पद्म पुराण के इस अंतिम और ऐतिहासिक एपिसोड में जानिए उस महा-रहस्य को, जब वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश के हाथों लक्ष्मण और हनुमान के बंदी बनने के बाद स्वयं श्रीराम रणभूमि में आते हैं। जानिए कैसे होता है राम और उनके पुत्रों का आमना-सामना, माता सीता का वाल्मीकि जी के साथ प्रकट होना, और अश्वमेध यज्ञ का महान समापन। देखिए पद्मा पुराण के इस सीजन का ग्रैंड फिनाले, सिर्फ हमारे साथ! #PadmaPurana #Ramayana #LuvKush #HinduMythology #EpicStories
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00:00अयोध्या के विशाल स्वर्ण राज महल में सन्नाटा पसरा हुआ था जब अचानक एक घायल गुप्तचर ने प्रवेश किया।
00:08महर्शी वशिष्ठ और महामंत्री सुमंत राजसभा में इस अभूतपूर्व संकट की आशंका से गंभीर मुद्रा में बैठे थे।
00:17गुप्तचर ने कापते हुए स्वर में बताया कि तपोवन के दो बालकों ने पूरी सेना को धूल चटा दी है।
00:25यह भयंकर समाचार सुनते ही संपूर्ण सभाकक्ष में बिजली सी कौंध गई और सन्नाटा चा गया।
00:33शत्रुघन के पराजय की खबर सुनकर राजभवन के गलियारों में हडकंप मच गया और रानिया चिन्ता में डूब गई।
00:42मंत्री सुमंत ने व्याकुल होकर वशिष्ट से पूछा कि आखिर वे कौन अज्यानी वीर हैं जिन होने अश्व को रोक
00:49लिया।
00:50गुप्तचर ने आगे कापते हुए खुलासा किया कि पराक्रमी शत्रुघन और वीर पुषकल को भी वे बालक बंदी बना चुके
00:58हैं।
01:00यह अशुध प्रसंद सुनकर संपूर्ण अयोध्या के आकाश में मानो शोक के काले बादल मंदराने लगे।
01:08जब यह समाचार मिला कि महाबली लक्षमन भी युद्ध भूमी में मूर्चित होकर गिर पड़े हैं तो कोहराम मच गया।
01:17महर्शी वशिष्ठ ने अपनी योग द्रिष्टी से इस संकट की गहराई को भामपने का असफल प्रयास किया।
01:25राजसभा के योध्धा क्रोज से उबल पड़े और अपने अस्त्रशस्त्रों को थामने लगे।
01:31राज्य की सीमाओं पर तैनाज सैनेकों में भी इस भयानक पराजय की खबर आग की तरह फैल गई।
01:38तभी एक और संदेश्वाहक ने हाक लगाते हुए घोशना की की महाबली हनुमान को भी उन बालकों ने बांध लिया
01:46है।
01:47इस असंभव सत्य को सुनकर सभा में बैठे सभी मंत्रियों और सेनाप्तियों के होश उड़ गए।
01:55हनुमान जी की पराजय का समाचार पाकर संपून अयोध्या के प्राण मानो सूख से गए।
02:02अयोध्या के आकाश में उरते हुए पक्षी भी इस महा संकट के संकेत पाकर भैभीत होकर चीखने लगे।
02:10वशिष्ठ ने अपने आसन से उठकर गंभीर स्वर में कहा कि यह कोई साधारन बालक नहीं है।
02:18मंत्रियों ने हाथ जोड़ कर महर्शी से प्रार्थनाकी की वे इस संकट से राज्य की रक्षा करें।
02:25संपूर्ण राजमहल में अब केवल एक ही चर्चा थी कि आखिर वे तपोवन के वीर बालक कौन है।
02:33इस महा कोहराम के बीच अब पूरी अयोध्या की निगाहें केवल श्रीराम के अगले निर्णय पर टिक गई।
02:42मर्यादा पुरुशोत्तम श्रीराम ने अपने कक्ष में गंभीर मुद्रा में अपने दिव्यकोदंड और महाबली बानों को धारण किया।
02:50उनके चहरे पर प्रजा की रक्षा का संकल्प और उन वीर बालकों के प्रती एक अनोखा आत्मियस ने स्पष्ट जलक
02:58रहा था।
03:00उन्होंने अपने रत को तपोवन की ओर मोरने का आदेश दिया, जिससे संपूर्ण अयोध्या नगरी में एक नया रोमाच दोड़
03:08गया।
03:09रत के पहियों की गड़गड़ा हट से संपूर्ण धर्ती काप उठी और आकाश में देवता भी इस महायात्रा के साक्षी
03:17बनने लगे।
03:18श्री राम का यह प्रस्थान साधारण यात्रा नहीं था, बलकि यह मर्यादा और वात्सल्य के मिलन की एक अद्वितिय बेला
03:27थी।
03:28उनके सार्थी ने जब स्वर्ण रत की गती बढ़ाई तो हवाय भी उनके स्वागत में सुगंधित पुष्क बरसाने लगी।
03:35मार्ग में पढ़ने वाले रिशिमुनियों के आश्रमों ने इस महान प्रस्थान को देखकर श्री राम की जैजैकार की।
03:44तपोवन की सीमाएं अब निकट आ रही थी, जहां प्रकृती भी किसी अनहोनी की आशंका से शांत और गंभीर थी।
03:52श्री राम की द्रिश्टी उन सुदूर व्रिक्षों पर टीकी थी, जिनके पीछे वालमी की आश्रम का वह पवित्र रनक्षेत्र छिपा
04:01था।
04:02उनके हृदय में एक अजीब सा वेग उमड रहा था, मानो कोई भूला हुआ अतीत उन्हें अपनी और खीच रहा
04:10हो।
04:11उनके दिव्यधनुष की प्रत्यंचा की हलकी सी टंकार से संपूर्ण तपोवन की वायु में एक अध्भुत उर्जा का संचार हो
04:19गया।
04:20यह वहक्षन था जब धर्म की रक्षा के लिए पिता का कर्तव्य और वात्सल्य आमने सामने खड़े होने वाले थे।
04:28रत के रुकते ही श्री राम ने अपनी भूमी पर पग रखा और उनकी चरंधूली से वन की भूमी पवित्रहो
04:35उठी।
04:37उनके साथ आय सैनेकों ने चारों और मोर्चा संभाल लिया, किन्तु श्री राम ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।
04:45उन्होंने अकेले ही उस रणक्षेत्र में प्रवेश करने का निर्णै लिया, जहां उनके अपनों ने ही उन्हें चुनोती दी थी।
04:54पेड की शाखाओं पर बैठे पक्षी भी उस महान हस्ती के आगमन पर चुपचाप सहम कर बैठ गए थे।
05:01वालमी की आश्रम के द्वार पर पहुँचकर श्रीराम ने श्रधा से हाथ जोड़कर अपने गुरु और तपोवन को प्रणाम किया।
05:11उनकी इस विनमरता को देखकर आसमान से देवता भी फूलों की वर्शा करने लगे।
05:17अब वे उस स्थान पर खड़े थे जहां ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहसियों से परदा उठने वाला था।
05:25श्रीराम के उस एक कदम ने तपोवन के इतिहास और भविश्य दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया।
05:32श्रीराम के उस अलौकित पदारपन से रनभूमी की वायू में एक अद्भुत दिव्यता और गामभीर यचा गया।
05:40सामने की ओर दो तेजस्वी बालक निडर्ता से खड़े थे, जिनके मुखमंडल पर सूर्य जैसी दीप्ती चमक रही थी।
05:49उनके ठीक सामने अयोध्या के मूर्चित वीर योध्धा धूल में निश्प्रान से पड़े हुए थे।
05:56वीर महाबली हनुमान और भाता लक्षमन को बंधक रूप में देखकर रगुकुल नंदन की आखें आश्चर्य से विस्फारित हो गई।
06:04उस द्रिश को देखकर मर्यादा पुरुशोत्तम श्रीराम के हरिदय में उन अज्यात बालकों के प्रती वादसल्य का अनूठा जवार उमर
06:14पड़ा।
06:15बालकों के अदमय साहस और युद्ध कौशल ने त्रिलोकी के स्वामी को भी क्षणभर के लिए विस्मय में डाल दिया
06:22था।
06:24लव और कुष ने जब सामने खड़े महाबली श्रीराम को देखा, तो उनके बालहरिदय में भी असीम श्रद्धा और सम्मान
06:31जाग उठा।
06:45किन्तु उनके चहरे पर क्रोध के स्थान पर केवल स्नेहल जिग्यासा थी। बालकों के तेज को निहारते हुए श्रीराम समठ
06:54शुके थे कि ये सामान्य बालक नहीं बलकी किसी महान देस्टिनी के वाहक हैं।
07:00लव ने आगे बढ़कर अपनी माता सीता की सिखाई हुई वीर नीती का स्मरण करते हुए श्रीराम को नमन किया।
07:09चारो तरफ फैली उस अध्भुत शान्ती में प्रकृती भी मानो अपनी सांसे रोक कर इस मिलन की साक्षी बन रही
07:16थी।
07:18कुष ने भी अपने भाई के साथ कदम मिलाकर अपने पिता के समक्ष वीरता और विनय का अनूठा परिचय दिया।
07:26श्रीराम के चरण कमलों की धूल को देखकर दोनों बालकों के नेत्रों से प्रेम के अश्रुबह निकले।
07:33युद्ध की उष्णता अब धीरे-धीरे एक पवित्र पारिवारिक समवाद और आत्मिय मिलन में परिवर्तित हो रही थी।
07:42आस्मान से देवता पुष्प वर्शा कर रहे थे और गंधर्व लोक से मंगलगान की मधुर ध्वनिया सुनाई दे रही थी।
07:50यह वहक्षन था जब इतिहास अपने सबसे बड़े रहस्य के द्वार खोलने के लिए पूरी तरह तयार था।
07:59श्रीराम ने आगे बढ़कर दोनों बालकों को अपनी भुजाओं में समेटने के लिए अपने हाथ सने से फैला दिये।
08:07वह स्पर्ष ऐसा था जिसमें ब्रहमांड की समस्त उर्जा, शान्ती और वातसल्य समाहित था।
08:14और इस प्रकार अश्वमेध यग्य की रणभूमी एक अलोकिक पुनर्मिलन के पवित्र प्रांगण में बदल गई।
08:22श्रीराम की बाहों के इस अलोकिक वातसल्य से दोनों बालकों के हृदय में छिपा हुआ युद्ध का आकरोश क्षन भर
08:29में शान्त हो गया।
08:31आकाश मार्ग से देवगण इस द्रिश को देखकर आश्चर्यचित थे की कैसे अयोध्या के प्रतापी राजा ने इन अंजान बालकों
08:40को अपने सीने से लगा लिया है।
08:43लव और कुष ने भी अपने तीखे बानों को नीचे जुका लिया और उस दिव्य आलिंगन की उश्मा को अपने
08:50भीतर महसूस करने लगे।
08:53यह वहक्षन था जब ब्रह्मांड की समस्त उर्जा ने थमकर इस पिता और पुत्रों के दुलब मिलन के साक्षी बनने
09:00का निर्णय किया।
09:02श्री राम ने सनेह से बालकों के मस्तक को सहलाते हुए पूछा कि हे बीर बालकों तुम्हारी इस अध्भुत विद्या
09:10का स्रोत कौन है।
09:12महर्शी वालमीकी के आश्रम की पवित्र छाव में पलेब्धे उन बालकों के मुख पर अब उस असीम आदर और प्रेम
09:20का भाव था।
09:22कुष ने अपने पराक्रमी भाई लव की ओर देखा और फिर श्रधा से भरे स्वर में अपने गुरु वालमीकी का
09:29नाम लिया।
09:30उस महान रिशी का नाम सुनते ही श्री राम के नेत्रों में एक अज्याती और गहन करुणा का समुद्र उमड
09:37पड़ा।
09:38सेना के सभी योध्धा और भाई जो अभी तक इस युद्ध से विस्मित थे, अब इस शांत और पावंद रिश
09:46को देखकर स्तब्ध खड़े थे।
09:49लक्षमन और शत्रुग्न जो अभी अभी अपनी मूर्चा से उभरे थे, इस अद्वितिय मिलन के साक्षी बनकर अपनी आखों पर
09:57विश्वास नहीं कर पा रहे थे।
10:00महाबली हनुमान ने अपनी विशाल वानर मुद्रा को समेकते हुए इस पवित्र प्रसंग पर अपने दोनों हाथ जोड़ कर प्रभू
10:08को नमन किया।
10:09यह रनभूमी अब युद्ध के मैदान से अधिक किसी सिद्ध संथ के पावन आश्रम जैसी उलजा से परिपूर्ण हो गई
10:17थी।
10:18श्रीराम ने अत्यंत कोमल स्वर में उन दोनों बालकों से उनके कुल और माता के विशय में पूछना चाहा।
10:26बालकों के मन में अब कोई अहंकार नहीं बचा था, बलकि उनके भीतर एक अज्यात अपनापन और आदर जागरित हो
10:34चुका था।
10:36कुष ने विनमर्ता से उत्तर दिया कि वे महर्शी वालमी की के संरक्षन में पले हैं और रामायन की गाथा
10:43गाते हैं।
10:45रामायन का नाम सुनते ही संपूर्ण यग्यशाला में एक दैविय प्रतिध्वनी गूंच उठी मानो स्वय वेद प्रवाहित हो रहे हो।
10:54श्री राम के हरिदय में उस गाथा के प्रती एक गहरा खिंचाव महसूस हुआ जिसे इन बालकों ने अपनी स्वर
11:01लहरियों से सजाया था।
11:04आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी और गंधर्वों ने इस अध्वितिय समवाद के स्वागत में अपने दिव्यवाद्यों को बजाना शुरू
11:12कर दिया।
11:13पिता और पुत्रों के बीच की यह पहली समवाद श्रंखला ब्रहमाण के इतिहास में प्रेम और धर्म का सबसे बड़ा
11:21अध्याय बन गई।
11:22इस प्रकार बिना यह जाने की वे उनकी अपनी संतान हैं, श्रीराम ने उन बालकों को अपने जीवन का सबसे
11:31अनमोल्स ने प्रदान किया।
11:33रनभूमी के शान्थ होते हुए उस दिव्यवातावर्ण में अचानक एक अलोकिक तेज पुंज आकाश से उतरता हुआ दिखाई दिया।
11:43महर्शी वालमी की अपनी योगशक्ती और करुना की मूर्ती के समान रनभूमी के मध्यभाग में प्रकट हुए।
11:50उनके आगमन से संपूर्ण रनभूमी में एक शान्थ और पवित्र उर्जा का संचार हो गया, जिसने सारे युद्ध को थाम
11:58लिया।
12:00महर्शी वालमी की की उपस्थिती ने वहां उपस्थित सभी योध्धाओं और देवताओं को श्रधा से नत्मस्तक कर दिया।
12:08अपने हाथों को उपर उठा कर महर्शी ने दोनों पक्षों को तुरंत अपने शस्त्र नीचे रखने का आदेश दिया।
12:17उनकी वानी में इतनी शक्ती थी कि राजा श्री राम और वीर बालत लवकुष भी मंत्रमुग्ध होकर उन्हें देखने लगे।
12:25महर्शी ने प्रेम और शालीन्ता के साथ लव और कुष की ओर देखा, जिनके मुख पर अभी भी युद्ध का
12:32तेज था।
12:34वातावर्ण में एक गहरी शांती चा गई जब महर्शी ने अपने गुरु होने के नाते समवाद आरंभ किया।
12:42उन्होंने बालकों को संबोधित करते हुए कहा कि जिस महापुरुष से वे युद्ध कर रहे हैं, वे साधारन मानव नहीं
12:50है।
12:51महर्शी वालमीकी के इस कथन ने सभी की उच्सुकता को और अधिक बढ़ा दिया और हर कोई उनके अगले शब्दों
12:59की प्रतीक्षा करने लगा।
13:02बालकों के मन में आश्चर्य का सागर उमर पड़ा जब उन्होंने अपने गुरु को गंभीर मुद्रा में देखा।
13:09आकाश में स्थित देवता भी इस अध्भुत रहस्योद घाटन को सुनने के लिए अपनी विमानों में स्थिर हो गए।
13:17महर्शी ने स्पष्ट शब्दों में घोशना की की वे कोई और नहीं, बलकि स्वयं अयोध्या के चक्रवर्ती समराच श्रीराम है।
13:27यह सत्य सुनते ही लव और कुश के हाथों से उनके अस्त्र सहेज ही नीचे की ओर जुक गए।
13:34जिन्हें वे अपना शत्रु मानकर परास्त करने चले थे, वे तो उनके अपने आराध्य और पिता श्रीराम थे।
13:43सत्य के इस अलौकिक प्रकाश ने अज्यान के अंधकार को क्षण भर में ही नश्ट कर दिया।
13:50संपूर्ण सेना और उपस्थित रिशिमुनी इस पवित्र क्षण के साक्षी बनकर आनन्दित हो उठे।
13:57वालकों के हृदय में क्रोध का स्थान अब असीम श्रधा और प्रेन ने ले लिया था।
14:03युद्ध भूमी का वह रनक्षेत्र अब एक दिव्य मिलन स्थल में परिवर्तित हो चुका था।
14:10महर्शी वालमीकी ने मुस्कुराते हुए श्रीराम और उनके पुत्रों की ओर देखा, जिससे एक नए युग के आरंभ का संकेत
14:18मिला।
14:19महर्शी वालमीकी के इस अध्भुत सत्य को सुनकर लव और कुश अवाक रह गए और उनके हाथों से उनके अस्त्र
14:27सहेज ही भूमी पर गिर पड़े।
14:30बालकों के मन में पिता के प्रती जो अज्यात आक्रोश था, वह पल भर में अगाद श्रद्धा और गलानी के
14:37आसुओं में परिवर्तित हो गया।
14:40समूचे रणक्षेत्र में एक गेहन और पवित्र शान्ती छा गई, मानो साक्षात ब्रहमांड इस महानक्षन को अपनी पल के जुका
14:48कर नमन कर रहा हो।
14:50श्री राम के नेत्रों से प्रेम की अश्रुधारा बह निकली और उनके हृदय का वातसले वेग अपनी सभी सीमाओं को
14:58पार कर गया।
15:00अयोध्या के अधिपती चक्रवर्ती समराट श्री राम ने अपने दोनों वीर पुत्रों को अपनी बाहों में भरने के लिए अपने
15:07चरण आगे बढ़ाएं।
15:09महाबली श्री राम का वहरूब करुणा और वातसले का ऐसा सागर बन गया जिसने समस्थ ब्रहमांड के संताप को एक
15:17पल में सोख लिया।
15:19लव और कुष ने जब अपने पिता की असीम करुणा को देखा तो वे दोड़कर सीधे श्री राम की विशाल
15:26भुजाओं में समा गए।
15:29पिता और पुत्रों के इस मिलन से आकाश में देवता भी पुष्प वर्षा करने लगे और गंधर्व लोग के गीत
15:36गूंज उठे।
15:37अयोध्या के सेनापती शत्रुघन और वीर लक्षमन जो कुछ क्षण पहले मूर्चित थे इस दिव्य मिलन को देखकर अवाक रह
15:46गए।
15:47महर्शी वालमीकी की वीना से निकलने वाले स्वर इस एतिहासिक क्षण की पवित्रता को और अधिक दिव्यता प्रदान कर रहे
15:55थे।
15:56रिशिमुनियों और संतों ने इस पुनर मिलन को त्रेता युग का सबसे महान और पावन अध्याय घोशित किया।
16:03भूमी पर बिछा अश्वमेध यग्यका वह लाल रेश्मी आसन अब इस त्रदिव्य मिलन का गवाह बन चुका था।
16:12लव और कुष ने अपने पिता श्री राम के चर्नों में मस्तक जुका कर अपनी समस्त भूलों के लिए क्षमा
16:19याचना की।
16:20श्री राम ने अपने दोनों पुत्रों को प्रेम से उठाया और उनके मस्तक को अपने स्नेहपूर्ण हाथों से सहलाया।
16:29युद्ध भूमी की धूल अब शांत हो चुकी थी और वहा केवल मातरित्व, पितरित्व और संतान के पवित्र प्रेम का
16:36प्रकाश शेश था।
16:50पुत्रों का हाथ थाम कर यग्य मंडप की और प्रस्थान करने के लिए तैयार हुए। अयोध्या के राजकुमारों के रूप
16:58में लव और कुश की यह विजय गाथा इतिहास के पन्नों पर अमर हो गई। अश्वमेध यग्य के उस महान
17:06अनुष्ठान का समापन अब एक �
17:08ऐसी पूर्णाहुती के साथ होने जा रहा था जिसकी कलपना किसी ने नहीं की थी। पद्म पुरान के इस महार
17:16हस्य ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रेम और धर्म से बड़ा इस ब्रहमांड में कोई दूसरा बल नहीं है।
17:24महर्शी वालमीकी के आहवान पर जगज जन्नी माता सीता उस पवित्र भूमी पर वर्षों के निर्वासन के बाद राम और
17:33सीता का यह मिलन तपोवन और समस्थ देवी देवता पुष्प वर्षा करने लगते हैं।
17:40महर्शी वालमीकी के आहवान पर जगज जन्नी माता सीता उस पवित्र भूमी पर वर्षों के निर्वासन के बाद राम और
17:50सीता का यह मिलन तपोवन और समस्थ देवी देवता पुष्प वर्षा करने लगते हैं।
17:58महर्शी वालमीकी के आहवान पर जगज जन्नी माता सीता उस पवित्र भूमी पर
18:04वर्षों के निर्वासन के बाद राम और सीता का यह मिलन तपोवन
18:09और समस्त देवी देवता पुष्प वर्षा करने लगते हैं
18:15महर्शी वालमीकी के आहवान पर जगज जन्नी माता सीता उस पवित्र भूमी पर
18:21वर्षों के निर्वासन के बाद राम और सीता का यह मिलन तपोवन
18:26और समस्थ देवी देवता पुष्प वर्षा करने लगते हैं
18:31महर्शी वालमीकी के आहवान पर जगज जन्नी माता सीता उस पवित्र भूमी पर
18:38वर्षों के निर्वासन के बाद राम और सीता का यह मिलन तपोवन
18:43और समस्थ देवी देवता पुष्प वर्षा करने लगते हैं
18:48महर्शी वालमीकी के आहवान पर जगज जन्नी माता सीता उस पवित्र भूमी पर
18:54वर्षों के निर्वासन के बाद राम और सीता का यह मिलन तपोवन
19:00और समस्त देवी देवता पुष्प वर्षा करने लगते हैं
19:05महर्शी वालमीकी के आहवान पर जगजजन्नी माता सीता उस पवित्र भूमी पर
19:11वर्षों के निर्वासन के बाद राम और सीता का यह मिलन तपोवन
19:17माता सीता के दिव्यतेज और वातसल्यपूर्ण स्पर्ष से युद्ध भूमी की धूली एक अलोकिक सुगंधित कुझ में परिवर्तित हो गई
19:26देवराज इंद्र और अन्य देवतागन विस्मय से देख रहे थे कि कैसे माता सीता का प्रभाव मृत्युतुल्य मूर्चा को क्षण
19:34भर में नश्ट कर रहा है
19:37सबसे पहले महाबली हनुमान ने अपनी आखें खोली और अपने स्वामी श्री राम के चर्णों में स्वयं को समर्पित कर
19:45दिया
19:47हनुमान के उठते ही सम्पूर्ण तपोवन में राम भक्ती के दिव्यस पंदन गूंज उठे मानो स्वयं प्रकृती ने भी उनका
19:54स्वागत किया हो
19:56इसके पश्चात लक्षमन और शत्रुग्न धीरे-धीरे सचेत हुए और अपने सम्मुख प्रभु राम को साक्षात उपस्थित देख विमूढ हो
20:05गए
20:06प्रभु श्री राम ने मुस्खुराते हुए अपने अनुजों को हरिदय से लगा लिया जिससे युद्ध की सारी विभीशिका एक पल
20:14में मिट गई
20:16मूर्चित सैनिक भी माता सीता के आशिरवाद से स्वस्थ होकर उठ खड़े हुए और चारों और जै श्री राम के
20:23नारे लगने लगे
20:25आकाश से फूलों की वर्षा हो रही थी और दिव्यवाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनी से दिशाय गुझायमान हो उठी
20:33लव और कुष अपने माता पिता के इस मिलन को देखकर अभिभूत थे उन्होंने जुपकर प्रभुराम के चर्णों का वंदन
20:41किया
20:43ब्रह्मा जी और शिव जी अपने लोक से इस दिश्य को देखकर प्रसन्नता से भर उठे और उनका आशिरवाद भी
20:51वायुमंडल में समा गया
20:53सीता मया की दयालुता ने उस युद्ध भूमी को एक तपोवन की शांती में परिवर्तित कर दिया था जहां शत्रुता
21:01का कोई स्थान नहीं था
21:04अयोध्या के सैनिक जो अभी तक युद्ध की उनमाद में थे अब अपने अस्त्रशस्त्र त्याग कर प्रभु की महिमा में
21:11लीन हो गए
21:13प्रभु राम ने लव और कुष को अपने बाहुपाश में भर लिया जिससे पिता और पुत्रों का वह युगों पुराना
21:20मिलन पूर्ण हुआ
21:22पूरे वन प्रांत में पक्षियों का कलरव बढ़ गया और ऐसा प्रतीत हुआ जैसे स्वयन प्रकृती प्रभु के पुनर्मिलन का
21:29उत्सव मना रही है
21:32लक्षमन ने हाथ जोड कर माता सीता के प्रती अपना नमन प्रकट किया जो उनके लिए साक्षात शक्ती स्वरूपा थी
21:41हनुमान जी ने एक विशाल स्वर में जैगोश किया जिससे समस्त वानर सेना और योध्धाओं का उत्सा चरम पर पहुँच
21:49गया
21:50संपूर्ण वातावर्ण दिव्य उर्जा से भर गया था और ऐसा लगा मानो अयोध्या का सारा वैभव उस तपोवन में ही
21:58उतर आया हो
22:00महर्शी वालमी की इस अभूत पूर्व ग्रिश को देख कर मंदमंद मुस्कुरा रहे थे उनकी तपस्या सफल हो गई थी
22:09अश्वमेध का वह यग्य जो युद्ध का कारण बना था अब एक महाउत्सव में बदल गया था जिसमें भक्ती और
22:16प्रेम का वास्थ था
22:18राम और सीता की जोडी को साथ देख कर समस्थ ब्रहमांड ने एक सुर में उनकी जैजैकार की और वहक्षन
22:26इतिहास में अमर हो गया
22:29अयोध्या के विशाल प्रांगन में स्थापित यग्य मंडप में दिव्य वेदियों से उठती पवित्र अगनी की लप्टे संपूर्ण वातावर्ण को
22:37सुवासित कर रही थी
22:40महर्शी वशिष्ठ और अन्यकुल गुरूओं के वेद मंत्रों के उच्चारण से संपूर्ण ब्रहमांड में एक नई उर्जा का संचार हो
22:47रहा था
22:49समराच श्री राम और माता सीता के साथ यग्य कुंड के समीक विराजने से वह महानुष्ठान अपनी पूर्णता के चरम
22:57पर पहुँच गया था
22:59अयोध्या की स्वर्ण नगरी के भव्य शिखरों पर सूर्य की सुनहरी किरने पढ़कर इस एतिहासिक यग्य की दिव्यता को और
23:07अधिक बढ़ा रही थी
23:09लव और कुष अपनी माता सीता और पिता श्री राम के चर्णों में नत्मस्तक होकर इस महान उत्सव का हिस्सा
23:16बने
23:18रिशी वालमिकी के नेत्रों से बहते आनंद के अश्रु इस बात की गवाही दे रहे थे कि उनकी तपस्या का
23:25उद्देश सार्थक हो चुका है
23:28यग्य की पूर्णाहुती के समय छोड़े गए पवित्र घ्रित और समिधा की आहुती से आकाश में देवताओं के विमान प्रकट
23:36हो गए
23:37देवराज इंद्र समेच समस्त देवी देवता बादलों की ओट से पुष्प वर्शा कर इस अलोकिक द्रिश्य पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त
23:45कर रहे थे
23:47भरत और शत्रुगन ने आगे बढ़कर यग्य के घोडों और अनुष्ठान की सभी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप से सुसज़ित किया
23:57महर्शी नारद अपनी वीना पर नारायन के इस महामिलन के यश्का गान करते हुए त्रलोक्य में घूम रहे थे
24:05माता कौशल्या और अन्यरानियों ने सीता और उनके दोनों पुत्रों को सने से गले लगा कर अपनी मम्ता का आशिरवाद
24:12दिया
24:14स्वर्ण सीता की वह प्रतिमा इस बात का प्रतीक बन गई की धर्म और सत्य की विजय में प्रेन ही
24:20सबसे बड़ा संबल है
24:23संपूर्ण अयोध्या की जन्ता दीपों की मालाओं और रंगोलियों से सचकर इस अध्वितिय पुनर्मिलन का उत्सव मना रही थी
24:32महाबली हनुमान और लक्षमन ने भाईयों संग मिलकर इस एतिहासिक यग्य के समापन पर समस्थ ब्रहमांड का आभार व्यक्त किया
24:42यग्य की पवित्र वेदी से उठी अंतिम लपट ने संपूर्ण आकाश मंडल को सुनहरी आभा से उत्प्रोत कर दिया
24:50यह वहक्षन था जब इतिहास के पन्नों में अयोध्या का अश्वमेध यग्य धर्म और प्रेम की सर्वोच गाथा बन गया
24:59समराट श्री राम ने अपने दोनों पुत्रों लव और कुष को अपनी भुजाओं में भर कर संपूर्ण सूर्यवंश को गौरवान
25:06वित किया
25:08समस्त्रिशियों और मुनियों ने एक स्वर में श्री रामसिया के इस युगांतरकारी पुनरमिलन की दीरधायू की कामना की
25:16पद्म पुरान के इस महा अध्याय का समापन संपूर्न ब्रहमांड में शांती, प्रेम और धर्म की स्थापना के साथ हुआ
25:25यग्य की पूर्णाहुती के साथ ही सत्य और निष्ठा का यह अलौकिक अध्याय अनन्ट काल के लिए अमर हो गया
25:33यग्य की अगनी से उठती सुगंधित लप्ते स्वर्ग और प्रित्वी के बीच एक स्वर्णिन सेतु का निर्मान कर रही हैं
25:40जिससे संपून ब्रह्मांड में अलौकिक उर्जा का संचार हो रहा है
25:46श्री विष्णु ने गरूर पर आरूड होकर आकाश से इस महान धर्म संस्थापन को देखा और एक मंद मुस्कान के
25:54साथ संपून स्रिष्टी को अपना आशिरवात प्रदान किया
25:59महर्शी वालमीकी ने अपनी द्रिष्टी से भविष्य के कालचकर को देखा जहां श्री राम का यह यश गाथा मानवता के
26:06लिए प्रेणा का सबसे पावन स्रोत बन गई
26:10प्रकृती का हरकन, हवा की सरसराहट और बहती नदिया मानो एक साथ मिलकर धर्म की इस विजय का शंखनाद कर
26:18रहे हैं
26:20कैलाश के शिखरों पर विराजमान महादेव ने अपनी ध्यान मुद्रा से बाहर आकर त्रिशूल से दिव्य उर्जा के कंट छोड़े
26:28जो ब्रहमांड के अंत तक धर्म की रक्षा करेंगे
26:32माता पारवती ने मुस्कुराते हुए इस ब्रहमांडिय संतुलन को निहारा जहां प्रेम और कर्तव्य का मिलन सदा के लिए अमर
26:40हो गया
26:42स्वयं ब्रहमाजी ने इस यग्य के समापन को एक युग का परिवर्तनकारी क्षण माना जहां से सत्य और न्याय का
26:49नया सूर्य उदे हुआ
26:52आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी जैसे स्वया देवगन श्री राम और माता सीता के इस मिलन और धर्म
26:59के विजय पर अपना हर्ष व्यक्त कर रहे हो
27:03अयोध्या के जन्मानस ने जब यह सुना तो भक्ती के सागर में डूब कर उन्होंने प्रभो की जैजय कार की
27:10जो दूर दूर तक गुंजती रही
27:13श्री राम ने अपनी प्रजा और रिशियों को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म का मार्ग ही शांती का एक
27:20मात्र द्वार है
27:22मया सीता ने अपनी ममता और निष्ठा से धर्ती के उस कणकण को पवित्र कर दिया जहां उनके चरण पड़े
27:29थे
27:31यग्य स्थल के चारों और एक सुरक्षा धेरासा बन गया जो भविश्य की आने वाली पीढियों के लिए मर्यादा की
27:38एक अमर सीख बन गया
27:41हनुमान जी के हृदय में आज भी श्री राम का वही छवी बसी है जो इस यग्य के सफल समापन
27:47के बाद और भी अधिक प्रखर हो उठी है
27:52ब्रहमांड की सभी दिशाएं अब शान्त हो चुकी थी जैसे कोई गहरा सन्नाटा किसी महान सत्य का स्वागत करने के
27:59लिए आतुर हो
28:01पद्म पुरान का यह अध्याय अब अंतिम चर्णों में है जो बताता है कि त्याग ही जीवन का सबसे बड़ा
28:08अलंकार है
28:11समय की गती मानो थम गई जब इस महायग्य की पूरा हुती हुई और सत्य के प्रकाश ने असत्य के
28:18हर अंधकार को मिटा दिया
28:21रिश्यमुनियों ने अपने नेत्र बंद कर लिए इस दिव्य अनुभूतियों को अपने हृदय में संजोते हुए जो वे युगों तक
28:28लोगों को सिखाएंगे
28:30श्री राम ने समस्त लोग को अपना विराट रूप तो नहीं परंतु अपना प्रेमपूर्ण स्वरूप दिखाया जो प्रत्येक भक्त के
28:38अंतर्मन में समाया है
28:41पद्म पुरान का यह महारहस्य अब सम्पूर्ण मानवता की धरोहर है जो हर युग में धर्म की नई परिभाशा गड़ता
28:49रहेगा
28:50जब तक सूरज और चांद रहेंगे तब तक श्रीराम और माता सीता के इस पुनर्मिलन की पावन गाथा जनवरी से
28:58जनवरी के जीवन को प्रकाशमान करती रहेगी