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Welcome to Season 6 of our Mythology series. Today we begin the profound journey of the Brahmavaivarta Purana. We explore the creation of the universe, the manifestation of the Supreme Goddess, and the secret origins of the Trimurti. This is not just a story; it is the revelation of the primordial energy. #BrahmavaivartaPurana #HinduMythology #CreationStory #SpiritualAwakening #Puranas #SanatanDharma #IndianHistory #Gods #Creation
Transcript
00:00स्रिष्टी के आरंब से पूर्व, समय और दिशाओं की सीमाओं से परे केवल एक असीमित शुन्यता का सामराज्य था।
00:08इस अगाध शुन्य में निराकार ब्रह्मा का वास था, जो समस्त अस्तित्व का एक मात्र सत्य और आधार बिंदु थे।
00:17उस आदिन शान्ती के भीतर समय का कोई अस्तित्व नहीं था, केवल एक अनन्त स्पंदन विद्यमान था।
00:25शुन्य के गर्ब से एक दिव्य प्रकाश पुन्च का प्राकट्य हुआ, जो आने वाली स्रिष्टी की पहली आहट थी।
00:33चारो दिशाओं में फैली उस शुन्यता में धीरे-धीरे एक अलोकिक चेतना का विस्तार होने लगा।
00:40अनन्त में समाहित वह ब्रहमा स्वयन को एक आधिक रूपों में अभिव्यक्त करने की इच्छा का अनुभव करने लगे।
00:48शुन्य के कणकण में एक सुक्ष्म कमपन हुआ, मानो सम्पूर्ण ब्रहमांड एक गहरी निद्रा से जागने की प्रतीक्षा में हो।
00:57अचानक उस अनन्त सन्नाटे के मध्य एक दिव्यध्वनी गूजी जो आधिकार की प्रथम तरंग थी।
01:04उस ध्वनी के प्रभाव से शुन्यता की कठोर परतें पिघलने लगी और अनन्त संभावनाय साकार होने को आतुर हुई।
01:13ब्रहमा की उस इच्छा शक्ती ने स्वयं के तेज से एक अलोकिक देवी के स्वरूप की कलपना की।
01:20देवी का स्वरूप धीरे-धीरे निखरने लगा, मानों चमकते हुए स्वन से कोई दिव्य प्रतिमा आकार ले रही हो।
01:29उनके उदे मात्र से उस रिक्ट स्थान में प्रकाश के रंगों का एक अध्भुत नृत्य प्रारम हो गया।
01:36यह देवी जो आदिशक्ती थी, उन्होंने अपनी द्रिष्टी से संपून शूने को आलोकित कर दिया।
01:44देवी के चर्नारविंद जिस स्थान पर स्पर्श हुए, वहां ब्रहमान के पहले बीज का अंकुरण हुआ।
01:51उनकी उपस्थिती ने उस निश्चल शूने को एक सक्रिय चेतना में परिवर्तित कर दिया।
01:58शूने अब और शूने न रहा, क्योंकि उसमें आदिशक्ती के तेज का समावेश हो चुका था।
02:05ब्रहमांडिय खेल के इस प्रथम अध्याय में देवी का उदे जीवन की सबसे बड़ी पहेली को सुलजाने का सूत्र था।
02:14उन्होंने अपनी दिव्यमुसकान से कालचक्र के प्रथम क्षन का आहवान किया।
02:20शूनी की उस अनन्त गहराई में पहली बार किसी स्थान का उदे हुआ जिसे उन्होंने अपना आश्रे बनाया।
02:28इस प्रकार महारहस्य का द्वार खुला और सृष्टी के निर्मान का महानुष्ठान पूर्ण हुआ।
02:35उस आदिशून्य में पहली तरंग का कमपन धीरे धीरे प्रस्फुटित हुआ। जैसे शांत जल में किसी अद्रिश शक्ती ने अमरित
02:43की बूंद गिरा दी हो।
02:45भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा के गेहन सागर से जागरित होकर उस प्रथम स्पंदन को निहारने लगे। उनके मुख पर
02:53एक सौमय और रहस्य में मुस्कान थी।
02:57उस दिव्य स्पंदन के केंद्र से स्वर्ण में आभा निकल कर चारों और फैलने लगी, जो ब्रहमांड की भावी संरचना
03:04का आधार बन रही थी।
03:07वह प्रकाश इतना तीवर था कि उसने संपूर्ण शून्यता को स्वर्णिम आवर्ण में लपेट लिया, मानो कोई महान यग्य पूर्णता
03:16की ओर बढ़ रहा हो।
03:18इसी दिव्य उर्जा के मिलन से मूल प्रकृती देवी का प्रथम आभास उस स्वर्णिम केंद्र में प्रकट होने लगा।
03:26भगवान विश्णु ने आदर पूर्वक अपनी भुजाएं जोड कर उस अद्रिश्य शक्ती को प्रणाम किया, जो स्रिष्टी का मूल स्रोत
03:34थी।
03:35देवी का प्रकाश एक घनी भूत शक्ती के रूप में परिवर्तित हुआ, जिसने संपूर्ण आकाश को अपनी गरिमा से भर
03:43दिया।
03:44स्रिष्टी के इस रहस्य में द्वार पर दिव्य आभाने देवी की पूर्ण आकृती को धारन करने का प्रथम संकेत दिया।
03:52आकाश से नक्षत्रों की वर्षा होने लगी, मानो स्वर्ग स्वय उस महाशक्तियों के मिलन का साक्षी बनने को आतुर हो।
04:01गरुर देव भी अपनी विशाल पंखों को समेटे हुए उस दिव्यद्रिश के सम्मुख नत्मस तक खड़े थे।
04:09देवी की उपस्थिती ने शून्यता के कणकण में चेतना का संचार कर दिया, जिससे जड़ भी सजीव होने का बोध
04:16करने लगा।
04:18यह वहक्षन था जब होने और न होने का अंतर समाप्थ हो गया और अस्तित्व का उदे सुनिश्चित हुआ।
04:26देवी की आभाने भगवान विश्णु के चतुर्भुज स्वरूप में भी एक नई चमक और दिव्य उत्साह भर दिया।
04:34भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि यह महाशक्ती ही ब्रहमांड को जन्म देने वाली आदिजन्नी है।
04:43उनके शब्द गूंचते ही देवी का प्रकाश और अधिक प्रकर हो उठा, मानो वह आवान स्विकार कर रही हो।
04:51स्रिष्टी के इस प्रथम सोपान पर देवी ने अपनी चेतना का विस्तार करना प्रारंभ कर दिया।
04:59महाशून्यता अब धीरे-धीरे एक भव्य रंगमच में बदलने लगी थी, जिसका सूत्रपात स्वयम मूल प्रकृती कर रही थी।
05:08गरुर ने अपनी तीक्ष्न द्रिष्टी से देखा कि देवी का सूक्ष्म स्वरूप अब साकार होने के निकट है।
05:16देवी के कणों ने ब्रहमांड के तानेबाने को बुन्ना शुरू किया, जो अभी तक अद्रिष्य और अमूर्थ थे।
05:23इस प्रकार महारहस्य का प्रथम अध्याय एक दिव्य सत्य के रूप में इस स्विष्टी के पतल पर अंकित हुआ।
05:32ब्रहमांड के शुने में अचानक एक महाप्रकाश का स्फोठ हुआ, जिससे दिव्य उर्जा की तरंगे चारों दिशाओं में फैलने लगी।
05:41भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा से जागे और उन्होंने देखा कि वह आदिशक्ती अपने पांच दिव्य रूपों में विभाजित होने
05:49को तत्पर हैं।
05:52प्रथम प्रकाश पुन्च से रंचंडी दुर्गा का प्रक्टी करण हुआ, जो अपनी दाहिनी भुजा में त्रिशूलिय स्रिष्टी की रक्षक के
06:00रूप में उभी।
06:01सफेद स्वन की आभा के साथ देवी लक्ष्मी का आवतरण हुआ, जिनके चर्णों में कमल दल स्वयन ही प्रस्पुटित होने
06:09लगे।
06:11तीसरी शक्ती के रूप में माता सरस्वती प्रकट हुई, जिनके हाथों में वीना की मधुर ध्वनी से ब्रहमांड के चंदों
06:18का स्रिजन हो रहा था।
06:20तभी भगवान ब्रहमा ने देखा कि सरस्वती की मुखाकृती से ज्ञान की धाराएं निकल कर स्रिष्टी के कणकण में समाहित
06:28हो रही हैं।
06:30देवी सावित्री का आगमन हुआ, जिन्होंने अपने तेज से समय के चक्र को गती प्रदान की और कर्म के विधान
06:38को सुनिश्चित किया।
06:40वातावर्ण में एक विलक्षन शान्ती छा गई, जो देवी के इन चार रूपों के मिलन की भव्यता को प्रतिध्वनित कर
06:47रही थी।
06:49अंत में पांचवी शक्ती के रूप में राधारानी का स्वरूप प्रकट हुआ, जो स्वयं प्रेम और भक्ती की पराकाश्था है।
06:58राधा के आते ही समस्त ब्रह्मांड प्रेम की एक अवर्णनिय मिठास से भर गया, जिससे स्रिष्टी का आधार तयार हुआ।
07:07राधा की दिव्य मुस्कान ने जड़ और चेतन में प्राणों का संचार कर दिया, जिससे निर्जी ब्रह्मांड जीवन्त होने लगा।
07:16पांचों देवियां एक दूसरे की ओर देखकर मंद मुस्कराईं और उनका तेज एक संगठित प्रकाश पुझ में बदल गया।
07:36अपनी दृष्टी से इन पांचों देवियों को नमन किया, क्योंकि उसे अब स्रिष्टी के विस्तार का मार्क दिख रहा था।
07:44स्रिष्टी के इस प्रथम सोपान पर इन देवियों ने अपने सुक्षम कणों से पंच्चतत्वों का निर्मान आरंभ कर दिया।
07:52देवी के इस दिव्य विभाजन के साथ ही शूने का एकांत समाप्थ हुआ और अस्तित्व का संगीत गूझ उठा।
08:01ब्रहमान्ड की हर नब्ज में अब इन पांच देवियों की उर्जा प्रवाहित हो रही थी, जिससे समय की गणना का
08:08प्रारंभ हुआ।
08:10भगवान विश्णू ने संतुष्टी के साथ अपनी दिव्य शंक ध्वनी की, जिसने इस नए स्रिजन के आगमन का शंकनाद किया।
08:18अब स्रिष्टी का प्रत्येक अनु उन पांचों शक्तियों के अनुशासन में बंध कर अपने निश्चित कर्तव्य की ओर बढ़ने लगा।
08:28इस प्रकार महारहस्य का यह अध्याय पूर्ण हुआ और भौतिक जगत के निर्मान की नीम अत्यंत भव्यता के साथ स्थापित
08:36हुई।
08:37ब्रहमांड के अनंत विस्तार में भगवान विश्णों की इच्छा से एक दिव्य प्रकाश पुंजने आकार लेना शुरू किया, जो गोलोक
08:45धाम के निर्मान का प्रथम बिंदु बना।
08:48गरुर देव ने अपने विशाल पंखों से उस प्रकाश को समवारा और उसे एक निश्चित विस्तार प्रदान करने हेतु आकाश
08:57में विचर्ण किया।
08:59जैसे जैसे दिव्य उर्जा का प्रवाह बढ़ता गया, गोलोक की आधार शिला पर स्वर्ण के कमल और रतनों से जडित
09:07स्तंभ स्वतह ही प्रकट होने लगे।
09:09चारो और व्याप्त दिव्य नीलिमा ने उस नूतन धाम को एक ऐसी आभा प्रदान की जो युगोलो तक अक्षोन बनी
09:17रहने का प्रमाण थी।
09:20भगवान विश्णों के मस्तक से निकली एक दिव्य किरण ने गोलोक के मध्यमे स्थित परम सिनहासन को आलोकित कर दिया।
09:28भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए अपनी आज्यादी और गोलोक का हर कोना दिव्य संगीत की मधुर ध्वनियों से गुंजायमान हो
09:36उठा।
09:37हवाओं में बहती सुगंध और प्रकाश के अनुओं ने गोलोक की दिवारों पर नकाशिदार आकृतियों का निर्मान प्रारंभ कर दिया।
09:46यह गोलोक अब केवल एक स्थान नहीं था, बलकि यह विश्नु की अनंत अनुकमपा और प्रेम का साक्षात स्वरूक बन
09:55चुका था।
09:56गोलोक के प्रत्येक द्वार पर देवताओं के अंश से निर्मित द्वारपालों की प्रतिमाएं सजीव होकर अपनी सुरक्षा का दायत्व संभालने
10:05लगी।
10:06नारद मुनीक जो इस निर्मान को देख रहे थे, वे अपनी वीना से गोलोक की स्थुती में मंत्रों का गायन
10:13करने लगे।
10:15वीना की तान ने गोलोक के उध्यानों में अमरित मही पुष्पों को खिलने के लिए प्रेरित किया, जिससे पूरे वातावर्ण
10:23में दिव्यता फैल गई।
10:24आकाश से गिर्ती अमरित की बूंदों ने गोलोक की धर्ती को सदैव तरोताजा और उर्वर बनाये रखने का वर्दान प्राप्त
10:33किया।
10:33भगवान विश्णु ने गोलोक की विशालता का विस्तार करते हुए ब्रहमांड के केंद्र में इसे एक दिव्यदीप के समान प्रजवलित
10:42किया।
10:42इस गोरवमई धाम के शिखर पर सूर्य से भी अधिक चमकते हुए स्वर्ण कलश ने अपनी जोती से समस्त दिशाओं
10:51को प्रकाशित कर दिया।
10:53प्रत्येक स्तंध पर अनकित पौरानिक कथाएं गोलोक की दीवारों पर जीवन्त होकर निर्त्य करने लगी और निर्मान के आनंद को
11:01साजा किया।
11:03वातावर्ण में एक अनुपम शान्ती व्याप्थ हो गई, मानो समय स्वय गोलोक की सुन्दर्ता के सामने ठहर गया हो।
11:11विश्णु का विराट रूप अब गोलोक के शान्त व्यभव में समाहित होकर उस शक्ती के पुंश को संतुलित करने लगा।
11:20तभी गोलोक के द्वार पर दिव्य शक्तियों का एक समूह एकत्रित हुआ, जिन्होंने इस नूतन स्रिजन को नमन किया।
11:28गोलोक की रचना पूर्ण हुई और उसने पहली बार अपनी अनंत जोती के साथ ब्रहमांड के गर्भ में अपनी उपस्थिती
11:36दर्स कराई।
11:37यह दिव्य धाम अब आने वाले कालचक्र के लिए सत्य और धर्म के एक मात्र आश्रे स्थल के रूप में
11:45स्थापित हो गया।
11:47गोलोक की उनपरम दिव्य तरंगों के घर्षन से कारण स्मुद्र के जल में एक अध्भुत दिव्य स्वेद उत्पन हुआ, जो
11:54धीरे-धीरे एकत्रित होने लगा।
11:57भगवान विश्णु उस अनंत जलराशी पर शेशनाग की सया पर विराज मान होकर अपनी योगनिद्रा के माध्यम से उस स्वेद
12:05को एक केंद्र में केंद्रित करने लगे।
12:09उस दिव्य जल के मध्यवह स्वेद एक विशाल तेजस्वी बिंदु के रूप में परिवर्तित होकर धीरे-धीरे फैलने लगा और
12:16आकार ग्रहन करने लगा।
12:19यह कनकन का मिलन एक ऐसे विशाल ब्रहमांडी अंडे में बदल गया, जिसमें समस्त चराचर जगत की संभावनाए एक साथ
12:27समाहित थी।
12:29कारण स्मुद्र की लहरें उस स्वर्णमे अंडे को अपने आगोश में लेकर उसे स्थिर्ता प्रदान करने के लिए थिरकने लगी।
12:38गरुर देव अपनी स्वर्णमे पंखों की फड़फडाहट से उस अंडे के चारों और एक सुरक्षा कवच का निर्मान करने लगे।
12:47उस अंडे के भीतर से मधूर संगीत की गूँच सुनाई देने लगी, जैसे प्रकृती स्वयन किसी महान स्रिजन का स्वागत
12:55कर रही हो।
12:56ब्रहमांदी अंडा धीरे-धीरे अपनी चमक बढ़ाते हुए कारण सागर के अंधकार को अपनी दिव्य आभा से आलोकित करने लगा।
13:06समस्त दिशाएं शांत हो गई और वह अंडा कारण सागर की गहराई में एक स्थिर प्रकाश स्तंभ के समान चमकने
13:13लगा।
13:15भगवान विश्णू ने अपनी एक द्रिश्टी उस अंडे पर डाली, जिससे वह अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर होने लगा।
13:23अंडे के भीतर अब सुक्ष्म तत्वों का सन्योजन प्रारंभ हुआ, जिससे काल और स्थान की रचना का मार्ग प्रशस्थ हुआ।
13:45अब उस अंडे के चारों और एक अद्रिश भेरा बना कर खड़े हो गए।
14:39अब वह अंडा अपनी दिव्य उर्जा के साथ स्रिष्टी के महाविस्तार के लिए
14:44पूर्णत है तैयार हो चुका था।
14:47ब्रहमांदी अंडे के भीतर अचानक एक अध्भुत स्वर्ण कमल की पंखुरिया धीरे-धीरे खुलने लगी।
14:54उस कमल के मध्य में चतुर मुखी ब्रहमा जी का दिव्य स्वरूप प्रकट होने लगा, जिनकी कांती सूर्य के समान
15:02तेजो में थी।
15:04ब्रहमा जी की चार आखे धीरे से खुली, जो अनंत अंधकार को भेदने का प्रयत्न कर रही थी।
15:12अंडे की आंतरिक दिवारों पर अंकित दिव्य आकृतिया और स्पंदन धीरे-धीरे एक अध्भुत प्रकाशपुझ में परिवर्तित हो रहे थे।
15:21ब्रहमा जी ने अपने चारों और देखा, किन्तु उन्हें शून्य और केवल अनंत अंधकार ही दिखाई दे रहा था।
15:29अपनी उत्पत्ती के रहस्य को जानने है तु ब्रहमा जी ने अपनी चेतना को एकागर करना प्रारंभ कर दिया।
15:37उनकी एक आगरता से एक ध्वने उत्पन हुई जो धीरे धीरे ओम के दिव्य नाद में गूजने लगी।
15:45ब्रहमांड के इस महाशून्य में ब्रहमा जी का वह निस्पंद ध्यान स्रिष्टी के प्रथम बीज को जन्म देने वाला था।
15:53जैसे जैसे वह ध्यान गहरा होता गया, अंडे के भीतर का अंधकार दिव्य प्रकाश में बदलने लगा।
16:01ब्रहमा जी को अब अपनी भुजाओं में अद्भुत उर्जा का संचार अनुभव होने लगा।
16:07उन्होंने अपनी दिव्य द्रिष्टी से ब्रहमांड के सभी आयामों को एक साथ देखना चाहा।
16:14चारू दिशाओं में प्रकाश की एक किरन सी दोडी जिसने इस अंडे की सीमाओं को स्पर्श किया।
16:20किन्तु ब्रहमा जी अभी भी भ्रमित थे कि वे कौन है और उनका उद्देश क्या है।
16:28अंडे की सतह पर अब स्रिष्टी की रूपरेखा और नक्षत्रों के सुक्षमकन उभरने लगे थे।
16:35ब्रहमा जी ने पुनह ध्यान मुद्रा में लीन होकर अपने पिता की खोच प्रारंभ की।
16:41उनके अंतर्मन में एक अद्रिष्य उर्जा का स्पंदन उन्हें गहराई में उतरने के लिए प्रेरित कर रहा था।
16:50अंदा अब उस दिव्य ध्वनी से स्पंदित हो रहा था, जो स्वयन स्रिष्टी की आधार शिला थी।
16:57ब्रहमा जी का मुख मंडल अब एक दिव्य मुस्कान से खिल उठा था क्योंकि उन्हें कुछ संकेट मिलने लगे थे।
17:05उन्होंने अपनी श्वास को सन्यमित किया और शुने के भीतर से सुनाई दे रहे उस महानात पर अपना ध्यान केंद्रित
17:12किया।
17:14स्रिष्टी का महारहस्य अब धीरे धीरे ब्रहमा जी के समक्ष अपनी परतें खोलने के लिए तयार था।
17:21ब्रहमा जी के कानों में वह दिव्यस्वर प्रतिध्वनित हुआ जो उन्हें समस्त माया से परे अपनी साधना को कठोर बनाने
17:29का निर्देश दे रहा था।
17:32भगवान ब्रहमा अपनी चार भुजाओं को सन्यमित कर कमल के आसन पर स्थिर बैठ गए और उनके मुख पर एक
17:39अलोकिक तेज उभर आया।
17:42उन्होंने अपनी इंद्रियों को बाहरी शोर से पूर्णता मुक्त कर लिया और स्वयन को उस अगाध शून्यता के केंद्र में
17:49स्थापित कर दिया।
17:51शूनी की गहरायों में ब्रह्मा जी के चारों मुखों से एक साथ कार का अनवरत गुंजन सुनाई देने लगा जो
17:59स्रिष्टी के कंकन को तरंगित कर रहा था।
18:02धीरे धीरे उनके तपकी अगनी इतनी प्रखर हो गई कि उस अंधकार में शूने में भी एक सुनहरी चमक फैलने
18:10लगी।
18:11ब्रह्मा जी के भीतर से उठ रही यह तपस्या रूपी उर्जा मानों पूरे ब्रह्मान के निर्मान का आधार तयार कर
18:19रही थी।
18:20साधना की इस गहन अवस्था में ब्रह्मा जी को अपने अस्तित्व के मूल का बोध होने लगा था जो निर्गुन
18:27से सगुन की ओर अग्रसर था।
18:30शूने की सगंता को चीरते हुए उनके तब का प्रभाव एक विशाल प्रकाश पुण्ज के रूप में चारों और फैल
18:37गया।
18:39इस एकागरता के कारण ब्रह्मा जी के हृदय में एक अधवितिय ज्यान का उदे हुआ जिसने उनके मस्तिश्क के कपाट
18:47खोल दिये।
18:48साधना के उसक्षण में ब्रह्मा जी ने अनुभव किया कि स्रिष्टी का प्रतेक कन उनही के चिंतन से उत्पन होने
18:56की प्रतीक्षा कर रहा है।
18:59उनके प्रतेक्षवास के साथ शून्य में से दिव्य उर्जा के सुक्ष्म तंतु निकलने लगे जो भविश्य की रचना के सूत्र
19:06थे।
19:08शून्य की अनंत परतों के बीच अब ब्रह्मा जी का ध्यान पूर्णतह स्थिर हो चुका था जैसे कोई निश्चल परवत
19:15हो।
19:27शून्य मुस्कान यह संकेत दे रही थी कि उन्होंने अपने लक्षे को पहचान लिया है। उनके तब की उश्मा ने
19:35शूने की ठंडी स्थिर्ता को एक जीवन्त स्पंदन में बदल दिया था।
19:41ब्रह्मा जी के शरीर से निकलती प्रभा अब उस अंधकार को परास्थ कर रही थी जो युगों से वहां जमा
19:48था।
19:49स्रिष्टी के प्रथम स्रश्टा का संकल्प अब इतना द्रिढ हो चुका था कि प्रकृती भी उनकी आग्या की प्रतीक्षा में
19:56ठहर गई थी।
19:59उन्होंने अपनी साधना के बल से उस निराकार ईश्वर का साक्षातकार करने का मार्ग प्रशस्थ कर लिया था।
20:07शून्य का सन्नाटा अब एक दिव्य संगीत में परिवर्तित हो चुका था, जिसे केवल वे ही सुन पा रहे थे।
20:14इस प्रकार ब्रहमा जी की कठोर तपस्या ने स्रिष्टी के महार हस्य के द्वार खोलने की अंतिन प्रक्रिया पूर्ण कर
20:22ली।
20:22ब्रहमा की तंद्रिल अवस्था में अचानक चेतना के क्षितिच पर एक अनन्त दुग्धसागर का प्राकट्य हुआ जो अनन्त संभावनाओं से
20:32भरा था।
20:32उस अनन्त क्षिरसागर के बीचों बीच शेशनाग के सहसर फणों पर विराजमान भगवान विश्णु का दिव्यरूप प्रकट हुआ जो स्वयन
20:42साक्षात परमशान्ती का स्वरूप थे।
20:44शेशनाग के फणों से निकलती हुई मणिया उस अंधकार मई शून्यता को स्वर्णिन प्रकाश की किर्णों से जग्मगाने लगी।
20:54ब्रहमा ने देखा कि वे अनंत स्वामी अपने नेत्र मून्दे हुए उस स्रिष्टी के स्वपन की रचना कर रहे थे
21:01जो अभी तक केवल कलपना मात्र थी।
21:04विश्णू की नाभी से एक दिव्य कमल का अंकुरन प्रारंभ हुआ जो धीरे धीरे उपर की ओर अपनी पंखुडिया खोलता
21:12चला गया।
21:14उस कमल के भीतर स्वयं ब्रह्मा ने अपनी उत्पत्ती का आभास किया, जहां हर पंखुडी एक नए लोग के निर्मान
21:21का आधार थी।
21:23कमल की प्रत्येक पंखुडी से अंगिनत नक्षत्रों और सौरमंदलों की स्रिष्टी होने का क्रम एक मंद ध्वनी के साथ निरंतर
21:31चलने लगा।
21:33यह वह क्षन था जब रचनाकार और रचिता के मध्य एक मूख समवाद का सेतु स्थापित हो गया था।
21:41विष्णु के शयन की लए पर ही समस्त ब्रह्मांडों की धड़कने टिकी हुई थी, जिसे देखकर ब्रह्मा विस्मय में डूग
21:48गए।
21:50भगवान विष्णु के मुख पर छाई वह मंद मुसकान स्रिष्टी की समस्त जटिलताओं को एक क्षन में ही सुलजाने वाली
21:57थी।
21:59शेशनाग ने अपनी फुमकार से उस दिव्यवातावर्ण को एक सुरक्षा कवच में लपेट दिया, जिससे स्रिष्टी की प्रक्रिया निर्विधन चलती
22:07रही।
22:09आकाश में तैरते हुए स्वर्णिमकन विष्णु के संकल्प को साकार कर रहे थे, जो अब ब्रह्मा के माध्यम से मूर्ट
22:16रूक लेने वाला था।
22:19ब्रह्मा ने अनुभव किया कि यह दृष्टी केवल एक दृष नहीं, बलकि सृष्टी के महारहस्य का प्रथम पाठ था।
22:27विष्णु के हरदय से निकलने वाली प्रकाश की धारा सीधे ब्रह्मा के हरदय को स्पर्ष कर रही थी।
22:34इस दिव्य मिलन के केंद्र में ही सृष्टी की समस्त विद्याओं और वेदों का भी समाहित था।
22:41आकाश के रंग बदलते जा रहे थे, जैसे कोई महान दिव्य शक्ती इस समवाद की गवाह बन रही हो।
22:49ब्रह्मा का तप अब एक पूनता की ओर अग्रसर था, क्योंकि उन्हें ग्यात हो चुका था कि पालन करता ही
22:56रचिता का आधार है।
22:59विश्नु की निग्रा और ब्रह्मा का जागर्ण मिलकर ही इस ब्रह्मांड के संतुलन को निर्धारित करते थे।
23:06वह दिव्य संगीत अब और भी तीवर हो गया था, मानो ब्रह्मांड की वीना के तार छेड़ दिये गए हो।
23:14स्रिष्टी के महार हस्य के ये द्वार अब खुल चुके थे और ब्रह्मा को अपनी नई भूमिका का उत्तरदायत्व स्वीकार
23:22करना था।
23:23ब्रह्मांड के शूने में एक दिव्य प्रकाश पुंज अचानक कौन धा और उससे हिमशिखर पर विराजमान महादेव की आकरिती उभरने
23:32लगी।
23:33विष्णु ने अपनी योग निद्रा से नेत्र खोले और महादेव के दिव्य आगमन का स्वागत करते हुए मुस्कुरा कर अपनी
23:41सहमती दी।
23:43शिव के त्रिशूल की एक तंकार से संपून ब्रहमांड की जड़ता भंग हुई और उसमें चेतना की लहरेन दोड गई।
23:51आकाश के विस्तार में एक दिव्य आभा मंडल छा गया, जो स्रिष्टी के रच्चिता और सनहारक के मिलन का साक्षी
23:59बना।
24:00बर्फ की चादर ओढ़े कैलाश परवत पर शिव ने अपना तीसरा नेत्र थोड़ा सा खोला जिससे ब्रहमांडी अगनी का आभास
24:08हुआ।
24:10विश्णू ने अपने चतुर्भुज रूप में ब्रहमांड की धुरी को संतुलित करने के लिए अपना शंक बजाया।
24:17शिव के डमरू से निकलती हुई नादब्रम की ध्वनी ने स्रिष्टी के बिखरे हुए तत्वों को आपस में जोडना प्रारंब
24:24किया।
24:26एक डैविये चमक ने संपूर्ण कैलाश को घेर लिया, जो इस बात का प्रतीक था कि अब सहार की शक्ती
24:32स्रिजन के साथ तालमिल बिखा रही है।
24:36शिव के गले में लिप्टे नागराज वासुकी ने अपनी फुफकार से ब्रहमांड की वायू में जीवन का संचार कर दिया।
24:45विश्णू ने अपने हाथों से सुदर्शन चक्र को वायू में स्थापित किया, जो ब्रहमांड की सुरक्षा के लिए एक धाल
24:52बन गया।
25:10शिव ने अपनी आखें पूरी तरह खोल दी और उनकी द्रिष्टी से एक दिव्य प्रकाश की धारा कैलाश से निकल
25:18कर स्रिष्टी के केंद्र की ओर प्रवाहित हुई।
25:22विष्णु ने अपनी मुस्कान के साथ उस दिव्य धारा को स्विकार किया और स्रिष्टी के विस्तार को गती दी।
25:30कैलाश के चारों और बर्व के कन एक नित्य करते हुए दिखाई दिये जो महादेव की महिमा का गुनगान कर
25:37रहे थे।
25:38यह वहक्षन था जब ब्रह्मांड के नियम पूर्ण रूप से कार्यानवित हो गए और स्रिष्टी एक व्यवस्थित सम्रचना में बदल
25:46गई।
25:47शिव अपनी मुद्रा में पुना लौट आये लेकिन अब उनके चारों और की उर्जा एक स्थिर सुरक्षा चक्र की तरह
25:55काम कर रही थी।
25:57विश्णू ने अपने कमल सिनहासन पर बैठते हुए स्रिष्टी के अगले चरण की तयारी का संकेत दिया।
26:04कैलाश की चोटियों पर अब एक दिवय शांती पसरी थी जो स्रिष्टी के नए अध्याय के आरंभ का संदेश दे
26:12रही थी।
26:14समय का चक्र अब घूम चुका था और देवता अपनी अपनी भूमिकाओं के साथ स्रिष्टी के सुचारू संचालन के लिए
26:21तयार थे।
26:23ब्रहमांड के विशाल रिक्ट स्थान में अचानक एक दिवय स्पंदन उत्पन हुआ, जैसे सोया हुआ काल अब जागरित हो रहा
26:31हो।
26:32विश्णु ने अपनी मंद मुस्कान के साथ ब्रहमांड के तंतुओं को चुकर स्रिष्टी के प्रथम कमपन को सक्रिय कर दिया।
26:52फैलने लगी, मानुस्रिष्टी की नसों में नया जीवन दौड रहा हो। कैलाश के हिमाच छादित शिखरों पर जमी बर्फ की
27:01चादरे भी उस दिवय उश्मा से चमक उठी।
27:05महादेव ने अपनी समाधी के भीतर उस आगामी महा प्रिवर्तन का अनुभव किया और उनके नेत्रों की चमक और तीवर
27:13हो गई।
27:14नंदी ने उस दिवय स्पंदन को पहचान कर अपने स्वामी की ओर श्रधा से शीष नवाया।
27:21समय का चक्र अब अपनी धुरी पर तेजी से घूमने लगा, जिससे काल के नए आयान खुल गए।
27:29अद्रिश्य शक्तियों ने मिलकर ब्रहमांड के भौतिक धाचे को बुन्ना शुरू किया, जिससे पंच्तत्वों का उदे हुआ।
27:36गरूर के पंखों की फड़फडाहट से अंतरिक्ष में एक गूज उठी, जो स्रिष्टी के आरंभ का शंकनाद बनी।
27:45गरूर ने अपनी तीच्शन ग्रिष्टी से ब्रहमांड के उस कोने को देखा जहां भौतिक स्रिष्टी का बीजारोपन हो रहा था।
27:53स्वर्ण प्रभासे युक्त वेपंख, ब्रहमांड के अंधकार को मिटाते हुए एक नई दिशा की ओर मुड़ गए।
28:01ब्रहमाजी ने अपने कमल से उठकर स्रिष्टी के विस्तार के लिए प्रथम संकल्प का आहवान किया।
28:08उनकी चार भुजाओं से निकले प्रकाश ने उन दिशाओं को आलोकित कर दिया जो अब तक शूने में डूबी थी।
28:16स्रिष्टी के कण अब संगठित होने लगे थे और पदार्थ ने अपना पहला भौतिक रूप धारण किया।
28:24तारागणों ने आकाश में अपना स्थान लेना प्रारंभ किया, जिससे रातरी का सौंदर्य भी अस्तित्व में आ गया।
28:33सब्तरशी मंडल की दिव्यज्योती ने कैलाश की चोटियों पर उतर कर उसे ज्यान का केंडर बना दिया।
28:40महादेव ने उन रिशियों को देख कर अपनी स्वीकृती में अपना मस्तक थोड़ा सा जुका दिया।
28:47स्रिष्टी के हर पर्मानों में अब प्रान का संचार हो चुका था और प्रकृती ने अपनी पहली श्वास ली।
28:54प्रथम सूर्योदय के साथ ही ब्रहमान्ड का महारहस्य उद्घाटित हुआ और सत्य की पहली किरन सत्ययुक के आरंभ की गवाह
29:03बनी।
29:03झाल

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