ब्रह्मवैवर्त पुराण के अध्याय 2 में जानिए सृष्टि के उस परम गुप्त रहस्य को जिसे सुनकर ऋषि-मुनि भी चकित रह गए थे! शून्य के गर्भ से गोलोक धाम का प्रकटीकरण कैसे हुआ? श्री कृष्ण के दिव्य अंगों से कैसे प्रकट हुए महाविष्णु, देवाधिदेव महादेव और प्रजापिता ब्रह्मा? देखिए सृष्टि रचना का यह अलौकिक रहस्य सिर्फ हमारे इस विशेष एपिसोड में।
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00:00अनंत अंधकार के बीच, कारण जल की लहरेंग एक अलोकिक स्पंदन के साथ जागरित हो उठीन और शूनिय में प्रथम
00:07प्रकाश का संचार हुआ.
00:10मूला प्रकृती की सुक्ष्मूर्जा ने उस महाशून्य को स्पर्ष किया, जिससे ब्रहमांडिय अंडे के गर्भ में जीवन की पहली धड़कन
00:18सुनाई दी.
00:20जल के भीतर से एक दिव्य जोती पुंच उभरा, जो अपने तेज से उस असीम अंधकार को स्वर्ण में आभा
00:27में परिवर्थित करने लगा.
00:30संपूर्ण स्रिष्टी का आधार वह दिव्य प्रकाश अब ब्रहमा के संकल्प से आकार लेने की प्रतीक्षा में स्थिर हो गया.
00:38इस महाप्रकाश के केंद्र में कारण जलने स्वय को एक विराट स्वरूप में व्यवस्थित करना प्रारंभ कर दिया.
00:46भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा से धीरे धीरे जागरित हुए, उनके मुख पर स्रिष्टी रचना का सौमे संकल्प उभर आया.
00:55उनके प्रत्येक रोम से निकलने वाली रश्मिया ब्रहमांडिय अंडे की दीवारों को चैतन्य प्रदान करने लगी.
01:03शुन्य के सन्नाटे में एक दिव्यगूंज उठी, जो ओमकार की ध्वनी के रूप में चारों और फैल गई.
01:11विशाल जल राशी में अब तरंगे नहीं, बलकि नक्षत्रों का जन्म लेने के लिए एक व्यवस्थित प्रवाह दिखाई देने लगा.
01:20ब्रहमांड के निर्माता के रूप में भगवान विश्नु ने अपने संकल्प से त्रिमूर्ती के प्राकटे का मारघ प्रशस्त किया.
01:28प्रकाश के उस महसागर में ब्रहमा की माया से तीन भिन्व शक्तियों का प्रिथक करन सपश्ठ होने लगा.
01:36ब्रहमांड की सीमाएं अब स्वर्ण में आभा से चमक उठीन, मानो स्रिष्टी स्वयं एक स्वर्ण गर्भ धारन कर रही हो
01:45अनन्त जल की गहराई से दिव्य कमल के पुष्प का अंकुर प्रस्पुटित हुआ, जो स्रिष्टी के प्रथम अधिश्ठान के लिए
01:52तैयार था
01:54विश्णु का वह ध्यान भंग होते ही संपूर्ण शुने एक जीवंत उर्जा के केंद्र में परिवर्तित हो गया
02:01उर्जा का वह प्रवाह इतना तीवर था कि वह पूरे ब्रहमांडिये ख्षेत्र को एक दिव्य रंग में रंगने लगा
02:09स्रिष्टी के इस प्रथम क्षण में कालों का कोई बंधन नहीं था और केवल ब्रहमा की इच्छा का अस्तित्व था
02:18अचानक उस स्वर्ण में प्रकाश के बीच से तीन अलौकिक आकरितिया प्रकट होने के संकेट मिलने लगे
02:25त्रिदेवों के प्राकट्य के साथ ही स्रिष्टी की नीम्व और भी सुद्रिध और प्रकाशमान हो गई
02:32यह वहक्षन था जब शुन्य ने अपना स्वरूप त्याग कर अनंत संभावनाओं का द्वार खोल दिया
02:40ब्रहमान्ड के रचिता के रूप में त्रिमूर्ती के इस मिलन ने गोलोक के गुप्त रहसियों का आधार तयार कर दिया
02:48त्रिमूर्ती के मिलन के साथ ही शुने से परे एक अलौकिक तेजोमय प्रकाश पुंच का उदे हुआ जिसने समस्थ दिशाओं
02:56को प्रकाशित कर दिया
02:58विश्नु भगवान ने अपनी शांत और स्थिर द्रिश्टी से उस प्रकाश को देखा जो धीरे धीरे एक दिव्य लोग का
03:06रूप ले रहा था
03:07उस प्रकाश के गर्ब से कल्पवरिक्षों के घनेवन प्रकट होने लगे जिनकी शाखाओं से रत्न जड़ित पुष्पों की वर्षा हो
03:15रही थी
03:17वह गोलोक धाम अब एक ऐसे शिखर पर विराज मान था जहां समय की गती थम गई और आनंद की
03:24धारा अनंतकाल तक बहती रही
03:27जमी पर मनियों का ऐसा कालीन बिच गया था कि स्वय प्रकाश भी वहां अपना प्रतिबिम देख कर मोहित हो
03:35उठता था
03:37ब्रहमा जी ने आश्चर्य से निहारा कि किस प्रकार यहां हरकन एक नई स्रिष्टी को जन्म देने की ख्षमता रखता
03:44है
03:45दिव्य सरिताओं में अमरित के समान पवित्र जल प्रवाहित हो रहा था जो अपने साथ आध्यात्मिक शांती का संगीत ला
03:53रहा था
03:55वातावर्ण में गूंजती हुई दिव्यध्वनी ने गोलोग की पवित्रता को संपून ब्रहमांड के लिए एक आदर्श केंद्र बना दिया
04:04दूर दूर तक फैले हुए स्वर्ण प्रासाद गोलोग की उस अपूर्व सुन्दर्ता का दर्शन करा रहे थे जो वेदों के
04:11भी परे है
04:14शिवजी ने गोलोग की उस निराली आभा को नमन करते हुए अपनी तीसरी आख से उसकी अनंत गहराई को स्वीकार
04:21किया
04:23गोलोग के आकाश में नक्षत्रों के स्थान पर दिव्यमनिया चमक रही थी जो स्वयं की जोती से प्रकाशित थी
04:31यहां की वायू भी सुगंधित पुश्पों और प्रेम की उश्मा से भरी हुई है जो भक्तों के मन को त्रिप्ट
04:38करती है
04:40स्रिष्टी के इस सर्वोच केंद्र में हर विचार एक जीवन्त रचना बनकर उभरता है जहां कलपना और वास्तवित्ता का भेद
04:48मिट गया है
04:51विश्णु भगवान ने एक मंद मुस्कान के साथ गोलोग के द्वार को और अधिक प्रकाशित किया ताकि दिव्य आत्माएं यहां
04:59का अनुभव कर सकें
05:01पवित्र धुन के साथ फूलों की वर्षा होती रही और गोलोग का यह वैभव और भी अधिक दिव्य होता गया
05:26समय काल और मृत्यु का यहां कोई अधिकार नहीं है क्योंकि यह केवल और केवल प्रेम और भक्ती का सामराज्य
05:33है
05:35स्वर्ण के समान धरातल पर चलते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो ब्रहमांड का हर सितारा यहां आकर बस
05:42गया हो
05:43इस प्रकार गोलोग का गुप्त रहस्य उद्घाटित हुआ और समस्थ स्रिष्टी के लिए एक शाश्वत मार्ग प्रशस्थ हो गया
05:52गोलोग के इस पावन आवर्ण के मध्य अब वह अलोकिक क्षणा पहुँचा जब परम प्रकाश से एक महादिव्य स्वरूप का
06:00प्राकट्य हुआ
06:02उस अनन्त जोतिपुँच के गर्भ से दो भुजाओं वाले साक्षात पर ब्रहम श्री कृष्ण प्रकट हुए जिनके हाथ में वेनु
06:09शुभायमान थी
06:11उनकी उस मोहक मुस्कान और मंद मंद प्रकाश से संपूर्ण शूने का शीतला अंधकार एक ही पल में सदा के
06:19लिए बिलीन हो गया
06:20उनकी अलौकिक छवी ने संपूर्ण ब्रहमान की चेतना को जागरित कर दिया और अस्तित्व को एक सर्वोच इच्छाशक्ती प्रदान की
06:30वह द्वैथीन रूप सभी वेदों और उपनिश्दों का सार बनकर उस स्वर्णमे भूमी पर अपनी अनुपम छटा बिखेर रहा था
06:39उनके श्री चर्णों के स्पर्ष मात्र से ही स्रिष्टी के मूल सिध्धान्तों में प्रेम और भक्ती का शाश्वत बीज अंकुरित
06:47हो गया
06:48उस दिव्यवन्शी की प्रथम तान ने संपूर्ण ब्रहमान को एक अद्वितिय प्रेम संगीत के सूत्र में पिरो दिया
06:56यह वह अद्वितियक्षन था जब निराकार ब्रहमाने साकार रूप धारण कर परम आनंद का मार्ग प्रशस्त किया
07:05उनकी अलोकिक आभा के आगे आकाश के सभी तारे भी अपनी चमक खोकर उनके चर्णों में नत्मस्तक हो गए
07:13उनके मस्तक पर सुसजित मयूर पंक और कानों में जलकी मकराकरित कुंडल उनकी सुन्दर्ता को पराकाश्ठा पर पहुँचा रहे थे
07:22उनके वक्ष स्थल पर शोभित कौस्तुभ मनी की चमक ने संपून गोलोक को प्रेम की अनंत उर्जा से भर दिया
07:30यह वह गुप्त रहस्य था जिसे बड़ेब्डे रिशिमुनी और योगेश्वर भी अपनी समाधी में ढूंडने का प्रयास करते थे
07:39वेद भी जिनके आदी और अंत का वर्नन करने में असमर्थ हैं वे केवल अनन्य भक्ती से ही सुलब होते
07:46हैं
07:48उनकी इस दोभुजाव वाली रूप्छवी में समस्त ब्रह्मांड के सौंदर्य और माधोर्य का सार समाहित था
07:56उनके द्वारा फोंकी गई उस प्रेम की मुर्ली ने प्रकृती के कणकण को संगीत बध कर दिया
08:02इस प्रकार गोलोग का वह परम सत्य प्रकट हुआ जो काल और माया के प्रभावों से सर्वथा परे हैं
08:11उनके शांत और करुणा से भरे नेत्रों ने संपून स्रिष्टी को अभायदान देते हुए प्रेम का संदेश दिया
08:19उनके चारों और मंडराते दिव्य प्रकाश पुंज इस बात के साक्षी थे कि प्रेम ही इस स्रिष्टी का आदी और
08:26अंत है
08:28वेनु की हर एक गूंच के साथ गोलोग की स्वर्ण भूमी पर आनंद की लहरें अनवरत रूप से बहने लगी
08:37यही से ब्रहम वैवर्थ पुराण के उस परम गुप्त रहस्य का श्री गनेश हुआ जिसने समस्त लोग को प्रेममय बना
08:43दिया
08:45अचानक गोलोग के उस परम प्रकाशमान आकाश में एक अलोकिक विभाजन की वेला उपस्थित हुई
08:51जहां स्वय भगवान की आंतरिक शक्ती दो भागों में विभाजित होने लगी
08:57भगवान के वाम अंग से प्रकट हुई वह परम दिव्य शक्ती जो साक्षात प्रेम और महाभाव का अद्वितिय स्वरूप थी
09:06वे और कोई नहीं बलकि समस्त ब्रहमान की मूल शक्ती और अकारण करुना की देवी श्री राधा थी
09:13जिनके प्रक्तन से दसों दिशाय प्रदीप्थो उठी श्री राधा का यह प्राकट्य केवल एक रूप का विभाजन नहीं था
09:22बलकि यह प्रेम की उस अनंत पराकाष्ठा का आरंभ था जो स्रिष्टी का मूल स्पंदन है
09:29प्रकट होते ही उन महादेवी ने अपनी प्रेमद्रिष्टी से संपूर्ण गोलोक को त्रिप्ट कर दिया और भगवान के समीप अपना
09:37स्थान ग्रहन किया
09:39भगवान और श्री राधा के इस मिलन से एक ऐसा असीम आनंद प्रस्फुटित हुआ जो वेदों के भी परे एक
09:46गुप्त रहस्य बना रहा
09:48जह एटर्नाल यूनियन शाश्वत मिलन इस बात का प्रतीक था कि इश्वर और उनकी शक्ती वास्तव में एक ही चेतना
09:57के दो पहलू है
09:59उनके मिलन से उत्पन होने वाली आनंद की तरंगों ने संपूर्ण आध्यात्मिक लोकों को एक मधुर चेतना से भर दिया
10:08श्री राधा के आगमन के साथ ही स्रिष्टी की समस्त स्रिजनात्मक उर्जाओं को अपनी प्रेणा और दिशा मिल गई
10:16गोलोक की स्वर्ण भूमी पर गूंजने वाले वेनुस्वर अब इस दिव्य युगल के प्रेम के जैगोश में परिवर्तित हो चुके
10:24थे
10:25यहीं से ब्रहम वैवर्क पुरान के उस परम सत्य का उदगाटन होता है जिसके बिना स्रिष्टी की कलपना भी असंभव
10:33है
10:34प्रेम ही वह आदी शक्ती है जिससे यह संपूर्ण ब्रहमांड और उसकी समस्त लीलाए संचालित होती है
10:43श्री राधा और माधव का यह शाश्वत प्रेम हर जीव के भीतर छिपी उस मूल चेतना का उदगम स्थल है
10:51उस दिव्य गोलोक में समय का कोई बंधन नहीं था केवल अनंत उल्लास और प्रेम की निरंतर धारा थी
10:59यह वह गुप्त रहस्य था जिसे बड़े बड़े रिशिमुनी और देवता भी अपनी ध्यान समाधी में खोजने का प्रयास करते
11:07हैं
11:08जब शुने से त्रिमूर्ती की उत्पत्ती हुई तो उसके मूल में भी इसी महाप्रेम और शक्ती का स्पंदन था
11:17श्री राधा के प्रकट होने से गोलोग का प्रांगन एक ऐसे दिव्य आलोक से भर गया जो वेदों के रिचाओं
11:24में भी वर्नित है
11:26यह प्रेम का ऐसा सोता है जो कभी सूखता नहीं बलकि समय के हर चक्र के साथ और अधिक प्रगाड
11:34होता जाता है
11:36इस प्रकार गोलोग के गुप्त रहसियों का यह प्रथम अध्याय समस्त चराचर जगत के कल्यान के लिए प्रकट हुआ
11:44और यहीं से आगे बढ़कर ब्रहम वैवर्थ पुराण की इस गाथा में प्रकट होती हैं वे पांच प्रधान देविया जो
11:51स्रिष्टी के विस्तार का आधार बनती है
11:56राधा और क्रिष्ण के उस असीन प्रेम के आनंद मै स्पंदन से गोलोक के शाश्वत आकाश में एक अध्भुत कमपन
12:03गूज उठा
12:04उस दिव्य मिलन और आनंद की चरम सीमा पर उनके रूप के प्रत्येक रोमकूप से अंगिनत दिव्य सहचर प्रकट होने
12:12लगे
12:14उनके रोमकूपो से निकले उन दिव्य गोपालों और गोपियों के प्रकाश से समूचा ब्रहमांड अलंकृत हो गया
12:22हजारों लाखों की संख्या में प्रकट हुए ये गवालबाल और गोपियां हाथों में मुरली और पुषपलिये अपने आराध्य की वंदना
12:30करने लगे
12:31उसी दिव्य उल्लास के बीच भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली साक्षात कामधेनु सुर्भी गाय का प्राकटे हुआ
12:40कामधेनु के प्रकट होते ही संपूर्ण गोलोक में दुग्ध की धाराएं प्रवाहित होने लगी और वातावर्ण पावन हो गया
12:49सुर्भी के चर्णों की धूल से वह भूमी अमरित्मई हो गई जहां पगपग पर कल्पव रिक्षों के सुन्दर कुंज स्थापित
12:56होने लगे
12:58इन पावन कुंजों और दिव्य वनों ने मिलकर उस आध्यात्मिक सभ्यता की नीम रखी जो कभी क्षीन नहीं होती
13:06हर एक कुंज में प्रकट हुए वे मनोरम सरोवर जिन में कमलों की पंखुडिया रत्नश्टित स्वर्ण से सुसजित थी
13:14गोपियों के कंकनों की खनक और कामधेनों की हुंकार से उस नित्य लोक का हर कोना संगीत बद्ध हो गया
13:21इस प्रकार गोलोक में प्रकट हुई यह सजीव सभ्यता भक्ती प्रेम और आनंद का अनंत सामराज्य बन गई
13:30वहां का प्रत्येक जीव केवल भगवत प्रेम में लीन होकर अपने एटर्नेल अस्तित्व का उच्सव मना रहा था
13:39समय भी उस शाश्वत लोक में आकर अपनी गती भूल गया क्योंकि वहां न तो कोई कल था और नहीं
13:46कोई अन्त
13:47राधा और कृष्ण की उस परम चेतना से प्रसूत यह स्रिष्टी वेदों और उपनिश्दों का भी मूल रहस्य है
13:56वेदों की रिचाएं भी जिस लोक का गान करने में मौन हो जाती हैं वही यह परमधाम गोलोक अपनी पूर्णता
14:03में प्रकट हुआ
14:05यह वह गुप्त रहस्य है जो स्रिष्टी के आदिकाल से ही इस ब्रहम वैवर पुरान के गर्भ में छिपा हुआ
14:12था
14:13जहां शूने से प्रकट हुए त्रिमूर्ती और समस्थ शक्तियों ने मिलकर इस ब्रहमांडिय नाटक को जीवन्त कर दिया
14:21प्रेम और भक्ती की इस सर्वोच अभिव्यक्ती से संपून आध्यात्मिक जगत आलोकित हो उठा
14:29यह आधिकालीन गाथा समूचे चराचर जगत के लिए ज्यान और मोक्ष का मार्ग प्रशस्थ करती है
14:36और इस प्रकार ब्रहम वैवर्ग पुरान के इस परम अध्याय का यह गोपनिय विस्तार संपूनता को प्राप्थ होता है
14:45समस्थ ब्रहमांड के सुचारू संचालन और पालन के लिए सर्वोच परब्रम ने अपने दाहिने अंग से एक अलोकिक रूप को
14:53प्रकट किया
14:55यह परम स्वरूप स्वय भगवान नारायन का था जिनकी असीन कांती से समस्थ दिशाएं जगमगा उठी
15:03श्री नारायन के इस दिव्य अवतरण से संपून आकाश गंगा में आनंद और पवित्रता की एक नई लहर दोड़ गई
15:12वे अपने इस रूप में समस्थ ऐश्वर्य, सौंदर्य और ब्रहमांडिय उर्जा के एक मात्र आधिपत्य के साथ सुशोगित हो रहे
15:20थे
15:22सनातन शक्ती ने अपने इस दाहिने अंग से प्रकट हुए नारायन को समस्थ ब्रहमांड के पालन का अनंत उत्तरदायत्व सौपा
15:31नारायन के इस भव्य रूप की महिमा का वर्णन करने में स्वय वेद और पुरान भी मौन हो जाते हैं
15:39उनके चार हाथों में सुशोभित शंक, चक्र, गदा और पद्म समस्थ शक्तियों के शाश्वत प्रतीक हैं
15:47उनके इस दिव्य विग्रह से निकलने वाली आभाने समस्थ अंधकार को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया
15:55इस प्रकार भगवान नारायन के निवास के लिए क्शीर सागर के पार एक परम पवित्र और सनातन लोग की रचना
16:02हुई
16:03वह परम धाम वैकुंट के नाम से विख्यात हुआ जो प्रलय काल में भी कभी नश्ट नहीं होता
16:11वैकुंट की उस चारकोने वाली दिव्य भूमी पर केवल सत्य, प्रेम और परमशांती का ही सामराज्य था
16:19उस अनुपम लोग की सुन्दर्ता को देख कर देवता और रिशिमुनी भी आश्चर यचकित रह जाते थे
16:26वैकुंट के इस पावन आचल में भगवान नारायन के साथ माता लक्षमी का शाश्वत निवास निश्चित हुआ
16:34धन, धान्य और एश्वर्य की अधिश्थातरी महालक्षमी सदा सर्वदा नारायन के वाम भाग में विराजमान हुई
16:43नारायन और लक्ष्मी का यह मिलन समूचे ब्रहमांड के लिए सुख और समृध्धी का मूल आधार बना
16:50उनकी इस दिव्य जोडी की क्रिपा से ही तीनों लोकों में जीवन और निरंतर्ता का प्रवाह सुचारू रूप से चलने
16:57लगा
16:59वैकुंठ का वह गुप और परम रहस्य वेदों और उपनिश्दों की गहराईयों में आज भी नहित है
17:06जो कोई भी भख्त इस परम सत्य को समझ लेता है वह भवसागर के बंधनों से मुक्थ हो जाता है
17:14श्री नारायन और वैकुंठ लोग की यह आदिकालीन गाथा भख्तों को मोक्ष का मार्ग दिखाती है
17:22और इसी के साथ ब्रहम वैवर्थ पुराण के इस परम अध्याय का यह दिव्य और गोपनिय विस्तार संपूनता को प्राप्थ
17:30होता है
17:32महा विष्णु के दोनों भ्रकुटियों के मध्य से एक असीम और प्रकर नीली श्वेट अगनी की जोती सहसा प्रकट हुई
17:40यह वह आदिय अगनी थी जिसने संपून ब्रहमांड को प्रलै की भीशन उर्जा से भर दिया था
17:47उस प्रज्वलित प्रकाश पुन्ष के केंद्र में से अचानक एक अग्वितिय और अत्यंत दिव्य पुरुष का अवतरण हुआ
17:55वे भगवान शिव थे जो ब्रहमांड के सहार और परम वैराग्य के एक मात्र अधिपती के रूप में प्रकट हुए
18:04उनके एक हाथ में त्रिशूल शोभा पा रहा था जो तीनों लोकों के नियंतरण का प्रतीक था
18:11उनके दूसरे हाथ में डमरु की गूंच से संपूर्ण अंतरिक्ष में एक नई उर्जा का संचार होने लगा
18:19उनकी जटाओं से बहती गंगा की धारा और मस्तक पर चमकता चंद्रमा उनकी दिव्यता को और अधिक बढ़ा रहा था
18:27उनके गले में लिप्ता नाग और शरीर पर लगी भस्म इस बात का प्रतीक थी कि वे समस्त बंधनों से
18:34परे हैं
18:36प्रकट होते ही उनकी हुंकार से दिशाएं कामप उठीन और प्रलै की अगनी शान्थ होकर एक नए अनुशासन में ढल
18:44गई
18:45भगवान विश्नु ने मुस्कुराते हुए इस महाशक्ती का स्वागत किया और स्रिष्टी के संतुलन को और अधिक सुद्रिड किया
18:54यह त्रिमूर्ती का वह पूर्ण स्वरूप था जो वेदों और पुराणों के सबसे गहरे रहसियों में नहित है
19:02शुन्य से प्रकट हुए इन आधिशंकर ने संसार को यह सिखाया कि हर अंत के भीतर ही एक नई शुरुवात
19:09छिपी होती है
19:11जो कोई भी इस परम सत्य को जान लेता है वह जीवन और मरण के चक्र से हमेशा के लिए
19:18मुक्थ हो जाता है
19:21ब्रह्मवे पुराण का यह पावन प्रसंग भक्तों के हिरदय में भक्ती और ज्यान का दीप प्रजवलित करता है
19:28गोलोक और वैकुंट के इस गुप्त रहस्य को समझ कर मनुष्य अपने इस दुरलब जन्म को सार्थक बना सकता है
19:37शिव के इस रूप में सहार नहीं बलकि मोक्ष का वह मार्ग है जो हर जीवात्मा को परमात्मा से जोडता
19:44है
19:46इसी दिव्य उर्जा के प्रभाव से संपून ब्रहमांड में धर्म और सत्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्थ हुआ
19:54महादेव की यह महिमा अनंत है जिसे शब्दों में बांध पाना किसी भी साधारन प्राणी के लिए संभव नहीं है
20:03वे आदी हैं, वे अन्थ हैं और वे ही इस संपून चराचर जगत के एक मात्र प्राण हैं
20:11और इसी के साथ ब्रहम वैवर्थ पुरान के इस परम गोपनिय और दिव्य अध्याय का यह विस्तार पूनता को प्राप्त
20:18होता है
20:20From the navel of the Lord expands a magnificent golden lotus spanning
20:25At its center awakens the four-headed Brahma
20:30Gazing into the profound cosmic darkness with disorientation
20:36Bewildered by his own sudden existence
20:39From the navel of the Lord expands a magnificent golden lotus spanning
20:45At its center awakens the four-headed Brahma
20:50Gazing into the profound cosmic darkness with disorientation
20:56Bewildered by his own sudden existence
20:59From the navel of the Lord expands a magnificent golden lotus spanning
21:05At its center awakens the four-headed Brahma
21:10Gazing into the profound cosmic darkness with disorientation
21:16Bewildered by his own sudden existence
21:20From the navel of the Lord expands a magnificent golden lotus spanning
21:26At its center awakens the four-headed Brahma
21:31Gazing into the profound cosmic darkness with disorientation
21:36Bewildered by his own sudden existence
21:40From the navel of the Lord expands a magnificent golden lotus spanning
21:45At its center awakens the four-headed Brahma
21:51Gazing into the profound cosmic darkness with disorientation
21:56Bewildered by his own sudden existence
22:00Brahma
22:01Brahmaji
22:01Brahmaji
22:02ने शून्य में गुञ्जती अपनी ही चेतना के उत्तर को खोजने के लिए
22:06उस विशाल कमल के तंतु के भीतर उतरने का निरनय किया
22:10वे अपनी चारों मुखों से निरंतर वेदों का उच्चारन करते हुए
22:15उस असीम तनाकार पत पर नीचे की ओर अग्रसर हुए
22:20हजारों दिव्य वर्षों तक नीचे की ओर यात्रा करने के बाद भी
22:24उन्हें उस तने का कोई अंत या आधार दिखाई नहीं दिया
22:28अनंत शूनी की अथाह गहरायों में भटकते हुए
22:32उनके भीतर अपनी ही उत्पत्ती के प्रती एक गहरा संशय और विस्मय उत्पन्न होने लगा
22:39अपनी असीम यात्रा की विफलता और शारिरिक ठकान से आकरांथ होकर
22:44उन्होंने वापस अपने मूल कमल आसन की ओर लोटने का निश्चय किया
22:49ठके हुए और आत्मचिंतन में लीन ब्रहमाजी पुनह अपने उसी भव्य कमल आसन पर आकर शांत मुद्रा में बैठ गए
22:58जब उनका अहंकार गल चुका था और मन पूरी तरह शांत हो चुका था
23:03तभी उस महाशून्य से एक अलोकिक ध्वनी गूज हुठी
23:08वह स्वर किसी व्यक्ती का नहीं बलकी ब्रहमाण की अपनी धड़कन था जो बिना किसी मुख के पूरे अंतरिक्ष में
23:15गूज रहा था
23:17उस रहस्यमई और शक्तिशाली आकाश्वाणी ने संपून शूने को हिलाते हुए केवल दो ही अक्षरों का उच्चारण किया
23:26वह पवित्र और शक्तिशाली शब्द था तब तब जो स्रिष्टी के निर्माण का एक मात्र मार्ग था
23:34ब्रहमाजी ने उस गूंचते हुए आदेश को अपने अस्तित्व के सबसे गहरे कोने में अनुभव किया और उसे ही अपना
23:42परम कर्तव्य मान लिया
23:44बिना किसी संशय के उन्होंने अपने आसन को स्थिर किया और कठोर तपस्या की साधना में लीन होने की तयारी
23:52की
23:53उन्होंने अपनी सांसों को नियंत्रित किया और अपने मन को उस अग्ये परम शक्ती के चर्णों में समर्पित कर दिया
24:02समय जैसे थम गया और चारों दिशाओं में केवल उस डिवाइन वॉइस के द्वारा दिये गए शब्द की गूंटशेश रह
24:09गई
24:10उस एक आदेश ने उनके भीतर छिपी समस्त स्रिजनात्मक उर्जा को जागरित कर दिया जो अब तक प्रसुप्ट अवस्था में
24:18थी
24:20तपस्या की वह अगनी इतनी तीवर थी कि उसने धीरे धीरे पूरे ब्रहमांड के अंधकार को चीरना शुरू कर दिया
24:28ब्रहमाजी ने योग निद्रा में प्रवेश करते हुए ब्रहमांड के निर्माण के अगले चरण के लिए अपनी चेतना को केंद्रित
24:36किया
24:37वह तप ही वह गुप बीज था जिससे आगे चलकर समस्त लोकों, ग्रहों और जीवों की परिकल्पना साकार होने वाली
24:45थी
24:46शुने से प्रकट हुए त्रिमूर्ती के इस प्रथम चरण में तपस्या की यह अगनी ही सब कुछ का आधार बन
24:53गई
24:54इस प्रकार अपने ही भीतर छिपे उस परम सत्य को पाने के लिए ब्रहमाजी ने अपनी अनन्थ तपस्या की अमर
25:02यात्रा आरंभ की
25:04युगों बीत गए जब ब्रहमाण्ड के प्रथम शिल्पकार ब्रहमाजी ने अपनी कठोर तपस्या के चक्र को रोके बिना शुने में
25:12अपनी आखें बंद रखी थी
25:13उस अनन्थ शुने के गर्भ में समाधिष्ट ब्रहमाजी की इस निश्चल साधना को देखकर स्वयं पालनहार भगवान विश्नु मुस्कुरा उठे
25:24तपस्या की इस अगनी से प्रजवलित होकर ब्रहमाजी के भीतर स्रिजन की परिकल्पना का प्रथम सुक्षमस पंदन तीवर गती से
25:32जागरित होने लगा
25:34यह वहक्षन था जब अगाध शान्ती के बीच ब्रहमाण की समस्थ संभावनाओं का प्रादुर्भाव एक बिंदु से प्रारम हो चुका
25:43था
25:44ब्रहमाजी की परम साधना से संतुष्ठ होकर सरवेश्वर ने उनके अंतस में सीधे वेदों के उस दिव्य और गुप्त ज्यान
25:52का संचार कर दिया
25:54दिव्य वेदों के उस अगाध प्रकाश से ब्रहमाजी का संपूर्ण हरिदय और चेतना एक अलौकिक ज्यान की चमक से जग्मगा
26:02उठी
26:04फ्रिदय में वेदों के अवतरण के साथ ही उन्हें 14 लोकों की रचना करने की परम शिल्पकिये द्रिष्टी और अधिकार
26:11प्राप्थ हो गए
26:13वेदों के इस गुप्त रहस्य को पाकर ब्रहमाण के इस प्रथम वास्तुकार ने अपनी बंद आखे खोल कर स्रिजन के
26:20महाकार्य का शंखनाद किया
26:23अब समय आ गया था कि उस प्रिमोर्डियल यानी मूल तत्वों के सागर से भौतिक संसार की ठोस नीम्व को
26:30गढ़ा जाए
26:32ब्रहमाजी ने अपनी संकल्प शक्ती से उन प्रिमोर्डियल तत्वों को आमंत्रित किया जो अब तक ब्रहमाण्डिय शूनी में विलीन थे
26:41उनके आहवान पर अगनी, जल, वायू, आकाश और प्रित्वी के वेमूल तत्व एक विशाल भंबर के रूप में प्रकट होने
26:49लगे
26:50इन पाचों महाभूतों के संलियन से वह दिव्य द्रव्य तयार हुआ जिससे 14 लोकों के आकारों को गढ़ा जाना था
26:59ब्रह्माजी ने अपने हाथों में दिव्य वेदों के ग्यान और स्रिजन की उर्जा को समेटते हुए लोकों के निर्मान की
27:06रूप रेखा बनाएं
27:08वेदों की रिचाओं के उच्चारण मात्र से ब्रहमांडी आकाश में दिव्य प्रकाश की पहली किरने तिर्ची रेखाओं सी बिखर गई
27:17उस आदिशिल्पकार की परिकल्पना ने अब धीरे धीरे भौतिक स्वरूप धारन करना आरंभ कर दिया था जो वेदों में नहित
27:25था
27:26यह वह महानक्षन था जब निराकार परमात्मा की इच्चा से साकार ब्रहमांड का धाचा अस्तित्व के पटल पर उभरने लगा
27:36ब्रहमाजी की एकागरता और वेदों के प्रभाव से 14 लोकों के इस विशाल चक्रव्यों का प्रथम चरण सफलता से पूर्ण
27:43हुआ
27:45स्रिष्टी के इस भव्य विस्टार को देखकर दिव्य आकाश भी आनन्दित हो उठा और चारों और उत्सव का वातावर्ण चा
27:53गया
27:54अब इन लोकों में जीवन और चेतना का संचार करने के लिए ब्रहमाजी अपनी अध्ली महारचना की और प्रवरित्थ हुए
28:03इस प्रकार शूने से प्रकट हुए त्रिमूर्ती के संकल्प और वेदों के ज्यान से ब्रहमाज का वहस्वर्णिम अध्याय लिखा गया