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Episode 9 of Brahmavaivarta Purana explores the difficult life of the boy who carries the divine soul essence of Narada. Amidst poverty and the harsh realities of the material world, can he reclaim his spiritual memory? Watch the journey of awakening, resilience, and the first whisper of Krishna Bhakti. #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #HinduMythology #KrishnaBhakti #SpiritualAwakening #Puranas #VedicWisdom
Transcript
00:00मृत्यो लोग के इस धूल भरे गाउं में बालक के कोमल चर्णों में कांटे चुब रहे हैं, मानो संसार उसे
00:06उसके अस्तित्व का पहला कठोर पाठ पढ़ा रहा हो.
00:10उपर वैकुंट के स्वर्ण कमल पर विराजमान भगवान विश्णु अपनी योगमाया से इस बालक की विस्मृती को देख मंदमुस्कान के
00:19साथ विस्मित हैं.
00:22बालक अपनी जोपडी के द्वार पर खड़ा होकर सूर्य की उन किर्णों को निहारता है, जो उसे धुन्धली स्मृतियों की
00:29तरहे किसी खोए हुए धाम का स्मरण दिलाती हैं.
00:34हवा में उर्ती धूल का प्रत्येक कन जैसे समय का चक्र बनकर इस बालक को उसके वर्तमान पतन का एहसास
00:41करा रहा है.
00:44गाओं की तंग गलियों में काम का बोज और दूसरों के तिरसकार पून शब्द बालक के कोमल हिदय पर गहरे
00:50घाव की तरह अंकित हो रहे हैं.
00:54गरुर्देव वैकुंट के द्वार से नीचे मृत्युलोग की ओर देखकर अपने स्वामी की लीला को समझ कर अपना सिर आदर
01:02और जिग्यासा से जुका लेते हैं.
01:05बालक को भूक और प्यास सता रही है, लेकिन उसका मन किसी अग्रिश्य संगीत की खोज में भटक रहा है,
01:13जिसे वह पकड नहीं पा रहा.
01:16सांच का धुन्धल का धीरे-धीरे गाउं को घेर रहा है, जैसे यह संसार की अग्यानता का अंधेरा हो जो
01:23बालक की चेतना को ढखने का प्रयास कर रहा है.
01:27दूर कहीं मंदिर की घंटी बचती है, और उसकी गूंच सुनकर बालक को लगता है, जैसे कोई उसे उसके वास्तविक
01:35नाम से पुकार रहा हो.
01:38भगवान विश्नु का ध्यान बालक पर केंद्रित है, उनकी त्रिलो की द्रिष्टी उस जोपडी की दिवारों को भेद कर सीधे
01:45उस दुखी आत्मा को देख रही है.
01:49बालक एक सूखे पत्ते को उठा कर उसे घूरता है, मानो उस नश्वर वस्तु में उसे अपने पूर्व जन्म के
01:56वैभव की कोई छाया दिखाई दे रही हो.
02:00समय का पहिया रुकता सा प्रतीत होता है, जब एक अद्रिष्य उर्जा बालक के चारों और एक सुरक्षा धेरा बनाने
02:08का संकेत देती है.
02:10गाओं के अन्य लोग अपने कारियों में व्यस्त हैं, बेखबर की उनके बीच वह बालक चल रहा है, जो साक्षात
02:18भक्ती का बीज अपने भीतर समेटे हुए है.
02:22गरुर्देव का पंक फड़फडाता है, और एक स्वर्ण धूल मृत्यो लोग की उस जोपड़ी पर गिरती है, जिसे कोई साधारन
02:30आख देख नहीं सकती.
02:33बालक को एक क्षण के लिए लगता है, जैसे वह शूने में तैर रहा हो, जहां न कोई जाती है,
02:39और नहीं कोई शरीर का बंधन.
02:43नदिया और परवत साक्षी है, कि यह बालक कोई साधारन नहीं, बलकि स्वयन ब्रह्मा के अंश का एक छोटा सा
02:50प्रतिबिम्भ है.
02:53अंधेरा और घना हो जाता है, और बालक अपनी जोपडी के कोने में दुबक कर सो जाता है, उसके सपनों
03:00में अब भी वही रहस्य में ध्वनी गूंज रही है.
03:04वैकुंठ में भगवान विश्णु का सुदर्शन चक्रधी मेधी में अपनी धुरी पर घूमता है, मानो वह आने वाले महा प्रिवर्तन
03:12की प्रतीक्षा कर रहा हो.
03:15बालक की निद्रा में भी उसकी आत्मा उस दिव्यध्वनी का पीछा कर रही है, जो उसे इस सांसारिक माया से
03:22मुक्त कराने वाली है.
03:25संसार की जर्ता और इस बालक की महाचेतना के बीच का संघर्ष अब अपने चरम पर है, जिसे देख प्रकृती
03:32स्वयं मौन हो गई है.
03:35बालक की कुटिया के उपर फैली अनंत आकाश गंगा का विस्तार धीरे धीरे वैकुंट के स्वर्ण द्वारों की परचाई को
03:42धर्ती पर उकेरने लगा है.
03:45विश्नु का सुदर्शन चक्र अपनी धुरी पर घूमते हुए एक मध्धम सी गूंच उत्पन कर रहा है, जैसे वह किसी
03:53महाप्रलय की तैयारी में हूँ.
03:56बालक के अवचेतन मन में वैकुंट के मनिकुट्टिम प्रांगण का प्रतिबिम उभर रहा है, जिसे देखकर उसकी आखे निद्रा में
04:04भी सजल हो उठी है.
04:07प्रकृति का मौन स्वय में एक रहस्य समेटे हुए है, मानो काल का चक्र अपनी गती को एक क्षण के
04:14लिए रोक कर बालक की एकागरता को निहार रहा हो.
04:18पालक मातापिता अपनी दरिदर्ता के बोज तले दबे, बालक के इस रहस्य में व्यवहार को देखकर गहरी चिंता में डूबे
04:26हैं.
04:27गरुर के पंकों की फड़फडाहट वैकुंट के आकाश में वैसी ही है, जैसे किसी योगी की धड़कने, जो बालक की
04:35आत्मा को जागरत करने के लिए व्याकुल है.
04:39बालक की निद्रा में गूंजती वह अलोकिक ध्वनी धीरे-धीरे उसके हृदय के भीतर एक दिव्य प्रकाश तंभ का निर्माण
04:47कर रही है.
04:49संसार की जर्ता और बालक की जागती हुई महाचेतना के बीच का घर्षन अब उसकी देह पर एक दिव्याब आभा
04:57बिखेर रहा है.
05:00अंधेरी गलियों और मिट्टी की दिवारों के बीच बालक का स्वपन उसे उन अम्रित्मय जर्नों के पास ले जाता है,
05:07जहां समय का कोई अस्तित्व नहीं है.
05:11विश्नु के नेत्रों में वह करुणा है, जो मृत्य लोग के इस शूद्र बालक की पीडा को अपनी महाचेतना से
05:18जोड रही है.
05:20बालक के मस्तक पर एक अग्रिश्य तिलक उभर रहा है, जो गंधर्व काल की उस खोई हुई स्मृतियों का प्रतीक
05:27है, जिसे संसार नहीं देख सकता.
05:31प्रकृती के कणकण में अब कृष्ण की उस ध्वनी की प्रतिध्वनी गूंजने लगी है, जिसे अभी केवल वही बालक सुन
05:38पा रहा है.
05:40अज्यानता के अंधेरे में लिप्टे मातापिता अब भी बालक की बेचैनी को शारिरिक व्याधी मान कर उपचार ढूंडने में लगे
05:48हैं.
05:50वैकुंट के उचे शिकरों से उतरती उर्जा की एक किरन गरुड के साथ मिलकर मृत्य लोग की नीरस धरा को
05:57आलोकित कर रही है.
06:00बालक अपनी नींद में धीरे से मुस्कुराता है, क्योंकि उसे अब उस दिव्य बासुरी का स्वर सुनाई दे रहा है,
06:07जो उसे अपने मूल स्थान की ओर बुला रही है.
06:12समय का चक्र इस क्षण पर रुख गया है, जहां भक्ती और चेतना का संगम होकर संसार के नियमों को
06:19चुनोती दे रहा है.
06:21शूद्र बालक की यह निद्रा अब सामान्य विश्राम नहीं, अपितू ब्रहमांडिये चेतना के साथ उसका सुक्ष्म मिलन है.
06:30विश्नु का सुदर्शन चक्र अब स्थिर हो चुका है, जो इस बात का संकेथ है कि परिवर्तन का क्षण समीप
06:38आ गया है.
06:40बालक की श्वास प्रश्वास के साथ ही आसपास की हवा में चंदन और पुश्पों की दिव्य सुगंध घुलने लगी है.
06:49अंधेरा धीरे धीरे छंट रहा है और बालक के मन में वैकुंट का चित्र अब इतना स्पष्ट है कि वह
06:55उसे स्वपन नहीं, अपनी वास्तविक्ता समझने लगा है.
07:00प्राचीन घनेवनों की उस शांती में, जहां समय भी ठेहर सा गया था, वह शूदर बालक अपनी सुधबुध खोकर रिशियों
07:08की कुटिया के द्वार पर नत्मस्तक खड़ा हो गया.
07:12स्वयं विश्णों ने गरूर से कहा कि यह बालक अब मेरी भक्ती के उस मार्ग पर है, जहां प्रत्येक सास
07:19एक प्रार्थना बन गई है.
07:22बालक ने बिना किसी अपेक्षा के, उन तपस्वियों की सेवा के लिए सूखी लकडी और जल लाने के कठिन कार्य
07:30को अपनी साधना मान लिया.
07:32वन की वायू में अब चंदन और पुष्पों की वह दिव्यगंध है, जो बालक के भीतर छिपी उस पुरानी चेतना
07:40को धीरे-धीरे जागरत कर रही है.
07:43व्रिध रिशियों ने बालक की इस निश्काम सेवा को देख, अपने तपोबल से उसके प्रती करुणा का भाव जागरत किया.
07:52नारायन के ध्यान में लीन एक रिशी ने बालक की आखों में वैकुंट के उस प्रतिबिम को देखा, जो अब
07:59स्पष्ट होने लगा था.
08:01बालक ने कुटिया के आंगन में बिखरी हुई धूल को इतने सने से साफ किया, मानो वह स्वय वैकुंट के
08:08गलियारों को शुद्ध कर रहा हो.
08:11इस सेवा के प्रतियक खण में वह बालक अपनी शूद्र पहचान से उपर उठकर एक अलौकिक तेज की ओर बढ़
08:19रहा था.
08:20घने वनों के बीच वह शान्ति पूर्ण वातावर्ण जहां तपस्वी अपने मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे, उस बालक की
08:28चेतना का केंद्र बन गया.
08:30गरुर्ण ने अपनी विशाल आखों से इस बदलाव को देखा और विश्नु की मुस्कान में ही उस बालक का भविश्य
08:38सुरक्षित जान लिया.
08:40बालक की उंगलियां अब उन जड़ी बूटियों को चुनने में निपून हो गई थी, जिनका उप्योग रिशी अपनी आउश्धियों के
08:47लिए किया करते थे.
08:50प्रकृती भी इस बालक की भक्ती के प्रती नत्मस्तक हो गई थी, क्योंकि उसके हृदय में क्रिश्न के नाम का
08:57अंकुर फूट रहा था.
09:00तपस्वियों की साधना के बीच उस बालक का मौन, संसार के समस्थ शोर से अधिक प्रभावशाली प्रतीत होने लगा.
09:08विश्नु ने माया का परदा हलका सा उठाया ताकि वह बालक अपनी पूर्वचेतना के कुछ अंशों को स्वप्नवत देख सके.
09:17बालक को स्वप्न में वही गंधर्व लोग दिखाई दिया, जहां से वह गिरकर यहां मृत्युलोग की धूल में आया था.
09:25उस द्रिश्य को देखते ही उसके नेत्रों से अश्रु बहने लगे, जो धर्ती पर गिरते ही छोटे फूलों में परिवर्तित
09:32हो गए.
09:34रिशियों ने इस अलौकिक घटना को देख अपना शीष जुका लिया, क्योंकि वे समझ गए थे कि यह साधारन बालक
09:41नहीं, बलकि भक्ती का एक महासागर है.
09:46आकाश में मेग भी उस बालक के स्वागत में मधुर गर्जना करने लगे, मानो इंद्र देव ने भी अपनी स्विकृती
09:53दे दी हो.
09:55मृत्यो लोग की इस धरा पर पहली बार क्रिश्न का नाम उस बालक के अध्रों से एक स्पंदन के रूप
10:01में निकला.
10:03क्रिश्न की वह प्रथम ध्वनी पूरे ब्रहमांड में गूंच गई और वैकुंठ के द्वार उस बालक के लिए पुनह खुलने
10:10को व्याकुल हो गए.
10:12कुटिया के समीब छिपे हुए उस बालक के कानों में रिशियों के मुख से निहसरित वेदमंत्रों की अलोकिक ध्वनी किसी
10:19दिव्य औशधी के समान उतरने लगी.
10:23वैकुंठ में स्थित भगवान विश्नु के मुख पर एक सौमे मुस्कान तैर गई, जैसे उन्हें उस बालक के हृदय में
10:30जगी जिग्यासा का आभास हो गया हो.
10:34बालक ने जाडियों की ओट से देखा की कैसे अगनी के प्रचंड ताप में आहुती देते हुए रिशियों के मंत्र
10:41आकाश में एक जामितिय रचना बना रहे थे.
10:45हवा में तैरतेवे पवित्र अक्षर बालक की चेतना में किसी जादूई स्पंदन की भांती गहराई से अनकित होने लगे.
10:54विप्रीत परिस्थितियों और निशेधों के कठोर घेरे के बीच बालक का मन ज्यान की उस शीतल गंगा में डुपकी लगाने
11:01हे तू व्याकुल हो उठा.
11:04गरुर देव अपनी स्वर्ण में पंखों को फैला कर वैकुंट के प्रवेश द्वार पर खड़े होकर उस बालक की भक्ती
11:11को उचसुकता से निहारने लगे.
11:13उस बालक ने एक मुख संकल्प लिया कि वह भले ही इस ज्यान का अधिकारी नहीं माना गया, किन्तु उसका
11:21आत्मा ही इसका प्रमान बनेगा.
11:24वातावर्ण में गूंजती ओम की गूंजने बालक के भीतर सोई हुई उस प्राचीन उर्जा को जैसे किसी सोई हुए ज्वाला
11:32मुखी की भाती जागरत कर दिया.
11:35रिशियों की कुटिया के पास के उस छोटे से नाले में जल की बूदे भी मंत्रों चारण के साथ तालमिल
11:41बिठा कर लयात्मक ध्वनी उत्पन करने लगी.
11:46देवराज इंद्र ने उपर से इस द्रिश को देख कर अपना वजर नीचे जुका लिया, जैसे उन्होंने भी उस बालक
11:53की साधना के सामने मस्तक नमन कर दिया हो.
11:57बालक ने अपने ननहे हाथों से मिक्टी पर उन्ही मंत्रों को उकेरने का प्रयास किया, जिन्हें वह छिपकर सुनता था.
12:05ब्रहमांड के रचिता ब्रहमाजी ने इस पल को अपनी द्रिश्टी से देखा और स्रिश्टी के पन्नों में एक नई उर्जा
12:12का उदे होता हुआ अनुभव किया.
12:15अचानक कुटिया से बाहर निकले एक व्रिध रिशी को देखकर बालक घबराया, परन्तु उसने अपनी द्रिश्टी मंत्रों से नहीं हटाई.
12:25भगवान विश्टी ने अपनी वीना को जंकृत किया, जिससे उस बालक को एक अद्रिश्य सुरक्षा कवच प्राप्थ हुआ.
12:33धर्ती के उस छोटे से कोने पर अब रिशियों का अनुशासन और बालक की अनंत जिग्यासा एक दूसरे के आमने
12:41सामने थी.
12:43आकाश के रंग धीरे-धीरे बदलने लगे, मानो संध्या और रात्री के मिलन ने भी उस बालक के लिए एक
12:50विशेश पूर्जा का संचार किया हो.
12:53बालक के अध्रों पर फिर से कृष्ण का वह नाम उभ्या, जिसने हवाओं का रुख भी परिवर्तित कर दिया.
13:01देवी लक्ष्मी ने वैकुंट के प्रांगन से नीचे जहाका और उस बालक के प्रतीसने से भर गई, जो दरिद्रता में
13:08रहकर भी इश्वर को खोज रहा था.
13:11मिट्टी पर अंकित उनमंत्रों से प्रकाश की एक पतली रेखा निकली और सीधे उस बालक के हरिदय में समा गई.
13:20वह ख्षण ऐसा था मानो समय रुक गया हो और मृत्य लोग का वह बालक अचानक अपनी पूर्वस्मृतियों के द्वार
13:27पर खड़ा हो गया.
13:29संध्या की धुन्धलके में लिप्टे उस धने वन में अचानक प्रकृती ने जैसे अपनी गती रोक दी और चारों और
13:36एक अलोकिक सन्नाटा चा गया.
13:39वैकुंठ के स्वर्ण प्रासाद से भगवान विश्णू ने अपनी कमलन्यन द्रिष्टी नीचे प्रित्वी पर डाली जहां उनके भक्त का हृदय
13:47उस ध्वनी की प्रतीक्षा में धड़क रहा था.
13:51बालक के कानों में एक दिव्यगूंश प्रविष्ट हुई जो न हवा थी, न शब्द बलकी स्वयंक्रिष्ण की बानसुरी का वह
13:58मधुर आवाहन था जिसे सुनते ही रोमरों पुलकित हो उठा.
14:04वायुमंदल में वह राग दिखर गया, जिसे सुनकर काल के चक्र भी थम गये और व्रिक्षों की पत्तियां एक लैबध
14:11गती में हिलने लगी.
14:13बालक की अचेतन अवस्था में वह स्वर किसी गहरे धागे की तरह उलजी हुई स्मृतियों को एक एक कर खोलने
14:21लगा.
14:22भगवान विश्णों के मुख पर एक सौमय मुस्कान उभी क्योंकि उन्होंने देखा कि उनका गंधर्व अंश अब अपनी सांसारिक मोह
14:31की बेडियों को तोड़ने के लिए तयार है.
14:35बानसुरी की वह पहली ध्वनी उस शूदर बालक के मस्तक पर एक अद्रिश्य तिलक की तरह अंकित हो गई, जिससे
14:42उसकी सुप्त चेतना जागरित होने लगी.
14:45वन की हर दिशा से आती वह ध्वनी अब बालक के हरिदय में प्रतिध्वनित हो रही थी, जैसे वर्षों से
14:52भूला हुआ कोई पुराना राग फिर से स्मृती में आ गया हो.
14:57मृत्यो लोग की वह दरिद्र काया अब उस दिव्य संगीत के प्रभाव से एक तेजस्वी ओज में बदलने लगी, जैसे
15:04राख के धेर के नीचे दबा अंगारा धीरे-धीरे चमकने लगे.
15:09गरुर के पंकों की फड़फडाहट की ध्वनी उस संगीत में समाहित हो गई, जिससे बालक को यह आभास हुआ कि
15:16रक्षक अब निकठी है.
15:19बालक ने आखें खोली और उस पहली बार गूंजी हुई ध्वनी में उसे न केवल संगीत, बलकी अपने गंधर्व जीवन
15:27का वह खोया हुआ सत्य दिखाई दिया.
15:30वह ख्षण ऐसा था मानो संसार के सारे बंधन उस मधुर धुन के एक जोके में तिनके की तरह बिखर
15:37गए हुँ.
15:39वन के पशुपक्षी भी उस ध्वनी के वशी भूत होकर अपनी चंचलता त्याग कर बालक के चारों और मौन स्तब्ध
15:46खड़े हो गए.
15:48भगवान विश्णु ने अपनी उंगलियों से उस धुन को और अधिक सुक्ष्म किया, ताकि बालक के हृदय की गहराईयों तक
15:56वह सत्य पहुँच सके.
15:58उस बालक के कंट से भी अब स्वतह ही वही स्वर निकलने लगा, जो मृत्यु लोग के इतिहास में पहली
16:05बार किसी शूदर बालक के मुख से सुना गया था.
16:09ध्वनी का वह स्पंदन अब प्रित्वी की मिक्टी में भी संचारित हो रहा था, जिससे वन के मुर्जाय हुए पुष्प
16:16अचानक खेल उठे.
16:19इंद्रलोग की सभा में देवताओं ने भी जब उस धुन को सुना, तो वे भी अपने आसन छोड़कर उस बालक
16:25की भक्ती के आगे नत्मस्तक हो गए.
16:29ब्रहमांड के हर कोने में कृष्ण की उस बांसुरी का वह अनहद नाद फैल गया, जो पुनरजन्म और मुक्ती के
16:36बीच की धुन्धली रेखा को मिटा रहा था.
16:40बालक अब केवल एक शूद्र नहीं था, बलकि वह उस विराट चेतना का प्रतिविम बन चुका था, जिसे खोजने की
16:47यात्रा उसने जन्म से पहले शुरू की थी.
16:51जैसे ही बानसुरी की ध्वनी शान्त हुई, बालक ने अपनी आखे बंद की और वह पूर्णत उस पर्मानंद में विलीन
16:58हो गया, जिसे पाकर सब कुछ मिल जाता है.
17:02बालक ने अपनी कुटिया की धूल भरी फर्ष पर बैठते हुए स्वयन से प्रश्ण किया कि क्या यह नश्वर संसार
17:10केवल उसकी आत्मा की कैद है या इश्वर द्वारा रची गई एक कठिन परीक्षा.
17:16उसकी अंतरात्मा में गूंजती कृष्ण की वन्शी की मधुर ध्वनी और बाहर की दरिद्रता के बीच एक ऐसा द्वंद्व पैदा
17:24हुआ जिसने उसे गहरे चिंतन में धकेल दिया.
17:28हाथों में लकडी के भारी गठ्ठर लिये, उसने अचानक अपनी कापती उंगलियों को देखा और उसे यह आभास हुआ की
17:36ये हाथ किसी और ही लोग की सेवा के लिए बने थे.
17:41सांसारिक कर्तव्यों का बोज उसे बांधना चाहता था, किन्तु उसकी दिव्य चेतना उसे किसी और ही दिशा में निरंतर खीच
17:48रही थी.
17:50उसके चारों और का वातावर्ण अचानक एक अजीब से सन्नाटे में डूब गया, जैसे प्रकृती भी उसके भीतर चल रहे
17:58इस संधर्ष का साक्षी बन रही हो.
18:01भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा से धीरे से विचलित हुए, जैसे उन्हें उस बालक की छटपटाहट का स्पंदन अपने हृदय
18:09में महसूस हो रहा हो.
18:12बालक ने अपनी आखे मूंद ली और देखा कि उसके आसपास की जोपड़ी की दीवारे धुन्धली होकर अनंत अंतरिक्ष के
18:20सितारों में विलीन हो रही हैं.
18:23यह माया का वह परदा था, जिसे कृष्ण की ध्वनी ने फाड़ कर फेंक दिया था, और अब वह केवल
18:30यथार्थ के दो किनारों के बीच जूल रहा था.
18:34दूर कहीं नदियों के बहने की ध्वनी भी अब उसे उसी मधुर बांसुरी के संगीत की एक और कड़ी प्रतीत
18:41होने लगी थी.
18:43देवर्शी नारद का दिव्य अंश उस नश्वर बालक के भीतर अपनी स्मृतियों के गलियारों को फिर से खंगालने का प्रयास
18:50कर रहा था.
18:52उसने मिट्टी के बरतन उठाते हुए स्वयं को एक गंधर्व के रूप में कल्पना की, जिसके स्वर से कभी स्वर्ग
19:00के दर्बार गूँच उठा करते थे.
19:03संसार की कठोर सच्चाई ने उसे फिर से अपनी ओर खींचा, जिससे उसकी चेतना का वह दिव्य प्रकाश क्षंधर के
19:10लिए मंद पड़ गया.
19:13परंतु वह बालक अब साधारण न था, उसके भीतर का वह गंधर्व संसकार फिर से जागरित होने की तीवर तड़प
19:20महसूस कर रहा था.
19:22विश्णु के उस अंशने दूर आकाश में देखते हुए पूछा की आखिर कब तक उसे इन सांसारिक बेडियों में रहकर
19:30अपनी असली पहचान छिपानी होगी.
19:34उसके चारों और हवाएं तेज हो गई और अचानक उसे बांसुरी की वही मधुर गूंच फिर से सुनाई दी, जिसने
19:41उसके संकल्प को सुद्रिड कर दिया.
19:44अतीत का वह मोह जो उसे एक शूद्र बालक के जीवन से बांध रहा था, धीरे धीरे उस दिव्य संगीत
19:51के सामने पिघलने लगा.
19:54इस द्वन्दव के बीच उसने पहली बार यह अनुभव किया कि दुहक केवल मन की अवस्था है और आनंद उसकी
20:02आत्मा की वास्तविक स्थिती.
20:05देवर्शी नारत का वह अंश अब एक नए द्रिड संकल्प के साथ अपनी इंद्रियों पर नियंत्रन पा रहा था.
20:13जैसे ही उसने मिट्टी के ऊपर अपनी उंद्लिया चलाई, वहाँ अनायास ही कृष्ण के नाम की रेखाएं उभरने लगी.
20:22मृत्योलोग की वह पहली रात थी जब वह बालक अबडर के साए में नहीं, बलकी परमात्मा की प्रतीक्षा में जाग
20:29रहा था.
20:31बालक की बंद पलकों के पीछे एक दिव्य प्रकाश पुन्ज साक्षात होने लगा, मानो ब्रहमांड की सारी जोतियां एक बिंदू
20:39में सिमट आई हो.
20:41उस तेज के भीतर भगवान विश्नु के चतुर भुज रूप का दर्शन हुआ, जिनके मुख पर वह सौमे मुस्कान थी
20:48जो स्रिजन के प्रथम ख्षण में थी.
20:51बालक ने देखा कि कृष्न के वेचरण कमल, जिनके नख्मनी से सारा अंधकार मिट रहा है, धीरे धीरे उसके हृदय
20:59की ओर बढ़ रहे हैं.
21:02हृदय के द्वार पर उस अलौकिक स्पर्ष ने अहमकार की उन समस्थ पर्तों को भस्म कर दिया, जो उसे अब
21:09तक शूदर बालक के रूप में सीमित रखे हुए थी.
21:13उस एक क्षण के दर्शन ने बालक की समस्थ शारिरिक पीड़ा और दरिद्रता के बोध को ऐसे मिटा दिया, जैसे
21:20सूर्योदय के साथ ओस की बूंदे विलीन हो जाती हैं.
21:25विश्नु का वह करुण स्वर बालक के अंतर्मन में गूंजा, जिसने उसे यह बोध कराया कि देह तो मात्र एक
21:32वस्त्र है, वास्तविक अस्तित्व तो आत्मा की प्यास में नहित है.
21:38बालक ने देखा कि उसके रोम्रोम में कृष्न का नाम अब केवल ध्वनी नहीं, बलकि एक जीवन्त स्पंदन बनकर धड़कने
21:46लगा है.
21:48माया का वह सघन आवर्ण जो कल तक उसे संसार की दास्ता का अनुभव करा रहा था, अब पूरी तरह
21:55से छिन्न भिन्न हो चुका था.
21:57एक गंधर्व का अतीत और एक शूद्र बालक का वर्तमान दोनों ही उस दिव्य जोती में मिलकर एकाकार हो गए
22:05थे.
22:06गरुर के पंखों की फड़फडाहट जैसी एक दिव्य ध्वनी वातावर्ण में गूंजी, जैसे साक्षात वैकुंठ का द्वार बालक के लिए
22:14खुल गया हो.
22:16बालक ने अपनी कापती उंगलियों को उस प्रकाश की ओर बढ़ाया, मानो वह स्वयन को उस अनंत में विसर्जित करने
22:24के लिए आतुर हो.
22:26आकाश से उतरती उस दिव्य आभा के नीचे प्रकृती भी शांत थी, मानो वह भी इस महाचेतना के उदे की
22:33साक्षी बन रही हो.
22:36क्रिश्न के चरन चिनह अब बालक के मस्तक पर एक तिलक की भांती अनकित हो गए, जो उसकी अलोकिक यात्रा
22:43का शुभारंभ था.
22:46ब्रहमांड के सभी लोकों के स्वामी का वह सुक्ष्म अंश अब एक शूद्र बालक के तन में रहकर भी अपनी
22:52समगरता को प्राप्त कर चुका था.
22:55बालक के नेत्रों से गिरने वाले अश्रु साधारन जल नहीं, बलकी भक्ती के उस रस में डूबे थे जिसमें स्रिष्टी
23:03का सार छिपा था.
23:05वातावर्ण में एक अध्भुत सुगंध फैल गई, जो कमल और चंदन के सम्मिश्रण से कहीं अधिक दिव्य और मन को
23:13विमोहित करने वाली थी.
23:15वह शूद्र बालक अब साधारन बालक नहीं था, वह एक ऐसा सेतु बन चुका था जो मृत्यु लोग को वैकुंट
23:23की उर्जा से जोडने वाला था.
23:26अचानक उसके मुख से अनायास ही एक मधुर ध्वनी निकली, जो संसार के प्रथम नाद ओम के समान पवित्र और
23:33गहरी थी.
23:35उस ध्वनी के प्रभाव से धर्ती की धूल भी मानो सोना बनकर चमक उठी और चारों और एक दिव्य सन्नाटा
23:42चा गया.
23:44दर्शन की वह पूनता प्राप्त कर बालक अब पुनह अपनी निद्रा में गया, किन्तु इस बार वह निद्रा साधारन नहीं,
23:52बलकी परम योग की अवस्था थी.
23:55गाउं की धूल भरी गलियों में, जहां सूर्य की किरने भी कठोरता से पड़ती थी, वहां बालक की गहरी मौन
24:02अवस्था ने लोगों के मन में शंका के बीज बो दिये.
24:07गाउं के मुखिया ने अपने भेकुटी सिकोरते हुए कहा, कि यह बालक अपनी दरिद्रता को भूल कर जिस शूनी में
24:14खोया है, वह कोई दिव्य योग नहीं, बलकी एक आलस्य भरा पागलपन है.
24:21बालक के निर्विकार चहरे पर एक हलकी सी मुस्कान तैर गई, जैसे वह संसार के इन व्यर्थ के शब्दों को
24:28किसी सुदूर अतीत की गून समझ कर सुन रहा हो.
24:32सन्नाटा इतना घना हो गया कि गाउं की सूखी धर्ती पर उर्ती धूल के कन भी किसी ब्रहमांडियन रिती की
24:39भाती स्थिर दिखाई देने लगे.
24:42वहां से गुजरते हुए कुछ कर्मकांडी पंडितों ने जब बालक को बिना किसी मंतर के योग में लीन देखा, तो
24:49उन्होंने इसे धर्म की मर्यादा का उलंधन मान लिया.
24:54पंडितों का क्रोध बढ़ता गया, क्योंकि उन्हें लगा कि एक निम्न कुल में जन्मा बालक उनकी श्रिष्ठता और ज्यान को
25:01अपने मौन से चुनौती दे रहा है.
25:05बालक ने अपनी आखे धीरे से खोली और उसकी आखों की गहराईयों में वही अनंत सागर दिखाई दिया, जो स्रिष्ठी
25:13की रचना से पहले उपस्थित था.
25:16हवा का रुख बदल गया और चारों और एक ऐसी दिव्यगंध फैल गई, जिसने पंडितों के अहमकार को पल भर
25:24के लिए थाम लिया.
25:26गाउं की स्त्रिया भी अपने काम छोड़कर बालक की ओर देखने लगी, उनकी आखों में भय और विस्मय का अध्भुत
25:33संगम उमड रहा था.
25:36एक वृद्धस्त्री आगे बढ़कर चिल्लाई की इस बालक पर किसी अध्रिश्य शक्ती का साया है, जो गाउं की शांती भंग
25:43कर देगा.
25:45बालक ने कोई उत्तर नहीं दिया, किन्तु उसकी उपस्थिती ने ही उन सभी लोगों को अपनी ही अंतरात्मा के आईने
25:53में देखने को विवश कर दिया.
25:55शाम का धुंधल का गहराने लगा और जैसे ही सूरज अस्थ हुआ, गाउं की गलियों में एक अजीब सी उत्तेजना
26:03दोड़ गई.
26:04कुछ लोगों ने लाठिया उठा ली, यह सोचकर कि यह बालक उनके सामाजिक बंधनों को तोड़कर किसी अनिष्ट का संकेत
26:12दे रहा है.
26:14गाउं के पंडित ने आगे बढ़कर बालक को आदेश दिया कि वह तुरंत इस स्थान को त्याग दे, अन्यथा उसे
26:22कडादंड दिया जाएगा.
26:25बालक उठा, उसका शरीर धूल से सना था, किन्तु उसके चलने के धंग में किसी चक्रवर्ती समराट की गरिमा जहलक
26:33रही थी.
26:34एक लिक द्रिश में उसके कदमों के नीचे की मिट्टी मानों उसके चर्णों को नमन करने के लिए दब रही
26:41थी.
26:42पंडित और गाव वाले सहम गए, क्योंकि उन्होंने अब तक केवल दरिद्रता देखी थी, और आज उन्हें एक ऐसी भव्यता
26:50का बोध हुआ जिसे वे समझ नहीं पा रहे थे.
26:54बालक ने केवल एक बार पीछे मुड कर देखा, और उस द्रिष्टी ने सभी के मन में छिपे द्वेश को
27:01भस्न कर दिया.
27:03वह अंधकार की ओर चल पड़ा, मानो मृत्यू लोग की सभी बाधाएं उसके लिए मात्र धूल का एक धेर थी,
27:10जिसे वह आसानी से पार कर सकता था.
27:14गाओ के पीछे छूट जाने के बाद, उस नीरव रात्री में बालक ने पुनह अपने भीतर उस महाचेतना का आहवान
27:21किया, जो सृष्टी के अंत तक बनी रहेगी.
27:25बालक ने शून्यता के उस विस्तृत कैनवास पर कदम रखा जहां केवल वायू की सनसनाहट ही उसका एक मात्र संगीत
27:33थी.
27:34वैकुंट के स्वर्ण प्रासाद में भगवान विश्णु ने अपने नेत्र खोले, जहां से एक दिव्य नीली जोती इस शूदर बालक
27:42की चेतना को स्पर्श करने लगी.
27:45बालक ने मिट्टी के एक धेर को अपना तकिया बनाया और अपने ननहे हाथों को जोड कर उस अनाम सत्य
27:53की खोज में आखे मूंद ली.
27:56संसार की माया ने उसे घेरना चाहा, परंतु उसके भीतर जल रही भक्ती की अगनी ने अंधकार के उन तंतूओं
28:03को भस्म कर दिया.
28:05वह शूद्र बालक अब एक सांसारिक देह नहीं रहा, बलकी एक ऐसा पात्र बन चुका था जिसमें ब्रह्मांड का सार
28:13सिमटने लगा था.
28:16देवर्शी नारद ने उपर से उस बालक की निस्वार्थ भक्ती देखी और उनके मुख से अंजाने ही उस परम प्रभु
28:23के नाम का जैगोश निकल पड़ा.
28:26बालक ने एक गहरे श्वास के साथ अपने समस्थ सांसारिक दायत्वों को उस महासागर में विसरजित कर दिया जो उसके
28:34अंतर्मन में बह रहा था.
28:37अंधकार की उस गहरी पर्तों में एक दिव्य कमल खिला, जिसका प्रकाश उस निरव रात्री की सीमाओं को पार कर
28:44जाने की क्षमता रखता था.
28:47यह बालक अब किसी जातिया पहचान के बंधन में नहीं था, क्योंकि वह स्वया उस पर्मात्मा के चर्णों की धूल
28:55बनने का संकल्प ले चुका था.
28:57शिव के त्रिनेत्र ने इस अद्भुत समर्पन को स्वीकार किया और कैलास के शिखर से शीतलता की एक मंद बयार
29:05मृत्यूलोग की ओर प्रवाहित हुई.
29:08बालक के तन पर लगी धूल भी अब स्वर्ण के समान चमकने लगी थी, मानो उसके त्याग ने प्रकृती के
29:15नियमों को ही बदल दिया हो.
29:18प्रतिकात्मक रूप से उसके अहंकार के सभी कवच एक एक कर तूटकर गिर रहे थे, जैसे किसी पुराने व्रिक्ष से
29:26पत्जड में पत्ते जड़ते हैं.
29:29उसकी आत्मा ने अब अपनी वास्तविक पहचान का बोध पा लिया था, जो स्रिष्टी के रचिता के हृदय के सबसे
29:36निकट का कोना है.
29:39भगवान श्री कृष्ण की मधुर वन्शी की गूंच पहली बार उस बालक की हृद्यगुहा में अनुनादित हुई, जिससे पूरा वातावर्ण
29:46चैतन्य हो उठा.
29:49बालक ने अपनी आखें खोली और उसकी दृष्टी में वह अनंत करुणा थी जो केवल मृत्युलोक में कृष्ण को खोजने
29:57वाले भक्त में ही होती है.
30:00वह अक्षन काल के गर्भ में अमर हो गया, जहां एक सामाने शूदर बालक की पुकार ने वैकुंठ के द्वारों
30:07को भी जखजोर दिया था.
30:09चारू दिशाओं से उस बालक को एक अलौकिक शक्ती का अनुभव हुआ, जो उसे सांसारिक दुखों की बेडियों से मुक्त
30:17कर रही थी.
30:19देवराज इंद्र के आसन तक उस बालक की भक्ती की गूंच पहुँची, जिसे सुनकर वे भी अपनी दिव्य सभा में
30:26अचम्भित रह गए.
30:28बालक ने धीरे धीरे खड़ा होकर उस दिशा में चलना शुरू किया, जहां केवल प्रकाश था, अपने पिछले जीवन के
30:36समस्त भार को वहीं त्याग कर.
30:39मृत्युलोग की वह पहली रातरी अब एक नए युग के उदे का साक्षी बनने जा रही थी, जहां भक्ती ही
30:45एक मात्र धर्म थी.
30:48बालक के चरण मृत्युलोग की उस धूल भरी पकडंडी पर बढ़ रहे थे, जहां की हवा में भविश्य की अनंत
30:55संभावनाय तैर रही थी.
30:58वैकुंट के स्वर्ण कमलों पर विराजमान भगवान विश्णु ने अपनी योगनिद्रा के बीच भी उस बालक के साहस को देख
31:05एक मंद मुस्कान बिखेरी.
31:08बालक ने अपनी आखों को बंद किया और उस बांसुरी की ध्वनी को महसूस किया जो अब उसके हृदय के
31:15स्पंदन में समा गई थी.
31:18आकाश में नक्षत्रों ने अपनी चाल धीनी कर ली थी, जैसे वे भी इस शूदर बालक की अध्भुत यात्रा के
31:25साक्षी बनना चाहते हूं.
31:27पगडंडी अब एक धने और रहस्य में वन की ओर मुर गई थी, जहां की हर पत्ती पर ओसकी बूंदे
31:34किसी मंत्र की तरहें चमक रही थी.
31:38देवर्शी नारद ने वीना के तारों को छेड़ा और उस ध्वनी ने बालक के मार्ग में आने वाली बाधाओं को
31:44सुक्ष मूर्जा में बदल दिया.
31:47बालक ने रुपकर अपने पीछे छूटते संसार को देखा, उसे अब केवल एक भ्रम की तरहा अनुभव हो रहा था
31:55जिसे उसने पीछे छोड़ दिया.
31:58प्रकृती ने स्वयं उस बालक के लिए मार्ग बनाया, मानो लताओं ने अपने आप जुपकर उसे आगे बढ़ने का संकेत
32:05दिया हो.
32:07दूर क्षितिच पर पहाडों की श्रिंख लाए किसी विशाल प्रहरी की तरहे खड़ी थी, जो उसे किसी महान गुरु के
32:14आश्रम की सूचना दे रही थी.
32:17भगवान शिव ने कैलाश की एकांतता में अपनी तीसरी आख से उस बालक के अंतर्मन में छिपी भक्ती को बड़ी
32:25सुक्षमता से निहारा.
32:27बालक के पैरों में अब ठकान नहीं बलकी उस बांसुरी के सूर की प्रतिध्वनी थी, जो उसे हर पल शक्ती
32:34प्रदान कर रही थी.
32:36अंधेरी राद के साये में एक दिव्यदीपक स्वयं प्रकट हुआ, जिसने उस बालक के हर पक के नीचे भूमी को
32:43प्रकाशित कर दिया.
32:46वह शूद्र बालक अब केवल एक देह नहीं था, बलकी वह भक्ती का एक ऐसा स्वरूप बन गया था, जो
32:53नेती को बदलने निकला था.
32:55गरुर ने उची उडान भरते हुए उस बालक पर अपनी छाया की सुरक्षा कवच बना दी ताकि कोई भी विधन
33:03उसे छू न सके.
33:05बालक ने एक पुराने कूप के समीप रुप कर जल पिया, मानो वह उस तीर्थ का जल हो जो उसे
33:11उसकी विस्मृत स्मृती से जोड सके.
33:25जंगल की हिंसक पशुपक्षी भी उस बालक के पास आकर मौन हो गए, जैसे वे भी उस दिव्य ध्वनी को
33:31सुनना चाहते थे.
33:34समय मानो थमसा गया था जब उस बालक ने अपना अगला कदम एक दिव्य प्रवेश द्वार की ओर बढ़ाया जो
33:41अद्रिश्य था.
33:43बालक के मुख पर अब वह तेजस्वी आभा दिखने लगी थी, जो किसी योगिराज के माथे पर ही शोभा देती
33:50है.
33:52शूद्र बालक की यह यात्रा अब सांसारिक बंधनों को तोड़ कर सीधे उस मार्ग पर थी जहां कृष्ण के चर्णों
33:59की आहट सुनाई दे रही थी.

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