पद्म पुराण के इस एपिसोड में देखिए, जब अयोध्या के वीर शत्रुघ्न का सामना वाल्मीकि आश्रम के तेजस्वी बालकों लव और कुश से होता है। क्या शत्रुघ्न पहचान पाएंगे कि ये बालक उन्हीं के कुल के वारिस हैं? जानिये इस रहस्यमयी मुलाकात के पीछे छिपी नियति की साजिश और आने वाले महा-संकट का संकेत। #PadmaPurana #Ramayan #LuvKush #Shatrughna #HinduMythology #SanatanDharma #Storytelling
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00:00ब्रहमा जी अपनी कमल के आसन पर विराज मान होकर इस समवाद को सुन रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं
00:07कि यह कुल की मर्यादा का प्रश्ण है
00:10कुश अपने तेस्तर्रार स्वर में उत्तर देता है कि वन किसी राजा की जागीर नहीं बलकि प्रकृती का मुक्त आंगन
00:18है
00:20आश्रम के पास के शांत जरने की कलकल ध्वनी इस बहस के बीच एक अजीब सी शांती पैदा कर रही
00:26है
00:28शत्रुग्न को लगता है कि ये बालक अनुशास नहीं है इसलिए वे उन्हें दंडित करने के लिए अपना हाथ तलवार
00:36की मूठ पर रखते हैं
00:39गरुर देव अपनी विशाल पंकों के साथ बादलों के उपर मंदरा रहे हैं वे इस परीक्षा की घडी को सुक्षमता
00:46से देख रहे हैं
00:49लव अपनी निडर्ता का परिचय देते हुए शत्रुगन की और एक कदम बढ़ाता है जैसे कि वह किसी राजा से
00:56नहीं बलकी एक सामान्य मनुष्य से बात कर रहा हो
01:00वन के पत्ते हवा में लहरा रहे हैं मानों वे भी आने वाले सत्य के खुलासे के लिए स्वयन को
01:07तय्यार कर रहे हूँ
01:09शत्रुगन का स्वाभिमान उन बालकों के साहस के आगे डगमगा जाता है क्योंकि उन्होंने आज तक किसी को उनसे इस
01:17तरह बात करते नहीं देखा
01:30शत्रुगन अपनी तलवार निकालने ही वाले हैं कि तभी हवा में एक दिव्य गूंज होती है जो उनके हाथ को
01:38स्तब्ध कर देती है
01:40नेती का परदा धीरे धीरे हट रहा है और अब उस सत्य का समया गया है जिसे वालमीकी ने वर्षों
01:48से छुपा कर रखा था
01:50हिमालय की बरफीली चोटियों के बीच लवा और कुश के बाल सुलब साहस और दिव्य तेज का एक अध्भुत संगम
01:58वातावर्ण को आलोकित कर रहा है
02:01भगवान शिव अपनी समाधी में स्थिर त्रिलोकी के इसक्षण को अपनी तीसरी आख के माध्यम से अत्यंत गंभीर्ता से देख
02:09रहे हैं
02:12शत्रुग्न का हाथ जो अभी भी अपनी तलवार की मूठ पर जमा हुआ है एक अद्रिश शक्ती के प्रभाव से
02:19थर्थरा रहा है
02:22वातावर्ण में एक रहस्य में गून्शा गई है जैसे काल स्वय रुप गया हो ताकि सत्य और नेती का मिलन
02:29हो सके
02:30लव और कुश के मुख पर किसी भी प्रकार का भय नहीं बलकि वे एक ऐसे आत्म विश्वास से खड़े
02:37हैं जो केवल रगुकुल के वीरों में ही संभव है
02:42गरुर देव आकाश मार्ग से इस द्रिश को देख रहे हैं और भगवान विश्णु को इस आने वाले महान परिवर्तन
02:49के संकेट दे रहे हैं
02:52शत्रुघन ने अपनी तलवार को म्यान में वापस डाल दिया क्योंकि उनके भीतर का अंतर्मन उन्हें बता रहा था कि
03:00सामने कोई सामान्य बालक नहीं है
03:04हवा में बहने वाली शीतलता में भी एक दिव्यगंध है जो महर्शी वालमीकी के तपोबल का प्रमान दे रही है
03:13शत्रुघन ने बालकों की ओर कदम बढ़ाया उनकी आखों में वहस ने उभर आया जो उन्हें अपने अग्रज राम की
03:20याद दिला रहा था
03:23भगवान विश्णु वैकुंठ के अपने दिव्य आसन पर मुस्कुरा रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह नेती का ही
03:30एक बड़ा चक्र है
03:32कुष ने आगे बढ़कर शत्रुघन को नमन किया और उनकी वाणी में एक ऐसी मधूरता थी जिसे सुनकर शत्रुघन का
03:40हृदय पिघल गया
03:42किमाले की गुफाओं में गूंजती हुई ओंकार की ध्वनी ने बालकों के चारों और एक सुरक्षा कवच को और भी
03:49अधिक सुद्रिड कर दिया
03:52शत्रुघन ने उन बालकों को देखा और उन्हें अनुभव हुआ कि ये केवल शिश्य नहीं बलकि किसी महान वंश की
03:59परचाई है
04:02महर्शी वालमीकी की कुटिया से आती हुई प्रार्थना की ध्वनिया इस द्रिश्य को एक पवित्रता और गरिमा प्रदान कर रही
04:09है
04:12शत्रुघन ने धीरे से अपना हाथ बालकों के सिर पर रखा और उन्हें लगा जैसे विस्वया अपने कुल के गौरव
04:19को स्पर्श कर रहे हुँ
04:21नेती का पहिया धीरे धीरे घूम रहा है और वह रहस्य अब उभरने को है जो वर्षों से वालमीकी के
04:28तपोबल में सुरक्षित था
04:31शत्रुघन के मन में उठ रहे प्रशनों का सैलाब अब धीमा पड़ गया है क्योंकि उन्हें अपने भीतर उत्तरों का
04:38आभास होने लगा है
04:41शिवजी की तीसरी आख से निकली हुई उर्जा अब शान्थ हो गई है मानो उसने अपना कार्य पूर्ण कर लिया
04:48हो
04:49लव और कुष की आखों में वह तेज है जो सूर्यवन्षी राजाओं की गाथाओं का जीवन्त प्रमान बन चुका है
04:58अब समय आ गया है कि शत्रुघन को वह सत्य ज्यात हो जिसके लिए नेती ने उन्हें इस आश्रम की
05:05दहलीस तक खीच कर लाया है
05:08आश्रम की शांत वादियों में शत्रुघन के अश्वमेध घोडे की पच्चाप गूजी जिससे वहां की प्रकृती में एक अजीब सा
05:16तनाव उत्पन हो गया
05:18विश्णु लोक में भगवान विश्णु मंदमंद मुस्तरा रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि नेती के धागे अब एक दूसरे
05:26में उलजने वाले हैं
05:29शत्रुघन के सैनेकों ने जैसे ही आश्रम की सीमा में प्रवेश किया लव और कुष ने अपनी तपोबल से प्राप्त
05:36धनुशों को संभाल लिया
05:39आश्रम के चारों और की हवा में एक अदृष्य उर्जा का संचार हो रहा है जो आने वाले महासंगराम के
05:46संकेतों को स्पष्ट कर रही है
05:50शत्रुगन ने देखा कि दो किशोर बालक उनके घोडे के मार को निर्भय होकर रोके खड़े हैं जिससे उनकी भौहें
05:57क्रोध में तन गई
05:59भगवान शिव कैलाश के शिखर पर अपने आखे बंद कर इस अद्भुत लीला का साक्षी बन रहे हैं मानो सब
06:07कुछ उनके ही विधान के अनुसार हो रहा हो
06:10लव की तीखी वानी गुंजी की यह वन उनकी माता की पवित्र धरोहर है और यहां किसी भी राजा का
06:17हस्तक्षेप स्विकार्य नहीं है
06:21अधिकार और कर्तव्य के इस द्वंद्व में सत्यका सूर्य बादलों के पीछे छिप गया है जिससे जंगल में अचानक धुंद
06:29छा गई
06:31शत्रुघन के मन में यह गलतफमी गहरी होती गई कि यह वनवासी बालक किसी गुप्ट शत्रु के प्यादे हो सकते
06:37हैं
06:39गरुर देव उपर आकाश में मंदरा रहे हैं वे अपनी तीक्ष्न द्रिष्टी से देख रहे हैं कि मर्यादा पुरुशोत्तम के
06:47पुत्रों की परीक्षा का समय निकट है
06:51कुष ने एक चेतावनी भरा तीर हवा में छोड़ा जो शत्रुगन के रत के सामने की धर्ती में धंस गया
06:59नेती की बलिवेदी पर एक ऐसा रहस्य पर रहा है जो पिता और पुत्रों के बीच की खाई को मिटाने
07:05के लिए तयार है
07:08शत्रुगन ने अपनी तलवार म्यान से बाहर निकाली उनका शौर्य और क्रोध अब उनके सन्यम पर भारी पड़ रहे है
07:18भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा से हटकर इस लीला का आनंद ले रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि यह
07:24रण नहीं पुनर्मिलन की शुरुआत है
07:28लव और कुषने तनिक भी भाय न दिखाते हुए अपने धनुष की प्रत्यंचा खीची जिससे जंगल के पशुपक्षी सहन गए
07:38आश्रम की पावन भूमी पर अब रक्त और पराक्रम के मिलन का मंच सच चुका था
07:44शत्रुगन को अभी भी आभास नहीं है कि जिनके विरुद्ध वे शस्त्र उठाए हैं वे उनकी कुल की ही अमर
07:51पहचान है
07:54देवलोक से रिशिगन भी इस युद्ध का अवलोकन कर रहे हैं उनके मुख पर एक रहस्य में मुस्कान है
08:02एक क्षण के लिए समय मानो थम सा गया है जैसे प्रकृती स्वयें इस अनर्थ को रोकने का प्रयास कर
08:09रही हो
08:10और फिर शत्रुगन ने अपना शस्त्र उठा लिया इस गलतफमी के साथ की वे केवल अपनी सुरक्षा कर रहे हैं
08:19शत्रुगन के धनुष से निकला अगनिबान वातावर्ण में एक तीवर गर्जना के साथ आगे बढ़ा जिसे देखते ही वन की
08:27दिशाए भय से थर्थरा उठी
08:30कैलाश परवत पर बैठे भगवान शिव ने अपनी योगनिद्रा भंग की उनके ललाट पर स्थित तीसरा नेत्र सुक्षमता से चमक
08:38उठा जैसे वे किसी महान घटना के साक्षी बन रहे हो
08:43कुष ने अपनी फूर्ती से एक जलस्त्र संधान किया जिससे हवा में टकराते ही शत्रुगन का अगनिबान भाप बन कर
08:51शान्त हो गया
08:53आकाश मंडल में बिखरी हुई वह दिव्य उर्जा एक स्वर्ण कवच के समान चमकने लगी जो संपूर्ण तपोवन को अपनी
09:01ओजस्वी आभा से ढख रही थी
09:04शत्रुगन ने विस्मय से लव और कुश की ओर देखा जिनके चहरे पर तनिक भी भय नहीं अपितु एक अध्भुत
09:11तेज और निश्चिन्तता विराजमान थी
09:15देवलोक में गरूर की पीठ पर विराजमान भगवान विश्णु ने इस द्रिश को देख कर मंद मुस्कान के साथ अपने
09:22सुदर्शन चक्र को हलका सा इंगित किया
09:26लव ने एक और बान छोड़ा जो साक्षात नादपाश के समान शत्रुगन के अस्त्रों को अपनी जकड में लेने लगा
09:34पूरे वातावर्ण में एक रहस्यमई गूंच सुनाई दी मानो प्रकृती स्वय इन दोनों बालकों की वीर्ता का स्तवन कर रही
09:42हो
09:43शत्रुगन की भेकुटी तन गई उन्होंने अपने तरकश से वायव्यास्त्र निकाला जिसे छोड़ते ही एक प्रल्यंकारी चक्रवात ने वन की
09:52शान्ती को खंडित कर दिया
09:55रिशिगन विचलित होकर अपनी ध्यान साधना से जागे क्योंकि यह दिव्य युद्ध अब एक सामान्य संधर्ष से कहीं अधिक बढ़
10:03चुका था
10:05कुष ने अपनी आखों को बंद किया और पिता के द्वारा दी गई शिक्षा का स्मरण करते हुए एक शान्त
10:11स्वर में मंत्रो चार किया
10:14उस मंत्र के प्रभाव से शत्रुगन का चक्रवात मानो ठहर गया जैसे समय की धारा किसी शक्तिशाली हाथों से थाम
10:22ली गई हो
10:24भगवान शिव ने अपनी मंद मुस्कान के साथ त्रिशूल को स्पर्ष किया जिससे पूरी स्रिष्टी में एक दिव्यस पंदन उत्पन
10:32हुआ
10:33शत्रुगन के हाथों से धनुष गिर्टे गिर्टे बचा क्योंकि उन्हें आभास हुआ कि वे साधारन बालकों से नहीं बलकि किसी
10:41दैविय अंश से युद्ध कर रहे हैं
10:45लव और कुष ने अपनी बानों को एक साथ ऊपर की ओर किया जिससे एक अकलपनिय प्रकाश पुंच सूर्य की
10:52भानती चमक उठा
10:55पूरे तपोवन में एक ऐसी शांती चा गई जो प्रलय के बाद की उस शांत अवस्था का बोध करा रही
11:02थी जिसमें सब कुछ समाहित है
11:06शत्रुघन ने अपनी तलवार म्यान में डाल दी क्योंकि नेती का वह संकेट अब उनके अंतर्मन में स्पष्ट रूप से
11:13गुंज रहा था
11:15महर्शी वालमी की कुटिया के द्वार पर खड़े होकर इस अद्भुत द्रिश को देख रहे थे
11:20उनकी आखों में भविश्य की वहर उप्रेखा थी जिसे कोई देख न सका
11:26आस्मान में खड़े देवतागन अब अपनी कुतुहल भरी प्रतीक्षा का त्याग कर प्रित्वी के उस सत्य के प्रकट होने की
11:34प्रतीक्षा कर रहे थे
11:36नेती का सबसे बड़ा रहस्योध धाटन होने ही वाला था जहां पिता और पुत्र की यह भेंट एक महायतिहास रचने
11:44की ओर अग्रसर थी
11:46महर्शी वालमीकी की ओजस्वी उपस्थिती ने तपोवन के वातावर्ण को एक अलौकिक शांती से भर दिया जहां कनकन उनकी दिव्यता
11:55का साक्षी बन गया
11:58स्वर्गलोक से ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की बूंदे छोड़ी जो फूलों की वर्षा बनकर महर्शी के
12:05चर्णों को स्पर्श करने लगी
12:08महर्शी वालमीकी के मुख से निकला ठहरो शब्द वजर की भांती गूंज उठा और शत्रुगन की नंगी तलवार उनके हाथों
12:16में ही जडवत हो गई
12:18समय मानो थम गया और तपोवन की शीतल हवाओं ने युद्ध की उष्णता को मिटा कर एक दिव्य सन्नाटे को
12:25जन्म दिया
12:27शत्रुगन ने अपनी द्रिष्टी उपर उठाई और देखा कि वालमीकी का तेज सूर्य की सहस्त्र किर्णों के समान उनके अहंकार
12:35को जला रहा है
12:38देवराज इंद्र ने बादलों की ओट से देखते हुए अपना वजर नीचा कर लिया क्योंकि नेती का रहस्य अब खुलने
12:45के लिए तत्पर था
12:47लव और कुष ने अपनी धनुष की प्रक्तियंचा धीली की क्योंकि महर्शी के आगमन ने उनके भीतर की सहेज जिग्यासा
12:55को एक नई दिशा दे दी थी
12:58तपोवन के व्रिक्षों के पत्तों ने संगीत साचेरा जैसे प्रक्रिती स्वय इस महायतिहास के साक्षी बनने के लिए सन्नध हो
13:07गई हो
13:08महर्शी वालमीकी ने शत्रुगन की आखों में देखते हुए कहा कि यह शस्त्रों का युद्ध नहीं बलकि पित्रधर्म और कर्तव्य
13:16का समनवय है
13:19भगवान विश्णुनेक शीर सागर से इस मिलन को देख मंद मुस्कान बिखेरी जैसे वे स्वय इस लीला के सूत्रधार हो
13:28शत्रुगन का क्रोध अब आश्चर्य में परिवर्तित हो रहा था क्योंकि उन्हें वालमीकी के मुख से अपने कुल के गौरव
13:36का आभास हो रहा था
13:38नेती की लकीरें अब एक बिंदु पर मिल रही थी जहां एक योध्धा और दो वनवासी बालकों का अस्तित्व एक
13:46मेव होने को था
13:48लव और कुश के मुख पर एक दिव्य आभा उभराई जो उनके रगुवन्शी कुल की पहचान को और भी प्रखर
13:55बना रही थी
13:58देवताओं के विमान अब और नीचे आ गए थे ताकि वे उस सत्य को देख सकें जिसे युगों से छिपाया
14:04गया था
14:06वालमी की जी ने एक कदम और आगे बढ़ाया और उनके पगों से उत्पन्न कमपन ने पूरी धर्ती को एक
14:13नई चेतना प्रदान की
14:16धर्ती ने जैसे अपने भीतर दबे हुए सत्य को स्विकार कर लिया हो, हर्याली में एक दिव्य चमक दोड़ गई
14:24शत्रुघन ने अपनी तलवार को म्यान में वापस डालते हुए नमन किया, जैसे वह किसी अंजाने सत्य के सामने समर्पन
14:32कर रहा हो
14:34आस्मान में रंगबिरंगी आतिश बाजी सी गूंज होने लगी, जो देवताओं के इस महामिलन की प्रतीक्षा का अंत दर्शा रही
14:42थी
14:44लव और कुष के नेत्रों में अपने पूर्वजों की छवी प्रतिबिंबित हो रही थी, जैसे वे किसी प्राचीन दर्पन में
14:51स्वयंग को देख रहे हो
14:53महर्शी वालमीकी ने मुस्कुराते हुए कहा कि आज का सूर्योदय नहीं, बलकि एक नए युग का अवतरण हुआ है
15:03वालमीकी के आश्रम की शांत कुटिया के चारों और प्रकृती स्वयंग एक अद्रिश धेरा बना रही है, जहां व्रिक्षों की
15:10डालिया मानो भविश्य के किसी बड़े सत्य को छुपाने के लिए जुप गई है
15:16महर्शी वालमीकी ने अपनी अंतरद्रिश्टी से शत्रुगन के हृदय की बेचैनी को भांप लिया और मंद मुस्कान के साथ उनके
15:24सामने आकर खड़े हो गए
15:27शत्रुगन ने अपनी तलवार को म्यान में डालते हुए वालमीकी की आँखों में देखा, मानो वे इस बालक के शौर्य
15:34में अपने कुल की जलक धून रहे हो
15:38आश्रम की वायू में एक दिव्य सुगंध घुल गई है, जैसे किसी यग्य के पूर्ण होने का समय अब अत्यंत
15:45निकट आ गया हो
15:47वालमीकी ने लव और कुष की ओर संकेट करते हुए शत्रुघन से कहा कि इन बालकों की तेजस्विता केवल साधारन
15:55वनवास का फल नहीं है, बल्कि यह किसी महान सूर्यवंश का प्रतिबिम्भ है
16:01शत्रुघन के मन में जिग्यासा की अगनी धधक उठी और उन्होंने महर्शी से इन बालकों के पिता का नाम जानने
16:09की अत्यंत विनमर्ता पूर्वक याचना की
16:12महर्शी की द्रिष्टी में एक गहरा रहस्य तैर गया, जैसे वे समय के प्रवाह को रोक कर शत्रुघन को उत्तर
16:19के बोज से बचाना चाह रहे हो
16:23वातावर्ण में अचानक सन्नाट आचा गया, मानो पक्षियों ने भी इस समवाद की गरिमा को समझते हुए अपना कलरव थाम
16:30लिया हो
16:32शत्रुघन के मन में धीरे-धीरे एक ममता का भाव पन्पने लगा, जो उनके योध्धा हरिदय के कठोर कवच को
16:39अंदर से पिघला रहा था
16:41लव और कुषने अंजाने में ही अपनी धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई, जिससे उत्पन हुआ स्वर्शत्रुघन के कानों में किसी परिचित
16:50राग जैसा सुनाई पड़ा
16:53शत्रुघन के हरिदय की धड़कन तेज हो गई, क्योंकि उस राग में उन्हें अपने कुल के गौरवशाली अतीत का एक
17:00मीठा और दर्धनाक संगम महसूस हुआ
17:04प्रकृती का कनकन मानो गवाही दे रहा था कि जिस रक्त का वे संधान कर रहे हैं, वह स्वयं मर्यादा
17:11पुरुशोत्तम की ही थाती है
17:14महर्शी वालमीकी ने धीमे स्वर में कहा कि नेती का रहस्य सही समय आने पर स्वयं उद्घाटित होगा, तब तक
17:22इन बालकों की साधना में बाधा न डालें
17:26शत्रुगन के होट काम पे, लेकिन वे जानते थे कि आश्रम की मर्यादा और सत्य के धर्म के आगे उन्हें
17:33मौन ही रहना होगा
17:35लव और कुश के चहरे पर सूर्य जैसा तेज उभर आया, जो शत्रुगन को उनके पूर्वजों की याद दिलाने के
17:42लिए परियाप्त था
17:55शत्रुगन की तलवार जो अब तक आक्रामक थी, अब पूरी तरह शान्त होकर उनके कमरबंद में विश्राम कर रही है
18:04वालमीकी ने एक गहरा निश्वास लिया, क्योंकि वे जानते थे कि आज के बाद यहाँ आश्रम और शत्रुगन का जीवन
18:12कभी पहले जैसा नहीं रहेगा
18:15लव और कुष के मन में भी अब अपने अस्तित्व को जानने की प्यास बढ़ गई थी, जो उन्हें भविश्य
18:22के बड़े निर्नयों की ओर धकेल रही थी
18:26नेती का चक्र अब तेजी से घूम रहा था, जहां शत्रुगन का अंजाने में ही अपने ही वन्ष के दीपकों
18:32के साथ आमना सामना होने वाला था
18:36शत्रुगन ने जैसे ही आश्रम की सीमा में प्रवेश किया, वहां की शांती में उन्हें अयोध्या के राजभवन की एक
18:43मधुर गूंच सुनाई दी
18:46लव और कुष एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे बैठे थे, जिनकी दिव्य आभा देखकर शत्रुगन के कदम अंजाने में ठिठक
18:54गए
18:56शत्रुगन ने अपनी तलवार की मूठ को कसकर पकड़ा, लेकिन उनके मन में इन बालकों के प्रती अनायास ही एक
19:03अगाध प्रेम उमड पड़ा
19:05वन की वायू अचानक सुगंधित हो गई, जैसे कोई दिव्य शक्ती इन तीनों के मिलन के साक्षी बनने के लिए
19:13उपस्थित हो
19:15लव ने निडर्ता से अपना सिर उपर उठाया और शत्रुगन की ओर देखा, जिसकी आखों की चमक ने शत्रुगन के
19:22हृदय को भीतर तक जख जोर दिया
19:26शत्रुगन को लगा कि इन बालकों की तेजमई आखों में श्रीराम की वही सौमयता और मर्यादा का भाव छिपा है
19:34कुष अपनी धनुष की डोरी को ठीक कर रहा था और उसकी तनमयता में शत्रुगन को अपनी युवावस्था की जलत
19:42दिखाई दी
19:44आश्रम के शांत वातावर्ण में एक दिव्यस पंदन महसूस हुआ जो नेती के उन रहसियों की ओर इशारा कर रहा
19:51था जिन्हें अभी प्रकट होना बाकी था
19:55शत्रुगन ने अपनी तलवार म्यान में डाल दी क्योंकि उन्हें लगा कि यहां हिंसा का नहीं बल्कि सत्य के साक्षातकार
20:03का समय है
20:05उनकी आखों में पानी भराया जब उन्होंने इन बालकों के मुखमंडल पर अयोध्या के रग्धुकुल का दुरलब होज देखा
20:14लव ने धीरे से पूछा कि आप कौन है और आपकी आखों में यह करुणा का भाव किस लिए है
20:20ये पथिकुल की रक्षा के लिए वे जीवन भर लड़े उसके उत्तराधिकारी उनके सामने खड़े थे
20:32आश्रम की ओर जाते हुए पत पर शत्रुगन ने उन पच्चेहनों को देखा जो वालमिकी के मार्गदर्शन का प्रमान दे
20:39रहे थे
20:41वालमिकी के आश्रम के पास खड़ा वह महान योध्धा अब एक पिता के समान सने से भर उठा था
20:48कुष ने अपनी मधुरवानी में फिर से प्रश्न किया जो किसी पवित्र मंत्र की तरह वातावर्ण में गुम्ध उठा
20:57नेती का चक्र अब एक ऐसे मोर पर था जहां अतीत की स्मृतिया वर्तमान की सच्चाईयों से टकराने वाली थी
21:06शत्रुघन ने धीरे से अपना नाम लिया लेकिन उनकी आवाज में अयोध्या की मर्यादा का सारा सम्मान समाहित था
21:14लव और कुष के चहरे पर एक अप्रिचित मुस्कान आई जैसे वे सदियों से शत्रुघन के इस सम्बोधन की प्रतीक्षा
21:22कर रहे थे
21:24शत्रुघन ने अनुभव किया कि उनका यह छोटा सा पड़ाव आने वाले समय में एक बड़े इतिहास के निर्मान का
21:31आधार बनेगा
21:34इतिहास के पन्ने पलटने को तैयार थे क्योंकि अयोध्या के दो दीपकों ने अब अपने ही कुल के एक रक्षक
21:41को पहचान लिया था
21:43आश्रम की प्रदीप्ट पनकुटी के भीतर खड़ी माता सीता इन सभी अद्वितियद रिश्यों को अपनी सजल और शांत नेत्रों से
21:51देख रही थी
21:53उनके अंतस में मातरित्व की वादसलेधारा और मर्यादा की गंभीर मर्यादा के बीच एक गहन धर्मसंकट का ज्वार उठ रहा
22:02था
22:03वे भली भानती जानती थी कि ये दोनों बालक और कोई नहीं बलकी उनहीं के अपने अंश है जो उनके
22:10पराक्रमी पौरुष का जीवन्त प्रमान है
22:15परंतु नेती का विधान अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हुआ था इसलिए उनका यह मौन एक विरात भविश्य के
22:22गर्भ को साधे हुए था
22:25शत्रुगन के मन में इन दोनों बालकों के प्रती उपजा अकारंस नह और विस्मय इस बात का संकेत खा कि
22:32रक्त अपनी पहचान स्वयंपा रहा है
22:35महर्शी वालमीकी के इस पवित्र प्रांगण में खड़ा शत्रुगन अपनी ही परचाई से जैसे कुछ अनकहे समवाद करने को विवश
22:43हो गया था
22:45माता सीता का यह मौन केवल एक चुप्पी नहीं थी बलकि यह ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहसियों को अपने भीतर
22:53समेटे हुए एक गहरी समाधी थी
22:56वे अपने पुत्रों की वीर्ता पर गर्व महसूस कर रही थी, किन्तु शत्रुगन के समक्ष उनके प्रकट न हो पाने
23:03की विवश्टा उनके हृदय को मत रही थी
23:07बाह रणभूमी जैसी स्थिती में खड़े शत्रुभन के लिए यह मौन एक ऐसी पहेली बन चुका था जिसका उत्तर वे
23:15अपने अस्त्रों में नहीं पा सकते थे
23:18पयोध्या के वीर योध्धा का यह असमंजस इस बात का प्रमाण था कि नेती ने मनुश्यों के सभी तरकों को
23:25पचाड़ कर एक नया अध्याय लिख दिया है
23:29आश्रम की इस शांत छाव के तले समय मानो अपनी गती भूल कर उस एक पल को अनंत काल तक
23:36खींच देना चाहता था
23:38लव और कुश के तेजस्वी चहरे और शत्रुगन के शांत होते हुए क्रोध के बीच केवल माता सीता की यह
23:45चुप्पी ही एक मात्र सेतु थी
23:49प्रत्येक बीच्ते पल के साथ शत्रुगन का अंतरग्यान उन्हें बार-बार यह याद दिला रहा था कि इन बालकों का
23:56संबंध सीधे रगुवंश की मूल चेतना से है
24:00किन्तु अयोध्या की मर्यादा और एक त्याग की मूर्ती बन चुकी सीता का संकल्प उनके इस मिलन के मार्ग में
24:08एक पवित्र दीवार बन कर खड़ा था
24:11उनके मौन की गहराई इतनी अगाध थी कि पवन भी आश्रम की परणकुटी के पास आकर अपनी सरसराहट रोक लेता
24:19था
24:20यह वहक्षन था जहाँ इतिहास अपने पुराने पन्नों को फाड़ कर एक नए और अधिक गौरवशाली भविश्य की इबारत लिखने
24:29जा रहा था
24:31शत्रुगन ने अपनी तलवार को पूरी तरह म्यान में सुरक्षित रख लिया जैसे उन्होंने अपनी बुद्धी को इस रहस्य के
24:38आगे समर्पित कर दिया हो
24:41माता सीता ने दूर से ही अपने देवर के इस समर्पन को देखा और उनके होठों पर एक अत्यंत सुक्ष्म
24:48किन्तु रहस्य में मुस्कान तैर गई
24:51वह मुस्कान इस बात की गवाही थी कि जो बीज आज बोया गया है वह कल एक विशाल वटवरिक्ष बनकर
24:59संपूर्ण ब्रहमांड को शितलता देगा
25:02इस प्रकार शत्रुघन के सामने अडीवह तलवार जहां शान्त हुई वही से रामायन का एक नया और सबसे अध्भुत अध्याय
25:11प्रारंभ हुआ
25:13महर्शी वालमी की शत्रुघन को चेतावनी देते हैं कि आने वाला समय बहुत
25:24महर्शी वालमी की शत्रुघन को चेतावनी देते हैं कि आने वाला समय बहुत
25:35महर्शी वालमी की शत्रुघन को चेतावनी देते हैं कि आने वाला समय बहुत
25:46महर्शी वालमी की शत्रुघन को चेतावनी देते हैं कि आने वाला समय बहुत
25:58महर्शी वालमी की शत्रुघन को चेतावनी देते हैं कि आने वाला समय बहुत
26:09महर्शी वालमी की शत्रुघन को चेतावनी देते हैं कि आने वाला समय बहुत
26:26शत्रुघन इस रहस्य को समझने की कोशिश करते हैं
26:54महर्शी वालमी की शत्रुघन को चेतावनी देते हैं कि आने वाला समय बहुत
27:00शत्रुघन इस रहस्य को समझने की कोशिश करते हैं
27:05शत्रुघन के मन में महर्शी के शब्दों का प्रतिध्वनी एक ऐसे चकरवात की तरह घूम रही थी
27:11जिसे रोकना अब उनकी क्षमता से बाहर प्रतीत हो रहा था
27:16आकाश में गरोर पर आरूर भगवान विश्नु ने विचलित मन से शत्रुघन की स्थिती का अवलोकन करते हुए नेती के
27:24क्रूर खेल को मौन रहकर स्विकार किया
27:27शत्रुघन ने अपने रत की गती तीवर की जैसे वे अपने स्वयं के अंतर्मन के उन अंसुल्जे प्रशनों से दूर
27:35भागने का अस्पल प्रयत्न कर रहे हो
27:38जंगलों के बीच से गुजरते हुए प्रकृती का सन्नाटा ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरी स्विष्टी शत्रुघन की आने
27:46वाली वेदना का संकेट दे रही हो
27:49दूर एक विशाल परवत शिंखला के पीछे ढलते सूरज की अंतिम किरने शत्रुघन के कवच पर पढ़कर एक अलौकिक तेज
27:57उत्पन कर रही थी
28:00भगवान शिव कैलाश के शिखर पर स्थित अपनी समाधी में स्थिर थे और उनके मानस पटल पर शत्रुघन के हरिदय
28:08की वह गहरी टी स्पष्ट अंकित थी
28:11शत्रुघन ने मार्ग में रुक कर अपनी तलवार का निरीक्षन किया जिसके फलक पर आज भी उस युद्ध की विभीशिका
28:18की प्रतिध्वने स्पष्ट दिखाई दे रही थी
28:22नेती की अद्रिश्य डोरें इतनी जटिल हो चुकी थी कि शत्रुघन को अब अपना ही मार्ग किसी पराए लोग की
28:29पहेली जैसा लगने लगा था
28:32अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हुए वे बार-बार मुड कर उस आश्रम की दिशा में देखते थे जहां से
28:39उन्हें एक अद्रिश्य आकर्शन खीच रहा था
28:43महर्शी नारद आकाश मार्ग से विचर्ण करते हुए इस विवशता भरे दिश्य को देखकर केवल मंद मुस्कान के साथ अपनी
28:51वीना के तार छेड रहे थे
28:54शत्रुग्न के रत के पहियों की गड़गडाहट शांत वन में एक ऐसी बेचैनी पैदा कर रही थी जिसे सुनकर पक्षी
29:02भी अपने नीड छोड़ कर उरने लगे थे
29:05वातावर्ण में फैलती वह नीरवता मानों आने वाले महाविनाश या किसी बड़े रहस्योद घाटन का मौन निमंतरन बन गई थी
29:14तभी शत्रुग्न को ऐसा आभास हुआ जैसे कोई अद्रिश्य शक्ती उन्हें अयोध्या से दूर पुन्वालमी की आश्रम की ओर जाने
29:23का आदेश दे रही हो
29:25भगवान विश्णू ने गरूर को थोड़ा सा विचलन दिया ताकि नेती का चक्र अपनी पूर्व निर्धारित दिशा की ओर ही
29:33गतिमान रहे
29:35शत्रुघन के मन में उपजी वह टीस अब एक कसक बन चुकी थी जो उन्हें बार-बार यह याद दिला
29:41रही थी कि उनका कर्तव्य और उनका हृदय दो विप्रीत दिशाओं में है
29:47प्रकृती के उन प्राचीन पत्थरों और व्रिक्षों के बीच शत्रुघन की मानसिक द्वंद्व की गुंज एक अलौकिक तरंग बनकर वायू
29:55में विलीन हो रही थी
29:58अयोध्या और आश्रम के बीच का वह अद्रिश्य बंधन अब इतना खिंच चुका था कि उसके तूटने की ध्वनी केवल
30:05नेती के कानों को सुनाई दे रही थी
30:09शत्रुघन ने अपनी आखे मूद ली और उसक्षण उन्हें अयोध्या की भव्यता से अधिक आश्रम की उस पवित्र शांती की
30:17गंध सुनाई देने लगी
30:19नेती का वह अनसुलजा रहस्य अब अपनी परिधी के निकट आ रहा था जिसे थामने की शक्ती किसी भी देव
30:26के पास नहीं थी
30:29शत्रुगन के प्रस्थान के साथ ही आश्रम और अयोध्या के मध्य की दूरिया मिटने का समय आरंभ हो चुका था
30:36जिसके साक्षी केवल नक्षत रही थे