विशलेशन करते हुए, भदरा ने एक गुप्त पत्र राजा के चर्णों में
17:03समर्पित किया जिसमें नगर का अनकहा सक्छिपा था.
17:08अयोध्या के गलियारों में अब वह खौफनाक का नाफूसी एक बवंडर का रूप लेने लगी है, जिसकी गुंज राजा के
17:15कानों तक पहुँचते ही न्याय की तराजू को विचलित कर सकती है.
17:20राम ने शांत स्वर में भद्रा को आदेश दिया कि जो भी सत्य सामने आए, उसे बिना किसी संकोच या
17:27भय के राजदर्बार के पटल पर रखा जाएं.
17:31अयोध्या की प्रजा का यह अंजाना संशय अब एक ऐसे मोर पर पहुँच गया है, जहां से श्री राम को
17:38अपने व्यक्तिगत सुख और राजा के कर्तवियों के बीच चुनाव करना होगा.
17:44भद्रा वापस नगर के भीतर उन अंधेरे रास्तों की ओर प्रस्थान कर गया, जहां आज रात एक ऐसी सच्चाई का
17:51परदाफाश होने वाला है, जो रामराज्य की नीम को जखजोर देगी.
17:57अयोध्या का आकाश अब उस आने वाली अगनिप्रीक्षा की आहट से एक रहस्य में नीले रंग में डूग गया है,
18:04मानो प्रकृती भी राजा के उस कठिन निर्णय की प्रतीक्षा कर रही हो.
18:10सर्यू नदी के तटपर धुंधलके में लिप्टी ठंडी हवाएं आज एक ऐसी कड़वाहट लेकर आई हैं, जो अयोध्या की मर्यादा
18:18पर सवाल उठाने को तटपर है.
18:22भदरा अपनी छिपने की जगह से एक धोबी और उसकी क्रोधी पत्नी के बीच हो रहे हिंसक तर्क को सुनकर
18:29स्थब्ध रह गया है.
18:32धोबी के मुख से निकले विशैले शब्ध हवा में किसी जहरीली गैस की तरहा फैल गए हैं, जो सीता माता
18:39की पवित्रता पर सीधा प्रहार कर रहे हैं.
18:43अयोध्या की पावन माटी पर उस धोबी का चिल्लाना ऐसा लग रहा है, मानो राजमहल की शांती को किसी ने
18:50कुलहाडी से काट दिया हो.
18:53भद्रा कापते हुए हाथों से पेडों की ओट में दुबक गया है, उसे समच नहीं आ रहा कि वह अपने
19:00कानों पर विश्वास करे या अपने भाग्य पर.
19:03भग्वान शिव अपनी कैलाश की एकांध समाधी में इस विशैले समवाद की गूंच को अपनी तीसरी आख की दिव्यता से
19:11महसूस कर रहे हैं.
19:14धोबी की पतनी क्रोध से थर्थराते हुए, अपने पती के शब्दों का समर्थन करते हुए समाज के खोखले तरकों को
19:22दोहराने लगी है.
19:24रात का सन्नाटा उस धोबी की आवाज से फट रहा है, जो अज्यानता के अंधकार में सत्य के सूर्य को
19:32ग्रहन लगाने की कोशिश कर रहा है.
19:35भदरा का हृदय यह सोच कर देहल गया है कि यदि यह कानाफूसी राजमहल की देहलीज तक पहुँची, तो क्या
19:43होगा?
19:44गरुर देव अपने स्वामी के संकेत पर इस अनर्थ को दूर से ही अपनी पैनी द्रिष्टी से निहार रहे हैं,
19:51उनके पंखों की फड़फडाहट भी आज थम गई है.
19:56धोबी की अभधर टिपणिया अब किसी जंगल की आग की तरह फैलने की ओर अग्रसर हैं, जो रामराज्यके स्वर्णिम अध्याय
20:04को राख करने की क्षमता रखती हैं.
20:08प्रकृती के तत्व भी आज उस धोबी के कृत्यों से विचलित हैं, मानो सर्यू की धाराएं भी उस विशैले प्रलाप
20:15को सुनने से इनकार कर रही हों.
20:19भद्रा अपनी सुधबुध खोकर वहां से भागने की सोच रहा है, परंतु उसके पैर उस भारी सत्य के बोच से
20:26जैसे जमीन में धंस गए हैं.
20:30भगवान विश्नु का दिव्य प्रकाश उस स्थान पर उतरने को आतुर है, लेकिन वे नेती के चक्र को बदलने की
20:37जल्दी में नहीं हैं.
20:40धोबी की पत्नी अब और अधिक जोर से चिल्ला रही है, उसकी आवास का प्रतिध्वनी पूरे नदी तट को अपनी
20:47चपेट में ले चुकी है.
20:50अयोध्या की पावन वायू में उस धोबी के शब्दों का विश्ध धीरे धीरे घुल रहा है, जो आने वाले समय
20:56के भयंकर तूफान का संकेथ है.
21:00भद्रा अब पीछे मुरकर नगर की ओर भागने का प्रयास कर रहा है, उसके मन में केवर रामराज्य के विनाश
21:07का डर समाया हुआ है.
21:10ब्रहमा जी स्रिष्टी के रचिता के रूप में अपनी ध्यान मुद्रा में हैं, वे जानते हैं कि यह अगनिप्रीक्षा सीता
21:18माता की महानता को और अधिक प्रकाशित करेगी.
21:22नदी के किनारे खड़ा वह धोबी अभी भी अपने संशय को चिल्ला कर व्यक्त कर रहा है, जो समाज के
21:29एक बड़े वर्ग की दबी हुई सोच को बया कर रहा है.
21:34अयोध्या के उपर मंडराता वह रहस्य में नीला आकाश, अब उस महान निर्णय की प्रतीक्षा में और अधिक गहरा और
21:41शांत होता जा रहा है.
21:44अर्धरात्री के सन्नाटे में अयोध्या का राजमहल एक अद्रिश्य चिंता के भार से दबा हुआ प्रतीत होता है, जहां मशालों
21:52की लौभी कांप रही है.
21:55गुप्तचर भद्र, पसीने से तर्बतर और कापती आवाज के साथ प्रभु श्रीराम के निजी कक्ष के द्वार पर खड़ा होकर
22:03भीतर प्रवेश की अनुमती मांगता है.
22:07श्रीराम ने अपनी लेखनी थाम ली है और भद्र को भीतर बुलाते हुए, उसकी आखों में छिपे उस भय को
22:14भांप लिया है, जो अयोध्या की नीम भिला सकता है.
22:19कक्ष की दीवारों पर जल रही दीपकों की पंक्तिया उस सन्नाटे को और गहरा करती हैं, जैसे वे स्वयन किसी
22:26अनिष्ट की सूचना दे रही हुँ.
22:29भद्र ने लडखडाते शब्दों में यह स्विकार किया कि नगर के चौक चौराहों पर सीता माता के चरित्र को लेकर
22:37कानाफूसी का बवंडर उठ चुका है.
22:40प्रभु श्री राम के चहरे पर सन्नाटा चा जाता है, मानो उन्होंने उस कानाफूसी की कड़वाहट को एक जलते हुए
22:48अंगारे की तरह अपने भीतर महसूस किया हो.
22:52भद्र ने आगे बढ़कर बताया कि कैसे लंका से लोटने के बाद समाज का एक छोटा हिस्सा उस अगनिप्रीक्षा को
23:00परियाप्त प्रमान नहीं मान रहा है.
23:03महल के प्रांगण में खड़ा हुआ पहरेदार भी इस गेहन समवाद की गंभीरता को भांपकर अपनी द्रिष्टी नीचे जुका लेता
23:11है, मानो उसे भी इस तूफान का आभास हो गया हो.
23:16विस्त्रत अयोध्या नगरी जो कल तक उत्सव में डूबी थी, आज एक गहरे सन्नाटे के आगोश में है, जहां हर
23:24गली में एक अनकहा प्रशन तैर रहा है.
23:28श्रीराम की चुप्पी इतनी भारी है कि मानो स्वयंकाल भी अपनी गती धीनी कर चुका हो और महल का हर
23:35कोना उस सत्य का साक्षी बन रहा है.
23:39भद्र कापते हाथों से एक गुप्प संदेश का ताडपत्र मेज पर रखता है, जिसे पढ़ते ही एक राजा की नहीं,
23:46एक पती की आत्मा छटपटा उठती है.
23:51महल की नकाशिदार खंभों के बीच से आती हुई हवा का शोर अयोध्या में पनप्रहे उस नैतिक संकट के बवंडर
23:58का एक शोर सा प्रतीत होता है.
24:02भदर के जाने के बाद श्रीराम उठकर खिडकी के पास जाते हैं, जहां से अयोध्या की वह नगरी दिखाई दे
24:09रही है, जिसे उन्होंने अपना सर्वस्व दिया है.
24:14प्रभु का मुखमंडल उस निर्नय के भार से स्थिर है, जो राजधर्म और व्यक्तिगत स्नेह के बीच के उस पतले
24:21अंतर को परिभाशित करने वाला है.
24:25क्या एक राजा की मर्यादा की रक्षा का अर्थ अपने स्वयें के सुखों का बलिदान देना है, यह प्रश्न हवा
24:32में एक गूंच की तरह तैर रहा है.
24:36अयोध्या के आकाश में बादलों का एक पुंच चंद्रमा को ढखने का प्रयास कर रहा है, जैसे की आने वाले
24:42समय का वह अंधकार नगर पर छाने वाला हो.
24:46श्री राम धीरे से मुरते हैं और अपने कक्ष की उन वस्तूओं को देखते हैं, जिन्हें माता सीता ने बड़े
24:53प्यार से सजाया था, आज वे सब एक मौन प्रश्न बन गई हैं.
24:59महल का वह गलियारा जहां कल तक मधुर मुस्कुराहटें गूंजती थी, आज वहां भदर के कदमों की आहट भी एक
25:06शोर की तरह चुभ रही है.
25:10धर्म के मार्ग पर चलने की कीमत कितनी भारी होती है, यहां आज श्री राम की आखों की उस नमी
25:16में स्पष्ट दिखाई दे रहा है, जो केवल स्वयं को दिखाई दे रही है.
25:22अयोध्या के इतिहास के पन्नों में वह रात अंकित हो गई, जिसने प्रभु श्री राम को एक राजा और एक
25:29पुरुष के रूप में सबसे कठिन परीक्षा के द्वार पर लाख़डा किया.
25:34अयोध्या के राजमहल की उची प्राचीरें आज मानों खामोशी के बोज से दबकर दरक रही हैं, जहां दूरक्षितिच पर फैली
25:43रात्रिकालीन कालिमा प्रभु श्री राम की व्याकुलता की साक्षी बन रही है.
25:48श्री राम अपने कक्ष की विशाल खिड़की के निकट खड़े हैं, जहां उनकी शांत नीलिमा वाली त्वचा पर चंद्रमा की
25:56किरने एक अंथीन द्वंद्व का आभास करा रही है.
26:01प्रभु के हाथों में एक प्राचीन हस्तलिपी है, जिसके अक्षर धर्म के उनकठोर नियमों की ओर संकेत कर रहे हैं,
26:09जो एक राजा के हृदय को पत्थर बनाने की मांग करते हैं.
26:14कक्ष की दीवारों पर जलती हुई मशाले का आप रही हैं, जैसे वे स्वयें इस महान धर्म संकट की अगनी
26:21को अपने भीतर समाहित करने का प्रयास कर रही हूँ.
26:25महल का वह विशाल गलियारा, जो कल तक मंगल गान से गूंजता था, आज एक श्मशान जैसी निरवता को अपनी
26:33बाहों में समेटे हुए हैं.
26:36प्रभु के मन में गूंज रहे हैं उन नागरिकों के शब्द, जिन्होंने राजसी मर्यादा पर प्रश्न उठा कर उनके विवेक
26:43को एक चौराहे पर लाख़डा किया है.
26:47वे अपनी दिव्यद रिष्टी से भविष्य की उनकाली परचाईयों को देख पा रहे हैं, जो धर्म के संतुलन को बनाए
26:55रखने के लिए किसी बड़े बलिदान की मांग कर रही हैं.
26:59स्वर्ण का मुकुट जो सिनहासन की शोभा बढ़ाता है, आज प्रभु को एक भारी बोच के समान प्रतीत हो रहा
27:07है, जिसका हर कोना उनके मस्तक पर चुब रहा है.
27:12अयोध्या की सीमाओं के बाहर बहती सर्यू नदी भी आज अपनी गती को रोक कर इस राजसी व्याकुलता का मौन
27:19गान सुन रही है.
27:21प्रभु श्री राम के वक्षस्थल पर विराजमान वह दिव्य माला भी मानों उनके धड़कते हृदय के साथ मिलकर धर्म और
27:29प्रेम की इस युद्ध भेरी को महसूस कर रही है.
27:33उनके अंतर्मन में माता सीता का वह निर्दोष चहरा बार-बार उभर रहा है, जो अभी नई कोपलों की भाती
27:41को मल और वातसल्य की छाया में सुरक्षित है.
27:45एक राजा के रूप में उन्हें प्रजा का कल्यान सर्वोप्री है, परन्तु एक पुरुष के रूप में उनका प्रेम उस
27:52मर्यादा के आगे समर्पन करने की विवश्टा से जूज रहा है.
27:57महल की छटों पर बैठे हुए पक्षी भी इस भारी वातावर्ण में अपने घोंसलों में दुबक गए हैं, जैसे वे
28:04प्रभु की इस पीडा को महसूस कर रहे हूं.
28:08धर्मराज के कंधों पर लदा हुआ उत्तरदायत्व इतना विक्राल है कि उसके सामने नक्षत्र भी अपना मार्ग भटकते हुए प्रतीत
28:17हो रहे हैं.
28:19प्रभु श्री राम के हाथ की उंगलिया खिलकी की नकाशी पर थिरक रही हैं, जैसे वे नेती के उन सूत्रों
28:26को सुलजाने का प्रयत्न कर रहे हों, जिन्हें कोई और नहीं देख सकता.
28:32रात्री के अंतिन प्रहर में वह दीपक भी बुझने को है, जो प्रभु के इस एकांत का एक मात्र साथी
28:39बनकर उनके साथ जाग रहा था.
28:42अयोध्या की सीमाओं के परे कालचक्र का पहिया घूम रहा है, जो श्री राम को एक ऐसे निर्नय की ओर
28:49ले जा रहा है, जो युगो लुगो तक चर्चा का विश्य रहेगा.
28:54प्रभु श्री राम ने अपने आखें बंद कर ली हैं, और उनका संपूर्ण ध्यान उस परम सत्य पर केंद्रित है,
29:01जो उनके धर्म और अस्तित्व का आधार है.
29:05उनके चहरे पर उस कठोर निर्नय की लकीरें उभर आई हैं, जो अयोध्या के भविश्य को सदा के लिए बदल
29:12देने वाला एक अटल सत्य बनने जा रहा है.
29:17अयोध्या की उस खौफनाक कानाफूसी का उत्तर देने का समया गया है, और प्रभु श्री राम का अंतर्मन अब धर्म
29:24के उस कठिन मार्क पर चलने के लिए पूर्णत्य तैयार है.
29:30ब्रहमा मुहूर्थ की पहली किरण के फूटने से पूर्व ही, राम ने अपने कक्ष के द्वार को एक रहस्य में
29:36सन्नाटे के हवाले कर दिया है.
29:40ध्राता लक्षमन, भरत और शत्रुगन को गुप्ट संकेट मिलते ही वे स्तब्ध और चिंतित होकर एक एक कर उसकक्ष में
29:47प्रविष्ठ हुए.
29:49श्री राम ने अपनी द्रिष्टी को नीचे जुकाते हुए उन पर एक गहरी पीडा भरी नजर डाली, जो किसी आने
29:56वाले प्रलय का संकेट दे रही थी.
30:00कमरे की दीवारों पर जलती हुई मशालों की लौ काम्पने लगी, मानों वे भी इस भारी संनाटे को सहन करने
30:07में असमर्थ थी.
30:09राम के मुख से निकला पहला शब्द इतना भारी था कि जैसे अयोध्या की आधारशिला तक हिल गई हो.
30:17उन्होंने कापती हुई आवाज में प्रजा के उस कलुषित संदेह का विवर्ण दिया, जो सीता माता की पवित्रता पर प्रहार
30:25कर रहा था.
30:27लक्षमन की आखों से क्रोध की ज्वाला फूट पड़ी और उन्होंने तुरंट अपने धनुष पर हाथ रख कर इस अपमान
30:34का प्रतिशोध लेने का संकल्प किया.
30:37तभी एक दिव्य ओज के साथ राम ने लक्षमन का हाथ थाम लिया, जिससे कक्ष में उत्पन्न उत्तेजना तुरंट शांत
30:45हो गई.
30:47भरत ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपनी बात रखते हुए कहा कि क्या एक राजा का कर्तव्य अपनी धर्म पत्नी के
30:54प्रतित्याग से बड़ा हो गया है.
30:57शत्रुग्न मौन खड़े होकर अपने भाईयों के मुख पर उभरती वेधना को देख रहे थे, मानों वे नेती के क्रूर
31:05खेल को समझ रहे हुँ.
31:07राम ने कहा कि राज धर्म व्यक्तिगत सुखों का नहीं, बलकि मर्यादाओं की रक्षा करने का कठिन मार्ध है, जिसे
31:15चुनना ही पड़ता है.
31:18उनकी बातों में वह कठोर सत्य जलकता था, जिसे सुनकर तीनों भाईयों के हृदय जैसे काच की तरह तूट गए.
31:26लक्षमन ने हताशा में कहा कि यदि सीता माता का अपमान अयोध्या का धर्म है, तो यह धर्म हमें स्विकार्य
31:34नहीं है.
31:36कक्ष के वातावर्ण में एक गहरा धूसर धुन्ध छा गई, मानो साक्षात धर्म भी इस कठिन निर्नय के बोज से
31:43कांप रहा हो.
31:45राम ने अत्यंत धीमे स्वर में स्पष्ट किया कि एक राजा की प्रजाही उसका परिवार है और राजधर्म सर्वोप्री है.
31:54भरत के नेत्रों से बहते अश्रुधर्ती पर गिरकर उस पवित्र भूमी को और अधिक भारी कर रहे थे.
32:02शत्रुधन ने अन्तह अपना मौन तोड़ा और कापती हुई आवाज में राम से इस कठोर सत्य को बदलने का आग्रह
32:10किया.
32:11परंतु राम का मुखमंडल उस अटल हिमालय की भांति स्थिर था, जिस पर न तो शीत का प्रभाव है और
32:19नहीं ताप का.
32:21कक्ष की छत से लटका हुआ, वह स्वर्ण दीप इस महान त्याग की गवाही देते हुए अचानक बुझ गया.
32:29अयोध्या के उस गुप्ट कक्ष में राज धर्म का वह कठिन अध्याय पूर्ण हुआ, जिसने आने वाले समय की दिशा
32:36तय कर दी.
32:37राम के आदेश अनुसार लक्ष मन ने भारी मन से राजसी रत को तयार करना प्रारंब किया, जैसे वे किसी
32:45उत्सव के लिए नहीं, बलकि नेती के सबसे कठोर निर्णय के लिए आधार तयार कर रही हुँ.
32:52लक्ष मन की आखों में उमरते अश्रु मानो उस विवश्चता की धारा थे, जिसे वे अपने बड़े भ्राता के प्रती
32:59भक्ती के कठोर अनुशासन में बांधे हुए थे.
33:03रत के पहियों में लगी मनिया सूर्य की पहली किरण के साथ, चमक उठीन, मानो वे सीता के आगमन की
33:11प्रतीक्षा में अपने स्वन आभूशनों को निखार रही हुँ.
33:15अयोध्या के विशाल प्रांगण में खामोशी की एक चादर बिच गई थी, जहां की हवाओं में केवल उस आगामी विचोह
33:23की आहट गूंज रही थी, जिसे कोई नहीं देख पा रहा था.
33:28सीता, जो अपने मातरित्व के आनंद में डूबी हुई थी, ने धीरे से रत की और कदम बढ़ाया, उनके मुख
33:35पर वही अलौकिक शान्ती थी, जो केवल त्याग की प्रतिमूर्ती में ही संभव है.
33:41प्रभु श्रीराम दूर खड़े इस द्रिश को देख रहे थे, उनकी भावहीन मुद्रा के पीछे का वह अनकहा दुख एक
33:49ऐसे महासागर जैसा था, जिसे कोई नहीं माप सकता था.
33:54लक्ष्मन ने लगाम पकड़ी, लेकिन उनकी उंगलिया थर्थरा रही थी, जैसे वे उस रत को नहीं, बलकि एक युग के
34:01अंत को आगे बढ़ा रही हूँ.
34:04रत की धोजा हवा में ऐसे लहरा रही थी, जैसे वह अयोध्या के गौरव को अंतिम बार नमन कर रही
34:11हो, जो अब कुछ ही क्षणों में सदा के लिए परिवर्तित होने वाला था.
34:17सीता ने रत में अपना स्थान द्रहन किया, वे पूरी तरह अंजान थी कि यह यात्रा उन्हें वन की गहराईयों
34:24में एक ऐसे एकांत की ओर ले जाएगी, जिसका वे स्वपन में भी अनुमान न लगा सकी थी.
34:31लक्षमन ने प्रभो के संकेतों का पालन करते हुए रत को आगे बढ़ाया, उनके पहियों की गड़गडाहट अयोध्या की गलियों
34:39में एक अंतिन विदाई के स्वर की भानती गूम्ष उठी.
34:44सड़क के दोनों और खड़े नगरवासी अपने राजा और रानी को जाते देख आनंदित हो रहे थे, वे नहीं जानते
34:51थे कि वे एक युग के समापन के साक्षी बन रहे हैं.
34:56आकाश के देवगण भी इस द्रिश को देख स्तब्ध थे, क्योंकि आज का यह त्याग नश्वर मनुश्यों के लिए नहीं,
35:04बलकि ब्रहमांडिय संतुलन के लिए अनिवार्य था.
35:08रत धीरे धीरे नगर की सीमाओं को पार कर रहा था, और अयोध्या की अंतिन जलक सीता की आखों में
35:15एक सुन्दर स्मृती बनकर अंकित हो गई.
35:18लक्षमन का मुख आज पूर्णत है पीला पड़ चुका था, उनका हृदय उन शब्दों को छिपाने के बोज से दबा
35:25जा रहा था, जो उनके कंठ में कांटों की तरह चुब रहे थे.
35:30प्रकृती भी जैसे उस दिन अपना स्वभाव बदल रही थी, पक्षियों का कल्रव अचानक थम गया और एक भारी सन्नाटा
35:38वन के द्वार पर पसरा हुआ था.
35:41स्वर्ण रत का तेज उस घने जंगल के अंधकार में एक दिये की भांती प्रतीत हो रहा था, जो धीरे
35:48-धीरे अपने ही अंत की ओर अग्रसर था.
35:52सीता ने वन की सुन्दर्ता की प्रशंसा की, उनकी मुस्कान में वही सहच पवित्रता थी, जो आज भी युगों तक
35:59अनुकरणिये बनी हुई है.
36:02लक्षमन के भीतर का युद्ध चरम पर था, एक और प्रभु की आज्या थी, और दूसरी और वेस्वयन को उस
36:09आज्या का दास होने के लिए कोस रहे थे.
36:13रत एक शांत नदी के तट पर रुख गया, जहां का वातावर्ण पवित्र होने के साथ साथ अत्यंत गंभीर और
36:20उदास प्रतीत हो रहा था.
36:23अब समय आ गया था उस सत्य के प्रक्तिकरण का, जिसने अयोध्या के इतिहास को सदा के लिए एक ऐसे
36:30मोर पर खड़ा कर दिया जहां से लोटने का मार्ग बंध हो चुका था.